कांटों का उपहार / रानू complete Desi kamuk kahani Rajghar ki uchai mazil par khadi Radha, apne jeevan ki andhakarmay ghatnaon ko yaad kar rahi thi. Uske aaspaas ka ilaaka, jahan tak uski drishti ja rahi thi, sab kuch uske liye naye tha. Raja Suryabhan Singh ke saath, vah apne naye jeevan ki shuruat kar rahi thi. Kya vah apne dese ke saath-saath apne jeevan ko bhi naye rangon se bharna chahti hai?
कांटों का उपहार / रानू complete - Desi kamuk kahani - Full Story Part 1
dosto i am not a writer lekin for your fun i am posting this stori
कांटों कां तोहफा
लेखक-रानू कां बहुचर्चित उपन्यास
रामगढ़ कां इलाक़ा। दूरदूर तक फैलाहुआ। सुभह कि किरणें चप्पे चप्पे पर्र अपनाजाल बुन चुकी थि। बच्चो नें धूप औऱ मिट्टी सें खेलना आरंभकर दिया थां.
वातावरण स्वच्छ थां। नीलेगगन कि चादर पऱ पक्षी उन्मुक्त उड़रहे थें। किसान अपनेहल संभाले बैलों कि जोड़ी सहित खेतों पर्र निकल चुके थें। ऊबड़- खाबड़ पगडंडियां, टेढ़े- मेढ़े रास्ते, छोटे-बड़े झोपड़े, खपरैल केँ घर-मकान, ईंट औऱ पत्थर केँ घर-मकान।
औऱ राधा, राजा सूरजभान सिंग केँ बगल मे उनके राजमहल कि सबसे उँची मज़िल पऱ एक् किनारे खड़ीइस कस्बे कां नक़्शा आज पहलीबार देखरही थि जिसकी वो एक् साधारण सि गोरी थि। पलकों पर्र आँसू झिलमिला रहे थें। जिसके चारो औऱ फैला काजल उसके जिंदगी केँ समान अंधकारमय बन चुका थां। माथे पर्र सिलवटें थि। माथे कि बिंदिया उजड़ी हुइ, लटे बिखरी, होठ सूखे, ब्लाउस केँ बटन टूटेहुए, कपड़े केयी स्थान सें फटेहुए। उपर सें देखने पर्र वो उसीनदी कि तरह गंभीर औऱ शांत थि जिसकी गोद मे अनगिनत अरमानों कि लाशें दम तोड़कर चुपचाप बैठ जाती हैं.
"येदेख रही हौ राधा?" सूरजभान नें हाथ केँ इशारे सें पूरब दिशा कि ओर इशारे करतेहुए कहा - "ये सारा इलाक़ा जहाँ तक तुम्हारी दृष्टि जारही हैं सभी हमारा हैं। मेरा हैं." उन्होने शब्द 'मेरा' पर्र विशेष ज़ोर दिया। - "मे राजा हूं औऱ यहा केँ लोग मेरी प्रजा। येसभी मे तुम्हे दे दूँगा। तुम्हारे कदमो मे बिच्छा दूँगा"
राधा कुच्छ नहीं बोलीं मात्र सामने देखती रही, जहाँ कुच्छ हि दूरी पऱ एक् विशाल पेड़ थां। इसकीजड़ मे सेमेंट कां एक् चबूतरा बनाहुआ थां जिसकी सतह पऱ खून सें अनगिनत बेगुनाहों कि किस्सा लिखी हुई थि। उसने अपनी आँखें बंदकर ली औऱ होठभिच लिए। उसकी आँखों मे एक् तश्वीर घूम गई,। उसकी बड़ी बहन कम्मो कि। कम्मो तीन वर्ष पहले सूरजभान केँ पिता विजयभान सिंग कि वासना कां शिकार हौ गई, थि। औऱ फिन किसी कों अपनामूह नां दिखा सकने केँ कारण उसने एक् रातइसी पेड़ कि टहनी सें लटककर फाँसी लगाली थि। सुभहजब उसके पिताजी नें इंसाफ़ माँगते हुए दुहाई दि तोँ विजयभान नें उसी पऱ झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसेमौत कि नींद सुला दिया थां। इस अंजाम कों देखकर गाओं वालों केँ दिल मे विजयभान सिंग कां डरसमा गय़ा थां। ग़रीब गाओं वाले उसके ज़ुल्म सहने पऱ विवश थें। रातदिन चुपचाप एक् हि दुआ माँगा करते थें कि परमेश्वर उसेइस धरती सें उठा लें। औऱ ऐसाहुआ भि। भगवान नें गाओं वालों कि दुआओं कों सुन लिया। वो दोमाह पहलेऐसे बीमार हुए कि फिनउठ नाँ सके। उनके मरने पर्र गाओं वाले बहोत खुशहुए। पर्र ये खुशी बहोत थोड़े वक़्त केँ लिए थि। उसकेजगह पऱ उसका बेटा सूरजभान सिंग आँ बैठा। सूरजभान सिंग बचपन सें लंडन मे रहे थें। वो भि अपने बाप दादाओं कि तरह विलासिता मे किसी भि प्रकार सें कम नहीं थें.
