अम्मी मेरी अम्मी | incest indian sex story - Complete Kahani All Parts
मेरानाम वली अहमद हैं। मे 35 साल कां हूं औऱ पिछले 6 सालों सें मे अपने बीबी बच्चो समेत ब्रसेल्स, बेल्जियम मे रहरहा हूं। हमारे मशारें मे, वतन छोड़ बाहर् बसने पर्र अक्सर ये इतिमाद किया जाता हैं कि ये आदमी पाकिस्तान मे सही मौका औऱ मौहौल न् मिलने सें वहां सें भाग बाहर् बस गय़ा हैं मगर मेरेसंग ऐसाकोई फसाना नहीं हैं। मेरीवजह कुछ औऱ हैं औऱ उसका जिक्र भि मैनेकभी किसी सें किया नहीं हैं। मेरीवजह मेरी अम्मी कां इंतकाल थां औऱ आज, उसवजह कां जिक्र कर अपनेदिल कां बोझ उताररहा हूं।
मेरी जीवन मे अम्मी केसेऐसा मुकाम बन गई कि उनके इंतकाल केँ बाद मेरा पाकिस्तान मे मन नं लगा उसके पीछे एक् दास्तां हैं। ये दास्तां एक् वाक्ये सें शुरुआत हुईँ औऱ ये वाक्या तब कां हैं जब मे अपनेघऱ, देहात गुल्ज़ारवाला सें दूरशहर डेरा ग़ाज़ीखान मे रहकर पढ़ाईकर रहा थां। मे जब ग्रेजुएशन करनेघऱ सें यहां डेरा गाज़ी खानआया थां तब मुझेशहर कि हवा नहींलगी थि। मे तब जिस्मानी रिश्तों औऱ जिन्सी अमलऐसा कुछ नहीं जानता थां। मुझ पऱ शहर मे दोस्तो कि सोहबत कां कुछऐसा असर पड़ा कि इनसभी चीजों कों लेकरआदत पड़ गयीँ, थि। कुछदिन तक कुछनया नं मिले तोँ जहनी तबियत परेशान हौ जाती थि। हकीकतन आज तक मैने महिला कि चूत मात्र एक् दोबार दोस्तों द्वारा छुपछुप कर लायेगए ब्लू फिल्म मे हि देखी थि मगरमन बहोत करता थां। मुझे हकीकत मे चूत कों छूने औऱ चोदने कि बड़ी हसरत थि मगर इसकेलिए जोखम लेने कि हिम्मत अभि तक नहींआई थि। इससभी कां येअसर जरूर थां कि हलाला औऱ चुदाई कि किताबें पढ़करघऱ कि औरतों कों लेकरनज़र बदल गयीँ, थि।
कभीकभी मे जब इसको लेकर बहोत पुरजोश होँ जाता तौ मुट्ठ मार लेता थां पऱ जल्दी हि अपने कों कसूरवार महसूस करने लगता थां। बड़ी जलालत महसूस होती थि मगरमन थां कि नहीं मानता हि नहि थां। मे सोचने लगता थां कि अगरघऱ मे हि मिलजाए तौ कितना लुक्फ आँ जाए, पऱ यह नामुमकिन थां। मेरेलिए बसयहतलब केवल खयालों मे हि थि औऱ उसतलब कों मुतमइन करने केँ लिए लौड़े कों मुट्ठ मारना हि सहारा थां।
साल मे दोबार मे घऱ जाता थां, एक् गर्मियों कि छुट्टी मे दूसरा सर्दियों मे। मेरेघऱ मे मात्र अम्मी औऱ दादाजी जान दादीमा थें, अब्बू दुबई मे रहते थें। अब्बू साल मे एक् बारबस एक् महीने केँ लिएआते थें औऱ मेरी अम्मी खेती बारी, घऱ औऱ दादाजी दादीमा कों संभालती थि। मेरी अम्मी अपनेनाम "अंजुमन" कि तरह प्यारी तौ थि हि संग हि वोँ संग सबका ख्याल रखने वाली भि थि। खेतों मे काम करके भि उनके गोरेरंग पे अधिककोई फर्क नहींपड़ा थां। वोँ बहोत अधिक खूबसूरत तोँ नहीं थि पर्र किसी सें कम भि नहीं थि, जिस्म भराहुआ थां, करीब सारादिन काम करने सें बदन मे कोई अधिक चर्बी भि नहींचढ़ी थि। मैंने उनके शरीर कों कभी हसरत कि नज़र सें नहीं देखा थां इसलिये उनके शरीर कि बनावट कां माप कां कोई अंदाजा नहीं थां।
इसबार सर्दियों मे जबघऱआया तौ मुझे आदतन चुदाई केँ किस्सों कां रिसाला याँ पुस्तक पढ़ने कां मनहुआ मगर जल्दबाजी मे उन्हे मे खरीदकर लानाभूल गय़ा थां। जोँ घऱ मे मेरे बक्से मे पड़ी थि वोँ सभीपढ़ी हुईँ थि। अब यहां देहात मे मिले कहां, किसके पास जाऊं, कहां मिलेगी? डरते डरते एक् दो पुरानी पुस्तक कि दुकानों पऱ पता किया तौ उन्होंने मुझे अजीब नज़रों सें देखा तौ फिन मेरी हिम्मत हि नहीं हुइ। देहात कि दुकानें थि, यही कहींआते जाते सें किसी दुकानदार नें अगर गाँव केँ किसी व्यक्ति सें जिक्र कर दिया तौ शर्मिंदा होना पड़ेगा, इसलिये मैंने कुछदिन मन मारकर बितादिए पऱ मन बहोत बेचैन होँ उठा थां।
एक् दिन अम्मी नें मुझसे कहा कि कच्चे घर-मकान मे पीछे वाले कमरे केँ ऊपरबने कोठे पर्र पुरानी मटकी मे गुड़ कां राब भरकेरखा हैं, जरा उसको उतारदे।
मैंने सीढ़ी लगाई औऱ कोठे पऱ चढ़ गय़ा, वहां अंधेरा थां, बस एक् छोटे सें झरोखे सें हल्की रोशनी आँ रही थि। मे टार्च लेकरआया थां, टॉर्च जलाकर देखा तोँ मटकी मे भराहुआ राबदिख गय़ा, पऱ संग मे मुझे वहां बहोत सि पुरानी किताबों कां गट्ठर भि दिखाई दिया। मैंने वोँ राब कि मटकी, सीढ़ी पर्र थोड़ा नीचे उतरकर, नीचे खड़ी अम्मी कों पकड़ाया औऱ बोला- अम्मी यहां कोठे पऱ किताबें कैसीपड़ी हें?
