♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो माफी चाहता हूॅ।
टाइम नं मिलने कि वजह सें एपसोड नहि देपारहा हूॅ। आज कां टाइम मेरी दूसरी कहाने केँ एपसोड मे हि निकल गय़ा।
मे पूरी कोशिश करूगा कि कलइस स्टोरी कां एपसोड दे सकूॅ।
कुछ दिन कि औऱ बात हैं दोस्तो, फिन स्टोरी कि रफ्तार बढ़ जाएगी।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 24 》
अब तक,,,,,,
"मुझेमाफ कर दे.माफ करदे मुझे। " विराज नें निधि कों अपने सीने सें अलग करके अपने दोनोहाथ जोड़कर कहा__"यह मे क्याँ कररहा थां गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों सें अपनीजान सें भि ज़्यादा प्यारी अपनी गुड़िया कां गलादबा रहा थां मे। मुझेमाफ करदे गुड़िया, मुझसे कितना नीचकाम हौ गय़ा.तूँ तूँ मुझेइस सबकेलिए कठोर सें भि कठोर सज़ादे गुड़िया। "
"भइयाऽऽ। " निधि कां दिल हाहाकार करउठा, उसने एक् झटके सें विराज कों स्वयं सें चिपका लिया। बुरीतरह रोयेजा रही थि वो। वो जानती थि कि यह जोँ कुछ भि हुआ उसमें विराज कि कहींकोई ग़लती नहि थि। वोँ तोँ बस एक् गुबार थां, जोँ इस प्रकार सें निधि कों हि विधीसमझ कर उसके अंदर सें फट पड़ा थां।
जाने कितनी हि देर तक यहीआलम रहा। निधि अपने भइया कों शान्त कराती रही। शराब केँ नशे मे विराज वहीं निधि कि गोंद मे सिररख करसो गय़ा थां। निधि बड़े प्रेम सें उसकेसिर केँ बालों पर्र उॅगलियाॅ फेरती जारही थि। उसकी नज़रें अपने भइया केँ उस चेहरे पऱ जमी हुइ थि जिस चेहरे पर्र इससमय संसार भर कि मासूमियत विद्यमान थि।
'आप् चिन्ता मत कीजिए भाई, आपकीयह गुड़िया आपको इतना प्रेम करेगी कि आप् संसार केँ सारेदुख सारेग़म भूल जाएॅगे। आप् मेरीजान हें औऱ मे आपकीजान हूॅ। इस लिएआज सें आपकी खुशी केँ लिए मे वोँ सभीकुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अबआगे,,,,,,,,
विराज कों करीबचार घंटेबाद होशआया। निधि कि गोद मे सिररखे वो उसीतरह लेटाहुआ थां। उसकेसिर पऱ निधि कां हाॅथ थां औऱ वो स्वयं भि वहीं पर्र यूॅ हि सो गई थि। दोनो हि नहि जानते थें कि जिसशिप मे वोँ दोनोइस वक़्त थें वो कहाॅ सें कहाॅ घूमते हुए पहुॅच गय़ा थां।
विराज कों जबहोश आया तौ उसने अपनेसिर कों निधि कि गोद मे टिकाहुआ पाया। उसने देखा कि उसकीजान उसकेसिर पर्र अपना हाॅथरखे यूॅ हि सो गई थि। उसके हसीन चेहरे पर्र संसार भर कि मासूमियत विद्यमान थि। विराज कों उस पर्र बड़ा प्रेम आया। वो आहिस्ता सें निधि कि गोद सें उठा औऱ फिन निधि कों बड़ी हि आसानी सें अपनी बाजुओं मे उठा लिया। पास मे हि एक् तरफरखे सोफे पऱ उसने निधि कों आहिस्ता सें लिटाया। उसकेबाद वो स्वयं भि उसके चेहरे केँ समीप हि बैठ गय़ा औऱ अपनी गुड़िया कों सोते देखने लगा। कुछ देरयूॅ हि देखने केँ बाद वो झुका औऱ निधि केँ माथे पर्र आहिस्ता सें चूॅमा फिनउठ कर बाथरूम कि तरफबढ़ गय़ा।
विराज केँ जाते हि निधि नें मुस्कुराते हुएपट सें अपनी आॅखें खोल दि। कुछ लम्हा जाने क्याँ सोचती रहीफिन उसने बहोत हि धीमे स्वर मे कहा__"आपको तौ यह भि नहि पताजान जी कि किस किसी लड़की केँ माथे पर्र नहि बल्कि उसके होंठो पऱ किया जाता हैं। मगर आप् चिन्ता मत कीजिए.आप् यह भि जानने लगेंगे.मे सभी बताऊॅगी न् आपको, हाॅ नहि तौ। " यहकहकर वो हॅस पड़ीफिन सहसा शर्मा भि गई वो। अपने दोनो हाथों द्वारा जल्दी हि अपना चेहरा छुपा लिया उसने।
कुछ देरबाद विराज जब बाथरूम सें वापसआया तौ उसने अपनी गुड़िया कों अपने हि हाथों अपने चेहरे कों छुपाये हुए पाया। उसे लगा गुड़िया अभि भि उसकेलिए दुखी हैं, इसलिए वो जल्दी हि उसकेपास पहुॅचा औऱ फर्स पऱ उसके घुटनों केँ पासबैठ गय़ा।
"तूँ दुखीमत होँ गुड़िया। " विराज नें अपने हाॅथों द्वारा निधि केँ चेहरे सें उसके हाॅथों कों हटाते हुए कहा__"मे तुझसे वादा करताहूॅ कि अब सें मे स्वयं कों दुखी नहि करूॅगा। उसकी यादों पर्र तौ मेराकोई ज़ोर नहि हैं मगरअब उसकी यादों सें मे स्वयं कों विचलित नहि करूॅगा। "
"यह तौ बहोत अच्छी बात हैं भाई। " निधि नें कहा__"उस लड़की कों याद करके अपनेदिल कों क्यूं परेशानी देना जिसे प्रेम कि परिभाषा कां ज्ञान हि नं हौ। "
"तूँ सहीकह रही हैं गुड़िया। " विराज केँ चेहरे पऱ एकाएक ज़लज़ले केँ सें भावआए, बोला__"मगर इसका हिसाब तौ मे उससे लूॅगा गुड़िया। उसे मेरेसंग इस खिलवाड़ कों करने कि सज़ा अवश्य मिलेगी मेरे हाथों। ऐसाहाल करूॅगा उसका कि फिन किसी केँ संगऐसा करने कि हिम्मत भि नहि करेगी वोँ। "
"क्याँ आपकाऐसा करना मेरा मतलब हैं कि उसे सज़ा देना उचित हैं भाई?" निधि नें कहा__"उसने जोँ कियाउसे उसकाफल ईश्वर स्वयं हि दे देगा। आपने उससे सच्चा प्रेम किया थां, इसलिए आप् उसकेलिए अपनेमन मे ऐसा विचार केसेरख सकते हें??"
