कामुकता भरे पल आरज़ू के साथ - Desi sex story - Complete Kahani Part 1
कामुकता भरे लम्हा आरज़ू केँ संग
मूलतः भोपाल कां रहने वाला हूं मगर लखनऊ मे रहता हूं। रिश्तेदारों मे एक् खाला कानपुर मे रहती हें
खाला केँ तीन बच्चे थें, जिनमें एक् लड़का थां जिसके संग मैंने अपने टाईम मे बहुत मस्ती कि हैं औऱ दो लड़कियाँ, जिनमें एक् फ़रीदा कि अभि चारसाल पहले विवाह होँ गयीँ, थि औऱ वो अपने पति केँ पास रहने सऊदीचली गई,। दूसरी घऱ पे हि रहती थि, जिसका नाम शाजिया थां।
लड़का मेरा हमउम्र थां जिसकी विवाह भि यूँ तौ संग मे हि कि गयीँ, थि, मगरठीक ठाककुछ कमाता धमाता नहि थां तोँ आयेदिन झगड़ा बना रहता थां औऱ उसकी पत्नि मायके पड़ी रहती थि।
घऱ केँ हालात कुछठीक नहि थें, जिसवजह सें शाजिया कि विवाह भि नहि हौ पारही थि, जबकि वो भि अट्ठाईस कि हौ चुकी थि।
जिस दौरान सभी ठीकठाक थां औऱ मे उनकेघऱ जाजाकर रुक जाता थां, उस दौरान शाजिया छोटी हि थि, इसलिये उससे मेरीकोई खास बोलचाल नहि हि थि। हां, इधर लखनऊ रहने केँ दौरान हम् सब चूँकि व्हाट्सएप पर्र एक् घरेलू ग्रुप सें जुड़े थें तोँ बातचीत होती रहती थि, जिससे सब बातें पता चलती रहतीथीं।
तीनसाल सें मे लखनऊ मे थां औऱ इसबीच तीनबार हि कानपुर खाला केँ यहा गय़ा थां। अबदुआ सलाम, खैरियत पूछने तक याँ इधर-उधर कि जनरल बातें तोँ उससे होँ जातीथीं मगरकोई खास कंटीन्युटी उससेफिन भि नहि थि।
उसकाखास जिक्र इसलिये भि, क्योंकि मैंने जीवन मे जिन लोगों पऱ सेक्स केँ अभाव कां असर पड़ते देखा हैं। वो भि उनमें सें एक् थि।
वो लगभग साढ़े पांचफुट कि लंबाई, साफ रंगत औऱ आकर्षक चेहरा रखने वाली लड़की थि जोँ लगभग पांचछः साल पहले तक अच्छी सेहत रखती थि। कभी कजिन्स पर्र मैंने कोईगलत नजर तोँ नहि डाली, बस जनरलवे मे बतारहा हूं कि उसकी फिगरकोई उत्तेजक तोँ नहि मगरफिन भि ठीकठाक थि।
मगर वर्तमान मे वो करीब-करीब ढांचा सि दुबली पतली होँ गई, थि। सीनानाम कां रह गय़ा थां, कूल्हे भि सपाट हौ गये थें। हाथ पांव कि हड्डियां दिखतीं औऱ नसें चमकती थीं; देखकर किसी बीमारी कां शिकार लगती थि.
मगर खाला नें बताया थां कि उसकीसब जांचें होँ चुकीथीं औऱ सबठीक ठाक हि रहीथीं। उसे किसीतरह कि कोई बीमारी नहि थि। फिन क्याँ वजह थि उसके एकदमढल जाने कि? मुझेयौन कुंठा, घुटन, कुढ़न केँ सिवा औऱ कोईवजह नहि समझ मे आती थि।
बहरहाल, वो काबिले जिक्र इसलिये भि हैं कि येकथा उसी कों लेकर हैं।
एक् दिन खाला कां मोबाइल आया थां कि शाजिया कों मेरी सहायता कि जरूरत थि। दरअसल वो कानपुर मे जिस स्थान जॉब करनाचाह रही थि, उसका हेड-दफ़्तर लखनऊ मे थां औऱ इंटरव्यू यहीं होना थां।
शाजिया केँ मुताबिक साम होँ जानी थि औऱ वो यूँसाम याँ रात कों सफर करने केँ पक्ष मे नहि थि।
मे उनकाआशय समझ गय़ा थां औऱ उन्हें भरोसा दिलाया थां कि वो फिक्र न् करें, मे इंतजाम कर दूंगा। रातभर रुक केँ सुभह मे स्वयं हि चारबाग ट्रेन पे बिठा आऊँगा।
इसकेबाद मैंने अपने घर-मकान मालिक कों येबात बताकर उसके रुकने केँ लिये उनसे इजाजत मांगी। ये भि पेशकश कि, कि अगर उन्हें कोई एतराज होँ तौ वो नीचे सुला सकते हें।
