Albela - Complete Kahani Part 1
bhay ye story juldi shuru hongi.pehli story k khatam hote hi ya usse pahle.so wait nd watch.are yar ye me devil bhay kee tarf say bhol Raha ho wait nd wacht
thora time lgega meri ek kahani already running mai h woh complete hote he isko suru kroga Baki rhe gltiyo kee bat insaan khud glti kaa putla h aur glti krna insaan kaa param dhram h
bhay link ptaa nahii kaise send karte h lekin. kahani name woh ALBELA SA writer name SOANK h baki ap dhundh lena forum pr mil jayegi
bhay es forum mai yesi bhut si kahani h joo esi sit kee kahani same name say copy paste hai ap kee kahani kaa title albela h too kisi ko koy problem nahee hoga
thora aur waqt dedo bhay kal say office k Kam kaa kaffi pressure aagya h mere pe waqt km say paa Raha hu ab kal sham say
तुम् जुआरी बड़े हि माहिर हौ, एक् दिल कां पत्ता फेककर जिदंगी खरीद लेते होँ……!!!🩵 Will wait for the first update
Jldi start karo bhay Bs character ko chutiya nahee dikhana or iss kahani mai har update main galtiyan hi galtiyan haen galtiyon usko sudhar krr likhna
Apni running kahani ko END krne wala hu phir ise suru krdoga Bat yeh h me दो कश्ति पे सवार नहीं हौ सकता हूं
Eta do kasti kee baat nahee h suruwaat kaa meter too purani say mil hi jayega bus thodi edit krr k ek do update post krr de.
Ji bhay yhe hu Bs out of city aaya huwa hu abhi 4 din say kam k karan tbi waqt ni mil paa rah h update tyaar krne kaa SORRY bhay
Such bolo me bi waiting hu jldi start krne mai Mind khe aur divert na hu bs islye first kahani ko END krne k bad isko start krne kaa decide kiya h
Albela – New Episode
UPDATE 1
तेज हवाऐं चलरही थि। शायद तूफ़ान थां क्यूंकि ऐसालग रहा थां मानो अभि इन हवाओं केँ झोके बड़े-बड़े पेंड़ों कों उख़ाड़ फेकेगा। बरसात भि इतनी तेजी सें होँ रही थि कि मानो पूरा संसार नां डूबादे। बादल कि गरजऐसी थि कि उसे सुनकर लोग अपने-अपने घरों मे दुबककर बैठे थें।
जहां एक् तरफइस तूफानी औऱ डरावनी रात मे लोग अपने घरों मे बैठे थें। वहीं दूसरी तरफ एक् लड़का, इस तूफान सें लड़तेहुए आगे भागते हुएचले जारहा थां
वोँ लड़का इसगति सें आगेबढ़ रहा थां, मानोउसे इस तूफान सें कोईडर हि नहीं। तेज़ चलरही हवाऐं उसे रोकने कि बेइंतहा कोशिश करती। वोँ लड़का बार-बार ज़मीन पर्र गीरता मगरफीर खड़े हौ कर तूफान सें लड़तेहुए आगे कि तरफबढ़ चलता।
ऐसे हि तूफान सें लड़कर वोँ एक् बड़े बरगद केँ पेंड़ केँ नीचेआकर खड़ा हौ गय़ा। वोँ पूरीतरह सें भीग चूका थां। तेज तूफान कि वज़ह सें वोँ ठीक सें खड़ा भि नहीं हौ पारहा थां। शायद बहोत थक गय़ा थां। वोँ एक् दफ़ा पीछेमुड़ कर गाँव कि तरफ देखा। उसकी आंखेनम हौ गयीँ,, शायद आंशू भि छलके होंगे मगर बारीश कि बूंदे उसके आशूं केँ बूंदो मे मीलरहे थें। वोँ लड़का कुछदेर तक काली अंधेरी रात मे गाँव कि तरफ देखता रहा, उसे दूर एक् कमरे मे हल्का उज़ालदीख रहा थां। उसे हि देखते हुए वोँ बोला.
"मे जारहा हूं मम्मी!!"
औऱ यह बोलकर वोँ लड़का अपने हांथ सें आंशू पोछते हुए वापस पलटते हुए गाँव केँ अंतिम छोर केँ सड़क पर्र अपनेकदम बढ़ा दीये.
तूफान शांत होनेलगी थि। बरसात भि अब रीमझीम सि होँ गयीँ, थि, पर्र वोँ लड़का अभि भि उसीगति सें उस कच्ची सड़क पर्र आगेबढ़ा जारहा थां। तभीउस लड़के कि कान मे तेज आवाज़पड़ी.
