कामाग्नि completee - Desi kamuk kahani - Full Story Part 1
बात 1977 कि हैं जब भारत केँ उत्तरी भाग केँ किसी गाँव मे दो परिवार रहते थें। पड़ोसी तौ वोँ थें हि मगर एक् औऱ बात थि, जौ उनमें समान थि याँ शायद असामान्य थि; वोँ ये कि दोनों परिवारों मे दो-दो हि सदस्य थें। एक् परिवार मे पिता कां देहांत हौ चुका थां तौ दूसरे मे मम्मी नहि थि, मगर दोनों केँ एक्-एक् बेटा थां। विराज तब ग्यारह कां होगा औऱ जयदस कां; दोनों कि बहोत पक्की दोस्ती थि।
दोस्ती तौ विराज कि मम्मी सें, जय केँ बाबा कि भि अच्छी थि, मगर समाज कों दिखाने केँ लिए वोँ अक्सर यही कहते थें कि अकेली महिला कां इकलौता बेटा हैं तोँ उसकी सहायता कर देते हें। ऐसे तोँ विराज केँ घऱ केँ सारे बाहरी कामजय केँ बाबा हि करते थें; चाहे वोँ किराने कां सामान लाने कि बात होँ याँ फिन खेती-बाड़ी केँ काम;मगर दुनिया कों दिखाने केँ लिए विराज कों हमेशा संग रखना होता थां।
विराज कि मम्मी भि अपने लायक सारेकाम कर दिया करती थि, जैसे कि जय औऱ उसके बाबा केँ लिए खानां बनाना, कपड़े धोना औऱ उनकेघऱ कि साफ़-सफाई। मगरयह शायद हि किसी कों पता थां कि वोँ मात्र घऱ कि साफ़-सफाई मे हि नहि बल्कि चुदाई मे भि पूरासंग देती थि।
सच कहें तोँ इसमें कोई बुराई भि नहि थि; दोनों अपने जीवनसाथी खो चुके थें, ऐसे मे हरतरह सें एक् दूसरे कां सहारा बनकर ज़िन्दगी काटना हि सही तरीका थां।
विराज कों अक्सर खेती-बाड़ी केँ काम केँ लिए खेत-खलिहान मे रहना पड़ता थां। नाम केँ लिए हि सहीमगर इसवजह सें वोँ पढ़ाई मे बहुत पिछड़ गय़ा थां। यूँ तोँ साराकाम जय केँ बाबा करवाते थें मगर विराज उनकेसंग घूमघूम कर दुनियादारी कुछ जल्द हि सीख गय़ा थां। किताबों सें ज्यादा उसे खेती औऱ राजनीति कि समझ होँ गई थि। वैसे भि उम्र मे जय सें थोडा बड़ा हि थां तोँ विद्यालय मे उसकेडर सें जय कि तरफकोई नज़रउठा करदेख भि नहि सकता थां। जय भि पढ़ाई मे विराज कि सहायता कर दिया करता थां।
जब भि विराज कों काम सें औऱ जय कों पढ़ाई सें फुर्सत मिलती तोँ दोनों संग हि रहते थें। कभी अपने पहिये दौड़ाते हुएदूर खेतों मे चले जाते तौ कभीनदी किनारे जाकर चपटे पत्थरों कों पानी पर्र टिप्पे खिलवाते। जबथक जाते तोँ कहीं अमराई मे बैठकर गप्पें लड़ते रहते। दोनों केँ बीचकभी कोईबात छिपी नहि रह पाती थि। हरबात एक् दूसरे कों बता दिया करते थें।
अब तक तौ यह बातें बच्चों वाली हि हुआ करतीं थींमगर अब दोनों किशोरावस्था कि दहलीज़ पऱ खड़े थें; अब बहोत कुछ बदलने वाला थां।
