RISTON KE RAKH ( maa beta story) - maa beta story - Episode 1
Got it! Here's the revised version without the headlines:
कथा कां नाम: रिश्तों कि राख
मुख्य पात्र:
1। एरा (Era)
एरा एक् हसीन, आत्मनिर्भर औरत हैं औऱ एक् मल्टीनेशनल कंपनी कि सीईओ हैं। उसने अपने माँ-बाप केँ दबाव मे आकर अपने पति अमर औऱ बेटेकरण कों छोड़कर अमेरिका मे नई ज़िंदगी शुरुआत कि थि। अब वोँ अपने फैसले पर्र पछतारही हैं औऱ करण कों ढूंढकर अपनी गलती सुधारने केँ लिएहर संभव प्रयास कररही हैं।
2। करण (Karan)
एरा औऱ अमर कां बेटा। अपनी मां केँ बिना बिताहुआ बचपन औऱ पिता कों खोने कां दर्दकरण कों कठोर औऱ आत्मनिर्भर बना चुका हैं। अपनी दादीमा केँ संग गाँव मे रहने वालाकरण अब अपनी मम्मी सें नफरत करता हैं औऱ अपनेदिल मे बहोत सारे प्रश्न छिपाए हुए हैं।
3। अमर (Amar)
एरा केँ पति औऱ करण केँ पिता। अमर नें एरा केँ जाने केँ बाद गहरेदुख मे अपनीजान दे दि थि। उनकीमौत नें करण कों गहरीचोट पहुंचाई औऱ उसे जिंदगी केँ कठिन रास्तों पऱ अकेला छोड़ दिया।
4। दादीमा (Karan’s Grandmother)
करण कि दादीमा, जिन्होंने अमर कि मौत केँ बादकरण कों अपनीगोद मे पाला। वो करण केँ लिए मां औऱ पिता दोनों बनीं औऱ उसकी परवरिश मे अपने मूल्यों कों प्राथमिकता दि
9। गीता शर्मा
एरा कि सेक्रेटरी, जौ हमेशा उसकेसंग खड़ी रहती हैं औऱ एरा केँ दर्द कों समझती हैं।
भविष्य मे करन केँ जिंदगी मे एक् महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हैं।
किस्सा कि थीम:
ये स्टोरी मां-बेटे केँ बीच कि नफरत, पछतावे औऱ टूटे रिश्तों कों जोड़ने कि जद्दोजहद कि हैं। रिश्तों कि राख सें एक् नई शुरुआत करने कि कोशिश, जहाँहर पात्र अपनी गलतियों सें सीखते हुए प्रेम औऱ माफी कि ओर बढ़ता हैं।
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इरा एक् हसीन, आत्मविश्वासी औऱ महत्वाकांक्षी स्त्री थि। वो अपने आकर्षक व्यक्तित्व औऱ स्मार्ट फैसलों सें हमेशा सबका ध्यान आकर्षित करती थि। उम्र केँ इस पड़ाव मे भि, वो किसी युवा लड़की सें कम नहि लगती थि। उसकीहरी आँखें, घने कालेबाल, औऱ पतला हसीनबदन उसे सबकी नज़र मे आकर्षक बनाते थें। इरा, जोँ अब अमेरिका मे एक् बहुराष्ट्रीय कंपनी कि सीईओ केँ पद पर्र काबिज़ थि, एक् वक्त मे दुनिया केँ सबसे बड़े व्यापारियों मे सें एक् मानी जाती थि।
वो कंपनी कि मीटिंग्स औऱ ग्लोबल विस्तार योजनाओं कि जिम्मेदारी संभालते हुए अपने कर्मचारियों सें संवाद करती। पऱ, उसके चेहरे पऱ एक् गहरी चुप्प थि, एक् ऐसा दर्द जिसे वो छुपाने कि कोशिश करती थि, मगरकभी नं कभी वो बाहर् आँ हि जाता थां।
आज कि मीटिंग मे इरा नें एक् नए प्रोजेक्ट पर्र चर्चा करने केँ लिएटीम कों बुलाया थां। उसका कार्यालय एक् आलीशान औऱ अत्याधुनिक थां, जोँ उसकी सफलता कों दिखाता थां। उसके चारों ओर उसके कर्मचारी बैठकर उसकी बातें ध्यान सें सुनरहे थें। इरा कि आवाज़ मे एक् विशेष कशिश थि, जोँ सब कों प्रभावित करती थि।
"हमेंइस प्रोजेक्ट कों अगलेतीन महीनों मे लांच करना हैं, " इरा नें गंभीरता सें कहा। "हमारे पाससही टीम हैं, औऱ मे जानती हूं कि हम् इसे बिना किसी मुश्किल केँ पूराकर सकते हें। हर एक् डिटेल कों ध्यान सें देख्ना हैं। "
"जी, मैम, " सब कर्मचारी सहमति मे सिर हिलाते हें।
"औऱ ध्यान रखें, "इरा नें फिन सें अपनी आवाज़ कों थोड़ी तीव्रता सें उठाया, "हमारा उद्देश्य मात्र मुनाफा नहि हैं, बल्कि इस प्रोजेक्ट कों समाज मे एक् सकारात्मक बदलाव लाने केँ रूप मे देख्ना हैं। "
कर्मचारी एक् दूसरे कों देखने लगे। इरा कां नेतृत्व औऱ दूरदृष्टि उन्हें प्रेरित करती थि, मगर एक् बात जोँ सबको चौंकाती थि, वो ये थि कि इरा केँ भीतर एक् हल्की सि उदासी छुपी रहती थि। कभी-कभी वो अपनी समस्याओं कां सामना नहि कर पाती थि औऱ फिनवही गहरी चुप्प उसेघेर लेती थि।
इरा कां जिंदगी एक् सुखद यात्रा नहि थां। उसकी सफलता कि कुंजी उसके अंदर कि इच्छाशक्ति औऱ संघर्ष थि। एक् समय थां जब वो एक् छोटेशहर कि लड़की थि, जोँ अपने सपनों कों पूरा करने केँ लिए बड़ी उम्मीदों केँ संगघऱ सें निकली थि। उसने सबकुछ छोड़ा थां, अपने बेटेकरण कों, अपने पति कों, औऱ अपने पुराने जिंदगी कों।
"मैम, क्याँ सभीकुछ ठीक हैं?" एक् कर्मचारी, जिसे गीतानाम थां, नें इरा सें हल्के सें पूछा। इरा कि आँखों मे एक् आंसू थां, जौ वो जल्दी पोंछने कि कोशिश करती थि, मगर गीता नें देख लिया।
"हाँ, गीता। सभी ठीक हैं, " इरा नें जवाब दिया, मगर उसकी आवाज़ मे वो विश्वास नहि थां, जोँ आमतौर पऱ होती थि। वो जानती थि कि गीता कों उसका दर्द महसूस होँ रहा थां।
"अगर आपकोकुछ चाहिए, तौ बताइए, " गीता नें समझदारी सें कहा।
"नहि, गीता। मुझे सिर्फ़ अपनेकाम पर्र ध्यान केंद्रित करना हैं, " इरा नें हल्के सें मुस्कुराते हुएकहा। मगर उसके भीतर कां दर्दअब भि उसे परेशान कररहा थां।
हालाँकि इरा कां बाहरी जिंदगी बेहदसफल थां, पर्र उसकी निजी ज़िंदगी कि स्थिति कुछ औऱ हि थि। उसे अपने बेटेकरण केँ बारे मे बार-बार यादआता थां। वो जानती थि कि उसने अपने बेटे कों छोड़ दिया थां, औऱ अब वो उसे ढूँढने कि कोशिश कररही थि। इरा कों ये एहसास हौ गय़ा थां कि अब वो जिस सफलता कां स्वाद चखरही हैं, वो उसके बेटे केँ बिना अधूरी हैं।
कभी वो सोचती थि कि अगर वो उस वक़्त करण कों छोड़ने केँ बजायउसे संग लेकर जाती, तौ उसका जिंदगी कितना अलग होता। मगर, एक् गहरी चाहत थि कि वो अबसभी कुछठीक कर लें, औऱ वो अपने बेटे केँ पास वापस लौटे।
"मैम, आपको हमारे नए प्रोजेक्ट केँ लिए क्याँ उम्मीदें हें?" एक् कर्मचारी नें गंभीरता सें पूछा।
"मे उम्मीद करती हूं कि आप् लोग मेहनत करें औऱ हर एक् चुनौती कां सामना करें। हमारा उद्देश्य इस प्रोजेक्ट कों सफलता कि ऊँचाईयों तक लें जानां हैं, मगर इसकेलिए हमें सबका सहयोग चाहिए होगा, "इरा नें आश्वस्त करतेहुए कहा।
ये मीटिंग ख़त्म होँ गई, मगरइरा केँ चेहरे पर्र गहरी चिंता थि। उसके अंदर एक् ऐसी कशिश थि, जौ किसी कों दिखाई नहि देती थि, मगर वो स्वयं जानती थि कि उसकी ज़िंदगी मे कुछ जरूरी चीज़ें अधूरी हें।
उसकेमन मे हमेशा एक् प्रश्न रहता थां - "क्याँ मे अपने बेटे कों फिन सें पा सकूँगी?"