पलटकर देखा तौ उसकी आँखें चौंधिंया गई,। क्यूंकि एक् तेज प्रकाश उसके चेहरे पऱ पड़ी थि। उसने अपना हांथ उठाते हुए अपने चेहरे केँ सामने कीया औऱ उस प्रकाश कों अपनी आँखों पऱ पड़ने सें रोका। वोँ आवाज़ सुनकर यहसमझ गय़ा थां कि यह ट्रेन कि हॉर्न कि आवाज़ हैं। कुछदेर बादजब ट्रेन कां इंजनउसे क्रॉस करतेहुए आगे नीकला, तोँ उस लड़के नें अपना हांथ अपनी आँखों केँ सामने सें हटाया। उसके सामने ट्रेन केँ डीब्बे थें, शायद ट्रेन सीग्नल नां होने कि वजह सें रुक गयीँ, थि।
उसने देखा ट्रेन केँ डीब्बे केँ अंदर लाइटजल रहीथीं॥ वोँ कुछ सोंचते हुएउस ट्रेन कों देखते रहा। तभी ट्रेन नें हॉर्न मारा। शायदअब ट्रेन सिग्नल देरही थि कि, ट्रेन चलने वाली हैं। ट्रेन जैसे हि अपने पहीये कों चलायी, वोँ लड़का भि अपनापेर चलाया, औऱ भागते हुए ट्रेन पऱ चढ़ जाता हैं। औऱ चलती ट्रेन केँ गेट पर्र खड़ा होकर एक् बारफीर सें वोँ उसी गाँव कि तरफ देखने लगता हैं। औऱ एक् बारफीर उसकी आँखों केँ सामने वहीरूम दीखता हैं जीसमे सें हल्का उज़ाला थां। औऱ देखते हि देखते ट्रेन नें रफ्तार बढ़ाई औऱ हल्के उज़ाले वालारूम भि उसकी आँखों सें ओझल हौ गय़ा.
कमरे मे हल्की रौशनी थि, एक् लैम्प जलरहा थां। बीस्तर पर्र दो ज़ीस्म एक् दुसरे मे समाने कि कोशिश मे जुटे थें। मादरजात नग्न अवस्था मे दोनोउस बीस्तर पऱ गुत्थम-गुत्थी हुएकाम क्रीडा मे लीन थें। कमरे मे फैली उज़ाले कि हल्की रौशनी मे भि उस स्त्री कां शरीर चांद कि तरहचमक रहा थां। उसकेउपर लेटा वोँ सख्शउस महिला केँ ठोस उरोज़ो कों अपने हांथों मे पकड़कर बारी बारी सें चुसते हुए अपनीकमर केँ झटकेदे रहा थां।
उस महिला कि सीसकारी पूरे कमरे मे गूंजरही थि। वोँ स्त्री अब अपनी गोरी टांगे उठाते हुएउस सख्श केँ कमर केँ इर्द-गीर्द रखतेहुए शिकंजे मे कस लेती हैं। औऱ एक् जोर कि चींख केँ संग वोँ उस सख्श कों बहुत तेजी सें अपनी आगोश मे जकड़ लेती हैं औऱ वोँ सख्श भि चींघाड़ते हुए अपनीकमर उठाकर ज़ोर-ज़ोर केँ तीन सें चार झटके मारता हैं। औऱ हांफते हुएउस महिला केँ उपर हि नीढ़ाल होँ करगीर जाता हैं।
"बस होँ गय़ा तेरा
अब जा अपने कमरे मे। आज जौ हुआ मे नहीं चाहती कि कीसी कों कुछपता चले। "
उस महिला कि बात सुनकर वोँ सख्श मुस्कुराते हुए उसके गुलाबी होठों कों चूमते हुए, उसकेउपर सें उठ जाता हैं औऱ अपने कपड़ेपहन कर जैसे हि जाने कों होता हैं। वोँ बला कि खुबसूरत महिला एक् बारफीर बोलीं--
"जराछुप कर जानां, औऱ ध्यान सें गलती सें भि अभय केँ कमरे कि तरफ सें मत जानां समझे। "
उस स्त्री कि बात सुनकर, वोँ सख्श एक् बारफीर मुस्कुराते हुए बोला--
"वोँ अभि बच्चा हैं भाभी, देख भि लीया तोँ क्याँ करेगा? औऱ वैसे भि वोँ तुमसे इतना डरता हैं, कि कीसी सें कुछ बोलने कि हीम्मत भि नहीं करेगा। "
उस सख्श कि आवाज़ सुनकर, वोँ स्त्री बेड पर्र उठकरबैठ जाती हैं औऱ अपनी अंगीयां (ब्रा) कों पहनते हुए बोलि.