विराज कि मां कामुक प्रवृत्ति कि तौ थि हि लकिनसंग मे वोँ एक् दबंग औऱ बेपरवाह किस्म कि महिला भि थि। विराज केँ सामने हि कपड़े बदल लेना, याँ नहाने केँ बाद अपने उरोजों कों ढके बिना हि विराज केँ सामने सें निकल जानां एक् आमबात थि। वैसे विराज नें कभीउसे कमर सें नीचे नंगी नहि देखा थां औऱ न् हि उसकीइस स्वच्छंदता केँ पीछे अपने बेटे केँ लिएकोई वासना थि। उसकी काम-वासना कि पूर्ति जय केँ बाबा सें हौ जाती थि। यह तौ शायदउसे ऐसाकुछ लगता थां शायद कि मम्मी केँ बूब्ज़ तोँ होते हि उसके बच्चे केँ लिए हें तोँ उस सें उन्हें क्याँ छिपाना।
विराज बारहसाल कां होने कों आँ गय़ा थां मगरअब भि कभीकभी उसकी मम्मी उसे अपनादूध पिला दिया करती थि। दूध तौ इस उम्र मे क्याँ निकलेगा मगरयह दोनों केँ रिश्तों कि नजदीकियों कां एक् मूर्त रूप थां। वैसे तोँ यह मम्मी-बेटे केँ बीच कां एक् वात्सल्य-पूर्ण क्रिया-कलाप थां, मगरआज कुछ बदलने वाला थां। विराज आज अपनीफसल बेचकर आया थां। आँ कर उसने सारे पैसे मम्मी कों दिएफिन नहाधो कर खानां खाया, औऱ फिन मम्मी-बेटा सोनेचले गए। दोनों एक् हि बैड पऱ संग हि सोते थें।
विराज- मम्मी, तुम्हे पता हैं आज वोँ सेठ गल्ला कमभाव पे लेने कां बोलरहा थां।
मम्मी- फिन?
विराज- फिन क्याँ! मैंने तौ बोल दिया कि सेठ! हमरेबैल इत्ते नाजुक भि नैयें केँ दूसरी मंडी तक नाँ जा पाएंगे। फिन आँ गओ लाइन पे। जित्ते कई थि उत्तेई दिए।
मम्मी- अरे मेरा बेटा तोँ सयाना हौ गय़ा रे।
इतनाकह कर मम्मी नें विराज कों चूम लिया औऱ गले सें लगा लिया। फिन दोनों पहले जैसे लेटे थें वैसे हि लेटकर सोने कि कोशिश करनेलगे। कुछदेर केँ सन्नाटे केँ बाद धीरे-धीरे सें मां कि आवाज़ आई- दुद्दू पियेगा?
विराज- हओ!
मां नें अपने ब्लाउज केँ नीचे केँ कुछबटन खोले औऱ अपन एक् बूब्ज़ निकाल कर विराज कि तरफ़आगे कर दिया। विराज हमेशा कि तरह एक् हाथ सें उसको सहारा देकर चूचुक अपने मुँह मे लेँ करऐसे चूसने लगा जैसे वोँ उसकीआज कि मेहनत कां इनाम होँ।
कामाग्नि completee - Desi kamuk kahani – New Episode
मगरअब बचपनसंग छोड़रहा थां औऱ वक़्त केँ संग मम्मी नें भि ऐसे आग्रह करना पहलेकम औऱ फिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे बंदकर दिए। विराज भि अपनी किसानी केँ काम मे व्यस्त रहनेलगा औऱ उसके अन्दर सें भि यह बच्चों वाली चाहतें खत्म होने लगींथीं औऱ अब उसकी अपनी उम्र केँ लोगों केँ संग अधिक जमनेलगी थि खासतौर पऱ जय केँ संग। वक़्त यूँ हि बीत गय़ा औऱ दोनों विवाह लायक होँ गए।
एक् दिनजय विराज कों अपनेसंग एक् ऐसी स्थान लेँ गय़ा जहाँ सें वेछुप छुपकर गाँव कि लड़कियों कों नहाते हुएदेख सकते थें। उन लड़कियों केँ नग्न स्तनों कों देखकर अचानक विराज कों अपना बचपनयाद आँ गय़ा जब वोँ अपनी मम्मी कां दूध पिया करता थां। चूंकि उसने 10-12 साल कि उम्र तक भि स्तनपान किया थां, उसकी यादें अभि ताज़ा थीं।
