♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Hii dosto.
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dosto finally came the day we were eagerly waiting for। Waiting for 4 years iss now going too end। Legends are in front of the eyes and their courage iss waiting for us। In this particular moment, we have brought one last opportunity for you, which can benefit you a lot
। All you have too दो that join us in a quiz contest। So let's get one last try and one last win and then crown
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Prove yourself as a legend of prediction.
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बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,,,पेज नंबर 399 पर्र,
yeh baat bilkul sai h bhay, naina ji starting say hi is kahani kee reader rahi haen, or vo kabhi bi aapko thes pahunchaane kaa nahii sochna sakti h, uss din unhone yeh baat kisi or hi intension say kaha thaa halanki arth kuchh or nikal gyaa,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 53 》
अब तक,,,,,,,,
"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहि हैं डियर। "अजय सिंह नें गहरी साॅस ली___"तुमने जोँ कुछ भि किया उसमें केवल तुमहारी अपने पति केँ प्रति चिंता व फिक्र थि। ख़ैरअब जौ हौ गय़ा सो हौ गय़ा मगरअब हमें बड़ी हि होशियारी औऱ सतर्कता सें काम लेना होगा। तुम् उन्हें यह नहि बताओगी कि कल तुमने उन्हें किसवजह हे मोबाइल किया थां बल्कि यही कहोगी कि तुम्हें उनकी बहोत याद आँ रही थि। दूसरी बात शिवा कों भि समझादो कि वोँ उनके सामने ऐसीकोई भि बात नं करे जिससे किसी भि तरह कि बात खुलने कां चाॅसबन जाए। "
"हमारी दूसरी बेटी नीलम भि तौ आज आँ गई हैं मुम्बई सें। " प्रतिमा नें कहा___"इतना हि नहि उसकेसंग मे मेरी बेहन कि बेटी सोनम भि हैं। "
"क्याँ????" अजय सिंह चौंका।
"हाॅअजय। " प्रतिमा नें बेचैनी सें कहा___"वोँ दोनोऊपर कमरे मे इससमय सोरही हें। "
"अरे तौ तुम् उनकेपास जाओ। "अजय सिंह एकदम सें फिक्रमंद हौ उठा थां, बोला___"औऱ उन दोनो कों अच्छी तरह समझादो कि वोँ दोनो अपने नानाजी जी केँ सामने हालातों केँ संबंध मे किसी भि तरह कि कोईबात नहि करेंगी। "
"ठीक हैं। " प्रतिमा नें सोफे सें उठतेहुए कहा___"मे अभि जातीहूॅ उनकेपास औऱ सभीकुछ समझाती हूॅ उन्हें। "
यहकहकर प्रतिमा तेज़ तेज़ क़दमों केँ संगऊपर केँ कमरे मे जाने केँ लिए सीढ़ियों कि तरफबढ़ गई। जबकि उसके जाने केँ बादअजय सिंह एक् बाथ पुनः असहाय सां सोफे कि पिछली पुश्त सें पीठ टिकाकर पसर गय़ा थां। चेहरे पर्र चिंता व तकलीफ़ केँ भाव गर्दिश करतेहुए नज़र आँ रहे थें।
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अबआगे,,,,,,,,
उधर पुलिस वालों कि गाड़ी सें मे औऱ आदित्य भि सुरक्षित रितू दिदी केँ पास फार्महाउस पऱ पहुॅच गए थें। सारे रास्ते मे सारी बातों औऱ सारे हालातों केँ बारे मे बारीकी सें मनन करताआया थां। इसजंग मे मुझेदो ताकतों सें भिड़ना थां। एक् तोँ अपने ताऊ अजय सिंह सें औऱ दूसरा मंत्री सें। रितू दिदी नें मुझे मंत्री केँ संबंध मे सारी बातें बता दि थि। मे जानकर खुश थां कि रितू दिदी केँ पास मंत्री केँ खिलाफ़ ऐसे सबूत हें कि वोँ जब चाहेउस मंत्री औऱ उसके साथियों कों बीच चौराहे पऱ नंगा दौड़ने पऱ बिवशकर दें। इधर वहीहाल मेरा भि थां। मेरेपास भि अजय सिंह केँ खिलाफ़ ऐसे सबूत थें कि उन सबूतों केँ आधार पर्र अजय सिंहपलक झपकते हि कानून कि ऐसी गिरफ्त मे पहुॅच जाएगा जहाॅ सें बचकर निकलना उसीतरह नामुमकिन थां जैसे किसीनदी केँ दो किनारोउअं आपस मिलना नामुमकिन हि नहि असंभव होता हैं।
मेरेमन मे कभीकभी यह ख़याल भि आता थां कि इसखेल कों एक् समय मे समाप्त करदूॅ। यानी ग़ैर कानूनी धंधा करने औऱ अवैधगैर कानूनी ऐसा पदार्थ रखने केँ जुर्म मे अजय सिंह ऊम्रभर कां लिएजेल कि सलाखों केँ पीछेचला जाए जोँ पदार्थ किसी भि इंसान कि ज़िंदगी समाप्त करने केँ लिए बहुत थें। मगर मे ऐसा करना नहि चाहता थां बल्कि मे तोँ अजय सिंह कों स्वयं अपने हाथों सें ऐसी सज़ा देना चाहता थां कि वोँ मौत केँ लिए गिड़गिड़ाए मगरमौत उसे नसीब नं होँ सके।
मुझेइस बात कां भि एहसास थां कि आजभले हि मंत्री सच्चाई कों पूरीतरह नं जानता हौ मगरदेर सवेरउसे सभीकुछ पताचल हि जाएगा। वोँ चुप नहि बैठेगा बल्कि कुछ तौ ऐसा करेगा हि कि उसकेगले मे फॅसी हुई हड्डी निकलसके औऱ उसके बच्चे सही सलामत उसे वापसमिल सकें। मुझे एहसास थां कि यह दोनो हि ताकतें बहोत हि खतरनाक साबित हौ सकती हैं हमारे लिए। हम् अभि तक इसीलिए सेफरह सके थें क्योंकि हमनेखुल करतथा सामने आकरकोई काम नहि किया थां। बल्कि हरकाम दोनो ताकतों कि ग़ैर जानकारी मे एवंछुप कर किया थां। मगर हालात अधिकदिन तक ऐसे हि नहि बनेरह सकते थें। इसलिए इनसभी बातों पर्र विचार करके मुझे सबसे पहले अपनी सुरक्षा कां पुख्ता इंतजाम करना थां।
फार्महाउस पऱ हमें छोंड़ कर वोँ पुलिस केँ व्यक्ति वापसचले गए थें। रितू दिदी मुझे वापसआया देखकर बेहदखुश हौ गई थि। आदित्य तोँ सीधा कमरे कि तरफचला गय़ा थां जबकि मे औऱ कुछदेर वहीं ड्राइंगरूम मे बैठा सबसे बातें करतारहा। नैना फूफी नें मुझसे मुम्बई मे सबकाहाल चाल पूछा। उसकेबाद मे भि उठकर कमरे कि तरफबढ़ गय़ा।
कमरे केँ अटैच बाथरूम मे मे मस्त ठंडे पानी सें नहाया तोँ तबीयत हरी हौ गई। नहाकर मे टावेल लपेटे हि बाथरूम सें कमरे मे आँ गय़ा। जैसे हि मे कमरे मे आया तौ बेड पऱ आहिस्ता बैठी रितू दिदी पऱ मेरी नज़र पड़ी तोँ मे चौंका। दरअसल मे इस वक़्त केवल एक् टावेल मे हि थां। बाॅकी ऊपर कां समूचा शरीर नंगा हि थां मेरा। रितू दिदी केँ सामने इसतरह आँ जाने सें मुझे लज्जा सि महसूस हुइ।
"ओहो क्याँ बात हैं राज। " सहसा रितू दिदी कि चहकती हुई आवाज़ मेरे कानों सें टकराई___"क्याँ बाॅडी शाॅडी बनारखी हैं तुमने। ओहो सिक्स पैक भि हैं। पक्का जिम करते होगे तुम्, हैं नं?"
"हाॅ थोडा बहोत करताहूॅ दिदी। " मैने शर्माते हुएकहा।
"अरे तुम् शर्मा क्यूं रहे हौ राज?" रितू दिदी कां चौंका हुआ स्वर___"भला मुझसे किसबात कि शरम भइया? मे तौ तेरी बेहनहूॅ कोई ग़ैर लड़की नहि जिससे तुँ शरमाए। "
"पऱ दिदी। " मैने असहजभाव सें कहा___"मे कभी आपके सामने इस हालत मे नहि आया न्। इसलिए मुझे थोड़ी शरम आँ रही हैं। "
मेरीयह बातसुन कर रितू दिदी बेड सें उतरकर मेरे क़रीब आँ गई औऱ फिन मेरे चेहरे कों अपनी हॅथेलियों केँ बीच लेतेहुए कहा___"ओए यह क्याँ बात हुईँ भला? तुँ मेरा सबसे अच्छा औऱ सबसे हैण्डसम भइया हैं। तुम को मुझसे किसी भि तरह सें शरमाने कि याँ झिझकने कि ज़रूरत नहि हैं। तुम्हे पता हैं राज, अब तक मे ऐसे रिश्तों केँ बीच थि जोँ कहने कों तौ मेरे अपने थें मगरउन सब केँ अंदरपाप औऱ गंदगी भरी हुइ थि। ऐसे लोगों सें मेराकोई संबंध नहि हैं अब। दुनियाॅ मे मेराअगर कोई अपना हैं तोँ वोँ हैं तुँ। मेरी ज़िंदगी कां अब एक् हि मकसद हैं भइया औऱ वोँ हैं तेरेसंग ग़लत करने वालों सर्वनाश करना औऱ तुम्हे संसार कि हर खुशी देना। मेरादिल करता हैं कि मे तुझ पऱ कुर्बान हौ जाऊॅ मेरे भइया, फना होँ जाऊॅतुझ पऱ। "
"मुझेपता हैं दिदी। " मैने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"कि आप् मुझसे बहोत प्रेम करती हें। इसका सबसे बड़ा सबूतयही हैं कि आज आप् अपने हि माता पिता केँ खिलाफ़ होँ गई हें औऱ अपने माता पिता केँ सबसे बड़े दुश्मन कां संगदे रही हें। मुझेइस बात कि खुशी नहि हैं कि आपने मेरेलिए अपने माता पिता सें बगावत कि हैं बल्कि इसबात कि खुशी हैं कि मे जिस रितू दिदी सें बात करने केँ लिएअब तक तरसरहा थां वोँ आज मेरेपास हें। "
"काशयह सभी मे पहले हि सोच लेतीराज। " रितू दिदी एकदम सें दुखी होकर मुझसे लिपटगईं। फिन भारी स्वर मे बोलीं___"तोँ इतने सालों तक मे अपने भइया सें दूर न् रहती औऱ नां हि ऐसे हालात पैदा होते। "
"हालात तौ तब भि ऐसे हि पैदा होते दिदी। " मैने कहा___"क्योंकि इंसानों कि फितरत कभी नहि बदलती। वोँ अपनी फितरत सें मजबूर होकर पहले भि वही करता जोँ आजकररहा हैं। "
"माना कि मेरे पिता अपनी फितरत केँ चलतेवही सभी करते जोँ आजकररहे हें। " रितू दिदी नें कहा___"मगर मे तेरीबात कररही हूॅराज। तूँ मुझे पहले हि तौ मिल जाता न्? मेरीवजह सें तेरेदिल कों इतनी तक़लीफ तौ न् होती जितनी अब तक हुई थि। "
"कोईबात नहि दिदी। " मैने प्रेम सें कहा___"जौ गुज़र गय़ा उसेभूल जाइये औऱ आज कि बात करिये तथाआज केँ माहौल मे खुश रहिए। "
"तुँ संग हैं तोँ अब मे खुश हि रहूॅगी राज। " रितू दिदी नें मेरी ऑखों मे देखते हुए कहा___"तेरी पता हैं राज, इसके पहले मे कभी किसी लड़के केँ क़रीब नहि गई। पता नहि क्यूं पऱ मुझेहर लड़के सें एक् नफ़रत सि थि। आज केँ टाइम मे हर लड़का लड़की एक् दूसरे केँ जाने कितने क़रीब आँ जाते हें मगर मुझेइन सभी बातों सें बेहद चिढ़ थि। मगर विधी सें मिलने केँ बाद औऱ उसकी प्यार किस्सा सुनने केँ बाद मुझे एहसास हुआ कि आज भि ऐसेलोग हें जौ पाक़ इश्क करते हें औऱ एक् मिसाल बन जाते हें। मे बहोत खुश थि मेरे भइया कि ऐसा इंसान मेरा अपना भइया हि हैं औऱ फिन मुझे एहसास हुआ कि कितनी ग़लत थि मे जोँ तुम को बचपन सें हि ग़लत समझती आँ रही थि। बस उसकेबाद जब सबकुछ पताचला तौ तेरेलिए मेरे हृदय मे औऱ भि स्थान हौ गई भइया। मेरी अंतर्आत्मा सें बस एक् हि आवाज़ आती हैं औऱ वोँ यह कि अब तुझसे हि मेरीहर खुशी हैं औऱ दुख भि। "
"जौ होता हैं सभी अच्छे केँ लिए हि होता हैं दिदी। " मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज मेरी सबसे अच्छी दिदी मेरेपास हैं औऱ मुझे इतना प्रेम करती हैं। मे बता नहि सकता कि इसबात सें मे कितना खुशहूॅ दिदी। मेरा तौ मुम्बई जाने कां बिलकुल भि मन नहि थां। मगर सबको लेकर जानां भि ज़रूरी थां। मगर वहाॅ सें वापस आपकेपास आँ जाने केँ लिए मे उतावला हौ रहा थां। मुझेलग रहा थां कि मे पलक झपकते हि आपकेपास पहुॅच जाऊॅ। "
"ऐसी बातें मतकरराज। " रितू दिदी कि आवाज़ काॅप सि गई। वोँ मुझसे कस केँ लिपटगईं औऱ फिन बोलीं___"तुझे ही नहि पता कि तेरीऐसी बातों सें मे कितनी कमज़ोर होँ सकतीहूॅ। कहींऐसा न् हौ जाए कि मे तेरे बिना एक् समय भि रह न् पाऊॅ। "
"तोँ क्याँ हुआ दिदी?" मैंने कहा___"सभी कुछठीक होने केँ बाद हम् सभी एक् संग हि तौ रहेंगे। फिन आप् ऐसा क्यूं कहरही हें?"