"नाँ जाने क्यूं.आज बहोत अज़ीब सि बेचैनी हौ रही हैं मुझे। मैनेअभय केँ सांथ बहोत गलत कीया। "
"यह सभी छोड़ो भाभी, अब तूम सोजाओ। "
कहतेहुए वोँ सख्शउस कमरे सें बाहर् नीकल जाता हैं। वोँ स्त्री अभि भि बीस्तर पर्र ब्रा पहने बैठी थि। औऱ कुछ सोंचरही थि, तभी उसके कानो मे ट्रेन कि हॉर्न सुनायी पड़ती हैं। वोँ महिला भागते हुए कमरे कि उस खीड़की पर्र पहुंच कर बाहर् झाकती हैं। उसेदूर गाँव कि आखिरछोर पर्र ट्रेन केँ डीब्बे मे जलरही लाईटें दीखी, जैसे हि ट्रेन आहिस्ता चली। मानोउस स्त्री कि धड़कने भि धिरे-धिरे बढ़नेलगी.
***********
ट्रेन केँ गेट पऱ बैठा वोँ लड़का, एक् टक बाहर् कि तरफ देखेजा रहा थां। आँखों सें छलकते आशूं उसके दर्द कों बयांकर रहे थें। कहां जारहा थां वोँ? कीसलिए जारहा थां वोँ? कुछ नहींपता थां उसे। अपने चेहरे पऱ उदासी कां चादरओढ़े कीसी बेज़ान पत्थर कि तरह वोँ ट्रेन कि गेट पऱ गुमसुम सां बैठा थां। उसके अगल-बगल कुछलोग भि बैठे थें। जोँ उसकेगले मे लटकरही सोने कि महंगी सुकून कों देखरहे थें। उनकी नज़रों मे लालचसाफ दीखरही थि। औऱ शायदउस लड़के कां सोने कां इंतज़ार कररहे थें। ताकी वोँ अपना हांथसाफ करसके।
पर्र अंदर सें टूटा वोँ परीदां जीसका आज आशियाना भि उज़ड़ गय़ा थां। उसकी आँखों सें नींद कोषोदूर थां। शायद सोंचरहा थां कि, अपना आशियाना कहां बनाये???
*********
अगली सुभह
सुभह-सुभह संध्या उठतेहुए हवेली केँ बाहर् आकर कुर्सी पऱ बैठ गयीँ,। उसकेबगल मे रमन सिंह औऱ ललिता भि बैठी थि। तभी वहां एक् ३0साल कि सांवली सि महिला अपने हांथ मे एक् ट्रे लेकरआती हैं, औऱ सामने टेबल पर्र रखतेहुए सबकोगरम चाय देकरचली जाती हैं।
संध्या गरमचाय कि चुस्की लेतेहुए बोलीं.
संध्या -- "तुम्हे पता हैं नां रमन, आज अभय कां बर्थडे हैं। मे चाहती हूं कि, आजयह हवेली दुल्हन कि तरहसजे,, सभी कों पता चलना चाहिए कि आज छोटे ठाकुर कां बर्थडे हैं। "
रमन भि गरमचाय कि चुस्कीया लेतेहुए बोला.
रमन –(कुटिल मुस्कान केँ संग) तुम् चिंता मतकरो भाभीआज कां दिन पूरा देहात याद रहेगा
रमन अभि बोल हि रहा थां कि, तभी वहां मालती आँ गयीँ,
मालती -- "दिदी, अभय कों देखा क्याँ तुमने?"
संध्या – सोरहा होगा वोँ मालती अब इतनी सुभह सुभहकहा उठता हैं वोँ ?
मालती – वोँ अपने मे तोँ नहि हैं, मे देखकर आँ रही हूं ! मुझेलगा कल कि मार कि वजह सें डर केँ मारेआज जल्दउठ गय़ा होगा
मालती कि बात सुनते हि, संध्या गुस्से सें लालगए औऱ एक् झटके मे कुर्सी पर्र सें उठतेहुए गुस्से मे चिल्लाते हुए बोलीं…
संध्या – बेटा हैं मेरा वोँ कोई दुश्मन नहीं जोँ मे उसेडरा धमका केँ रखूगी हा होँ गईंकल मुझसे गलती गुस्से मे मारा थोडा बहोत तोँ क्याँ होगया ?
