Hot stori घर का बिजनिस complete - Ghar Ka Biznes - Episode 1
घऱ कां बिजनिस --1
मेरेघऱ मे हम् 7 लोग रहते हें औऱ घऱ मे 4 रूम औऱ एक् बैठक केँ अलावा एक् हाल-रूम हैं जहाँ हम् लोग खानां खाते औऱ टेलीविज़न देखते हें। एक् रूम अम्मी औऱ पिताजी कां हैं, एक् पिताजी कि बेहन (यानी फूफी) कां हैं जोँ तलाक-शुदा हें। एक् मेरी बहनों कां रूम हैं औऱ एक् मेरारूम हैं जहाँअगर कोई गेस्ट आँ जाये तौ मुझेवहा सें फूफी (मतलब फूफी) केँ रूम मे याँ फिन बहनों केँ रूम मे शिफ्ट करना पड़ता हैं।
अब चलते हें स्टोरी कि तरफ:
सबसे पहले मे आप् लोगों सें अपना औऱ घऱ वालों कां परिचय करवादूँ। बाकी जौ लोग बाहर् केँ हें वक्त केँ संग हि उनका भि परिचय करवा दिया करूंगा।
पिताजी- अमितशाह; उम्र 45 साल; किराना कि दुकान हैं जहाँ सें बड़ी मुश्किल सें घऱ कां खर्चा निकल पाता हैं।
अम्मी- ऊषाशाह; उम्र 42 साल; एकदम स्लिम औऱ सेक्सी फीगर कि मालिक; घऱ कां साराकाम अम्मी औऱ फूफी हि संभालती हें।
फूफी- नीलमशाह; पिताजी कि छोटी बेहन; उम्र 31 साल; तलाकशुदा; बहुत स्लिम औऱ सेक्सी हें।
दिदी- अंजली शाह; उम्र 21 साल;रंग गोरा; पतला & स्मार्ट जिश्म कि मालिक; गाण्ड थोड़ी सि पीछे कों निकली हुईँ, जोँ कि दिदी कों औऱ भि सेक्सी बना देती हैं।
मे- आलोकशाह; उम्र 19 साल; कसरती जिश्म कां मालिक; एफ॰ए॰ सें आगे नहि पढ़ा औऱ अबदिन मे पिताजी केँ संग दुकान कों देखता हूं। औऱ जबकीयह कथा हैं तब तक बस एक् बार हि चूत ली थि मगर एक् आंटी कि।
पायल- उम्र लगभग 18 साल; सेक्सी जिश्म कि मालिक हैं औऱ हरसमय हँसती मुश्कुराती रहती हैं।
स्वीटी- उम्र लगभग 18 साल; चढ़ती जवानी; घऱभर कि लड़ली हैं क्योंकि सबसे छोटी हैं। \
तौ दोस्तों यह थां मेरा औऱ घऱ वालों कां परिचय। अब चलते हें किस्सा कि तरफ। यह स्टोरी औऱ उम्र जोँ मैंने लिखी हैं आज सें 3 साल पहले कि हैं।
जब सें मैंने पिताजी केँ संग दुकान पे जानां शुरुआत किया थां, तब सें पिताजी नें दुकान पे बैठना कमकर दिया थां औऱ अधिकसमय घऱ मे हि गुजारा करते थें।
जब सें मैंने दुकान पे बैठना शुरुआत किया थां, दुकान तोँ पहले कि तरह हि चलती थि मगरपता नहि केसेघऱ कां खर्चा अब खुलेहाथ सें पूरा होना शुरुआत हौ गय़ा थां। मे इसकीवजह यह हि समझा थां कि शायद पिताजी नें अब दुकान केँ अलावा कहीं औऱ भि काम ढूँढ़ लिया होगा, जिसकी वजह सें मैंने कभीगौर नहि किया।
एक् दिन मे अपनी दुकान पे हि बैठाहुआ थां कि एक् ग्राहक आया औऱ मुझसे कुछ सामान माँगा। जब मे सामान देने केँ लिएउठा तौ देखा कि सामान खतम होँ चुका हैं। क्योंकि ग्राहक भि हमारी हि दुकान सें सामान लेता थां, इसलिये मैंने उससेकहा कि आप् घऱजाओ, अभि सामान आता हैं तौ मे आपकेघऱ भिजवा दूँगा। उसके जाने केँ बाद मैंने दुकान कां जायजा लिया तोँ बहुत सामान खतम होँ चुका थां। इसलिये मैंने पिताजी कों काल किया तौ पिताजी कां नंबर स्विच-आफ आँ रहा थां।
मैंने कुछदेर सोचा औऱ दुकान कों थोड़ी देर केँ लिएबंद कर दिया औऱ घऱ कि तरफचल पड़ा कि पिताजी कों जाकरबता देता हूं कि सामान खतम हौ गय़ा हैं जौ कि मंगवाना हैं।
जब मे अपनीगली मे पहुंचा तौ वहा टेंटलगे हुये थें, क्योंकि वहा विवाह हौ रही थि। इसलिये मे दूसरी गली कि तरफ मुड़ गय़ा जोँ कि हमारे घऱ केँ पीछे थि। उसगली मे सभी घरों कां पिछवाड़ा थां औऱ लोगों नें बैठकें बनाई हुईँ थि जिसकी वजह सें वहा अक्सर कोई भि नहि होता थां। मे भि इसीलिए इसतरफ आँ गय़ा थां कि चलो बैठक कि तरफ सें घऱ मे चला जाता हूं। जैसे हि मे घऱ कि बैठक केँ पास गय़ा औऱ दरवाजे कों खटखटाया तोँ एक् व्यक्ति नें जौ कि सिर्फ़ निक्कर मे हि थां, दरवाजा खोला तोँ मे हैरान रह गय़ा कि यहकौन हैं? जौ हमारे घऱ मे इसतरह खड़ाहुआ हैं।
उस व्यक्ति नें कहा-कौन होँ भइया? औऱ यहा क्यूं आँ गये हौ?
मैंने कहा-यह तौ आप् बताओ कि आप् कौन होँ? औऱ हमारे घऱ मे क्याँ कररहे हौ? औऱ इतना बोलते हि मे अंदर दाखिल होँ गय़ा औऱ अंदर दाखिल होते हि जोँ नजारा मेरी आँखों नें देखा मुझेउस पे यकीन नहि हुआ। बैठक मे फूफी बेड पे नंगी लेटी हुई थि औऱ दरवाजे कि तरफ हि देखरही थि। जैसे हि फूफी कि नजर मेरेऊपर पड़ी, फूफी घबराकर उठी औऱ बगल सें चादर उठाकर अपनेऊपर करली।
मुझेकुछ देर तक तौ समझ मे हि नहि आया कि यह होँ क्याँ रहा हैं? औऱ मुझे करना क्याँ चाहिए?
तभी वोँ व्यक्ति जोँ कि बैठक मे फूफी केँ संग हि थां बोल पड़ा-हाँ भइयाकौन हैं तूँ? औऱ यहा क्यूं आँ मरा हैं?