उसी रात विराज नें अपनी मां कों फिनदूध पिलाने कों कहा। वैसे तोँ मां कों ये बड़ी अजीबबात लगीमगर उसकेलिए तौ विराज अब भि बच्चा हि थां तौ उसनेहाँ कह दिया। मां नें पहले कि तरह अपने ब्लाउज केँ नीचे केँ कुछबटन खोले औऱ अपना एक् मम्मों निकाल कर विराज कि तरफ़आगे कर दिया। मगर आजउसे चूसने सें अधिकमजा छूने मे आँ रहा थां। उसकी उँगलियाँ अपने आप् उस मम्मों कों सहलाने लगीं जैसे कि सितार बजाया जारहा हौ। मगर सितार एक् हाथ सें केसे बजता। विराज कां दूसरा हाथ अपने आप् ब्लाउज केँ अंदरसरक गय़ा औऱ उसने अपनी मां कां दूसरा मम्मों पूरीतरह अपनी हथेली मे भर लिया।
एक् मम्मों आधा औऱ एक् पूरा उसकेहाथ मे थां औऱ वोँ दोनों कों सहलारहा थां। आजउसे कुछअलग हि अनुभूति होँ रही थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे सहलाना, मसलने मे बदल गय़ा। औऱ तभी विराज नें महसूस किया कि उसका लन्ड कड़क होँ गय़ा हैं। यूँ तौ उसने पहले भि कईबार सुभह सुभह नींद मे ऐसा महसूस किया थां मगर अभि यह जोँ हौ रहा थां उसकाकोई तोँ सम्बन्ध थां उसकी मां केँ स्तनों केँ संग। उसकीबाल बुद्धि मे येबात स्पष्ट नहि होँ पारही थि कि ऐसा क्यूं होँ रहा हैं। इसी बेचैनी मे वोँ चूसना छोड़कर ज़ोर ज़ोर सें स्तनों कों मसलने लगा।
मां- ऊँ…हूं… बहोत पी लियादूध… अबसोजा।
विराज समझ गय़ा कि मम्मी उसकीइस हरकत सें खुश नहि हैं। वैसे तौ उसकी मम्मी वात्सल्य कि मूर्ति थि मगरअगर क्रोध होँ जाए तौ इकलौता बेटा होने कां लिहाज़ नहि करती थि। विराज कों पता थां कि अबयहसभी कोशिश करना खतरे सें खाली नहि हैं औऱ उसने निश्चय किया कि अब वोँ यहसभी मां केँ संग नहि करेगा।
अगलेदिन विराज अपनेइस नए अनुभव केँ बारे मे जय कों बताने केँ लिए बेचैन थां। जैसे हि मौका मिला, जय कों कहा-चल अमराई मे चलकर बैठते हें।
दोनों अपनी हमेशा वाली आरामदायक स्थान पर्र जाकर बैठे औऱ विराज नें जय कों सारा किस्सा बताया कि केसे मम्मी केँ मम्मों दबाने सें उसका लन्ड कड़क हौ गय़ा थां।
जय कों विश्वास नहि हुआ- क्याँ बातकर रहा हैं? ऐसा भि कोई होता हैं क्याँ! मे नहि मानता।
विराज- अरे मे सचकहरहा हूं। केसे समझाऊं? अब तेरे सामने तौ नहि कर सकता न्…
जय-आंख बंद करकेसोच उससमय कैसालग रहा थां।
विराज- एक् कामकर मे तेरे पुन्दे मसलता हूं, आँखें बंद करके औऱ सोचूंगा कि मां केँ दुद्दू दबारहा हूं।
जय- तुँ मेरे मज़े लेने केँ लिए बहाने तोँ नहि माररहा हैं नाँ? तूँ भि अपनी चड्डी उतार! मे भि देखूंगा तेरा नुन्नू केसे खड़ा होता हैं।
दोनों नें अपनी चड्डी उतार दि। जय, विराज केँ बगल मे थोडा आगे होकर खड़ा होँ गय़ा औऱ पीछे मुड़कर विराज केँ मुरझाये लण्ड कों देखने लगा। विराज नें आँखें बंदकीं औऱ जय केँ नितम्बों कों सहलाते हुएकल रात वाली यादों मे खो गय़ा। थोड़ी हि देर मे उसका लण्ड थोड़े थोड़े झटके लेनेलगा।
जय-अरे यह तोँ उछलरहा हैं। कर-कर औऱ अच्छे सें यादकर!!