संध्या कों इसतरह चिल्लाते देख मालती शीतलता सें बोलि…
मालती – अपने आप् कों झूठी दिलासा क्यूं देरहे हौ दिदी ? मुझे नहीं लगता कि कल आपनेअभय कों थोडा बहोत मारा थां औऱ वोँ पहलीबार भि नहीं थां
अब तौ संध्या जलभुन करराख सि होँ गई क्योंकि मालती कि सचबात उसे तीखी मिर्ची कि तरहलगी याँ उसे स्वयं कि हुई गलती कां एहसास थां
संध्या –( गुस्से मे) तुँ कहना क्याँ चाहती हैं मै…मेभला उससे क्यूं नफरत करूगी मेरा बेटा हैं वोँ औऱ तेरी लगता हैं कि मुझे उसकी फिक्र नहि हैं केवल तुम्हारी तरफ हैं क्याँ
मालती –(संध्या कि बातसुन गुस्से मे बोलीं) मुझे क्याँ पता दिदी ? अभय तुम्हारा बेटा हैं मारो चाहे काटो मुझे उससे क्याँ मुझे वोँ अपने कमरे मे नहीं दिखा तोँ पूछने चलीआई यहा पे
कहतेहुए मालती वहां सें चली जाती हैं। संध्या अपनासर पकड़कर वही चेयर पर्र बैठ जाती हैं। संध्या कों इस हालत मे देखरमन संध्या केँ कंधे पर्र हांथ रखतेहुए बोला.
रमन – क्याँ भाभी आप् भि छोटी छोटीबात कों दिल मे…
रमन अपनीबात पूरी नहि कर पाया थां कि संध्या बीचमो बोलीं
संध्या – रमन तुम् जाओ यहां सें मुझेकुछ टाइम केँ लिए अकेला छोड़दो
संध्या कि गुस्से सें भरी आवाज़ सुनके रमन कों लगा अभि यहां सें जानां ठीक रहेगा
रमन –(हवेली सें बाहर् मेनगेट पे आते हि पीछेपलट केँ संध्या कों देख केँ बोला)बस कुछ वक़्त औऱ फिन तूँ मेरीबन जाएगी
इसतरफ
संध्या अपनेसर पे हाथरख केँ बैठी गहरीसोच मे डूबी हुइ थि कि तभीदो हाथ संध्या कि आखों पे पड़े उसकी आंखेबंद हौ गई अपनी आखों पे किसी केँ हाथ कों महसूस कर संध्या केँ होठों पे मुस्कान आग्यी
संध्या –(गहरी मुस्कान केँ संग) नाराज हैं तुँ अपनी मम्मी सें बस एक् बारमाफ करदे तेरीशपथ खाती होँ अब सें मे ऐसाकुछ नहीं करोगी जिससे तेरी तकलीफ हौ मेरे बच्चे
संध्या कि बात सुनते हि अमनजोर सें हंसने लगा औऱ अपनाहाथ हटाते हि संध्या केँ सामने जा केँ खड़ा होगया
संध्या नें अपने सामने अमन कों पाया क्यूं कि उसेलगा यह उसका बेटा अभय हैं मगरए0ने सामने अमन कों देख संध्या कि हसी गायब होँ गई
अमन –(हस्ते हुए)अरे ताई माँ आपको क्याँ लगा मे अभय हूं
संध्या –(झूठी मुस्कान केँ संग) बदमाश कही कां मुझेसच मे लगा मेरा बेटा अभय हैं
अमन –आपको लगता हैं अभयऐसा भि कर सकता हैं अगर वोँ ऐसा करता तोँ अभि तक उसकोदो थप्पड़ खा चुका होता(बोल केँ जोरजोर सें हंसने लगा)
अमन कि ऐसीबात सुन संध्या केँ मन मे क्रोध आनेलगा मगरतभी अमनकुछ ऐसा बोला
अमन –(हस्ते हुए) एक् बात बताऊं आपको बेचारा अभयकल साम आपकेहाथ कि मार खाने केँ बाद मैनेरात कों अभय कों हवेली सें भागते हुए देखा थां वोँ ऐसा भागा कि वापस हि नहीं लौटा
अब चौंकने कि बारी संध्या कि थि, अमन कि बात सुनते हि उसके हांथ-पैर मे कंपकपी उठनेलगी। वैसे तोँ धड़कने बढ़ने लगती हैं, मगर संध्या कि मानो धड़कने थमनेलगी थि। सुर्ख हौ चली आवाज़ औऱ चेहरे पऱ घबराहट केँ लक्षण लीएबोल पड़ी.