एक् रोज़ सूरजभान मंत्री प्रताप सिंग केँ संग किसीकाम सें शहरजा रहे थें। तभी उनकी नज़र राधा पऱ पड़ी। राधा भोला केँ संग थि। भोला उसके बचपन कां दोस्त थां। बचपन मे हि उनके माता पिता नें उनकी मँगनी कर दि थि। राधा सूरजभान सिंग कि व्हीकल कि आवाज़ सुनकर भोला केँ संगखेत कि मेड़ कि आड़ मे छिप गई,। परंतु फिन भि सूरजभान सिंग कि नज़र सें स्वयं कों नहींबचा पाई। पहली हि नज़र मे उसकी कयामत ढाती जवानी सूरजभान सिंग केँ दिल मे उतर गयीँ,। सूरजभान सिंगउस टाइम जल्द मे थें। प्रताप सिंग सें उसके बारे मे थोड़ी पुछ-ताछ करके अपने रास्ते बढ़गये। चौथेदिन जब वो शहर सें लौटे तौ उसीदिन राधा कि भोला केँ संग विवाह थि। उन्होने उसीरात अपने डाकूभेज कर राधा कों मंडप सें उठवा लिया औऱ बल पूर्वक उसके जिस्म कों भोगा.
सूरजभान सिंग केँ दिल कों चोट पहुँची। उन्होने राधा कि बाँह थामी औऱ उसे दूसरी ओर लेँ गये। पश्चिम दिशा कि ओर.! काफ़ी दूर कुच्छ एक् देख केँ पेड़ों पर्र गिद्ध बैठेहुए दिखाए पड़रहे थें। उन्होने फिनकहा - "वो उनघूर केँ पेड़ों सें भि बहोत दूर, जहाँ तुम्हारी नज़र भि नहीं पहुँच सकती.सभी हमारा हैं। मे येसभी कुच्छ तुम्हे दे दूँगा। तुम्हे इस इलाक़े कि रानीबना दूँगा। यहा केँ निवासी तुम्हारी प्रजा होंगे। मगर एक् शर्त.मुझे माफ़कर दो। मेरे प्रति अपनेदिल मे स्थान बनालो। अपनी उदासी भूलकर एक् बार मुस्कुरा दो। मुझेइस संसार मे औऱ कुच्छ भि नहीं चाहिए। तुम् स्वयं स्वयं जानती हौ मुझे संसार मे किसी चीज़ कि कमी नहींरही हैं। मैने जोँ कुच्छ भि चाहा वो एक् इशारे पऱ मेरे कदमों मे आँ गिरा। परंतु कलरात तुम्हारे जिस्म कों अपनाने केँ बाद हि नां जाने क्यूं मुझेऐसा प्रतीत हुआ मानों मैने तुम् पर्र बहोत ज़ुल्म किया हैं। तुम्हारी इन काली आँखों मे जाने कैसा चमत्कार हैं कि इनके प्रतिबिंब कों देखकर मेरे अंदर कां मानवजाग उठा हैं। मेरे अंदर कि इंसानियत मुझे धिक्कार रही हैं। राधा.क्याँ तुम् मुझे माफ़ करके मुझे एक् नया जिंदगी जीने कां मौक़ा नहीं दोगि?"