अम्मी- वोँ तौ बहोत पुरानी हैं हमारे जमाने कि, इधरउधर फेंकी रहती थि तौ मैंने बहोत पहले सारी इकट्ठी करके यहींरख दि थि, तेरेकुछ काम कि हें तोँ देख लेँ।
यह कहकर अम्मी चली गयीँ, तौ मे फिन कोठे पर्र चढ़कर, अंधेरे मे रखी वोँ किताबों कां गट्ठर कों लेकर छोटे सें झरोखे केँ पासबैठ गय़ा। उसमेकई तरह कि पुरानी कॉपियां औऱ किताबें थि, पुराने जमाने कि शेरो शायरी औऱ घऱ हकीमी, घरेलू नुस्खे, मे सारी किताबों कों उलट पुलटकर देखता जारहा थां कि अचानक मेरे हाँथ मे जौ पुस्तक आयी उसकेकवर पेज पर्र लिखा थां - "जिंसी ज़िंदगी इस्लाम औऱ जदीद साइंस", यह देखकर मेरी आँखें चमक गयीँ,, मे इसके बारे मे जानता थां। ये "कोकशास्त्र" कां उर्दू मे तर्जुमा थां जिसमें चुदाई केँ बारे मे बताया गय़ा होता हैं। मे ये सोचकर बदहवास होँ गय़ा कि यह पुरानी पुस्तक हैं तौ मतलब जरूरयह मेरे अम्मी अब्बू कि विवाह केँ टाइम कि होगी। जरूर अब्बू नें खरीदी होगी, शायद अम्मी कों यहयाद नहींरहा होगा कि इस गट्ठर मे ऐसी पुस्तक भि हैं इसीलिए उन्होंने मुझे किताबों कां पुरानां गठ्ठर देख लेने कों बोल दिया थां।
जैसे हि मैंने उस पुस्तक केँ बीच केँ कुछ पन्नों कों खोला तौ मे हैरान हौ गय़ा। मैंने पुस्तक कों झरोखे केँ औऱ नजदीक लेँ जाकर ध्यान सें देखा तोँ वोँ गंदी कहानियों कि पुस्तक थि जिस पर्र बाद मे कवरअलग सें चिपकाया गय़ा थां। मेरी बांछे खिल गयीँ,, मे मारे खुशी केँ उछल पड़ा। मैंने उस गट्ठर कों इधरउधर एक् बारफिन सें खगाला औऱ फिन सारी किताबों कों जस कि तस बांधकर, दुबारा उनको कोने मे रख दिया। सिवाय उस गंदी कहानियों कि पुस्तक कों जिसे मैंने अपनी कमीज केँ नीचे छुपा लिया थां औऱ फिन मे कोठे सें नीचेउतर आया।
उस समय दोपहर केँ 2 बजरहे थें, दोपहर मे अक्सर मे घऱ केँ बाहर् दालान मे सोया करता थां जिसमे जानवरो केँ लिए भूसारखा हुआ थां। मुझसे सब्र नहीं होँ रहा थां, दोपहर मे दादाजी दादीमा खानां खा केँ पेड़ केँ नीचेसो रहे थें, मे दालान मे गय़ा औऱ बिस्तर बिछाकर वोँ गंदी पुस्तक पढ़नेलगा। मे, जिसतरफ भूसा थां उसतरफ पांव कियाहुए थां औऱ पुस्तक लेटकर, इसतरह पढ़रहा थां कि मेरा चेहरा पुस्तक सें ढकाहुआ थां। मे पुस्तक पढ़ने मे खो गय़ा औऱ ताव केँ मारे मेरा लन्ड दोनों जाँघों केँ बीचतन कर खड़ा होँ गय़ा थां। मैंने दो कहानियां पढ़ली थि जैसे हि तीसरी स्टोरी कों पढ़ने केँ लिएपेज पलटा तोँ स्टोरी कां नाम देखकर मेरे शरीर मे अज़ीब सां जोशए खरोशभर गय़ा। ये किस्सा मर्जी सें मम्मी बेटे केँ बीचबने, जिस्मी तालुकात कि बुनियाद पऱ थि। मैंने आज तक जौ भि कहानियां पढ़ी थि वोँ इधरउधर, आसपास केँ दूर केँ रिश्तों पर्र थि, पऱ यह किस्सा सगे माँ बेटे केँ बीच कि थि, किस्सा कि शुरवात करते हि मेरा जर्रा जर्रा कांपने लगा। मैंने उसे अभि एक् चौथाई हि पढ़ा थां कि खट सें दरवाजा खुला औऱ अम्मी एक् हाँथ मे बड़ी सि बोरी लेकर भूसा भरने केँ लिए दालान मे आँ गई। मुझेइस बात कां बिल्कुल भि इल्म नहीं थां कि अम्मी वहां, इस समय आँ जायेगी।
जैसे हि अम्मी दालान मे दाखिल हुई मैंने पुस्तक थोड़ा नीचे करके एक् सरसरी निगाह सें उनको देखा औऱ फिन दुबारा, उनको अनदेखी कर, किस्सा मे डूब गय़ा। मुझे इत्मीनान थां कि अम्मी कों क्याँ पता चलेगा कि मे क्याँ पढ़रहा हूं औऱ मेरे ख्याल मे यह बिलकुल भि नहि आया कि स्टोरी जिस पुस्तक सें पढ़रहा हूं उस पर्र "जिंसी ज़िंदगी इस्लाम औऱ जदीद साइंस" लिखाहुआ हें। केवल लिखाहुआ हि नहि थां बल्कि उसकेसंग फीकापड़ चुके, नंगे बूतों कि चुदाई कि तस्वीर भि उसपरछपी हुई हैं।
मे पुस्तक मे घुसा, स्टोरी पढ़ने मे दुबारा मस्त हौ गय़ा। अपनीसगी अम्मी कि मौजूदगी मे, मम्मी बेटे केँ बीच जिस्मानी तालुकात कि चाहत कि बातें पढ़कर, मे बहोत हेज़न ज़ादा हौ गय़ा थां, पऱ मेरी हिम्मत नहीं होँ रही थि कि मे अम्मी कि तरफ देखूं। मैने एक् बार चुपके सें, किनारे सें अम्मी कों देखा, तोँ वोँ झुककर बोरी मे भूसाभर रही थि। उनके भारी भरकम चूतड़ मेरीओर थें। अम्मी कों पहलीबार आजइसनज़र सें देखकर, मुझे बड़ी लज्जा आईमगर उनको लेकर मेरे लौड़े मे जौ जोशभर गय़ा थां वोँ बेमिसाल थां। मे शर्मिंदगी कों छुपाते हुएफिन पुस्तक मे देखने लगा। अभि कुछ हि समय बीता थां कि एकाएक अम्मी कि तेज आवाज़ सुनकर मे चौंक पड़ा।
अम्मी- यह क्याँ हैं तेरे हाँथ मे? क्याँ पढ़रहा हैं तुँ?
मे सकपका गय़ा औऱ पुस्तक कों तकिए केँ नीचे छिपाते हुएकहा- कुछ नहीं, कुछ भि तौ नहीं, ऐसे हि बस एक् पुस्तक हैं।
अम्मी- कैसी पुस्तक दिखा मुझे, कहां मिली तुम्हे?
अम्मी नें इसतरह पूछा जैसे अम्मी कों पुस्तक जानी पहचानी सि लगी, वोँ शायदयह इत्मीनान करना चाहती थि कि कहींयह उनके जमाने कि उनकी वोँ पुस्तक तोँ नहीं? मे लज्जा सें पानी पानीहुआ जारहा थां, मुझेये शुभा होँ रहा थां कि शायद अम्मी कों यह अंदाजा होँ गय़ा हैं कि वोँ गंदी पुस्तक हैं।
मुझेबुत बनादेख, अम्मी मेरेपास आई औऱ तकिए केँ नीचे सें वोँ पुस्तक निकाल ली। उन्होंने जैसे हि पुस्तक कों देखा वोँ चौंकी औऱ उनका लज्जा सें चेहरा लाल होँ गय़ा। अम्मी केँ चेहरे पर्र आए एकाएक लज्जा केँ वजूद कों देखकर मे समझ गय़ा कि वोँ पुस्तक पहचान चुकी हें। उन्होंने एकदम सें पुस्तक मेरे सीने पऱ पटकी औऱ हल्की सि शर्मिंदगी भरी मुस्कान लिए, अपना दुपट्टा दांतो मे दबाए, भूसे कि बोरी उठाकर दालान सें बाहर् निकल गई,। अल्लाह कां बड़ा शुक्र रहा कि उनकीनज़र मेरे लन्ड सें बने तंबू पऱ नहींपड़ी। मेरे तोँ जैसे काटो तौ खून नहीं, मे यहसोच करडरा हुआ थां कि अम्मी मुझे डाटेंगी। उसकेबरत, उनका मुझे डांटने केँ बजाय उल्टा शर्मा करचले जानां एक् तौ यहबता रहा थां कि अब वोँ यहसमझ चुकी थि कि मे अबबड़ा होँ चुका हूं। दूसरा वोँ यहसमझ चुकीथीं कि यह पुस्तक उनके जमाने कि हैं औऱ वोँ मुझे कहां सें मिली होगी। मुझे लगता हैं अम्मी शायदइस बात पर्र भि लज्जा यहलाल हौ गई, थि कि उनके बेटे कों अंदाजा होँ गय़ा हैं कि अपनेसमय मे वोँ भि येसभी पढ़ती थि। अम्मी कां डांटने कि स्थान शर्मा कर निकल जाने नें मेरे अंदर एक् अजीब सि सनसनाहट पैदाकर दि। मुझे डांटने कां ख्याल अम्मी कों नहींआया इस ख्याल नें मुझे हिम्मत सें लबरेज कर दिया।
मे बहोत देर दालान मे हि बैठारहा औऱ बहुतदेर बाद, पुस्तक कों तकिए केँ नीचे छुपाकर घऱ मे अंदर गय़ा। वहां अम्मी कामकर रही थि। अम्मी नें मुझेआया देख अपनाकाम करतेहुए, लज्जा सें मंदमंद मुस्कुराने लगी थि। कुछदेर बाद उन्होंने मुझसे बोला- कहां मिली तुम्हें वोँ पुस्तक?
मे- कोठे पऱ किताबों केँ गट्ठर मे।
अम्मी नें फिन थोडा गुस्से मगर शर्माते हुएकहा- ऐसी किताबें पढ़ता हैं तूँ?
मे- नहीं अम्मी, वोँ बस देखा तोँ मन किया। अब क्याँ कहे, आप् जानती हें क्याँ उसके बारे मे?
अम्मी नें शर्माते हुएझूठ बोला- नहीं
मे- तोँ आप् ऐसे क्यूं पूछरही हौ?
