सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़ completee - सुरभि - Episode 1
सुरभि औऱ जिन्न फ़ैज़ान कां इश्क़
"माँ?" बोलीं सुरभि अपनी माँ सें,
सर्दी केँ दिन थें, आज रविवार थां, धूप कां मजा लेँ रहेथीं मां बेटी!
"हाँबोल?" बोलीं मम्मी,
"वोँ सामने, अशोक कां पेड़ हैं नं?" बोलीं वोँ,
मां नें देखा,
"हाँ, वही हैं" बोलि मां!
"क्याँ फूल हें नं उसमे?" बोलीं वोँ,
"फूल? कहां हैं फूल?" बोलि मां,
गौर सें देखते हुएउस पेड़ कों!
"आपको वोँ लालचटक फूल नहि दिखरहे?" बोलि सुरभि,
हैरत सें!"कहां हें फूल?" मां नें फिन सें गौर सें देखा,
अब ग्रिल तक गयीं वोँ, औऱ गौर सें देखा,
उन्हें तोँ बसचटक हरे पत्ते हि दिखे!
आई वापिस,
"तुम्हारी तरफफूल दिखरहे हें उसने?"म नें पूछा,
"हाँ, देखो, कितने प्यारे हें!" बोलीं मुस्कुरा कर सुरभि!
"याँ तोँ तुँ मज़ाक कररही हैं, याँ फिन तेरी आँखों कां अब इलाज ज़रूरी हैं!" बोलि मम्मी, खीझकर,
औऱ आँ बैठीं फिन सें, फोल्डिंग-बिस्तर पर्र, मां मेथी केँ पत्ते साफ़क रहीथीं,
औऱ सुरभि, कानों मे, एअर-फ़ोन लगा, फोन-फ़ोन मे गानेसुन रही थि,
जब मम्मी सें बातें कीं, तोँ गले मे लगा लिया थां वोँ एअर-फ़ोन!
"कमाल हैं माँ! खैर छोडो!" बोलि सुरभि,
औऱ कान मे, फिन सें लगा लिया उसनेअपन एअर-फ़ोन!
सुरभि, मेडिकल कि छात्रा थि, तृतीय वर्ष कि,
बहोत खूबसूरत औऱ अच्छे शरीर वाली हैं वोँ सुरभि!
उसकेतन पऱ, कोई भि कपड़ा हौ,
फब जाता हैं, ऐसा शरीर हैं सुरभि कां!
चेहरा ऐसा खूबसूरत,
कि उसकी सहेलियां हि उसे न् जीने देतीं!
सुलझे हुए व्यक्तित्व वाली हैं सुरभि!
नए ज़माने कि हवा सें दूर हैं,
साड़ी पहनती हैं कभीकभी,
मैंने सबसे पहले साड़ी मे हि देखा थां उसको,
बाकी, सूट-सलवार, जीन्स आदिकुछ नहि,
कट-स्लीव्स, क़तई नहि!
केश, कमर सें नीचे तक!
सुसंस्कृत! औऱ समझदार!
श्याम सिंह कां परिवार, नॉएडा मे रहता हैं,
परिवार मे, श्याम सिंह, सरकारी जॉब करते हें,
पत्नि गृहणी हें,
एक् बड़ी बेटी हैं यह सुरभि,
औऱ एक् छोटा बेटा हैं, कुणाल,
कुणाल, इंजीनियरिंग कररहा हैं, औऱ घऱ सें बाहर् रहता हैं,
महीने मे, एक् बारघऱ आता हैं, सीधा-सादा लड़का हैं वोँ!
श्याम सिंहजी केँ बड़े भइया भि सरकारी जॉब मे हें,
उनका परिवार भि, उनकेपास हि, रहता हैं,
उनके पापा बड़े भइया केँ पास रहते हें,
श्याम सिंहजी केँ बड़े भइया केँ तीन लड़के हें,
इसीलिए, अपने ताऊ-ताई औऱ अपनेसब भाइयों कि लाड़ली हैं यह सुरभि!
