वो कौन था - dopahar ki chahat - Full Story Part 1
पहला आध्याय
दोहपर कां वक्त थां सूर्य देवता अपना पूरा अस्तित्व बतारहे थें ! पुरेजगत कों अपने किरणों सें प्रकाशमान करने वाले औऱ सब जीवो औऱ प्रकति कों संतुलित रखने वाले सूर्य देवता आजएसा लगरहे थें जैसे कुध्र होकरबरस रहे होँ ! लगता हैं जैसेहवा भि आज सूर्यदेव केँ गुस्सा कां शिकार हौ गई, हैं आसमान सें जैसे अंगार बरसरहे हैं ! कुछ पक्षी अपने घोसलों मे बैठे याँ तोँ अपने साथियों कि इंतज़ार रहे थें याँ सूर्य केँ कम होने कां इंतेजार कररहे थें औऱ कुछ पक्षी पानी कि तलाश मे अपनी खोजी व्यक्तित्व कि पहचान देरहे थें ! पालतू मवेशी अपने अपने बेड़े मे बैठकर अपने मालिको कि इंतजार कररहे थें कि कब उनके मालिक आकर चारा पानी कि व्यवस्था करदे ! कुत्ते यहावहा चाव देखकर सुस्ता रहे थें ! सारेलोग अपने अपनेघरो मे आरामकर रहे थें औऱ खेतो मे काम करने वाले मजदुर भि पेड़ो केँ निचेबैठ हैं अपनी शुधा शांतकर रहे थें !
अभि- अभि एक् अधेड़ उम्र कां शख्स अपनेघऱ सें निकलकर हाट कि तरफजा रहा थां उस आदमी कां हुलिया औऱ अभि अभि आँ रहे सफेद बालो कि वजह सें एसालग रहा थां कि जैसे उसके किस्मत नें उसे टाइम सें पहले हि बहुतकुछ सिखा दिया होँ ! हाथ मे उसने एक् कपडे कि जोली लटका थि, फटे कपड़ो केँ चप्पल औऱ पुराने बेरंग कपडे उसकी जर्जर स्तिथि कां वर्णन कररही थि ! वोँ आदमी धीरे धीरे अपनेकदम हाट कि तरफ लेँ जारहा थां औऱ मन मे उसके बहुत विचार उभररहे थें कुछ थोड़े सें सिक्को औऱ ढेर सारी जरूरतों कों लेकर वोँ चलरहा थां ! एसा इसलिये नहि कि दोहपर कों वो खालीपड़ा रहता थां याँ कुछ करने केँ लिएकाम नहि थां बल्कि उसनेइस भरी दोहपर कों इसीलिए हाट जाने केँ लिए चुना थां क्युकी इस वक्त एक्का दुक्का लोग हि हाट मे रहते हैं ताकिलोग उससे अपना उधार मांगकर वोँ परेशान नं होँ ! तकलीफ़ उसेइस बात कि नहि थि कि लोगउस सें अपना मांगेंगे बल्कि इसबात सें थि कि वोँ इनसभी कां धन केसे लौटाएगा ! आखिरकार वोँ हाट पहुच हि गय़ा !
हाट पहुचते हि उसनेनजर इधरउधर घुमाई औऱ एक् दुकान कि तरफचल पड़ा ! वोँ एक् धागों कि दुकान थि ! वोँ आदमी अपनी आजीविका औऱ घऱ कां पेट पालने केँ लिए कपड़ो कि बुनाई करता थां इसीलिए वोँ हाट मे धागे औऱ कुछ अनाज लेनेआया थां !
“केसे हौ माणिकलाल” उस दुकानदार नें कहा !
दुकानदार केँ कटाक्ष नें माणिकलाल कां ध्यान खीचा
“माफ़ करना हरिराम, मे तेराधन जल्द हि चूकता कर दूंगा “
“अरे मे तोँ बसऐसे हि पूछरहा थां, बताओ क्याँ खरीदने आये होँ “
माणिकलाल नें दुकान मे रखे धागों पर्र एक् नजरभर दौड़ाई औऱ कुछहरे सूत केँ धागों कां मोल पूछा
“हरे रंग कां सूत, यह किसके लिए लेँ जारहे होँ”
“आज सुभह हि एक् बुढाआया थां घऱ पर्र, उसनेकहा कि उसकोहरे रंग केँ कुर्ते केँ लिए एक् कपडा चाहिए थां”
“माफ़ करना माणिकलाल, मगरइन रंग केँ धागों कां मे उधारी नहि रख सकता ! पहलीबात तोँ यह हैं कि इनरंग केँ धागे बहोत कमआते हैं औऱ दूसरी कि आजकल तुम्हारी उधारी कुछ अधिक हि होँ रही हैं” हरिराम नें बनावटी दुःखी भाव मे कहा !