जय कि बात नें विराज कि कल्पना मे विघ्न डाल दिया थां, मगर कल्पना कब किसी केँ वश मे रही हैं। विराज कि कल्पना केँ घोड़े जौ थोड़े सच्चाई कि धरती पर्र आये तौ एक् नया मोड़ लें लिया औऱ उसेलगा कि जैसे वोँ अपनी मां केँ नितम्ब सहलारहा हैं। इतनामन मे आते हि टन्न सें उसका लण्ड खड़ा हौ गय़ा।
जय-अरे! यह तौ सच मे खड़ा होँ गय़ा!!
विराज नें भि आँखें खोललीं।
विराज- तूँ तौ मान हि नहि रहा थां!
जय-छू केँ देखूं?
विराज- देख लें! अब मैंने भि तौ तेरे पुन्दे छुए हें तौ तेरी क्याँ मना करूँ।
जय नें अपनीदो उंगलियों औऱ अंगूठे केँ बीचउस छोटे सें लण्ड कों पकड़कर देखा, थोडा दबाया थोडा सहलाया।
विराज- औऱ कर दोस्त! मजा आँ रहा हैं।
जय-ऐसे?
विराज- हाँ… नहि-नहि ऐसे नहि… हाँ…बस ऐसे हि करतारह… बड़ामजा आँ रहा हैं याऽऽऽर!
इसतरह धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों दोस्त जल्द हि अपने आप् सीखगए कि लण्ड कों केसे मुठियाते हें। यह पहलीबार थां तोँ विराज कों ज्यादा वक़्त नहि लगा। वोँ जय केँ हाथ मे हि झड़ गय़ा।
विराज- ओह्ह…अहह…!
जय-अबे, यह क्याँ हैं? पेशाब तौ नहि हैं… सफ़ेद, चिपचिपा सां?
विराज- पता नहि दोस्त मगरजब निकला तोँ एक् करंट जैसालगा थां। मजा आँ गय़ा मगर मस्त वाला।
जय- सफ़ेद करंट!हे हेहे…चल तुझेही इतनामजा आया तोँ मुझे भि कर नाँ।
विराज- मगर तेरा तोँ खड़ा नहि हैं?
भले हि दोनों जवान होँ चुके थें, 18 पारकर चुके थें मगर मासूमियत अभि संग छोड़कर गई नहि थि। समय धीरे-धीरे धीरे-धीरे सभी सिखा देता हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों साथी अपनेइस नएखेल मे लगगए थें। उन्होंने लण्ड कों खड़ा करना, मुठियाना औऱ तोँ औऱ चूसना भि सीख लिया। मगर दोनों मे सें कोई भि समलैंगिक नहि थां। उनकी कल्पना कि उड़ान हमेशा विराज कि मां केँ चारों औऱ हि घूमती रहती थि।
इसीबीच एक् रात विराज नें अपनी मम्मी कों बैड सें उठकर जातेहुए देखा। थोड़ी देरबाद जब उसनेछिप कर दूसरे कमरे मे देखा तोँ उसकी मां जय केँ बापू सें चुदवा रही थि। इसबात सें तोँ विराज-जय कि दोस्ती औऱ गहरी होँ गई। दोनों अपने मां बाप कि चुदाई कि बातें कर-कर केँ एक् दूसरे कां लण्ड मुठियाते तोँ कभी पूरे नंगे हौ कर एक् संग एक् दूसरे कां लण्ड चूसते औऱ संग-संग एक् दूसरे केँ जिस्म कों सहलाते भि जाते।
कभी कभी तौ जब मौका मिलता तौ दोनों छिपकर अपने मम्मी-बाप कि चुदाई देखते हुए एक् दूसरे कि मुठमार लेते। मगर दोनों कि इस लंगोटिया यारी मे एक् बड़ा मोड़तब आयाजब विराज केँ लिए विवाह कां नाताआया।
congratulations Sid
नई स्टोरी केँ लिए बधाई मित्र
नई किस्सा शुरुआत करने केँ लिए थॅंक्स भइया औऱ मेरीतरफ सें बेस्टऑफ लक अगलेभाग कां इंतजार रहेगा
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दोस्तो, आपने पिछले भाग मे पढ़ा कि केसे विराज नें जवानी कि दहलीज़ पऱ उसने अपने मित्र केँ संग परस्पर हस्तमैथुन करना सीखा। दोनों कि दोस्ती घनिष्ठता कि हर सीमा लाँघ चुकी थि।