इससे पहले कि मे कुछ बोलता फूफी नें हल्की सि आवाज़ मे कहा- आलोक, तुम् घऱ मे जाओ औऱ अपनी अम्मी केँ पास बैठो। मे अभि कुछदेर आती हूं।
मैंने कहा-मगर फूफी, यहसभी क्याँ हैं? औऱ मे क्यूं जाऊँयहा सें? औऱ यहकौन हैं? बताओ मुझे।
फूफी नें कहा- आलोक, अभि तुम् अपनी अम्मी केँ पासजाओ। वोँ तुम्हें सभीकुछ बता देंगी औऱ अगरफिन भि मुझसे कुछ पूछना हुआ तोँ पूछ लेना।
मुझेकुछ समझ मे नहि आँ रहा थां। मगर मे यह भि नहि चाहता थां कि यहाकोई हंगामा शराबा होँ औऱ लोगजमा होँ जायें क्योंकि इसमें हमारे घऱ कि हि बदनामी थि। मे वहा सें सीधाघऱ कि तरफ कां दरवाजा खोलकर जैसे हि घऱ मे दाखिल हुआ कि अम्मी नें, जोँ कि सामने हाल मे हि बैठी हुईँ थीं, मुझेदेख लिया औऱ एकदम सें घबरा गई औऱ बैठक कि तरफ देखने लगी।
मैंने कहा- अम्मी, यह बैठक मे क्याँ हौ रहा हैं? औऱ पिताजी कहां हें?
अम्मी नें मुझे अपनेपास बुलाया औऱ कहा- तुम्हारे पिताजी अभि आँ जाते हें। यहा बैठो औऱ बताओ कि तुम् इतने गुस्से मे क्यूं होँ?
मैंने अम्मी कि तरफ देखा औऱ कहा- क्यूं अम्मी? आपको नहि पता कि यहां बैठक मे फूफी कौन सें गुल खिलारही हें?
अम्मी नें कहा- देखो आलोक, अभि तुम्हारे पिताजी आँ जायेंगे औऱ वोँ हि इस मसले पे तुम्हारे संगबात करेंगे। प्लीज़्ज़… अभि आहिस्ता बैठो औऱ हंगामा नहि करो।
मैंने कहा-ठीक हैं अम्मी, मे आपकीबात मानकर चुपकर जाता हूं औऱ पिताजी केँ आने तक कुछ नहि बोलूंगा मगर आप् अभि उस व्यक्ति कों बाहर् निकालो।
इससे पहले कि अम्मी कुछ बोलती पिताजी घऱ आँ गये औऱ मुझे अम्मी केँ पास बैठा देखकर समझगये कि मुझेसभी पताचल चुका हैं।
मैंने पिताजी कों देखते हि कहा- पिताजी, यहाइस घऱ मे क्याँ हौ रहा हैं? आपकोपता भि हैं कुछ?
पिताजी- हाँ…पता हैं मुझे। तुम् आओ मेरेसंग रूम मे वहा बैठकर बात करते हें।
मे पिताजी कि बात सुनकर चौंक गय़ा औऱ हैरानी सें पिताजी कि तरफ देखने लगा औऱ बोला- क्याँ आपकोपता हैं? औऱ फिन भि?
पिताजी- “आलोकचलो आँ जाओरूम मे चलते हें औऱ वहा बैठकर बात करेंगे…” औऱ रूम कि तरफचल पड़े।
मैंने भि चुपचाप पिताजी केँ पीछे उनकेरूम कि तरफचल पड़ा। उस समय मेरेमन मे आँधियां चलरही थीं औऱ मुझेसमझ मे नहि आँ रहा थां कि मे क्याँ करूं?
पिताजी नें मुझे अपने सामने हि बेड पे बैठने कों कहा औऱ मेरे बैठते हि कहा-हाँ, अबकहो क्याँ बात हैं? तुम् इतना क्रोध क्यूं दिखारहे होँ?
मे- पिताजी, आपको नहि पता हैं क्याँ कि फूफी बैठक मे क्याँ कररही हैं?
पिताजी- पता हैं कि इससमय वोँ वहा चुदवा रही हैं। मगर तुम् इसमें इतना क्रोध क्यूं कररहे होँ?
पिताजी कि बात सुनकर मे दंगरह गय़ा औऱ कुछदेर केँ बाद बोला- क्याँ पिताजी, आपकोसभी पता हैं औऱ आप् फिन भि इसतरह आहिस्ता बैठे हौ।
पिताजी- तोँ क्याँ करूं?चलो तुम् हि बतादो?
मे- पिताजी, आपको फूफी कों मना करना चाहिए। आप् इसघऱ मे बड़े हौ औऱ अगर आप् हि कंट्रोल नहि करोगे तौ इसघऱ कां क्याँ होगा?
पिताजी- देखो आलोक, तुम् अब दुकान चलते हौ औऱ पैसे कमाकर घऱ लाते हौ तोँ क्याँ मे तुम्हें मारूं याँ मना करूं कि नहि तुम्हें दुकान नहि चलानी चाहिए?
मे- मगर पिताजी, इसबात मे मेरी औऱ दुकान कि बात कहां सें आँ गई?
पिताजी- आलोक, जिस तरह तुम् दुकान सें पैसे कमाकर घऱ लाते हौ उसीतरह तुम्हारी फूफी लोगों सें चुदवाकर पैसे कमाती हैं औऱ घऱ चलाती हैं।
मे हैरानी सें पिताजी कि तरफ देखने लगा औऱ कुछ नहि बोलसका।
तौ पिताजी नें कहा- “देखो आलोक, बस आमखाओ यह नहि देखो कि वोँ आँ कहां सें रहे हें…”
मैंने कहा- नहि पिताजी, यह मुझसे नहि होगा औऱ आपनेकभी सोचा हैं कि लोग क्याँ कहेंगे औऱ हमारे रिश्तेदार, हमारे बारे मे क्याँ सोचेंगे?
पिताजी नें गुस्से सें कहा- हम् लोग इतने सालों सें गुरबत औऱ तंगी मे ज़िंदगी गुजार रहे हें तब तौ यहलोग औऱ रिश्तेदार कुछ नहि बोलेअब इनको क्याँ तकलीफ हैं?
मे पिताजी कि बात सुनकर वहा सें उठा औऱ सीधा अपनेरूम मे आँ गय़ा औऱ दरवाजे कों बंद करकेलेट गय़ा। क्योंकि अब मेरादिल नहि चाहरहा थां कि मे दुकान पे जाऊँ।
कुछ देर केँ बाद मेरेरूम केँ दरवाजे पे खटखट हुइ तोँ मैंने पूछा-कौन हैं?