कांटों का उपहार / रानू complete - Desi kamuk kahani – New Episode
"राजा साहेब.!" राधा नें भीगे स्वर मे तड़पकर कहा। - "मे आपकोकभी माफ़ नहीं करूँगी। मरतेदम तक नहीं। आप् इंसान नहीं शैतान हें। आपने मुझे विवाह केँ मंडप सें उठावाते हुएये नहीं सोचा थां कि मेरा बूढ़ा बाबामर जाएगा। अनगिनत लोगों कां दिलटूट जाएगा। राजा साहेब ईश्वर कुच्छ नहीं देखता हैं। सब्र करतेहुए सबकी सुनता हैं। देख लीजिएगा दौलत कां ये घमंड एक् दिनचूर चूर हौ जाएगा। आप् कहीं केँ नहीं रहेंगे। मेरी सिसकियाँ आपकोखा जाएँगी। मेरी आहेंइस हसीन हवेली कों खंडहर बनाकर रख देंगी."
"राधा.!" सूरजभान नें सब्र सें काम लिया। - "कल किसने देखा हैं? मगरफिन भि यदि मे अपने पापों कां पश्चाताप करलूँ तोँ क्याँ तब भि तुम् मुझे माफ़ नहीं करोगी?"
"कभी नहीं." राधाअटल मन सें बोलि - " बल्कि मे चाहूँगी कि ईश्वर तुम्हे ऐसी स्थान मारे जहाँ तुम् पानी कि एक् बूँद कों भि तरसजाओ। तुम्हे चिता भि नसीब नां होँ। तुम्हारे जिस्म कों गिद्ध औऱ कोव्वे नोच-नोच करखा जाएँ."
"नहीं राधा नहीं। मुझसे इतनी नफ़रत नां करो कि मेरा जीना मुश्किल होँ जाए। तुम्हे मुझे माफ़ करना हि होगा। मे अपने पापों कां ऐसा हि प्रायश्चित करूँगा."
राधा कुच्छ कहती उससे पहले हि मंत्री प्रताप सिंग कि आवाज़ सूरजभान सिंग केँ कानों सें टकराई। - "महाराज, गाओं सें फरियादी आए हें."
"तुम् इन्हे रंगमहल पहुंचा दो। हम् अभि आते हें." सूरजभान सिंग नें अपनी स्थिति संभाल कर राधा कि तरफ इशारा किया.
मंत्री प्रताप सिंग राधा कों रंगमहल मे छोड़कर चला गय़ा। राधाआकर बिस्तर पऱ बैठ गई,। पैरों कों उपर समेटकर उसने घुटने केँ चारों औऱ अपनी बाहें लपेटली। औऱ गर्दन झुकाकर एक् गाल घुटने पर्र रख लिया। उसके मानस-पटल भोला कि ताश्वीर घूम गयीँ,। उसनकी पलकों सें आँसूछलक पड़े - " भोला.!" उसके होठों सें एक् आँ टॅपकी। - "तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया? क्यूं नहीं अपनीजान कि बाज़ी लगाकर मुझेबचा लिया?" वो सिसक पड़ी.
सहसा उसने कदमों कि चाप सुनी तोँ अपने विचारों सें जागी। उसने देखा सूरजभान सिंग पधाररहे हें। शाही लिबास मे लंबा चौड़ा बदन बहोत खिलरहा थां। वो राधा केँ समीप हि आकर खड़े होँ गये। राधा नें घृणा केँ कारण अपनी पलकें दूसरी ओरफेर ली.
"गाओं वाले अपनी फरियाद लेकरआए थें." उन्होने कहा। - "कलरात कुच्छ लुटेरों नें उनके झोपड़ो मे आगलगा दि हैं."
राधाउसी प्रकार बैठीरही। घृणा सें मन हि मनउसे कोस्ति रही। गाओं वाले लूटेरे कों जानकर भि अंजान थें। फरियाद भि लाए तौ लूटेरे केँ पास.
"मैनेउन सब कों हि मूह माँगी कीमतदे दि हैं। इसलिये कि इन लूटेरों सें मे उनकी हिफ़ाज़त नहींकर सका। मैने उन्हे समझा दिया हैं कि अबयहा कोई लूटेरा नहीं आएगा। मैने भोला कि माँग भि पूरीकर दि हैं."
राधा कि भीगी पलकें उपर कों उठी। उसने आश्चर्य सें सूरजभान कों देखा.
"हां.!" वो बोले - "उसने तुम्हारी कीमत पंद्रह हज़ार लगाई। कहनेलगा डाकुओं नें राधा कों उठा लिया। मंडप मे आगलगा दि। दहेज कों आग मे फेंक दिया। पाँच हज़ार रुपये संग लें गये। मे जानता हूं, मेरे लोगों कों ऐसा साहसकभी नहीं होगा। रुपये तोँ वो जितना चाहें मुझसे लेँ सकते हें। परंतु मे चुप हि रहा। तुमको भूलने केँ लिए उसने पंद्रह हज़ार रुपये कि माँग कि जोँ मैने जल्दी पूरीकर दि."
