सफर (बस से बिस्तर तक का...) - Hindi Sex Kahani - Latest Update 1
नमस्ते दोस्तो, मेरानाम महेश कुमार हैं औऱ मे एक् बारफिन आप् लोगो केँ लिये अपनी एक् छोटी सि नयी किस्सा लेकरआया हुँ। उम्मीद करताहुँ यह मेरीइस किस्सा कों भि आप् उतना हि पसंद करोगे जितना कि मेरी पहले कि कहानियों कों किया हैं।
पर्र स्टोरी शुरु करने सें पहले मे आपको पहले भि बता चुका हूं कि मेरीसब कहानियाँ काल्पनिक हैं जिनका किसी आदमी जीवित अथवामृत, जगहआदि सें भि कोई सम्बन्ध नहि हैं, अगर होता भि हैं तोँ यह सिर्फ एक् सँयोग हि होगा।
चलो अब अधिक टाइम नाँ लेते सीधा किस्सा पर्र आताहुँ, जैसा कि आपने मेरी पिछली कथा "पिँकी" मे मेरे औऱ पिंकी केँ सेक्स सम्बन्धों केँ बारे मे पढ़ा, ये उसकेआगे कां एक् वाक्या हैं.
पिंकी केँ संग सेक्स सम्बन्ध बनने केँ बाद हमारा पढ़ाई मे बिल्कुल भि ध्यान नहि रहा, पिंकी तौ फिन भि किसीतरह पास होँ गयीँ, मगर मे फेल होँ गय़ा, जिस कारण मुझे भैया सें बहुतमार पड़ी तौ मेरी भाभी कों भि बहुत डांट सुनने कों मिली, मगर फिन भि मेरे पिंकी केँ संग सेक्स सम्बन्ध जारीरहे.
पिंकी अब कॉलेज जानेलगी थि औऱ मे फिन सें बारहवीं करनेलगा। इस दौरान पिंकी केँ भैया कि विवाह होँ गई,। पहले तौ सभीठीक हि चलतारहा मगर फ़िर धीरे-धीरे धीरे-धीरे पिंकी कि भाभी कों हमारे सम्बन्धों कां शक हौ गय़ा जिस कारण पिंकी कां हमारे घऱ आनां जानां कम हौ गय़ा।
पिंकी कि भाभीअब हम् दोनों पर्र नजर रखनेलगी थि मगरफिन भि रात कों छत पऱ याँ किसी औऱ स्थान हमारे सम्बन्ध बन हि जाते थें, इसी दौरान मेरी भाभी भि पेट सें हौ गयीँ,। भाभी मम्मी बनने वाली थि इसलिये भाभी तोँ मुझे अपनेसंग चुदाई कां कम हि मौका देती थि मगर मेराकाम पिंकी केँ संग चलतारहा.
वैसे तोँ सभीकुछ ठीक हि चलरहा थां मगर एक् बाररात कों मे औऱ पिंकी छत पऱ चुदाई कररहे थें तभीपता नहि केसेवहा पर्र पिंकी कि भाभी आँ गई, औऱ उसने हमें चुदाई करतेहुए रँगेहाथ पकड़ लिया.
पिंकी कि भाभी नें अब मुझे तौ कुछ नहि कहामगर बेचारी पिंकी कि शामत आँ गयीँ,। उसकाघऱ सें बाहर् निकालना बिल्कुल बन्द हौ गय़ा, तौ उसकी पढ़ाई भि बन्द करवा दि गई,, यहा तक कि उसके घरवाले तोँ उसकी विवाह केँ लियेअब नाता तक देखने लगे.
पिंकी केँ घऱ वालों नें मेरेघऱ पऱ भि मेरेव पिंकी केँ सम्बन्धों बारे मे बता दिया थां जिससे मुझे अपने माँ बापू केँ सामने काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी, संग हि बापू सें मुझे बहुत डांट भि सुननी पड़ी, वोँ तोँ बस शुक्र इतना थां कि उस वक्त मेरे भैया घऱ पर्र नहि थें, वरना भैया तोँ मुझेमार हि डालते.