“आज इसकीकोई जरुरत नहि पड़ेगी”
“मतलब क्याँ हैं तुम्हारा ?” हरिराम उसकी जर्जर हालात सें पूरा वाखिफ थां औऱ वोँ उसको औऱ उधारी कां माल नहि देना चाहता थां इसलिए वो माणिकलाल कि इसबात सें थोडा चौक गय़ा थां
“मतलबयह हैं कि इन धागों कि आज मे पूरा मूल्य चूका केँ जाऊंगा”
“लगता हैं कुछ खजाना हाथलग गय़ा हैं”
“अरे नहि भइया, सुभहउस बूढ़े नें कपडे कि सारीरकम पहले हि दे दि औऱ ३दिनबाद आने कों कहा हैं”
“कोन हैं वोँ बुढा, जिसने माल सें पहले हि पूरीरकम दे दि “
“मे भि हैरान हु, वोँ अपनेगॉव कां तोँ नहि थां ! उसका पहनावा भि अलग थां ढाढ़ी थोड़ी लम्बी औऱ सर पर्र कुछ अजीब सां पहनरखा थां शायदधुप सें बचने केँ लिए होगा, औऱ तोँ औऱ उसकेकहा हि कपडे केँ लिएहरे रंग केँ धागों कां हि इस्तेमाल करना, कपडा बुनने केँ बाद रंगना मत”
“लगता हैं कोई परदेसी होगा”
“वोँ सभी बाते छोड़ो, कपडे कां कितना मूल्य हुआ”
“पुरे७ ताम्बे केँ सिक्के”
माणिकलाल नें सिक्के दिए औऱ धागों कों अपने झोले मे डालने लगातभी अचानक एक् शख्स दौड़ता हुआआया औऱ माणिकलाल सें टकरा गय़ा जिससे वोँ दोनों गिरपड़े औऱ वोँ धागे निचे मिट्टी मे गिरगए !
“हाहाहा हाबदल जायेगा, बदल जायेगा, सभीबदल जायेगा”
यहगॉव कां पागल बुढा थां जोँ दिनभर चिल्लाता हुआगॉव मे घूमता रहता थां फटे कपडे, बालो सें भरा चेहरा, पिली औऱ लाल मिश्रित आखे, जैसेकई रातो सें वो सोया नहि थां कोई भि उसको देखकर भय सें काफउठे ! उसकीउस हालात सें उसकी उम्र कां कोई भि अंदाजा नहि लगा सकता थां कि वो कितना बुड्डा थां ! वोँ बहोत सालो सें ऐसे हि दिखरहा थां जैसे कि उसकी उम्रथम सि गयीँ, होँ !
दुकानदार नें पास मे रखे डंडे कों उठाया औऱ उस पागल कों मारने केँ अंदाज मे ऊपर लहराया, वोँ पागलवहा सें चिल्लाता हुआभाग गय़ा !
“चोट तौ नहि लगी माणिकलाल”
गिरने कि वजह सें माणिकलाल केँ हाथो औऱ पीठ पऱ कंकड़ कि वजह सें कुछ खरोचे आँ गई, थि
“नहि, कोईबात नहि, मे ठीकहु”
“पता नहि इस पागल सें कब छुटकारा मिलेगा, नां तोँ यहगॉव सें जाता हैं औऱ नाँ हि मरता हैं” दुकानदार नें घृणाभरे अंदाज मे कहा
माणिकलाल उठा औऱ अपने जोले कों सही करके जमीन पऱ गिरे धागों कों उठाकर जोले मे डाल देता हैं औऱ चलने लगता हैं
वोँ हाट मे इधरउधर देखता हैं औऱ कुछ अनाज औऱ धान लेकर अपनेघऱ कि औऱ निकल पड़ता हैं
माणिकलाल कां घऱगॉव केँ उत्तरी दिशा मे सबसेअंत मे थां औऱ इसकेआगे सें जंगल शुरुआत होता थां ! माणिकलाल धीरे-धीरे धीरे-धीरे घऱ कि औऱ बढ़ता हैं तभीउसे अचानक एक् पेड़ केँ निचेकुछ दिखाई देता हैं वोँ चौका !! उसको जैसे यकीन नहि हुआ, औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे पेड़ केँ नजदीक पंहुचा ! मगरअब वहाकोई नहि थां ! शायद मेरा भ्रम थां – उसनेमन मे सोचा औऱ अपनेघऱ कि औऱ निकलपड़ा !