इरा नें अपने जिंदगी कों साकार किया थां, मगर वो ये जानती थि कि हर सफलता कि एक् कीमत होती हैं। औऱ उसकी सफलता कि कीमत थि, उसका बेटा। वो उसे ढूंढने केँ लिएकोई भि क़ीमत चुकाने कों रेडी थि, चाहेउसे अपने अतीत सें जूझना पड़े याँ अपनी गलती कों सुधारने केँ लिए अपनी सारी खुशियाँ छोड़नी pare
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इरा दफ़्तर सें घऱ लौटने केँ बाद अपने बेडरूम मे आकर पलंग पर्र बैठ गई। दिनभर कि व्यस्तता औऱ जिम्मेदारियों केँ बाद, अब उसे अपने अकेलेपन कां सामना करना थां। वो गहरी सांस लेतेहुए आरामसे अपने जूते उतारती हैं औऱ खाट पऱ गिर पड़ती हैं। उसकेमन मे आजफिन वही प्रश्न उठता हैं, जौ कई सालों सें उसे परेशान कररहा थां – क्याँ उसनेसही किया थां? क्याँ वो कभी अपने बेटे कों वापसपा सकेगी?
बेहदथकी हुइ इरा नें अपना ध्यान बैड केँ सामने रखे एक् पुराने फ़्रेम कि ओर मोड़ा। वो तस्वीर उसकी आँखों केँ सामने खड़ी होँ गई, जिस पर्र उसके बेटेकरण कां चेहरा थां। वो तस्वीर एक् पुरानी याद कों ताजाकर देती थि – वो दिनजब उसनेउसे छोड़ दिया थां, जब उसने अपना करियर बनाने केँ लिएउसे छोड़ दिया थां। उसेयाद थां कि करण बहोत छोटा थां उस वक़्त, औऱ वो बेहद नाज़ुक थां, फिन भि उसनेउसे छोड़ दिया।
इरा कि आँखों मे गहरी उदासी थि, औऱ उसने धीरे-धीरे सें तस्वीर कि ओर देखा। ये वही तस्वीर थि, जौ उसने अपने बेटे केँ कमरे सें लेँ ली थि। जब वो घऱ छोड़ने वाली थि, तबकरण कि छोटी सि मुस्कान औऱ उसकी मासूमियत उसे हमेशा याद दिलाती थि। येवही तस्वीर थि, जौ वो अक्सर रात कों अपने कमरे मे देखती थि, जब अकेले होती थि, औऱ अपने बेटे सें बात करने कि कोशिश करती थि।
इरा कि आँखों मे आंसू थें, जोँ आरामसे उसकी आँखों सें बहनेलगे। वो ये महसूस करती थि कि कितने सालों सें वो अपनी सफलता कि चादर ओढ़ेहुए थि, मगर उसने अपनी खुशियाँ खो दि थीं। अपनी जड़ों कों भूल चुकी थि, औऱ अब वो अकेली थि।
"करण."इरा नें धीमी आवाज़ मे कहा। "क्याँ तुम् मुझेमाफ करोगे?" वो अपने बेटे सें ये प्रश्न करती थि, मगर जवाबकभी नहि आता थां। क्याँ उसने अपने बेटे कों छोड़कर सही किया थां? क्याँ वो कभीउस प्रेम कों वापसपा सकेगी, जिसे उसने अपने बेटे सें दूर रहकरखो दिया थां?
इरा नें अपनी आँखों कों पोंछते हुएफिन सें तस्वीर कि ओर देखा। "जब तुम् छोटे थें, तब मे तुम्हें हरदिन देखती थि, तुम्हारी छोटी सि मुस्कान कों, तुम्हारी मासूम बातें। औऱ अब, मे अपनी आँखों मे तुम्हारी यादों कों संजोकर जीरही हूं। क्याँ तुम्हारे दिल मे मेरेलिए अब भि कोई स्थान हैं, करण?"इरा नें अपनी आँखों कों बंद करतेहुए कहा, उसकी आवाज़ मे अब गहरी उदासी थि। "क्याँ तुम् मुझेकभी अपनी मम्मी मान सकोगे?"
तस्वीर कि ओर देखते हुए, उसकी आँखों मे ये गहरी कशिश थि कि वो वापसलौट सके। वो चाहती थि कि उसे अपने बेटे सें एक् बारफिन वही प्रेम औऱ संबंध मिलजाए। वो चाहती थि कि उसका बेटा उसेफिन सें अपनेदिल सें स्वीकार करे, मगर अब वो जानती थि कि ऐसा बहोत मुश्किल थां। उसने जौ गलती कि थि, वो अबकभी सुधर नहि सकती थि।
उसकी आँखों सें आँसू बहतेजा रहे थें, औऱ उसका चेहरा गुस्से औऱ पश्चाताप सें भराहुआ थां। "मे नहि जानती कि तुम्हारा दिल मुझसे कभी मिलेगी याँ नहि। मगर एक् चीज़ मे जानती हूं कि मेरेदिल मे तुम्हारी यादें हमेशा बनी रहेंगी। " इरा नें कहा, औऱ उसकी आवाज़ मे अब भि वहीदुख थां।
वो तस्वीर कों अपने हाथों मे उठाकर उसके लगभगलाई औऱ उसे अपने गालों पर्र रखा। "तुमसे बहोत प्रेम करती हूं, करण। मे तुम्हें कभी नहि भूल सकती। क्याँ तुम् अब भि मुझे अपनी मां केँ तौर पर्र अपनाना चाहोगे? क्याँ तुम्हारे दिल मे वोँ प्रेम फिन सें जिंदा हौ सकेगा?" इरा कि आवाज़ मे अब उम्मीद थि, मगर वो जानती थि कि ये उम्मीद शायदकभी पूरी नहि होगी।
उसने तस्वीर कों फिन सें दीवार पऱ टांग दिया, मगर उसे महसूस होँ रहा थां कि इस तस्वीर केँ आगे वो स्वयं कितनी छोटी औऱ अकेली थि। इरा जानती थि कि वो अब अपने बेटे कों वापस पाने केँ लिए जोँ भि कर सकती थि, उसे करेगी। वो हर कोशिश करने केँ लिए रेडी थि, मगरउसे नहि पता थां कि उसका बेटा उसकीइस कोशिश कों स्वीकार करेगा याँ नहि।
"करण, मुझे तुमसे मिलने कि एक् अंतिम कोशिश करने कां हक चाहिए, " इरा नें अपनी आँखों मे फिन सें आशा भरतेहुए कहा। "क्याँ तुम् कभी मेरेपास आओगे, मुझेगले लगाओगे? क्याँ तुम् मेरेलिए वो प्रेम फिन सें दे पाओगे?" उसकी आवाज़ अब बहोत हल्की थि, जैसे वो स्वयं भि अपनी उम्मीदों सें टूट चुकी हौ, मगरफिन भि अपने बेटे कों पाकरउसे हरहाल मे चाहती थि।
अबइरा नें स्वयं सें वादा किया कि वो कभीहार नहि मानेगी। चाहे जोँ भि हौ, वो अपने बेटे कों वापस पाने केँ लिए अपनी पूरी कोशिश करेगी। उसकी आँखों मे येनयी उम्मीद थि।
इरा नें तस्वीर सें फिन सें आँखें हटाईं औऱ स्वयं कों समेटते हुएकहा, "मे तुमसे प्रेम करती हूं, करण, औऱ मे तुम्हे कभी नहि छोड़ूंगी। "
इस वक़्त, इरा कों ये अहसास हुआ कि ये प्रेम कभी समाप्त नहि होँ सकता। भले हि वो अपने बेटे सें दूर थि, मगर उसकादिल हमेशा उसी केँ पास रहेगा।
एरा कां दिल जैसे बर्फ सें भि ठंडा होँ गय़ा थां। वो तस्वीर मे अपने बेटे कों देखरही थि, औऱ उसके अंदर कां दर्द औऱ बढ़ता जारहा थां। आँसुओं सें भरी उसकी आँखें अबउसे यह समझाने कि कोशिश कररही थीं कि वो उस दर्द कों महसूस करे जोँ उसनेकभी नं कभी किया थां। जैसे हि एरा नें तस्वीर कों फिन सें देखा, उसे अपनी छोटी सि कटी-फटी यादें ताजा होँ आईं। वोँ यादें जोँ उसकी आत्मा मे हमेशा केँ लिए दर्ज हौ गई थीं।
वो यादें, जबकरण छोटा थां, औऱ वो अपनी मम्मी कि गोदी मे झूलते हुए अपनी प्यारी मुस्कान केँ संग दुनिया सें खेलता थां। एरा नें अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उस छोटे सें मासूम बेटे कि मुस्कान कों अपनी आँखों मे बसाने कि कोशिश कि। उसेआज भि उसकीउस मुस्कान कि जरुरत थि। मगर उसकी आँखों केँ सामने एक् सन्नाटा थां।
एरा केँ होंठ एक् धीमी आवाज़ मे कांपे। "करण, मुझे तुमसे बहोत प्रेम थां। मगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया। क्याँ तुम् मुझेफिन सें अपना सकोगे?"
उसकीये बात मात्र एक् प्रश्न नहि थि, बल्कि उसकेदिल कां एक् टूटाहुआ टुकड़ा थां, जिसे वो छुपा नहि पाई। तस्वीर कों देखते हुए उसकी आँखों सें आँसूगिर रहे थें, मगरउसे लगरहा थां कि यह आँसूअब उसेकोई राहत नहि देंगे। उसेबस ये चाहिए थां कि वो अपनी गलती कां प्रायश्चित करसके।
वो तस्वीर कों अपनी आँखों सें चिपकाकर देखरही थि औऱ किसीतरह सें सोचरही थि कि क्याँ वो कभीकरण कों फिन सें अपनी मां बना पाएगी? क्याँ वो कभी अपने बेटे कां दिलफिन सें जीत सकेगी? मगर उसके अंदर केँ सवालों कां कोई जवाब नहि थां।
इतना हि नहि, अचानक एरा कों ऐसा महसूस हुआ कि कमरे मे कुछबदल रहा हैं। जैसे किसी नें उसके सामने आकर उसकेसंग बातें कि होँ। उसेलगा जैसेकरण सचमुच उसकेपास हौ, औऱ उसकी आँखों मे दर्द औऱ प्रश्न थां। "मां, तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया थां?"