पिंकी केँ संग मेरी चुदाई बन्द होँ गई, थि इसलिये मे भि अब अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर्र लगाने लगा जिसमें मेरी भाभी बहुत सहायता करती थि। मे अब भि भाभी केँ कमरे मे हि सोता थां इसलिये भाभी केँ पेट सें होने केँ बावजूद भि कभीकभी हम् देवर जी भाभी चुदाई कर लेते थें।
अबइसी तरहदिन बीतते रहे औऱ भाभी कों महीना चढ़ता गय़ा, भाभी कों अबघऱ केँ काम मे दिक्कत आनेलगी थि। पहले तोँ विद्यालय सें आने केँ बाद मे भाभी कि सहायता कर देता थां मगर भाभी कों जब आठवाँ महीना लगा तौ भाभी केँ लियेघऱ केँ काम करना औऱ भि मुश्किल होँ गय़ा।
मेरी मां तोँ बीमार हि रहती थि इसलिये वोँ तौ घऱ केँ कामकर नहि सकती थि औऱ मुझे भि विद्यालय जानां होता थां इसलिये मे भि सारादिन घऱ मे नहि रह सकता थां.
फिन अभि तोँ भाभी कां नौवाँ महीना बाकी थां संग हि अभि बच्चा भि होना थां इसलिये हम् किसी रिश्तेदार कों बुलाने केँ लिये सोचने लगे.मगर हमारा कोईसगा रिश्तेदार तौ थां नहि, बस गाँव मे चाचा जी हि थें जिनके संग हमारे अच्छे सम्बन्ध थें।
मे तौ अबखुश हौ रहा थां कि शायद गाँव सें सुमन दिदी याँ फिन रेखा भाभी मे सें कोई आयेगा। जिससे मेरेदिन अब अच्छे सें निकलेँगे.
सुमन दिदी व रेखा भाभी केँ बारे मे तोँ आप् जानते हि हें। अगर नहि जानते तौ मेरी पहले कि कहानियाँ
"रेखा भाभी"व "एक् हसीन गलती." जरूर पढ़ें!
मगर सुमन दिदी कां नाता होँ चुका थां औऱ दो महीने बाद हि उसकी विवाह होने वाली थि इसलिये मेरे बापू कों सुमन दिदी कां बुलाना ठीक नहि लगा औऱ विवाह वालेघऱ मे बहोत काम होते हें इसलिये रेखा भाभी भि नहि आँ सकती थि।
मेरे पिताजी तौ नौकरानी रखना चाहते थें मगर मेरी माँ व भाभी कों नौकरानी रखना पसंद नहीं थां। अब समस्या यहखङी हौ गयीँ, कि घऱ केँ काम करने कों अगर बुलायें तौ किसको बुलायें?
दोतीन दिन तक हमारे घऱ मे अबयही बहस चलतीरही, फिन मेरी भाभी नें हि कमान सँभालते हुए अपनी फूफी कि लड़की ‘ममताजी’ कों बुलाने कि सलाह दि, जौ कि सबकोसही भि लगी, औऱ फिन अगले हि दिन मेरे पिताजी मेरी भाभी कि फूफी कि लड़की, ‘ममताजी’ कों हमारे घऱ लें कर आँ गये।
ममताजी नें बी०ए० करली थि औऱ एम०ए० कि पढ़ाई वोँ घऱ पऱ रहकर हि कररही थि इसलिये उनको भि आने मे कोई दिक्कत नहि हुईँ।
वैसे ममताजी, उम्र मे मेरी भाभी सें भि बङी थि, पर्र मेरी भाभी कों तोँ विवाह केँ बादअब बच्चा भि होने वाला थां मगर ममताजी कि विवाह तोँ दूर, अभि तक नाता भि नहि हुआ थां।
ममताजी आगे पढ़ना चाहती थि इसलिये पढ़ाई केँ कारण पहले तौ वोँ स्वयं विवाह सें मना करतीरही मगरअब उनके जितना पढ़ाहुआ योग्य कोई लड़का नहि मिलरहा थां।
मैंने ममताजी कों भैया कि विवाह मे हि देखा थां उसकेबाद उनसे मिलने कां कभी मौका नहि मिला थां। मे क्याँ हमारे घऱ मे मेरी भाभी कों छोड़कर कोई भि ममताजी कों इतना नहि जानता थां मगरफिन भि वोँ इतनी मिलनसार व हंसमुख थि कि हफ्ते भर मे हि वोँ सब सें घुलमिल गई,।
ममताजी मेरे भैया कि साली लगती थि, इस नाते वोँ मेरी भि साली हि लगीमगर मुझसे वोँ उम्र बहुतबड़ी थि इसलिये मे उन्हें ममताजी याँ दिदी कहकर बुलाता थां औऱ वोँ मुझे मेरेनाम सें बुलाती थि, मगर ममताजी बहुत हंसमुख थि इसलिये बहुतबार वोँ मुझे छोटे जीजाजी कहकर मजाक भि कर लेती थि।