तोँ उसदिन सुरभि नें अशोक केँ फूल देखे थें,
पेड़ पर्र लगेहुए, बहोत कम हि देखते हें यहफूल!
अशोक कां वृक्ष चाहे वृद्ध होँ, ठूंठबन, गिरजाए,
फूल नहि देता, जब तक कि कोई रजस्वला कन्या उसको स्पर्श नं करे!
इस सें पहले भि, कोईदस दिन पहले,
सुरभि जब स्नान करने गयीँ, थि,
तोँ बाल्टी केँ पानी मे, उसको अजीब सें छोटे छोटे नीलेरंग केँ कुछफूल मिले थें!
उसने उनको निकाल लिया थां बाहर्,
औऱ जब स्नान कर लिया, तोँ जिस्म केँ कोने कोने सें, एक् भीनी भीनी सुगंध बनीरही, अगलेदिन तक, उसके सहपाठी भि चकित थें, कि पूरी कक्षा मे यह सुगंध आँ कहां सें रही हैं! जिस सें छूजाए, वहीगंध जाए!ऐसी सुगंध थि वोँ! औऱ हैरत कि बातयह, कि सुरभि कों यह सुगंध नहि आँ रही थि! औऱ जब वोँ लौटी कक्षा सें, तोँ गुसलखाने मे रखेहुए वोँ फूल, थें हि नहि वहां! शायद मां नें फेंकदिए हों!यही सोचा उसने, औऱ बातआई गयीँ, हौ गयीँ, !
दोदिन बाद कि बात होगी,
अपनी कक्षा मे थि उसदिन सुरभि,
साथ मे उसकीदो सहेलियाँ थीं, जिनसे वोँ खुलकर बात करती थि,
एक् जिला सागर, मध्य प्रदेश सें थि, कामना,
औऱ एक् ऊना, हिमाचल प्रदेश सें, पारुल,
प्यास लगी कामना कों,
तोँ चली पानी पीने,
साथ उसके, वोँ पारुल भि चली,
बाहर्, एक् स्थान, वाटर-कूलर लगा थां, वहीँ सें पानी पिया करते थें विद्यार्थी,
तोँ वाटर-कूलर काम नहि कररहा थां, वापिस हुईं दोनों,
अबबाद मे कैंटीन सें पीना पड़ता उनको, कोई बात नहि,
वक़्त भि हौ चला थां, आँ करबैठ गयींवे दोनों,
कुछ हि देर मे, सुरभि गयीँ, पानी पीने,
सुरभि नें वाटर-कूलर कि टंकी केँ नीचेरखा गिलास,
तौ पानी आँ गय़ा! पानीपी लिया उसने, गिलास फेंकदया,
डिस्पोजेबल गिलास रखे जाते थें वहां,
पानी पिया, औऱ वापिस हुईँ,
कक्षा कां वक़्त ख़त्म हुआ, तौ अब चलीं कैंटीन,
कामना औऱ पारुल नें पानी पिया सबसे पहले,
औऱ लें आयींउस सुरभि केँ लिए भि!
सुरभि नें मना किया,
"प्यासी हि रहेगी क्याँ?" बोलीं कामना,
"क्यूं? पानीपी तोँ लिया मैंने?" बोलि सुरभि,
"कहां पिया पानी?" पूछा कामना नें,
"वहीँ सें, वाटर-कूलर सें?" बोलि वोँ,
"मगर वोँ तौ खराब हैं?" बोलि कामना,
"जा, जाकरदेख, चलरहा हैं!" बोलीं सुरभि,
"पारुल? वोँ चलरहा थां क्याँ?" पूछा कामना नें, पारुल सें,
"नहि!" बोलीं पारुल,
"मगरजब मे गई,, तोँ चलरहा थां?" बोलीं सुरभि!