"मे जानता हूॅ गुड़िया कि प्रेम मे बदले कि ऐसी भावना याँ विचार रखना उचित नहि हैं। " विराज नें कहा__"मगर किसी कों आईना दिखाना तौ सर्वथा उचित हैं नं। वही करना चाहता हूॅ मे। "
"ठीक हैं आपको जोँ अच्छा लगे वोँ कीजिये भाई। " निधि नें कहा__"शायद इससे आपकेदिल कों चैनमिल जाए। "
"क्षमा करना गुड़िया। " विराज नें खेदभरे स्वर मे कहा__"मे तुम्हें यहाॅकिस लिये लाया थां औऱ क्याँ होँ गय़ा। मगर तुँ फिक्र मतकर, अभि तौ बहोत वक़्त हैं। चल हम् दोनोअब इसटूर कां आनन्द लेते हें। "
"कोईबात नहि भाई। " निधि नें प्रेम भरे लहजे मे कहा__"आपसे बढ़कर मेरेलिए कुछ भि नहि हैं। आप् मेरीजान हें, औऱ जब मेरीजान हि खुश नहि रहेगी तोँ भला मे केसे किसी चीज़ सें खुशरह सकतीहूॅ?"
"तुँ औऱ तेरीयह बातें। " विराज नें मुस्कुरा कर कहा__"मेरी समझ सें बाहर् हें गुड़िया। "
"ऐसा क्यूं?" निधि नें विराज कि तरफगौर सें देखते हुएकहा थां।
"कभीकभी मुझेऐसा लगा करता हैं जैसे तेरे अलावा भि तुझ मे कोई औऱ कैरेक्टर हैं जोँ कुछ औऱ कहने लगता हैं। " विराज नें कहा__"कुछ ऐसा कहने लगता हैं जौ मेरीसमझ मे हि नहि आता। "
"अच्छा, ऐसा आपको क्यूं लगता हैं भाई?" निधि नें धड़कते दिल सें कहा__"कि मेरे अंदरकोई औऱ भि कैरेक्टर हैं जोँ कुछ औऱ हि कह डालता हैं?"
"पता नहि गुड़िया। " विराज नें कहा__"कभी कभी लगता हैं जैसे तूँ अब मेरी वोँ गुड़िया नहि रही जोँ हर चीज़ कों अपनी मधुरव चुलबुली बातों सें हसकर उड़ा देती थि बल्कि अब तूँ बड़ी हौ गई लगती हैं। इतनी बड़ी कि तेरी बातों मे अब किसी रहस्य तथा किसी दूसरे हि अर्थ कां आभास होता हैं जोँ समझ सें परे होता हैं। "
निधि अपलक देखती रह गई विराज कों। उसकेदिल कि धड़कने अनायास हि बढ़ गई थि। उसेसमझ मे नं आया कि वोँ क्याँ जवाबदे???
"मे सचकहरहा हूॅ न् गुड़िया?" उसेचुप देख विराज नें कहा__"ऐसी हि बात हैं नं तुझ मे?"
"पता नहि भाई। " निधि नें सिर झुकाकर कहा__"जाने क्यूं ऐसा लगता हैं आपको, जबकि ऐसी तोँ कोईबात हि नहि हैं। "
"चलकोई बात नहि गुड़िया। " विराज नें निधि केँ चेहरे कों अपने दोनो हाॅथों मे लेतेहुए कहा__"पऱ तुँ इतनासमझ लें कि तेरायह भइया तुझसे बहोत प्रेम करता हैं औऱ तुम को हमेशा खुशियों सें चहकती व फुदकती हुइ हि देख्ना चाहता हैं। "
विराज कि बातें सुनकर निधि कि आॅखें भरआई। उसकेदिल मे भावना कां एक् तीब्र भूचाल सां आँ गय़ा। उसी भावना केँ वशीभूत होकर वो विराज सें लिपट गई। विराज केँ सीने मे चेहरा छुपाए हुए हि बोलि__"पर्र यहतभी संभव हैं जब आप् भि खुश रहेंगे। अगर आप् किसीबात सें दुखी होंगे तोँ मे भि दुखी होँ जाऊॅगी। "
"ऐसा क्यूं भला?" विराज नें कुछ सोचते हुए पूछा थां।
"क्योंकि मे आपसे प्या.। " निधि कहतेहुए अचानक हि रुक गई। उसे एकाएक हि ध्यान आया थां कि वो यह क्याँ बोलने वाली थि। उसकी हालतसमय भर मे ख़राब होँ गई। दिल कि धड़कने इतनी तीब्र होँ गई उसकीधमक कनपटियों मे स्पष्ट सुनाई देनेलगी थि। उसने जल्दी हि बात कों सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल सें कहा__"क्यूं कि आप् हमारे लिएसभी कुछ हें भ भाई.अगर आप् हि इसतरह दुखी रहेंगे तौ हम् माॅ बेटी केसेखुश रह सकेंगे भला?"