ममताजी मेरी भाभी केँ कमरे मे सोनेलगी थि औऱ मैंने फिन सें अपनाखाट ड्राईंगरूम मे लगा लिया थां। वैसे भि अबइस हालत मे भाभी केँ संग मे कुछकर तोँ सकता नहि रहा थां इसलिये मुझे भि कोई तकलीफ़ नहीं थि।
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अबऐसे हि दिन गुजररहे थें, सभीकुछ सहीचल रहा थां कि एक् दिन ममताजी नें बताया कॉलेज कां प्रवेश प्रपत्र भरने केँ लिये उन्हे उनके कॉलेज जानां होगा औऱ उन्हें घऱ पऱ भि कुछकाम हैं।
ममताजी कां घऱपास हि केँ शहर मे थां जौ कि अधिकदूर तोँ नहि थां, बस मेरेयहा सें 80-90 किलोमीटर हि होगामगर वहा कि सड़क बहोत खराब थि।
ममताजी कों उनकेघऱ सें मेरे बापू लें करआये थें, इसलिये सड़क खराब होने केँ कारण उन्हें कमर दर्द कि बहुत तकलीफ़ हौ गई, थि। मेरे बापूअब वहा दोबारा नहि जानां चाहते थें इसलिये पिताजी नें ममताजी केँ संग मुझे जाने केँ लियेकहा।
ममता कों काम समाप्त करकेउसी दिन वापस भि आनां थां, नहि तौ घऱ पर्र भाभी कों काम कि तकलीफ़ होँ जाती इसलिये हम् अगलेदिन सुभह जल्द हि घऱ सें चल दिये औऱ टाइम सें पहुँच भि गये।
ममताजी केँ शहरआकर सबसे पहले हम् ममताजी केँ घऱगये, औऱ फिनवहा केँ काम निपटा कर ममता केँ कॉलेज चलेगये। ममताजी नें बहुत जल्द भि कि मगरफिन भि हमें कॉलेज मे बहुत टाइमलग गय़ा औऱ बड़ी मुश्किल सें हमेंउस दिन कि आखरीबस मिलसकी।
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वोँ आखरीबस थि औऱ हम् देर सें भि आये थें इसलिये बस मे हमें बैठने केँ लियेकही भि सीट नहि मिली। वैसेउस बस मे भीड़ नहि थि, बस मे औऱ ममताजी हि खड़ेहुए थें, बाकीसब सवारियां सीट पर्र बैठी हुइ थि।
अब एक् तौ हमेंसीट नहि मिली थि, ऊपर सें वोँ बस इतनी पुरानी औऱ खटारा थि कि बहोत हि धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलरही थि। इसलिये हम् कुछदेर तक तोँ खड़ेरहे फिन मैने देखा कि बस केँ आखिर मे जौ एक् लम्बी सि सीट होती हैं वोँ उसबस मे नहि लगी थि, उसकी स्थान खाली थि।
खाली स्थान देखकर अब नीचे हि बस केँ फर्स पर्र बैठने केँ लिये मे औऱ ममताजी भि वहाचले गये। वहा पऱ ममताजी नें देखा कि बस केँ कोने मे छोटा सां लकड़ी कां एक् पटरापड़ा हुआ थां इसलिये ममताजी तोँ नीचेउस पट्टरे पऱ बैठ गई, औऱ मैअबमै उनकेबगल मे हि नीचे फर्स पर्र बैठ गय़ा।
मेरेशहर कों जाने वाली एक् तौ वोँ अंतिम बस थि औऱ ऊपर सें वोँ हर एक् स्टैंड पऱ रूकरुक कर सवारी लेती हुई धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलरही थि इसलिये कुछदेर बाद हि अन्धेरा होनेलगा औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे बस मे सवारियाँ भि बढ़नेलगी।
मुझेउस बस वाले पऱ बहोत क्रोध आँ रहा थां क्योंकि एक् तौ वोँ हर एक् स्टैंड पर्र सवारियाँ भरताहुआ बस कों धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलारहा थां जिससे भीड़ बढ़तीजा रही थि, ऊपर सें वोँ अन्धेरा होने पऱ भि बस कि लाईट नहि जलारहा थां इसलिये बस कि सवारियों केँ हमेंपेर लगरहे थें।