"नहि चलरहा!" आवाज़ आई एक् लड़के कि,
यह अरिदमन थां, लखनऊ सें थां वोँ, संग हि पढ़ता थां उनके,
"क्याँ?" बोलीं सुरभि,
"हाँ, नहि कलरहा, उसका स्विच भि ऑफ हैं!" बोला वोँ,
"ऐसा केसे हौ सकता हैं?" बोलि सुरभि,
"आँ! चलकरदेख!" बोलि पारुल,
अब तीनों चल पड़ीं उधर हि!
औऱ जब वाटर-कूलर देखा,
तोँ स्विच ऑफ थां उसका!
पानी, नाम कों नहि थां उसमे!
"अब तूने क्याँ ख्वाब मे पिया पानी?" बोलि कामना!
"मेरा यक़ीन कर! मैंने यहीं सें पिया थां पानी!" बोलि वोँ,
औऱ तब उसने डस्टबीन मे झाँका,
एक् हि गिलास पड़ा थां! वोँ भि सुरभि कां!
वोँ गिलास, उन दोनों नें भि देखा!
अब वे भि सन्न!
ऐसा केसे होँ सकता हैं?
वाटर-कूलर बंद!
स्विच ऑफ!
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मगर डस्टबीन मे पानी कां गिलास!
क्याँ मानाजाए इसे! केसेआया पानी!
खैर,
अधिक माथा-पच्ची नहि कि उन्होंने,
सीधा कैंटीन गयीं, औऱ अपना खानां खाया,
मगर, सुरभि केँ मन मे यहबात घूमती हि रही!
जब वोँ बंद थां, तोँ पानीआया केसे?
क्याँ कुछ पलों केँ लिएचल पड़ा थां?
याँ बचाहुआ पानी थां?
जब उत्तर नहि मिलता मानव-मस्तिष्क कों,
तौ उसको भूलना हि बेहतर समझता हैं वोँ!
तोँ वोँ भि भूल गई, ! आया होगा, केसेआया होगा, पता नहि!
तीनदिन बाद कि बात हैं,
अपनेघऱ मे हि थि सुरभि,
रात कां वक़्त थां, अपनी पढ़ाई कररही थि वोँ,
इसी सिलसिले मे, उसे एक् पुस्तक कि तलाश थि,
पूरारूम छान मारा उसने अपना,
फर्श, अर्शसभी देख डाले,
नहि मिले वोँ पुस्तक! औऱ कां भि ज़रूरी!
कलजमा भि करना थां कक्षा मे,
कहीं किसी सहेली कों तोँ नहि दे दि?
फ़ोन उठाया, तौ फ़ोन किया उसने,
पूछा, जवाबवही, कि नहि हैं पुस्तक उसकी उनकेपास!
अबफिन सें ढूँढा! नं मिले!
अपने दूसरे रूम मे भि तलाशकरे,
वहा भि नं मिले!
छत पऱ गई,, वहा ढूँढा, वहा भि नहि!
अब गई, तोँ गई, कहां?
चिंता लग गई, बेचारी कों! क्याँ करेअब!
आई अपने कमरे मे,
औऱ जैसे हि नज़र पड़ी अपनीउन खुली किताबों पर्र,
तौ वही पुस्तक, दायें रखी थि उधर!
उसने दौड़कर, झट सें उठायी!
शायद निगाह नं पड़ी होँ उसकी!
उसने पलटे पृष्ठ,
औऱ बिस्तर पर्र बैठ, रूम लगा दीवार सें,
पढ़ने लगी,
कुछ पंक्तियों कों छांटा, औऱ फिन,
एक् सफ़े पऱ उतार लिया उसने!
देर रात तक, पढ़ती रही वोँ, औऱ लगभग डेढ़बजे,
अपनकाम फ़ारिग कर, किताबें करीने सें रख,
चादरओढ़, बत्ती बुझा, सो गयीँ, सुरभि!