ये मेरी एक् आदत हैं कि जहां रहता हूं वहां इतनी इज्जत तोँ बनाकर रखता हूं कि सामने वाला भरोसा करसके, फिन आगंतुक लड़कीकोई गैर याँ यार नहि, बल्कि खालाजाद बेहन हि थि तौ उन्हें क्याँ एतराज होता। उन्होंने इजाजत दे दि।
वो ग्यारह बजे आँ गई, थि। मैंने उसे स्टेशन सें लेँ लिया औऱ उसकी बताई स्थान पर्र छोड़ दिया औऱ स्वयं अपने दफ़्तर निकलआया।
साम कों पांचबजे वो फारिग होँ गई, मगर मे छःबजे छूटा तोँ उस तक लगभग साढ़े छःबजे पंहुच पाया।
आगे कां टाइम वैसा हि गुजरा जैसा गुजरता हैं। पहले सीधेघऱ लें गय़ा, जहां वो नहा धोकर फ्रेश हुईँ। फिनउसे अमीनाबाद लेँ आया जहां थोड़ी शॉपिंग करने केँ बाद वहीं टुंडे केँ यहा खानां खिलाया, प्रकाश केँ यहा कुल्फी खिलाई औऱ थोडा वापसी मे गोमती किनारे टहलकर साढ़े दसबजे घऱ आँ गये।
इस बीच इधर-उधर कि बातें हि होतीरही थीं। बावजूद इसके कि उसकी बहोत कम बोलने कि आदत थि। याँ शायद हम् दोनों कि उम्र केँ फर्क कि वजह सें वो असहज होँ रही होँ।
खैर। लगभग ग्यारह बजे सोने केँ लिये लेटने कि नौबतआई। ऊपर मेरे कमरे मे एक् तख्त हि थां जोँ घर-मकान मालिक कि मेहरबानी सें लेटने केँ कामआता थां, बाकी मे तोँ सफरी जिंदगी कि वजह सें कोईखास सामान हि नहि बनाता थां।
उसे मैंने तख्त पे लिटा दिया औऱ स्वयं नीचे चटाई बिछाकर लेट गय़ा।
“सुन!” मैंने उसकीतरफ करवट लेँ कर कुहनी केँ बल चेहरा उठाते हुएकहा।
“हां भइया?” वो तख्त केँ किनारे पऱ आकर मेरीतरफ करवट लें कर मुझे देखने लगी।
“पांचछः साल पहले तक तौ तुम्हारी सेहत अच्छी भली थि औऱ दिखने मे बहुत अच्छी लगती थि। अब क्याँ होँ गय़ा तुम्हें?”
“पता नहि। ” उसने अनमने भाव सें जवाब दिया।
“कोई ऐसी बीमारी हैं जोँ खाला नें मुझे बतानी ठीक न् समझी हौ?” मैंने थोड़ी आत्मीयता पैदा करतेहुए कहा।
“जैसे?” वो थोडा चौंककर गौर सें मुझे देखने लगी।
“जैसे ल्यूकोरिया हि लेँ लो। ” मैंने राजदाराना अंदाज मे कहा।
कामुकता भरे पल आरज़ू के साथ - Desi sex story – New Episode
वो एकदम सें सकपका गई,। मुझसे मिली निगाहें एकदम सें झुक गयीं औऱ सीधी होँ करछत देखने लगी।
“नहि। ” थोड़ी देरबाद उसनेसधे हुए अंदाज मे जवाब दिया।
“कोई ब्वायफ्रेंड हैं तुम्हारा?”
“नहि। ” उसनेफिन अटकते हुए थोड़े वक्फे केँ बाद जवाब दिया।
“हम्म। अच्छा सेक्स करती होँ?”
“क्याँ!” वो एकदम भड़ककर उठ बैठी औऱ तेज निगाहों सें मुझे घूरने लगी-ये कैसा बेहूदा प्रश्न हैं?
“इसमें बेहूदा क्याँ हैं। जनरलचीज हैं, लोग करते हि हें, अगर तुम् करती होगी तौ कौन सि कयामत टूट पड़ेगी। ”
“क्याँ आप् ये चाहते हौ कि मे अभि इसीसमय यहां सें चली जाऊँ। ” उसकी आँखों सें क्रोध झलकने लगा।
“तुम्हारी मर्जी हैं। मे तोँ कभी नहि चाहूँगा ऐसा। वैसा मेरा इरादा न् तुम्हें तकलीफ पंहुचाने कां हैं औऱ न् हि कोई तुम्हारी इंसल्ट करने कां। मुझे साइकोलॉजी मे गहरी दिलचस्पी भि हैं औऱ पकड़ भि। समझना चाहता हूं तुम्हारे केस कों। शायदकोई सही सलाहदे सकूँ तुम्हें। ”
वो थोड़ी देर वैसे हि बैठी अजीब अंदाज मे मुझे देखती रही, फिन चुपचाप जैसे लेटी थि, वैसे हि लेट गई,।
“नहि। ” ऐसालगा जैसे बड़ी मुश्किल सें उसकेगले सें ये जवाब निकला होँ।
“बसयही तुम्हारी बिमारी हैं। ”
“मतलब?” वो फिन चौंककर करवट लेती हुइ मुझे देखने लगी।