तौ अम्मी नें कहा- “बेटा मे हूं, चलो आँ जाओ औऱ खानां खालो…”
मैंने कहा- “मुझेभूख नहि हैं आप् जाओयहा सें औऱ मुझेकोई भि तंग नहि करे प्लीज़्ज़…”
उसकेबाद साम तक बाहर् क्याँ होतारहा मुझे नहि पता। क्योंकि नां तौ मे बाहर् निकला औऱ नाँ हि कोई मेरेरूम मे आया औऱ इसीतरह रात केँ 10:00 बजगये औऱ मुझे किसी नें रात कां खानां भि नहि पूछा औऱ मेरेपेट मे भूख कि वजह सें हल्का दर्द भि होँ रहा थां। कोई 10:10 पे मेरेफोन पे एस॰एम॰एस॰ आया। मैंने देखा तौ फूफी कां थां। फूफी नें लिखा थां- “आलोक, प्लीज़्ज़ मे खानां लारही हूं दरवाजा खोल देना…”
पहले तौ मुझे बड़ा क्रोध आयामगर फिनयह सोचकर कि मुझे फूफी सें बात तोँ करनी हि चाहिए। उठा औऱ दरवाजे कों खोल दिया औऱ फिन सें लेट गय़ा। अभि दरवाजा खोलेकुछ हि देर हुईँ थि कि मेरेरूम कां दरवाजा आहिस्ता खुला औऱ फूफी मेरेरूम मे खानां लेकर आँ गई औऱ खाने केँ संगआज दूध भि थां। फूफी नें खानां लाकरबेड पे मेरेपास हि रख दिया औऱ सर झुका केँ खड़ी होँ गई।
तोँ मैंने कहा- “फूफी खानां लेँ जाओ मुझे नहि खानां हैं…”
फूफी- “आलोक, प्लीज़्ज़ खानां खालो। पता हैं मैंने भि तब सें कुछ नहि खाया हैं…”
मे- क्यूं आपने क्यूं नहि खाया? क्याँ आपके ग्राहक नें खानां नहि मँगवाया थां क्याँ?
फूफी- “देखो आलोक, प्लीज़्ज़ मुझे जोँ भि केहना हैं बोललो मगर खानां खालो…”
मे- ठीक हैं, मे खानां खा लूँगा मगर पहले आपको बताना होगा कि यहसभी कब सें चलरहा हैं औऱ क्यूं?
फूफी- आलोक, जब छुपाने केँ लिएकुछ बचा हि नहि तोँ अब मे सभीबता दूँगी। मगर पहले खानां खालो मुझे भि भूखलगी हुइ हैं।
मे उठकरबैठ गय़ा औऱ फूफी कों भि बैठने केँ लिए बोला औऱ कहा-चलो आँ जाओ खानां मिलकर खा लेते हें। फिन हमने खानां खाया औऱ फूफी बर्तन किचेन मे रखने केँ लिएचली गई औऱ दूध साइड टेबल पे रखगईं। फूफी बर्तन रखकर वापिस आई औऱ दरवाजा कों अंदर सें लाककर दिया औऱ मेरेपास आकरबेड पे बैठ गई औऱ मेरीतरफ देखते हुये बोलि- हाँ, अब पूछो जौ पूछना हैं?
मैंने कहा- फूफी, आपकोजरा भि शरम नहि आई कि लोग क्याँ कहेंगे औऱ यहकाम जोँ आप् कररही हें इसमें कितनी बदनामी हैं?
फूफी- “देखो आलोक, 4 साल हौ गये हें मुझे तलाक हुये औऱ अभि मे 31 साल कि हूं। मुझे भि अपनी ज़िंदगी जीने कां हक हैं औऱ ज़िंदगी गुजरने केँ लिए रुपया भि चाहिए होता हैं जौ कि एक् तलाक-शुदा औऱ गरीब महिला कों कौन देता हैं? इसीवजह सें मैंने यहकाम किया औऱ अबइसकाम सें अपना औऱ इसघऱ कां खर्चा भि निकालती हूं…”
मे- मगर फूफी, पिताजी औऱ अम्मी केसे आपकासंग देने केँ लिए सजधजकर हौ गये?
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घऱ कां बिजनिस --2
फूफी- “आलोक, असल बात मे तुम्हें बताऊँगी नहि, मगर दिखा दूँगी यह मेरा वादा हैं। मगरहाँ घऱ केँ जौ हालात चलरहे थें उसमें कोई भि किसीकाम भि केँ लिए सजधजकर होँ सकता हैं…”
मे- “ठीक हैं फूफी, अब आप् जाओ मुझे औऱ कुछ नहि पूछना हैं आपसे…”
फूफी- क्यूं आलोक? मे इतनी बुरी हूं कि मे यहा तुम्हारे पास नहि सो सकती?
मे- “मगर फूफी, आपका तोँ अपनारूम भि हैं औऱ आप् वहीं पे सोती हौ…”
फूफी- हाँपता हैं मुझे, मगर आज मेरादिल यहा तुम्हारे पास सोने कों कररहा हैं।
मैंने कहा-“ठीक हैं फूफी, लाइटबंद करदो औऱ सोजाओ। मुझे सुभह दुकान पे भि जानां हैं…” औऱ करवट केँ बललेट गय़ा।
तभी फूफी नें कहा- आलोक, मे यहदूध भि लाई थि तुम्हारे लिए। इसे पीलोफिन सो जानां…”
मैंने उठकर फूफी कि तरफ देखा औऱ गिलास पकड़ लिया, आधा पी लिया तौ बाकी फूफी नें पकड़ लिया औऱ पीगईं। फिन फूफी नें लाइटबंद कर दि औऱ औऱ बेड पे आकर मेरेसंग लेटगईं। मुझेसमझ मे नहि आँ रहा थां कि आखिरआज फूफी कों हुआ क्याँ हैं जोँ वोँ यहा मेरेरूम मे सोने केँ लिए आँ गई हें?