संध्या –(घभराते हुए)क क्याँ मतलब हैं तेराअ अभयभाग गय़ा हवेली सें
अमन–हा कलरात मे मैनेअभय कों हवेली सें भागते हुए देखा थां मुझेलगा आजाएगा अपने आप् औऱ देररात मे पानी पीनेउठा थां तब देखाअभय कां रूम खुला पड़ा हैं अंडर देखा खाली थां रूमकोई नहीं थां वहा पे
संध्या झट सें चेयर पर्र सें उठखड़ी हुईँ, औऱ हवेली केँ अंदर भागी।
संध्या –(डरतेहुए चिल्लाने लगी) अभय…अभय…अभय…अभय…अभय
पागलो कि तरह संध्या चीखती-चील्लाती अभय केँ कमरे कि तरफबढ़ी। संध्या कि चील्लाहट सुनकर, मालती, ललीता, नीधि औऱ हवेली केँ नौकर-चाकर भि वहां पहुंच गये। सबने देखा कि संध्या पगला सि गयीँ, हैं। सभी हैरान थें, कि आखिर क्याँ हुआ? ललिता नें संध्या कों संभालते हुए पूछा
ललिता – क्याँ हुआ दिदी आप् इस्त्रह चिल्ला क्यूं रहे होँ
संध्या –(रोतेहुए) मेराअभय कहा हैं
मालती –(यहबात सुन केँ गुस्से मे चिल्ला केँ) यहीबात तोँ मे भि पूछने आई थि दिदी क्योंकि अभय सुभह सें नहींदिख रहा हैं मुझे
अब संध्या कि हालत कों लकवामार गय़ा थां। थूकगले केँ अंदर हि नहींजा रहा थां। आँखें हैरत सें फैली, चेहरे पऱ बीना कीसीभाव केँ बेजान नीर्जीव वस्तु कि तरह वोँ धड़ाम सें नीचे फर्श पऱ बैठ गयीँ,। संध्या कि हालत पऱ सभी केँ रंगउड़ गये। ललिता औऱ मालती संध्या कों संभालने लगी।
ललिता –(संध्या कों संभालते हुए) दिदी घबराओ मतयेकही होगा अभि आजाएगा अभय
सब कि बातसुन संध्या जैसे जिंदा लाश कि तरहबन गई थि
संध्या –(सदमे मे) चला गय़ा मुझे छोड़ केँ चला गय़ा मेराअभय
इतनाबोल संध्या वही जमीन मे गिर केँ बेहोश होगई
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तोँ कैसालगा आप् सबकोयह भाग
बताएगा जरूरकथा मे बहुतकुछ एडिटकर रहा हूं मे थोडा वक्तलग रहा हैं मैयहबात मानता होँ
बस मेरी कोशिश यही हैं कि गलती सें भि कोई गलती नाँ हौ
कथा कों मे देवनागरी मे जरूरलिख रहा हूं मगर मेरेलिए आसान नहि हैं आप् सभी सें प्राथना करूंगा कोई गलती होँ शब्दो मे तोँ बता जरूर देना
बससंग बनेरहे जैसे मैने अपने दोनो कहानियों कों मंजिल तक लें आयाइसे भि इसकी मंजिल तक लें आऊंगा
शुक्रिया
Vro mast dhamakedar update yeh ajj tak rahasya haan kee Sandhya raman say kyon chudwa rahi thi aur apne bete say itna kharab bartav kyon krti thi kher Let's thaa journey begins
Congratulations for new thread n thanks for start this kahani isse bhut.jyada judav h or iska adhurapan kaafi mann ko dukhata thaa , ab agar ap ise poora krr paye too bhut hi achaa lagega
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बढ़िया, सारी गलतियां एक् लाइन मे साफकर दि भइया। औऱ देवनागरी मे हि लिखो,अब बहोत कम कहानियां बची हें देवनागरी मे पढ़ने लायकइधर
Koshish yhe meri h kee glti say bhi glti na hu kahani mai bas sath banay rakho ap haan agar aapko khe aur kuch glti ptaa hu too bata skte hu madad hongi meri Thank you bhay
Rekha ji ab too aapne ek hi baat use 3 baar batati h too pakka baat h woh ise pura hi likhega jb tak iski saansh chl rahi h Kyu DEVIL MAXIMUM Jabaab do devi ji ko.