“मतलबये कि चौदह पंद्रह कि उम्र सें हि लड़की जवान हौ जाती हैं औऱ सोलह सतरह तक उसकाबदन मर्दाना संसर्ग मांगने हि लगता हैं। ये नैसर्गिक हैं। इसमें गलतकुछ भि नहि। पऱ होताये हैं कि समाज केँ बनाये नियम औऱ अपनी इज्जत वगैरह केँ चक्कर मे सब अपनी प्राकृतिक इच्छाओं कों दबाने मे लग जाते हें, जोँ कि गलत हैं।
मेरीसमझ मे अपनी स्वाभाविक यौन इच्छाओं कों उस सूरत मे भलेदबा लें लड़की, जब उसेबीस बाईस तक विवाह होँ जाने कि उम्मीद होँ मगरअगर इसमें कोई दुविधा हैं याँ ये कनफर्म हैं कि विवाह जल्द हौ पाने केँ कोई चांस नहि तौ फिनइस संसर्ग सें गुरेज न् करके बल्कि केसे भि कोई जुगाड़ बने, बना लेना चाहिये।
क्योंकि ऐसा न् करने पऱ इंसान यौनकुंठा कां शिकार हौ जाता हैं। चाहेदिल दिमाग़ सामाजिक नियमों केँ चलतेइस डिमांड कों लाख नकारता रहे पर्र बदन तौ अपनी प्रतिक्रिया देता हि हैं।
तुम् जिस उम्र मे हौ, गारंटी सें कह सकता हूं कि तुम्हारे संग कि लड़कियों कि विवाह हौ चुकी होगी औऱ अगर किसी कि नहि भि हुइ होगी तोँ वो अपना जुगाड़ बनाये होगी औऱ वो सब पुरुष संसर्ग केँ मजे लें रही होंगी औऱ यहीचीज तुममें कुढ़न पैदा करती होगी।
साम कों जब तुम् बाथरूम गयीँ, थि तोँ तुम्हारा मोबाइल देखा थां मैंने। यूसी ब्राउजर कि हिस्ट्री मे न् केवल अंतर्वासना मौजूद हैं बल्कि दूसरी पोर्न विडियो साईट भि मौजूद हैं जोँ बताती हैं कि असल मे तुम्हारी यौन इच्छायें मरी नहि हें, बस उन्हीं सामाजिक नियमों केँ चलते तुम् उन्हें जबरनमार रही हौ औऱ यहीचीज तुम्हारे बदन कों गलारही हैं। ”
अब वो गहरी दिलचस्पी सें मुझे देखने लगी- मैंने कभी सोचा भि नहि कि मे आपसेइस सब्जेक्ट पर्र कभीबात करूँ!
“मगर कर सकती होँ, हमारी उम्र केँ फर्क औऱ रिश्ते कों भूलजाओ औऱ भरोसा रखो, एक् एक्सपर्ट साथी कि तरह तुम्हारे काम आँ सकता हूं। ”
जाने क्यूं। उसकी आंखें चमकने लगीं। थोड़ी देर तक सीधी हौ करछत निहारती रही.फिन वापस तिरछी होकर मुझे देखने लगी।
“मे घऱ पे रहती हूं। घऱ सें निकलने कां मौका रेयर हि मिलता हैं। ऐसे मे किसी सें कोई कंटीन्युटी बनाऊं भि तोँ मिल पाना हि मुश्किल होगा, सेक्स तोँ दूर कि बात हैं। ”
“फिन भि। पोर्न देखती हौ, पढ़ती हौ औऱ सोशल साइट्स पर्र भि होँ तोँ ब्वायफ्रेंड तोँ होना हि चाहिये कि कभी नं कभी जुगाड़ बन हि जायेगा। ”
“तीन हें। मगर मेरे लियेकभी घऱ सें निकलना मुमकिन भि होता हैं तोँ वोँ हि बेकार साबित होते हें। इधर-उधर पार्क झील घुमाते फिराते हें याँ फिल्म दिखा देते हें औऱ इस बहाने थोडा इधर-उधर हाथलगा कर औऱ सुलगा देते हें। न् उनकेपास कहीं लेँ जाने कां जुगाड़ होता हैं औऱ न् कहीं होटल वगैरह हि लेँ जाने मे दिलचस्पी रखते हें। अब मे क्याँ स्वयं सें कहूँ कि मुझे क्याँ चाहिये। ”
“एक् दोबार मे चेक करके, कि काम केँ नहि हैं। टाटाकर लेना चाहिये थां। नयाचेक करती, कोई तोँ काम कां निकलता। ”
“पहले एक् हि बनाया थां, बाद मे चेक करने-करने मे तीन हौ गये। बस टाटा किसी कों नहि किया कि नेट पे इन्हीं केँ सहारे थोडा टाईमपास होँ जाता हैं। ”
“तौ मतलब अट्ठाईस तक कुंवारी हि हौ। ”
इसबार जवाब देने केँ बजाय वो हंस पड़ी। निगाहें झुक गयीं औऱ कहतेहुए शब्द थोड़े लहरागये- नहि। तीनबार होँ चुका हैं।
“वो केसे?” मुझे जानने मे दिलचस्पी होँ गई, - जब तीनों हि नाकाम रहे तौ केसे होँ गय़ा?