अभि मे यहसोच हि रहा थां कि फूफी नें करवटली औऱ मुँह दूसरी तरफकर लिया औऱ अपनी गाण्ड मेरी गाण्ड केँ संग मिला दि औऱ हल्का सां दबा दिया। जिससे हम् दोनों कि गाण्ड एक् दूसरे केँ संगमिल गई,। फूफी कि नरम औऱ रसीले गाण्ड कों अपनी गाण्ड केँ संग महसूस करके मुझे बड़ा अच्छा लगा औऱ मेरे लण्ड कों भि हल्का सां मज़ाआने लगा।
मुझे दोपहर कि बातयाद आँ गई। जब फूफी कों मैंने नंगा देखा थां औऱ फूफी केँ नंगे जिश्म कों याद करके मेरा लण्ड पूरा हार्ड हौ गय़ा औऱ मुझे एक् खयालआया कि क्यूं नां मे भि फूफी पे कोशिश करूं? होँ सकता हैं कि कामबन जाये औऱ मुझे भि फूफी कि चूत कां आनंदमिल जाये। मगर इसकेसंग हि यह सोचकर चुपकर गय़ा कि नहि आलोक, यह मेरी फूफी हें मे इनकेसंग ऐसा नहि कर सकता, यह गलत हैं औऱ ऐसा नहि होना चाहिए।
मगर इसकेसंग हि मेरेदिल कि आवाज़ जोँ मेरेमन पे भारी पड़ती जारही थि, वोँ यह थि कि फूफी सिर्फ़ एक् गश्ती हैं जिसको पैसे सें मतलब हैं रिश्ते सें नहि। यहसोच जब मेरेऊपर हावी होँ गई तोँ मैंने फूफी कि तरफ करवटली औऱ अपने खड़े लण्ड कों जोँ कि 8” कां हैं औऱ बहुत मोटा भि, फूफी कि गाण्ड कां संगछुआ दिया।
मेरा लण्ड जैसे हि फूफी कि गाण्ड पे लगा एक् मजे कि लहर सि मेरे जिश्म मे दौड़ गई औऱ मैंने अपने लण्ड कों थोडा सां औऱ फूफी कि गाण्ड पे दबा दिया। मे जानता थां कि फूफी जागरही हैं मगरचुप करके लेटी हुई हें औऱ कुछबोल नहि रही हें। जिससे मेरा हौसला भि बढ़ गय़ा औऱ मैंने अपनाहाथ फूफी केँ ऊपररख दिया औऱ धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरुआत कर दिया औऱ फूफी कि चूचियां तक लें गय़ा। जैसे हि फूफी कि चूचियों पे मेराहाथ लगा मुझे औऱ भि मज़ाआने लगा।
क्योंकि फूफी नें ब्रा नहि पहनी हुई थि औऱ फूफी कि चूचियां पूरी हार्ड होँ रहीथीं। मे समझ गय़ा कि मे जोँ भि करूं, फूफी मना नहि करेंगी। तोँ मेरा हौसला थोडा बढ़ गय़ा औऱ मैंने अपनी शलवार कां नाड़ा खोला औऱ लण्ड कों बाहर् निकाल लिया।
अब मैंने फूफी केी चूचियां सें हाथहटा लिया औऱ फूफी कि कमीज कों थोडा ऊपर किया औऱ फूफी कि शलवार कों थोडा नीचे खिसका दिया। जिसमें फूफी नें भि मेरी सहायता कि औऱ अपनी गाण्ड कों थोडा सां हिलाकर नीचे सें भि शलवार निकालने मे सहायता कि औऱ इसतरह कि मे फूफी कों सोता हि समझूं। फूफी कि शलवार कों नीचे घुटनों तक उतारकर मैंने फूफी कि गाण्ड कों नंगाकर दिया औऱ अपने नंगे लण्ड कों फूफी कि गाण्ड कि दरार मे फँसा दिया।
मेरेइस तरह करते हि फूफी केँ मुँह सें बिल्कुल हल्की सि आहह-आहह निकल गई जिससे मे समझ गय़ा कि फूफी कों भि इसमें मज़ा आँ रहा हैं। अब मैंने फूफी कि कमीज कों ऊपर किया औऱ उनकी चूचियों कों भि नंगाकर दिया औऱ हाथ सें पकड़कर दबाने लगा।
औऱ संग हि अपने लण्ड कों भि फूफी कि गाण्ड केँ ऊपर हल्का सां रगड़रहा थां। कुछदेर इसतरह करने केँ बाद मे थोडा सां पीछेहुआ औऱ फूफी कों सीधा लिटा दिया औऱ फूफी कि चूचियों पे अपना मुँह लगाकर चूसने लगा औऱ दबाने लगा।
फूफी बस हल्की आवाज़ मे आहह-आहह… उन्म्मह… कि आवाज़ कररही थीं, मगर अपनी आँखों कों बंद करके लेटीरही। फिन मे उठा औऱ फूफी कि शलवार कों टाँगों सें निकाल दिया औऱ फूफी कों नीचे सें नंगाकर दिया औऱ फूफी कि टाँगों कों खोलकर बीच मे बैठ गय़ा औऱ अपने लण्ड कों फूफी कि चूत पे जोँ कि बुरीतरह सें गीली होँ रही थि रगड़ने लगा।
मेरेइस तरह लण्ड रगड़ने सें फूफी थोडा मचलने लगी औऱ अपने होंठों कों काटने लगीमगर बोलीं कुछ नहि औऱ नाँ हि अपनी आँखों कों खोला। फिन मैंने अपने लण्ड कों थोडा सां फूफी कि चूत केँ सुराख पे रखकर दबाया तोँ मेरे लण्ड कां सुपाड़ा फूफी कि बुर मे आहिस्ता घुस गय़ा औऱ फूफी केँ मुँह सें आअहह कि आवाज़ निकल गई।
फूफी कि चूत अंदर सें बड़ी गर्म किसी तंदूर कि तरह थि मगर गीली। अब मैंने फूफी कि टाँगों कों थोडा औऱ फैला दिया औऱ हल्का सां झटका दिया औऱ अपने लण्ड कों थोडा औऱ अंदर घुसा दिया। अब फूफी भि मेरे लण्ड कि तरफ अपनी गाण्ड कों हल्का सां दबारही थीं। जिससे मे समझ गय़ा कि फूफी क्याँ चाहती हैं औऱ मैंने भि एक् थोडा तेज झटका दिया औऱ लण्ड फूफी कि चूत मे घुसा दिया।
लण्ड केँ घुसते हि फूफी केँ मुँह सें सस्सीई कि आवाज़ निकल गई औऱ फूफी नें अपनी टाँगों मे मुझे बुरीतरह जकड़ लिया जिससे कि मुझसे हिला भि नहि गय़ा। कुछदेर इसीतरह रहने केँ बाद फूफी नें अपनी टाँगों कों ढीला छोड़ दिया औऱ संग हि अपनी गाण्ड कों मेरे लण्ड कि तरफदबा दिया। मे फूफी कां इशारा समझ गय़ा औऱ अपने लण्ड कों आहिस्ता सें फूफी कि चूत मे अंदर-बाहर् करनेलगा औऱ संग हि फूफी कि चूचियां कों भि दबाने लगा।
मुझेउस समयसच मे जन्नत कां आनंदमिल रहा थां औऱ मेरा लण्ड बड़े प्रेम औऱ आहिस्ता फूफी कि चूत मे घूमरहा थां।
मेरादिल तौ कररहा थां कि मे फूफी कि पूरी ताकत सें चुदाई करूं। मगर क्योंकि फूफी सोने कां ड्रामा कररही थि इसलिये मे भि धीरे-धीरे फूफी कि चुदाई करतारहा औऱ कोई 6-7 मिनट कि लगातार चुदाई केँ बाद फूफी कि चूत मे हि फारिग़ हौ गय़ा औऱ इसीतरह फूफी केँ ऊपर हि लेट गय़ा। पता नहि कब मेरीआँख लगी औऱ इसीतरह फूफी केँ ऊपर हि लेटाहुआ मे सो गय़ा।
सुभहजब मे उठा तौ सुभह केँ 9:00 बज चुके थें। मे उठा तौ अभि भि नंगा हि थां औऱ फूफी रूम मे नहि थीं। मे समझ गय़ा कि फूफी जा चुकी हें।
अभि मे उठकर खड़ा हि हुआ थां कि रूम कां दरवाजा खुला औऱ अम्मी अंदर आँ गई औऱ मुझेइस तरह नंगा खड़ा देखकर अम्मी हल्का सां हँस पड़ी औऱ बोलीं- उठ गय़ा मेरा बेटा?