अगली सुभहगॉव मे कुछ हलचल सि मची थि, सबलोग शिव मंदिर मे जाने कों उत्सुक हौ रहे थें बहोत बड़ी केवल मे भीड़उमड रही थि
मंदिर गॉव केँ करीबबिच मे हि थां ! शिव मंदिर बहोत हि भव्य औऱ पुराना थां ! मंदिर केँ २ मुख्य दरवाज़ा थें, एक् दक्षिणी दरवाज़ा औऱ दूसरा पूर्वी दरवाज़ा ! मंदिर केँ दक्षिणी दरवाज़ा मे प्रवेश करते हि नंदी कि एक् विशाल प्रतिमा (करीब-करीब २०फीट ऊची ) औऱ पूर्वी दरवाज़ा मे एक् बिच्छु कि प्रतिमा दिखाई पड़ती हैं ! मंदिर कां प्रांगण बहोत हि बड़ा थां जिसमे १२०० सें भि ज़्यादा लोग एक् संग आँ सकते थें ! इस मंदिर कि सबसेबड़ी विशेषता यह थि कि इसमें कोई गर्भगृह नहि थां औऱ नाँ हि शिवलिंग, बस एक् शिव कि विशाल प्रतिमा खुले आकाश केँ निचे ध्यानस्थ अवस्था मे थि ! यह प्रतिमा इतनीबड़ी थि कि दूर केँ उत्त्तरी पहाडियों सें भि हल्की सि दिखाई पड़ती थि ! इस मंदिर मे इस क्षेत्र कां राजा धूम्रकेतु हर अमावस्या पर्र आकर अभिषेक करता थां ! यद्यपि येगॉव औऱ राजधानी केँ बिच कां मार्ग २दिन कां पड़ता थां फिन भि राजा अपने पूर्वजो कि प्रथा कों आगे बढ़ाने पर्र बिलकुल विलम्ब नहि करता थां
माणिकलाल अपनेघऱ मे बुनाई कां कमबस शुरुआत हि कररहा थां कि उसकोकुछ ध्वनि सुनाई दि ! यहढोल औऱ नगाडो कि आवाजे थि ! यह आवाजे सुनकर उसकी पत्नि भि खानां बनाते बनाते बिच मे छोड़कर माणिकलाल केँ पास आँ गयीँ, !
“ सुनोजी, आजगॉव मे कोई उत्सव हैं क्याँ “ उसकी पत्नि बोलीं
“मुझे तोँ इसबात कि कोईखबर नहि हैं, रुको मे अभि देखकर आताहु “ माणिकलाल नें अपना बुनाई कां सामान निचे रखतेहुए बोला
“ठीक हैं लेनिक जल्द आनां, सुरभि कों दोहपर सें पहलेवैध जी केँ यहा भि लें चलना हैं “ उसकी पत्नि नें कहा
सुरभि कां नाम सुनते हि उसका उत्साह थोडा कम हौ गय़ा !
“ठीक हैं, मे जल्द हि आँ जाऊंगा” यह कहते हि माणिकलाल अपनेघऱ सें उसढोल कि आवाजो कि तरफचल पड़ा !
पुरेगॉव मे उत्सव कि लहरदौड़ चुकी थि, हरकोई अपना अपनाकाम छोड़कर ढोल कि आवाज़ कि औऱ जारहा थां ! भीड़बढ़ चुकी थि औऱ तोँ औऱ राजा धूम्रकेतु भि अपने पुरे परिवार केँ संगवहा आँ चूका थां ! पूरीभीड़ आचर्यचाकित थि कि आज नाँ हि अमावस्या हैं औऱ न् हि कोई विशेष त्यौहार फिन भि आजवहा राजाआया हुआ थां !