निधि नें भले हि अपनीसमझ मे बात कों सम्हाल लिया थां लेकिन उसके पहले अधूरे वाक्य नें हि सारी सच्चाई स्पष्ट कर दि थि। विराज नें पूछा हि इसतरह थां कि जल्दबाजी औऱ बेध्यानी मे उसकेमुख सें वोँ निकल गय़ा थां जौ वर्षों सें उसकेदिल मे पनपरहा थां। विराज यहसुन करतथा यहजान कर बुरीतरह हिल गय़ा थां कि उसकीजान उसकी गुड़िया उससे प्रेम करती हैं। यही वोँ बातें थि जौ द्विअर्थी होती थि औऱ विराज कों समझ मे नहि आती थि। लेकिन आज संयोगवश सभीकुछ सामने आँ गय़ा थां। निधि स्वयं हि बेख़याली मे बोल गई थि।
अपने भइया कों खामोश जानकर निधि कों झटका सां लगा। उसे समझते देर न् लगी कि सभी गड़बड़ हौ चुका हैं। मतलब उसका भइया उसके पहले हि अधूरे वाक्य कों सुनकर समझ चुका हैं कि उसकी सच्चाई क्याँ हैं। बात कों सम्हालने कि उसकी कोशिश बेकार होँ चुकी थि। हालतयह होँ गई उसकी कि अपने भइया सें नज़र मिलाने कि उसकी हिम्मत नहि होँ रही थि अब। भइया केँ सीने मे चेहरा छुपाए वो वैसी हि खड़ीरही। उसेलग रहा थां कि यह ज़मीन फटे औऱ वो पाताल तक उसमे समाती चलीजाए। मगरचाह कर भि तोँ वो ऐसा न् करसकी। उसके होंठ घबराहटवश बुरीतरह थरथरा रहे थें।
वातावरण मे अजीब सि शान्ति छा गई थि। बहुतदेर तक यहीआलम रहा। दोनो मे सें कोई भि कुछ नं बोलरहा थां। विराज तोँ जैसे वहाॅ थां हि नहि बल्कि किसी गहरे ख़यालों केँ समंदर मे डूबाहुआ नज़र आँ रहा थां। बारबार उसके ज़ेहन मे यहीबात गूॅजरही थि कि उसकी गुड़िया उसकी अपनी बेहन उससे प्रेम करती हैं।
"भ भाई। " सहसा निधि नें हिम्मत जुटाकर तथा विराज केँ सीने सें अपना चेहरा उठाकर विराज कि तरफ देखते हुए धीमे स्वर मे कहा__"क्याँ बात हैं.आप् एकदम सें चुप क्यूं होँ गए? क्याँ मुझसे कोई ग़लती होँ गई? अगरऐसा हैं तोँ मुझे क्षमा कर दीजिए प्लीज़। "
विराज केँ कानों मे निधि कि जबयह बातें पड़ीं तौ वो ख़यालों केँ गहरे समुद्र सें बाहर् आया। वस्तुस्थित कां आभास होते हि उसने निधि कि तरफ अजीबभाव सें देखा। निधि स्वयं भि उसी कि तरफदेख रही थि लेकिन सीघ्र हि उसकी नज़रें झुकगईं। जाने क्यूं अपने भइया कि आॅखों सें आॅखें न् मिलासकी वो। कदाचित् इसलिए कि उसकेदिल कां भेद उसके भइया केँ सामने खुल चुका थां।
"आज कां पिकनिक टूर यहीं पऱ ख़त्म हौ चुका गुड़िया। " सहसा विराज नें सपाटभाव सें कहा__"अब हम् वापसघऱ चलरहे हें। "
इतनाकह कर विराज नें निधि कों स्वयं सें अलग किया औऱ बाहर् कि तरफचल दिया। निधि कों जाने क्यूं ऐसालगा जैसे उसकासभी कुछलुट गय़ा हैं, उसके सीने मे बड़ा तेज़ दर्दउठा। आॅखों केँ सामने अॅधेरा सां छा गय़ा। ऐसालगा जैसे वो अभि गशखाकर वहीं फर्स पर्र गिर पड़ेगी। मगर आखिरी वक्त मे उसने बड़ी मुश्किल सें स्वयं कों सम्हाल लिया। दिल मे उमड़ते हुए जज़्बातों मे प्रबलता आँ गई जिसकी वजह सें उसकी रुलाई फूट गई। वो जीजान सें विराज कि तरफ दौड़ी औऱ पीछे सें विराज कि पीठ सें लिपटकर ज़ार ज़ार रोनेलगी।
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"यह तुम् क्याँ कहरहे होँ हरिया?" अजय सिंह बुरीतरह चौंका थां__"तुमने अच्छी तरहपता किया तौ हैं नं ?"
"जीहाॅ मालिक। " हरिया नाम कां एक् व्यक्ति जौ कि अजय सिंह कां हि व्यक्ति थां बोला__"मैने अच्छी तरहपता किया हैं। आपके छोटे भइयाकल हि यहाॅ सें बम्बई केँ लिए निकलगए थें। उन्होंने अपनी पत्नि औऱ बच्चों कों कल हि उदयपुर भेज दिया थां। मेरे एक् खास व्यक्ति नें अपनी आॅखों सें उनको जातेहुए देखा थां। उसी नें बताया कि छोटी मालकिन(करुणा) केँ भइया उनकेसंग हि थें। "
अजय सिंहयह सभीजान कर बुरीतरह भिन्ना गय़ा। उसने तौ सोचा थां कि अभय केँ जाते हि वो करुणा कों उठवा लेगा औऱ उसे अपनेनये फार्महाउस पर्र रखेगा। उसकेबाद वो जिसतरह चाहेगा करुणा केँ गदराए हुएव मादक सें बदन कां मजा लूटेगा। लेकिन हरिया कि इस ख़बर नें उसकेसब अरमानों पर्र पानी नहि फेरा थां बल्कि बाल्टी भर पेशाब कर दिया थां। उसेइस बात कि कतई उम्मीद नहि थि कि उसका छोटा भइयाअभय इतना शातिर दिमाग़ निकलेगा जोँ इतनाआगे कां सोचकर अपनाखेल खेल जाएगा।
अजय सिंह चाहता तौ करुणा कों उसके मायके सें भि उठवा सकता थां लेकिन उस सूरत मे बहोत बड़ा बवाल होँ जाता। इस लिएअब वो अपनेहाथ मलने केँ अलावा कुछ नहि कर सकता थां। करुणा नाम कि सुंदर चिड़िया अब उसके हाॅथ सें निकल गई थि।
अजय सिंह नें सोचा थां कि अभय केँ पीछे अपने आदमियों कों लगा देगा लेकिन वोँ भि नं करसका वो। क्योंकि उसेपता हि नं चल पाया थां कि अभय सिंह नें कब क्याँ किया थां?