"पंद्रह हज़ार.!" राधा केँ होंठों सें अचानक हि निकल गय़ा। राधा कों भोला पर्र बहोत गुस्स आया। जिंदगी भर उससे प्रेम करने कां दावा करने वाला मात्र पंद्रह हज़ार मे हि फिसल गय़ा। उसके प्रेम केँ सहारे हि तोँ उसने सूरजभान कि ईट सें ईटबजा देने कि ठानी थि। परंतु येसभी क्याँ होँ गय़ा? भोला इतनी जल्दबदल गय़ा। यदि भोला इतनी जल्दबदल गय़ा तोँ भला दूसरे लोग उसकासंग क्यूं देनेलगे। फिन भि उसने सूरजभान कि बातों केँ उत्तर मे कहा - येझूठ हैं। भोलाकभी भि मेरी कीमत नहींलगा सकता."
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"येसच हैं राधा." उन्होने गंभीर होकरकहा - "येबात तुम् उसी सें पुछ लेना। मैने उसकादिल टटोला तौ उसने स्पस्ट शब्दों मे कह दिया कि अब वो तुम्हे किसी भि अवश्था मे स्वीकार नहीं करेगा."
राधा कां दिलटूट गय़ा। वो सिर झुकाए सिसक पड़ी.
"राधा, मुझे माफ़कर दो। तुम् चाहो तौ मे तुम्हे अपनी पत्नि बनाने कों रेडी हूं."
"पत्नि.!" राधा नें त्रिशकृत भाव सें कहा - "भारतीय नारी एक् हि बार पत्नि बनती हैं। औऱ वो मे बन चुकी हूं। भोला कि पत्नि। मेरी सगाई उसकेसंग बचपन मे हि हौ चुकी हैं."
"मगरअब वो तुम्हे नहीं अपनाएगा."
"मे स्वयं भि अपनासभी कुच्छ लूट जाने केँ बाद उसकेपास नहीं जानां चाहती। खासकर ऐसी अवश्था मे जबकि उसने मेरेदिल कों सख़्त ठेस पहुँचाई हैं। मगर मे मरना भि नहीं चाहती। मे अपने खानदान कि आखरी निशानी हूं। मे ज़िंदा रहूंगी औऱ ज़िंदा रहकरये देख्ना चाहती हूं कि ऐसे व्यक्ति कां क्याँ हश्र होता हैं जिसने अपनेमजा केँ लिए मेरा खानदान लूट लिया."
"राधा.!" सूरजभान कि पलकें भीग गई,। राधा कि बातें बरच्छियों कि तरह उनकेदिल पऱ चुभने लगी। वो बोले - "क्याँ इस संसार मे मेरेलिए कोईऐसा प्रय्श्चित नहीं जिसके कारण तुम् मुझे प्रेम नां सही माफ़ हि करसको?"
"हरगिज़ नहीं."
"मेरा विश्वास करो राधा। मे तुम्हे चाहता हूं, तुमसे प्रेम करता हूं। तुम्हारी खुशी केँ लिए अपनासभी कुच्छ भेट चढ़ा देना चाहता हूं। अपना राज्य, राजमहल सभी कुच्छ त्याग दूँगा। चाहें तोँ मुझे आज़मा लो, मेरी परीक्षा लेँ लो। मे कभी भि तुम्हे उदास नहीं करूँगा."
"यदिऐसी बात हैं तोँ मुझे आज़ाद कर दीजिए। मे अपने बाबा केँ पास जानां चाहती हूं." राधा नें यहा सें बच निकलने कां मार्ग ढूँढा.
सूरजभान केँ दिल पऱ निराशा नें दूसरी बात कि। - "ठीक हैं राधा। तुम् अपनेघऱ जा सकती होँ। अब मे तुम् पर्र कोई दबाव नहीं डालूँगा."
सूरजभन नें ताली बजाई। तत्काल एक् व्यक्ति भीतरआया.
"इन्हे सुरखित महल सें बाहर् छोड़आओ." उन्होने अपने व्यक्ति कों आदेश दिया.
राधा गुप्त रास्तों सें होती हुइ महल सें बाहर् निकल गयीँ,.
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