राजा धूम्रकेतु वहा किसी कि साधू बाबा कि पूजाकर रहे थें ! उनके चहरे पर्र चिंता औऱ प्रसन्नता केँ मिक्ष्रित भाव थें, मन मे उधेड़बुन चलरही थि !
माणिकलाल भि भीड़ कों चीरता हुआवहा आँ पंहुचा ! वोँ भि चौक गय़ा, उसने भि राजा कों उस हालात मे पहलीबार देखा थां ! जौ राजाकभी किसी केँ सामने झुका नहि, पता नहि कितने हि साधू महात्मा उनकी राजधानी मे आकरचले भि गए परन्तु धूम्रकेतु नें कभी किसी कों नमस्ते तक भि नहि किया ! इसलिये माणिकलाल कों अपनेआखो पर्र विश्वास नहि होँ रहा थां कि राजा धूम्रकेतु किसी साधू बाबा कि सेवाकर सकता हैं !
वोँ साधू बाबा दिखने मे हष्ट पुष्ट थां, उम्र मे बहोत बूढ़े थें करीब-करीब १२०-१४० वर्ष केँ, मगर उनकी उम्र कां उनके जिस्म सें पता नहि चलरहा थां ! लम्बी सफेद दाढ़ी, काली धोती औऱ उपरकुछ नहि, ललाट पर्र भबूत सें कुछ निशान बना औऱ लम्बी जटाए ! करीब-करीब १५० सें ज़्यादा उनके शिष्य औऱ शिष्याए उनकेआस पास बैठेहुए थें ! सब मंदिर केँ प्रांगण मे शिव कि प्रतिमा केँ समकक्ष बैठे थें !
“तुम् भि येआये होँ माणिक” माणिकलाल कां ध्यान भंगहुआ, किसी नें उसकेपीठ पऱ हाथ फेरते हुयेकहा
“रमन, तोँ यह तुम् हौ “ माणिकलाल नें कहा !
रमन माणिकलाल कां बचपन कां साथी थां जिसने अब तक उसकासंग नहि छोड़ा थां !
“तुम् यहा क्याँ कररहे हों”रमन नें पूछा !
“कुछ नहि, बसढोल औऱ नगाडो कि आवाज़ बहोत जोरो सें आँ रही थि तौ सोचा कि देखआऊ ! मगरयहा आया तौ कुछपता भि रहीचल रहा हैं कि क्याँ होँ रहा हैं”
“सामने सें हट, मुझे देखने दे “
रमन माणिकलाल कों उधर करकेभीड़ सें थोडा आयेचला गय़ा औऱ सामने कां द्रश्य देखता हैं ! एक् बार मे तौ वोँ भि चौक गय़ा मगरउसे कुछयाद आया “अच्छा तौ यहबात हैं “
“क्याँ हुआ, क्याँ तुम् जानते हौ “
“पूरा तौ नहि, मगर थोडा थोडा “
“मे जब छोटा थां तब मेरे दादा नें इनके बारेकुछ बताया थां “ रमन नें कहा
“ क्याँ बताया थां, जल्द बोलो”
“बहोत टाइम पहले कि बात हैं जब राजाजी कि उम्र३-४ साल होगी ! तब उनको एक् साप नें डस लिया थां ! बड़े राजा साहब नें इनका बहोत इलाज करवाया मगरकोई फर्क नहि पड़ा औऱ अन्त मे राजाजी कि मौत होँ गयीँ, ! उस टाइम पुरे राज्य मे मातम सां छायाहुआ थां क्युकी बड़े राजाजी कि एक् हि संतान थि औऱ वोँ भि बहोत टाइमबाद बहुत मन्नतो केँ बाद पैदा हुइ थि ! बड़े राजाजी इनको बहोत प्रेम करते थें औऱ अबवे पूरीतरह टूट चुके थें ! २ दिनों बादशव कां आखिरी संस्कार थां औऱ पूराराज घराना शौक मे डूबाहुआ थां “
“ यदि राजाजी मर चुके थें तौ यहकौन हैं “ बिच मे हि माणिकलाल नें पूछा !
“अरे मेरी पहले पूरीबात तोँ सुन लियाकरो ! अब सुनो “
“जैसे हि शव कां आखिरी संस्कार करने केँ लिएनदी केँ पास वाले शमसान मे जारहे थें तभी एक् काले कपड़ो वाला एक् साधू दिखाई दिया ! उस साधू नें बड़े राजाजी सें कहा हि वो उसशव कों वापस जिन्दा कर देगामगर उसकी एक् शर्त थि ! औऱ उसकी शर्त.”