“ग्रेजुएशन केँ एक् सालबाद मैंने एक् फोन सेंटर मे जॉबकर ली थि, वहींकाम करने वाले लड़के थें। सालभर मे एक् लड़के सें कंटीन्यूटी बनपाई थि तोँ पहलीबार उसी केँ संगहुआ थां। फिनउस लड़के कों दिल्ली मे ज़्यादा अच्छी जॉबमिल गई, तौ वो चला गय़ा।
फिन धीरे धीरे एक् दूसरे लड़के सें कंटीन्यूटी बनी जौ पहलेसाल सें हि लाईनमार रहा थां। उसकेसंग डेढ़साल नातारहा मगर सेक्स कां जुगाड़ मात्र एक् बार हि बन पाया। ”
“फिन?”
“वो वहांकाम करने वाले लड़कों मे सबसे हैंडसम थां औऱ लड़कियों मे मे हि दिखने मे सबसे ठीकठाक थि, मगरतब तक। जब तक एक् दूसरी लड़की वहां न् आँ गयीँ, जोँ मुझसे अधिक अच्छी भि थि औऱ फ्रैंक भि थि। आरामसे उसका जुगाड़ उससे स्लिम होँ गय़ा तौ मुझसे ब्रेकअप होँ गय़ा। फिनछः महीने सिंगल रही।
इसकेबाद एक् औऱ लड़कानया आया, जिसने खालीदेख केँ प्रपोज किया तोँ मेरे सामने भि क्याँ ऑप्शन थां। मैंने एक्सेप्ट कर लिया। उसकेसंग भि एक् हि बार नौबत आँ पाई लेटने कि। फिनये नाता अधिक लंबाचला भि नहि। सात महीने बादकॉल आई सेंटर हि बंद हौ गय़ा औऱ वो लड़कानयी जॉब केँ चक्कर मे लखनऊ शिफ्ट होँ गय़ा औऱ मे घऱ पे बैठ गई,। ”
“फिन कहीं औऱ भि तोँ कर सकती थि। ”
“कि थि। मगर कहींजॉब पसन्द नहि आई तौ कहींजॉब देने वालों कों मे नहि मनपसंद आई। अब यहां देखो क्याँ होता हैं। ”
“यहां नं बन पाये तोँ कह देना कि लखनऊ मे करोगी। यहां मे जॉब कि भि सेटिंग करा दूंगा, रहने कि भि औऱ लड़के कि भि। रोज हि करनातब। घऱ मे कोई विरोध करे तौ कह देना कि याँ तोँ विवाह हि करादो याँ फिनजॉब करनेदो, क्योंकि घऱ पर्र खाली नहि बैठ सकती। बाकी उन्हें मे कनविंस कर लूंगा। ”
“हम्म.यही करूँगी। मे भि अब औऱ नहि झेल पाऊंगी। ”
“सोचकर भि अजीब लगता हैं कि तुम् जिस स्थान हौ, वहां विवाह नं होने कि सूरत मे अब तक तीनसौ मर्तबा सेक्स कर चुका होना चाहिये थां तुम्हें औऱ किया हैं केवलतीन बार। ”
“मेरी बुरी क़िस्मत!” उसने जैसेअहह भरी।
“ये जोँ योनि होती हैं न्… खाती पीतीरहे तोँ बदन भि स्वस्थ रखती हैं औऱ मन भि, मगर सूखीरह गयीँ, तौ बदन भि सुखा देती हैं। ”
“आरएसएस पढ़पढ़ केँ इनढके छुपे शालीन शब्दों कि आदत नहि रही.अब तौ वे खुले-खुले शब्द हि अट्रैक्टिव लगते हें। मर्यादा तौ टूट हि चुकी.अब उन्हीं शब्दों मे बोलो भइया। ”
“हम्म। बुर कों सहीसमय पऱ चुदाई मिलना शुरुआत हौ जाये तोँ वो जिस्म कों खिला देती हैं औऱ स्वयं भि खिल जाती हैं, मगर वहींअगर उम्र हौ जाने केँ बाद भि बुर चुदाई केँ लियेतरस जाये तौ वो स्वयं भि सूखती हैं औऱ जिस्म भि सुखा देती हैं। तुम्हारे संग बदइत्तेफाकी सें वहीहुआ हैं। ”
थोड़ी देर तक वो खामोश रहीफिन एक् ठंडी सांस भरतेहुए बोलि- रात कां टाइम हौ, सन्नाटा होँ, तन्हाई होँ औऱ संग मे अपोजिट सेक्स कां व्यक्ति तौ कितना भि नजदीकी नाता हौ, कितना हि ‘पहलेकभी सोचा तक नहि…’ वाला सम्मान हौ। मगर इंसान बहकने जरूर लगता हैं।
“मे नहि बहकता। जोश मे होश खोने वालादौर कहीं पीछेछूट चुका। उम्र औऱ परिपक्वता आहिस्ता नियंत्रण करना सिखा देती हैं। तुम्हें अजीबलग रहा हौ तोँ सोजाओ। वैसे भि जोँ जानना औऱ समझाना थां, वो होँ चुका। ”
“मे अपनीबात कररही भाईजान। अब जोँ सब्जेक्ट छेड़ दिया हैं… उसकेबाद नींद कहां आयेगी। अब तोँ स्वयं हि दिलकर रहा हैं औऱ बातें करने कां। ”
“उन लड़कों मे सें किसी नें विवाह करने मे दिलचस्पी न् दिखाई?”
