एक अनोखा बंधन complete - body-focused teasing - Real Kahani Part 1
एक् अनोखा बंधन
यह कथा कहीं सें भि चुराई नहि गई हैं| यह मेरीखुद कि रचना हैं!
नमस्कार मित्रों,
मैंने इस फोरम पर्र बहोत सि कहानिया पढ़ीं हें, कुछ कहानियों कों पढ़ केँ साफ़लग रहा थां कि यह बनावटी हें हालां कि लेखक नें अपनीतरफ सें बहोत कोशिश कि, कि येकथा पाठकों कों सच्ची लगे पऱ एक् असल इंसान जिसने यहसभी भोगा होँ वो जर्रूर बता सकता हैं कि यहसभी बनावटी हैं| मे अपनीइस सच्ची गाथा केँ बारे मे अपनेमुख सें स्वयं कुछ नहि कहूँगा परन्तु यहआशा रखता हूं कि आप् अपने व्यंग ओरों केँ समक्ष रखेंगे|
आज मे अपनेइस धागे कि जरिये आपको अपने जिंदगी कि एक् सच्ची घटना सें रूबरू कराने जारहा हूं| एक् ऐसी घटना जिसने मेरे जिंदगी मे एक् तूफ़ान खड़ाकर दिया| मे अभि तक इस घटना कों भुला नहि पाया हूं औऱ अब भि उस व्यक्ति कों एक् औऱ बार पाने कि कामना करता रहता हूं| मे अभि तक नहि समझ पाया कि जौ कुछ भि हुआ उसमें कसूर किसका थां? शायद आप् मेरीइस सच्ची गाथा कों सुनबता सकें कि असली दोषीकौन थां|
मे आपकोये बताना चाहूंगा कि मुझे अपनीइस कथा कां शीर्षक चुनने मे वाकईकई दिनों कां टाइमलगा हैं|
you are a great writer
एक अनोखा बंधन complete - body-focused teasing – New Episode
इससे पहले कि मे किस्सा शुरुआत करूँ मे पहले आपको इसके पत्रों सें रूबरू करना चाहता हूं| आपको बताने कि जर्रूरत तोँ नहि कि मैंने इस स्टोरी केँ सब पात्रों केँ नाम, स्थान सभीबदल दिए हें| तोँ चलिए शुरुआत करते हें, मेरे पिता केँ दो भइया हें औऱ एक् बेहन जिनके नामइस प्रकार हें :
१। बड़े भइया - राकेश
२। मझिल* - मुकेश (*बीच वाले भइया)
३। सुरेश (मेरे पिता)
४। बड़ी बेहन - रेणुका
बड़े भइया जिन्हें मे प्रेम सें बड़के दादाजी कहता हूं उनके पाँच पुत्र हें| उनकेनाम इस प्रकार हें :
१। चन्दर
२। अशोक
३.अजय
४। अनिल
५.गटु
मझिल भइया जिन्हें मे प्रेम सें मझिले दादाजी कहता हूं उनकेतीन पुत्र औऱ तीन पुत्रियाँ हें| उनकेनाम इस प्रकार हें :
१। रामु (बड़ा लड़का)
२। शिवु
३। पंकज
४। सोनिया (बड़ी बेटी)
५। सलोनी
६। सरोज
हमारा गावों उत्तर प्रदेश केँ एक् छोटे सें प्रांत मे हैं| एक् हराभरा गावों जिसकी खासियत हैं उसके बाग़ बगीचे औऱ हरीभरी फसलों सें लैह-लहाते खेत परन्तु मौलिक सुविधाओं कि यदिबात करें तौ वो न् केँ बराबर हैं| न् मार्ग, नं बिजली औऱ नं हि सोचालय! सोचालय कि बातआई हैं तोँ आप् कों सौच केँ जगह केँ बारे मे बतादूँ कि हमारे गावों मे मुंजनमक पोधे केँ बड़े-बड़े पोधे होते हें जोँ झाड़ कि तरह फैले होते हें| सुभह-सुभह लोग अपने खेतों मे इन्ही मुंज केँ पौधों कि ओट मे सौच केँ लिए जाते हें|