अम्मी- इतना तोँ पुस्तक केँ फोटो कों देखकर पताचल हि गय़ा कि वोँ गंदी पुस्तक हैं। ऐसी पुस्तक नहीं पढ़ते।
मे- उसमे कहानियां हैं अम्मी।
अम्मी औऱ शर्मा गई, - फाड़ केँ फेंकदे उसको, गंदी कहानियां होती हें वोँ।
मैंने हिम्मत करके- आपको केसेपता? यह पुस्तक देखने मे बहोत पुरानी लगती हैं, कब कि हैं अम्मी?
अम्मी चुप हौ गई, - बोला नं फाड़ केँ फेंकदे उसको, नहीं तोँ तेरे अब्बू कों बता दूंगी।
मे- औऱ अगरफाड़ केँ फेंक दि तौ नहीं बताओगी नं
अम्मी - नहीं
अम्मी मुझे देखकर हल्का सां मुस्कुरा दि औऱ नं जाने क्यूं वोँ मेरीतरफ देखने लगी, मुझे भि नं जाने केसे हिम्मत आँ गयीँ, मे भि उनको देखने लगा, दोनों कि सांसें कुछतेज चलनेलगी, अम्मी मुझसे कुछ दूरी पऱ खड़ी थि।
मैंने फिन धीरे-धीरे सें बोला- अब्बू कों नहीं बताओगी नं?
अम्मी नें धीरे-धीरे सें न् मे सर हिलाते हुएकहा औऱ शरमाकर कमरे मे चली गयीँ,।
अम्मी कां इसतरह मुझेभरी नजरों सें देख्ना मुझेकुछ इशारा कररहा थां। न् जानेयह क्याँ होँ रहा थां, मेरामन खुशी केँ मारेझूम उठरहा थां। अम्मी केँ चेहरे पऱ लज्जा कि लालीयह बतारही थि कि उनकेमन मे बहोत कुछ करवटें लें रहा हैं। उन्होंने मुझेजिस तरह देखा औऱ आंखे नहीं मिलाई, उससे मे बड़ा हैरान थां। मुझे आजतक उन्होंने कभीऐसे नहीं देखा थां औऱ नं हि मैंने उन्हें।
मे खड़ाखड़ा कुछदेर सोचता रहाफिन घऱ केँ बाहर् आँ गय़ा। एक् तरफ जहां मे डररहा थां कि अम्मी क्रोध करेंगी, न् जाने क्याँ क्याँ सोचेंगी मगरयह क्याँ हुआ? मेरादिल तोँ यह सोचकर जोरो सें धड़कउठा कि लगता हैं कि अल्लाह ताला नें मेरीसुन ली!फिन भि मे अभि पूरीतरह इत्मीनान मे नहीं थां। होँ सकता हैं कि मम्मी बेटे कि कथापढ़ कर मेरा दिमाग़ चल गय़ा हौ औऱ ये मेरा केवल ख्याल हौ? अम्मी कि हया मे डूबी मुस्कराहट कों देखकर, मेराउस पुस्तक सें मनहट गय़ा। जब ज़िंदगी मे इसतरह कां कोई वाक्या गुजर जाता हैं तौ किसीचीज़ मे कहां मन लगता हैं?
उसकेबाद सें मे छुपछुप कर अम्मी कों घूरने लगा। जब वोँ इधरउधर दरवाजे पर्र काम करती रहती याँ घऱ मे भि जबकाम करती रहती तोँ मे उन्हें किनारे सें घूरता याँ कभी उनकीओर टकटकी बांधे देखता रहता। मेरा उनकी घूरना, अम्मी सें नजरंदाज नहि थां। वोँ भि मुझको उनको देखता हुआ देखकर, कुछदेर मेरी आँखों मे घुसकुछ तलाश करती। अम्मी मेरे अंदर केँ इरादों कों पढ़ने कि कोशिश कररही थि, वोँ कभी अकबका केँ सामने सें हट जाती औऱ कभी शरमाकर, मुस्कुरा करचली जाती।
कुछ दिनों तक ऐसा हि चलतारहा फिन एक् दिन कि बात हैं कि मे बरामदे मे बैठा थां तभी अम्मी आँ गई औऱ मेरेपास मे बैठकर, थाली मे मटर छिलने लगी। मुझे बैठा देखा अम्मी, मुझसे ग्रेजुएशन केँ बादआगे क्याँ करना हैं पूछने लगी औऱ मे उन्हें अपने ख्वाबों केँ बारे मे बतारहा थां कि मेरी सामने बाग मे नज़रचली गई,। वहां देखा कि कुछलोग एक् भैंस कों लेकरआये औऱ उसेपेड़ सें बांध दिया। बाग मे क्याँ चलरहा हैं इसका अम्मी कों कोई गुमान नहीं थां, वोँ तौ बसमटर छीलती जारही थि औऱ मुझसे बातेकिए जारही थि। मे भि हां हूं कां जवाब देताजा रहा थां मगर उनकीनज़र बचाकर सामने देखेजा रहा थां। मे बाग मे शुरुआत होने वालेकाम कों भांप गय़ा थां। वहां भैंस कि एक् भैसे सें हरी कराईजा रही थि। अब क्योंकि मेरे दिलों दिमाग़ मे केवल चोदन चुदान घुसा थां इसलिये मेरा लन्ड मेरे पैंट मे फूलने लगा।
भैंस कों पेड़ सें बांधने केँ बाददो लोगकुछ दूरखड़े हौ गए औऱ थोड़ी देर मे हि बगल वालेघऱ सें एक् भैंसा भागता हुआआया। उसने लगभगदो बित्ता लम्बा लालरंग कां लन्ड बाहर् निकलरखा थां जिसको देखकर मेरे लन्ड नें भि हुंकार मार दि। अम्मी नें अभि तक उसतरफ नहीं देखा थां औऱ मे इधर गर्म हौ रहा थां, बारबार उनसे नजरेबचा केँ उधर हि देखरहा थां। वोँ भैंसा, भैंस कि बूर कों सूंघने लगा। भैंस थोड़ी चिहुंकी फिन मूतने लगी। भैंसे कां लंड अब लगभग 2 इंच औऱ बाहर् आँ गय़ा थां। मे नज़रबचा करउसतरफ हि देखरहा थां कि तभी अम्मी नें गौर किया कि मे बारबार एक् हि तरफ क्यूं देखरहा हूं। येदेख उन्होंने ऐसे मौके पर्र उसतरफ देखा, जिस टाइम भैंसा लगभग 3 बित्ता लन्ड बाहर् निकाल चुका थां। उसकालाल लाल लन्ड, शरीर मे अलग हि झुरझुरी पैदाकर रहा थां। अम्मी नें ये देखते हि एकदम सें मेरीतरफ देखा तौ मे सकपकाया हुआ उन्हें हि देखरहा थां। जैसे हि हमारी आंखे मिली, एकाएक अम्मी कां चेहरा लज्जा सें लाल हौ गय़ा औऱ वोँ "धत्त" कहतेहुए घऱ केँ अंदरभाग गई। मेरी तौ हालत खराब होगई, सांसें धौकनी कि तरह चलनेलगी थि।
मैंने हिम्मत करके उन्हें एक् बार पुकारा भि पर्र वोँ नहींआई। उधरबाग मे एक् दोबार नाकाम होने केँ बाद भैंसा अब भैंस केँ ऊपरचढ़ चुका थां। दोचार धक्के उसने भैंस कि बूर मे मारेफिन नीचेउतर गय़ा। मे यहसभी देखकर औऱ गरम हौ गय़ा। भैंसे नें फिन कोशिश कि औऱ एक् दोबार फिन भैंस कि बूर मे तेजी सें अपनालाल लाल लन्ड डालकर धक्के मारे। मुझसे जबरहा नहीं गय़ा तौ मे जल्द सें उठा औऱ एक् नज़र बाहर् दादाजी दादीमा पर्र डालकर, घऱ मे चला गय़ा। मेरी जिदारी बढ़रही थि। मैंने पाया अम्मी पीछे वाली कोठरी मे बड़े सें बक्से केँ पासखड़ी थि। मुझेऐसा कुछ शुबहहुआ कि जैसे अम्मी वहां मेरा हि इंतज़ार कररही थि। मे एक् पल उन्हें देखता रहा औऱ वोँ मुझे देखती रहीं। हम् दोनों कि हि सांसें तेज चलनेरही थि औऱ कुछदेर ऐसे हि बुतबने हम् दोनों खड़ेरहे। अम्मी कों मे गौर सें देखरहा थां औऱ मुझेये पुरजोर इत्मीनान होँ चुका थां कि उनकी आंखों मे बुलावा हैं मगरखून केँ रिश्ते कि दीवार अब भि बीच मे खड़ी थि। मे जैसे हि आगेबढ़ा तौ वोँ मेरीतरफ पीठ करके अपना मुँह अपने हांथों मे छुपाते हुए "नं" बोलते हुएपलट गई। मगर मुझेअब सब्र कहां थां, मैंने उन्हें पीछे सें बाहों मे भर लिया। आज पहलीबार एक् स्त्री कां गुदाज शरीर मेरेबदन सें सटा थां औऱ वोँ भि मेरी हि अपनीसगी अम्मी कां! मेरादिल इतनीजोर जोर सें सीने मे धड़करहा थां कि लगा कि वोँ उछलकर बाहर् हि आँ जायेगा। जोँ मेराहाल थां वहीहाल अम्मी कां भि थां, उनकीतेज चलरही सांसें मे बखूबी महसूस कररहा थां।
मे अम्मी कों पीछे सें बाहों मे लिएहुआ थां, वोँ नं अपने आप् कों मुझसे छुड़ारही थि औऱ नं हि मुझेआगे बढ़ने कों कोई दावतदे रही थि। मेरे कों तौ बड़ी अजीब सि बदहवासी हौ रही थि। मेरी बाहों मे गिरफ्त अम्मी केँ गुदाज बदन नें मुझे जिन्सी तमन्ना सें लबरेज कर दिया थां। मेरा लन्ड तनकर उनकी गुदाज चूतड़ों कि दरार मे घाघरे केँ ऊपर सें हि ठोकर मारने लगा जिसे वोँ अच्छे सें महसूस कररही थि। उनके मुंह सें न् चाहते हुए भि हल्की सि अहह निकल गई, औऱ वोँ बोलि- याँ अल्लाह! यह गुनाह हैं, मतकरवली, कोई आँ जायेगा।
मे- आह्ह्ह अम्मी, बस एक् बार!