अचानक रमन औऱ माणिकलाल कों भीड़ मे सें किसी नें धक्का दिया !
आप् सब केँ प्रोत्साहन केँ लिए शुक्रिया दोस्तों अगर किस्सा मे कुछ गलतीहों तौ comment मे जरुर बताना
Hmm. ye dozu, vaidh k sath sath shayad mayavi takato kaa bi malik haen shayad.man kee padh le joh. Brilliant update Manoj ji. great going. story bohot interesting hoty ja rahi h.
वो कौन था - dopahar ki chahat – New Episode
“बहोत वक्त पहले कि बात हैं जब राजाजी कि उम्र३-४ साल होगी ! तब उनको एक् साप नें डस लिया थां ! बड़े राजा साहब नें इनका बहोत इलाज करवाया मगरकोई फर्क नहि पड़ा औऱ अन्त मे राजाजी कि मौत होँ गयीँ, ! उस वक्त पुरे राज्य मे मातम सां छायाहुआ थां क्युकी बड़े राजाजी कि एक् हि संतान थि औऱ वोँ भि बहोत टाइमबाद बहुत मन्नतो केँ बाद पैदा हुईँ थि ! बड़े राजाजी इनको बहोत प्रेम करते थें औऱ अबवे पूरीतरह टूट चुके थें ! २ दिनों बादशव कां आखिरी संस्कार थां औऱ पूराराज घराना शौक मे डूबाहुआ थां “
“ यदि राजाजी मर चुके थें तोँ यहकौन हैं “ बिच मे हि माणिकलाल नें पूछा !
“अरे मेरी पहले पूरीबात तोँ सुन लियाकरो ! अब सुनो “
“जैसे हि शव कां आखिरी संस्कार करने केँ लिएनदी केँ पास वाले शमसान मे जारहे थें तभी एक् काले कपड़ो वाला एक् साधू दिखाई दिया ! उस साधू नें बड़े राजाजी सें कहा हि वो उसशव कों वापस जिन्दा कर देगामगर उसकी एक् शर्त थि ! औऱ उसकी शर्त.”
अचानक रमन औऱ माणिकलाल कों भीड़ मे सें किसी नें धक्का दिया !
“धन कां इंतजाम होँ गय़ा माणिक चाचा ?” एक् लड़के नें कहा !
इस आवाज़ कों सुनते हि रमन केँ आख मे एक् मिर्ची सि लगी ! यहइसगाव केँ एकमात्र साहूकार कां एकमात्र बेटा थां, कालू : बहोत हि अड़ियल औऱ बेशर्म थां ! अपने पिता, राजनसेठ सें बिलकुल विपरीत थां !
राजनसेठ, इनका व्यहार अपने साहूकार केँ व्यक्तिव्य सें बिलकुल अलग थां ! साधारण सां दिखने वाला जिस्म, सरल वेशभूषा औऱ सहज हि उसकी भाषा ! कोई भि अनजान आदमीयह सोच भि नहि सकता कि उसका दूर-दूर तक कोई साहूकार कां सम्बन्ध भि हौ सकता थां ! वो करबार निर्धनों कों बिनासूद केँ हि धनदे दिया करता थां औऱ वक़्त ख़तम होने पर्र उन पर्र जोर भि नहि देता थां ! एसा नहि कि राजनसेठ केँ इस व्यहार सें उसे साहुकारी मे बहोत फायदा बल्कि कभी-कभी तौ वो घाटे मे भि चला जाता थां मगर अपने पूर्वजो कि छोड़ी गई इतनीधन सम्पदा, जोँ लोगो केँ खून पसीने सें वसूली गई थि, कभीकम नहि पड़ी थि !
कालू, जिसका सहीनाम कालिसेठ थां, उसकेइस अड़ियल स्वाभाव केँ कारणसभी उसकेपीठ पीछेउसे कालू हि कहते थें ! वैसे कालू कि गाव मे कोईखास इज्जत नहि थि, बल्कि राजनसेठ सें द्वारा दिया गय़ा धन केँ कारण लोगो कों कालू कों इज्जत देनी पड़ती थि ! कालू कां स्वाभाव अपने पुरखो केँ जैसा हि थां : वाक-पटुकता, लालची, लोगो सें जबरदस्ती धन वसूलना, कभी कभार अचानक सूदबढ़ा देना ! मगर उसके पिता केँ कारण उसकी बिलकुल नहि चलती थि !