मैंने जल्द सें अपनी शलवार उठाकर अपने सामने करली औऱ बोला-जी अम्मी उठ गय़ा हूं। आप् चलो अभि मे आता हूं।
अम्मी हँसते हुये वापिस मुड़ गई औऱ दरवाजे केँ पास जाते हुये बोलि- “आलोक, इतना घबरा क्यूं रहा हैं? मे मां हूं तेरी तेरी नहलाती भि रही हूं…” इतना बोलते हुये अम्मी मेरेरूम सें निकलगईं औऱ मे समझ गय़ा कि फूफी नें अम्मी कों सभीकुछ बता दिया होगा।
खैर मे बाहर् निकला, कपड़े पहनकर बाथरूम मे घुस गय़ा औऱ नहाकर बाहर् निकला तौ अम्मी नें कहा-“चलो बेटा बैठजाओ, मे अभि गर्म-गर्म ब्रेकफास्ट लेकरआती हूं…”
मे हाल मे बैठ गय़ा कि तभी पिताजी भि वहा आँ गये। उनके चेहरा पे भि हल्की सि मुशकुराहट थि। पिताजी मेरेपास बैठगये औऱ बोले-“हाँ आलोक, रात नींद तौ अच्छी तरहआई नां? नीलम नें तंग तोँ नहि किया तुम्हें?
मैंने कहा- “नहि पिताजी, फूफी तोँ आहिस्ता सो गई थीं। उन्होंने तोँ रात मे मुझेजरा भि परेशान नहि किया…”
पिताजी नें कहा- “अभि ब्रेकफास्ट करके मेरेपास रूम मे आनां, तुम्हारे संगकुछ बात करनी हैं…”
मैंने हाँ मे सर हिला दिया कि तभी अम्मी भि ब्रेकफास्ट लेकर आँ गई औऱ मे ब्रेकफास्ट करनेलगा। नाश्ते केँ बाद मे उठा औऱ पिताजी केँ पास उनकेरूम मे चला गय़ा।
पिताजी नें मुझे अपनेपास बेड पे हि बिठा लिया औऱ बोले-हाँ तौ आलोक बेटा, क्याँ सोचा तुमने फिन?
मे- किस बारे मे पिताजी?
पिताजी- “वोँ जोँ कलबात हुईँ थि हमारे बीच, मे उसी केँ बारे मे बातकर रहा हूं…”
मे- पिताजी, आप् जौ भि करना चाहते हौ मुझेकोई ऐतराज नहि हैं।
पिताजी थोडा खुश हौ गये औऱ बोले-चलो अच्छा हुआ कि तुम्हें स्वयं हि इस सबकापता चल गय़ा हैं। वरना तुम्हें समझने मे बाद मे तकलीफ़ होती…”
मे- पिताजी, आपसे एक् बात पूछूं? बुरा तौ नहि मानोगे?
पिताजी- “नहि बेटा, पूछो जौ भि पूछना चाहते होँ? मे बुरा नहि मानूंगा क्योंकि अब तोँ तुम्हें भि पताचल हि गय़ा औऱ जौ नहि पता वोँ भि पता होना चाहिए…”
मे- पिताजी, क्याँ फूफी अकेली हि यहकाम करती हें याँ?
पिताजी- “नहि बेटा, तुम्हारी फूफी केँ संग अभि तुम्हारी मां भि करती हैं…”
मे- पिताजी, क्याँ आपको बुरा नहि लगता कि आपकी पत्नि औऱ बेहन लोगों केँ संग पैसों केँ लिए सोती हें?
पिताजी- “देखो बेटा, जब तुम्हारी मम्मी औऱ फूफी किसी केँ संग सोती हें तौ पैसों केँ लिए हि सोती हें वरना नहि। औऱ आज केँ जमाने मे रुपया हि सभीकुछ हैं…”
मैंने कहा-ठीक हैं पिताजी आप् जौ चाहें करें, मुझेकोई ऐतराज नहि हैं। मगरबस आपसे एक् बात बोलनी थि अगर आप् बुरा नहि मानो तौ?
पिताजी नें कहा-“हाँ कहो बेटा, क्याँ बात हैं? जौ भि बात होँ खुलकर करो। अब शरमाना किसबात कां…”
मैंने कहा- पिताजी, आपकोपता हैं कि रात मे फूफी मेरेरूम मे मेरेपास हि सोई थि?
पिताजी मेरीबात सुनकर हँस पड़े औऱ बोले- अच्छा यहबात हैं? ठीक हैं, मे उसेबोल दूँगा कि जब भि तुम्हारा दिलकरे अपनी फूफी केँ संगसो लिया करना। वोँ मना नहि करेगी। ठीक हैं?
मे पिताजी कि बात सुनकर खुश होँ गय़ा औऱ वहा सें उठकर अपनेरूम मे आँ गय़ा। क्योंकि आज दुकान पे जाने कां मूड नहि थां इसलिये मे रूम मे आँ गय़ा औऱ बेड पे लेट गय़ा औऱ फूफी केँ बारे मे सोचने लगा। क्योंकि अब मुझे इजाजत मिल हि गई थि कि फूफी कि चूत जबदिल चाहेमार सकता हूं। कुछदेर बाद मे उठा औऱ फूफी केँ रूम कि तरफचल पड़ा।
तोँ अम्मी नें मुझे देखते हुयेकहा- बेटा, कहां जारहे हौ?
मैंने सर झुका लिया औऱ आहिस्ता सें बोला- वोँ… अम्मी फूफी सें काम थां थोडा।
अम्मी नें कहा- “तूँ चल अपनेरूम मे, मे कुछ करती हूं तेरा। क्योंकि तेरी फूफी तौ दोबजे तक फारिग़ नहि हें…”
यहा मे एक् बातबता दूँ कि मेरी दिदी सिलाई करनासिख रही थि औऱ बाकी कि दोनों बहनें पढ़ने जातीथीं। इसलिये 3:00 बजे तक घऱ मे अम्मी, पिताजी औऱ फूफी केँ अलावा घऱ मे कोई औऱ नहि होता। मे मुँह लटकाकर रूम मे आँ गय़ा औऱ सोचने लगा कि चलो अभि नहि तोँ क्याँ हुआरात कों हि चोद लूँगा फूफी कों। अभि मे यहसोच हि रहा थां कि मेरेरूम कां दरवाजा खुला औऱ अम्मी अंदर आँ गई।
मे अम्मी कि तरफ देखा औऱ बोला-जी अम्मी, कोईकाम थां क्याँ?
अम्मी- बस बेटा, वैसे हि दिल किया तोँ मे आँ गई तुम्हारे रूम मे कि चलो तुम्हारे संग थोड़ी देर बातें हि करलूँ। क्यूं नहि आनां चाहिए थां क्याँ?
मे- नहि अम्मी, आप् जबदिल करे मेरेपास आँ सकती हौ…” औऱ संग हि अम्मी कों बेड पे बैठने केँ लिएबोल दिया।
अम्मी बेड पे मेरेपास हि बैठगईं औऱ हल्का सां मुश्कुराते हुये बोलि- अच्छा आलोक, रात मे तुम् इसीतरह सोते होँ याँ फिन अपनी फूफी केँ संग हि इसतरह सोगये थें?
मुझे अम्मी कि बात पूरीतरह समझ मे नहि आई तौ मैंने कहा- क्याँ मतलब? अम्मी मे समझा नहि?
अम्मी मुझे मुशकुराहट देते हुये बोलीं- मेरा मतलब थां कि इसीतरह जिसतरह तुम् अपनी फूफी केँ संगसो रहे थें बिना कपड़ों केँ?