मैंने बस इतना हि बोला औऱ उनको औऱ मजबूती सें पकड़कर, उन्हे अपनी बाहों मे भरतेहुए, उन्हे महसूस कराने केँ लिए, अपने लन्ड कों जानबूझकर उनके भारभराए चूतड़ों मे तेजी सें दबा दिया। मेरे लन्ड कि इसठसक सें उनकी हल्की सि सिसकी निकल गयीँ,। मैंने जैसे हि उनकी ब्लॉउज मे कैद नंगीपीठ कों चूमा, मे जिन्सी कि दूसरी हि दुनियां मे पहुंच गय़ा। मे इतना जज़्बाती कभी नहींहुआ, जितना आज अपनी अम्मी केँ संग लिपटने सें हौ रहा थां। मैंने धीरे-धीरे धीरे-धीरे उनकीपीठ औऱ गले पऱ उन्हे कई स्थान चूमा औऱ हरबार वोँ अपना चेहरा अपने हांथों मे छुपाए सिसकजा रही थि। मे इतना तौ समझ हि रहा थां कि वोँ भि येसभी करना चाहती थि, यदिऐसा न् होता तोँ वोँ अभि तक मेरेगाल पे थप्पड़ मारकर, मुझे अच्छे सें पीट चुकी होती। इसके बावजूद वोँ नं तौ मुझे अपने सें हटारही थि औऱ न् हि मुझे अच्छे सें आगे बढ़नेदे रही थि।
मुझे इतने हि नें इतनापुर शेवतकर दिया थां कि अब मुझसे रहा नहीं गय़ा औऱ मैंने पूराजोर लगाकर उनको सीधा करके अपनी बाहों मे भर लिया। उन्होंने अब भि अपना चेहरा अपने हांथों सें मुंदा हुआ थां, जिसकी वजह सें उनकी मोटी गुदाज छातियाँ मेरे सीने सें सट नहींपा रही थि। मैंने उनको धकिया कर बक्से सें सटा दिया औऱ बेशर्म होकर घाघरे केँ ऊपर सें हि उनकीबूर पर्र अपने टंटनाते हुए लन्ड सें चार पाँच धक्के मारे तौ वोँ तेजी सें सिसकिया दि। मे अब अपनेहोश ओहवसखो रहा थां। मैने बिनाकोई परवाह किए अपना हाँथ नीचे अम्मी कि बूर कों छूने केँ लिए लेँ गय़ा तौ उन्होंने लपक सें मेरा हाँथपकड़ करउसे झटक दिया। अपनीइस रुसवाई सें बेखबर जब मैंने अपने होंठ, उनके होंठ पर्र रखने चाहे तोँ उन्होंने एक् हाँथ सें अपने होंठढक लिए औऱ मेरी आँखों मे देखने लगी। मे चाहता तौ जबरदस्ती कर सकता थां, पर्र उनकी आंखे बयांकर रही थि कि उनकेसंग जबरदस्ती औऱ जल्दबाजी करना दोनो हि गलत होगा। मे अपनी अम्मी कि हसरतों औऱ तसादुम कों खौफजदा नहीं करना चाहता थां, इसलिये मे उनकी आंखों मे बड़ी हसरतों सें देखने लगा।
मेरा लन्ड अभि भि तमतमाया हुआ उनकीबूर पऱ घाघरे केँ ऊपर हि धराहुआ थां। मे उनको औऱ वोँ मुझेकुछ देरऐसे हि देखते रहे, फिन अम्मी उखड़ती भारी आवाज़ मे धीरे-धीरे सें बोलीं- यह गुनाह हैं वली।
मे- मे येसभी नहीं जानता अम्मी, मुझे आप् चाहिए।
अम्मी- छोड़दे नहीं तौ तेरे अब्बू कों बता दूंगी।
मे- आपकीयही ख्वाइश हैं? तौ बता देना अब्बू कों, पऱ एक् बार, बस एक् बार इख्तिलात कि इजाजत देदे, प्रेम करनेदो अम्मी।
ऐसा कहतेहुए मैंने अपने लन्ड कों उनकीबूर पर्र फिनऊपर सें दबाया तौ वोँ फिन सिसकउठी।
अम्मी- नामुराद लड़के! कोई आँ जायेगा! जा यहां सें अभि, नहीं तौ सच मे मे तेरे दादाजी कों बुला केँ तेरी करतूत बता दूंगी।
अम्मी चुप होँ गई, औऱ फिन मुझे देखने लगी। मैंने नीचे अपने हाँथ कों उनके हाँथ सें छुड़ाया औऱ अब उनके हाँथ कों पकड़कर अपनेतने हुए लन्ड पर्र जैसे हि रखा तोँ उन्होंने झट सें अपना हाँथहटा लिया।
मे- एक् बार अम्मी, बस एक् बार।
मेरेइस तरह इस्तदा करने पर्र वोँ मेरी आँखों मे देखने लगी। उनकी आंखों मे कश्मकश केँ बादलछट रहे थें, मुझे उनमें हसरतों केँ उफनते गुबार साफदिख रहे थें। मैंने जुर्रत करके दुबारा उनके हाँथ कों पकड़ा औऱ उसे अपनेखड़े हुए मोटे लन्ड पऱ रखने केँ लिए लें गय़ा। मैंने जैसे हि अम्मी केँ हाथ कों अपने लन्ड पऱ रखा, उन्होंने मेरे सीने मे अपनासर छुपाते हुए मेरे लन्ड कों कस केँ पकड़ लिया। मेरे सीने मे धसी अम्मी कांपरही थि मगर उनकाहाथ मेरे लन्ड कों सहलारहा थां। अम्मी मेरे लन्ड कों थोडा सहलाने केँ बाद उसकोआगे पीछे करके मुठियाने लगी तोँ मस्ती मे मेरी आंखें बंद हौ गई,। मुझे यकीन नहीं होँ रहा थां कि आज मेरीसगी अम्मी, मेरे लन्ड सें खेलरही हें। जब थोड़ी देर मे अम्मी नें लन्ड कों मुट्ठ मरनाबंद कर दिया तोँ मेरी आंखेखुल गई। मैंने देखा, वोँ मुझे हि देखरही थि औऱ हम् दोनों कि उखड़ी उखड़ी सांसें चलरही थि। मुझे आंखेखोल देख, अम्मी नें मेरे लन्ड कों फिन आहिस्ते सें सहलाया औऱ बोलि- वालीअब जा, कोई आँ जायेगा।
मैंने उनकीबात मानते उन्हें छोड़ दिया औऱ थोड़ा पीछेहटा तोँ मेरा लन्ड पैंट मे बुरीतरह तनाहुआ थां, जिसको देखकर अम्मी केँ चेहरे पर्र मुस्कराहट आगई औऱ उन्होंने दांतो मे दुपट्टे दबा, चेहरा ढक लिया। मे उनका शर्माना देख, जैसे हि दुबारा उनके लगभग जानेलगा तौ अम्मी बोलि- जा न्, अब क्याँ हैं?