"तुम् पताकरो हरिया। " फिन उसनेकुछ सोचते हुए कहा__"अभय मुम्बई जा चुका हैं याँ नहि?"
"वोँ तोँ कल हि यहाॅ सें चलेगए थें मालिक। " हरिया नें कहा__"औऱ आज तौ वोँ बम्बई पहुॅच भि गए होंगे। "
"अरे बेवकूफ कल वोँ मुम्बई केसेजा सकता हैं?" अजय सिंह नें हुड़की दि__"साम सें पहले तक तोँ वोँ यहीं थां, औऱ साम कों भलाकौन सि ट्रेन इसशहर सें मुम्बई जाती हैं। वो तौ दोपहर कों जाती हैं। मतलबसाफ हैं कि अभयकल नहि आज गय़ा होगा मुम्बई। "
"यह तौ मैने सोचा हि नहि मालिक। " हरिया नें सिर झुकाकर कहा__"छोटे मालिक अगरआज गए होंगे तोँ कल हि पहुॅचेंगे बम्बई। अब हम् क्याँ करें मालिक?"
"अभि भि कुछ नहि बिगड़ा हैं हरिया। " अजय सिंह नें कहा__"यह तौ तुम्हें भि मालूम हैं कि हमारे कुछ व्यक्ति मुम्बई मे हि हें जौ विराज औऱ उसकीमाॅ बहनों कि खोज मे लगेहुए हें। हम् अपनेउन आदमियों कों मोबाइल करकेकह देंगे कि वोँ अभय पऱ नज़र रखें। अभय कल मुम्बई पहुॅचेगा। मुम्बई मे जैसे हि वो ट्रेन सें उतरेगा वैसे हि हमारे व्यक्ति उसके पीछेलग जाएंगे। "
"यह तोँ बहोत बढ़िया आइडियवा हैं मालिक। " हरिया नें इंग्लिश कि माॅ बेहन एक् करतेहुए कहा__"छोटे मालिक जहाॅ जहाॅ जाएॅगे हमारे आदमीं भि उनके पीछे जाएॅगे। "
"अब तुम् जाओ हरिया। " अजय सिंह नें कहा__"हम् भि किसी ज़रूरी काम सें बाहर् जारहे हें। "
"ठीक हैं मालिक। " कहतेहुए हरिया चला गय़ा वहाॅ सें।
अजय सिंह नें फोन निकाल कर मुम्बई मे स्थित अपने आदमियों कों मोबाइल लगाया। अपने आदमियों कों सारी बातें समझाने केँ बाद उसने मोबाइल काट दिया।
अभि वो इस सबसे फारिग़ हि हुआ थां कि सामने सें उसकी इंस्पेक्टर बेटी रितूआती हुइ दिखी। अजय सिंहउसे देखकर बसअहह सि भरकररह गय़ा। पुलिस कि चुस्त दुरुस्त वर्दी मे उसकी बेटी ग़ज़ब ढारही थि। बदन कां एक् एक् उभारसाफ नज़र आँ रहा थां। अजय सिंह कि आॅखें एकटक रितू केँ सीने पऱ टिकी हुई थि। जहाॅ पऱ रितू केँ सीने केँ दोठोस लेकिन बड़े बड़े वक्ष उसके चलने केँ कारण एक् रिदम पऱ ऊपर नीचेकूद सें रहे थें।
अजय सिंह अपनी बेटी केँ वक्षों कों ललचाई नज़रों सें देख हि रहा थां कि तभी अंदर सें आती हुई प्रतिमा कि नज़रअजय सिंह पर्र पड़ी। अपने पति कों अपनी हि बेटी केँ बड़े बड़े पर्वत शिखरों कों ललचाई नज़रों सें देखते देख वो मन हि मनकहउठी 'स्स्स अजय तुम् कभी नहि सुधर सकते। '
"अरे.तुम् अभि तक यहीं बैठे हौ?" प्रतिमा नें जल्दी हि अजय सिंह कां ध्यान भंग करने कि गरज सें कहा__"तुम् तौ कहरहे थें कि शहर जानां थां?"
अजय सिंह चौंका, उसने जल्दी हि अपनी बेटी पर्र सें नज़रे हटाली। कुछसमय केँ लिए उसके चेहरे पर्र ऐसेभाव उभरे जैसेइस सबसे वो बेहद शर्मसार हुआ होँ लेकिन फिन अगले हि लम्हा स्वयं कों सम्हाल कर बोला__"ह हाॅहाॅ बस निकल हि रहाहूॅ मे। "
तब तक रितू भि आकर वहाॅ पऱ रखे एक् सोफे पर्र करीबपसर सि गई। अपनेसिर सें पुलिस कि कैप उतारकर तथाहाथ मे लिए पुलिस रुल कों उसने एक् तरफरख दिया औऱ फिन अपनीमाॅ कि तरफ देखते हुए कहा__"माॅम एक् कप काॅफी मिलेगी क्याँ??"
"अभि लाई बेटी। " कहतेहुए प्रतिमा वापसपलट गई औऱ किचेन कि तरफचली गई।
"लगता हैं मेरी बेटी केँ सीने मे काम औऱ जिम्मेदारी कां बोझ बहोत हि ज़्यादा हैं। " अजय सिंह नें पुनः रितू केँ सीने कि तरफ एक् नज़रडाल करकहा थां।
"सीने पर्र?????" रितू नें चकराकर कहा__"काम औऱ जिम्मेदारी कां बोझ तौ कंधों पऱ होता हैं नाँ डैड??"
"ओह हाॅहाॅ बेटी। " अजय सिंह बुरीतरह हड़बड़ा गय़ा। उसके चेहरे पर्र घबराहट केँ भाव भि उभरे लेकिन फिन जल्दी हि सम्हल कर बोला__"यू आर राइट.अब्सोल्यूटली राइट। "
"डैड कल सें शिवा कहीं नज़र नहि आँ रहा?" रितु नें पहलू बदलते हुए कहा__"औऱ नां हि चाचा चाची जी वगैरा कहीं नज़र आँ रहे हें?"