“तीनों दूसरे धर्म सें थें। विवाह करने कां कलेजा कहां रखते होंगे। बस चोदने तक मकसद थां औऱ उसमें भि एक्-एक् बार हि कामयाब हौ पाये तौ शायद छोड़ने कि वजह एक् ये भि रही हौ। ”
“औऱ ये जोँ करंट ब्वायफ्रेंड्स हें। इनमें?”
“दो सहधर्मी हें एक् अन्य धर्म सें… मगर तीनों हि उम्र मे मुझसे छोटे हि हें। उनकी दिलचस्पी केवल घूमने फिरने, अपने सर्कल मे गर्लफ्रेंड कां रौब गांठने औऱ नेट पऱ टाईमपास करने तक हि लगती हैं। ”
“मतलब दोनों मोर्चों पर्र बेकार हें। नं विवाह न् सेक्स। ”
“यही समझो!खैर। आप् अपने बारे मे बताओ। आपकी केसे गुजरती हैं? विवाह तौ आपकी भि नाकाम हुईँ मगर बुर तौ आपको भि चाहिये हि होगी न्?”
“मे तौ मर्द हूं। मर्दकब बंदिश मे रहता हैं औऱ कब परवाह हि करता हैं। दसियों जुगाड़ बनते रहते हें। हफ्ते मे दोतीन बार चोदने कों मिल हि जाती हैं। ”
“हम्म.लकी! काश लड़की कों भि समाज इतनीछूट देता। ”
“अच्छा। मैंने हाल हि कि विजिट सें पहले तक कभी तुम्हें शायदगौर सें देखा तक नहि थां। न् हि कभी पहले तुम्हें लेँ करमन मे कोई ख्याल आया थां, मगरअब तुम्हें देखता थां तोँ सोचता जरूर थां कि बिना कपड़ों केँ तुम्हारा जिस्म कैसा लगता होगा। ”
वो मेरी आंखों मे झांकने लगी।
“दरअसल मैंने अब तक ढेरों शरीर भोगे हें। उन्हें नंगा देखा हैं, उन्हें चोदा हैं मगरअब तक कोई भि ऐसी लड़की मेरे नीचे सें नहि गुजरी जौ इतनी ज़्यादा दुबली पतली होँ कि दिमाग़ मे ख्याल आये कि इसकाकुल वजूद जैसेबस दोछेद भर होँ औऱ उभारने पर्र वेछेद केसे दिखते होंगे। ”
“दोछेद?”
“मे आगे पीछे दोनों छेदों कां शौकीन हूं औऱ दोनों हि मुझे समानरूप सें आकर्षित करते हें। ”
“तौ। वो ख्वाहिश अब भि हैं?”
“जाहिर हैं। जब तक देखने कों नं मिल जाये, समाप्त केसे होँ सकती हैं। ”
मे उसकी मंशासमझ रहा थां, वो मेरी मंशासमझ रही थि। मगरफिन भि बहुतदेर खामोश रही जैसे किसी कशमकश मे पड़ी होँ।
“इतनी रोशनी मे चलेगा?” अंततः उसने नाईट बल्ब कि ओर इशारा करतेहुए कहा।
“क्यूं। लज्जा आती हैं?”
“एकदम सें ऐसी स्थिति बन जानां कि जिसकी पहलेकभी उम्मीद नं कि गई, होँ, थोड़ी झिझक तौ पैदा करता हि हैं। पहलेइसे हि रहने दीजिये। बाद मे भलेजला लीजियेगा। फिलहाल इसे भि बंदकर दीजिये। ”
कामुकता भरे पल आरज़ू के साथ - Desi sex story – New Episode
मेरादिल धड़कउठा। वाकई मे मैंने कभी नहि सोचा थां कि ऐसी नौबत आयेगी। हांये सच थां कि हाल केँ दिनों मे उसेदेख कर अक्सर मेरेदिल मे उसके नंगे शरीर कां ख्याल तौ जरूरआया थां मगर उससेआगे सोचने कि जरूरत कभी नहि महसूस हुइ थि।
बहरहाल मैंने उठकर कमरे मे जलता नाईट बल्ब भि बुझा दिया।
थोड़ी देरबाद उसने “हूं” कि आवाज़ कि, जौ इसबात कां इशारा थां कि मे लाईटजला सकता हूं। मैंने वापस स्विच ऑनकर दिया।
नजर घुमा केँ उसे देखा तौ वो चित लेटी हुईँ थि औऱ एक् हाथआंख पऱ रख लिया थां कि निगाहें मुझसे छुपी रहें। बाकीरात वाले उसके कपड़े उसने चटाई पे डाल दिये थें जहां मे लेटा थां।
मे उसकेपास तख्त पऱ हि आँ बैठा।
नाईट बल्ब वैसेभले कम रोशनी रखता होँ मगर वो बंद कमरे मे इतनी भि अपर्याप्त नहि थि कि मे उसके नग्नबदन कां अवलोकन नं कर सकता।
कामुकता भरे पलों सें इतरअगर वो अस्पताल कि शय्या पऱ पड़ी होती तोँ निश्चित हि उसेदेख कर किसी केँ भि मन मे दया हि पैदा होती।