मे- एक् बार
अम्मी- एक् बार क्याँ?
मैंने अम्मी कि बूर कि तरफ इशारा करकेकहा- एक् बार छूनेदो नं अम्मी।
अम्मी- बड़ा गुस्ताख हैं तूँ! अभि नहीं, अभि जा यहां सें।
मे अम्मी कि बातसुन पीछेहट गय़ा औऱ उनके इसरार कों तस्लीम करतेहुए बाहर् निकल गय़ा। मेरेमन मे हजारों पटाखे फूटरहे थें, मुझेबस अब अम्मी केँ इशारे कां इंतज़ार थां मगरये इशारा कब तक मिलेगा, ये भि कोई वाजे नं थां। ऐसे मे, इशारे कि तलाश मे कईदिन बीतगए औऱ मुझेये लगनेलगा थां अम्मी जानबूझ कर मुझसे दूरबना रखी हैं। अम्मी मुझेदेख कर मुस्कुरा तोँ देती थि मगर मेरेपास सें गुजरने याँ अकेले मे रहने सें बचती भि थि। मेरेलिए अम्मी केँ येनए अंदाज बिल्कुल भि समझ केँ बाहर् थें। अम्मी नें जमाना देखाहुआ थां, उन्हे इसका इल्म थां कि मैने वो पुस्तक फाड़ी नहीं होगी बल्कि पूरीपढ़ ली होगी। अम्मी येबात भि अच्छी तरह जानती थि कि उसी मे तीसरी कथा मां बेटे पर्र हैं।
जैसा पहले बताया कि उन दिनों सर्दियां थि इसलिये मे भूसा रखने वाले दालान मे हि सोता थां। अंधेरे रात कि तन्हाई मे मुझे अम्मी केँ संग गुजरे वेसमय बेहद तकलीफ देते थें। अम्मी केँ संगहुए उस वाक्यें कों बीतेअब सातदिन बीत चुके थें औऱ गुजरते दिन केँ संग अम्मी केँ संग अगले राब्ते कि उम्मीद भि कम होँ रही थि। मुझे लगनेलगा थां कि मेरी जौ ख्वाइश हैं वोँ अम्मी कि अब नहींरही हैं। अम्मी कि एक् हफ्ते कि बेरुखी सें मे नाउम्मीद होँ चला थां औऱ सर्दी भरीउस रात मे दालान मे बेधड़क सोरहा थां। रात देहात मे कोहरा भि होँ जारहा थां। मे कोहरे भरीउस चांदनी रात मे दालान मे भूसे केँ बगल मे खटिया पर्र बनियान औऱ चढ्ढी पहनेऊपर सें तहमद लपेटे, रजाई ओढ़ेसो रहा थां।
अचानक दालान कां दरवाजा हल्के सें खटखटाने कि आवाज़ हुईँ जिससे मेरी नींदखुल गई। शायद दरवाजा दोतीन बार पहले भि खटखटाया गय़ा थां, मे रजाई सें निकला औऱ दरवाजे पर्र जाकर अंदर सें बोला-कौन?
अम्मी नें धीरे-धीरे सें कहा- मे….दरवाजा खोल
मैंने झट सें दरवाजा खोला तौ सामने अम्मी शॉलओढ़े खड़ी थि वोँ झट सें अंदर आँ गयीँ, औऱ दालान कां दरवाजा अंदर सें बंद करके मेरीओर मुड़ी औऱ अंधेरे मे मेरी आँखों मे देखने लगी। मुझे भरोसा हि नहीं हौ रहा थां कि मेरी अम्मी इस अंधेरी रात, चुपके सें मेरे सामने खड़ी हैं। मैने जल्द सें दिया जलाने कि कोशिश कि तोँ अम्मी नें धीरे-धीरे सें कहा- दियामत जलावली बाहर् रोशनी जाएगी खिड़की सें।
मे दिया जलाना छोड़कर उनकीतरफ पलटा तोँ वोँ मुझे अपनाशॉल उढ़ाते हुए मुझसे लिपट गयीँ,। मुझे काटो तोँ खून नहीं, मैंने उन्हें औऱ उन्होंने मुझे बाहों मे भर लिया। ऐसा मंजर वाकई होँ गुजरेगा ये मैनेकभी सपने मे भि नहीं सोचा थां। हम् दोनों कि साँसे धौकनी कि तरहतेज तेज चलनेलगी, अम्मी कां गुदाज शरीर कों अपनी बाहों मे महसूस कर मेरी आशनाई इंतहा पर्र पहुंच गई थि। मैने जैसे हि उन्हें चूमने केँ लिए उनके चेहरे कों अपनी हथेली मे थामा, वोँ धीरे-धीरे सें बोलि- किसी कों कभीखबर नं चलेवली?
मैंने भि धीरे-धीरे सें कहा-कभी नहीं अम्मी, आप् फिकरमंद नं होँ, आप् कों आते, किसी नें देखा तोँ नहीं?
अम्मी नें फिन धीरे-धीरे सें कहा- नहीं, तेरे दादाजी दादीमा ओसारे मे सोरहे हें।
उस लम्हे ठंड नं जाने कहां गायब होँ गई, थि, मैंने अम्मी कों कस केँ अपने सें चिपका लिया। मैंने आजफिन उनके मुंह सें सिसकी सुनी तोँ मेरा लन्ड तहमद मे फुंकार मारकर खड़ा हौ गय़ा। वोँ हल्की चीख लेकर मुझसे लिपट गयीँ,, मे उन्हें चूमने लगा, उनकी सांसे तेजी सें ऊपर नीचे होँ रही थि। एक् अजीबों गरीब सि सनसनी हम् माँ बेटे केँ जिस्मों मे हौ रही थि। दोनों कि गर्म गर्म सांसें एक् दूसरे केँ चेहरे पऱ टकरारही थि। मैने, अम्मी केँ गालों कों चूमने केँ बाद जैसे हि उनके होंठों पर्र अपने होंठरखे मेरा पूरा शरीर कांप गय़ा। आज मुझे पहलीबार महसूस हुआ कि किसी महिला केँ होंठों कों चूमने पऱ कैसा लगता हैं औऱ ये तोँ मेरी अम्मी केँ होंठ थें! मे उनके होंठों कों चूमने लगा औऱ वोँ मेरासंग देनेलगी। होंठों कों चूमते चूमते जब मैंने अपना हाँथ उनके गदराए चूतड़ों पर्र रखा तोँ उनके शरीर मे अजीब सि थिरकन हौ उठी। अपनी हि अम्मी केँ चूतड़ छूकर भि मुझे यकीन नहीं होँ रहा थां, मैंने जैसे हि उनकी गांड कों दबाया वोँ सिसककर मुझसे कस केँ चिपट गई,। मैंने उन्हें बाहों मे उठाया औऱ अंधेरे मे हि बैड पऱ लिटाया औऱ "ओह अम्मी" कहतेहुए उनकेऊपर चढ़ गय़ा। मैनेऊपर सें रजाईओढ़ ली थि। अम्मी नें "धीरे-धीरे सें बोल" कहतेहुए मुझे अपने आगोश मे भर लिया। रजाई केँ अंदर हम् दोनों एक् दूसरे सें लिपटगए। मेरा लन्ड लोहे कि तरह तनकर जैसे हि उनकीबूर केँ ऊपर चुभा वोँ मुझसे शर्मा कर लिपटती चली गई,। मे उनके गालों, गर्दन, कान, माथा, नाक, आंख, ठोढ़ी पऱ ताबड़तोड़ चुम्बनों कि बरसात करनेलगा औऱ अम्मी मेरेइस इजहार ए इश्क मे भीगी धीरे-धीरे धीरे-धीरे कसमसाते हुए सिसकने लगी।
मैने जैसे हि दुबारा उनके होंठों पर्र अपने होंठरखे तोँ उन्होंने मेरे बालों कों सहलाते हुए मेरे होंठों कों चूमना शुरुआत कर दिया। मैने चूमते चूमते अपनीजीभ जैसे हि उनके होंठों सें छुवाई उनके होंठ अपने आप् खुलते चलेगए औऱ जैसे हि मेरीजीभ उनके मुंह मे डली, हम् दोनों सिरहउठे। मैंने महसूस किया कि वोँ जब मेरीजीभ कों चूसने लगी थि तौ उनकीबूर इस तपिश मे कांपने लग थि। कभी वोँ मेरीजीभ कों चूसती तौ कभी मे उनकीजीभ सें खेलने लगता, एकएक मेरा हाँथ उनकी मम्मों पऱ गय़ा तोँ वोँ फिन सिसकउठी। मुझसे जबरहा नहीं गय़ा तौ मे उनके ब्लॉउज केँ बटन खोलने लगा। अंधेरे मे