एरा केँ दिल मे एक् अजीब सां दर्दहुआ। उसकी हिम्मत अबटूट चुकी थि, औऱ उसने अपने हाथों सें अपने चेहरे कों ढक लिया। वो फूट-फूट कर रोनेलगी। उसकादिल जैसे चीरने वाला दर्द महसूस कररहा थां। "करण। मेरे बेटे। मुझे क्षमा करदो। मे जानती हूं कि मैंने तुम्हारे संग बहोत गलत किया हैं। "
उसकी आवाज़ मे इतनेकषट थें कि कमरे कां हर कोनाउसे सुन सकता थां। उसकी आँखें जल चुकीथीं, औऱ उसके चेहरे पर्र वोँ चुप्प थि जोँ कभीउसे समझ मे नहि आती थि।
मगर जैसे हि वो औऱ रोई, उसे अचानक ऐसालगा कि उसके सामने करण एक् बारफिन खड़ा हैं। उसकी आँखों मे वही मासूमियत औऱ वही प्रश्न थां। "मां, क्याँ तुम् मुझेफिन सें अपना सकोगी?"
ये प्रश्न उसेअब औऱ भि बेहोश करने वाला थां। एरा अपने आँसुओं कों नहि रोकपाई। "करण, मे तुमसे बहोत प्रेम करती हूं। तुम् मेरी जीवन होँ। मुझे क्षमा करदो। "
उसकी आवाज़ मे ये दर्द थां, औऱ वो चाहती थि कि वो अबकभी नं रुकसके, मगर जैसे हि उसने पलटकर देखा, कमरे मे सन्नाटा थां। सभीकुछ हलचल मे डूबाहुआ थां। औऱ तभीउसे समझ मे आया कि जोँ कुछ उसने महसूस किया वो मात्र एक् सपना थां। वो एक् ऐसा सपना थां जिसे वो खो चुकी थि।
कमरे मे एक् ठंडीहवा आई, जैसे वो सपना अचानक टूट चुका होँ। एरा नें अपनी आँखें खोलीं, औऱ वो यही सोचने लगी कि कहीं वो अपनी गलती केँ लिएकभी माफ़ी पा सकेगी याँ नहि।
तभी, कमरे कां दरवाजा खुला औऱ उसकी मां, पिता, भइया, औऱ भाभी एक्-एक् करके कमरे मे आए। वेएरा कों देखते हुए चुपचाप खड़े थें। हर एक् केँ चेहरे पऱ कुछ छिपाहुआ थां। एरा नें जब उनकी आँखों मे देखा, तोँ उसेसमझ मे आया कि वेसभी उसे समझने कि कोशिश कररहे थें, मगरवे भि उस दर्द कों महसूस नहि करपारहे थें जोँ उसने खोया थां।
उसका भइया, जोँ हमेशा उससेबात करने केँ लिए हिम्मत देता थां, अबचुप थां। उसकी आँखों मे भि गहरी उदासी थि। वो बस खड़ारहा, औऱ उसकेपास कोई शब्द नहि थें।
एरा नें आँखों मे आँसू समेटते हुएकहा, "मे केवलये जानना चाहती हूं कि करण मुझेफिन सें अपना पाएगा याँ नहि?" उसकी आवाज़ अब भि कांपरही थि।
तभी उसके पिता नें धीरे-धीरे सें उसकीपीठ थपथपाई। "बिलकुल, एरा। वक़्त कभी भि सजा नहि देता। तुम् जौ कुछ भि कर सकती हौ, करो। मगर तुम्हें एक् बातयाद रखनी होगी.कभी भि अपने फैसले केँ लिए स्वयं कों दोषीमत समझो। "
एरा कि आँखें एक् समय केँ लिए औऱ भरआईं, मगर उसने धीरे-धीरे सें उन्हें पोंछ लिया। उसे अब एक् उम्मीद कां नया सूरज दिखाई देरहा थां। वो जानती थि कि अब शायद वो करण सें माफ़ी मांग सकेगी।
मगर वो जानती थि कि उसकासफर अभि समाप्त नहि हुआ थां। उसे अपने बेटे कों खोने केँ बाद स्वयं कों पाना थां।
एरा अपनेकिए फैसलों पऱ पछतारही थि। वोँ सोचरही थि कि केसे उसने अपनी खुशियों कों छोड़कर अपने परिवार कि इच्छाओं कों पूरा करने केँ लिएसभी कुछ दांव पऱ लगा दिया। उसने अपने पति अमर औऱ बेटेकरण कों छोड़कर, अपनी माँ-बाप केँ दबाव मे आकर, अमरीका आकर एक् नई जीवन शुरुआत कि थि। वो मानती थि कि ये निर्णय सही थां, मगरअब उसेये समझ मे आँ रहा थां कि कुछ फैसले एक् आदमी कि जीवन कों हमेशा केँ लिएबदल देते हें, औऱ उसने जौ किया, उसका खामियाजा उसेअब भुगतना पड़रहा थां।
एरा केँ दिल मे ये प्रश्न बार-बार गूंजता थां कि क्याँ उसनेसही किया थां? क्याँ अगर वो अमर औऱ करण कों छोड़कर अपने माँ-बाप कि बातों कों न् मानती तौ उसकी जीवनअलग होती? क्याँ अगर वो उनकेसंग रहती, तौ क्याँ वो आजखुश होती?
एरा केँ मन मे ये विचार घूमते रहते थें कि उसने अपने बेटेकरण कों क्यूं छोड़ा। उस टाइम, जब वो अमर औऱ अपने बेटे केँ संगखुश थि, उसे क्यूं लगा कि वो अपनी मम्मी-बाप केँ पासजा सकती थि, औऱ फिन उसकेबाद क्याँ हुआ, वो जानती थि। उसेये भि समझ मे आँ रहा थां कि उस टाइम उसके सामने कुछ औऱ हि दृश्य थें, जोँ अबउसे साफ दिखाई देरहे थें। उसकी मम्मी-बाप नें उसके सामने एक् अलग हि दुनिया कां सपनारखा थां, औऱ वो इस ख्वाब कां पीछा करतेहुए अपनीअसल जीवन औऱ असल खुशियों कों भूल गई थि।
उसेयाद थां कि जब उसनेअमर सें विवाह कि थि, तब वो बहोत खुश थि। दोनों नें अपने रिश्ते कों समझा, उसकी नींव मजबूत थि, औऱ उनकेबीच एक् प्रेम थां, जौ बहोत गहरा थां। मगरफिन उसके माँ-बाप कां दबाव बढ़ा, औऱ वो समझ नहि पाई कि वो किसे चुनें—अपनी फैमिली याँ अपने पति औऱ बेटे कों। उसके माँ-बाप नें उसेये समझाया थां कि अमरीका मे एक् नई जीवन शुरुआत करने सें वो कुछ बड़ा हासिल कर सकती हैं, मगर उसकीये सोच एक् भटकाव कि तरह साबित हुई।
आजएरा जानती थि कि उसनेसभी कुछ छोड़कर जौ फैसला लिया थां, वो गलत थां। जब वो अपनी दुनिया छोड़कर अमरीका आई, तोँ उसकादिल टूट चुका थां। वो अपनी माँ-बाप केँ संग भि खुश नहि थि, क्योंकि वो हमेशा ये महसूस करती थि कि उसने किसी कों छोड़ दिया थां। वो जानती थि कि उसने अपने बेटेकरण कों सबसे ज़्यादा दुख पहुंचाया थां, औऱ इस दर्द कों वो हमेशा महसूस करती थि।
वो सोचती थि कि क्याँ उसनेसही किया?अगर वो अमर औऱ करण कों छोड़कर अपनी मम्मी-बाप केँ पास नहि जाती, तौ क्याँ वो आजखुश रहती?अब उसकी जीवन केवल खालीपन सें भरी हुईँ थि, औऱ वो समझती थि कि इस खालीपन कों भरने कां कोई तरीका नहि हैं।
उसेयाद आया कि एक् दिन उसनेअमर सें बात कि थि, औऱ वो उसे समझाने कि कोशिश कररहा थां कि वो गलतकर रही हैं। अमर नें उससेकहा थां, "तुम्हें हमारे संग रहना चाहिए थां, एरा। तुम्हें अपने बेटे केँ संग रहना चाहिए थां। तुमने अपनी खुशियों कों छोड़ दिया हैं, औऱ मे जानता हूं कि तुम् कभी भि अपनी गलतियों कां पछतावा करोगी। "
आजएरा कों यहीबात महसूस होँ रही थि। वो जानती थि कि उसने अपने बेटेकरण कों खो दिया थां। उसनेकभी उसे स्वयं केँ पासरखा थां, औऱ आजजब वो अपने बेटे केँ बारे मे सोचती थि, तौ उसे उसकी आँखों मे वो मासूमियत औऱ प्रेम दिखता थां, जौ वो कभी छोड़ नहि पाई थि। वो अबकभी भि उसे वापस नहि पा सकती थि।
उसने अपने आप् सें कहा, "क्याँ मे कभीकरण कों फिन सें पा सकूँगी?" ये प्रश्न उसका पीछा नहि छोड़ता थां, औऱ उसने अपनेमन सें इसका जवाब भि ढूंढ लिया थां। वो जानती थि कि जोँ कुछ भि हुआ, अब वो उसेबदल नहि सकती थि, औऱ उसके फैसले नें उसे दर्द औऱ अकेलेपन केँ रास्ते पर्र चला दिया थां।
एरा कि आँखों मे आँसू थें, औऱ उसने अपने हाथों सें उन आँसुओं कों पोंछा। वो जानती थि कि उसने जौ किया, वो अबउसे कभी वापस नहि पा सकती थि। मगरफिन भि, उसकेमन मे उम्मीद थि कि कभी नं कभी वो अपने बेटे औऱ पति कों ढूंढ पाएगी। एरा कां दिलअब भि वही चाहता थां, जोँ उसनेखो दिया थां—अपना परिवार।
वो महसूस करती थि कि शायदअब वो अपने फैसलों कों सुधार नहि सकती, मगर वो चाहती थि कि किसीतरह उसे औऱ अमर कों फिन सें मिलाया जाए। उसकी आत्मा, उसकी अंतरात्मा मे ये विचार थां कि क्याँ वो कभी अपने परिवार कों सही तरीके सें वापसपा सकती हैं?