"तुँ नहि समझेगा राज। " रितू दिदी नें सहसा बेचैनी सें पहलू बदला___"ख़ैर छोंड़ यहसभी। मे यहकहरही हूॅ कि विधी केँ माता पिता भि यहाॅ आँ गए हें। उनसे भि मिल लेना तुम्। "
"मे आपसे एक् ज़रूरी बात जानना चाहता हूॅ। " मैने दिदी सें कहा___"औऱ वोँ यह कि यह फार्महाउस आपकेपास केसे हैं?"
"यह फार्महाउस डैड नें मेरेनाम बहोत पहले हि कर दिया थां। " रितू दिदी नें कहा___"ऐसे हि दो फार्महाउस औऱ हें। एक् नीलम केँ लिए औऱ दूसरा शिवा केँ लिए। पऱ तूँ यह क्यूं पूछरहा हैं राज?"
"इसका मतलब। "राज कों झटका सां लगा थां___"इस फार्महाउस केँ बारे मे बड़े बापू जानते हें। जाने भि क्यूं नं आख़िर दिया तौ उन्होंने हि हैं आपको। इस लिएअब आप् यह भि जान लीजिए कि यहाॅ पऱ रहना भि हमारे लिए खतरे सें खाली नहि हैं। "
"क्याँ????" रितू दिदी भि बुरीतरह हिलगईं, कदाचित उन्हें भि अब तक इसबात कां एहसास नहि थां। लेकिन अब हौ गय़ा थां___"यह तोँ यकीनन सचकहा तूने। ओह माँ गाड मुझेइस बारे मे पहले हि सोच लेना चाहिए थां। सचमुच राज यहाॅ हममें सें कोई भि सुरक्षित नहि हैं। यह तौ अच्छा हुआ कि अभि तक डैड कां ध्यान फार्महाउस कि तरफ नहि गय़ा हैं। मगर इसमें अब ज़रा भि शक नहि कि बहोत जल्द उन्हें इस फार्महाउस कां ख़याल आँ सकता हैं। वोँ सोच सकते हें कि मे औऱ तुम् यहाॅ छुपे हौ सकते हें। अतः वोँ अवश्य इसकापता लगाएॅगे। अब क्याँ होगाराज?"
"फिक्र मत कीजिए। " मैने कहा___"सारे रास्ते मे यहीसोच रहा थां औऱ फिन मैने इसका बंदोबस्त भि किया हैं। "
"बंदोबस्त??" रितू दिदी हैरान।
"हाॅ दिदी। " मैने कहा___"इसका तोँ मुझे भि अंदाज़ा थां कि यह फार्महाउस आपकेपास बड़े पिताजी कि वजह सें हि आया होँ सकता हैं। इसलिए इसका ख़याल देर सवेर उन्हें आँ हि जाएगा। अतः मैने जल्दी हि अपने एक् मित्र कों मोबाइल किया। मेरा वोँ यार आजकल इंदौर मे हैं अपने माता पिता व भइया बेहन केँ संग। घऱ सें औऱ दौलत सें भि सम्पन्न हैं वोँ। उसके बापू इन्कमटैक्स केँ बड़े ऑफिसर हें तथा उसका बड़ा भइया पुलिस मे एसीपी हैं। गुनगुन सें क़रीब दस किलोमीटर पहले हि उसका गाॅव हैं रेवती। जहाॅ पऱ उसका बड़ा भारी पुश्तैनी घऱ हैं। लेकिन उसघऱ मे कोई नहि रहता हैं। घऱ कि देखरेख केँ लिए एक् दो केयरटेकर रखेहुए हें उसकेडैड नें। मैने अपनेउसी साथी सें बात कि थि तथा उसको सारी बातें भि बताई औऱ कहा कि कुछ वक़्त केँ लिए मुझे उसकेघऱ कि ज़रूरत हैं रहने केँ लिए। मेरी सारी बातें सुनकर उसने अपनी माॅम सें बात किया। उसकी माॅम मुझे अपने बेटे कि तरह हि चाहती थि। शेखर नें जब अपनीमाॅ सें मेरी सारी किस्सा बताई तोँ वोँ मेरेलिए चिंतित होँ गईं औऱ जल्दी हि उन्होंने कह दिया कि मुझेआज हि उनकेघऱ मे शिफ्ट होँ जानां चाहिए। उन्होंने घऱ केँ केयरटेकर कों मोबाइल करके मेरे बारे मे बता दिया हैं। एक् काम उन्होंने यह भि किया कि अपनी बेहन कों जौ कि रेवती मे हि रहती हें भि सूचित कर दिया हैं। उनसेकहा कि वोँ अपने पति कों किसीऐसे कार केँ संग मेरेपास भेजदें जिसमें हम् सभी औऱ हमारा सामान आहिस्ता आँ सके। "
"यह तोँ बहोत हि अच्छी बात हैं राज। " रितू दिदी नें खुश होकर मेरेगाल पऱ चुम्बन जड़ दिया___"तूने सचमुच बहोत हि कमाल कां औऱ होशियारी कां काम किया हैं। मगर एक् समस्या भि हैं। "
"कैसी समस्या दिदी?" मे चकराया।
"यही कि हम् सभी औऱ हमारा सामान वगैरह तौ यहाॅ सें वहाॅ शिफ्ट होँ जाएगा। " रितू दिदी नें कहा___"मगर हम् तहखाने मे मौजूद उस मंत्री केँ पिल्लों कों केसे लें जाएॅगे औऱ वहाॅ उन्हें केसे रखेंगे? यहाॅ तौ तहखाना थां जहाॅ पर्र मैनेउन सबकोकैद कियाहुआ हैं जबकि वहाॅ पऱ ऐसाकोई तहखाना नहि होँ सकता। "
"कोई ज़रूरी तोँ नहि कि उन सबको तहखाने मे हि रखाजाए। " मैने कहा___"हम् उन लोगों कों किसी कमरे मे भि वैसे हि बाधकर रख सकते हें। बसइसबात कां ख़याल रखना होगा कि वोँ चीख चिल्ला नं सकें। वरना उनकी आवाज़ सें बाहरी लोगों कों पता भि लग सकता हैं। "
"हाॅयह भि सही हैं। " रितू दिदी नें कहा___"औऱ हाॅ हरिया काका औऱ शंकर काका भि हमारे संग हि जाएॅगे। वोँ बेचारे मुझे अपनी बेटी कि तरह हि चाहते हें। मेरेलिए वोँ कुछ भि कर सकते हें। वोँ दोनो अच्छे इंसान हैं राज। यहाॅ पऱ उन्हें अकेले छोंड़ चले जानां कतई उचित नहि हैं। "
"ठीक हैं दिदी। " मैने कहा___"हम् उन्हें भि संग लें चलेंगे। मगर यहाॅ सें चलने कि जल्दी तैयारी कीजिए। मेरे साथी शेखर कां कभी भि मोबाइल आँ सकता हैं यह बताने केँ लिए कि उसके मौसा गाड़ी लेकर हमारे पास पहुॅचने हि वाले हें। "
"क्याँ हमेंआज हि यहाॅ सें निकलना होगा?" रितू दिदी नें हैरानी सें कहा थां।
"बिलकुल दिदी। " मैने कहा___"हम् एक् समय कि भि देरी नहि कर सकते। बड़े पिताजी कां कुछपता नहि कि उनकेमन मे किस लम्हा इस फार्महाउस कां ख़याल आँ जाए औऱ वोँ जल्दी हम् सबकापता लगाने केँ लिए यहाॅ आँ धमकें। इसलिए बेहतर यही हैं कि उनके यहाॅ धमकने सें पहले हि हम् लोग यहाॅ सें कूचकर जाएॅ। "
"सही कहरहा हैं तूँ। " रितू दिदी नें हालात कि गंभीरता कों समझते हुए कहा___"टाइम औऱ हालात कां कोई भरोसा नहि कियाजा सकता। "
"ठीक हैं दिदी। " मैने कहा___"अब आप् जाइये औऱ सबकोबता दीजिए। मे भि कपड़े पहनकर आताहूॅ हाथ बटाने। "
"चलठीक हैं। " दिदी नें कहा औऱ जल्दी हि कमरे सें बाहर् निकलगईं। उनके जाने केँ बाद मैने भि आनन फानन मे कपड़े पहने। तभी मेराआई मोबाइल बजा। (यहाॅ पऱ मे आप् सबको(खास कर नैनाजी कों) यहबता दूॅ कि आई मोबाइल केवल रितू दिदी केँ पास हि नहि थां बल्कि मेरे औऱ गुड़िया (निधी) केँ पास भि हैं)
मैनेफोन उठाकर देखा तोँ शेखर कां हि काल थां। मैने जल्दी हि काल रिसीव करफोन कों कान सें लगा लिया। उधर सें शेखर नें बताया कि उसके मौसाकुछ ऐसे आदमियों कों भि संग मे लेकर आँ रहे जोँ तुम् सबकी सुरक्षा कां भि ख़याल रखेंगे। मे उसकीबात सुनकर मुस्कुराया औऱ उसे इसकेलिए शुक्रिया दिया। उसने बताया कि दस सें बीस मिनट केँ बीच उसके मौसा मेरेपास पहुॅच जाएॅगे। उसकेबाद कालकट होँ गई।
मे जल्दी हि कमरे सें निकलकर नीचेआया औऱ सबकेसंग सामान कों इकट्ठा करउसे पैक करवाने लगा। मैने आदित्य सें कहा कि वोँ हरिया काका कों भि इसबात कां बतादे औऱ उससेकहे कि वोँ तहखाने सें उन चारों पिल्लों कों तथा मंत्री कि बेटी कों बेहोश कर तहखाने सें बाहर् निकालने कि तैयारी करें। मेरीबात सुनकर आदित्य जल्दी हि हरिया काका केँ पासचला गय़ा। इधर नैना फूफी तथा विधी केँ माता पिता भि सारे सामान कों पैक करने मे लगेहुए थें। रितू दिदी नें बताया कि पवन कां सामान भि पैकरखा हुआ हैं जिसेसंग हि यहाॅ सें लें चलना हैं।
करीबबीस मिनटबाद हि दो इनोवा वाहनतथा उसके पीछे एक् टैम्पो फार्महाउस मे दाखिल हुए। मे यहदेख कर हैरान रह गय़ा कि इतने सारेकार शेखर नें भेजवा दिये थें। कदाचित उसे अंदाज़ा थां कि सबको लाने मे इतने हि वाहनों कि ज़रूरत पड़ सकती थि। टैम्पो मे सारा सामान औऱ दोनो कारों मे हम् सभीलोग बैठकर आहिस्ता यहाॅ सें जा सकता थें। ख़ैर सामान तोँ पैक हौ हि चुका थां। अतः मे औऱ आदित्य जल्द जल्द सारे सामान कों टैम्पो मे लोड करनेलगे। इसकाम मे मौसा केँ संगआए हुएचार पाॅच व्यक्ति भि लगगए। कुछ हि देर मे सारा सामान टैम्पो मे लोड हौ गय़ा।
हरिया काका औऱ शंकर काका नें उन चारों पिल्लों औऱ उस पिल्ली कों भि टैम्पो मे हि ठूॅस दिया औऱ स्वयं भि उसी टैम्पो मे चढ़गए। मौसा केँ तीन व्यक्ति भि टैम्पो मे चढ़गए। टैम्पो कां पिछला फटकालगा करऊपर सें मोटी तिरपाल कों ढॅक दिया गय़ा। जिससे अंदर कां कुछ भि देखा नहि जा सकता थां।
उसकेबाद मैने विधी केँ माता पिता, नैना फूफी, तथा बिंदिया काकी कों एक् इनोवा मे बैठा दिया। उस इनोवा मे मौसा कां एक् व्यक्ति भि आगे कि शीट पऱ हाॅथ मे बंदूख लिएबैठ गय़ा। दूसरी इनोवा मे मे आदित्य औऱ रितू दिदी बैठगए। आगे कि शीट पर्र आख़िरी बचा बंदूकधारी भि बैठ गय़ा। उसकेबाद सारा क़ाफिला चल दिया वहाॅ सें। इसके पहले हमने अच्छी तरह सें चेककर लिया थां कि हमारी कोईऐसी चीज़ तोँ नहि छूट गई जौ ज़रूरी होँ।
रितू दिदी नें रास्ते मे किसी कों मोबाइल लगाया औऱ उससेकहा कि उसके फार्महाउस सें पुलिस जिप्सी अपनेसंग लेँ जाकर थाने मे खड़ाकर दें। फार्महाउस मे एक् औऱ जीप थि जोँ कि अजय सिंह कि हि थि उसे वहीं खड़े रहने दिया थां। करीब-करीब आधा घंटेबाद हम् रेवती पहुॅच गए। इसबीच रास्ते मे हमें इक्का दुक्का कार तौ मिलेमगर उनमें कोई मंत्री याँ अजय सिंह कां व्यक्ति नहि थां। रेवती मे शेखर केँ घर-मकान केँ सामने हि हमारा क़ाफिला रुका। घऱ केँ बाहर् हि दो केयरटेकर खड़े दिखे। वाहनों केँ रुकते हि वोँ हमारे पास आँ गए।
हम् सभी वाहनों सें उतरकर बाहर् आए तौ वोँ दोनो केयर टेकर हमेंघऱ केँ अंदर कि तरफ लेँ गए। मे औऱ आदित्य बाहर् हि थें। टैम्पो सें पहलेउन पाॅचों कैदियों कों निकाल करघऱ केँ अंदर एक् ऐसे कमरे मे लेँ आए जोँ सबसेअलग औऱ आख़िर मे थां। उसकेबाद हम् सबनेमिल कर टैम्पो सें सारा सामान उतारकर अंदर लेँ गए। उन बंदूखधारियों हमारी बड़ी सहायता कि।
शेखर केँ मौसा, जिनका नाम केशव शर्मा थां वोँ बड़े हि खुशदिल इंसान थें। मुझे उनका नेचर बड़ा मनपसंद आया थां। वोँ अंत तक हमारे पास हि रहे औऱ हमारी हर ब्यवस्था केँ बारे मे देखते सुनते रहेतथा हमारी हर ज़रूरों कि लिस्ट बनाते रहे। दरअसल यहाॅ रहता तौ कोई थां नहि। दो केयरटेकर थें जोँ कि घऱ सें अलग एक् तरफबने सर्वेन्ट क्वार्टर मे रहते थें। वोँ सारादिन सारे सामान कों जमाने मे औऱ रखने मे चला गय़ा। इसबीच शेखर कि माॅम सुगंधा ऑटी कां मोबाइल भि आया थां। उन्होंने मुझसे बड़े प्रेम सें बात कि औऱ यह भि कहा कि मे यहाॅ पर्र किसी भि चीज़ केँ लिए संकोच नं करूॅ। यह घऱ अपना हि हैं औऱ हर चीज़ कां उपयोग बड़ेशौक सें कर सकते हें हम्। मे सुगंधा ऑटी सें बात करके मुतमईन हौ गय़ा थां औऱ खुश भि। उसकेबाद मे औऱ आदित्य मौसाजी केँ संग मार्केट चलेगए। जहाॅ सें हमें खाने-पीने पानीतथा औऱ भि कई सारी चीज़ें लेनी थि। मौसाजी नें कहा कि गैस सिलेण्डर वोँ अपने यहाॅ सें हमेदे देंगे।
सारी ब्यवस्था औऱ सभीकुछ सही करवाने केँ बाद मौसाजी यहकहकर अपनेघऱ चलेगए कि हमेंजब भि किसी चीज़ कि ज़रूरत पड़े तोँ हम् बेझिझक उनसे मोबाइल बता सकते हें। उन्होंने कहा कि वोँ बीचबीच मे आते रहेंगे हालचाल केँ लिए। मौसाजी कां घऱ रेवती मे हि थां लेकिन मुख्य मार्ग केँ पीछे थां। पैदलचल कर जाने मे करीबदस मिनट सें भि कम कां वक्त लगता थां।
शेखर कां यहघऱदो मंजिला थां तथा बहुत बड़ा थां। आज केँ टाइम कां बनायह घऱवेल डेकोरेटेड थां। अंदर सें ऐसा लगता थां जैसेकोई बॅगला होँ। हलाॅकि मुम्बई वाले मेरे बॅगले केँ मुकाबले यहकुछ भि नहि थां। होता भि केसेउस बॅगले कि कीमत भि तोँ डेढ़सौ करोड़ रुपये थि। ख़ैररात हौ चुकी थि इनसभी कामों मे। अतः बिंदिया काकी नें अपनी किचन सम्हाल ली थि। उनकी सहायता केँ लिए नैना फूफी भि संग थि। विधी कि माॅ भि खानां बनाने मे सहायता करना चाहती थि मगर नैना फूफी नें साफकह दिया थां कि वोँ बस आराम करें। उन्हें यहाॅ पऱ कोईकाम करने कि ज़रूरत नहि हैं।
रात कां डिनर करने केँ बाद हम् सभी अपने अपनेरूम मे सोने केँ लिएचल दिये। विधी केँ माता पिता ग्राउण्ड फ्लोर पऱ हि बने कमरे कों चुना थां अतः वोँ उसी कमरे मे चलेगए। नीचेतीन कमरे औऱ भि थें। जिनमे सें एक् पर्र हरिया काकाव बिंदिया काकीतथा दूसरे पऱ शंकर काका सोने केँ लिएचले गए। जबकि ऊपर केँ रूम मे मे आदित्य नैना फूफी व रितू दिदी चलेगए।
इनसभी कामों सें हम् सभी बहुतथक चुके थें अतःबेड पर्र लेटते हि नींद कों आन् हि थां। लेकिन मुझे नींद नहि आँ रही थि। मेरेमन मे कई सारी बातें चलरही थि। फार्महाउस सें यहाॅ शिफ्ट हौ जाने सें अब किसी कां ख़तरा नहि थां। बल्कि अब तोँ खुलकर हम् कोईकाम कर सकते थें। मे यहसभी सोच हि रहा थां कि सहसा मुझेऐसा लगा जैसे दरवाजे पऱ बाहर् सें किसी नें दस्तक दि होँ। मे यह सोचते हुएबेड सें उठकर दरवाजे कि तरफचल दिया कि इस वक़्त कौन होँ सकता हैं?