कुछदिख तौ नहींरहा थां मगरजब किसीतरह सें ब्लॉउज केँ बटनखोल दिए तोँ अम्मी नें स्वयं हि उसे निकाल करबगल मे रख दिया। अब वोँ खाली ब्रा मे थि, मेरादिल तौ उनकी 38 साइज कि जिन्सी हवास मे तनी हुइ दोनों चूचीयों कों महसूस करके हि बदहवास हौ चला थां। मैने जल्द सें ब्रा कों ऊपर उठाया तौ उनकी मोटी मोटी चूचीयाँ उछलकर बाहर् आँ गई,, जिनपर मैंने अंधेरे मे मुँह लगाकर उन्हें बहुतदेर तक महसूस किया। मेरे होठों औऱ गालों कि तपिश सें अम्मी तैश मे आगाईं औऱ सिसकते हुए अपनी चूंचियों पर्र दबाने लगी।
मे तौ आजरात सातवें आसमान मे थां, सोचा नं थां कि अल्लाह मुझपे इतनी महेरबान होंगे। मे जब अपनी अम्मी कि चूंचियों कों मुंह मे भरकर पीने औऱ दबाने लगा तौ वोँ नं चाहते हुए भि सिसकारे लेनेलगी। वोँ अपने दांतों कों होंठों सें काटने लगी औऱ उनके चूचकहवस मे तनकर किसी काले अंगूर कि तरह होँ चुके थें। उनकी दोनों चूचीयाँ फूलकर किसी गुब्बारे कि तरह होँ चुकी थि। एकएक मैंने अपना हाँथ उनकी ढोढ़ी पऱ रखा तौ वोँ समझ गयीँ, कि अब मे किसतरफ बढ़रहा हूं। मैंने जैसे हि अपना हाँथ उनके घाघरे कि गांठ पऱ रखा औऱ हल्का सां अंदर सरकाया तोँ उन्होंने मेरा हाँथ शर्माते हुएपकड़ लिया, मैंने धीरे-धीरे सें बोला- एक् बार दिखादो अम्मी।
वोँ थोड़ीदेर चुप रहीं तोँ मे फिन घिघियाता हुआ बोला- दिखादो न् अम्मी, मैंने कभी देखा नहीं हैं।
अम्मी धीरे-धीरे सें बोलीं- मुझे लज्जा आती हैं।
मे- बस एक् बार जल्द सें।
कुछदेर वोँ खामोश रही तोँ मे समझ गय़ा कि यह खामोशी उनकी रजामंदी हैं। मे चुपचाप उठा औऱ दिया लेकर आँ गय़ा, अब तक अम्मी नें पूरी रजाई अपने मुंह पर्र डालली थि। मैंने दिया जलाया औऱ पेर केँ पास जाके रजाई कों हटाकर, उनके साये कों ऊपर सरका दिया। मेराऐसा करने पर्र अम्मी नें धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपने पांव एक् दूसरे पऱ चढ़ाकर अपनी प्यासी बूर कों शर्मिंदगी सें बचाने कि कोशिश करनेलगी। मैने उनके घाघरे कों कमर तक उठा दिया औऱ उनकी गोरी गोरी सुडौल जांघें देखकर तौ मेरी साँसे हि फंस गई। मैंने आज पहलीबार अपनी हि अम्मी कों इसतरह देखरहा थां। कुछदेर उन्हें ऐसे हि बेसुध देखने केँ बाद मैंने उनकेपेर अलग किये, तोँ उनका जिस्म सिरहउठा। आज एक् सगा बेटा अपनीसगी अम्मी कि बूर देखने जारहा थां। उनका बुराहाल थां, रजाई मुँह पर्र डाले वोँ इतनीतेज तेज साँसे लिएजा रही थि कि रजाईहिल रही थि।
मैंने दिये कि रोशनी मे मैने देखा कि उनकी प्यासी बूर कां आकार बखूबी उनकेसाए केँ ऊपर सें हि दिखरहा थां औऱ उस स्थान पऱ साया बहुत गीली भि हौ गय़ा थां। मैंने साए केँ ऊपर सें हि बूर पर्र अपना मुंहरख दिया औऱ बूर कों अपने मुंह मे भर लिया। जैसे हि मेरा मुँह उनकीबूर पऱ लगा, अम्मी थोड़ाजोर सें कराहपड़ी औऱ उनकी जांघें स्वयं ब स्वयं हि हल्का सां खुल गयीँ,। मे वैसे हि कुछदेर बूर सें आती मदहोश कर देने वालीगंध कों सूंघता रहा। कभी साए केँ ऊपर सें बूर कों चाटता तोँ कभी जाँघों कों सहलाता औऱ चूमता औऱ उसकेसंग अम्मी भि सिसके जारही थि। कुछ हि देरबाद उन्होंने स्वयं हि मेरे दोनों हांथों कों पकड़कर जब अपनीकमर पऱ साए कि गांठ पऱ रखा तोँ मे अपनी अम्मी कि मंशासमझ गय़ा "कि वोँ अब बर्दाश्त नहींकर पारही हैं औऱ स्वयं हि सभी उतारने कां इशारा उन्होंने मुझेदे दिया हैं"।
मे खुशी सें झूमउठा। मैंने जल्द सें साए कि गांठखोल उसे नीचे सरका दिया औऱ जब मेरीनज़र अपनी अम्मी कि बूर पऱ पड़ी तोँ मे उसे देखता हि रह गय़ा। जीवन मे आज पहलीबार मे रूबरू हौ बूरदेख रहा थां औऱ वो भि अपनी हि अम्मी कि। क्याँ बूर थि उनकी, हल्के हल्के बाल थें बूर पऱ, गोरी गोरी जाँघों केँ बीच उभरी हुई फूली फूली फांकों वालीबूर जिसकी दोनों फांकों केँ बीच हल्का हल्का चिपचिपा रसबहरहा थां। दोनों फांकों केँ बीच, तना हुआ तीता देखकर मे तोँ पागल सां हि हौ गय़ा औऱ बिना देरी कियेबूर पऱ झुककर होंठलगा दिए। अम्मी मे मुंह सें जोर कि आह निकल पड़ी औऱ मे बूर कों बेताहाशा चाटने लगा। कभी नीचे सें ऊपर तौ कभीऊपर सें नीचे, कभी तीता कों जीभ सें छेड़ता तौ कभीबूर कि छेद पऱ जीभ चलाता। अम्मी जोश खरोश मे सिसकने लगी औऱ कुछ हि देरबाद उनके हाँथ स्वयं हि मेरे बालों पऱ घूमने लगे। वोँ बड़े प्रेम सें मेरेसर कों सहलाने लगी, मेरेसर कों अपनीबूर पऱ दबाने लगी औऱ छटपटाहट मे उन्होंने अपनेसर सें रजाईहटा दि थि।
तभी उन्होंने कुछऐसा किया कि मुझे यकीन नहींहुआ कि वोँ मुझेऐसे बूर परोसेंगी। उन्होंने कुछदेर बाद स्वयं हि लजाते हुए तसवर सें लबरेज अपने एक् हाथ सें अपनीबूर कि दोनों फांकों कों फैलाकर बूर कां गुलाबी गुलाबी छेद दिखाया। मानो वोँ जीभ सें उसे अच्छे सें चाटने कां इशारा कररही हों। उनकीइस अदा पर्र, मारेजोश केँ मेरा लन्ड फटा हि जारहा थां। मैंने झट सें बूर केँ छेद मे अपनीजीभ नुकीली करकेडाल दि तौ उनका शरीर गनगना गय़ा। उनके चूतड़ हल्का सां थिरकगए। एक् तेज सनसनाहट केँ संग उन्होंने दूसरे हाँथ सें मेरेसर कों अपनीबूर पर्र दबा दिया औऱ मे अपनीजीभ कों हल्का हल्का उनकीबूर मे अंदर बाहर् करनेलगा। वोँ लगातार सिसके जारही थि, मुझसे अबरहा नहींजा रहा थां तभी एकाएक उन्होंने मेरेसर कों पकड़कर मुझे अपनेऊपर खींचा तोँ मे रजाई अच्छे सें ओढ़ताहुआ अपनी अम्मी केँ ऊपरचढ़ गय़ा। वोँ मेरी आँखों मे देखकर मुस्कुराई, मे भि मुस्कुराया फिन वोँ लजा गयीँ,। इस उठापटक मे मेरी तहमदकब कि खुल चुकी थि औऱ मे बस बनियान औऱ चढ्ढी मे थां। मेरा लन्ड लोहे कि तरहतना हुआ थां, अब वोँ नीचे सें बिल्कुल नंगी थि, वोँ ऊपर सें भि नंगी थि बस उनका घाघरा कमर पऱ थां, मे मात्र चड्डी औऱ बनियान मे थां।