सुभहजब नींद खुली, तौ पूरारूम गुलाब कि ख़ुश्बू सें महकाहुआ थां!
उसके नथुने भरउठे!
स्नान करने गयीँ,, तौ बाल्टी मे, फिन सें नीलेरंग केँ छोटे छोटेफूल दिखे!
उसने उठाये वोँ, कुलचार थें, रखदिए एक् स्थान,
स्नानादि सें निवृत हुइ, तोँ वोँ फूल लेँ चली बाहर्,
वस्त्र पहने, औऱ दर्पण देखा, आज तौ रूप हि निखर गय़ा थां उसका!
उसका गोरारंग, आज गुलाबी आभा लेँ रहा थां!
चली बाहर्, मां सें मिली, पिता जी सें मिली, अखबार पढ़रहे थें पापा,
उनसे बातें कीं, वोँ फूल पिता जी कों दिखाए, आँ गए होंगे कहीं सें, याँ गिरगए होंगे, बाहर् भि तौ ऐसे हि फूललगे हें शायद, याँ फिन माली केँ साथ आँ गए होंगे, बातटल गई, फिन सें, औऱ फिनगरम चाय-ब्रेकफास्ट भि आँ गय़ा!
तीनों नें मिलकर, गरमचाय ब्रेकफास्ट किया, वोँ भीनी भीनीगंध, अबआने लगी थि!
अबइस सें, मम्मी कों क्याँ औऱ पिता जी कों क्याँ!
उसकेबाद सुरभि रेडी हुई, मां नें लंच सजधजकर कर दिया थां,
आज कामवाली नहि आई हि, उसकी तबीयत ठीक नं थि,
तोँ आज मम्मी नें हि किचन संभाल रखी थि!
खैर, अपनाबैग संभाल, चल पड़ी अपनी कक्षा केँ लिए!
वहां पहुंची, तौ सारा कक्ष जैसेडूब गय़ा उस भीनी भीनी सुगंध मे!
ऐसाकोई नं थां, जिसको वोँ गंध नं आँ रही हौ!
"क्याँ परफ्यूम मे नहाकर आँ यी हैं आज?" बोलि कामना,
"नहि तौ?" बोलि वोँ,
"सारारूम गंधउठा हैं!" बोलि कामना!
"मगर मुझे तोँ नहि आँ रही?" बोलीं वोँ,
"औऱ आज क्याँ लगाया हैं चेहरे पर्र? दूध सें नहायी हैं क्याँ?" बोलि कामना,
"क्यूं? कुछ नहि लगाया?" बोलीं सुरभि!
"तोँ चमक केसेरही हैं आज इतनी?" बोलीं कामना, हंसकर!
"चल! हमेशा हि मज़ाक!" बोलि वोँ,
बाद मे, जब कक्षा समाप्त हुई, तोँ कैंटीन चलीं तीनों!
वहां एक् लड़का भि थां, यश, एक् बिगड़ैल रईसज़ादा!
हमेशा सें हि, मार्ग रोका करता थां सुरभि कां,
फिरभी सुरभि नें दो-टूक उत्तर दे भि दिया थां उसको,
मगर बाज नहि आया थां, पिछले महीने वोँ गय़ा हुआ थां कहीं बाहर्,
अबआया थां, औऱ आते हि, नज़रें लड़ाने कि कोशिश किया करता थां सुरभि सें!
कोईचार बजे, जब सुरभि चलीघऱ केँ लिए,
तोँ बाहर्, एक् चौराहा पार करतेहुए, पारुल औऱ कामना तौ चली गयीं थि अपने पी.जी। मे,
वे वहीँ, पास मे हि रहा करतीथीं, औऱ सुरभि कों आनां थां वापिस घऱ अपने, नॉएडा,
वोँ मार्ग केँ बाएंचल रही थि, कि वाहन कां हॉर्न बजा!