बहोत कम जगहों पर्र गोश्त थां, अधिकतर जगहों पर्र हड्डियां चमकरही थीं। गर्दन पतली सि। नीचे हंसुली कि हड्डियां साफ उभरी हुईं। दोनों हाथों पऱ बस कुहनी केँ पास थोडा ज़्यादा मांस थां, बाकी पूरेहाथ कि हड्डियां चमकरही थीं। सीने पर्र दोनों अवयव, जोँ कभी टेनिस बॉल जितना उभार रखते थें वो अब नदारद थें औऱ यूँ लेटने पऱ तोँ सीना लड़कों कि तरह हि फ्लैट हौ गय़ा थां। पूरारिब केससाफ चमकरहा थां।
हां फ्लैट सीने पर्र चूचुक जरूर उभरेहुए थें मतलबभर केँ औऱ उससे ज़्यादा बड़ीबात ये थि कि उसके आसपास कां एरोला वाला हिस्सा भि यूँ फूलाहुआ थां कि निप्पल हि लगरहा थां। येपफी निप्पल थें। बहोत कमइसतरह केँ चुचुक नजरआते हें, ये उसका प्लस प्वाइंट थां।
नीचे जैसेपीठ सें लगताहुआ पेट थां औऱ ढलान पर्र दोनों साईड कूल्हे कि हड्डी कि खपच्चियां। पेडू पऱ घने काले बालों कां जमावड़ा, जिन्होंने उसकी योनि कों पूरीतरह ढकरखा थां।
उदर सें जुड़ी दो पतली-पतली टांगें, जिनमें जांघें पिंडलियों सें बस थोड़ी हि ज़्यादा थीं। हाथ पैरों कि नसेंचमक रहीथीं औऱ बगलों केँ बाल भि नीचे कि तरह बढ़ेहुए थें। मे देखकर सोचने लगा कि क्याँ मेरे सिवा भि किसी केँ मन मे कोईऐसा बदन कामुकता पैदाकर सकता थां।
“झांटे बहोत बड़ी हें। बिलकुल हि नहि बनाती क्याँ?”
“जैसी कुढ़-कुढ़ केँ जीवन गुजररही हैं, उसमें जल्द ख़्वाहिश हि नहि होती। ”
“हम्म। पीछे पलटो। ”
उसने चेहरे सें हाथ हटाया। एक् लम्हा कों मेरा चेहरा निहारा जिस पऱ शायदउसे मन माफिक भाव न् हि दिखेहों। फिन औंधी हौ गई,।
कंधे कि हड्डी, पक्खे, रीढ़ कि हड्डी साफतौर पर्र नुमाया थि। नितम्ब जौ बाहर् निकले हुए होने चाहिये औऱ पहलेकभी थें भि। वे लड़कों कि तरह फ्लैट थें। मैंने मुट्ठी मे भरकर दोनों पुट्ठों कों दबोचा। उनमें कोई सख्ती नहि थि औऱ वे आसानी सें फैलगये। बड़ी आसानी सें गुदा कां गुलाबी छेद बाहर् उभरआया।
“इसने भि टेस्ट किया क्याँ लन्ड कां?” मैंने छेद पऱ उंगली फिराते हुएकहा।
“एक् बार। ”
फिन वो सीधी हौ गयीँ,। औऱ मेरी आँखों मे देखने लगी।
“वैसे मानना पड़ेगा इमरान भइया। बहोत नियंत्रण हैं स्वयं पे। सामने लड़की कां शरीरदेख कर भि टूट नहि पड़रहे। ”
“उम्र औऱ मैच्योरिटी इंसान कों समझदार बना देती हैं। वैसेइन लम्हों कां तुम् पऱ क्याँ असरपड़ रहा हैं?”
“ये अहसास हि बहुत हैं कि मेरा नंगा शरीर किसी कि नजर मे हैं। चूत कों गीलाकर देने केँ लिये। ”
दिख तौ रही नहि थि मगर मैंने उंगली लगाकर देखा तौ वाकई वो बहनेलगी थि।
“अगर रेजर केँ इस्तेमाल सें परहेज नं हौ तोँ बोलोये मलबाहटा दूं। ”
“हटा दो। मुझेकौन सां माडलिंग करनी हैं याँ पोर्न फिल्मों मे काम करना हैं। ”
इजाजत मिलने कि देर थि, मैंने कमरे मे हि मौजूद नीचे केँ बालशेव करने वाली मशीन उठाई, अखबार लिया औऱ वापस उसकेपास आँ करबैठ गय़ा।
उसकीबगल केँ नीचे अखबार रखकर पहले बगलों केँ बालसाफ किये, फिन नितम्बों केँ नीचे अखबार रख केँ योनि केँ आसपास फैले बालों कों साफ करनेलगा। इसकाम मे उसकीऊपर सें लंबी दिखती मगर अंदर सें छोटी योनि कां निरीक्षण करने कां भि मौकामिल गय़ा।
यूँ खाली लकीर देखने सें भ्रम होता थां कि उसकी योनि बड़ी औऱ बहुत इस्तेमाल कि हुई होगी, मगर अंदर सें खोलने पर्र एकदमबंद दिखती थि औऱ लगता हि नहि थां कि वो सेक्स करती होँ। क्लिटोरिस भि छोटी-छोटी थीं औऱ भगांकुर भि छोटा हि थां। मैंने वहां उंगली छुहाई तौ वो ‘सि’ करके सिहर गई, थि।
काम ख़त्म होते उसकी योनि सें बहतारस उसके नीचे वालेछेद सें गुजरकर चादर तक पंहुचने लगा थां। औऱ काम समाप्त होने केँ बाद वो स्पष्ट चमकने लगी थि।
“देखकर तौ लगता नहि कि पहलेकभी सेक्स किया हैं। चलो लन्ड कि सुविधा नहि थि मगर क्याँ हस्तमैथुन सें भि परहेज थां?”