एरा अपने अतीत केँ हर एक् लम्हा कों याद करती थि, औऱ जैसे-जैसे टाइम बीतता गय़ा, उसकी सज़ा औऱ बढ़ती गई। वो स्वयं सें प्रश्न करती थि, "क्याँ मैंने सही किया थां? क्याँ सच मे मुझे अपने बेटे औऱ पति कों छोड़कर अपनी माँ-बाप केँ संग जानां चाहिए थां?"
उसनेकई सालों तक इस प्रश्न सें लड़ाई कि थि, मगरअब भि उसे इसका जवाब नहि मिलसका थां। उसदिन केँ बाद, जब उसनेअमर औऱ करण कों छोड़ा थां, उसकी जीवनबस एक् खामोशी औऱ पछतावे मे बदल गई थि। अब वो हररात अपने बेटे केँ बारे मे सोचती थि, औऱ वो सोचने लगी थि कि क्याँ उसकी गलती कि वजह सें करण कि ज़िंदगी भि नष्ट हौ गई थि।
कभी-कभी, उसेऐसा लगता थां कि वो अमर औऱ करण केँ बिनाजी नहि सकती थि। मगरफिन उसकेमन मे एक् औऱ प्रश्न उठता थां, क्याँ वो सहीकर रही थि? क्याँ वो इस दर्द कों सहन करने केँ लिए सजधजकर थि?
एरा नें अपने बेटेकरण कों ढूंढने केँ लिए बहोत मेहनत कि थि। उसनेकई जांच एजेंसियों सें संपर्क किया थां, औऱ उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी कां हिसाब देने केँ लिए सजधजकर थि। वो जानती थि कि उसे अपने बेटे कों वापस पाना थां, औऱ इसकेलिए वो कोई भि मार्ग अपनाने केँ लिए सजधजकर थि।
आरामसे, उसनेकुछ ऐसे डिटेक्टिव्स कों हायर किया, जौ इसकाम मे माहिर थें। उसे उम्मीद थि कि वेउसे करण तक पहुँचाने मे सहायता करेंगे। डिटेक्टिव्स नें कड़ी मेहनत कि, औऱ कुछ महीनों बाद, उन्होंने एरा कों एक् ख़बर दि, जोँ उसकेदिल कों तोड़ने वाली थि।
"मैम, " एक् डिटेक्टिव नें उसे बताया, "हमनेकुछ जानकारियाँ हासिल कि हें। आपके बेटेकरण केँ बारे मे पताचला हैं। जब आप् अमेरिका गईंथीं, उसकेकुछ वक़्त बादअमर नें ग़म मे अपनीजान दे दि थि। औऱ उसकेबाद, करण कों उसकी दादीमा नें अपनेसंग लेँ लिया औऱ एक् छोटे सें गाँव मे रहनेलगे। "
येखबर सुनते हि एरा केँ पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकादिल बुरीतरह सें टूट गय़ा, औऱ उसके अंदर कि सारी उम्मीदें चूर-चूर हौ गईं। वो बस एक् हि बात बार-बार सोचने लगी थि, "क्यूं? क्यूं ऐसाहुआ? क्याँ मैंने गलत किया?"
"मुझे क्षमा करदो, करण, " उसने अपने बेटे केँ बारे मे सोचते हुए धीमे सें कहा, "मुझे क्षमा करदो, कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया। मुझेपता थां कि तुम् अकेले हौ गए थें, औऱ फिन भि मे तुम्हारे पास नहि आँ सकी। "
एरा कों अब महसूस होँ रहा थां कि उसने जोँ किया, उसका खामियाजा उसे हमेशा भुगतना होगा। वो जितना भि आगे बढ़ने कि कोशिश करती थि, कुछ न् कुछउसे हमेशा उस अतीत कि ओर खींच लें आता थां।
"क्याँ तुम् मुझेमाफ करोगे, करण?"एरा नें अपनेदिल सें ये प्रश्न किया। "क्याँ तुम् मुझेफिन सें अपनेपास आने दोगे? क्याँ तुम् मुझेफिन सें अपनी मां केँ रूप मे स्वीकार करोगे?"
वो बुरीतरह सें रोरही थि। उसकी आँखों मे वो हीन भावना औऱ पछतावा थां, जिसे शब्दों मे बयान करना मुश्किल थां। वो जानती थि कि अबकरण कां वापस लौटना संभव नहि थां। वो जानती थि कि उसने अपने बेटे कों हमेशा केँ लिएखो दिया थां।
अबएरा कों येसमझ मे आँ गय़ा थां कि उसने अपनी जीवन केँ सबसे बड़े फैसले कों कितना गलत लिया थां। वो सोचती थि, "क्याँ मे अब भि अपने बेटे केँ पासजा सकती हूं? क्याँ मेरेपास उसे वापस पाने कां कोई मार्ग हैं?"
फिन भि, एरा कि उम्मीदें औऱ उसकी आत्मा नें उसेकभी हार मानने कि अनुमति नहि दि। वो जानती थि कि एक् दिन वो अपने बेटे कों ढूंढ निकालेगी। वो जानती थि कि वो अपने बेटे सें मिलकर उसे वोँ सारी चीज़ें दे सकती थि, जौ उसनेउसे नहि दि थीं।
एरा अपने आप् सें कहती थि, "मे कभीहार नहि मानूंगी। मुझेबस अपने बेटे कों वापस पाना हैं। "
मगरफिन उसेयाद आया कि वो कितना भि कोशिश करे, वो कभी अपनी गलतियों कों नहि बदल सकती थि। उसे महसूस हुआ कि जोँ कुछ भि हौ चुका हैं, वो अबकभी भि वापस नहि आएगा। औऱ यही सोचते हुए, एरा केँ दिल मे एक् गहरी उदासी भर गई थि।
उसने अपने आप् सें ये वादा किया, "मे अब अपनी गलती कां अहसास कररही हूं। मुझेपता हैं कि मैंने क्याँ खो दिया हैं, औऱ अब मुझेइसे ठीक करना हैं। "
एरा कों अबये भि समझ मे आँ गय़ा थां कि वो जब तक अपने बेटे सें नहि मिलेगी, तब तक वो चैन सें नहि जी सकती थि। वो मात्र एक् हि चीज़ चाहती थि—अपने बेटे कां चेहरा देख्ना। उसेबस यही लगता थां कि अगर वो करण कों फिन सें देख पाएगी, तौ शायद वो अपने दर्द औऱ पछतावे कों थोडा कम महसूस कर पाएगी।
उसने अपने अंदर एक् नई ताकतपाई थि। अब वो जानती थि कि वो अपने बेटे कों ढूंढेगी, चाहे जोँ भि हौ। औऱ इसबार, वो उसेकभी नहि खोने देगी।
रात कां वक्त थां। एरा अपने माँ-बाप, भइया, भाभी औऱ उनके बच्चों केँ संग डाइनिंग टेबल पऱ बैठी हुईँ थि। मेज पऱ मज़ेदार पकवानों कि भरमार थि, पर्र उसरात कां माहौल खाने सें अधिक भावनाओं सें भराहुआ थां। एरा नें अपनी प्लेट मे खानां तोँ परोसा थां, मगर उसका ध्यान कहीं औऱ थां। उसकेमन मे सिर्फ़ एक् हि बातघूम रही थि—करन।
विक्रम (एरा केँ पिता):
"तोँ। एरा, " उन्होंने एक् लंबी सांस लेतेहुए बात शुरुआत कि, "हमनेतय कर लिया हैं कि अगले हफ्ते भारत जाएंगे। "
टेबल पर्र अचानक शांति छा गई। हरकोई उनके शब्दों कों समझने कि कोशिश कररहा थां। एरा नें धीरे-धीरे सें अपनासिर उठाया औऱ अपने पिता कि ओर देखा।
एरा (चौंकते हुए):
"क्याँ। क्याँ कहा आपने? हम् भारतजा रहे हें?"
विक्रम नें सिर हिलाकर हामीभरी।
विक्रम:
"हां। करन कों ढूंढने केँ लिए। "
ये सुनते हि एरा कि आंखों मे आंसूछलक पड़े। वो इतनी भावुक होँ गई कि बोल भि नहि पारही थि। उसकेदिल मे करन कि यादें हिलोरें मारने लगीं।
संध्या (एरा कि मम्मी):
"हम् सभी तुम्हारे संग हें, बेटा। अब औऱ विलंब नहि करेंगे। करन कों वापस लाना हि होगा। "
एरा कि आंखें भरआईं। उसने अपनी माँ केँ हाथथाम लिए।
एरा (आवाज़ भर्राई हुइ):
"माँ, मैंने करन कों बहोत दर्द दिया हैं। क्याँ वोँ मुझेकभी माफ करेगा?"