haan janta hu btaya thaa aapne yad h muze bs islye mention kiya mene humare joo bat hue iske bare mai usme koy glti ni ker rah hu me islye mention kiya mene ap teeno ko
Na bhay dhanywaad kee jroort ni h Agar Dena he h too Raj_sharma bhay ko thank you bolo ap unhone he muze iss kahani k lye sujaav dia aur unke support say me ise likh raha hu
Raj_sharma , SEANIOUR Black , Guru Ashwathama ji , Rekha rani ji , Shetan Devi ji , paand , Rahul Chauhan , Aakash. bhay , DesiPriyaRai , komaalrani ji , Rajizexy ji , Laila Ali Khan , Shekhu69 , dev61901 , Iron mann , Yasasvi3 , Ghost Rider ❣️ , Mass , park , parkas , Riky007 , motaalund , maakaloda , Raja thakur , ram11 , Lord xingbie , Carry0
Albela – New Episode
UPDATE 2
गाँव केँ बीचो-बीच खड़ी आलीशान हवेली मे अफरा-तफरा मची थि। पुलिस कि ज़िपआकर खड़ी थि। हवेली केँ बैठके(हॉल) मे। संध्या सिंहजोर सें चींखती चील्लाती हुईँ बोलि
संध्या --"मुझे मेरा बेटा चाहिए.! चाहे पूरी दुनीया भर मे हि क्यूं नाँ ढ़ूढ़ना पड़ जाये तुम् लोग कों? जीतना रुपया चाहिए लें जाओ.!! पर्र मेरे बच्चे कों ढूंढ लाओ.मेरे बच्चे कों ढूंढ लाओ.मेरे बच्चे
कहतेहुए संध्या जोर-शोर सें रोनेलगी। सुभह सें दोपहर हौ गयीँ, थि, पर्र संध्या कि चींखे रुकने कां नाम हि नहीं लेँ रही थि। गाँव केँ लोग भि यहखबर सुनकर चौंके हुए थें। औऱ चारो दिशाओं मे अभय केँ खोज़खबर मे लगे थें। ललिता औऱ मालति कों, संध्या कों संभाल पाना मुश्किल होँ रहा थां। संध्या कों रह-रहकर सदमे आँ रहे थें। कभी वोँ इसकदर शांत हौ जाती मानो जिंदा लाश होँ, पऱ फीर अचानक इसतरह चींखते औऱ चील्लाते हुए सामन कों तोड़ने फोड़ने लगती मानो जैसे पागल सि हौ गई, हौ।
रह-रहकर सदमे आनां, संध्या कां पछतावा थां संग अपने बेटे सें बीछड़ने कां गम भि, अभय नें आखिरघऱ क्यूं छोड़ा? अपनी मां कां आंचल क्यूं छोड़ा?इस बात कां जवाब मात्र अभय केँ पास थां। जौ इस आलीशान हवेली कों लातमार केँ चला गय़ा थां, कीसी अनजान डगर पऱ, बीना कीसी मक्सद केँ औऱ बीना कीसी मंज़ील केँ।
(कहते हें बड़ो कि डाट-फटकार बच्चो कि भलाई केँ लिए होता हैं। शायद होँ भि सकता हैं, मगर जौ प्रेम कर सकता हैं। वोँ डाट-फटकार नहीं। प्रेम सें रिश्ते बनाता हैं। डाट-फटकार सें रिश्ते बीछड़ते हैं, जैसेआज एक् बेटा अपनी मम्मी सें औऱ मम्मी अपने बेटे सें बीछड़गए। रीश्तो मे प्रेम कलम मे भरी वोँ स्याही हैं, जब तक रहेगी कीताब केँ पन्नो पर्र लीखेगी। स्याही ख़त्म तौ पन्ने कोरेरह जायेगें। उसीतरह रीश्तो मे प्रेम समाप्त, तौ कीताब केँ पन्नो कि तरह ज़िंदगी केँ पन्ने भि कोरे हि रह जाते हें। )
हवेली कि दीवारों मे अभि भि संध्या कि चींखे गूंजरही थि कि तभी, एक् व्यक्ति भागते हुए हवेली केँ अंदरआया औऱ जोर सें चील्लाया
ठाकुर साहब ठाकुर साहब
आवाज़ काभी भारी-भरकम थि, इसलिये हवेली मे मौजूद सब लोगों कां ध्यान उसतरफ केंद्रीत करली थि। सबसे पहलीनज़र उस इंसान पर्र ठाकुर रमन कि पड़ी। रमन नें देखा वोँ व्यक्ति बहुत तेजी सें हांफरहा थां, चेहरे पर्र घबराहट केँ लक्षणं औऱ पसीने मे तार-तार थां।
रमन --"क्याँ हुआरे दीनू? क्यूं गलाफाड़ रहा हैं?"
दीनू --(अपने गमझे सें माथे केँ पसीनो कों पोछते हुए घबराहट भरी लहज़े मे बोला) मालीक.वोँ, वोँ गाँव केँ बाहर् वाले जंगल मे। ए.एक् ब.बच्चे कि ल.लाश मीली हैं।
रमन --(एक् नजर संध्या कों देखते हुए बोला) ल.लाश क.कैसी लाश?"