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उधर हवेली मे प्रतिमा कां बाप वअजय सिंह कां ससुरजी जगमोहन सिंहउस वक़्त हवेली पहुॅचा जबअजय सिंह फ्रेश होने केँ बाद खानां खाने केँ लिए डायनिंग टेबल केँ चारोतरफ लगी कुर्सियों मे सें मुख्य कुर्सी पऱ बैठा थां। जगमोहन सिंह कों हवेली केँ बाहर् तैनात अजय सिंह कां एक् व्यक्ति अंदर लेकरआया थां।
अपने ससुरजी कों आज वर्षों बाददेख करअजय सिंह जल्दी हि अपनी कुर्सी सें उठकर जगमोहन कि तरफ बढ़ा औऱ उसके पांवछू कर आशीर्वाद लिया। अभि अजय सिंह अपने ससुरजी केँ पाॅवछू कर खड़ा हि हुआ थां कि तभी प्रतिमा भि किचेन सें हाॅथ मे थालीलिए आई। प्रतिमा कि नज़रजब अपने पिता पऱ पड़ी तोँ वोँ एकदम सें मानोबुत बन गई। बहुतदेर बाद उसकी तंद्रा तब टूटीजब अजय सिंह नें उससेकहा कि देखो प्रतिमा बापूजी आँ गए।
हाॅथ मे ली हुइ थाली कों प्रतिमा नें डायनिंग टेबल पऱ रखा औऱ फिनभाग कर जगमोहन कि तरफ बढ़ी औऱ अपने पिता केँ गले सें लग गई। भावनाओं औऱ जज़्बातों नें मानो प्रबल रूप धारणकर लिया जिसके प्रभाव सें उसकी ऑखों सें ऑसूझर झर करके बहनेलगे थें। प्रतिमा अपने पिता केँ सीने सें छुपकी ज़ार ज़ार रोयेजा रही थि। जगमोहन स्वयं भि बेहद ग़मगीन होँ गय़ा थां औऱ हौ भि क्यूं नं आख़िर प्रतिमा उसकी लाडली बेटी जौ थि। अपनी बेटी कों अपने कलेजे सें लगाए जगमोहन कों आज असीमसुख शान्ति मिलरही थि। वर्षों सें उसके अंदर दर्द सें भरी हुई टीसकम हौ गई थि।
कितनी हि देर तक प्रतिमा अपने पिता केँ गलेलगी रही उसकेबाद जब उसके अंदर कां गुबार समाप्त हुआ तोँ वोँ अपने पिता सें अलग हुइ औऱ अपने पिता सें उनकाहाल चाल पूछने लगी। कुछ देरबाद अजय सिंह नें प्रतिमा औऱ अपने ससुरजी सें कहा कि वोँ फ्रेश होँ लें ताकि हम् संग मे बैठकर हि खानां खाएॅ। अजय सिंह कि बात पर्र जगमोहन सिंह बोले कि वोँ बेटी केँ घऱ कां अन्न केसेखा सकते हें? इस पर्र अजय सिंह नें हॅसते हुएकहा कि पिताजी जी आप् भि क्याँ बाबाआदम केँ रीति रिवाज लिए बैठे हें। आज केँ वक्त केँ सबसे बड़े वकील होतेहुए भि ऐसीबात करते हें। आख़िर अपने दामाद औऱ बेटी केँ बारबार कहने पर्र जगमोहन सिंह कों अजय सिंह केँ संगबैठ कर खानां हि पड़ा।
खानां खाने केँ बाद ससुरजी दामाद केँ बीचढेर सारी बातें हुईं उसकेबाद अजय सिंह प्रतिमा कों बताकर अपनी फैक्ट्री केँ लिए निकल गय़ा। बहुतदिन सें फैक्ट्री नहि गय़ा थां वो। वैसे भि वोँ चाहता थां कि वर्षों केँ बाद बाप बेटी मिले हें तोँ वोँ फ्री होकर एक् दूसरे सें बातें करें। अजय सिंह प्रतिमा कों किनारे पऱ बुलाकर उससे एक् बार पुनःयह कहा कि वोँ याँ कोई भि जगमोहन जी सें हमारे हालातों केँ संबंध मे कोईबात नं करे। सभी कुछ समझा बुझाकर अजय सिंह हवेली सें बाहर् आँ गय़ा।
बाहर् आते हि उसे शिवाइस तरफ हि आता दिखाई दिया। अजय सिंहउसे देखकर ठिठक गय़ा। अपनी हि धुन मे मस्ती सें आताहुआ शिवा अपने बाप कों देखकर हैरान रह गय़ा औऱ फिन एकदम सें झपटकर उसकेगला लग गय़ा।
"ओहडैड आप् आँ गए। " शिवा खुशी सें झूमता हुआ बोला थां।
"मे तोँ आँ हि गय़ा बर्खुरदार। " अजय सिंह नें मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम् इस वक़्त कहाॅ सें इसतरह मस्ती मे डूबेचले आँ रहे थें?"
"वोँ मे गेस्टहाउस कि तरफ सें आँ रहा थां डैड। " शिवा नें कहा___"दरअसल आपके बिजनेस संबंधी दोस्तों नें अपने व्यक्ति हमारी सहायता केँ लिए यहाॅभेज गए थें। इसलिए मे उन्हीं केँ पास बैठाहुआ थां। माॅम नें कहा थां कि उन्हें किसी चीज़ कि ज़रूरत होँ तोँ उन सबका ख़याल रखूॅ। "
"ओह आई सि। " अजय सिंह आदमियों कां सुनकर सहसा चौंक पड़ा थां फिन बोला___"चलो यह तौ बहोत अच्छी बात हैं बेटे। मुझे खुशी हुई कि तुम् अपनी जिम्मेदारियों कों समझने लगे हौ। ख़ैर मे यहकहरहा हूॅ कि आज तुम्हारे नानाजी जीआएहुए हें इसलिए तुम् याँ कोई भि उनके सामने हमारे हालातों केँ संबंध मे कोई भि बात नहि करोगे। औऱ हाॅ, तुम् भि ज़रा सम्हल कर उनसेबात करना। वोँ बहोत हि जहीन इंसान हें। इंसान कों पहचानने मे उन्हें ज़रा भि वक़्त नहि लगेगा। अतःसोच समझकर औऱ होशियारी सें उनके सामने जानां। ऐसा न् हौ कि तुम्हारे हावभाव सें उन्हें ऐसा प्रतीत हौ जाए कि तुम् किस टाइप केँ लड़के हौ? तुम् समझरहे हौ न् कि मे क्याँ कहना चाहता हूॅ?"
"डोन्ट वरीडैड। " शिवा नें कहा___"मेरी वजह सें नानाजी जी कों कुछ औऱ सोचने कां मौका हि नहि मिलेगा औऱ नं हि उन्हें हमारे हालातों कां कुछपता चलेगा। "
"गुड ब्वाय। " अजय सिंह मुस्कुराया___"अब जाओ तुम्। मे भि ज़राउन आदमियों सें मिललूॅ, उसकेबाद मुझे थोड़ी देर केँ लिए फैक्ट्री भि जानां हैं। "
"ओकेबाय डैड। "यह कहकर शिवा हवेली केँ अंदर कि तरफबढ़ गय़ा।
शिवा कां जाने केँ बादअजय सिंह भि गेस्ट हाउस कि तरफचल दिया। अभि वोँ कुछ क़दम हि चला थां कि सहसा पीछे सें उसे प्रतिमा कि आवाज़ सुनाई दि। उसनेपलट कर देखा तौ प्रतिमा हवेली केँ मुख्य दरवाजे पऱ खड़ी थि। अजय सिंह केँ पलटते हि प्रतिमा नें उसे बताया कि लैण्डलाइन मोबाइल पऱ किसी कां कालआया हुआ हैं औऱ वोँ उससेबात करना चाहता हैं। प्रतिमा कि बातसुन करअजय सिंह वापस हवेली केँ अंदर कि तरफचल दिया। उसे यादआया कि उसकेफोन पऱ तौ सिम कार्ड हैं हि नहि।
"हैलो। " अपने कमरे मे रखे लैण्डलाइन मोबाइल केँ रिसीवर कों कान सें लगाते हि अजय सिंह नें अपनी आवाज़ कों प्रतभावशाली बनाते हुएकहा थां।
"ठाकुर। " उधर सें किसी कि स्पष्ट आवाज़ उभरी__"हम् इस प्रदेश केँ मंत्री दिवाकर चौधरी बोलरहे हें। "
"म.मंत्री???" अजय सिंहउधर ईआ वाक्य सुनकर बुरीतरह चौंका थां, फिन लरजते हुए स्वर मे बोला____"क्याँ सच मे आप् मंत्री जी हि बोलरहे हें?"
"हाॅ ठाकुर। " उधर सें दिवाकर चौधरी नें खास अंदाज़ मे कहा___"क्याँ तुम्हें हमारे मंत्री होने पऱ शक़ हैं?"
"नं.न्.नहि नहि मंत्री जी। "अजय सिंह बुरीतरह सकपकाया___"म मे तोँ बसइसलिए ऐसाकह गय़ा क्योंकि मुझे उम्मीद हि नहि थि कि प्रदेश कि इतनी बड़ी पर्सनैलिटी कां मोबाइल मेरेपास आँ सकता हैं। मे तौ यहसोच सोचकर हैरान हूॅ कि भला मुझसे मंत्री जी कां क्याँ काम होँ सकता हैं जिसके तहत आपने मुझे मोबाइल किया हैं। "
"कुछ तोँ खासवजह होगी हि ठाकुर। " उधर सें दिवाकर चौधरी नें कहा___"वरना इस फानी दुनियाॅ मे बेमतलब कोई भि किसी कों याद नहि करता। "
"हाॅ यहबात तोँ बिलकुल सच हैं मंत्री जी। "अजय सिंह केँ दिमाग़ केँ घोड़े बड़ी तेज़ी सें यहपता लगाने केँ लिए दौड़रहे थें कि मंत्री नें उसेकिस वजह सें मोबाइल किया होँ सकता हैं? लेकिन प्रत्यक्ष मे बोला___"आज केँ टाइम मे हर इंसान मतलबी बन चुका हैं। ख़ैर आप् बताइये मेरेलिए क्याँ आदेश हैं आपका?"