संध्या:
"समयहर जख्म कों भर देता हैं, बेटी। पऱ तुम्हें अपनादिल मज़बूत रखना होगा। करन तुम्हारा खून हैं। वोँ तुम्हें अवश्य माफ करेगा। "
इस बातचीत केँ बीचएरा कां भइया, अभिषेक, जोँ आमतौर पऱ हंसी-मज़ाक मे माहिर थां, गंभीर होँ गय़ा।
अभिषेक:
"दिदी, तुमने जौ किया वोँ आसान नहि थां, मगरअब पीछे मुड़ने कां टाइम नहि हैं। करन कों ढूंढकर हि सुकून मिलेगा। "
अंजलि (अभिषेक कि पत्नि):
"औऱ हम् सभी तुम्हारे संग हें। "
एरा नें सबकीओर देखा। वो भावनाओं केँ जाल मे फंसी हुईँ थि। इतने सालों सें जौ बोझ उसकेदिल पऱ थां, वो अब आहिस्ता हल्का महसूस कररही थि।
एरा:
"बापू, क्याँ आपने सारी तैयारी करली हैं?"
विक्रम:
"हां, टिकट्स औऱ रहने कां इंतज़ाम होँ गय़ा हैं। हमने डिटेक्टिव्स कों भि निर्देश देदिए हें। हमेंबस करन केँ देहात जानां हैं। "
अभिषेक (हल्की मुस्कान केँ संग):
"औऱ हां, तुम् टेंशन मत लेना। हम् वहां घूमने भि जाएंगे। "
इस पऱ सबहंस पड़े, माहौल थोडा हल्का होँ गय़ा।
एरा (थोड़ी मुस्कुराते हुए):
"अभि, तुम् हमेशा मेरी टेंशन कमकर देते होँ। "
अभिषेक:
"क्याँ करूं, दिदी? तुम्हें हंसाना मेरी ड्यूटी हैं। "
रात केँ खाने केँ बाद भि एरा कां दिलकरन कि यादों मे डूबाहुआ थां। उसने अपने पिता केँ फैसले कों दिल सें स्वीकार कर लिया थां।
एरा (अपने आप् सें):
"करन, मे आँ रही हूं। इसबार तुम्हें अपनी मम्मी कां प्रतीक्षा नहि करना पड़ेगा। "
उसकी आंखों मे दृढ़ निश्चय कि चमक थि।
करण कां परिचय
करण, एरा कां बेटा, जौ कि अबकई सालों सें अपनी दादीमा केँ संग गाँव मे रहता हैं, अपनी ज़िन्दगी मे एक् अजनबी सां मोड़ लेकरआगे बढ़रहा थां। बचपन कि वोँ हंसी-खुशी, प्रेम औऱ ममता, जोँ उसे अपनी माँ औऱ पिता सें मिली थि, अब उसकी यादों मे धुंधली होँ गई थि। वो एक् इंट्रोवर्ट औऱ सख्तदिल कां लड़काबन चुका थां। उसके जिंदगी कां मुख्य उद्देश्य मात्र अपनी दादीमा कां संग देना औऱ अपनी छोटी सि दुकान चलाना थां।
वो गाँव केँ चौराहे पऱ एक् छोटी सि मैकेनिक कि दुकान चलाता थां। वहालोग अपनी बाइक औऱ व्हीकल कि मरम्मत केँ लिएआते थें, औऱ करण कों देखकर लगता थां जैसे वोँ किसी फिल्म कां हीरो हौ। उसकी चौड़ी कांधें, मजबूत हाइट, औऱ घुंघराले बाल उसकीअलग पहचान बनाते थें। उसकी आँखें, जोँ हमेशा शांत औऱ गंभीर रहतीथीं, कभी भि किसी सें मिलकर हंसती नहि थीं।
करण कां रूप औऱ व्यक्तित्व
करण कां चेहरा किसी आदर्श युवक जैसा थां, कालेबाल घुंघराले, जोँ उसके माथे पऱ हमेशा गिरे रहते थें। उसकी आँखों मे गहरी नीलीचमक थि, जैसे सागर कि लहरें हौ। उसकी मजबूत हाइट-काठी औऱ चौड़े कंधेउसे औऱ भि आकर्षक बनाते थें। जब वो गाँव कि गलियों सें गुजरता, तौ लोगउसे दूर सें पहचान लेते थें। उसकी आँखों मे एक् गहरीचुप सि थि, एक् ऐसाग़म जोँ उसनेकभी किसी सें साझा नहि किया थां।
उसकी जिस्म कि ताकत कों देखकर लगता थां कि वो किसी भि कठिनाई कां सामना कर सकता हैं, मगर उसकी व्यक्तित्व मे एक् ठंडी शांति थि। वो दूसरों सें मेल-मिलाप करने मे बहोत हि कम रुचि दिखाता थां। उसकी दुकान पऱ आकरलोग काम करवाते, मगरकरण हमेशा बिना किसी सें ज़्यादा बातकिए बस अपनेकाम मे व्यस्त रहता थां। उसकी स्थिति यही थि कि वो अधिक किसी सें घुलता-मिलता नहि थां, औऱ न् हि कोईउसे जान पाता थां।
करण कां जिंदगी औऱ उसकी दादीमा
करण कां जिंदगी, अपनी दादीमा केँ संग बिताने मे गुजररहा थां। उसकी दादीमा, जौ बहोत हि सख्त औऱ समझदार स्त्री थि, नें उसे अपना जिंदगी सिखाया थां। वो जब भि किसी केँ पास सें गुजरता, उसकी आँखों मे एक् शांति कां सां अहसास होता थां, जैसे वो दुनिया सें कटकरबस अपनी दादीमा केँ पास हि जीता थां।
गाँव केँ लोगकरण कों जानते थें, मगरकोई उसे लगभग सें जानने कि कोशिश नहि करता थां। वो हमेशा अकेला हि रहता थां, अपनेकाम मे व्यस्त औऱ अपने दादीमा केँ संग। उसकी दादीमा नें उसेइस काबिल बनाया थां कि वो स्वयं कि सहायता करसके, मगरकरण कां दिलअब भि उसके माँ-बाप कि यादों सें भरा थां। उसेये समझने मे टाइमलगा थां कि उसकी माँ नें उसे छोड़ दिया, औऱ वो कभी भि अपने पिता केँ पास वापस नहि जाएगा।
करण कां ठंडा औऱ चुप्पा व्यक्तित्व
उसके अंदर एक् ठंडी खामोशी थि, जोँ उसे औरों सें अलग करती थि। वो ज़्यादा बातें नहि करता थां, बसवही करता थां जौ उसे करना थां। उसका चुप्पापन उसके व्यक्तित्व कां हिस्सा बन चुका थां। गाँव केँ लोग कहते थें कि करणकभी किसी सें बात नहि करता, मगर जब भि वो अपनेकाम मे व्यस्त होता, उसकी आँखों मे एक् अलग हि चमक होती।
करण कि दुनिया अबबस उसकी दुकान औऱ दादीमा तक सीमित थि। एक् दिन, जब वो अपनी दुकान पऱ बैठा थां औऱ किसी ग्राहक कि कार कि मरम्मत कररहा थां, तभी एक् बच्चा आया औऱ उसने पूछा,
बच्चा: "भैया, आप् इतने अच्छे क्यूं हौ?"
करण नें सिर उठाया, मगरकुछ नहि बोला। उसनेबस हल्की सि मुस्कान केँ संगकाम करना जारीरखा।
इस छोटी सि घटना नें उसकेचुप रहने केँ कारणों कों औऱ भि गहराकर दिया थां। करण कां दिल बहोत बड़ा थां, मगर वो उसे किसी सें साझा नहि करना चाहता थां। वो अपने अंदर केँ जख्मों कों दबाएहुए थां, औऱ शायदयही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भि थि।
हालाँकि, वो अपने जिंदगी मे खुश थां, मगर उसकी यादों मे एक् खालीपन थां, जोँ कभी पूरा नहि होँ सका। वो नहि जानता थां कि उसकी माँ एराकभी उसे ढूंढने आई थि। एरा नें कभी उससे मिलने कि कोशिश नहि कि, औऱ अब वो यही सोचता थां कि शायद वो कभी अपनी माँ सें मिल भि नहि पाएगा। उसकी दुनिया मे मात्र उसकी दादीमा थि, औऱ वो बस अपनी दिनचर्या मे खोया रहता थां।
मगर एक् दिन, उसके जिंदगी मे बदलाव आँ सकता थां, जब उसकी मम्मी एरा, भारत लौटने कां निश्चय करेगी।
गाँव मे रहतेहुए, करण कि दुकान केँ आसपास कुछखास लड़कियाँ थीं, जिनकी आँखों मे हमेशा एक् अलग सां आकर्षण औऱ आँख मिचौली करने कां अंदाज़ थां। वे गाँव केँ चौराहे पऱ आतीं औऱ एक्-दूसरे सें बातें करतीं, कभी हँसते हुए, कभी शरारत सें। उनकेबीच करण कां नाम हमेशा हि चर्चा कां विषय रहता थां। कोई भि लड़कीजब भि अपनी सहेलियों केँ संगवहा सें गुजरती, तोँ उसकी नज़रें स्वाभाविक रूप सें करण पऱ हि होतीं।
ख्वाब, शरारतें औऱ छोटी-छोटी चहक—इन सबमें करण कि छवि कहीं नं कहीं सबसे पहले आँ जाती थि। उसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखें औऱ घुंघराले बाल जैसेउन लड़कियों केँ दिलों मे हलचल पैदाकर देते थें। वे हमेशा सें हि करण केँ इर्द-गिर्द अपना ध्यान बनाए रखतीं। कभी कभार, वे दुकान केँ पास सें गुज़रते हुए जान-बूझकर आवाज़ मे कुछकह देतीं, ताकिकरण उनकीतरफ देखे। उनकादिल उसी लम्हा धड़क उठता थां, जैसे हि करण कि आँखें उन पर्र पड़ती थीं।
"किसीदिन तौ करण भैया कों देख्ना हैं नाँ!"