“सुन कालूसेठ, धन कां सम्बन्ध तेरे पिता औऱ माणिक केँ बिच हैं, उससे तेराकोई सम्बन्ध नहि हैं” रमन नें थोडा उग्र होतेहुए कहा !
“अरेअरे रमन चाचा, जरा शांत, मे तौ बसपूछ रहा थां” कालू नें अपना बचाव करतेहुए कहा !
पुरेगाव मे मात्र एक्का-दुक्का लोग हि थें जिसने राजनसेठ नें उधारधन नहि लिया थां जिनमे सें एक् थां रमन ! रमन प्रकति सें थोडा उग्र थां, उसके बाप-दादाजी सब सेना मे थें मगररमन कों खेती-बाड़ी हि पसन्द थि इसीलिए वोँ सेना मे नहि गय़ा, मगर वो एक् सेनिक जीवट वाला हि थां ! कालू अपने बुरे व्यवहार केँ कारणकई बाररमन सें पिट भि चूका थां
इसीलिए वोँ रमन सें संभलकर हि रहता हैं !
कालूरमन केँ उग्र स्वाभाव कों देखकर थोडा भीड़ सें आगेचला जाता हैं !
“हा तौ रमन, तुम् साधूबाबा केँ बारे मे क्याँ शर्तबता रहे थें ?” माणिक नें रमन कों शांत कराने केँ लिए पूछा ताकि उसका ध्यान कालू सें हट जाये !
“अरेयह कालू भि नाँ, पूरा दिमाख ख़राबकर देता हैं” रमन नें अपने गुस्से कों शांत करतेहुए कहा
“उसको छोड़ो, तुम् आगेउस शर्त केँ बारे मे बताओ” माणिक नें कहा
‘अब सुनो, साधुबाबा कि शर्तयह थि कि जब भि वोँ वापसआये तोँ बड़े राजाजी याँ उनकेवंश कों उनकीबात मानकर उनका एक् काम करना होगा नहि तौ वोँ उनकी वंशबेली कों खत्मकर देंगे’
‘आखिर, उस बूढ़े बाप केँ पुत्र मोह नें उनकीइस शर्त कों मानने सें मजबूर कर दिया’
‘बाद मे साधुबाबा नें उसशव कों लेकरचले गए औऱ पुरे 3 दिनों लें बाद उसको जीवित कर वापसमहल लेँ आये’
तब सें लेकरआज तक साधुबाबा कभी नहि आये, उनका सीधाआज हि दर्शन हौ पाया हैं
‘अच्छा, तभी राजाजी इतने उलजन मे दिखरहे हैं’ माणिक मन मे सोचरहा थां
“अरेहां माणिक, तुम् सुरभि केँ बारे मे इनसे क्यूं नहि पूछ लेते, कोई तौ मार्ग जरुर होगा इनकेपास” रमन नें भरोसा दिलाते हुएकहा
यहबात सुनकर माणिकलाल केँ मन मे एक् आशा कि किरण सि जाग गई
‘हाहायह साधुबाबा सुरभि कों जरुरठीक कर देंगे, यह तौ मुर्दों कों भि ठीककर सकते हैं, आखिरकार बरसो केँ बाद मेरी बच्ची ठीक हौ सकेगी’ अपनीमन कि कल्पनाओ मे माणिकलाल खुश हौ रहा थां
तभी अचानक भीड़ मे कुछ हल्ला सां होँ उठा ! माणिकलाल अपनेमन कि कल्पनाओ सें बहारआकर देखता हैं कि अचानक वोँ गाव कां पागल बुड्ढा उस विशाल शिव प्रतिमा केँ पीछे सें बहार निकलता हैं औऱ इतनी फुर्ती केँ संग वोँ राजा केँ सैनिको केँ बीच सें निकलकर उस साधू केँ पास पहुच जाता हैं जिससे सारेलोग औऱ राजा भि चौक जाते हैं ! इस पागल बुड्ढ़े कों एसागाव मे करतेहुए किसी नें कभी नहि देखा थां
तभी वोँ होता हैं जिसेदेख कर सारेलोग औऱ यहा तक कि राजा भि हक्का-बक्का रह जाता हैं