अब मे अपनी आप् बीती शुरुआत करता हूं| मेरे जिंदगी मे आये बदलाव केँ बीज तोँ मेरे बचपन मे हि बोयेजा चुके थें| मेरे विद्यालय कि छुटियों मे मेरे पापा मुझे गावों लेँ जाया करते थें औऱ वहा एक् छोटे बच्चे कों जितना प्रेम मिलना चाहिए मुझे उससेकुछ ज़्यादा हि मिला थां| इसका कारन थां कि मे बचपन सें हि अपने मम्मी-बाप सें डरता थां पऱ उन्हें प्रेम भि बहोत करता थां| मेरे पापा नें बचपन सें मुझे शिष्टाचार केँ गुण कूट-कूट केँ भरे थें| कुत०कुत केँ भरने सें मेरा तात्पर्य ऐ कि डरा-धमका केँ, इसीडर केँ कारन मेरा व्यक्तित्व बड़ा हि आकर्षक बन गय़ा थां|गावों मे बच्चों मे शिष्टाचार कां नामो निशान नहि होता, औऱ जबलोग मेरा उनके प्रति आदरभाव देखते थें तौ मेरे पापा कि प्रशंसा करते थकते नहि थें|
यही कारण थां कि परिवार मे मुझसभी प्रेम करते थें| परन्तु मेरी बड़ी भाभी (चन्दर भैया कि पत्नि) जिन्हें मे प्रेम सें कभी-कभी "भौजी" भि कहता थां वोँ मुझेकुछ अधिक हि प्रेम औऱ दुलार करती थि| मे उसे बचपन सें हि बहोत मनपसंद करता थां परन्तु तब मे नहि जानता थां कि यह आकर्षण हि मेरेलिए दुःख कां सबब बनेगे|
मेरी मम्मी बतायाकरती थि कि मैंने 6 साल तक दूध पीना नहि छोड़ा थां, औऱ यही कारन हैं कि जब मे छोटा थां तोँ मे भागता हुआ किचन केँ अंदरघुस जाता थां, जहाँ कि चप्पल पहने जानां मना हैं औऱ खानां बनारही भाभी कि गोद मे बैठ जाता औऱ वोँ मुझे बड़े प्रेम सें दूध पिलाती| दूध पिलाते हुए अपनीगोद मे मुझे सुला देती| मे नहि जानता कि यह उसका प्रेम थां याँ उसके अंदर कि वासना? क्योंकि उस वक्त भाभी कि उम्र तकरीबन 18 याँ 20 कि रही होगी| (हमारे गावों मे विवाह जल्दकर देते हें|) मे ये नहि जानता तब उन्हें दूधआता भि थां याँ नहि, हालाँकि मेरेमन मे उनके प्रति कोई भि दुर्विचार नहि थें पर्र एक् अजीब सें चुम्बकीये शक्ति थि जौ मुझे उनकेतरफ खींचती थि| जब वोँ अपने पति अर्थात मेरे बड़े भइया चन्दर केँ पास होती तौ मेरे जिस्म मे जैसेआग लग जाती| मुझेऐसा लगता थां कि मेरेउन पऱ एक् जन्मों-जन्मान्तर कां हक़ हैं| ऐसाहक़ जिसेकोई मुझसे नहि छीन सकता| दोपहर कों जब वोँ खानां बना लेती औऱ सभी कों खिलने केँ बाद खाती तोँ मे बसउसे चुप-चाप देखता रहता| खानां खाने केँ बाद मे भाभी सें कहता कि "भाभी मुझे नींद आँ रही हैं आप् सुलादो|" तोँ भाभी मुझेगोद मे मुझेउठा कर चारपाई पऱ लिटाती औऱ मेरी औऱ प्रेम भरी नजरों सें देखती| मेरेमुख पर्र एक् प्यारी सि मुस्कान आती औऱ वोँ नीचेझुक कर मेरेगाल पर्र प्रेम सें काट लेती| उनके प्रेम भरे होंटजब मेरेगाल सें मिलते औऱ जैसे हि वोँ अपने फूलों सें नाजुक होंटों सें मेरेगाल कों अपनी मुंह मे भरती तौ मेरे सारेबदन मे एक् झुरझुरी सि छूट जाती औऱ मे हंस पड़ता| इनकायह प्रेम करने कां तरीका मेरेलिए बड़ा हि कातिलाना थां!