"दोस्तों कों आदेश नहि देते ठाकुर। " उधर सें चौधरी नें कहा___"बल्कि साफ शब्दों मे कह दिया जाता हैं जोँ कहना होता हैं। ख़ैर हम् यहकहरहे हैं कि हम् तुमसे मिलना चाहते हें। मिलने केँ बाद हि तसल्ली सें हमारे बीचबात चीत होगी औऱ यह भि कि वोँ खासवजह क्याँ हैं जिसके तहत हमने तुम्हें मोबाइल किया हैं?"
"जैसा आप् कहें मंत्री जी। "अजय सिंह मंत्री केँ मुख सें दोस्तों शब्दसुन कर सोचने पऱ मजबूर होँ गय़ा थां। हलाॅकि मंत्री कां उसे मोबाइल करना मौजूदा हालात केँ हिसाब सें उसकेलिए कहीं नं कहीं राहत औऱ खुशी कि बात थि। उसे भि पता थां कि मंत्री दिवाकर चौधरी क्याँ चीज़ हैं। फिन बोला___"बताइये मुझेकब औऱ कहाॅ मिलने आनां होगा आपसे?"
"वैसे टाइम तोँ अभि भि हैं ठाकुर। " उधर सें मंत्री नें कहा___"क्योंकि अभि साम भि नहि हुईँ हैं। इसलिए चाहो तौ अभि हमारे यहाॅ आँ सकते होँ। इससमय हम् गुनगुन मे हि अपने आवास पर्र मौजूद हें। लेकिन अगर तुम्हारे पासइस वक़्त वक्त नहि हैं तोँ कोईबात नहि कल सुभह आँ जानां। हमेंकोई तकलीफ़ नहि हैं। "
"यह कैसीबात कररहे हें मंत्री जी?"अजय सिंह नें चापलूसी वाले अंदाज़ सें कहा___"आप् मुझे अपनासमझ कर इतनी इज्ज़त सें बुलाएॅ औऱ मे तत्काल नं आऊॅऐसा केसे हौ सकता हैं भला? मे तोँ अपने सारे ज़रूरी काम छोंड़ कर आपकेपास हि दौड़ा चला आऊॅगा चौधरी साहब। बस कुछदेर तक इंतजार कर लीजिए। मे जल्दी हि अपने गाॅव हल्दीपुर सें गुनगुन मे आपके आवास पऱ आने केँ लिए निकलरहा हूॅ। "
"ओके हम् इन्तज़ार कररहे हें ठाकुर। " उधर सें मंत्री नें कहा___"तुम् हमारे यार कि तरह हि हौ इसलिए अपने साथी कां वैलकम भि हम् शानदार तरीके सें हि करेंगे। "
"यह तौ मेरी खुशनसीबी हैं मंत्री जी। "अजय सिंह एकदम सें खुश होतेहुए बोला___"जोँ आप् मुझे अपनायार कहरहे हें वरना मेरी आपके सामने भला क्याँ औकात?"
"ऐसी कोईबात नहि हैं ठाकुर। " मंत्री नें कहा___"हर इंसान अपनी स्थान पर्र औकात वाला हि होता हैं। तुम् भि अपनी स्थान किसी सें कम नहि हौ। हमेंसभी पता हैं तुम्हारे बारे मे। ख़ैर छोंड़ो यहसभी। आओफिन मिलकर हि बाॅकी बातें होंगी। "
"जीठीक हैं चौधरी साहब। "अजय सिंह केँ ऐसा कहते हि उधर सें कालकट गई।
रिसीवर कों हाॅथ मे पकड़े अजय सिंह किसीबुत कि मानिंद खड़रह गय़ा थां। उसकी ऑखेंऐसी चमकने लगी थि जैसे उसकी ऑखों केँ अंदर हज़ारों वाट केँ बल्ब एकाएक हि रौशन हौ उठे थें। चेहरे पर्र खुशीसाफ झलकरही थि। कुछदेर तक अजय सिंहइसी तरह रिसीवर हाॅथ मे खड़ारहा फिन जैसेउसे होशआया। उसने मुस्कुरा कर रिसीवर कों वापस केड्रिल पर्र रखा औऱ फिन कमरे मे हि एक् तरफरखी आलमारी कि तरफबढ़ चला।
आलमारी सें उसने अपने सबसे अच्छे औऱ सबसे कीमती कपड़े निकाले। अपनेबदन पऱ पहले सें हि पहनेहुए कपड़ों कों निकाला उसने औऱ फिनउन कपड़ों कों पहनना शुरुआत किया जिन्हें उसने आलमारी सें निकाला थां। उसके चेहरे पर्र इस टाइम एक् अलग हि चमकदिख रही थि। ख़ैरकुछ हि देर मे वो कपड़ों कों पहनकर एक् तरफ दीवार सें सटे आदमकद आईने केँ सामने आया औऱ उसमें स्वयं कों देखने लगा। कीमती कोट पैन्ट मे इससमय वोँ बहुतजॅच रहा थां औऱ लग भि रहा थां कि वोँ कोई बहोत बड़ा व्यक्ति हैं। सभीकुछ ठीकठाक करने केँ बाद वोँ मुस्कुराते हुए हि कमरे सें बाहर् कि तरफचल दिया।
ड्राइंगरूम मे बैठे जगमोहन सिंह, प्रतिमा व शिवा कि नज़र जैसे हि अजय सिंह पऱ पड़ी तौ जगमोहन सिंह कों छोंड़ कर प्रतिमा व शिवा केँ चेहरे पर्र हैरानी केँ भाव उभरे। जबकि जगमोहन सिंह केँ चेहरे पऱ यहसोच कर खुशी केँ भाव उभरे कि उसका दामाद वाकई मे एक् पर्सनैलिटी वालातथा प्रभावशाली ब्यक्तित्व रखने वाला इंसान हैं। उसे पहलीबार लगा कि उसकी बेटी नें अपने पति केँ रूप मे ग़लत चुनाव नहि किया थां। यहाॅआने केँ बाद उसने इतनी बड़ी हवेली औऱ अंदर बाहर् इतने सारे नौकर चाकर देखे तोँ उसेसमझ आँ गय़ा थां कि उसका दामाद वास्तव मे कोईऐरा ग़ैरा नहि थां। बल्कि इस गाॅव कां राजा थां वोँ।
"प्रतिमा मे ज़रा मंत्री जी केँ पासजा रहाहूॅ। " अजय सिंह नें यहबात कुछइस अंदाज़ सें कही थि कि सोफे पर्र बैठे जगमोहन सिंह पर्र अपना एक् खासअसर डालसके औऱ ऐसाहुआ भि। जबकि अजय सिंह बोला___"अभि उन्हीं कां मोबाइल आयाहुआ थां। उन्होने मुझे किसी ज़रूरी काम सें याद किया हैं। अतः हौ सकता हैं कि मुझे वापसआने मे देर हौ जाए तौ तुम् पिताजी जी कां अच्छे सें ख़याल रखना। "
"ठीक हैं आप् जाइये। " प्रतिमा नें अपने पिता कि मौजूदगी मे अजय सिंह सें आप् कहकरबात कि, बोलीं___"मे पिताजी कां बहोत अच्छे सें ख़याल रखूॅगी। "
"इसमें ख़याल रखने कि क्याँ बात हैं बेटा?" सहसा जगमोहन सिंह नें मुस्कुराते हुए कहा___"यह तौ मेरा भि अपना हि घऱ हैं। अगर किसी चीज़ कि ज़रूरत हुइ तौ मे स्वयं हि लें लूॅगा। क्यूं बेटी?"
"जी आपने बिलकुल ठीककहा बापू। " प्रतिमा नें खुशी सें मुस्कुराते हुऐकहा।
"फिन तोँ ठीक हैं बापू। "अजय सिंह भि मुस्कुराया__"मुझे आपकीयह बात बहोत अच्छी लगी। ख़ैर मे जल्द वापसआने कि कोशिश करूॅगा औऱ फिन आपसेढेर सारी बातें होंगी। अच्छा अब चलताहूॅ। "
अजय सिंह केँ कहने पऱ जगमोहन सिंह नें हाॅ मे सिर हिलाया जबकि अजय सिंह जल्दी हि हवेली सें बाहर् कि तरफबढ़ चला। उसकेमन मे इस टाइम मंत्री सें मिलने कि बड़ी ब्याकुलता पैदा होँ गई थि। उसे अभि भि यकीन नहि हौ रहा थां कि प्रदेश कां मंत्री उसे साथीमान कर उससे मिलना चाहता हैं। मंत्री सें संबंध होना उसकेलिए कितना फायदेमंद हौ सकता थां इसका बखूबी अंदाज़ा थां उसे। इसी लिए तौ वोँ जल्द सें जल्द मंत्री केँ पास पहुॅच जानां चाहता थां।
बाहर् एक् तरफ खड़ी अपनी मर्सडीज गाड़ी केँ पास पहुॅच कर उसने वाहन कां दरवाजा खोला औऱ ड्राइंविंग शीट पर्र बैठ गय़ा। कुछ हि पलों मे उसकी वाहन गुनगुन केँ लिए रवाना हौ गई थि।
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उधर गुनगुन मे अपने आवास पऱ मंत्री दिवाकर चौधरी अपनेदो दोस्तों औऱ एक् रखैल साथी यानी सुनीता केँ संग ड्राइंग रूम मे रखे सोफे पऱ बैठा थां। इससमय ड्राइंग रूम मे इन चारों केँ अलावा औऱ कोई नहि थां। मंत्री केँ सुरक्षा गार्ड सभी बाहर् हि तैनात थें।
"वैसे आपको क्याँ लगता हैं चौधरी साहब। " सहसा अशोक मेहरा कह उठा___"वोँ ठाकुर हमारी इस मामले मे क्याँ मददकर सकता हैं? जबकि उसकी स्वयं कि बेटी हि उसके खिलाफ़ हैं। "
"इन्हीं सभी चीज़ों केँ बारे मे तोँ जानना हैं अशोक। " मंत्री नें सोचते हुए कहा___"मुझे लगता हैं कि इस मामले सें जुड़ी हर चीज़ ठाकुर कों क्राॅस करती हैं। हमनेयह तौ समझ लिया कि हमारे मामले जौ होँ रहा हैं वोँ कौन औऱ क्यूं कररहा हैं मगर हम् यह भि जानना चाहते हें कि जोँ हमारा दुश्मन हैं उसने याँ उसकीमाॅ बेहन नें ऐसा क्याँ किया थां जिसकी वजह सें ठाकुर नें उन तीनों कों हवेली सें हि नहि बल्कि सारी ज़मीन जायदाद सें भि बेदखल कर दिया हैं? सबसे महत्वपूर्ण बात हमेंयह भि जानना हैं कि ऐसा क्याँ हुआ हैं जिसके तहत ठाकुर कि अपनी बेटी स्वयं अपने हि माॅ बाप केँ खिलाफ़ होँ गई हैं?"
"बात तौ आपकी एकदमसही हैं चौधरी साहब। " अशोक नें कहा___"लेकिन इससे निष्कर्श क्याँ निकलेगा? मेरा मतलब हैं कि इससे हमारा फायदा क्याँ होगा?"
"नफ़ा नुकसान तौ अपनी स्थान हैं हि अशोक। " चौधरी नें कहा___"लेकिन इस मामले मे कुछ बातें ऐसी हें जिनके बारे मे पक्के तौर पऱ जानना बहोत ज़रूरी हैं। तुमने कहा थां कि ठाकुर कि बेटी जोँ थानेदारनी हैं औऱ अपने पैरेन्ट्स केँ खिलाफ़ हैं वोँ हमारे दुश्मन औऱ ठाकुर केँ भतीजे कि सहायता इसलिए नहि कर सकती क्योंकि वोँ भि उससे अपनेमाॅ बाप कि तरह नफ़रत करती हैं। यह बातें एक् दूसरे सें मैच नहि खारही हें अथवायह भि कह सकते हें कि जॅच नहि रही हें। "
"जी मे कुछ समझा नहि चौधरी साहब। " अशोक मेहरा केँ माॅथे पर्र उलझनपूर्ण भाव आए___"कौन सि बातें नहि जॅचरही आपको?"
"यही कि एक् तरफ तौ तुम् यह भि कहरहे हौ कि ठाकुर कि थानेदारनी बेटी उस विराज नाम केँ अपने भइया सें नफ़रत करती हैं। " मंत्री नें कहा___"इस लिए वोँ उसकी सहायता नहि कर सकती। जबकि दूसरी तरफ तुम् यह भि कहरहे हौ कि ठाकुर कि वही थानेदारनी बेटी स्वयं अपने हि माॅ बाप केँ खिलाफ़ हैं। सोचने वालीबात हें अशोक कि ऐसा केसे हौ सकता हैं? आमतौर पर्र बच्चे वही करते हें जौ उनकेमाॅ बाप उन्हें सीख देते हें अथवा करने कों कहते हें। यहाॅ सोचने वालीबात यह हैं कि अगर वोँ थानेदारनी अपनेमाॅ बाप कि सीख अथवाकहे केँ अनुसार अपने चचेरे भइया सें नफ़रत करती हैं तौ फिन अपने हि माॅ बाप केँ खिलाफ़ वोँ किसवजह सें हौ गई हैं?"
"आपकीइन सभी बातों मे ज़बरदस्त प्वाइंट हैं चौधरी साहब। " सहसा अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"सचमुच यह सोचने वालीबात हैं कि आख़िर ऐसा क्याँ हुआ हैं जिसके चलते ठाकुर कि बेटी उसके खिलाफ़ हैं? संभव हैं कि उसेकोई ऐसीबात अपनेमाॅ याँ पिता कि पताचल गई होँ जिसके चलते उसने अपनेमाॅ बाप सें किनारा कर लिया हौ। याँ फिनऐसा होँ सकता हैं कि सोच याँ विचारों केँ चलते थानेदारनी अपने पैरेन्टस् सें दूर होँ। "
"यहसभी तौ महज संभावनाएॅ हें अवधेश। " दिवाकर चौधरी नें कहा___"जोँ सही भि औऱ ग़लत भि हौ सकती हें मगर हमें वोँ बातपता करना हैं जौ केवल औऱ केवलसच होँ। ख़ैर फिक्र कि कोईबात नहि हैं, हमने ठाकुर कों बुलाया हैं। वोँ आता हि होगा हमारे पास। उसी सें पूछेंगे कि सच्चाई क्याँ हैं?"