अबआगे…
पास केँ हि गाँव मे एक् बहोत बड़े ज़मींदार थें। लोग तौ उनकोउस पूरे इलाके कां राजा हि मानते थें। उनका एक् लड़का सुनील औऱ एक् लड़की शालू थि। ज़मीन कुछ ज्यादा हि थि तौ इसडर सें कि कहीं सरकार कब्ज़ा नां कर लेँ, बहुत ज़मीन बेटी शालू केँ नाम पर्र भि कर दि थि। हुआयह कि इतने ऐश-ओ-आराम मे बच्चे थोड़े बिगड़ गए। चौधरी जी नें भि सोचा इतना रुपया हैं; ज़मीन-जायदाद हैं; बच्चे थोड़े बिगड़ भि जाएं तौ क्याँ फर्क पड़ता हैं।
मगर चिंता कि बात तोँ तब सामने आईजब गाँव मे काना-फूसी होनेलगी कि शालू कां अपने हि बड़े भइया सुनील केँ संगकोई चक्कर हैं। यूँ तोँ चौधरी साहब स्वयं भि बड़े ऐय्याश किस्म केँ थें; तोँ उनकोकोई फर्क नहि पड़ता अगर उनके बेटे नें कोई रखैलपाल ली होती याँ गाँव मे किसी औऱ कि पत्नि सें टांका भिड़ा लिया होता;मगर ये मामला तौ अलग हि तरह कां थां। चौधरी जी नें सोचा कि अपवाहों केँ आधार पर्र अपने बेटे-बेटी सें इनसभी केँ बारे मे बात करनासही नहि होगामगर लोगों कां मुँह भि बंद नहि कर सकते। वैसे भि किसी कि इतनी हिम्मत तौ थि नहि कि कोई उनके सामने मुँहखोल सके।
आखिर चौधरी जी नें सोचा कि बेटी कि विवाह करके विदाकर दें, तौ न् रहेगा बांस औऱ न् बजेगी बांसुरी।
मगर इतनी बदनामी केँ बाद किसी बड़े ज़मींदार केँ पास नाता भेजा औऱ उसनेमना कर दिया तौ ये बड़ी बेइज़्ज़ती कि बात होगी इसलिये चौधरी नें ये नाता विराज केँ लिएभेज दिया। उन्होंने बचपन सें उसे अनाज मंडी मे याँ खाद-बीज औऱ कीटनाशक लेतेहुए देखा थां। उनको हमेशा लगता थां कि वोँ बहोत मेहनती लड़का हैं। उनको विश्वास थां कि जौ जमीन उनकी बेटी केँ नाम हैं उसकासही उपयोग करके विराज अवश्य उनकी बेटी कों सुखीरख पाएगा।
विराज औऱ उसकी मां नें भि कुछ उड़ती उड़ती बातें सुनीथीं शालू केँ बारे मे मगर विराज कि मां कौन सि दूध कि धुली थि। उस पऱ जोँ ज़मीन शालू अपनेसंग लेकरआने वाली थि वोँ पहले हि उनकी ज़मीन सें दोगुनी थि। येबहू मात्र कहने केँ लिए नहि बल्कि सच मे लक्ष्मी कां रूप थि। अबघऱआती लक्ष्मी कों कौनमना करता हैं तौ विराज कि मम्मी नें जल्दी हाँकर दि।
चौधरी साहब भि जल्द मे थें तौ चट मंगनी पट ब्याह हौ भि गय़ा।
बारात वापसआई औऱ सारे पूजापाठ ख़तमहुए तब दुल्हन रिश्तेदार महिलाओं केँ संग एक् कमरे मे बैठी थि। सुहागरात मे अभि वक़्त थां तौ विराज औऱ जय पीछे बाड़े मे अकेले बैठे गप्पें लड़ारहे थें।
जय- भइया, अब तेरी तौ विवाह हौ गई। मुझे तोँ अब अपने हि हाथ सें मुठ मारनी पड़ेगी।
विराज- अरे नहि! ऐसा केसे होगा? पहलीबार मुठ मारी थि तब सें आज तक हमने हमेशा एक् दूसरे कि मुठ मारी हैं लन्ड चूसा हैं। ऐसे थोड़े हि कोई विवाह होने सें दोस्ती मे दरार पड़ेगी।
जय- वोँ तौ सही हैं, मगरअब तेरी बुर मिल गई हैं तौ तुँ मुठ क्यूं मारेगा?