वो कौन था - dopahar ki chahat – New Episode
तभी अचानक भीड़ मे कुछ हल्ला सां होँ उठा ! माणिकलाल अपनेमन कि कल्पनाओ सें बहारआकर देखता हैं कि अचानक वोँ गाव कां पागल बुड्ढा उस विशाल शिव प्रतिमा केँ पीछे सें बहार निकलता हैं औऱ इतनी फुर्ती केँ संग वोँ राजा केँ सैनिको केँ बीच सें निकलकर उस साधू केँ पास पहुच जाता हैं जिससे सारेलोग औऱ राजा भि चौक जाते हैं ! इस पागल बुड्ढ़े कों एसागाव मे करतेहुए किसी नें कभी नहि देखा थां
तभी वोँ होता हैं जिसेदेख कर सारेलोग औऱ यहा तक कि राजा भि हक्का-बक्का रह जाता हैं
वोँ पागल बुड्ढा, साधू केँ आखो मे आखे डालता हुआ, आहिस्ता उसकेहोठ साधू केँ कानो केँ पास लें जाकरकुछ बोलता हैं औऱ अचानक सें चिल्लाता औऱ हसताहुआ वोँ बुड्ढा तेजी सें दौड़ता हुआ मंदिर सें बहारचला जाता हैं !
वोँ साधूडर केँ मारे जड़वत हौ जाता हैं मानो अभि उसके सामने मौत नाचकर चली गयीँ, होँ ! आरामसे उसकेआखो केँ सामने अन्धकार छा जाता हैं औऱ वोँ वही बैठे-बैठे नीचेगिर पड़ता हैं
रात्रि कां दूसरा प्रहर, निशिथ चलरहा थां ! मंदिर केँ प्रांगण मे राजा औऱ उन साधुबाबा कां तम्बू लगा दिया गय़ा थां औऱ राजा केँ सैनिक, मंदिर कि चारदीवारी कि सुरक्षा कररहे थें, कुछ सैनिक अपना प्रहर ख़त्म होते हि अपनी स्तिथि छोड़रहे थें उसकी स्थान पर्र नए सैनिक स्थान लेँ रहे थें !
सप्तोश, जौ उस साधूबाबा कां सबसे पुरानां शिष्य थां वोँ राजवैद्यीके संग साधू कि जडीबुटी कररहा थां ! राजवैद्यी, सुभह सें कईबार साधू कि नाडीदेख चुकी थि, कई परिक्षण कर चुकी थि मगर उसकोकुछ भि समझ मे नहि आँ रहा थां कि उनकोहुआ क्याँ थां !
सप्तोश भि आयुर्वेद कां परम ज्ञाता थां उसके गुरु नें उसको अपना सारा ज्ञान उसको दियाहुआ थां मगरआज उसे अपने गुरु कि हालात उसके पुरे ज्ञान केँ विपरीत दिखाई पड़रही थि इसीलिए उसने राजवैद्यी कां सहारा लिया थां !
राजवैद्यी चेत्री, वो हमेशा यात्रा केँ दौरान राजा केँ संग हि रहती थि ! वोँ दिखने मे कुरूप थि मगर उसको कुरूप कहना उसके ज्ञान कां अपमान थां ! उसका सौन्दर्य, उसका ज्ञान औऱ उसकी वैज्ञानिक सोच थि जौ उसको हमेशा दुसरो सें महान रखती थि ! वो हमेशा हर किसी कि सहायता केँ लिए तत्पर रहती थि ! राजा कों उसकीवजह सें कभी तकलीफ़ कां सामना नहि करनापड़ा थां ! मगरआज जैसे उसकी ज्ञान कि परीक्षा थि !
करीब रात्रि कां दूसरा प्रहर भि बीत चूका थां ! दोनों कों समझ नहि आँ रहा थां कि अब क्याँ करे ! दोनों अपनी-अपनी तरफ सें पूरी कोशिश कररहे थें, दोनों हि तरफ सें मामला सर केँ उपर थां !