"मगर चौधरी साहब। " अशोक मेहरा नें एक् बार पुनः हस्ताक्षेप किया___"प्रश्न तौ एक् बारफिन खड़ा होँ जाता हैं कि इस सबसे हमारा फायदा क्याँ होगा? हम् यह तौ जानते हि हें कि हमारा दुश्मन ठाकुर कां वोँ भतीजा हैं जिसका नाम विराज हैं औऱ वोँ मुम्बई मे रहता हैं। फिन अचानक आप् ठाकुर औऱ उसकी बेटी कों बीच मे केसे लें आए?इस मामले मे यह कहाॅ सें आँ गए? ठाकुर कि बेटी अपनेमाॅ बाप केँ खिलाफ़ हैं यह उनका आपसी मैटर हैं। इसलिए हमें इससे क्याँ लेना देनाभला? हमें तोँ अपने टार्गेट पऱ फोकस रखना हैं नां?"
"तुम् बात कों याँ तौ अनसुना करगए होँ अशोक याँ फिनबात कों समझने कि कोशिश हि नहि कररहे हौ। " मंत्री नें स्पष्ट भाव सें कहा___"जबकि तुम्हें सबसे पहलेयह सोचना चाहिए कि हम् बेवजह फालतू कि बकवास करने कां शौक नहि रखते हें। ख़ैर, बात दरअसल यह कि अगर ठाकुर कि बेटी सचमुच मे अपने पैरेंट्स केँ खिलाफ़ हैं तौ वोँ अपनेउस भइया कि सहायता क्यूं नहि कर सकती जोँ अपनेमाॅ बाप कि तरह हि उस लड़के सें नफ़रत करती थि? संभव हैं कि उसेउस वजह कां पताचल गय़ा हौ जिसवजह केँ चलते उसके बाप नें विराज औऱ विराज कि माॅ बेहन कों हर चीज़ सें बेदखल किया थां। उसेपता चल गय़ा होँ कि जिसवजह सें विराज कों बेदखल किया थां उसके बाप नें वोँ वजह वास्तव मे बेवजह हि थि। यानी विराज व विराज कि माॅ बेहन अपनी स्थान सहीरहे हों। उस सूरत मे संभव हैं कि रितू नें उस संबंध मे अपने पैरेंट्स सें बात कि होँ औऱ उनसेकहा हौ कि विराज औऱ उसकीमाॅ बेहन कों बेदखल करके उसने अच्छा नहि किया। वोँ अगर बेक़सूर हें तोँ उन्हें उनकाहक़ मिलना हि चाहिए। इस संबंध मे अपनी बेटी कि यहबात शायद ठाकुर कों पसन्द न् आई होँ औऱ उसने विराज कां हक़ देने सें साफ इंकार कर दिया होँ। इसवजह सें थानेदारनी अपनेमाॅ बाप सें अलग हौ गई औऱ संभव हैं कि इसी केँ चलते वोँ अपनेउस चचेरे भइया केँ प्रति अपनी नफ़रत कों मिटाकर उसकी सहायता भि करनेलगी होँ। हलाॅकि यहसभी भि महज संभावनाएॅ हि हें लेकिन होँ सकता हैं कि यहीसच हौ। "
अशोक मेहरा हि नहि बल्कि वहाॅ बैठे अवधेश व सुनीता भि चौधरी कि इन संभावना भरी बातें सुनकर चकितरह गए थें। एक् बेटी कां अपने पैरेंट्स केँ खिलाफ़ होने कि क्याँ खूबवजह सोचकर बयान किया थां उसने।
"अगर आपकी संभावनाएॅ सच हें। " फिन अवधेश नें कहा___"तौ यकीनन वोँ थानेदारनी विराज कि सहायता कर सकती हैं। मे सभीसमझ गय़ा चौधरी साहब, आपनेयही सभीसोच कर ठाकुर कों यहाॅ बुलाया हैं। "
"बिलकुल। " चौधरी मुस्कुराया___"लेकिन इसवजह केँ अलावा भि एक् महत्वपूर्ण वजह हैं। "
"वोँ क्याँ चौधरी साहब?" तीनो एक् बारफिन चौंके।
"अगर ठाकुर नें सचमुच हि विराज औऱ उसकीमाॅ बेहन कों बेवजह हि हर चीज़ सें बेदखल किया हैं। " चौधरी नें कहा___"तौ यह भि सच हि होगा कि विराज अपने ताऊ कों दुश्मन समझता होगा औऱ यह भि चाहता होगा कि उसकाहक़ किसी भि सूरत मे उसे मिले। ठाकुर नें अगरधन दौलत अथवा सारी प्रापर्टी कों हथियाने कि गरज सें उसे बेदखल किया होगा तोँ फिनयह पक्की बात हैं कि ठाकुर किसी भि कीमत मे वोँ प्रापर्टी अथवाउस प्रापर्टी मे सें विराज कां हक़ नहि देगा। कहने कां मतलबयह कि विराज कों अपनाहक़ आसानी सें नहि मिलने वाला। इस लिए वोँ ऐसाकुछ अवश्य करेगा जिसके तहतउसे अपने ताऊ सें अपनाहक़ वापसमिल सके। "
तीनोमुह फाड़े देखते रहगए चौधरी कों। किसी केँ मुख सें कोईबोल नं फूटसका थां। जबकि चौधरी उन सबके चेहरों पर्र मॅडराते भावों कों देखते हुए पुनः कहना शुरुआत किया____"हलाॅकि यह भि महज संभावनाएॅ हि हें दोस्तो जोँ ग़लत भि होँ सकती हें। मगर हमें कहीं न् कहींऐसा आभास भि होँ रहा हैं कि हमारी इन संभावनाओं पऱ कुछ नं कुछ तौ सच्चाई अवश्य हैं। हमने ठाकुर, ठाकुर कि बेटी, तथा विराज, इन तीनों पऱ ग़ौर किया हैं औऱ इनकेबीच पैदाहुए हालातों पऱ भि ग़ौर किया हैं। इसकेबाद हि हमारे दिमाग़ मे इन संभावनाओं कां आगमनहुआ हैं। "
"मुझे तोँ ऐसा लगता हैं चौधरी साहब। " सहसा अवधेश कह उठा___"कि आपनेउन तीनों कां ऑपरेशन कर दिया हैं। आपकी संभावनाओं मे कहीं पऱ भि ऐसा नहि लगरहा हैं कि उनमें कहींकोई लोचा हैं। "
"ठाकुर कि बेटी कां अपनेमाॅ बाप सें भले हि चाहे जौ पंगा हौ अवधेश। " चौधरी नें गहरी साॅस ली___"जिसके तहत वोँ अपनेमाॅ बाप केँ खिलाफ़ हैं। मगरयह बात तोँ सच हि समझो कि ठाकुर औऱ विराज कां छत्तीस कां ऑकड़ा हैं। ज़र ज़ोरू ज़मीन यहकभी किसी कि नहि हुइ। इसने जाने जाने कितने पाक़ रिश्तों कों नेस्तनाबूत किया होगाअब तक इसका हममें सें कोई अंदाज़ा भि नहि लगा सकता। विराज व ठाकुर केँ बीचहक़ कि लड़ाई हैं यह पक्की बात हैं औऱ जब तक इस लड़ाई कां अंत नहि होगा दोनो मे सें कोई भि सुकून सें नहि बैठेगा। ख़ैर, तुमने सुना होगा कि हमने मोबाइल पर्र ठाकुर कों साथीकहा थां। वोँ इसीलिए कहा थां कि मौजूदा हालात मे हम् दोनो कां एक् हि टार्गेट हैं-----विराज। इसलिए हमनेउसे यारकहा। हम् उससे विराज केँ संबंध मे सारी जानकारी हासिल करेंगे औऱ फिनउस हिसाब सें आगे कि रणनीति बनाएॅगे। "
अभि चौधरी नें यहकहा हि थां कि सहसातभी ड्राइंग रूम मे एक् व्यक्ति दाखिल हुआ। उसने बड़ेअदब सें चौधरी कों बताया कि बाहर् कोई व्यक्ति आपसे मिलने आया हैं। वोँ व्यक्ति अपनानाम ठाकुर अजय सिंहबता रहा हैं। उस व्यक्ति कि बातसुन कर चौधरी मुस्कुराया औऱ अपनेउस व्यक्ति सें कहा कि उसे इज्ज़त सें अंदर लें आओ। चौधरी कि बातसुन कर वोँ व्यक्ति पहलेअदब सें सिर झुकाया फिन वापस बाहर् कि तरफचला गय़ा।
कुछ हि देर मे उसी व्यक्ति केँ संगअजय सिंह ड्राइंग रूम मे दाखिल हुआ। उसे देखते हि चौधरी अपने सोफे सें उठा हलाॅकि वोँ प्रदेश कां मंत्री थां औऱ अजय सिंह केँ लिए उठना उसकीशान केँ खिलाफ़ थां लेकिन फिन भि वोँ उठा हि। उसकी देखा देखी बाॅकी सभी भि उठगए।
"मोस्ट वेलकम ठाकुर। " चौधरी नें गर्मजोशी सें तथा मुस्कुराते हुएअजय सिंह सें हाॅथ मिलाया औऱ फिन एक् अन्य खाली सोफे कि तरफ बैठने कां इशारा किया औऱ स्वयं भि अपनी स्थान पर्र आँ करबैठ गय़ा।
"बहोत बहोत धन्यवाद चौधरी साहब। "अजय सिंह नें अपने अंदर हि हड़बड़ाहट पऱ काबू पातेहुए लेकिन बड़ी शालीनता सें कहा___"आज तोँ मेरे क़िस्मत हि खुलगए हैं जोँ आपके दर्शन होँ गए। "
"ऐसा कुछ भि नहि हैं ठाकुर। " चौधरी नें कहा___"इस समय हम् किसी मंत्री कि हैसियत सें नहि बल्कि एक् आम इंसान तथा एक् साथी कि हैसियत सें तुमसे मिलरहे हें। औऱ वैसे भि यह तोँ हमें भि पताचला हैं कि हमसे पहले जौ मंत्री थें उनसे तुम्हारे बहोत गहरे ताल्लुकात थें। सारा पुलिस महकमा हि तुम्हारी मुट्ठी मे होता थां। लेकिन हमने सुना कि रातभर मे साराकुछ बदल गय़ा थां। इस सबका बड़ा होँ हल्ला भि हुआ थां। मगर किसी कि समझ मे नं आया कि ऐसा क्यूं हुआ थां। आज भि यह रहस्य हि बनाहुआ हैं। "
दिवाकर चौधरी कि इसबात सें अजय सिंह तोँ चौंका हि मगर उसकेसंग संग अशोक, अवधेश व सुनीता आदि भि चौंके थें। लेकिन उन लोगों नें बीच मे कहाकुछ नहि।
"हाॅयह तौ आपनेसच कहा चौधरी साहब। "अजय सिंह नें सहसा गहरी साॅस ली___"एक् समय थां जबहर चीज़ मेरेलिए आसान थि मगर एक् ऑधीआई औऱ सभीकुछ उड़ाकर लेँ गई। अबउन जगहों पर्र गहन ख़ामोशी केँ सिवाकुछ भि शेष नहि रहा। "
"इसका मतलब तोँ यहहुआ कि वोँ साराकुछ तुम्हारी वजह सें बदल गय़ा थां?" इसबार चौंकने कि बारी मानो चौधरी कि थि। हैरत सें बोला___"मगर आख़िर ऐसाहुआ क्याँ थां ठाकुर? यकीनन कोई बड़ीवजह थि क्योंकि इतना बड़ा सिस्टम यहाॅ तक कि प्रदेश केँ मंत्री कां तबादला हौ जानां कोई मामूली बात नहि हैं। उस सबसे तौ हरकोई हैरान रह गय़ा थां। आज जबकि तुम्हारे मुख सें हि पताचला कि वोँ सभी तुम्हारी वजह सें हुआ थां तोँ इस सबको जानने कि उत्सुकता औऱ भि बढ़ गई हैं। "
अजय सिंहसमझ सकता थां कि उसे मंत्री कों इस सबके बारे मे बताना हि पड़ेगा। वोँ भि चाहता थां कि किसीवजह सें हि सहीमगर उसे मंत्री कां संगमिल जाए। अतः उसने संक्षेप मे अपनी फैक्ट्री मे लगीआग वालेकेस केँ संबंध मे बता दिया। यह भि कि बाद मे उसेयह पताचल हि गय़ा कि फैक्ट्री मे लगीआग केँ पीछे उसके अपने हि भतीजे विराज कां हाॅथ थां। मंत्री यहजान कर हैरान रह गय़ा कि विराज नें इतना बड़ा काण्ड कियाहुआ हैं अपने ताऊ केँ संग। अजय सिंह नें मंत्री कों यह भि बताया कि मंत्री कां तबादला औऱ सारे पुलिस महकमे कों बदल देने मे भि विराज कां हि हाॅथ थां। यहबात सुनकर तोँ चौधरी कि गाॅड मे कीड़े हि कुलबुलाने लगे। वोँ सोचने पर्र मजबूर होँ गय़ा कि विराज आख़िर चीज़ क्याँ हैं जोँ मंत्री औऱ सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट तक कों इधर सें उधरकर देने कि क्षमता रखता हैं? चौधरी जैसा हि हाल वहाॅ बैठे बाॅकी सबका भि थां।
"तुम्हारी किस्सा तोँ वाकई मे हैरतअंगेज हैं दोस्त। " चौधरी नें चकितभाव सें कहा___"मगर यहसमझ नहि आया कि तुम्हारे भतीजे विराज नें ऐसा किया क्यूं?"