एक अनोखा बंधन complete - body-focused teasing – New Episode
वक्त कां चक्का घुमा औऱ मे कुछ बड़ा होगया| मे अपने बालपन कों छोड़ किशोर अवस्था मे पहुँच चूका थां| मेरेकुछ ऐसा मित्र बन चुके थें जिन्होंने मुझे वयस्क होने कां ज्ञान दिया, परन्तु मे महिला केँ यौन अंगों केँ बारे मे कुछ नहि जानता थां औऱ नं हि वे जानते थें| तभी एक् दिन मेरे पापा नें एक् प्रोग्राम बनाया, उन्होंने मेरे बड़े भइया चन्दर कों परिवार सहित हमारे घऱशहर आने कां निमंत्रण दिया| प्रोग्राम थां कि वेसभी रात कों हमारे घऱ पऱ हि रुकेंगे औऱ चूँकि चन्दर केँ घऱ मे टी.वी। नहि थां तोँ हमनेघऱ पऱ हि पिक्चर देखने कां प्लान बनाया| दिन मे पिता जी औऱ चन्दर दोनों बहारगए हुए थें, घऱ मे मात्र मे, मम्मी, भाभी औऱ उनकी बेटी” नेहा” हि थें| उस वक़्त तक भाभी मम्मी बन चूँकि थि पर्र उनका प्रेम मेरेलिए अब भि अटूट थां| उनकी एक् बेटी थि औऱ वोँ तकरीबन 2 याँ 3 साल कि रही होगी, वोँ मुझे चाचा-चाचा कह केँ मेरेसंग खेलती थि| परन्तु मेरा दिमाग़ तोँ बस भाभी केँ संग अकेले मे वक़्त बिताने कां थां, पर्र मेरी भतीजी नेहा थि कि मेरा पीछा हि नहि छोड़रही थि|
मे आग बबूला होताजा रहा थां, शायद भाभी नें मेरेमन कों पढ़ लिया औऱ जब मम्मी किचन मे कुछबना रही थि तौ उन्होंने मुझे बड़े प्रेम सें पुकारा औऱ मे भि उड़ता हुआ उनकेपास पहुँच| उन्होंने मुझे अपनेपास बिठाया औऱ आगेबढ़ कर मेरेगाल पर्र उसी प्रेम भरे तरीके सें काट लिया| मेरेमन मे मेरे बचपन कि सब यादें ताजा होँ गई| मन तौ किया कि भाभीबस ऐसे हि मुझे प्रेम करतीरहे| पहलीबार मैंने पाया कि उनकीइस हरकत सें मेरे शांत पड़े लन्ड मे अकड़न आँ गई| मुझेयह एहसास बहोत अच्छा लगता थां, इससे पहले भि जब भि मे सोते वक़्त अपने बचपन कि बातें याद करता तोँ मेरा लन्ड अकड़ जाता थां| परन्तु तब मुझेयह नहि पता थां कि इसको शांत केसे करते हें| इसबार भाभी केँ चुंबन कां निशान मेरेगाल पऱ बहुत गहरा थां औऱ यहदेख वोँ भि थोडा घबरा गई| मुझे दर्द तोँ नहि हौ रहा थां औऱ नं हि मे जानता थां कि उनके काटने सें मेरेगाल पऱ निशान पड़ गय़ा हैं| पहलीबार मेरेमन मे आय कि मे भि उनकेगाल कां एक् चुंबन लूँ| मैंने भाभी सें कहा :
"भाभी मे भि आपकी पप्पी लूँ?"
औऱ उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनेगाल कों मेरी औऱ घुमा दिया| मैंने भि आरामसे उनकेगाल पर्र अपने होंटरख दिए| पहले मैंने उनकेगाल कों अपने मुंह मे भरा औऱ अपनीजीभ सें उनकेगाल कों चाटा, जैसेमनो मे कोई आइसक्रीम चाटरहा हूं औऱ फिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे मैंने अपने दातों सें उनकेगाल कों काट लिया| मुझेयह ध्यान थां कि कहीं मेरे काटने सें उनगाल पर्र निशान नं बन जाये|इस डर सें कि कहीं मां नं आँ जाये मे उनसेअलग हौ गय़ा| मन मे जितना भि क्रोध थां सभी काफूर होँ चूका थां| तभी मेरे दोस्तों नें बहार सें मुझ आवाज़ लगाई, मे बहारभगा वोँ मुझे क्रिकेट खेलने केँ लिए बुलारहे थें परन्तु मैंने मनाकर दिया| मेरे दोस्तों नें मुझसे पूछा कि तेरागाल लाल क्यूं हैं, तब मुझेपता चला कि भाभी कि प्रेम भरी पप्पी केँ निशान गाल पर्र छपगए हें| मैंने बात घुमाते हुएकहा कि मेरी भतीजी नें खेलते-खेलते काट लिया|