"तुम्हें क्याँ लगता हैं, आज वो फिन हमें देखेगा?"
"मुझे तोँ लगता हैं कि वोँ जानबूझकर ध्यान नहि देता। "
ऐसी हि चहकती आवाज़ें दिनभर गाँव केँ चौराहे केँ आस-पास गूंजती रहतीं। लड़कियाँ हमेशा एक्-दूसरे सें करण केँ बारे मे बात करतीं, उसकी हाइट-काठी, उसकी आँखों कि चमक, उसकी मुस्कान—सब कुछ उन्हे खास हि लगता थां। कभीकभी, एक् लड़की किसीतरह कि टिपण्णी करती,
"देखो, इस बार तौ करण नें हमें ध्यान सें देखा, लगता हैं वोँ मुझसे कुछ कहने वाला हैं। "
औऱ फिन उसकी सहेलियाँ मजाक मे कह देतीं, "पागल! वोँ कभी किसी सें बात नहि करता, छोड़ो! स्वयं कों धोखादे रही होँ। "
मगरफिन भि वो लड़की अपनीबात पऱ अड़ी रहती।
"क्याँ तुमने देखा, उसकी आँखें कितनी गहरी हें, जैसे उसमें दुनिया कि सारी कहानियाँ समाई हुइ हों। "
ऐसे हि छोटे-छोटे वार्तालापों मे करण कां नाम हमेशा आता रहता। लड़कियाँ उसे लेकर चहकतीं, कभी बग़ैर उसकीतरफ देखे, कभी बिना किसी उद्देश्य केँ दुकान केँ पास सें गुजरतीं। उनका उद्देश्य मात्र करण कि आँखों कां सामना करना थां।
एक् दिन कि बात हैं, जब गाँव मे मेलालगा थां। सब लड़कियाँ जश्न मे शामिल होने केँ लिए सजधजकर हौ रहीथीं। कुछ लड़कियाँ गाने कि तैयारी कररही थीं, कुछ सज-धजकर मेला देखने जारही थीं, औऱ कुछ नें तौ करण कों देखने केँ लिएखास कोशिश कि थि। वे जानती थीं कि करणउस दिन भि अपनी दुकान पर्र बैठा होगा। उनकामन चाहता थां कि करण केँ पास जाकरकुछ बातें करें।
"चलो, आज मे जाकरकरण सें बात करती हूं!" एक् लड़की नें साहस जुटाते हुएकहा।
"क्याँ तुम् पागल हौ? वोँ तोँ हमारी तरफ देखता भि नहि। " दूसरी लड़की नें चुटकी ली।
"नहि, देख्ना! आज तौ मे उसे अवश्य पकड़ लूंगी!"
आखिरकार, लड़की नें अपनी सहेलियों कि बातों कों नजरअंदाज करतेहुए दुकान कि तरफकदम बढ़ाया। उसकेसंग उसकी दूसरी सहेली भि चल पड़ी, औऱ दोनों करण कि दुकान केँ पास पहुँच गईं। करण उस टाइम अपनी दुकान पर्र हि खड़ा थां, किसी बाइक केँ इंजन कों ठीककर रहा थां। लड़कियाँ दूर सें उसेदेख रहीथीं, मगर उनमें सें एक् लड़की नें हिम्मत जुटाते हुएपास जाकरकरण सें कहा,
"क्याँ आप् मेरी बाइकठीक कर सकते हें?"
करण नें उसे देखा, फिन बिनाकुछ कहे, सिर झुकाकर बाइक कों देखा। लड़कियों कि दिल कि धड़कन बढ़ गई थि, क्योंकि उन्हें लगरहा थां कि अबकरण उनसेकुछ बात करेगा। मगरकरण नें अपनी आँखों कों नीचे किया औऱ काम पऱ ध्यान केंद्रित किया।
"इसकी चाबीदो। मे देखता हूं। " करण कि आवाज़ मे वही ठंडक थि, जौ हमेशा रहती थि।
लड़कियाँ थोड़ी मायूस हौ गईं, मगर फिन भि उनकेदिल मे ख़ुशी थि, क्योंकि करण नें कम सें कम उनसेबात कि। वे अपनी चहकते हुए एक्-दूसरे सें बातें करने लगीं,
"देखा!करण भइया नें हमसेबात कि! अब देखो, अगलेदिन सें हम् औऱ भि आसानी सें मिल पाएंगे!"
"तुम् सहीकह रही होँ, आज तौ वो बहोत शांतलग रहा थां। शायद हमेंफिन सें कोशिश करनी चाहिए। "
वहा पऱ थोड़ी देर औऱ खड़ी रहने केँ बाद, लड़कियाँ मुस्कुराती हुईँ चलीगईं, मगर उनकेमन मे करण केँ प्रति एक् अजीब सि दीवानगी थि। वेसभी एक्-दूसरे सें कहरही थीं,
"अगर कभी वोँ हमारी तरफ ध्यान दे, तौ हम् उसे क्याँ कहेंगे?"
"मे तोँ बसयह कहना चाहूंगी, 'ओह!करण भइया!' औऱ फिन देखते हें क्याँ होता
हैं। "
"मुझे लगता हैं, करण कों हमारी तरह सें भि कुछसमझ मे आता हैं। हम् फिन सें कोशिश करेंगे। "
गाँव मे करण कों लेकरयह चहक हमेशा बनी रहती थि।
गाँव मे एक् मेलालग रहा थां, औऱ लोग दूर-दूर सें इस मेले कां हिस्सा बनने केँ लिए आँ रहे थें। वहाहर तरफ रौनक थि – रंग-बिरंगे झूले, स्टॉल्स, हंसी-खुशियाँ, औऱ बच्चे खुशियों सें झूमरहे थें। मगरकरण केँ लिएये सभीकुछ भि मायने नहि रखता थां। वो अपनेदो दोस्तों केँ संग मेले मे आया थां, मगर उसका ध्यान किसी औऱ चीज़ पऱ थां। उसकी दादीमा नें उसे जबर्दस्ती मेले मे लें जाने कि जिद कि थि, औऱ अब वो वहा खड़ा थां, अपने दोस्तों केँ संग, जहाँ लड़कियाँ लगातार उसकीतरफ देखरही थीं औऱ कुछ नं कुछ बोलने कि कोशिश कररही थीं।
लड़कियाँ उसे देखतीं औऱ उसकीओर आकर्षित होतीं, मगरकरण कि आँखों मे एक् गहरी उदासी थि। वो जानता थां कि वो इन चीज़ों सें दूर रहकर अपनी दुनिया मे शांत रहना चाहता थां। वो जानता थां कि लड़कियाँ उसे आकर्षक समझती थीं, मगर वो कभी किसी केँ संग अपनेदिल कि बात नहि करना चाहता थां। उसकी खामोशी मे गहरेराज छुपे थें, जोँ उसनेकभी किसी कों नहि बताए थें।
करण औऱ उसके साथी
करण केँ संगदो औऱ यार थें – अली औऱ मोहन। अली थोडा चुलबुला थां, औऱ हमेशा किसी नं किसी लड़की केँ संग बातें करने कि कोशिश करता थां। वहीं मोहन शांत औऱ विचारशील थां, ठीककरण जैसा, मगर वो थोड़ी ज़्यादा हिम्मत दिखाता थां। तीनों मित्र एक् संग खड़े थें, मगरकरण कां मन कहीं औऱ थां।
अली नें देखा कि करण किसी लड़की सें बात करने कि बजाय, अपने दोस्तों सें बातचीत मे ज़्यादा ध्यान देरहा थां, तौ उसने मजाक किया,
"करण, दोस्त, तुँ तोँ जैसे लड़की केँ नाम सें डरता हैं, लड़कियाँ तेरेपास आकर लाइन मारती हें, औऱ तूँ उनसेदूर भागता हैं। " अली नें उसे चिढ़ाते हुएकहा।
करण नें सिर झुका लिया औऱ बस हल्का सां मुस्कुराया। वो जानता थां कि अली मजाककर रहा हैं, मगर वो इसतरह कि बातें कभी नहि समझ पाता थां। मोहन नें बीच मे आतेहुए कहा,
"तुम् दोनों हि लड़की केँ बारे मे कुछ नहि समझते। "
अली औऱ करण दोनों हि मोहन कि तरफ देखने लगे। मोहन थोडा गंभीर हौ गय़ा औऱ बोला,
"लड़कियाँ कोई खिलौना नहि होतीं, जिन्हें हम् अपनी खुशी केँ लिए इस्तेमाल करें। वे हमारी ज़िन्दगी कां हिस्सा होँ सकती हें, मगरये सभी मात्र तभीसही होता हैं, जब हम् किसी कों सच मे प्रेम करते हें। "
अली थोडा चौंकते हुए बोला,
"क्याँ बातकर रहे होँ तुम्? तुम् तोँ हमेशा कहते होँ कि लड़की केँ संग वक्तपास करो, जब तक मस्ती करसको। अब क्याँ हौ गय़ा?"