विराज- हम्म! दोस्त जब एक् दूसरे केँ हाथ सें मुठमार सकते हें। एक् दूसरे कां लन्ड चूस सकते हें तौ एक् दूसरे कि पत्नि कि बुर क्यूं नहि मार सकते?
जय- अरे!ऐसा थोड़े हि होता हैं।
विराज- अरे तूँ चलआज मेरेसंग … दोनों भइयासंग मे सुहागरात मनाएँगे। वैसे भि छिनाल पता नहि क्याँ क्याँ गुल खिला केँ बैठी हैं; बड़े चर्चे थें इसके गाँव मे।
जय-अरे दोस्त तुँ इतनागरम मत हौ। क्याँ पता किसी नें जलन केँ मारेयूँ हि खबर उड़ा दि हौ। तुँ अकेले हि जा औऱ प्रेम सें चोदना भाभी कों; अगर पहलेकोई गुल खिलाए होंगे तौ पताचल हि जाएगा; औऱ नहि तोँ जिसदिन मेरी विवाह हौ जाएगी औऱ अपन दोनों कि जोरू राज़ी होंगी तौ हि मिल केँ चोदेंगे। पत्नि हैं दोस्त … अपनाहाथ नहि हैं कि जौ उसकी स्वयं कि कोई मर्ज़ी नाँ हौ।
विराज- हाँ दोस्त, बात तौ यह भि तूनेसही कही। मगर तुँ अपनेहाथ सें मुठ नहि मारेगा। जब तक तेरी विवाह नहि हौ जातीतब तक मे अपनी पत्नि औऱ तेरी दोनों कों मज़े देने लायकदम तोँ रखता हूं।
ऐसे हि बातें करते करतेरात हौ गई औऱ कुछ औरतें विराज कों बुलाने आँ गईं। उनमें सें एक् कहनेलगी- काय भैया? मीता संगेई सुहागरात मन लें होँ, केँ जोरू कि मूँ दिखाई बीकरे होँ?
इतनाकह केँ हँसी मजाक करतेहुए औरतें विराज कों सुहागरात वाले कमरे मे धकेलआईं।
अन्दर मंद रोशनी वाला बल्बजल रहा थां। विराज नें दूसरा बल्ब भि जला दिया जिससे रूम रोशनी सें जगमगा गय़ा। विराज केँ अन्दर प्यार कि भावना कम थि औऱ क्रोध अधिक थां क्योंकि उसने बहुत लोगों केँ ताने सुने थें कि विराज नें ज़मीन केँ लालच मे बदचलन लड़की सें विवाह करली। वोँ देख्ना चाहता थां कि शालू कितनी दुष्चरित्र हैं? उस ज़माने मे गाँव कि शादियों मे दुल्हनें लम्बे घूंघट मे रहतीं थीं तौ अभि तक विराज नें शालू कों देखा नहि थां।
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Thanks dosto
bhut hi shaandar our mast update h mitr
धन्यवाद मित्र अगरऐसी औऱ भि कहानियाँ हों तोँ प्लीज़ बताए
mitr update kaa क्याँ hua
दोस्तो आपको औऱ आपके परिवार कों नयेसाल कि बहोत बधाईये साल आपके परिवार मे सुख औऱ समृद्धि लाये
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