मंत्री नें जानबूझ करयह प्रश्न किया थां। उसेपता तोँ थां लेकिन वोँ अजय सिंह केँ मुख सें सच्चाई सुनना चाहता थां।
"बड़ी लम्बी किस्सा हैं चौधरी साहब। "अजय सिंह नें गहरी साॅस छोंड़ते हुए कहा___"कभी कभी हमारे संग वोँ सभी भि हौ जाता हैं जिसकी हमनेकभी कल्पना भि नहि कि होती हैं। दरअसल बातयह थि मैने अपने मॅझले भइया कि पत्नि औऱ उसके दोनो बच्चों कों घऱ औऱ ज़मीन जायदाद सें बेदखल कर दिया थां। इसकीवजह यह थि कि मेरे भइया कि पत्नि गौरी एक् चरित्रहीन महिला थि। जवानी मे हि उसके पति कि मौत हौ गई थि जिसकी वजह सें उससे अपने अंदर कि गर्मी बर्दास्त नहि हुईँ। शुरुआत शुरुआत मे तौ सभीठीक थां मगरफिन उसकेचाल चलन दिखने शुरुआत हुए। मे जोँ कि उसका जेठ लगता थां औऱ गाॅवों मे रिवाज हैं कि छोटे भइया कि पत्नि अपने जेठ केँ सामने सिर खुला नहि रखती औऱ नाँ हि उसे छूती हैं। मगर गौरी अपनी वासना औऱ हवश कि वजह सें मुझ पर्र हि डोरे डालने लगी। मे उसकीउस हरकत सें हैरान थां। हमारे खानदान कभीऐसा नहि हुआ थां। हरकोई छोटे बड़े कि मान मर्यादा कां ख़याल रखता थां। उधर दिनप्रति गौरी कि हरकतों सें मेरा दिमाग़ खराब होनेलगा। मैने उसकी हरकतों केँ बारे मे सबसे पहले अपनी पत्नि कों बताया औऱ उससेकहा भि कि वोँ गौरी कों समझाए बुझाए कि यहसभी कितना ग़तना ग़लत औऱ पापकर रही हैं। मेरी पत्नि नें गौरी कों बहोत समझाया। मगर गौरी तोँ जैसे वासना औऱ हवश मे अंधी हौ चुकी थि। जिसका नतीजा यह निकला कि एक् दिन वोँ मुझे मेरे कमरे मे अकेला देखकर आँ धमकी औऱ ज़बरदस्ती मुझसे सेक्स संबंध बनाने कों कहनेलगी। मे उसकीउस हरकत औऱ बातों सें बहोत क्रोध हुआ। जबकि वोँ मुझसे लपटी पड़ी थि। तभीइस बीच मेरी पत्नि आँ गई। उसने गौरी कों मुझसे छुड़ाया औऱ उसे घसीटते हुए कमरे सें बाहर् लें गई। मेरी पत्नि नें उस सबके कैमरे द्वारा फोटोग्राफ्स भि निकाले थें। ऐसाइस लिए क्योंकि अगर हम् गौरी कि इन हरकतों केँ बारे मे घऱ मे किसी सें बताते तौ कोई भि हमारी बात पर्र यकीन हि नं करता। क्योंकि सभी गौरी कों बहोत हि अधिक संस्कारी औऱ आदर्श महिला मानते थें। ख़ैरउस दिन हमारे पास सबूत भि थां इसलिए सबको मानना हि पड़ा औऱ फिन सबकी सहमति सें हि मैनेउसे औऱ उसीए बच्चों कों हवेली सें बाहर् निकाल दिया। हवेली सें बाहर् मैनेउसे खेतों पऱ बने घर-मकान मे रहने कि रियायत अवश्य दे दि थि। ऐसाइस लिए क्योंकि वोँ आख़िर थि तोँ हमारे खानदान कि बहू हि। हमने सोचा थां कि हवेली सें दूर खुतों पर्र बने घर-मकान मे रहेगी तोँ सभीकुछ ठीक हि रहेगा। मगर हमारा ऐसा सोचना भि ग़लत हौ गय़ा। क्योंकि वोँ खेतों पर्र कामकर रहे मजदूरों पऱ हि वासना औऱ हवस केँ चलते डोरे डालने लगी थि। एक् दिन हमारे एक् मजदूर नें इस बारे मे मुझसे डरतेहुए बताया। उसकीबात सुनकर मुझे गौरी पर्र हद सें ज़्यादा क्रोध आया। उसकेबाद मैने फैसला कर लिया कि अबउसे औऱ उसके बच्चों कों मे उस गाॅव मे नहि रहने दूॅगा। क्योंकि इससे हमारी औऱ हमारे खानदान कि बहोत बदनामी होती। अतः मैनेउसे हर चीज़ सें बेदखल कर दिया। गौरी कां लड़का थोडा बहोत समझदार थां मगर वोँ भि अपनीमाॅ कि बातों कों हि सच मानता थां। उसे लगता थां कि हमने उसकीमाॅ कों बेवजह हि हवेली सें निकाला थां। वोँ अपना औऱ अपनीमाॅ बेहन कां घऱ खर्चा चलाने केँ लिए मुम्बई मे कहींजॉब करनेचला गय़ा थां। जबकि उसके पीछे यहाॅ उसकीमाॅ यहसभी गुल खिलारही थि। ख़ैर, एक् दिनबाद पताचला कि विराज अपनीमाॅ व बेहन कों अपनेसंग मुम्बई लें गय़ा। उसकेबाद अभि कुछ टाइम पहले सें हि यहसभी शुरुआत हुआ। यानी विराज यहसोच कर मुझसे बदला लेँ रहा हैं कि मैने उसके औऱ उसके परिवार केँ संग ग़लत किया हैं। "
"ओह तौ यह हें सारी बातें। " सभीकुछ सुनने केँ बाद चौधरी नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"मगर इतनाकुछ हुआ औऱ तुमको अंदाज़ा भि नं हुआ कि यहसभी तुम्हारे भतीजे नें हि किया हैं?"
"अंदाज़ा तौ तब होता चौधरी साहब। "अजय सिंह नें कहा___"जब मुझे उससेइस सबकी उम्मीद होती। मे तौ यही समझता थां कि वोँ लड़का निहायत हि सीधा सादा औऱ भोला हैं। भला मुझे क्याँ पता थां कि वोँ किसी डायनामाइट सें कम नहि हैं। "
"ख़ैर। " चौधरी नें पहलू बदला___"हमने सुना हैं कि तुम्हारी अपनी बेटी जोँ कि पुलिस इंस्पेक्टर हैं वोँ आजकल तुम्हारे खिलाफ़ हौ चुकी हैं। यह क्याँ चक्कर हैं?"
"चक्कर वक्कर कुछ नहि हैं चौधरी साहब। "अजय सिंहमन हि मन बुरीतरह चौंका थां लेकिन चेहरे पऱ चौंकने केँ भावों कों आने न् दिया थां, बोला___"दरअसल बातयह हैं कि हमें उसका पुलिस कि जॉब करना ज़रा भि मनपसंद नहि थां। जबकि पुलिस कि जॉब करना उसकाशौक थां बचपन सें हि। मैने औऱ मेरी पत्नि प्रतिमा नें उससेकहा कि यह पुलिस कि जॉब छोंड़ दो, भला उसेजॉब करने ज़रूरत हि क्याँ हैं? उसेजिस चीज़ कि भि ज़रूरत होती हैं हम् उसके बोलने सें पहले हि वोँ चीज़ लाकर उसके क़दमों मे डाल देते हें। मगर वोँ हमारी बात सुनती हि नहि। बचपन सें हि ज़िद्दी थि वोँ। एक् दिन उसकीमाॅ नें कदाचित कुछ ज़्यादा हि कड़े शब्दों मे कह दिया थां। जिसकी वजह सें वोँ क्रोध होँ गई औऱ कहनेलगी कि उसे हमारी किसी चीज़ कि ज़रूरत नहि हैं। वोँ अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरीकर लेगी। बस उसदिन केँ बाद सें वोँ नाँ तौ मुझसे बोलती हैं औऱ नाँ हि अपनीमाॅ सें। यहाॅ तक कि घऱ भि नहि आती। "
"बड़ी अजीबबात हैं। " दिवाकर चौधरी नें कहा__"भला तुम् लोगों कों उसकाजॉब करने सें एतराज़ क्यूं हैं? आज कि जनरेशन ज़रा एडवाॅस टेक्नालाॅजी मे सम्मिलित हैं। वोँ स्वयं पर्र औऱ अपने टैलेन्ट केँ बल पऱ हि जिंदगी जीना चाहते हें। अतः तुम् दोनो कां उसकाजॉब करने सें ऐतराज़ करना सरासर ग़लत थां। ख़ैर, जैसा कि तुमने बताया कि उसदिन सें वोँ घऱ भि नहि आती हैं तौ प्रश्न यह हैं कि वोँ रहती कहाॅ हैं फिन? क्याँ तुमने पता करने कि कोशिश नहि कि कि तुम्हारी लड़की रहती कहाॅ हैं? दिन कां तोँ चलोठीक हैं कि वोँ पुलिस मे अपनी ड्यूटी केँ चलते कहीं नं कहीं ब्यस्त हि रहती होगीमगर रात कों? रात कों कहाॅ रहती होगी वोँ?"
"पुलिस वाली हैं चौधरी साहब। "अजय सिंह नें कहा__"स्वयं कमाती हैं। इसलिए कहीं न् कहीं अपने रहने केँ लिएकोई किराये सें रूम लेँ लिया होगा। "
"यह तोँ तुम् संभावना ब्यक्त कररहे होँ ठाकुर। " चौधरी नें कहा___"जबकि तुम्हें स्वयं पता लगाना चाहिए थां कि अगर वोँ लौटकर हवेली नहि आती हैं तोँ रहती कहाॅ हैं? केसे बाप हौ तुम् ठाकुर?"
अजय सिंहकुछ बोल नं सका। उसे एहसास थां कि चौधरी सचकहरहा थां कि उसे स्वयं अपनी बेटी केँ बारे मे पता करना चाहिए थां। भले हि वोँ पुलिस वाली थि मगरयह भि सच थां कि वोँ एक् लड़की भि थि। वोँ भले हि अपनी सुरक्षा बखूबी कर लें मगर वोँ तोँ उसका बाप थां नं? उसे तौ अपनी बेटी कि चिन्ता होनी चाहिए थि। अजय सिंह सोचो मे गुम तोँ थां मगर उसके ज़हन मे यह भि थां कि रितू केँ संग उसकी छोटी बेहन नैना भि हैं। शायदयही वजह थि कि उसनेअब तक पता करने कि कोशिश नहि कि थि कि वोँ दोनों कहाॅ रहती हें? अकेले रितूबस होती तोँ उसे चिंता यकीनन होतीमगर उसकेसंग मे नैना जैसी पढ़ी लिखीव समझदार उसकी बेहन भि थि। इसलिए वोँ बेफिक्र थां अपनी बेटी कि सुरक्षा केँ लिए।
"क्याँ सोचने लगे ठाकुर?" उसे सोचों मे गुमदेख कर चौधरी नें कहा___"ख़ैर छोंड़ो दोस्त, यह तुम्हारे घऱ कि बात हैं तुम्हें जोँ उचितलगे वोँ करो। अच्छा एक् बात बताओ। "
"ज जी????"अजय सिंह चौंका___"प.पूछिए। "
"क्याँ ऐसा होँ सकता हैं। " चौधरी नें बड़े ग़ौर सें अजय सिंह कों देखते हुए कहा___"तुम्हारी बेटी औऱ तुम्हारा भतीजा विराज एक् हौ गएहों? क्याँ ऐसा हौ सकता हैं कि विराज नें तुम्हारी बेटी कों अपनेसंग मिला लिया हौ??"
"प.प.पता नहि। " अजय सिंह केँ ऊपर जैसे एकाएक सारा आसमान भरभरा करगिर पड़ा थां। बड़ी मुश्किल सें स्वयं कों सम्हालते हुएकहा उसने___"आप् ऐसा क्यूं कहरहे हें चौधरी साहब? जबकि ऐसा हर्गिज़ नहि हौ सकता। इसकीवजह यह हैं कि मेरे तीनो हि बच्चे उसकीमाॅ कि हरकतों कि वजह सें उससे औऱ उसकीमाॅ बेहन सें कभीकोई बात करने कि तोँ बातदूर बल्कि उन्हें देख्ना तक मनपसंद नहि करते। "
"ऐसा तुम् सोचते होँ ठाकुर। " दिवाकर चौधरी नें दार्शनिकों वाले अंदाज़ मे कहा___"जबकि अक्सर ऐसा होँ जाया करता हैं जिसकी हमें पूरी उम्मीद होती हैं कि ऐसा तोँ कभी हौ हि नहि सकता। "
"क्याँ मतलब???"अजय सिंह चकरा सां गय़ा।
"मतलबसाफ हैं ठाकुर। " चौधरी नें कहा___"तुम् यहसोच करयह नहि मानरहे हौ कि तुम्हारी बेटी विराज कों देख्ना तक पसन्द नहि करतीइस लिए वोँ उससेमिल नहि सकती जबकि ऐसा होँ भि सकता हैं कि वोँ उससेमिल हि गई होँ। विराज कि कारगुजारियों सें इतना तौ पताचल हि गय़ा हैं कि वोँ कितना शातिर दिमाग़ रखता हैं औऱ कितनी ऊॅची पहुॅच भि रखता हैं। अतःअगर वोँ अपने शातिर दिमाग़ केँ चलते तुम्हारी बेटी कों अपनीतरफ कर भि लें तोँ हैरत कि बात नहि होगी। संभव हैं कि उसने रितू कों ऐसाकोई पाठ पढ़ा दिया हौ जिसके चलते तुम्हारी बेटी कां ब्रेन वाश होँ गय़ा होँ औऱ अब वोँ उसेसही मानरही होँ औऱ तुम्हें यानी कि अपने बाप कों ग़लत। "
अजय सिंह मंत्री कि सूझबूझ तथा उसकी दूरदर्शिता कि मन हि मनदाद दिये बिना न् रहसका। सच्चाई भले हि कुछ औऱ थि मगर जितना उसनेउहे बताया थां उस हिसाब सें कड़ियों कों जोड़कर सच्चाई केँ रूप मे अपनी संभावनाएॅ इसतरह बयां करना आसानबात न् थि। सहसाउसे ख़याल आया कि जबसे वोँ यहाॅआया हैं तब सें मंत्री मात्र उसी केँ संबंध मे बातें पूछरहा हैं जबकि उसेअब तक यहीसमझ मे नहि आया थां कि मंत्री नें आख़िर उसे बुलाया किसलिए थां??