"शिवा तौ शहर मे हैं बेटी। " अजय नें राहत कि साॅस लेतेहुए कहा__"बाॅकियों कां मुझेपता नहि। सभी अपनी मर्ज़ी केँ मालिक हें। कहींआने जाने केँ लिए वोँ किसी सें पूछना ज़रूरी नहि समझते। ख़ैर तुम् बताओ, तुम्हारे केस कां क्याँ हुआ? मेरा मतलब हैं कि क्याँ यहपता चलसका कि हमारी फैक्टरी मे किसने बम्ब स्लिम किया थां?"
"नहि डैड। " रितू नें कहा__"बड़ा हि पेंचीदा मामला हैं। इस मामले मे कुछ भि पता नहि चलसका कि वोँ कौन थां? हाॅ इतना जरूरपता किया कि फैक्टरी केँ गेट केँ बाहर् मौजूद गार्ड झूठबोल रहा थां। दरअसल जिसरात यह हादसा हुआ थां उसरात गेट पऱ एक् हि गार्ड थां औऱ वोँ भि चौबीस घंटे कि ड्यूटी पऱ। इसलिए रात मे वो गेट केँ बाहर् रखी कुर्सी पऱ बैठा बैठा हि ऊॅघरहा थां। इसकेबाद उसनेयह बताया कि उसेयह आभासहुआ कि कोई चीज़ उसकी नाॅक केँ पासलाई गई थि। जिसके असर सें उसेपता हि नहि चला कि वो कब बेहोश होँ गय़ा थां? उसकेबाद तबउसे होशआया जब फैक्टरी मे लगीआग सें अफरा तफरीमची हुइ थि। यकीनन जोँ चीज़ उसके नाॅक केँ पासलाई गई थि वो क्लोरोफाॅम डालाहुआ कोई रुमाल रहा होगा याँ फिन स्वयं क्लोरोफाॅम कि बाॅटल। इस हादसे सें वो गार्ड बहोत अधिकडर गय़ा थां इसीलिए शुरुआत मे उसनेयही कहा थां कि वो रातभर जागता रहा थां औऱ उसके सामने कोई भि ऐसा ब्यक्ति नहि आया थां जोँ फैक्टरी केँ अंदर गय़ा हौ। "
"तोँ फिन क्याँ फायदा हुआ तुम्हारे द्वारा केस कों रिओपन करने सें?" अजय सिंह नें रितू कि तरफ अजीबभाव सें देखते हुए कहा__"आख़िर क्याँ नतीजा निकला बेटी? वरनाजिस तरह सें तुमने इसकेस कों रिओपन किया थां उससे तौ यही ज़ाहिर होँ रहा थां कि इसबार कोई न् कोई सुराग़ अवश्य पुलिस केँ हाथ लगेगा। दूसरी बातयह भि मुझेपता चली थि कि इसकेस केँ रिओपन होने केँ जल्दी बाद हि रातों रातशहर केँ सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट कां तबादला कर दिया गय़ा थां। प्रश्न हैं कि ऐसा क्यूं हुआ थां?"
"यह प्रश्न तौ मेरेलिए भि सोचने कां विषयबना हुआ हैं डैड। " रितू नें सोचने वालेभाव सें कहा__"मुझे स्वयं यहबात समझ मे नहि आँ रही कि गृह मंत्री नें शहर केँ सारे पुलिस विभाग कां रातों रात तबादले कां आदेशकिस वजह सें दिया थां? अगर हम् यह सोचें कि इसकीवजह यह हैं कि पिछली बार फैक्टरी केँ केस मे पुलिस नें अपनी पूरी ईमानदारी सें तहकीकात नहि कि थि बल्कि ग़लत रिपोर्ट रेडी कि थि तौ भि यह इतनी बड़ीवजह नहि हौ सकती कि इसकीवजह सें शहर केँ सारे पुलिस विभाग कां इसतरह तबादला कर दियाजाए। पिछली रिपोर्ट पर्र ऊपर सें इंक्वायरी भि हुईँ थि। जिसमें पुलिस केँ उस अफसर नें यह बयान दिया थां कि ऐसी रिपोर्ट बनाने केँ लिए आपनेकहा थां क्यूं कि आप् नहि चाहते थें कि इसकीवजह सें आपकी इज्जत नीलाम हौ जाए। ख़ैर, आपके कहने पऱ उस अफसर नें भले हि ग़लत रिपोर्ट बनाई थि मगर इसकेलिए उसे ज़्यादा सें ज़्यादा सस्पेंड कियाजा सकता थां मगरऐसा नहि हुआ बल्कि शहर कां सारा पुलिस विभाग हि बदल दिया गय़ा। यही वोँ बात हैं डैड जिसने दिमाग़ कां दही कियाहुआ हैं। "
"हम्म.यकीनन। " अजय सिंह नें गहनसोच केँ संग कहा__"बात तौ वाकई बड़ी हि चक्करदार हैं बेटी। औऱ सबसे बड़ी समस्या तौ यह हैं कि इस बारे मे गृहमंत्री सें पूछा भि नहि जा सकता। "
तभी प्रतिमा हाथ मे ट्रेलिए हुई आई। उसने बहुत कां कप रितू कों दिया औऱ गरमचाय कां एक् कपअजय सिंह कों औऱ गरमचाय कां हि एक् कप स्वयं लेकर वहीं सोफे पर्र बैठ गई।
"क्याँ बातें होँ रही हें बाप बेटी केँ बीच?" प्रतिमा नें मुस्कुरा करकहा थां।
अजय सिंह नें संक्षेप मे उसेबता दिया। सुन कर प्रतिमा नें कहा__"यह तोँ सचमुच बड़ी सोचने वालीबात हैं। इसकेस मे आख़िर ऐसा क्याँ थां जिसके लिए स्वयं गृहमंत्री कों भि हस्ताक्षेप करना पड़ा? इतना हि नहि बल्कि उन्होंने रातोरात शहर केँ सारे पुलिस विभाग कां तबादला भि कर दिया थां। "
प्रतिमा कि इसबात केँ बाद वहाॅ पऱ सन्नाटा छा गय़ा। कोईकुछ नं बोला, कदाचित् इसलिए कि किसी केँ पास इसकाकोई जवाब नहि थां। यहअलग बात थि सबकेमन मे यहबात गहनरूप सें विचाराधीन थि।
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"नहि.प्लीज़ रुक जाइये.आप् इसतरह केसेजा सकते हें?" निधि नें रोतेहुए कहा थां__"हम् तोँ पिकनिक टूर पर्र आए थें न्, फिन इतनी जल्दयह टूर केसे खत्म होँ जाएगा? औऱ.औऱयह अचानक क्याँ हौ गय़ा हैं आपको जौ यहकहरहे हें कि हम् अबघऱ चलेंगे???"