मे- “नं…नहि अम्मी, वोँ बसऐसे हि…”
अम्मी- “अच्छा चलो छोड़ो, मुझेकुछ काम थां तुमसे…”
मे- जी अम्मी बताओ नाँ प्लीज़्ज़… क्याँ काम थां मेरेसंग?
अम्मी- वोँ बेटा, तुम्हारी फूफी तोँ जरा मसरूफ हैं औऱ मुझे अपनीकमर कि मालिश भि करवाना थि। क्याँ तुम् कर दोगे?
मे- “जी अम्मी, कर दूँगा…”
अम्मी- “अच्छा तुम् बैठो, मे तेल लेँ आती हूं औऱ संग हि कपड़े भि चेंजकर आऊँ…”
मैंने हाँ मे सर हिला दिया तौ अम्मी मेरेरूम सें उठकर बाहर् चलीगईं।
कुछदेर केँ बादजब अम्मी तेल लेकरआई तोँ अम्मी नें एक् प्राचीन औऱ ढीलासौत पहनाहुआ थां। अम्मी मेरेपास आकर खड़ी होँ गई औऱ तेल एक् साइड टेबल पे रख दिया औऱ मुझेकहा- चलोउठो यहा सें, मे पुरानी बेडशीट डालदूँ ताकियह खराब नां होँ जाये।
मे उठा तोँ अम्मी नें अलमारी मे सें एक् पुरानी बेडशीट निकली औऱ बेड पे बिछा दि औऱ बोलीं- “हाँअब ठीक हैं…” औऱ स्वयं बेड पे उल्टी होकरलेट गई औऱ बोलि- अब तुम् भि बेड पे हि आँ जाओ याँ खड़े होकर हि मालिश करोगे?
मे अम्मी कि बात सुनकर जैसे हि बेड पे बैठने लगा, अम्मी नें मेरीतरफ मुड़कर देखा औऱ बोलि- “आलोकऐसा करो कि तुम् भि यह वाले कपड़े उतारदो औऱ कोई चादर बाँधलो ताकि इनको कहींतेल नाँ लग जाये…”
मैंने अम्मी कि बात सुनकर अपने कपड़े बदललिए औऱ चादर बाँधली औऱ बेड पे अम्मी केँ पासबैठ गय़ा औऱ बोला- “अम्मी अपनी कमीज कों थोडा ऊपरकर लो तोँ मे तेल लगाऊँ…”
अम्मी नें कहा- बेटा, अब मे लेट गई हूं इसलिये स्वयं हि करलो…”
अम्मी कि बात सुनकर मैंने अम्मी कि कमीज कां पल्लू पीछे सें पकड़ लिया औऱ ऊपरकर दिया जिसमें कि अम्मी नें भि थोडा ऊपर उठकर मेरासंग दिया। जब मैंने अम्मी कि कमीज कों कंधों तक हटा दिया तौ मुझेपता चला कि अम्मी नें ब्रा नहि पहनी हुई हैं औऱ थोडा ऊपर होकरफिन लेटने सें अम्मी कि हलब्बी साइज चूचियां थोडा दोनों बगलों सें बाहर् कों निकलआई थीं। जिन्हें देखकर मेरा लण्ड थोडा सख़्त होनेलगा थां। अब मे अम्मी कि बगल मे बैठा थां औऱ अम्मी कि कमर पे हल्का-हल्का तेल लगाकर मलनेलगा।
तौ अम्मी नें कहा- “बेटा, ऐसेठीक सें नहि होँ रहा हैं। तुम् ऐसाकरो कि मेरी टाँगों पे बैठजाओ इससेतेल ठीक सें लगेगा…”
मे अम्मी कि बात सुनते हि जल्दी अम्मी कि रानों पे गाण्ड सें थोडा पीछे होकरबैठ गय़ा औऱ अम्मी कि कमर पे तेल लगाने लगा। मेरेइस तरह बैठकर तेल लगाने सें मेरा लण्डआधा खड़ा होँ गय़ा औऱ अम्मी कि नरम गाण्ड कि दरार मे चुभने लगा जिससे मुझे औऱ भि मज़ाआने लगा। अब मे थोडा सां आगे कों हौ गय़ा औऱ अपने लण्ड कों पूरीतरह सें अम्मी कि गाण्ड मे फँसाकरमालिश करनेलगा।
मेरीइस हरकत पे भि जब अम्मी नें कुछ नहि कहा तोँ मेरा हौसला थोडा औऱ बढ़ गय़ा औऱ मे अपनेहाथ अम्मी कि कमर सें चूचियां केँ पास बगलों मे भि तेल वाले हाथों सें मालिश करनेलगा जिससे मेरेहाथ अम्मी कि बगल मे थोड़ी निकली हुई चूचियों कों छूनेलगे। अब मे भि समझ गय़ा कि जिसतरह रात मे फूफी चुपचाप मुझसे चुदवाती रही। इसी तरह मेरीयह रंडी मां भि मुझेकुछ नहि कहेगी।
अब मे पूरीतरह सें खुल गय़ा औऱ अपने हाथों कों अम्मी कि चूचियों केँ पास रोका औऱ अपने लण्ड कों अम्मी कि गाण्ड पे जोर सें दबा दिया औऱ बोला- “अम्मी अगर आप् थोडा ऊपर कों हौ जाओ तौ मे आपकेपेट पे भि थोडा तेलमल दूँ…”
अम्मी नें मेरीबात कां कोई जवाब नहि दियामगर अपना जिश्म इतनाऊपर उठा दिया कि मेराहाथ अब आहिस्ता नीचेघुस गय़ा।
मेरेहाथ जैसे हि अम्मी कि चूचियों पे लगे मैंने उन्हें अपने हाथों मे जकड़ लिया औऱ अम्मी केँ मुँह सें आअहह कि हल्की आवाज़ निकल गई औऱ संग हि अम्मी फिन सें खाट पे गिर गई। जिससे मेरेहाथ अम्मी केँ नीचे हि दबगये औऱ मे अम्मी केँ ऊपरकमर केँ संग चिपक गय़ा। अब मैंने अम्मी केँ नीचे सें हाथ निकाल लिए औऱ फिन सें अम्मी कि कमर पे मालिश करनेलगा।
तौ अम्मी नें कहा- “आलोक, थोडा नीचे भि मालिश करदो…”
मैंने कहा- अम्मी, नीचे कहां करनी हैं मालिश? क्याँ पैरों कि?
अम्मी नें कहा- “नहि बेटा, अगर बुरा नाँ मानो तोँ बस थोडा मेरे चूतड़ों कि भि मालिश कर देना…
Hot stori घर का बिजनिस complete - Ghar Ka Biznes – New Episode
घऱ कां बिजनिस --3
मैंने कहा-मगर अम्मी, इसतरह तोँ मुझे आपकी शलवार कों भि थोडा नीचे करना पड़ेगा। करदूँ क्याँ?