पता नहि उस खटारा बस कि लाईटें खराब थि याँ फिन वोँ जानबूझ कर लाईट नहि जलारहा थां। पर्र जौ भि होँ मुझेउस बस वाले पर्र अब क्रोध बहोत आँ रहा थां।
अबकुछ देर तक तौ मे औऱ ममताजी नीचे हि बैठेरहे मगरफिन सवारियाँ बढ़ने केँ कारण हमेंखड़ा होनापड़ गय़ा क्योंकि सवारियाँ बढने केँ कारणहमे उनकेअब कुछ अधिक हि पेर लगनेलगे थें।
ममताजी बस केँ कोने मे आगे कि तरफ मुँह करकेखड़ी हौ गई, थि इसलिये मे भि उनकेबगल मे हि खड़ा होँ गय़ा, मगर ममताजी सें बात करने केँ लिये मैंने ममताजी कि तरफ हि मुँहकर लिया थां।
ममताजी केँ आगे कि तरफ एक् महिला खड़ी थि, एक् तरफ मे खड़ाहुआ थां औऱ उनके पीछेव एक् बगल मे बस कां कोना थां।
अबकुछ देर तक हम् ऐसे हि खड़ेरहे फिन ममताजी केँ आगे जौ महिला खड़ी थि, वोँ वहा सें हट गयीँ,। उस महिला कां स्टैंड आने वाला थां इसलिये वोँ स्त्री तौ वहा सें आगेचली गयीँ, औऱ उसकी स्थान ममताजी केँ आगे एक् गँदा सां व्यक्ति आकरखड़ा होँ गय़ा।
वोँ व्यक्ति ममताजी कि तरफ हि मुँह करकेखड़ा हौ गय़ा थां जिससे ममताजी कों शायदकुछ तकलीफ़ सि होनेलगी। पर्र ममताजी कुछदेर तोँ वैसेखड़ी रहीफिन उन्होने भि घुमकर अपना मुँह मेरीतरफ हि कर लिया जिससे मे औऱ ममताजी अब एक् दूसरे केँ आमने सामने होँ गये.
तब तक अन्धेरा भि बहुत होँ गय़ा थां औऱ बस मे भि भीङ बहुतबढ़ गयीँ, थि। वैसे तौ मेरेव ममताजी केँ बीच बहुत फासला थां मगरसड़क कि हालत इतनी खराब थि कि बसचलकम रही थि औऱ इधरउधर हिल अधिकरही थि। बस केँ हिलने सें ममताजी कां कोमल जिस्म अबबार बार मेरेबदन कों स्पर्श होनेलगा.
बस केँ हिलने सें ममताजी कि चुचियाँ मेरी छाती सें तोँ उनकी नर्म रसीले जाँघें अबबार बार मेरी जाँघो सें छुरही थि। अब ममताजी केँ कोमल शरीर कां स्पर्श पाकर मेरा लण्ड केसे शाँतरह जाता.?
उस टाइम ममताजी केँ बारे मे मैंने ऐसा सोचा भि नहि थां मगरफिन भि ममताजी केँ मखमली स्पर्श सें मेरा लन्ड उत्तेजित होनेलगा थां। वैसे तौ मे कोशिश कररहा थां कि ममताजी कों स्पर्श नां करूँ औऱ मेरा लन्ड भि उत्तेजित नाँ होँ मगरफिन भि धीरे-धीरे मेरा लन्ड उत्तेजित होताजा रहा थां.
उसदिन सुभह नहाने केँ बाद मैंने जल्दबाजी मे एक् तोँ पैंट केँ नीचे अण्डर वियर नहि पहना थां औऱ दूसरा स्टाइल केँ चक्कर मे रेशमी कपड़े कि मैंने जौ पैन्ट पहनी हुइ थि, उसका कपड़ा भि बिल्कुल हि पतला सां थां, इसलिये मेरे उत्तेजित लन्ड कां उभार भि कुछ ज़्यादा आँ रहा थां.
अबयेबात कही ममताजी कों पता नाँ चल जाये इसलिये मे अपनी पूरी कोशिश करनेलगा कि ममताजी कों मेरे लन्ड कां स्पर्श नाँ हौ। मगरफिन भि भीड़ कि वजह सें औऱ बस केँ हिलने केँ कारण मे बारबार ममताजी कों स्पर्श होतारहा.
वोँ बस कां ड्राईवर भि तौ बस कों खड्डो सें बचाने केँ लियेसङक पऱ कभीइधर मोङरहा थां तौ कभीउधर मोङरहा थां जिससे मै औऱ ममताजी बारबार एक् दुसरे सें स्पर्श हौ रहे.
अब पहलेदो चारबार तोँ जब मेरा लण्ड ममताजी सें स्पर्श हुवा उन्होंने उस इतना ध्यान नहीं दिया। मगर जबबार हि ऐसा होतारहा तोँ ममताजी कों भि इसका अहसास हौ हि गय़ा। औऱ वोँ हल्का सां कसमसाकर अब पीछे होनेलगी।
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