मोहन नें गहरी साँसली औऱ जवाब दिया,
"देखो, अली, मे तुमसे अधिक बड़ा नहि हूं, मगर मेरीसोच मे एक् फर्क हैं। प्रेम केवल एक् आकर्षण नहि होता। ये एक् गहरी भावना हैं, जोँ कभी भि किसी केँ संगगलत नहि होनी चाहिए। जब तुम् किसी कों दिल सें चाहो, तौ तुम्हें मात्र उसे हि चाहना चाहिए, नं कि अपने फायदे केँ लिए। "
करण, जौ अब तक खामोश थां, अपने दोस्तों कि बातों कों सुनते हुए धीरे-धीरे सें बोला,
"तुम् दोनों कुछ भि समझ नहि पारहे हौ। लड़कियाँ अपनी चाहत नहि दिखातीं, वे जौ महसूस करती हें, वही कहती हें। मगर प्रेम मात्र कहने कि बात नहि हैं। येतब होता हैं, जब हम् किसी केँ संग अपने दर्द औऱ खुशी कों साझा करने केँ लिए सजधजकर होते हें। मे जानता हूं कि इससमय लड़कियाँ मेरेपास आकरबात करती हें, मगर क्याँ फर्क पड़ता हैं? क्याँ मेरी चुप्पी सें किसी कां दिल टूटता हैं?"
अली औऱ मोहन दोनों चुप हौ गए। वेसमझ गए कि करण कि खामोशी मे कुछ गहरी बातें थीं, जौ उसने अभि तक किसी सें नहि साझा कि थीं। अली नें सिर झुका लिया औऱ धीरे-धीरे सें कहा,
"मुझे तोँ ऐसा लगता हैं कि तुम् बस डरते हौ, करण। डरते हौ यह सोचने सें कि अगर तुम् किसी सें अपनेदिल कि बात करोगे, तौ वो तुम्हारे जैसा नहि होगा। "
करण कि आँखों मे गहरी उदासी छा गई। वो जानता थां कि उसके दोस्तों कों वो महसूस नहि करवा सकता थां, जौ वो महसूस कररहा थां। वो जानता थां कि उसकी खामोशी एक् रक्षा कवच हैं, जौ उसे अपनी भावनाओं सें दूर रखता हैं।
"यहसभी बातें आसान नहि हें, अली। "करण नें कहा, "तुम् नहि समझ पाओगे। जब तुम् किसी सें प्रेम करते हौ, तौ वो प्रेम तुम्हें पूरेदिल सें चाहिए होता हैं। औऱ जब तुम्हारे पास वो नहि होता, तोँ तुम् बस खामोशी मे डूब जाते हौ, जैसे मे डूबता हूं। ये केवल एक् भावना नहि होती, ये एक् असलियत होती हैं, जौ हमेंचुप रहने पऱ मजबूर करती हैं। "
मोहन नें सिर झुका लिया औऱ कहा,
"तुम् सहीकह रहे होँ, करण। प्रेम केवलदिल सें नहि, बल्कि समझ सें भि होता हैं। जब तक तुम् किसी कों समझने कि कोशिश नहि करोगे, तब तक तुम् कभी भि पूरीतरह सें उस आदमी सें प्रेम नहि कर पाओगे। "
अलीचुप होँ गय़ा औऱ अपनीसोच मे खो गय़ा। वो जानता थां कि करण कि चुप्पी मे बहोत कुछ छिपा थां, जौ उसनेकभी स्वयं महसूस नहि किया थां।
अचानक, मेले मे कुछ हंसी कि आवाज़ें आईं। लड़कियाँ फिन सें करण केँ पासआईं, मगरइस बार वो बिना किसी झिझक केँ अपनी बातचीत मे शामिल होने कां इरादा रखतेहुए, उसे चिढ़ाने लगीं।
"देखो, करण! तुम् तौ हमेशा खामोश रहते हौ, क्याँ तुम्हारा दिल नहि चाहता कि तुम् हमसेबात करो?" एक् लड़की नें चिढ़ाते हुए पूछा।
करण नें सिर झुका लिया, फिन एक् हल्की मुस्कान केँ संगकहा,
"आप् लोग अच्छे हें, मगर मुझे लगता हैं कि मेरी दुनिया मे औऱ भि बहोत कुछ हैं, जोँ मुझे समझने कि जरूरत हैं। "
ये सुनकर लड़कियाँ थोड़ी चौंकीं, मगरफिन भि वेउसी तरह सें उसके आस-पास घूमने लगीं। करण अब भि अपनी दुनिया मे खोयाहुआ थां, जोँ कभी भि किसी केँ लिए नहि खुलती थि।
बातचीत ख़त्म हुईँ, औऱ तीनों मित्र फिन सें अपने रास्ते पऱ बढ़गए। करण जानता थां कि इस सबकाकोई मतलब नहि थां, क्योंकि उसकेलिए प्रेम औऱ रिश्ते हमेशा कुछ गहरे थें, जौ उसनेकभी किसी सें नहि कहा थां।
अंत मे, करण कि खामोशी हि उसकी ताकत थि, औऱ लड़कियाँ चाहे कितनी भि कोशिश कर लें, वो हमेशा अपनी दुनिया मे हि रहकर अपनेदिल कि बातों कों सितारों केँ बीचखो देता थां।
Karan मेले सें सीधा अपने पिताजी कि कब्र पर्र गय़ा। रात कां वक्त थां, आसमान मे घने बादल थें, औऱ हवा मे ठंडकबढ़ रही थि। चाँद कि रोशनी भि दब सि गई थि, औऱ आसपास कां वातावरण शांति मे डूबाहुआ थां। सिर्फ दूर कहींकुछ आवाज़ें आँ रहीथीं, मगरयहा सभीकुछ शांत थां, जैसे दुनिया केँ बाकी हिस्से सें ये स्थान एकदमअलग हौ।
क़ब्र केँ पास पहुँचते हि, Karan नें अपनी आँखें बंद कि औऱ गहरी सांसली। उस क़ब्र केँ पास उसकी पूरी ज़िंदगी कि अनकही बातें, वो सारी यादें थीं जोँ उसनेकभी किसी सें नहि बाँटी थीं। क़ब्र केँ सामने खड़े होकर, Karan नें धीरे-धीरे सें अपनासिर झुका लिया औऱ बोला,
“बापू, तुमसे कुछ बातें करनी हें। बहोत दिन होँ गए, तुमसे कुछ भि कहे बिना। आज बहोत वक़्त बाद लगता हैं कि शायद तुम् मुझेसुन सकोगे। “
Karan केँ चेहरे पर्र एक् गहरी उदासी थि, आँखों मे कुछ बुझी सि लाली थि। उसकेलिए ये एक् सामान्य दिन नहि थां, बल्कि वो अपने पिता केँ सामने खड़ा होकरउन सवालों कां जवाब ढूंढरहा थां, जौ उसनेकभी स्वयं सें पूछे थें।
“पिताजी, तुम् मुझे छोड़कर चलेगए, औऱ मे अकेला रह गय़ा। मुझेकभी समझ नहि आया कि तुमने मुझे क्यूं छोड़ दिया। क्याँ तुम्हें कभी मेरा ध्यान नहि आया? क्याँ तुमने कभी सोचा कि मेरे बिना तुम्हारे बिना मे क्याँ करूँगा?”
Karan कि आवाज़ मे दर्द औऱ क्रोध थां, मगर उसकादिल टूटकर भि शांत थां। वो अपनी सारी बातें अब अपने पिताजी सें कहरहा थां, जैसेये एक् अंतिम मौका थां।
“तुम्हें याद हैं, पिताजी, जब मे छोटा थां, तब हम् दोनों कितने खुश रहते थें। तुम्हारी बाहों मे छिपकर मे दुनिया सें लड़ने कां साहस पाता थां। मगरजब तुम् मुझे छोड़गए, तोँ सभीकुछ बदल गय़ा। मे अकेला होँ गय़ा। क्याँ तुम् नहि जानते थें कि मे तुम्हारे बिनाटूट गय़ा थां? क्याँ तुम् नहि जानते थें कि मुझेकिस हद तक तुम्हारी ज़रूरत थि? कभी सोचो, बापू, मे तोँ तुम्हारे बिनाजी हि नहि सका। ”
Karan नें एक् गहरी सांसली, औऱ फिन आँखें बंदकर लीं। उसे जैसे अपने पिताजी केँ संग बिताए गए टाइम कि यादें फिन सें ताज़ा होँ रहीथीं। उसनेसिर झुका लिया, औऱ धीरे-धीरे सें बोला,
“मैंने कभी भि किसी सें अपनेदिल कि बात नहि कि। सभी मुझसे डरते थें, सभी मुझसे दूर रहते थें। क्याँ तुम् नहि जानते थें, बापू, मुझे प्रेम कि दरकार थि, मगर मुझेकभी किसी सें सच्चा प्रेम नहि मिला। मेरेदिल मे हमेशा एक् कमी सि थि, औऱ अब तक वोँ कमी पूरी नहि हुइ। तुम् हि तौ थें, जिनसे मे प्रेम करना चाहता थां, मगर तुम् मुझे छोड़कर चलेगए, औऱ मे अकेला रह गय़ा। ”
क़ब्र केँ पास खड़े होकर Karan नें कई बातें कि, कुछ अपनेमन कि, कुछउन सवालों कि जोँ वो कभी स्वयं सें नहि पूछ सकता थां। उसनेकहा,
“क्याँ तुम् जानते हौ पिताजी, कि मे आज भि तुमसे बहोत प्रेम करता हूं। तुमसे दूर जाने केँ बाद, मेरी ज़िंदगी कि दिशा हि बदल गई। मुझेआज भि लगता हैं कि अगर तुम् होते, तोँ मेरी ज़िंदगी मे वोँ सभी होता जोँ मे आज तक चाहरहा थां। क्याँ तुमने कभी सोचा कि अगर तुम् मुझे छोड़कर चलेगए, तोँ मेरेसंग क्याँ हुआ होगा?”