अम्मी केँ मुँह सें बस एक् होन्न कि आवाज़ हि निकलसकी औऱ कुछ नहि।
मैंने अम्मी कि इसी हूं कों इकरार समझा औऱ थोडा सां पीछेहट गय़ा औऱ अम्मी कि एलास्टिक वाली शलवार कों घुटनों तक नीचेकर दिया। जिससे अम्मी कि सफेद औऱ नरम गाण्ड मेरी आँखों केँ सामने नंगी हौ गई। यह नजारा देखकर मे पागल होने केँ लगभग होँ गय़ा औऱ मजे कि शिद्दत सें मेरा लण्ड भि झटके खानेलगा थां। अब मैंने अम्मी कि गाण्ड पे हल्का सां तेल गिरा दिया औऱ थोडा सां तेल जानबूझकर अम्मी कि गाण्ड कि दरार मे भि गिरा दिया औऱ अम्मी केँ गोल औऱ नरम चूतड़ों कों मसलने लगा।
कुछ देरइसी तरह मालिश करने केँ बाद मैंने आहिस्ता सें हाथ घुमाते हुये अम्मी कि गाण्ड केँ सुराख कि तरफ अपनेहाथ कां अंगूठा लेँ गय़ा औऱ वहींरोक लिया औऱ दूसरे हाथ सें मालिश करनेलगा। फिन मैंने अपनेहाथ केँ अंगूठे कों आहिस्ता सें अम्मी केँ गाण्ड केँ सुराख पे लगा दिया औऱ वहीं घुमाने लगा।
जिससे अम्मी आअहह कि हल्की आवाज़ भि करनेलगी।
जिससे मे समझ गय़ा कि लाइन क्लियर हैं। अब मे अम्मी कि रानों सें थोडा ऊपर कों उठा औऱ अम्मी कि रानों कों थोडा खोल दिया जिससे मुझे अम्मी कि चूत भि हल्की सि नजरआने लगी जौ कि अम्मी कि चूत सें रिसने वाले पानी सें बुरीतरह गीली होँ रही थि।
मैंने अपना एक् हाथ जोँ कि अम्मी कि गाण्ड केँ सुराख कों सहलारहा थां वहीं रहने दिया औऱ दूसरा हाथ अम्मी कि रानों मे घुसा दिया औऱ मालिश करनेलगा औऱ संग हि अम्मी कि गीली चूत कों भि हल्का सां छूनेलगा।
मेरेइस तरह करने सें अम्मी केँ मुँह सें आअहह… उन्म्मह… कि आवाज़ केँ संग हि- “हाँ बेटा तुम्हारे हाथ मे तौ चमत्कार हैं। सच मे मालिश कां मज़ा आँ रहा हैं आअहह…”
अम्मी कि मुँह सें निकालने वाली आवाज़ों औऱ अल्फ़ाज कों सुनकर मुझे भि थोडा हौसला हुआ औऱ मैंने अपनेहाथ कों अचानक अम्मी कि चूत केँ ऊपर रखकरमसल दिया।
जिससे अम्मी उतावलापन उठी- “आअहह… आलोक उन्म्मह… ऊओ…हाँ बेटा, बड़ा आराममिल रहा हैं…”
मैंने अम्मी कि चूत औऱ गाण्ड सें हाथहटा लिया क्योंकि अब मुझसे बर्दाश्त नहि हौ रहा थां औऱ मेरा लण्ड भि फटने केँ लगभग हि थां। मे अब थोडा आगे होँ गय़ा जिससे कि मेरा लण्ड अम्मी कि नंगी गाण्ड तक आँ गय़ा तौ मैंने जोँ चादर बँधी हुई थि उसे लण्ड केँ ऊपर सें हटाकर नंगा किया औऱ अम्मी कि गाण्ड पे रखा औऱ आगे कों झुक गय़ा कि जैसे कंधों कि मालिश करनेलगा हूं।
अब मे अम्मी केँ कंधों कों मलने केँ संग-संग अपने लण्ड कों अम्मी कि तेल सें चिकनी गाण्ड पे रगड़ने लगा औऱ फिन थोडा सां ऊपर होँ गय़ा औऱ अपने लण्ड कों अम्मी कि रानों कि तरफदबा दिया।
अम्मी समझ गई कि मे क्याँ चाहता हूं औऱ इसकेसंग हि अम्मी नें अपनी टाँगों कों थोडा खोल दिया जिससे मेरा लण्ड स्लिप होकर अम्मी कि चूत केँ मुँह सें जालगा।
अब मुझसे औऱ बर्दाश्त नहि हुआ तौ मैंने अपने एक् हाथ सें लण्ड कों अम्मी कि चूत पे सेट किया औऱ आहिस्ता जोर लगाने लगा। अम्मी कि चूत क्योंकि पहले हि बहुत गीली थि औऱ ऊपर सें तेल भि लगाहुआ थां जिसकी वजह सें मेरा लण्ड अम्मी कि चूत मे आहिस्ता जानेलगा।
जैसे हि मेरे लण्ड कां सुपाड़ा अम्मी कि चूत मे घुसा अम्मी केँ मुँह सें- “आअहह आलोक उन्हं… तुम् बड़ी अच्छी मालिश करते हौ मेरीजान ऊओ…”
अब मे थोडा ऊपर कों हुआ औऱ अपने लण्ड पे दबाव बढ़ा दिया जिससे मेरा लण्ड अम्मी कि चूत मे घुसता चला गय़ा। जैसे-जैसे मेरा लण्ड अम्मी कि चूत मे जारहा थां मुझेऐसा लगरहा थां कि मेरा लण्ड किसी गर्म औऱ गीले तंदूर मे घुसता जारहा हौ, जिससे मुझे मज़ा भि ज़्यादा आँ रहा थां।
अब मैंने अम्मी कि चूचियों कि तरफहाथ बढ़ाया औऱ जितना भि हाथ मे आया उन्हें पकड़कर मसलने लगा औऱ संग हि अपने लण्ड कों भि अम्मी कि चूत मे अंदर-बाहर् करनेलगा।
जिससे अम्मी भि अब पूरीतरह आनंद लेँ रही थि। अम्मी भि अब थोडा सां खुल गई औऱ- “हाँ आलोक, अब बहोत अच्छा लगरहा हैं… हाँयहा सें हि मसलो… उन्म्मह…”
कुछ तोँ इतनीदेर सें मे उत्तेजित हौ रहा थां औऱ कुछ अपनी मां कि चूत मारने सें हि मेरा बुराहाल थां जिसकी वजह सें मे जल्द हि अम्मी कि चूत मे हि फारिग़ हौ गय़ा।
मेरे फारिग़ होते हि अम्मी बोलीं- “आलोक बेटा, इसीतरह मेरेऊपर लेटेरहो, हटना नहि… उन्हं…” औऱ इसकेसंग हि अम्मी अपनी चूत कों कभी टाइट करती औऱ कभी ढीला औऱ फिनकुछ हि देर मे मुझे अम्मी कि चूत मे कुछ गर्म महसूस हुआ औऱ मे समझ गय़ा कि अम्मी भि फारिग़ हौ गयीं।
फारिग़ होने केँ बाद हम् मां बेटा कुछदेर तक इसीतरह एक् दूसरे केँ ऊपर हि लेटेरहे। मेरा लण्डअब अम्मी कि चूत मे हि सिकुड़ना शुरुआत हौ गय़ा थां मगरअब मुझमें इतनी हिम्मत नहि थि कि मे उठकर अम्मी कां सामना कर सकूं।
अम्मी नें भि यहबात महसूस करली थि। तभी अम्मी नें कहा- “आलोक, अब बसकरो होँ गई मालिश चलो अभि मुझेघऱ कां काम भि करना हैं…”
मे अम्मी केँ ऊपर सें हटा जिससे मेरा लण्ड अम्मी कि चूत सें बाहर् आँ गय़ा औऱ मैंने देखा कि अम्मी कि चूत मे सें मेरा सफेद पानी निकालने लगा थां।
मेरेबाद अम्मी नें भि थोडा सां अपपनी गाण्ड कों ऊपर कि तरफ उठाया औऱ बेड पे बिछी पुरानी चादर कों खींच लिया औऱ अपनी चूत कों उसकेसंग अच्छी तरहसाफ किया औऱ फिन अपनी शलवार कों भि ऊपर कि तरफ खींच लिया। अब अम्मी उठकरबैठ गई औऱ अपनी कमीज जौ कि कंधों तक ऊपर थि उसे भि नीचेकर लिया औऱ चादर कों उठाकर बाहर् चली गई।
उस वक्त नाँ तोँ अम्मी नें मेरेसंग कोईबात कि औऱ नाँ हि मैंने अम्मी केँ संगकोई बात कि।
अम्मी केँ जाने केँ बाद मैंने चादर खोली औऱ अपने कपड़े पहनलिए औऱ फिन सें बेड पे लेट गय़ा औऱ आँखें बंद करकेकल सें अब तक होने वाले वाकियात केँ बारे मे सोचने लगा कि क्याँ थां औऱ क्याँ होँ गय़ा हैं? इन्हीं सोचों केँ बीचकब मेरीआँख लगीपता हि नहि चला।
औऱ जब मेरीआँख खुली तौ फूफी मुझेउठा रही थि।
मे उठा तोँ फूफी नें हँसते हुयेकहा- “क्यूं आलोक, अपनी अम्मी कि मालिश करने सें थकगये होँ क्याँ?