“क्लिटरिस हुड कों रगड़ केँ आनंद लेँ लेती थि। उंगली याँ कोई औऱ चीज घुसाने लायकजतन करने केँ लियेसमय औऱ सुविधा चाहिये जौ साल मे कभी कभार मिलती हैं, तबकर हि लेती हूं। ” कहतेहुए वो कुहनी केँ बलउठकर अपनी चिकनी हौ गयीँ, योनि देखने लगी।
“देखने सें सीलपैक बुर हि लगती हैं। ” मैंने प्रशंसात्मक स्वर मे कहतेहुए बालों कि अखबारी पुड़िया बनाकर कचरे मे डाली औऱ मशीनरख कर वापस उसकेपास आँ गय़ा।
“अबसही लगरही हैं। कम सें कम अट्रैक्टिव तौ लगरही थोड़ी। ”
“मुझे इंसल्टिंग लगरहा थोडा। ”
“क्याँ?”
“यही कि मेरा बेकार सां विरक्ति पैदा करने वाला शरीर भि आपके सामने बिना कपड़ों केँ हैं औऱ आपका ठीकठाक होतेहुए भि कपड़ों मे। ”
समझदार कों इशारा बहुत थां। मैंने अपने कपड़े उतारने मे देर नहि लगाई औऱ नंगा होकर उसके पहलू मे लेट गय़ा। जबकि वो मेरे नंगे होते हि मेरे अर्धउत्तेजित लिंग कों गौर सें देखने लगी थि।
“एक् अरसेबाद ये नियामत देखने कों मिली हैं। ” उसने एक् हाथ सें मेरे लिंग कों पकड़ते हुएकहा औऱ वो कमबख्त ठुनकता हुआ लकड़ी होँ गय़ा।
“मुंह मे लेने कि नौबतआई कभीइसे?”
“एक् बार। तीसरे वाले नें चुसाया थां। वो हालाँकि शौकीन थां औऱ उसकेसंग लंबी ट्यूनिंग चल पाती तोँ वो जुगाड़ बना केँ जबतबमजे देतामगर मेरी बुरी क़िस्मत। ”
“उनके साइज क्याँ थें?”
“पहले वाले कां तुमसे थोडा लंबा औऱ थोडा मोटा थां। सील तोँ उसी नें तोड़ी थि, फिन स्वयं जल्दझड़ भि गय़ा जिससे दर्द हि रहा, मज़ा नं आँ पाया। दूसरी बार मे थोडा मज़ाआया मगरतब भि वो देर तक नहि लेँ पाया जैसा मे चाहती थि। ”
“औऱ दूसरा?”
“उसका एकदम तुम्हारे साइज कां थां। उसनेतीन राउंड चोदा थां औऱ लंबा भि चला थां। दोबार बुर कों रगड़ा थां औऱ तीसरे राउंड मे गांड मारी थि। ”
“आनंदआया थां कुछ?”
“मैंने पोर्न मे दसियों बार देखा थां औऱ अन्तर्वासना पर्र भि पढ़ा थां, इसलिये मे स्वयं भि ये टेस्ट करना चाहती थि तभी करने भि दियाउसे। मगर उतना आनंद नहि आया औऱ दर्द भि बहुतहुआ। ”
“पहलीबार मे दर्द तोँ आगे भि होता हैं औऱ उसका मज़ा एक् दोबार मे नहि आता। आहिस्ता आनां शुरुआत होता हैं। ”
“होँ सकता हैं। मुझे तौ बार-बार कां मौका हि हाथ नं लगा। ”
“औऱ वो तीसरा लड़का?”
“उसका तुमसे बहुत लंबा औऱ मोटा दोनों थां, वो स्वयं भि बहुत लंबा चौड़ा थां। यूँ उसकेसंग इसीवजह सें घूमना फिरना जितना वीयर्ड लगता थां, चुदाई मे उतना हि आनंद देता थां। उसके लिये मे कोई हल्की फुल्की गुड़िया जैसी थि, जिसे वो किसी भि तरह सें औऱ किसी भि एंगल सें चोद सकता थां औऱ उसने चोदा भि। पहले राउंड मे उसके हैवी लन्ड कि वजह सें तकलीफ जरूर हुइ मगर अगलेदो राउंड मे आनंद भि खूब जबरदस्त आया। ”
“वो लखनऊ मे हि हैं?”