सप्तोश, जोँ कि प्रधान शिष्य भि थां, वोँ तम्बू सें बाहर् निकलता हैं औऱ उपर आसमान कों देखता हैं, आज उसने तारो कि गणना भि सहीकरी थि मगरएसी अनहोनी कां अंदाजा उसे बिलकुल नहि थां ! साधू केँ सारे शिष्य औऱ शिष्याऐ, मंदिर प्रांगण मे खुले आकाश केँ नीचे बैठेहुए थें ! सब केँ आखो सें नींद गायब थि !
“कुछपता चला, गुरूजी कों क्याँ हुआ हैं” डामरी नें पूछा !
डामरी, साधूबाबा कि शिष्याओ मे सें एक् थि जिसने अभि-अभि साधुबाबा कां शिष्यत्व स्वीकार किया थां !
“नहि डामरी, अभि तक उनकी अवस्था कां कुछपता नहि चला” सप्तोश नें हताश होतेहुए कहा !
“औऱ राजवैद्यी, उनका क्याँ कहना हैं” डामरी नें फिन पूछा !
“वोँ भि अपनी पूरी कोशिश कररही हैं”
सप्तोश नें डामरी कों नजरंदाज करतेहुए शिव कि प्रतिमा कों देखते हुएकहा ! अचानक सप्तोश कों कुछयाद आया औऱ वोँ जल्द सें राजा केँ तम्बू कि औऱ चलपड़ा औऱ डामरी उसको देखती हि रह गई, !
राजा धूम्रकेतु, अपने तम्बू मे कुछ परेशान सें उधेड़बुन मे इधर-उधर टहलरहे थें ! राजा सुभह सें हि चिंतित थें, पहली तौ यह कि उनको जल्द-जल्द मे अपनी राजधानी सें यहा आनांपड़ा थां जिससे उसने अपने राज्य कां कार्यभाल अपनेबड़े बेटे अश्वनी कों सौपकर आया थां जौ अभि राज्य, नीति औऱ बर्ताव सिख हि रहा थां औऱ दूसरा साधुबाबा केँ यहाआने कां औऱ तीसरा औऱ सबसेबड़ी तकलीफ़ ये थि कि अब क्याँ करा जाये ! इस अवस्था मे वोँ, साधुबाबा औऱ उनके शिष्यों कों छोड़ भि नहि सकता थां औऱ नां हि साधुबाबा केँ कुछ उपचार कां पताचल रहा थां तभी सप्तोश बिना राजा कों सूचना दिए सीधे हि राजा केँ सामने आँ जाता हैं ! जिससे राजा कां ध्यान भंग हौ जाता हैं ! राजा केँ द्वारपालों मे हिम्मत नहि थि थि वोँ साधुबाबा केँ प्रधान शिष्य, सप्तोश कों रोकसके !
“सुन राजन, अगर मेरे गुरु कों कुछ भि हुआ तोँ मे इस पुरेगाव कां नाशकर दूंगा” अपने शक्तियों केँ अभिमान औऱ क्रोधवश सप्तोश बोलउठा, जिससे राजा थोडा डर गय़ा !
राजा कां डरना भि जायज थां क्योकि ५५ सें ६० वर्ष कां सप्तोश कों उसके गुरु नें बहुतकुछ सिखा भि दिया थां औऱ बहुत परालौकिक शक्तिया भि अर्जित करली थि
“सुन, उस पागल बुड्ढ़े केँ बारे केँ कुछपता चला, जिसके कारणयह सभी घटितहुआ हैं” सप्तोश नें उसी गुस्सा मे कहा
“हमारे गुप्तचर औऱ खोजी, सुभह सें उस कि तलाश मे हैं मगर उसकाअब तक कोईपता नहि चला” राजा नें कहा
इसकेआगे सप्तोश भि कुछ नहि कह सकता थां क्योकि उसने भि अपनीतरफ सें, अपनी शक्तियों कि मदद सें पूरी कोशिश करली थि मगरउस पागल कां कोईपता नहि चला थां मानो उसका अस्तित्व हि नहि हौ
“चेत्री कां इसके बारे मे क्याँ कहना हैं” राजा नें माहोल कों थोडा शांत करने केँ लिएकहा !
सप्तोश कुछ कहने हि वाला थां कि एक् सैनिक दौड़ता हुआआता हैं औऱ कहता हैं कि।
वो कौन था - dopahar ki chahat - Next part mein bada twist
bhut hi behtreen writing skill h bhay aapki, aesa lag raha h jaesa kisi professional writer kee kahani padh raha ho. or plot bi majedaar lag raha h. for new kahani
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