दोपहर हौ चुकी थि पापा औऱ चन्दर दोनों वापस आँ चुके थें, हमने खानां खाया औऱ पापा नें कहा कि अगररात मे पिक्चर देखनी हैं तौ अभि सोजाओ, नहि तौ आधी पिक्चर देख केँ हि सो जाओगे| अभि हम् सोने केँ बारे मे सोच हि रहे थें कि बत्ती गुल हौ गई| गर्मियों केँ दिन थें ऊपर सें दोपहर! पापा, मां औऱ चन्दर तौ बहारगली मे सभी केँ संग अपनी-अपनी चारपाई डाललेट गए औऱ पड़ोसियों सें बात करनेलगे| बचगए मे, भाभी औऱ नेहा| नेहा कां पेटभरा होने केँ कारन वोँ लेट गई औऱ भाभी नें उसे पंखा हिलाते-हिलाते सुला दिया| मैंने भाभी सें कहा कि
"भाभी मुझे भि नींद आँ रही हैं|"
भाभी मेरा इशारा समझ गई, वोँ चोकड़ी मारे बैठी थि तोँ मे सीधा होँ कर उनकी योनि केँ पाससर रखतेहुए लेट गय़ा| वोँ एक् हाथ सें पंखाकर रही थि औऱ फिन आरामसे मेरेऊपर झुकी औऱ मेरे सीधेगाल पर्र एक् प्रेम भरा चुंबन किया औऱ फिन धीरे-धीरे सें गालकाट लिया| मेरा लन्ड खड़ा हौ चूका थां परन्तु कमरे मे अँधेरा होने केँ कारन वोँ उसेदेख नहि पाई|फिन उन्होंने अपने दूसरे हाथ सें मेरे मुंह कों दूसरी तरफ किया औऱ मेरे बाएंगाल पऱ एक् प्रेम भरा चुम्बन जड़ दिया औऱ फिनउसे भि काटलिए| मेरीबदन मे उठरही झुरझुरी सें मेराहाल बेहाल थां| मेरे दोनों कानलाल थें औऱ मे गर्म हौ चूका थां|
मैंने थोडा हिमायत करतेहुए उनकी गर्दन पर्र हाथ रखतेहुए अपनेऊपर झुका लिया औऱ उनकेगाल कि पप्पियाँ लेनेलगा| मैंने उन्हें भि गर्मकर दिया थां, औऱ इससे पहले कि हम् अपनी मर्यादा कों पार करते कि तभी मेरा एक् यार भागता हुआ कमरे मे आँ गय़ा| सच बताऊँ मित्रों मुझे इतना क्रोध आया जितना कभी नहि आया थां| मे बड़ीजोर सें उस पऱ गरजा "क्याँ हैं???"
मेरी गर्जन उसनेआज सें पहलेकभी नहि सुनी थि औऱ इससे पहले कि वोँ कुछ कहता मैंने कहा, 'भाग यहा सें!' मेरीबात सुनते हि वोँ बहार कि तरफभाग गय़ा| भाभी कां तोँ जैसे मुंह हि लटक गय़ा| मैंने उनका मुंह अपने हाथों मे थम औऱ इससे पहले कि मे हम् दोनों अपने जिंदगी कां पहला चुमबन करते उन्होंने मुझेरोक दिया| उन्हें डर थां कि मेरी गर्जन सुन कहीं मेरी मां अर्थात उनकी काकी अंदर न् आँ जाएं| उन्होंने कहा, "आज रात मे नेहा कों जल्द सुला दूंगी तब करना|"
पर्र मे कहां मानने वाला थां मैंने उन्हें जबरदस्ती अपनेऊपर झुका लिया औऱ उनके गुलाब केँ पंखुड़ियों जैसे होठों पर्र अपने दहकते हुए होंटरख दिए| मे उनके कोमल होंटों कां रस पीना चाहता थां, औऱ यहसभी भूल चूका थां कि पास मे हि उनकीबटी लेटी हैं| भाभी कों भि जैसे एक् अध्भुत सुखमिल रहा हौ औऱ वोँ बिना किसीबात कि परवाह किये मेरे होंटों कों बारी-बारी सें अपने मुंह मे लिएचूस रही थि| भाभी मेरेऊपर झुकी हुईँ थि औऱ मेरासर ठीक उनके योनि कि सिधाई पर्र थां| ऐसालग रहा थां कि मनोयह जहाँ जैसेथम सां गय़ा होँ औऱ हम् किसी जन्नत मे हें| मेरीबद किस्मती कि मुझेयौन क्रिया केँ बारे मे कुछ भि नहि पता थां कि बुर/ योनि किसे कहते हैं औऱ उसे भोगते केसे हें| इसी कारन मे उसदिन कुछ औऱ नहि कर पाया|
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