सुरभि नें पीछे देखा, यह यश थां!
कार बराबर कि उसने उसके, सुरभि चलती हि रही,
"आँ जा सुरभि, वहीँ तक छोड़ दूंगा!" बोला वोँ,
सुरभि कुछ नं बोलीं! चलतीरही!
औऱ वोँ भि चलतारहा, धीरे-धीरे धीरे-धीरे!
"गलतमत समझो! आँ जाओ, बैठो!" बोलाअब अदब सें!
न् सुना सुरभि नें, अपनीराह चली,
"अरे पीछेबैठ जाओ? हम् ड्राइवर हि सही आपके!" बोलि वोँ,
सुरभि नें गुस्से सें देखाउसे!
औऱ जैसे हि देखा,
वाहन केँ बोनट सें, निकला धुँआ!
गाढ़ा, सफेदरंग कां! यश उतरा, औऱ जैसे हि बोनट उठाया,
वैसे हि आगलगी गई,, वायरिंग मे आगलगी थि!
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सुरभि नें ध्यान न् दिया! औऱ अपनीराह, चलतीचली गयीँ, !
न् देखा पीछे मुड़कर! पकड़ी सवारी, औऱ हुईँ सवार!
पहुंची घऱ, हाथ-मुंह धोये, कपड़े बदले, औऱ लेट गई, !
लेटी, तौ आँखलगी!
औऱ जबआँख लगी,
तोँ कुछ दिखाई दियाउसे,
सपना थां वोँ! मगर सपनाऐसा, कि सोते सोते भि होंठों पर्र, मुस्कुराहट आँ गयीँ, !
ख्वाब मे देखा,
एक् उपवन हैं!
बहोत बड़ा!
बड़े बड़े पेड़ हें उधर!
चीड़ केँ पेड़, ऐसे लगें जैसे पेड़ों केँ तनों पर्र,
झोंपड़ियां रख दि गयीँ, हों!
पास मे हि एक् झरनाबह रहा थां!
नीलाजल थां उसका,
सूरज केँ किरणें, जब टकरातीं,
तौ इन्द्रधनुष सां बन जाता थां!
नीचे, जहां झरना गिरता थां,
वहांऐसा साफ़ पानी थां कि,
नीचे कां तल, साफ़ दीखता थां!
वहां सफेद सफेद पक्षी भि थें,
औऱ उनका मधुर हंगामा भि थां!
पास मे हि, वैसे हि ठीकउन फूलों जैसे हि, नीलेफूल वोँ,
कि झाड़ियाँ लगीथीं! फूल खिले थें सब मे,
गुच्छे बने थें फूलों केँ!
बर्रे आदि, सभी रसास्वादन कररह थें उनका!
गंध फैली थि वहा!
घास, तोतईरंग कि थि, मखमली, रसीले!
उसने सफेद कपडे पहने थें!
शफ़्फ़ाफ़ सफेदरंग थां, धूप जैसे औऱ निखार देती थि उन्हें!
वोँ स्थान, स्वर्ग कां सां कोना लगती थि!
दूर पहाड़ियों पर्र,
बर्फजमी थि, सफेदरुई केँ समानचमक रही थि वोँ!
जैसे, बादल नीचेउतर कर, उनकी चोटियों पर्र, विश्राम कररहे हों!
तभी, एक् तितली आकर बैठी उसके घुटने पऱ,
उस तितली कां रंग, जामुनी, हरा औऱ पीला थां!
ऐसी तितली, कभी न् देखी थि उसने!
वोँ तितली उडी,
औऱ एक् पीलेरंग केँ फूल पऱ बैठ गई, !
सुरभि खड़ी हुइ,
औऱ चलीआगे,
आगे गई, तौ देखा,
फलदार वृक्ष लगे हें,
आलूबुखारे अपनाचटक रंग बिखेर रहे थें!