दिया अभि जल हि रहा थां, वोँ मुझसे नज़रें मिलाकर लजागईं। उन्होंने जल्द सें एक् हाँथ सें दिया बुझा दिया, औऱ मेरी बनियान कों पकड़कर उतारने लगी तोँ मैंने झट सें हि उसे उतार फेंका औऱ रजाई ओढ़कर हम् दोनों रस्से कि तरह एक् दूसरे सें लिपटगए। मे उनकी मोटी मोटी चूचीयाँ औऱ तनेहुए चुचक अपने नंगे जिस्म पर्र महसूस कर मदहोश होताजा रहा थां। कितनी नरम औऱ गुदाज थि उनकी चूचीयाँ! मैंने कुछदेर उन्हे चूमा औऱ जब चढ्ढी केँ अंदर सें हि अपनेखड़े लन्ड सें उनकी नंगीबूर पऱ हल्का हल्का धक्के मारे तोँ वोँ औऱ लजा गयीँ,। अब दालान मे बिल्कुल अंधेरा थां, मैंने धीरे-धीरे सें उनका हाँथ पकड़ा औऱ अपनी चढ्ढी केँ अंदर लें गय़ा वोँ समझ गयीँ,। उन्होंने शर्माते हुए स्वयं हि मेरे लोहे केँ समान कठोर होँ चुके 7 इंच केँ लन्ड कों जैसे हि पकड़ा, उनके मुँह सें हल्का सां सिसकी केँ संग निकला "अल्लाह! इतनाबड़ा!" मैंने बोला- मात्र मेरी अम्मी केँ लिए।
वोँ मुझसे कस केँ लिपट गई, औऱ फिन मेरेकान मे बोलीं- कभी किसी कों खबर न् लगे, तेरे अब्बू कों पतालगा तौ गज़ब हौ जाएगा।
मे- आपको मेरेऊपर यकीन हैं नं अम्मी।
अम्मी- बहोत, अपने सें भि अधिक।
मैंने उनके होंठों कों चूम लिया तौ उन्होंने मेरासंग दिया। मेरे कठोर लन्ड कों सहलाते हुए वोँ सिसकने लगी औऱ मेरी चढ्ढी कों पकड़कर हल्का सां नीचे करतेहुए उसे उतारने कां इशारा किया। मैंने झट सें चढ्ढी उतार फेंकी औऱ अब मे रजाई केँ अंदर बिल्कुल नंगा थां। उन्होंने सिसकते हुए अपनी दोनों टांगें हल्का सां मोड़कर फैला दिया, जैसे हि मेरा दहाड़ता हुआ लन्ड उनकी दहकती हुईँ बूर सें टकराया वोँ बेखुदी मे सिसकउठी। मेरा लन्ड उनकीबूर पर्र जहां तहां टकराने लगा औऱ दोनों कि हि सिसकी निकलजा रही थि। मैंने अपने लन्ड कों उनकी रसीली बूर कि फांकों केँ बीच रगड़ना शुरुआत कर दिया। मुझसे रहा नहींजा रहा थां औऱ उनसे भि नहीं, बार बार लन्ड चूत सें टकराने सें वोँ बहोत भड़क चुकी थि। मैंने एक् हाँथ सें अपने लन्ड कों पकड़ा, उनकी चमड़ी खोली औऱ जैसे हि उनकी रिसती हुई बूर केँ छेद पर्र रखा उन्होंने मेरेकान मे धीरे-धीरे सें बोला- धीरे-धीरे धीरे-धीरे वाली, बहोत दिनों बाद, बहोत बड़ा हैं यह!
मे- अब्बू सें भि?
उन्होंने लजाकर मेरीपीठ पर्र चिकोटी काटते हुए बोला- हाँ….बेशर्म
मैंने उन्हें चूम लिया औऱ बूर कि छेद पऱ रखकर हल्का सां दबाया तोँ लन्ड फिसलकर ऊपर कों सरक गय़ा, मारे बदमस्ती केँ थरथरा सां रहा थां। वहीहाल अम्मी कां भि थां। जल्द सें जल्द वोँ मेरा लन्ड अपनीबूर कि गहराई मे लेनाचाह रही थि औऱ मे भि उनकीबूर मे जड़ तक लन्ड उतारना चाहरहा थां। पऱ आज मेरेलिए जीवन मे यह पहलीबार थां, मारे बदहवासी केँ मे कांप सां रहा थां।
अपनी हि अम्मी कों चोदना कां सोचकर हि मे मतवाला हौ जाता थां मगरआज कि रात तौ मे यह हूबहू कररहा थां। एक् दोबार लन्ड ऊपर कि ओरसरक जाने केँ बाद अम्मी नें अपने दोनों पेर मेरीकमर पऱ लपेटलिए औऱ एक् हाँथ नीचे लेँ जाकर मेरे तड़पते लन्ड कों पकड़कर एक् बार अच्छे सें सहलाया औऱ फिन अपनीबूर कि छेद पऱ रखकर उसकोसही मार्ग दिखाते हुए दूसरे हाँथ सें मेरी गाँड़ कों हल्का सां दबाकर लन्ड घुसाने कां इशारा किया तौ मैंने एक् तेज धक्का मारा। लंड इसबार गच्च सें आधाबूर मे चला गय़ा, वोँ कराहते हुए बोलीं- "धीरे-धीरे धीरे-धीरे" अब लन्ड बूर मे घुस चुका थां। उन्होंने हाँथ वहां सें हटाकर सिसकते हुए मुझे आगोश मे भर लिया, मे कुछदेर ऐसे हि आधा लन्ड बूर मे घुसाए उनपरचढ़ा रहा, आज पहलीबार पतालग रहा थां कि वाकई मे हर मर्द कों बूर चोदने कि हसरत क्यूं तड़पाती रहती हैं, क्यूं इसबूर केँ लिए वोँ मरता हैं।
क्याँ जन्नत कां अहसास कराती हैं यहबूर, कितनी नरम थि अम्मी कि बूर अंदर सें औऱ बिल्कुल किसी भट्टी कि तरह बदहाली मे धधकरही थि। कुछसमय तौ मे कहींखो सां गय़ा। अम्मी मेरीपीठ कों सहलाती रही, फिन मैंने एक् तेज धक्का औऱ मारा औऱ इसबार मेरा लन्ड पूराजड़ तक अम्मी कि बूर मे समा गय़ा। वोँ एक् तीखे दर्द सें कराहउठी, मुझे स्वयं अहसाह हौ रहा थां कि मेरा लन्ड उनकीबूर कों चीरता हुआ उनके बच्चेदानी सें जा टकराया थां। वोँ मुझसे बुरीतरह लिपटी हुइ थि औऱ आंखेबंद कियेतेज तेज कराहरही थि। अब रुकना कौनचाह रहा थां, मैंने रजाई अच्छे सें ओढ़ी औऱ उन्होंने कराहते हुए अपने कों मेरे नीचे अच्छे सें पसरी औऱ फिन मैंने धीरे-धीरे धीरे-धीरे लन्ड कों अंदर बाहर् करतेहुए अम्मी कों चोदना शुरुआत कर दिया। वोँ मस्ती मे सिसकते कराहते हुए मुझसे लिपटती चली गई,, इतना आनंद आएगायह कभी सपने मे भि नहीं सोचा थां। जितना कुछकभी सोचा थां उससे कहीं ज़्यादा आनंद आँ रहा थां।
दालान मे पूरा अंधेरा थां, धीरे-धीरे धीरे-धीरे मे उन्हें तेजतेज चोदने लगा औऱ मेरे धक्कों नें पूरा रफ्तार पकड़ लिया, खटिया चर्रर्रर्रर चर्रर्रर्रर करनेलगी, न् चाहते हुए भि दोनों केँ मुंह सें बदकार सिसकारियां निकलने हि लगी थि। मैंने दोनों हाँथ नीचे लेँ जाकर अपनी अम्मी केँ मोटे मोटे चूतड़ों कों थामकर हल्का सां ऊपर उठाया औऱ कसकस केँ पूरा लन्ड उनकी रसीली बूर मे पेलने लगा। वोँ तेजतेज सिसकते हुएअब नीचे सें शर्मो हयाछोड़ अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर कों उछाल उछालकर अपनेसगे बेटे सें चुदवाने लगी। हम् दोनों आलमए मस्ती मे दोनों मम्मी बेटेडूब गए। तेज तेज धक्के मारने केँ संगसंग मे उनके गालों औऱ होंठों कों चूमने लगा औऱ वोँ मदहोशी मे मेरासंग देनेलगी। मे उनकीतेज धक्कों केँ संग हिलती हुईँ चूचीयों कों कसकस केँ दबाने लगा, वोँ औऱ भि सिसकने लगी।