"मुझेकुछ नहि हुआ हैं। " विराज नें अजीबभाव सें कहा__"हम् घऱजारहे हें बस औऱ कोईबात नहि। "
यहकह विराज नें निधि कों अपनीपीठ पऱ सें अलगकर आगे बढ़ने केँ लिएकदम बढ़ाया। लेकिन अधिकदूर जा नहि सका वो। क्योंकि उसके कानों मे जल्दी हि निधि कां करुणायुक्त वाक्य टकराया__"आपको मेरीशपथ हैं अगर आपने एक् क़दम भि आगे बढ़ाया तौ मे अपनीजान दे दूॅगी। मुझे बताइये कि आख़िर क्याँ होँ गय़ा हैं ऐसा जिसकी वजह सें आप् अचानक हि इसतरह कां व्यवहार करनेलगे। अगर मुझसे कोई ग़लती हौ गई हैं तोँ आप् उसकेलिए मुझे जोँ चाहे सज़ादे दीजिए.मुझे आपकीहर सज़ा मंजूर हैं। मगर अपने प्रति आपकीऐसी बेरुखी मे सह नहि सकती। "
"मेरीइस बेरुखी कि वजह तुम् अच्छी तरह जानती हौ। " विराज नें एक् झटके मे पलटकर कहा थां__"तुम् जानती हौ कि किसवजह सें मेरा व्यवहार अचानक हि बदल गय़ा हैं। अगर नहि जानती तोँ इसतरह रोती नहि औऱ नां हि मुझे अपनीशपथ देती। "
निधि देखती रह गई विराज कों। उसे जल्दी कोई जवाब नं सूझा थां। आॅखों मे आॅसूलिए वो बड़ी मुश्किल सें अपनेदिल केँ जज़्बातों कों काबू मे करने कि नाकामयाब कोशिश कररही थि। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ विराज सें क्याँ कहे?
"तुम् ऐसा केसेकर सकती होँ गुड़िया?" उसेचुप देख विराज नें कहा__"क्याँ एक् बार भि तुम्हें यह ख़याल नहि आया कि तुम् यह क्याँ कररही हौ? क्याँ एक् बार भि यह नहि सोचा कि मे तुम्हारा सगा भइयाहूॅ? क्याँ एक् बार भि नहि सोचा कि जौ नाता तुम् बनारही हौ वोँ भइया बेहन केँ बीच नहि हौ सकता? क्यूं गुड़िया, क्यूं कियाऐसा?"
"मुझेमाफ कर दीजिये। " निधि कि रुलाई फूट गई, बोलि__"मैंने जानबूझ करयहसभी नहि किया। यह तौ बस होँ गय़ा। कब केसे मुझे स्वयं पता नहि चला। आप् यकीन कीजिए भाई, मैनेयह नहि किया। आप् तौ जानते हें न् कि कोई किसी सें जानबूझ कर याँ सोचसमझ कर प्रेम नहि करता बल्कि लोगों कों किसीखास ब्यक्ति सें प्रेम स्वयं हि होँ जाता हैं। औऱ उसेखुद इसबात कां पता नहि चल पाता। वैसा हि मेरेसंग हुआ हैं भाई। "
"मगरयह ग़लत हैं मेरी गुड़िया। " विराज नें कहा__"क्याँ तुँ नहि जानती यहबात?"
"मे जानती हूॅ कि यह ग़लत हैं। " रितु नें नज़रें झुकाकर लेकिन भारी स्वर मे कहा__"यह भि जानती हूॅ कि देश समाज भइया बेहन केँ बीचइस रिश्ते कों कभी मान्यता नहि दे सकता बल्कि ऐसे रिश्ते कों पापसमझ करऐसा नाता रखने वाले कों गाॅव समाज सें बहिस्कृत कर देता हैं। इसीलिए मैनेकभी आपके सामने यह ज़ाहिर नहि होने दिया कि मेरेदिल मे आपकेलिए क्याँ हैं? मैने अकेले मे स्वयं कों लाखों बार समझाया कि मुझे अपने दिलो दिमाग़ सें आपके प्रति ऐसे ख़याल निकाल देना चाहिए क्यूं कि यह ग़लत थां। मगर मेरादिल स्वयं केँ द्वारा लाखों बार समझाने केँ बाद भि मेरी नहि सुनता। मे क्याँ करूॅ भाई.अरे कितनी बुरीहूॅ मे औऱ कितनी बद्किस्मत भि हूॅ कि जिससे मुझे जिंदगी मे पहलीबार दिलोजान सें प्रेम हुआ वोँ मेरे भइया हें तथा एक् हि माॅ कि कोख सें जन्में हें। मेरेदिल नें जिनकी अटूट चाहतव हसरतपाल बैठा वोँ उसेकभी मिल हि नहि सकते। "
कहते कहते निधि वहीं फर्स पर्र असहाय अवस्था मे बैठकर ज़ार ज़ार रोनेलगी। जानेकब सें उसकेदिल मे यह गुबार बाहर् निकलने केँ लिएमचल रहा थां। आजउस गुबार नें दिल कि कैद सें बाहर् निकलआने कां जैसे मार्ग ढूॅढ़ लिया थां। हमेशा हॅसती खेलती व शरारतें करने वाली निधिआज जैसेइस सबकेबाद दुख कां दर्पण बन गई थि। जिसदिन उसेइस बात कां एहसास हुआ थां कि उसे अपने हि भइया सें प्रेम हौ गय़ा हैं उसदिन वो खूबरोई थि। क्योंकि वो इसबात कों भली भाॅति जानती औऱ समझती थि कि यह ग़लत हैं। अपने हि भइया कों अपना महबूब बना लेनाकतई उचित नहि हैं। इस संबंध कों समाज निम्न दृष्टि सें देखता हैं। उसनेइस बारे मे अपने आपको बहोत समझाया थां। सबके सामने उसीतरह हॅसती मुस्कुराती रहती लेकिन अपने कमरे मे रात कि तन्हाई मे जब उसकामन भटकते हुए अपने भइया तक पहुॅच जाता तोँ सहसा उसको झटका सां लग जाता थां। धड़कने रुक सि जाती उसकी औऱ यह ख़याल उसे लम्हा मे रुला देता कि यह उसकेदिल नें क्याँ कर दिया? वो रातरात भरइस बारे मे सोचती रहती औऱ भावना व जज़्बातों केँ भॅवर मे स्वयं कों रुलाती रहती। दिल केँ हाॅथों मजबूर होँ चुकी थि वो। छोटी सि इस ऊम्र मे उसकेदिल नें यह कैसा रोग़लगा लिया थां, औऱ लगाया भि थां तौ किसका.स्वयं अपने हि भइया कां? जौ उसकाकभी होँ हि नहि सकता थां।