उस व्यक्ति कि आवाज़ नें, संध्या केँ अंदर जिस्म केँ अंदरुनी हिस्सो मे खून कां प्रवाह हि रोक दीया थां मानो। संध्या अपनी आँखे फाड़ेउस व्यक्ति कों हि देखरही थि.
दीनू --"वोँ.वोँ मालिक, आप् स्वयं हि देख लें। ब.बाहर् हि हैं।
दीनू कां इतना कहना थां कि, रमन, ललिता, मालती सभीलोग भागते हुए हवेली केँ बाहर् कि तरफबढ़े। अगरकोई वहीखड़ा थां तोँ वोँ थि संध्या। अपनी हथेली कों महलते हुए, नां जाने चेहरे पर्र कीस प्रकार केँ भाव अर्जीत कीये थि, शारिरीक रवैया भि अजीबो-गरीब थि उसकी। कीसी पागल कि भाती शारीरीक प्रक्रीया कररही थि। शायद वोँ उसबात सें डररही थि, जौ इस वक़्त उसके दीमाग मे चलरहा थां।
शायद संध्या कों उसबात कि मंजूरी भि मील गयीँ,, जब उसने बाहर् रोने-धोने कि आवाज़ सुनी। संध्या बर्दाश्त नाँ करसकी औऱ अचेत अवस्था मे फर्श पऱ धड़ाम सें नीचेगीर पड़ती हैं
जब संध्या कि आंख खुलती हैं तोँ, वोँ अपने आप् कों, स्वयं केँ खाट पऱ पाती हें। आंखों केँ सामने मालती, ललिता, निधी औऱ देहात कि तीन सें चार औरतें खड़ी थि।
नहीं.ऐसा नहि होँ सकता, वोँ मुझे अकेला छोड़कर नहींजा सकता। कहां हैं वोँ?? अभय। अभय.अभय
पगलो कि तरह चिल्लाते हुए संध्या अपने कमरे सें बाहर् निकलकर जलबिन मछ्ली केँ जैसे तड़पने लगती हैं। संध्या केँ पीछे पीछे मालती, ललिता औऱ निधी रोतेहुए भागती हैं
हवेली केँ बाहर् अभि भि देहात वालों कि भीड़लगी थि, मगर जैसे हि संध्या कि चीखने औऱ चिल्लाने कि आवाजें उनसभी केँ कानों मे गूंजती हैं, सभीउठ कर खड़े हौ जाते हैं।
संध्या जैसे हि जोरजोर सें रोते - बिलखते हवेली सें बाहर् निकलती हैं, तब तक पीछे सें मालती उसे पकड़ लेती हैं।
संध्या --"छोड़ मुझे.!! मे कहती हूं छोड़दे मालती, देख वोँ जारहा हैं, मुझेउसे एक् बार रोकने दे। नहीं तोँ वोँ चला जायेगा।
संध्या कि मानसिक स्थिति हिल चुकी थि, औऱ इसका अंदाजा उसके रवैए सें हि लगरहा थां, वोँ मालती सें स्वयं कों छुड़ाने कां प्रयास करनेलगी कि तभी.
मालती – दिदी वोँ जा चुका हें। अब नहीं आयेगा, इस हवेली सें हि नहीं, बल्कि इस संसार सें भि दूरचला गय़ा हैं। "
मालती केँ शब्द संध्या केँ हलक सें निकलरही चिंखो कों घुटन मे कैदकर देती हैं। संध्या केँ हलक सें शब्द तौ क्याँ थूंक भि अंदर नहींगटक पारही थि। संध्या किसी मूर्ति कि तरह स्तब्ध बेजान एक् निर्जीव वस्तु कि तरह खड़ी, नीचे ज़मीन पऱ बैठीरो रही मालती कों एक् टक देखते रही। औऱ उसके मुंह सें शब्द निकले.
संध्या – वोँ मुझे अकेला छोड़ केँ नहींजा सकता
वोँ मुझे अकेला छोड़ केँ नहींजा सकता
ये बात बोलते बोलते संध्या हवेली केँ अंदर कि तरफकदम बढ़ा दि।
देहात केँ सबलोग संध्या कि हालत पर्र तरस खाने केँ अलावा औऱ कुछ नहींकर पा रहें थें।।
तुझको कां लगता हैं हरिया? कां सच मे ऊलाश छोटे ठाकुर कि थि??"