“हां.मगर दूरी कि वजह सें मेराकोई कांटैक्ट नहि रहाअब। ”
“यहां रहना तौ फिनबना लेना। कांटैक्ट बनने मे कितनी देर लगती हैं औऱ चूँकि वो तुम्हें चोद चुका हैं तौ भले उसकी गर्लफ्रेंड हौ, मगर तुम् चुदने मे दिलचस्पी दिखाओगी तोँ मान हि जायेगा। ”
“पहलेकभी इसतरफ मे सोच भि नहि सकती थि, मगरअब आप् कहरहे हौ तौ सोचती हूं इसीतरह कि ट्राई करूँगी। केवल मेरे चाहने सें घरवाले कभी न् मानते। मगर आप् कहोगे तोँ जरूरमान जायेंगे। ”
फिन थोड़ी देर केँ लिये हमारे बीच मे खामोशी छा गई, औऱ मे उसकीतरफ करवट लियेउसे देखता रहा।
“किसी नें तुम्हारी बुर चाटीकभी। ”
“नहि। चाहत तोँ देख-देख केँ हरबार पैदा हुई मगरकभी सामने वाले स्वयं सें रेडी नहि हुए औऱ मे कहपाई नहि। अजीब मानसिकता हैं यहां लड़कों कि। पोर्न देख केँ लड़की सें तौ वैसे हि एक्ट कि उम्मीद करते हें मगर स्वयं पीछेहट जाते हें। ”
“हरकोई तोँ नहि हट जाता। पर्र इत्तेफाक सें तुम्हें हटने वाले हि मिले। ”
“मेरी बुरी क़िस्मत। ”
“वैसे जोँ पोर्न देखती याँ पढ़ती होँ। कभी उसकी नायिका कि तरहदो याँ तीन लड़कों केँ संग एकसाथ मज़ा लेने कि ख्वाहिश नहि होती?”
“अब मेरीतरह एक् लन्ड कों भि तरसती लड़की कों ऐसी ख्वाहिश न् होँ, ये तोँ नामुमकिन हैं। मगर जहां एक् लड़के केँ लाले पड़ेहों, वहांदो कि तोँ उम्मीद करना हि चूतियापा हैं। ”
“कोईबात नहि। यहांरह गयीँ, तौ जोँ भि ख़्वाहिश होगी, बताना। हर ख्वाहिश पूरी करने कि गारंटी हैं। ”
“एक् अभि हैं। पूरीकर दीजिये। ” वो आंखें चमकाती हुई मुझे देखने लगी।
“क्याँ?”
“अपना लन्ड मेरी बुर मे घुसाकर मेरेऊपर लद जाइये औऱ मुझेदबा लीजिये। अभि मात्र इतना। ”
मे चुपचाप उठ गय़ा औऱ उसकी टांगों केँ बीच आँ बैठा। दोनों टांगों कों घुटनों सें मोड़कर उसकी योनि उभारकर खोलली जौ लिसलिसे पानी सें भीगी हुईँ थि औऱ बुरीतरह चिकनी हौ रही थि।
मुंह मे थोड़ी लारबना कर मैंने अपने लिंग कों चिकना किया औऱ शिश्नमुंड उसकी योनि सें सटाकर दबाव डालना शुरुआत किया। इतनी अधिक चिकनाहट नं होती तोँ शायदकाम मुश्किल थां मगर योनिरस कि अति आसानी पैदाकर रही थि।
उसकी योनि कि अंदरूनी मांसपेशियां जौ देखने मे जाहिरी तौर पऱ बंद औऱ अक्षत लगतीथीं, वे दबाव पड़ने पऱ लचीली होकरफैल गयीं औऱ उन्होंने थोड़े कसाव केँ संग शिश्नमुंड कों ग्रहण कर लिया।
पता नहि दर्द याँ मजा सें उसकी सीत्कार निकल गई, थि, आंखें बंद हौ गई, थि औऱ होंठ भिंचगये थें। हाथऊपर करके उसने मुट्ठियों मे चादर दबोचली थि।
मैंने उस पर्र झुकते हुएजोर डालना शुरुआत किया औऱ लिंग योनि कि संकुचित दीवारों कों फैलाता अंदर सरकने लगा। अपनाआधा जोर अपने घुटनों पर्र हि रखतेहुए उस पऱ लद गय़ा औऱ ऊपरीधड़ कां वजन कुहनियों पर्र संतुलित करतेहुए हाथ उसके नीचे पंहुचा दिये। दबोचने केँ अंदाज मे।
उसने अपनेहाथ मेरीपीठ पर्र पंहुचा लिये औऱ मुझेकस लिया, जबकि अपनी टांगों कों उठाकर उनसे मेरी जांघें जकड़लीं।
“धक्के लगाने हें?”
“नहि। बसऐसे हि पड़ेरहो औऱ मुझेइस मजे कों महसूस करनेदो। ”
कामुकता भरे पल आरज़ू के साथ - Desi sex story - Continue reading next part
Relavant source : click here