उसदिन तोँ वो बहोत रोई थि जिसदिन उसेयह पताचला थां कि उसका भइया किसीऐसी लड़की सें प्रेम करता हैं जिसने उसके भइया कों केवलइस लिए दुत्कार कर छोंड़ दिया हैं कि अब वो धन दौलत वाला नहि रहा। इस बात नें निधि केँ दिल मे जाने क्यूं जलन पैदाकर दि थि उससमय। मगर वहींइस बात सें उसकेमन कों थोडा राहत भि हुई थि कि वो लड़कीअब उसके भइया कों छोंड़ कर उसके जिंदगी सें जा चुकी हैं। निधि स्वयं सें यह प्रश्न करती कि उसकोइस बात सें क्याँ फर्क पड़ता हैं कि उसके भइया केँ जिंदगी सें कोई लड़कीजा चुकी हैं याँ नहि। पर्र दिल केँ किसी कोने सें उसेयह आवाज़ भि आती कि 'बहोत फर्क पड़ता हैं.राज मात्र मेरे हें'
अपनेदिल कि इस आवाज़ कों सुनकर उसके रोंगटे खड़े हौ जाते। उसकामन मयूर नाचने लग जाता थां। मगरजब उसेइस बात कां बोध होता कि वोँ जिसे प्रेम करती हैं तथा जिसको अपना बनाने कि हसरत रखती हैं वोँ तोँ उसकासगा भइया हैं जिसे वोँ किसी भि कीमत पऱ अपना नहि बना सकती तोँ उसकादिल बैठ जाता। यह एहसास उसे एक् हि लम्हा मे ज़िन्दा लाश मे तब्दील कर देता। उसके अंदर एक् हूक सि उठती औऱ फिन आॅखों सें मानो गंगा जमुना बहनेलग जातीं। उसे लगता कि इस दुनिया मे उससे अधिककोई दुखी नहि हैं।
निधि कों इसतरह ज़ार ज़ार रोतेदेख विराज बेचैनी कररह गय़ा। आख़िर थि तौ उसकी बेहन हि। ऐसी बेहन जिसकी आॅखों मे आॅसू कां एक् कतरा भि वो नहि देख सकता थां। हालातों नें भले हि अपना चेहरा बदल लिया थां औऱ यहबता दिया थां कि उसकी बेहन केँ मन मे वोँ जानेकब सें एक् महबूब बनकर बैठाहुआ थां मगर वो तौ अभि भि यही समझता थां नं कि निधि उसकी बेहन हि हैं। जिसको वो किसी भि तरहदुख मे नहि देख सकता। इस लिए इसके पहले जोँ उसने बेरुखी कां आवरण धारणकर लिया थां उस आवरण कों उसने सीघ्र हि दरकिनार कर दिया औऱ जल्दी हि झुककर फर्स पऱ बैठीरो रही अपनी बेहन कों उसके दोनो कंधों सें पकड़कर हौले सें उठाया औऱ अपने सीने सें लगा लिया।
"बस करअब। " विराज नें भर्राए हुएगले सें कहा__"तुँ जानती हैं नां कि मे तेरी आॅखों मे आॅसू कां एक् कतरा भि नहि देख सकता। इस तरहरो कर क्यूं मेरे हृदय कों चोंट पहुॅचा रही हैं गुड़िया? चलअब शान्त हौ जा। "
"मुझे क्षमा कर दीजिए भाई। " निधि नें विराज केँ सीने सें लगेहुए कहा__"मगर यहसच हैं कि मे आपसे बेइंतहा प्रेम करतीहूॅ औऱ आपके बिना एक् लम्हा भि जीने कां सोच भि नहि सकती। मे जानती हूॅ भाई कि यह ग़लत हैं पऱ आप् मेरी बेबसी कों भि समझिये। आप् मेरेमन मंदिर मे इसहद तक बस चुके हें कि अब मे हि क्याँ बल्कि स्वयं ईश्वर भि मेरेमन मंदिर सें आपको नहि निकाल सकता। आप् मेरे नहि होँ सकते औऱ नां हि मे आपकोइस बात केँ लिए मजबूर करूॅगी कि आप् मेरे हौ जाइये। बस एक् हि विनती हैं आपसे कि आप् मुझेयह नहि कहेंगे कि मे आपसे प्रेम कां नाता न् रखूॅ, क्योंकि यह मेरेबस मे नहि हैं भाई। "
"यह हमारे क़िस्मत कि कैसी विडम्बना हैं गुड़िया?" विराज नें अत्यंत गंभीर होकर लेकिन दुखीभाव सें कहा__"मे समझ सकताहूॅ तेरेदिल कि हालत कों क्योंकि मे उस हालत सें आज भि गुज़र रहाहूॅ। मगर ज़रा हम् दोनो भइया बेहन केँ नसीब कां खेल तोँ देखो.जिसको मैनेटूट कर चाहा उसने मुझे मात्र इसलिए ठुकरा दिया कि मे रुपये पैसे वाला नहि रहा थां औऱ जिसे तुम् टूटकर चाहती हौ वोँ तुम्हारा हौ हि नहि सकता। यह प्रेम इश्क क्यूं ऐसी होती हैं? इसके नसीब कों क्यूं इसतरह कां बना दिया हैं ईश्वर नें कि यहजिस किसी सें होगी वोँ उसका होँ हि नहि सकेगा? क्यूं ऐसी इश्क बनाई बनाने वाले नें? क्याँ मात्र इसलिए कि मुहब्बत करने वाले अपने महबूब केँ विरह मे जिंदगी भर तड़पें??"