रात केँ घनघोर अंधेरे मे मेरा लन्ड अपनी हि अम्मी कि बूर मे घपाघप अंदर बाहर् हौ रहा थां। कुछ हि देर मे जबबूर बहोत अधिक पनिया गयीँ, तोँ रजाई केँ अंदर चुदायी कि फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी। उनकी नंगी जाँघों सें मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जौ आवाज़ पैदाकर रही थि उससे हम् दोनों औऱ वहशी हौ जारहे थें। जिस्मानी रिश्तों कां येखेल आज अंधेरे मे मे औऱ अम्मी खेलेंगे यहकभी सोचा न् थां। इतना आनंद आएगाआज कि रातयह कभी सोचा नं थां। लगभग पंद्रह मिनिट कि लगातार चुदायी केँ बाद अम्मी नें बस धीरे-धीरे सें मेरेकान मे बड़ी मुश्किल सें भरी आवाज़ मे कहा "रुकना मत….औऱतेज तेज" मे यह सुनकर औऱ गचागच उनकीबूर चोदने लगा। वोँ तेजी सें आहें भरतेहुए कराहने लगी, लगातार बदहवास सिसकारियां लेतेहुए वोँ छटपटाने लगी। कभी मुझसे कस केँ लिपट जातीकभी मेरीपीठ पर्र चिकोटी काट लेती तौ कभी मेरी नंगीपीठ पऱ अपने नाखून गड़ा देती। एकएक उनका जिस्म थरथराया औऱ मैंने साफ महसूस किया कि उनकीबूर केँ अंदर मानोकोई जलजला सां आगया होँ औऱ उस केँ संग वोँ कस केँ मुझसे लिपटते हुए
तेजी सें कराहकर "आआआआआहहहह अरे अल्लाहआआआ वाली!!! " कहतेहुए फारिग होनेलगी। उनकीबूर मे इतनीतेज तेज सिकुड़न होनेलगी कि मुझसे भि बर्दाश्त नहींहुआ औऱ मे भि "ओह अम्मीईई" कहतेहुए झड़नेलगा। एक् तेजमाल कि गाढ़ीधार मेरे लन्ड सें निकलकर उनके बच्चेदानी पर्र गिरने लगी। मेरे अंदर इतना उफान थां कि लगभगदो मिनट तक मेरा लन्ड झटकझटक करमाल अम्मी कि बूर मे उगलता रहा। यही हाल अम्मी कि बूर कां भि थां। लगभग इतनी हि देर तक उनकीबूर भि कांपते हुये झड़तीरही। वोँ मुझेकस केँ अपनी आगोश मे भरकर बहुतदेर तक झड़तेहुए चूमती रही। इतना सकूं शायद उन्हें पहलेकभी नहीं मिला थां, उन्होंने धीरे-धीरे सें मेरेकान मे कहा-"आज मैंने पा लिया अपने बेटे कों, कितनी नाजो नामत हैं"
मे- फिन भि आपनेआने मे एक् हफ्ता लगा दिया अम्मी, मे कब सें आपका प्रतीक्षा कररहा थां रोज़, मे यही जन्नत आपको देना चाहता थां, मैंने भि आज अपनी अम्मी कों पा लिया हैं औऱ यहसभी हुआ हैं उस पुरानी पुस्तक कि वजह सें।
वोँ यह सुनकर हल्का सां मुस्कुरा पड़ी औऱ बोलि-नहीं वाली, देर इसलिये हुइ क्योंकि मेरी माहवारी आँ रखी थि, इसलिये मैंने तुझेही इंतज़ार करवाया, इतंज़ार कां फल मुक़दस होता हैं नं।
मे- हाँ अम्मी सच हैं
अम्मी- क्याँ वोँ पुस्तक तूनेफाड़ दि हैं।
मे- नहीं अम्मी, फाड़ा नहीं हैं।
वोँ फिन मुस्कुराई औऱ बोलीं- उसे फाड़ना मत, उसी नें हमे मिलाया हैं।
मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुएकई बार चूमा, औऱ बगल मे लेटते हुए उन्हें अपनेऊपर चढ़ा लियाइस उलटपलट मे मेरा लन्ड पक्क सें उनकीबूर सें निकल गय़ा तोँ अम्मी नें साये सें अपनीबूर औऱ मेरे लन्ड कों अच्छे सें पोछा औऱ एक् बारफिन हम् एक् दूसरे केँ आगोश मे समाते चलेगए।
उसरात मैंने अम्मी कों तीनबार चोदा औऱ फिन वोँ सुभह मे दालान सें निकल गई,। रात मे वोँ अबरोज़ मेरेपास नज़रबचा केँ आने औऱ हम् जी भरकर चुदायी करते थें। इतना हि नहींदिन मे भि हम् छुपछुप कर चुदायी कर लें थें। मेरी अम्मी अबसच मे मेरी होँ चुकी थि, आखिर मेराबदन उनकेबदन कां हि तोँ एक् टुकड़ा थां, अबकोई रुसवाई नहीं थि बस थां तोँ मात्र प्रेम हि प्रेम।
उस सर्दरात कों जोँ सिलसिला शुरुआत हुआ वो अगले 10 सालों तक चलतारहा। मेरेलिए मेरी अम्मी हि मुहब्बत थि मेरी जन्नत थि। जब मे यूनाइटेड बैंक लिमिटेड मे अफसरबन गय़ा तौ अम्मी मुझ पर्र अपनीदूर कि बाजी कि लड़की सें निकाह करने कां जबर करनेलगी। मगर मे बिल्कुल भि अम्मी कों छोड़ना नहीं चाहता थां। तब अम्मी नें मुझे वादा किया कि मेरे उनके रिश्ते इसनए रिश्ते सें बेजार नहीं होंगे। मे जब चाहूं अपनी अम्मी कों चोद सकता हूं। उनके वादे केँ बाद मैने अम्मी कि मनपसंद सें निकाह कर लिया औऱ मेरी शादीशुदा जीवन मे मेरी बीबी बाहर् लें आई। मे अपनी बीबी सें खुश थां मगरफिन भि मे बीचबीच मे देहात जाकर अपनी अम्मी कि आगोश मे राते बिताता रहा। दिन याँ रातजब भि मौका मिलता, अम्मी स्वयं हि मौका देती याँ फिन मे उन्हें बेमौके चोद देता थां।
मगर एक् दिन, मेरी दुनिया हि बदल गई। मे कराची मे अपने बैंक कि ब्रांच मे कामकर रहा थां कि खबरआई कि अम्मी कों दिल कां दौरा पड़ा औऱ उनका इंतकाल हौ गय़ा हैं। मेरादिल इसतरह टूटा कि अगले 6 महीनो मे हि पाकिस्तान मे बैंक कि जॉब छोड़, एक् विदेशी फाइनेंस कंपनी मे जॉब करने ब्रसेल्स आगया औऱ वहीं पर्र अपने परिवार कों बुला लिया।
आज 6 साल हौ गए हैं अम्मी कों गएहुए मगरआज भि वोँ मेरे ज़हन मे समाई हुईँ हैं।
Bai this kahani really fantastic,plz do continue . Up kee kahani mai ma beta k betch joo bath chith,uff dill ❤️ mai lagtha he ,plzz write a new kahani ,lombi khahini wala
आपकी प्रतिक्रिया केँ लिए आपको शुक्रिया। मेरी लेखनी सें वही निकलता हैं जिसमें मर्म होता हैं औऱ जौ वास्तविक जिंदगी मे अनुभव सें प्राप्त हुआ हैं।
अम्मी मेरी अम्मी | incest indian sex story – New Episode
मे सर्वप्रथम आपको आपकीकथा केँ लिए बधाई देना चाहता हूं। मे आपको अन्य बहोत सारे लेखकों कि तरह हिंदी कों अंग्रेजी फ़ॉन्ट्स मे लिखने केँ बजाए देवनागरी फ़ॉन्ट्स मे लिखने केँ लिए विशेष बधाई देना चाहता हूं, आपका प्रयास सराहनीय हैं। हिंदी कों अंग्रेजी फ़ॉन्ट्स मे पढ़ना अत्यंत यातना पूर्ण, दु:खदाई औऱ अपमानजनक अनुभव होता हैं।
आपकी लेखनी औऱ शैली दोनों बहोत प्रभावकारी औऱ दिल कों छूने वाली हें। विषय केँ अनुसार जरूरत केँ अनुसार आपनेगरम शब्दों कां प्रयोग किया हैं परंतु अनावश्यक गालियों, अपमानजनक शब्दों औऱ अश्लीलता कों आपने नहि अपनाया।
अम्मी मेरी अम्मी | incest indian sex story - Next part miss mat karna
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