हवेली सें लौटरहे देहात केँ दोलोग रास्ते पर्र चलतेहुए एक् दूसरे सें बातकर रहे थें। उस व्यक्ति कि बात सुनकर हरिया बोला
ह्वरिया --" वैसेउस लड़के कां चेहरा पूरीतरह सें ख़राब होँ गय़ा थां, कुछकह पाना मुुश्किल हैं। मगर हवेली सें छोटे ठाकुर कां इसतरह सें गायब हौ जानां, इसीबात कां संकेत होँ सकता हैं कि जरूरयह लाश छोटे ठाकुर कि हैं। "
हरिया कि बात सुनकर संग मे चलरहा वोँ व्यक्ति बोल पड़ा.
मगरू--"ठीक कहरहा हैं तूँ हरिया, मे भि एक् बार किसीकाम सें हवेली गय़ा थां तोँ देखा कि ठकुराइन छोटे मालिक कों डंडे सें पीटरही थीं, औऱ वोँ ठाकुर रमन कां बच्चा अमनवा वहीं खड़ेहंस रहा थां। सच बताऊं तोँ इसतरह सें ठकुराइन पिटाई कर रहीं थि कि मेरादिल भरआया, मे तौ हैरान थां कि आखिर एक् माँ अपने बेटे कों ऐसे केसे जानवरों कि तरहपीट सकती हैं??"
हरिया --" चलो अच्छा हि हुआ, अब तौ सारी संपत्ति कां एक् अकेला मालिक वोँ अमनवा हि बन गय़ा। वैसे थां बहोत हि प्यारा लड़का, ठाकुर हौ कर भि देहात केँ सभी लोगों कों इज्जत देता थां।
दोनोलोग बाते करते करते अपनेघऱ कि तरफचल रहे थें तभी किसी स्त्री कों आवाज़ आई
स्त्री –(पैदल जातेउन दोनो आदमियों सें) मगरू भईया इतनीधूप मे कहा सें आँ रहे होँ
मगरू –(महिला कों देखते हुए) गीता देवी (सामने जाकेपेर छूता हैं) दिदी हवेली सें आँ रहे हैं हम् दोनो
गीता देवी –हवेली सें क्याँ हुआ भईयाकुछ पताचला अभय बाबू कां
तभी पीछे सें एक् व्यक्ति आया
व्यक्ति –(दोनो व्यक्ति कों देखते हुए)अरे हरिया, मगरू तुम् दोनो तौ हवेली गए थें भागते हुए क्याँ बात होगाई रे
मगरू–अब क्याँ बताए सत्या बाबूबात हि एसी हैं
सत्या बाबू–हुआ कां हैं बता तोँ
मगरू –जंगल मे लाश मिली हैं एक् बच्चे कि उसके कपड़े देख केँ समझआया अभय बाबू कि लाश हैं
गीता देवी औऱ सत्या –(मगरू कि बातसुन उनकी आंखे बड़ी होँ गई)
मगरू–(आगे बोला)लाश लेके हवेली पहुंचे तबवहा पे लाश वालीबात सुन केँ सभी कां रोना निकल गय़ा औऱ संध्या देवी जैसे पत्थर सि जम गई थि
गीता देवी–(आसू पोछते हुए) क्याँ सच मे वोँ अभय बाबू थें
मगरू – हा दिदी लाश नें अभय बाबू जैसे कपड़े पहनेहुए थें अच्छा दिदी चलता हूं अब
इतनाबोल केँ मगरूचला गय़ा
सत्या –(महिला कि आंख मे आसूदेख केँ) संभाल अपने आप् कों गीता जाने वाला तोँ चला गय़ा
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जारी रहेगी
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My favorite kahani Thanks DEVIL bhay kahani ko start karne k liye ap continue Rahna bro aur update daily basis pe dena ap bi kahin kahani mai mistake mat krna bhay
Thank you Rahul Chauhan bhay bhay try ker raha hu juldi waha tak aane kee kahani ko thora change ker raha hu islye waqt lag raha h thora
Okey brother no fear when you're here koy juldi nahee h apne ko bi, Aaram say aur apne ganit say chalte do kahani koBas yeh batao kee aj koy update aayega ya nahee???
bhay try ker raha hu update mai kuch edit ker k try karta hu hu ske shyad aj dedo update Agar edit ker ska shi say
bhay ap keh rhe hu fonts chote k lye baki her koy fonts bade k lye bolta h Koshish kerta hu normal size kaa update deke phir batana ap
N Nice bhay accha likh rahe hu tarika accha hain kahani pr focus zyada hain muze kahani wali chiz pasand hain na kee vahi sab joo yaha hotha hain
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