"शायदइसी लिएराज। " निधि नें कहींखोए हुएकहा थां। उसेइस बात कां आभास हि नहि थां कि वो अपने बड़े भइया कों उसकेनाम सें संबोधित करयहकहा थां। जबकि.
"रराज.???" विराज बुरीतरह चौंका थां। उसने निधि कों स्वयं सें अलगकर उसके चेहरे कि तरफ हैरानी सें देखा।
"क क्याँ हुआ भाई??" निधि चौंकी, उसकोकुछ समझ न् आया कि उसके भइया नें अचानक उसे स्वयं सें अलग क्यूं किया।
"क्याँ बताऊॅ??" विराज नें अजीबभाव सें उसे देखते हुए कहा__"सुना हैं इश्क़ जब किसी केँ सरचढ़ जाता हैं तौ उस ब्यक्ति कों कुछ ख़याल हि नहि रह जाता कि वो किससे क्याँ बोल बैठता हैं?"
"आप् यह क्याँ कहरहे हें?" निधि नें उलझन मे कहा__"मुझे कुछसमझ नहि आँ रहा?"
"अरे पागल तूने अभि अभि मुझे मेरानाम लेकर पुकारा हैं। " विराज नें कहा__"हाय मेरी बेहन प्यार मे कैसी बावली औऱ बेशर्म होँ गई हैं कि अब वोँ अपने बड़े भइया कां नाम भि लेनेलगी। "
"क क्याऽऽ????" निधि बुरीतरह उछल पड़ी। हैरत औऱ अविश्वास सें उसका मुॅह खुला कां खुलारह गय़ा। फिन सहसाउसे एहसास हुआ कि उसके भइया नें अभि क्याँ कहा हैं। उसका चेहरा लाज औऱ लज्जा सें लाल सुर्ख पड़ता चला गय़ा। नज़रें फर्स पर्र गड़गईं उसकी। छुईमुई सि नज़रआने लगी वो। उसेइस तरह खड़े नं रहा गय़ा। कहीं औऱ मुह छुपाने कों न् मिला तोँ पुनः वो विराज सें छुपककर उसके सीने मे चेहरा छुपा लिया अपना। विराज कों यह अजीब तोँ लगा लेकिन अपनी बेहन कि इसअदा पऱ उसे बड़ा प्रेम आया। जिंदगी मे पहलीबार वो अपनी बेहन कों इसतरह औऱ इतना शर्माते देखा थां।
एपसोड हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,,
आप् सबकी प्रतिक्रिया कां इन्तज़ार रहेगा,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो मे अपनीयह कथाअब यहीं पर्र बंदकर रहाहूॅ। कथा कों शुरुआत हुए इतने महीने हौ गए, मगर मुझेआज पताचला कि मेरीयह कथा **********.com पऱ किसी अन्य टाइटल मे बिना मेरी परमीशन केँ धड़ल्ले केँ संग पोस्ट होतीरही औऱ मुझेइस सबकापता हि नहि थां। आजयहबात मुझेउस फोरम पर्र एक् मित्र नें बताया जिस फोरम पऱ मैनेइस कथा कों लिखना शुरुआत किया थां। मे उसयार कों शुक्रिया देताहूॅ कि उन्होने मुझेइस सच्चाई सें अवगत कराया। मैनेइस बात कि स्वयं जाॅच कि औऱ यहबात सच निकली कि उस फोरम पऱ मेरीइस कथा कों जानेकब सें चलाया जारहा हैं। स्टोरी केँ राइटर केँ नाम मे मेरा हि नाम दिया हैं, लेकिन कथा कां टाइटल बदल दिया गय़ा हैं। मे यह भि जानता हूॅ कि यहाॅ पर्र कितने हि लोग किसी दूसरे लेखकों कि कहानियों कों किसी नं किसी फोरम पर्र काॅपी पेस्ट करते रहते हें। लेकिन इसकेलिए वोँ ओरिजनल राइटर सें परमीशन लेते हें मगर यहाॅ तौ उसने मुझसे कभी नहि पूछा याँ इसबात कि परमीशन माॅगी कि वोँ मेरीइस कथा कों किसी दूसरे फोरम पर्र पोस्ट करना चाहता हैं। बल्कि मुझे तोँ स्वयं आजइसबात कां पताचला हैं। ख़ैर,
मे जानता हूॅ कि यहाॅ पऱ न् लेखकों कि कमी हैं औऱ नाँ हि कहानियों कि इसलिए मेरे द्वारा किस्सा कों बंदकर देने सें किसी कों कोई फर्क पड़ने वाला नहि हैं।
आप् सबने मेरासंग दिया मुझे प्रेम औऱ इज्जत दि इसकेलिए लाखों बारअगर मे आप् सब कां शुक्रिया करूॅ तौ कदाचित् कम होगा।
मेरेपास टाइम कि कमी थि इसके बावजूद जब भि मुझे वक़्त मिला मैने एपसोड रेडी करके आप् सबके सामने हाज़िर कर दिया। लेकिन कहानियों केँ ऐसे फोरम मे ऐसी बातें जब होती हें तौ दिलदुख जाता हैं। ख़ैरकोई बात नहि.
अंत मे इतना हि कहूॅगा दोस्तो कि टाइम मिला तोँ आता रहूॅगा औऱ आप् सबकी कहानियों कों पढ़कर अपना मनोरंजन भि करूॅगा।
शुक्रिया,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
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