"ईश्वर जाने चौधरी साहब। "फिन उसने पहलू बदलने कि गरज सें कहा___"कि सच्चाई हैं इस संबंध मे। ख़ैर छोंड़िये यहसभी औऱ यह बताइये कि इस नाचीज़ कों किसलिए बुलाया थां आपने?"
अजय सिंह द्वारा अचानक हि इसतरह पहलूबदल लेना चौधरी कों मन हि मन चौंकाया मगर उसनेउसे ज़ाहिर न् किया। बल्कि उसके पूछने पऱ वो मुस्कुराया औऱ सेन्टर टेबल पर्र सजेफल फूलव मॅहगी शराब कि तरफ इशारा किया।
"यह तोँ कमाल होँ गय़ा ठाकुर। " फिन चौधरी नें मुस्कुराते हुए हि कहा___"तुम् आज यहाॅ पहलीबार आए औऱ हमने बातों केँ चक्कर मे यह भि ख़याल नहि रखा कि घऱआए मेहमान कां आतिथ्य भि किया जाता हैं। "
"मे कोई मेहमान नहि हूॅ चौधरी साहब। "अजय सिंह नें भि मुस्कुराते हुए कहा___"आपने मुझे साथीकह कर मेरामान बढ़ा दिया हैं यही बहोत हैं मेरेलिए। इस नातेअब तोँ यह भि अपना हि घऱहुआ औऱ अपने हि घऱ मे भलाकोई मेहमान कैसा होँ सकता हैं?"
"हाॅ तौ सहीकहा तुमने। " चौधरी हॅसा औऱ फिनबगल सें हि बैठे अशोक, अवधेश व सुनीता कि तरफ इशारा करतेहुए कहा___"इनसे मिलो ठाकुर, यहसभी भि हमारे गहरेयार हें। बल्कि यूॅ समझो कि यह तीनो हमारे दोस्तों कि लिस्ट मे सबसेऊपर हें औऱ आज सें तुम् भि शामिल हौ गए हौ। "
"यह तोँ मेरा सौभाग्य हैं चौधरी साहब। "अजय सिंह नें खुश होतेहुए कहा___"जौ आपने मुझे अपनेयार कां दर्ज़ा दिया हैं। मे पूरी कोशिश करूॅगा कि इस दोस्ती पऱ खराउतर सकूॅ। "
"चलो फिनइसी बात पर्र एक् एक् जाम हौ जाए। " चौधरी नें मुस्कुराते हुए कहा___"औऱ हमारी दोस्ती कों सेलीब्रेट कियाजाए। "
"जी बिलकुल। " अजय सिंह हॅसा औऱ उन तीनों कि तरफदेख करउन तीनो सें हैलो कियातथा हाॅथ भि मिलाया। चौधरी केँ कहने पऱ सुनीता नें सबकेलिए जाम बनाया औऱ साक़ी बनकर सबको पिलाया भि। इसबीच चौधरी नें अजय सिंह कों बताया कि सुनीता उसकेसंग संग बाॅकी उन दोनो कों भि हरतरह सें खुश रखती हैं। अजय सिंहयह जानकर हैरान भि हुआ थां। मगरफिन यहसोच कर मुस्कुराया भि कि चौधरी भि उसी कि तरह हि औरतबाज हैं।
करीबआधा घंटे सें ऊपर तक जामों कां दौर चलतारहा। सभी केँ सभी हल्के नशे केँ सुरूर मे आँ चुके थें। उसकेबाद बातों कां सिलसिला फिन सें शुरुआत हुआ। अजय सिंह सबसे बहुतखुल चुका थां। बाॅकी सभी भि अजय सिंह सें खुल चुके थें। सुनीता कों अजय सिंह कि पर्शनाल्टी पहली नज़र मे हि भा गई थि औऱ वोँ उसके नीचे लेटने केँ लिए बेक़रार हौ उठी थि। मगर अभि उसको भि पता थां कि उसकीयह बेक़रारी शान्त नहि होने वाली हैं। यानीकुछ वक़्त तक इन्तज़ार करना पड़ेगा उसे।
"मजा आँ गय़ा चौधरी साहब। "अजय सिंह नें नशे केँ हल्के सुरूर मे मुस्कुराते हुए कहा___"आप् सच मे बहोत अच्छे हें। एक् लम्हा केँ लिए भि मुझेऐसा नहि लगा जैसे इसके पहले आप् मेरेलिए ग़ैर थें। सच कहताहूॅ आपसेमिल कर औऱ आपकायार बनकर बहोत अच्छा लगरहा हैं। बहोत दिनों बादऐसे खुश होने कां मौका मिला हैं मुझे। "
"अभि तोँ इससे भि ज़्यादा मजा आएगा ठाकुर। " चौधरी नें भि नशे केँ हल्के सुरूर मे कहा___"हमारी दोस्ती मे औऱ हमारे संग मे ऐसा हि होता हैं। हमेंवही इंसान अच्छा लगता हैं जौ हमसे वफ़ाकरे। वफ़ादार ब्यक्ति केँ लिए हम् कुछ भि करने कों सजधजकर हौ जाते हें। "
"मे अवश्य आपका वफ़ादार रहूॅगा चौधरी साहब। "अजय सिंह नें कहा___"आप् जब भि मुझेयाद करेंगे मे आपके सामने हरकाम छोंड़ कर हाज़िर होँ जाऊॅगा। मुझे भि वफ़ादार इंसान हि अच्छे लगते हें जोँ साथी केँ लिएकुछ भि करजाए मगर.। "
"मगर क्याँ ठाकुर। " चौधरी नें सिरउठा करअजय सिंह कि तरफ देखा___"तुम्हारे स्वागत मे हमसेकोई कमी होँ गई हैं क्याँ? अगरऐसा हैं तौ बेझिझक बोलदो दोस्त। जौ बोलोगे वोँ मिलेगा तुम्हें। यह दिवाकर चौधरी कां वचन हैं। "
"नं नहि नहि चौधरी साहब। "अजय सिंह नें हड़बड़ाते हुए कहा___"आपने किसीबात कि कमी नहि कि हैं। मेरे कहने कां मतलबयह थां कि आपने मुझे बताया नहि कि आपने मुझेकिस वजह सें यहाॅ बुलाया थां? देखिए अब तोँ हम् दोनो मित्र बनगए हें न्। इसलिए अगरकोई बात हैं आपकेमन मे तौ बेझिझक कहिए। मे वादा करताहूॅ कि अगर मेरेलिए आपकाकोई आदेश हैं तोँ मे जान देकर भि उसे पूरा करूॅगा। "
अजय सिंह कि बातइस पर्र चौधरी नें उसे बड़े ध्यान सें देखा जैसे जाॅचरहा हौ कि उसकीबात पर्र कितना दम हैं। फिन अपने हाॅथ मे लिए शराब केँ प्याले कों मुह सें लगाकर शराब कां हल्का सां घूॅट लिया उसकेबाद अजय सिंह कि तरफ देखते हुए कहा___"आदेश तोँ कुछ भि नहि हैं ठाकुर। बसयह समझो कि आज केँ वक्त मे जोँ तुम्हारा दुश्मन हैं वही हमारा भि दुश्मन हैं। "
"यह आप् क्याँ कहरहे हें चौधरी साहब?"अजय सिंह नें ऑखें फैलाते हुए कहा____"मेरा दुश्मन तोँ मेरा वोँ हरामज़ादा भतीजा बनाहुआ हैं लेकिन वोँ आपका दुश्मन केसेबन गय़ा? बातकुछ समझ मे नहि आई चौधरी साहब। "
"तुमने कुछ वक्त पहले किसी लड़की केँ सामूहिक रेप केँ बारे मे तौ सुना हि होगा नं?" चौधरी नें कहा।
"ररेप केँ बारे मे???" अजय सिंह केँ चेहरे पर्र सोचने वालेभाव उभरे। फिन सहसा जैसेउसे याद आया___"ओह हाॅहाॅ सुना थां। आप् उसीरेप स्कैण्डल कि बातकर रहे हें न् जिस पऱ कुछ टाइम पहले बहुत हौ हल्ला हुआ थां? मगरफिन सभीकुछ शान्त हौ गय़ा थां। उसकेबाद कुछपता हि नहि चला कि क्याँ हुआ?मगर आपकाउस रेपकेस सें क्याँ संबंध?"
"दरअसल वोँ रेप हमारे बच्चों कि करतूत कां नतीजा थां ठाकुर। " चौधरी नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"तुम्हारे गाॅव केँ हि पास कि एक् विधीनाम कि लड़की थि जिसके संग हमारे बच्चों नें मिलकर रेप किया थां। वोँ लड़की हमारे बच्चों केँ हि काॅलेज मे पढ़ती थि। उसरेप केस पऱ हौ हल्ला तोँ अवश्य हुआ थां लेकिन उस पऱ कोई शख्त ऐक्शन इसलिए नहि लिया गय़ा थां क्योंकि मामला हमारे बच्चों कां थां। यहाॅ कां पुलिस कानून हमारे खिलाफ कोई क़दमउठा हि नहि सकता थां। यहबात उस लड़की केँ घरवालों कों भि समझ आँ गई थि। इसीलिए लड़की केँ घरवालों नें भि कोईकेस नहि किया थां औऱ इसीवजह सें मामला शान्त पड़ गय़ा थां। मगर.। "
"मगर????" अजय सिंह केँ चेहरे पर्र हैरत केँ भाव थें।
"मगररेप केँ तीसरे दिन हमारे बच्चे हमारे हि फार्महाउस सें गायब होँ गए। " चौधरी कहरहा थां___"औऱ अब तक उनका कहींकुछ पता नहि चलसका हैं। उन बच्चों मे एक् हमारा बेटा हैं औऱ तीन लड़कों मे सें एक् अशोक कां हैं दूसरा अवधेश कां औऱ तीसरा सुनीता कां। हमनेसभी कुछ करकेदेख लियामगर आज तक कहीं भि बच्चों कां पता नहि चला। सबसे गज़ब तौ तब होँ गय़ा जब हमारी बेटी भि गायब होँ गई। "
"यह आप् क्याँ कहरहे हें चौधरी साहब??"अजय सिंह हक्का बक्का नज़रआने लगा थां, बोला___"मगर आपके बच्चों कों गायब किसने किया होँ सकता हैं? औऱ अगर बच्चे अगररेप केँ बाद सें हि गायब हें तौ ज़ाहिर सि बात हैं कि उन्हें उसी नें गायब किया होगा जिसके संगउन बच्चों नें अहित किया हैं। मगर गायब करने वाले कां आपकेपास कोई मोबाइल याँ किसीतरह कि सूचना तोँ आनी हि चाहिए थि। सीधी सि बात हैं कि अगरयह सभी उसने बदला लेने केँ उद्देष्य सें किया हैं तौ वोँ देर सवेरयह अवश्य सूचित करता कि आपके बच्चे उसके कब्जे मे हें। "
"बिलकुल सहीकहा तुमने ठाकुर। " चौधरी एकाएक कह उठा__"उसे अवश्य सूचित करना चाहिए थां औऱ उसनेऐसा किया भि हैं। "
"क्याँ????" अजय सिंह चौंका___"मेरा मतलब हैं कि क्याँ सूचित किया उसने?"
"उसने मोबाइल पऱ हमें बताया कि हमारे बच्चे उसके कब्जे मे हि हें। " चौधरी नें कहा___"औऱ यह भि बताया कि वोँ उनकेसंग क्याँ करेगा? शुरुआत शुरुआत मे तौ हमेंसमझ हि नहि आया कि ऐसाकौन कर सकता हैं, क्योंकि हमेंयही पता नहि थां कि हमारे बच्चों नें किस लड़की केँ संग वोँ सभी किया थां? दूसरी बात हम् यहसोच रहे थें कि अगर मामला इतना बड़ा थां तोँ पुलिस केस अवश्य होता। इस लिएयह जानने केँ लिए हमने यहाॅ केँ पुलिस कमिश्नर सें भि बात कि थि मगर उसने बताया कि पुलिस नें कोईकेस नहि बनाया। पुलिस केस भि तभी बनाती जब लड़की केँ घऱ वाले एफआईआर कराने थाने मे जाते। मगर लड़की केँ घऱ वाले तोँ पुलिस कि दहलीज़ पऱ गए हि नहि थें। हमने भि यही समझा थां कि वोँ हमसेडर गए होंगे इसीलिए पुलिस केस नहि किया। मगर फिनउस किडनैपर सें औऱ अशोक केँ द्वारा हि समझ मे आया कि ऐसाकौन औऱ क्यूं कर सकता हैं?"
"ओह तौ फिन क्याँ समझआया आपको?"अजय सिंह नें पूछा।
"रेप पीड़िता केँ घऱ वाले तौ ऐसाकर नहि सकते। " चौधरी नें कहा___"क्योंकि उन्हें पता थां कि पुलिस केस सें कुछ होने वाला नहि हैं औऱ ऐसा करने कि क्षमता उनमें थि नहि। मगर अशोक नें अपने तरीके सें पता लगाया कि एक् व्यक्ति औऱ हैं ऐसा जौ हमारे बच्चों कों इस संबंध मे किडनैप कर सकता हैं। "
"ऐसा आदमीभला कौन हौ सकता हैं चौधरी साहब?"अजय सिंह चौंका।
"तुम्हारा भतीजा विराज। " चौधरी नें मानोअजय सिंह केँ सिर पऱ बम्ब फोड़ा।
"क्याँ????" अजय सिंहइस तरह उछला थां जैसे औसके पिछवाड़े पर्र किसी नें चुपके सें गरमतवा रख दिया हौ। फिन हैरत सें ऑखें फाड़े हुए बोला___"यह आप् क्याँ कहरहे हें? भला विराज ऐसा क्यूं करेगा?"