खुरमैनी लगीथीं!
हवा केँ साथ, अपनीडाल सहित,
हिलती जारही थीं!
बड़े बड़े कंधारी अनारलगे थें!
अनार केँ पेड़, लदे थें उनसे!
बड़े बड़े घंटी कि आकार केँ, लाल-पीले फूललगे थें उन पर्र!
थोडा औऱ आगेचली वोँ!
सामने, खिन्नी केँ पेड़ देखे!
पीली-पीली खिन्नियाँ लगीथीं उन पऱ!
हाव चलती,
तौ खिन्नियों कि मनमोहक ख़ुश्बू,
नथुनों मे समा जाती!
बड़े बड़े सुल्तानी गुलाब लगे थें!
हवा केँ साथ, जैसेहिल, उसी कों सलामबजा रहे थें!
नरगिस केँ फूलों केँ पौधों कि,
दूरतलक, कतारचली गयीँ, थि!
उसके होंठों पऱ, मुस्कान तैर गई, !
वोँ मुस्कान, सोती हुई सुरभि केँ होंठों पऱ भि थि!
वोँ औऱ आगेचली!
एक् स्थान,
बड़ा सां साथ-ए-मरमर कां पत्थर पड़ा थां,
उसनेटेक लीउस सें, औऱ खड़ी हौ गई, !
हज़ारी गेंदों केँ फॉलो कि गंधउठी!
उसने पीछे देखा,
हर स्थान लगेहुए थें वोँ!
हर स्थान, पूरी ज़मीन हि पीली हुइ पड़ी थि उनसे!
उसनेफिन सें टेक लें ली,
आँखें बंद हौ गयीं उसकी!
औऱ तभी,
उसकेगाल सें कुछ टकराया,
उसने आँखें खोली अपनी!
औऱ छुआगाल,
एक् पत्ता थां, छोटा थां!
चटकहरे रंग कां!
बीच मे, एक् रेखा थि उस पत्ते केँ,
सफेदरंग कि! यह लफ़ीश कां पत्ता थां!
पूरा पेड़ऐसा लगता हैं कि जैसे,
जन्नत सें उखाड़ कर यहां लगाया गय़ा हौ!
कश्मीर मे, मुग़लों केँ बागों मे,
यह पेड़ लगवाये गए थें वहां!वे बहोत प्रकृति-प्रेमी थें!
हिन्दुस्तान मे, अनार, अनानास, तरबूज, खरबूजा,
आड़ू, लीची, अमरुद आदिफल, वे हि लाये थें,
इनका श्रेय, उन्हीं कों जाता हैं,
कश्मीर कां सेब, वही लाये थें हिन्दुस्तान मे,
बाबर, ऐसे हज़ारों पौधे औऱ पेड़ों केँ बीज लाया थां!
तौ लफ़ीश कां पत्ता थां वोँ!
वोँ चलीआगे,
एक् स्थान,
अंगूर कि बेलें लगीथीं!
मोटे मोटे,
काले औऱ हरे अंगूर!
उसने, एक् काला अंगूर तोड़ा,
औऱ खायाउसे, ऐसा मीठा,
केँ आँखें बंद हौ गयीं उसकी!
इतने मे हि आँख खुली उसकी!
उसने कितना प्रेम सपना देखा थां!
उठी, कपड़े सही किये,
तोँ दांत मे कुछ फंसा सां लगा,
उसने निकाला, तोँ यह काले अंगूर कां छोटा सां छिलका थां!
मुंह मे, अभि भि स्वाद बाकी थां, उस मीठे अंगूर कां!
उसने पानी पिया, तरज़ीह न् दि इस ख्याल कों, औऱ लग गई, अपने दूसरे कामों मे,
सुरभि और जिन्न फ़ैज़ान का इश्क़ completee - सुरभि - Aage kya hua? Next part padhiye
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