मे सिर्फ़ मुश्कुराकर रह गय़ा औऱ कुछ नहि बोला।
तोँ फूफी नें कहा-चल अब उठकरनहा लेँ औऱ खानां भि खा लेँ।
मे उठ गय़ा औऱ फूफी सें पूछा- क्याँ बाकीलोग भि घऱ आँ चुके हें?
फूफी नें कहा-“हाँ, तेरी बहनें भि आँ गई हें, अब ज़्यादा समय खराब नाँ कर औऱ चल खानां खा लें…”
मैंने कहा- नहि फूफी, अभि दिल नहि हैं अब वक्त भि बहुत होँ गय़ा हैं रात कां खानां हि खाऊँगा। हाँ, अभि नहा लेता हूं…” औऱ उठकर नहाने चला गय़ा।
जैसे हि मे नहाकर बाहर् आया तोँ सामने अम्मी औऱ दिदी बैठी हुई थि। मुझे देखते हि अम्मी नें कहा- “आलोक, यहा आँ जरा…”
मैंने कहा-“जी अम्मी, बोलें क्याँ बात हैं…” औऱ इसकेसंग हि मे अम्मी केँ पासचला गय़ा।
अम्मी नें दिदी कि तरफ देखा औऱ कहा- “तेरी बेहन नें कुछ सामान मंगवाना हैं। बेटा, मुझसे तौ इस वक्त जाया नहि जायेगा तुँ हि लादेइसे जौ भि चाहिये हैं…”
मैंने दिदी कि तरफ देखा औऱ कहा-“जी दिदी, क्याँ मंगवाना हैं बताओ मुझे? मे ला आपको दूँगा…”
दिदी जौ कि अम्मी कि बात सुनकर पहले हि बहुत घबरा गई थि औऱ भि घबरा गई औरबोली- “न्…नहि भ…भइया, अभि कुछ नहि चाहिए हैं, अगर जरूरत हुई तौ मे आपकोबता दूँगी…”
अम्मी नें कहा- “भइया हैं तुम्हारा, डर क्यूं रही होँ? बताओ जोँ भि मंगवाना हैं…”
दिदी वहा सें उठ गई औऱ जाते हुये बोलीं- “नहि, अम्मी नहि… मे बाद मे मंगवा लूँगी…”
मुझेकुछ समझ मे नहि आया कि आखिरऐसी कौन सि चीजेंन हें जोँ कि बाजी कों मंगवाना हें मगर वोँ मुझे नहि बतापा रही हैं? दिदी केँ जाने केँ बाद मैंने अम्मी कि तरफ देखा औऱ कहा- क्यूं अम्मी? क्याँ चाहिए हैं दिदी कों?
अम्मी हल्का सां हँस पड़ी औऱ बोलि- “बेटा, उसेडेट आने वाली हैं औऱ उसे पैडस चाहिये हें। जाओ लाकर अपनी बेहन कों देदो…”
मे अब समझा कि दिदी इतना शर्मा क्यूं रही थि। मे घऱ सें निकला औऱ अपनी दुकान पे चला गय़ा औऱ वहा सें हि दिदी केँ लिएदो पैकेट लेँ आया औऱ घऱआकर अम्मी कों देनेलगा।
तोँ अम्मी नें कहा- “जाकर अपनी बेहन कों देदो, उसे हि चाहिए हें मुझे नहि…” अम्मी यह बोलते हुये मुश्कुरा रहीथीं।
मे अम्मी केँ पास सें दिदी कि तरफचला गय़ा। दिदी उस वक्त मेरेरूम कि सफाईकर रहीथीं। मैंने दिदी कों देखते हुयेकहा- “यहलो दिदी, आपका सामान आँ गय़ा हैं जोँ मँगवाते हुये आप् इतना शर्मा रही थि…”
दिदी नें मेरेहाथ मे पैड देखे तौ दिदी कां चेहरा एकदमलाल हौ गय़ा औऱ दिदी नें मेरीतरफ देखे बिनापैड मुझसे छीनलिए औऱ मेरेरूम सें भाग गई।
मे दिदी कि इस हरकत पे हल्का सां मुश्कुरा दिया। दिदी केँ जाने केँ बाद मे बेड पे लेट गय़ा औऱ अपनेघऱ औऱ यहा हौ रहेकाम केँ बारे मे सोचने लगा कि तभी अचानक मेरे दिमाग़ मे ख्याल आया कि कहीं दिदी भि तोँ अम्मी औऱ फूफी कि तरह गश्ती नहि बन चुकी हें? यह ख्याल आते हि मे उठ बैठा औऱ सोचने लगा कि दिदी केँ बारे मे किसतरह पता चलाऊँ कि तभी मुझेयाद आया कि आजरात फूफी नें तोँ आनां हि हैं तौ क्यूं नाँ आज फूफी सें पूछ लिया जाये।
यह ख्याल आते हि मे फिन सें लेट गय़ा औऱ अम्मी औऱ फूफी कि मस्त फुद्दियां, जिनकी मे चुदाई कर चुका थां, सोचने लगा औऱ इसीतरह सें समय गुजर गय़ा औऱ पता हि नहि चला कि रात केँ 8:00 बजगये। रात केँ खाने केँ लिए स्वीटी मुझे बुलाने आई।
तोँ मैंने कहा-“यहा हि खानां देजाओ…”
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