"इसकी बहोत बड़ीवजह हैं ठाकुर। " दिवाकर चौधरी नें कहा___"दरअसल जिस लड़की कां रेप किया थां हमारे बच्चों नें उस विधीनाम कि लड़की सें तुम्हारा भतीजा विराज प्यार करता थां। जबउसे अपनी प्रेमिका केँ संगहुए उस भयावह रेप कां पताचला तोँ वोँ आग बबूला होँ गय़ा होगा औऱ फिन मुम्बई सें यहाॅ आँ कर उसने अपनी प्रेमिका केँ संगहुए रेप कां बदला लेने केँ लिएयह सभी कारनामा अंजाम दिया। हलाॅकि यह एक् संभावना हैं ठाकुर क्योंकि हमारे पास अभि इसबात कां कोई सबूत नहि हैं कि विराज हि यहसभी कररहा हैं। संभावना इसलिए हैं क्योंकि यहकाम याँ तौ विधी केँ घऱ वालेकर सकते याँ फिन विराज। दोनो केँ हि पासयह सभी करने कि मजबूत वजह थि। ख़ैरजब हमें अशोक कि तहकीक़ात सें यहपता चला कि विधी किसी विराज नाम केँ लड़के सें प्यार करती थि तौ हमने विराज केँ बारे मे भि जानकारी हाॅसिल कि। उसी जानकारी केँ तहतयह पताचला कि तुम्हारा भि विराज केँ संगऐसा हि कुछहाल हैं। इसलिए हमने सोचा तुमसे मिलकर हि इस संबंध मे बात कि जाए। "
"सच कहूॅ तौ यहबात मेरेलिए निहायत हि नई औऱ चौंकाने वाली हैं चौधरी साहब। "अजय सिंह केँ मस्तिष्क मे धमाके सें होँ रहे थें। उसके दिमाग़ कि बत्ती भि एकाएक जलउठी थि। अबउसे समझआया थां कि विराज मुम्बई सें यहाॅकिस लिएआया थां? इसके पहले वोँ सोचसोच कर परेशान थां कि विराज यहाॅकिस वजह सें आयारहा होगा। ख़ैर उसनेइन सभी बातों कों अपने दिमाग़ सें झटका औऱ फिन बोला___"मुझे तौ पता क्याँ बल्कि इसबात कां अंदाज़ा हि नहि थां कि मेरे भतीजे कां किसी लड़की सें प्यार संबंध भि हौ सकता हैं औऱ वोँ उसके चक्कर मे आपकेसंग इतनाकुछ कर सकता हैं। "
"दूसरी बातयह कि हम् तुम्हारी बेटी केँ विराज सें मिल जाने कि बातइस लिएकह रहे हें क्योंकि वोँ एक् पुलिस ऑफिसर थि। " चौधरी कहरहा थां___"उसके थाना क्षेत्र केँ अंतर्गत रेप कि वोँ वारदात हुईँ थि। इसलिऐसा हौ हि नहि सकता कि उसेउस वारदात कां पता हि न् चला हौ। बल्कि अवश्य चला होगा औऱ जब उसने विधी कों उस हालत मे देखा होगा तौ स्वयं हि कानूनन कोई ऐक्शन लेने कां सोचा होगा। मगर ऐक्शन वोँ बिनाआला ऑफिसर कि अनुमति सें केसे लेँ सकती थि अथवा बिना पीड़िता केँ घऱ वालों द्वारा दर्ज़ करवाई गई एफआईआर केँ केसे लेसकती थि? कमिश्नर नें उसेइस केस कों बनाने सें शख्तमना कर दिया होगा। ख़ैर, क्योंकि वोँ भि पुलिस वाली केँ संगसंग एक् लड़की थि इसलिए उसेउस रेप पीड़िता विधी सें हमदर्दी हुई होगी। जिसके तहत वोँ उसी हमदर्दी केँ तहत विधी सें मिलने भि गई होगी। उधर विधी केँ संग हुई उस घटना कि जानकारी किसीतरह विराज कों भि हुइ औऱ वोँ जल्दी हि मुम्बई सें अपनी प्रेमिका केँ पास आँ गय़ा होगा। अतः संभव हैं कि इसी दौरान विराज कि मुलाक़ात तुम्हारी बेटी सें हुई होँ औऱ उसे भि यहपता चल गय़ा हौ कि विधी औऱ विराज दरअसल प्रेमी कॅपल थें। ऐसी मार्मिक घटना केँ बीच किसी केँ अंदर मौजूद नफ़रत अगर प्रेम मे परिवर्तित होँ जाए तौ कोई हैरत कि बात नहि। ठाकुर, बसइसी वजह सें हम् कहरहे हें कि तुम्हारी बेटी इन हालातों मे विराज सें मिल गई होगी। बाॅकी सच्चाई क्याँ हैं यह तोँ भगवान हि बेहतर तरीके सें जानता हैं। "
अजय सिंह चौधरी कि संभावना सें भरी बातों कों सुनकर बुरीतरह चकित थां। उसेलगा कहींयही सभीसच तौ नहि? चौधरी कि बातों मे उसे सच्चाई कि बू आँ रही थि। हलाॅकि उसे तोँ पता हि थां कि उसकी बेटी विराज कां संगदे रही हैं आजकल। उसनेयह बात चौधरी सें बताई नहि थि, इसकीवजह यह थि कि फिनउसे औऱ भि सारी बातें बतानी पड़ती जिनका हक़ीक़त सें संबंध थां। मगरअजय सिंह हक़ीक़त बता नहि सकता थां। उसे लगता थां कि हक़ीक़त बताने सें उसका कैरेक्टर चौधरी केँ सामने नंगा हौ कररह जाएगा।
"आपकी बातें औऱ आपकी संभावनाएॅ सच भि हौ सकती हें चौधरी साहब। "फिन अजय सिंह नें कहा___"मगर क्योंकि महज संभावनाओं केँ आधार पऱ हि तोँ नहि चलाजा सकता नं। इसलिए हमेंसंग मिलकर सारी बातों कां पता लगाना होगा। "
"हम् भि यही कहना चाहते हें तुमसे। " दिवाकर चौधरी नें कहा___"मगर हमारे सामने समस्या यह हैं कि इस मामले मे हम् कोई भि क़दमखुल कर नहि उठा सकते। क्योंकि तुम्हारे भतीजे नें साफ शब्दों मे धमकी दि हैं कि अगर हमनेकुछ उल्टा सीधा करने कि कोशिश कि तोँ वोँ हमें हि नहि बल्कि इन तीनों कों भि बीच चौराहे पर्र नंगा दौड़ा देगा। "
"यह क्याँ कहरहे हें आप्?" अजय सिंह चौधरी कि यहबात सुनकर बुरीतरह हैरान रह गय़ा थां, बोला__"भला वोँ ऐसा केसेकर सकता हैं?"
"दरअसल। " चौधरी नें ज़रा झिझकते हुए कहा___"उसके पास हम् सबके खिलाफ़ ऐसे सबूत हें जोँ अगर पब्लिक केँ सामने आँ जाएॅ तौ हम् चारों कां बेड़ा गर्क होँ जाएगा। "
चौधरी कि बातसुन करअजय सिंह चौधरी कों इसतरह देखने लगा थां जैसे अचानक हि उसकेसिर पऱ गधे कां सिर नज़रआने लगा हौ। अजय सिंहयह सोचकर भि हक्का बक्का रह गय़ा थां कि विराज केँ पास उसके खिलाफ़ तौ उसका बेड़ा गर्ककर देने वाला सबूत थां हि औऱ अब चौधरी केँ खिलाफ़ भि ऐसा सबूत हैं उसकेपास। अजय सिंह कों लगा कि उसे चक्कर आँ जाएगा यहजान करमगर फिन उसने स्वयं कों बड़ी मुश्किल सें सम्हाला। उसेयह भि समझ आँ गय़ा कि जिस उम्मीद सें औऱ खुशी सें वो चौधरी केँ पासआया थां वोँ चौधरी तोँ स्वयं हि विराज केँ सामने भीगी बिल्ली बना बैठा हैं। यह सोचते हि अजय सिंह कां सारी उम्मीद औऱ सारी खुशी एक् हि समय मे नेस्तनाबूत होँ गई।
"यह तौ बहोत हि गजबनाक बातकह रहे हें आप्। " फिन उसने स्वयं कों सम्हालते हुए कहा___"बड़े आश्चर्य कि बात हैं चौधरी साहब कि आप् जैसा इंसान सभीकुछ करने कि क्षमता रखतेहुए भि कुछ नहि कर सकता हैं। "
"यहसच हैं ठाकुर। " चौधरी नें गंभीर भाव सें कहा___"जब तक उसकेपास हमारे खिलाफ़ वोँ सबूत हें तब तक हम् कोईठोस क़दम उठाने कां सोच भि नहि सकते हें। दूसरी बात उसके कब्जे मे हमारे बच्चे भि हें जिनके संग वोँ कुछ भि उल्टा सीधाकर सकता हैं। ऐसे हालात मे हम् उसके खिलाफ भलाकोई कठोर क़दम केसेउठा सकते हें? इसलिए हमने सोचा कि हमारा जौ दुश्मन हैं वही तुम्हारा भि हैं तौ तुम् अवश्य इस मामले मे कोईठोस कार्यवाही कर सकते हौ। यकीन मानो ठाकुर, अगर तुम् उस नामुराद कां पता करकेतथा उसके कब्जे सें हमारे बच्चों केँ संगसंग उस सबूत कों भि लाकर हमारे हवाले करदो तोँ हम् जिंदगी भर तुम्हारे एहसानमंद रहेंगे। तुम् जिस चीज़ कि हसरत करोगे वोँ चीज़ हम् लाकर तुम्हें देंगे। "
मंत्री कि यहबात सुनकर अजय सिंह चकितरह गय़ा थां। उसकेमुख सें कोई लफ्ज़ नं निकलसका थां। चौधरी उससे सहायता कि उम्मीद किये बैठा थां जबकि उसेपता हि नहि थां कि इस मामले मे तौ वोँ स्वयं भि पंगुहुआ बैठा हैं। कितनी अजीबबात थि दोनो एक् दूसरे सें सहायता कि उम्मीद कररहे थें जबकि दोनो हि एक् दूसरे कि कोई सहायता नहि कर सकते थें। अजय सिंह कों एकाएक हि उसका भतीजा किसी भयावह काल कि तरह लगनेलगा थां। उसके समूचे शरीर मे मौत कि सि झुरझुरी दौड़ गई थि।
"क्याँ सोचने लगे ठाकुर। " उसेचुप देखकर चौधरी पुनःबोल पड़ा___"तुमने हमारी बात कां कोई जवाब नहि दिया। जबकि हम् तुमसे इस मामले मे सहायता कि बातकर रहे हें। "
"मे तोँ यह सोचने लगा थां चौधरी साहब। "अजय सिंह नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"कि एक् पिद्दी सें लड़के नें प्रदेश कि इतनी बड़ी हस्ती कां जीना हरामकर दिया हैं। अभि तक तौ मे यहीसोच रहा थां कि उसने तोँ मात्र मेरा हि जीना हराम कियाहुआ थां मगर हैरत कि बात हैं कि उसने अपने निशाने पर्र आपको भि लियाहुआ हैं। "
"सभीसमय औऱ हालात कि बातें हें ठाकुर। " दिवाकर चौधरी नें कहा___"उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत भि हें औऱ हमारे बच्चे भि हें जिनके तहत उसका पलड़ा बहोत भारी हैं। अगरकम सें कम हमारे बच्चे उसकेपास नहि होते तोँ हम् उसे बताते कि हमारे संगऐसी ज़ुर्रत करने कि क्याँ सज़ामिल सकती थि उसे? ख़ैर छोंड़ो, तुम् बताओ कि क्याँ तुम् इस मामले मे हमारी कोई सहायता कर सकते हौ याँ नहि?"
"मे पूरी कोशिश करूॅगा चौधरी साहब। "अजय सिंह नें कहा___"कि मे इस मामले मे आपकेलिए कुछखास कर सकूॅ औऱ जैसा कि आपको मे बता हि चुकाहूॅ कि वोँ नामुराद मुझे भि अपना दुश्मन समझता हैं औऱ मुझसे बदला लें रहा हैं तौ उस हिसाब सें यह भि सच हैं कि मे भि यही चाहता हूॅ कि जल्द सें जल्द वोँ मेरी पकड़ मे आँ जाए। एक् बारपता चलजाए कि वोँ कमीना किस कोने मे छुपा बैठा हैं उसकेबाद तौ मे उसका खात्मा बहोत हि हसीनढंग सें करूॅगा। "
"ठीक हैं ठाकुर। " चौधरी नें कहा___"हम् भि यही चाहते हें कि उसके ठिकाने कां पता किसीतरह सें चलजाए। उसकेबाद हमारे लिएकोई क़दम उठाना भि आसान हौ जाएगा। "
ऐसी हि कुछदेर औऱ कुछ बातें होती रहीं। साम घिर चुकी थि औऱ अबरात होने वाली थि। इसलिए अजय सिंह चौधरी सें इजाज़त लेकर वापस हल्दीपुर केँ लिए निकल चुका थां। सारे रास्ते वो चौधरी केँ बारे मे सोचता रहा थां। उसे यकीन नहि हौ रहा थां कि उसका भतीजा इतना बड़ा सूरमा हौ सकता हैं कि वोँ प्रदेश केँ मंत्री तक कों अपनी मुट्ठी मे कैदकर लेँ। उसने मंत्री सें कह तोँ दिया थां कि वोँ इस मामले मे उसकी सहायता करेगा मगरयह तौ वही जानता थां कि वोँ उसकी कितनी सहायता कर सकता थां? ख़ैरथका हाराव परेशान हालत मे अजय सिंह अपनी हवेली पहुॅच गय़ा थां। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ स्वयं अपनेतथा चौधरी केँ लिएअब क्याँ करे?
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दोस्तो, आप् सबके सामने एपसोड हाज़िर हैं,,,,,,,
आप् सबकी प्रतिक्रिया तथा रिव्यू कां इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Just awesome mind blowing superb fantastic update bhay, daddy deni paregi bhay Viraj की ya phir ap की dimag की joo farmhouse की barey mey Viraj ney lagaya hey, achcha hua समय rehtey nikal geya, bhay Nilam कहा hey nana ke sath नहीं milaya usko, और yeh एक bikhari dusrey bukhari sey help mang raha hey, dekhtey hey yeh saytano की toli sath milkar क्या krta hey और Viraj keysey unki mukabla krta hey, last lekin not least yeh I-PHONE kaa क्या chakkar hey bhay, thoda humko bi samjha दो (just a part of joke)
keep it up and as always waiting for
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
Wow just wow shubham bhay kya khatarnak update diya h kya twist laye hu mind-blowing aage dekhte he thakur or mantri kee kese lagti h looking forward
Behtarin update bhay ab too moorti k pitaji bi aagaye he aur sare dusman 1 hogaye he bhay nilam nahee mili nana jise waiting for next update
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