Karan कि आवाज़ मे गहरी उदासी थि, जैसे वो किसी गहरे अंधकार मे खो गय़ा होँ। वो अपनी भावनाओं कों शब्दों मे ढालने कि कोशिश कररहा थां, मगर शब्द उसकेपास नहि थें। उसकेलिए शब्दों सें अधिक ज़रूरी थां अपनी आँखों सें उन दर्दभरे पलो कों महसूस करना, जौ वो बहोत पहले अपनी माँ केँ बिनाजी चुका थां।
“पिताजी, तुमने हमेशा मुझे ताकत दि थि, औऱ आज मे स्वयं कों टूटता हुआ महसूस कररहा हूं। मुझेअब येसमझ मे आँ गय़ा हैं कि तुम्हारी मुझसे दूर जाने केँ बाद, मुझे वो ताकत स्वयं सें ढूँढनी पड़ी। तुमसे दूर जाने केँ बाद मैंने जोँ संघर्ष किए, वो कभी ख़त्म नहि हुए। तुम्हारा प्रेम औऱ आशीर्वाद मुझेकभी भि समझ मे नहि आया, औऱ अब तक मैंने किसी सें वो प्रेम नहि पाया, जौ मुझे तुमसे चाहिए थां। क्याँ तुम् नहि जानते थें कि तुम्हारे बिना मे ज़िंदगी कों सही सें समझ नहि पारहा थां?”
क़ब्र केँ पास खड़ा Karan अब रोनेलगा थां। उसकी आँखों मे आँसू थें, जौ अब तक उसने किसी सें नहि दिखाए थें। उसकी पूरी ज़िंदगी एक् प्रश्न बनकररह गई थि, औऱ वो किसी सें उन सवालों कां जवाब नहि पासका थां।
“पिताजी, तुम्हें याद हैं कि तुम् मुझे हमेशा कहते थें कि लड़ाई औऱ संघर्ष सें कभीमत भागो। आज भि मे उसी रास्ते पऱ हूं, उसी संघर्ष मे हूं। मगरआज तक मुझेये समझ मे नहि आया कि तुम् मुझे क्यूं छोड़गए। क्याँ तुमने कभी सोचा थां कि तुम्हारी अनुपस्थिति मे मे केसेजी पाऊँगा? तुमसे मिलेहुए वोँ प्रेम भरे लम्हा अब भि मेरी ज़िंदगी कां हिस्सा बन चुके हें। जब भि मे किसी मुश्किल मे फंसता हूं, तब मुझे लगता हैं कि तुम् मेरेपास होँ, मगरजब मे देखता हूं कि तुम् नहि हौ, तौ फिन सें टूट जाता हूं। तुमसे प्रेम करने कि इच्छा कभी समाप्त नहि होती, बापू। “
Karan फिन सें अपनी पूरी ताकत सें बोलने लगा,
“तुमसे मिली हुई वोँ सारी यादें, वोँ बातें, वे लम्हे, सभीकुछ मेरे भीतर हें। मुझे लगता हैं कि तुम् अभि भि कहींपास होँ, मात्र मुझे समझने केँ लिए नहि आए। काश, तुम् मुझेसमझ पाते कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत थि, पिताजी। काश तुम् मुझेकभी नं छोड़ते। ”
Karan अब धीरे धीरे खड़ा होनेलगा, औऱ उसके चेहरे पर्र एक् अजीब सि शांति थि। उसनेसिर उठाकर एक् अंतिम बार क़ब्र कों देखा औऱ फिन अपना चेहरा फिन सें झुका लिया।
“पिताजी, शायद मे अबसमझ चुका हूं कि तुम्हारी अनुपस्थिति मे मुझे स्वयं कों ढूँढना होगा। शायदयही वो मार्ग हैं, जोँ मुझे स्वयं सें औऱ तुम्हारे प्रेम सें जोड़ता हैं। शायदअब मुझेउस प्रेम कों अपने भीतर तलाशना होगा, जोँ तुमने मुझेकभी दिया थां। मे तुम्हें कभी नहि भूल सकता, औऱ शायदयही वो प्रेम हैं, जोँ मुझेआगे बढ़ने केँ लिए ताकत देता हैं। ”
क़ब्र केँ पास खड़ा Karan एक् गहरी साँस लेकर वापस मुड़ने लगा। उसकी आँखों मे अब भि आँसू थें, मगर उसकादिल थोड़ी रा
हत महसूस कररहा थां। शायदअब वो अपने बापू केँ बिना भि अपनी ज़िंदगी कों समझने मे सक्षम थां।
bhut hi mazedaar update thaa bhay . Ab dekhta h era jb India wapis aayegi or jb wo Karan ko pheli bar dekhgu toh uskah reaction kya hotha h. Idhar Karan ko bi apna papa kee bhut yaad aa rhi h . Mazza aayega next update me
RISTON KE RAKH ( maa beta story) - maa beta story – New Episode
इरावती कां बॉयफ्रेंड अर्जुन मेहरा हैं। वो एक् आकर्षक व्यक्तित्व वाला आदमी हैं, जिसकी उम्र करीब 45 साल हैं। वो बाहरी रूप सें बेहदसफल व्यवसायी हैं, मगर उसकी असली दिलचस्पी मात्र इरावती कि संपत्ति औऱ हैसियत मे हैं। अर्जुन बहोत चालाक औऱ महत्वाकांक्षी हैं। वो इरावती केँ माँ-बाप कों प्रभावित करने मे सफलरहा हैं, खासकर विक्रम। अर्जुन कां मकसद हैं इरावती केँ परिवार केँ संसाधनों पऱ कब्जा जमाना औऱ अपनी कंपनी केँ विस्तार केँ लिए उनका इस्तेमाल करना।
अर्जुन कां एक् बेटा आर्यन मेहरा हैं, जिसकी उम्र करीब-करीब 23 साल हैं, यानिकरन केँ बराबर। आर्यन अपने पिता कि तरह महत्वाकांक्षी नहि हैं, बल्कि एक् शांत औऱ संवेदनशील लड़का हैं। फिरभी वो अर्जुन केँ प्रभाव मे पला-बढ़ा हैं, मगर उसके भीतर एक् मानवीय पक्ष हैं जौ उसे अपने पिता सें अलग करता हैं। आर्यन कां व्यक्तित्व करन सें बिलकुल अलग हैं—जहाँ करन मजबूत औऱ कठोर हैं, वहीं आर्यन विनम्र औऱ सहनशील हैं।
इरावती आर्यन कों देखकर अक्सर करन कि परछाईं देखती हैं। आर्यन कां मासूम चेहरा औऱ उसकी आँखों मे करुणा उसे बार-बार करन कि याद दिलाती हैं। जब भि आर्यन उसके सामने होता हैं, इरावती कां दिल भारी होँ जाता हैं, औऱ वो स्वयं कों करन केँ बारे मे सोचने सें रोक नहि पाती। आर्यन केँ प्रति उसकी संवेदनशीलता उसे एक् द्वंद्व मे डाल देती हैं—क्याँ वो आर्यन केँ जरिएकरन केँ प्रेम कों फिन सें महसूस कर सकती हैं, याँ ये सिर्फ एक् भ्रम हैं?
अर्जुन, इरावती कि भावनात्मक कमजोरी कां फायदा उठाने कि कोशिश करता हैं। वो जानता हैं कि इरावती अब भि अपने अतीत मे फंसी हुइ हैं, औऱ वो इस मौके कां उपयोग करउसे अपने लगभग लाने कि कोशिश करता हैं। अर्जुन केँ इरादों कों इरावती केँ परिवार केँ कुछ सदस्य नहि समझते, मगर इरावती कि माँ सुमित्रा कों अर्जुन पर्र शक हैं। वो अक्सर इरावती कों सावधान रहने कि सलाह देती हें, मगर इरावती अभि तक अपनेदिल औऱ मन केँ बीच फंसी हुईँ हैं।
आर्यन औऱ करन केँ बीचये समानता भविष्य मे दोनों केँ रिश्ते कों औऱ जटिल बनाएगी। क्याँ आर्यन औऱ करनकभी आमने-सामने होंगे? क्याँ इरावती अपनी भावनाओं केँ जाल सें बाहर् निकल पाएगी, याँ अर्जुन कां छलउसे औऱ गहराई मे धकेल देगा?इन सवालों कां जवाब वक्त केँ संग सामने आएगा।
इराबती कां नयादिन:
सूरज कि किरणें खिड़की केँ पर्दों सें छनकर इराबती केँ कमरे मे फैल चुकीथीं। वोँ हल्के नीलेरंग कि साड़ी पहनकर दर्पण केँ सामने खड़ी थि। बालों कों बांधते हुए उसने स्वयं कों देखा—चमकती आँखें, मगर उनमें कहीं गहराई मे छिपाहुआ दर्द। इराबती नें एक् गहरी सांसली औऱ स्वयं कों याद दिलाया कि आज कां दिननया हैं, औऱ उसे अपनेकाम पऱ ध्यान देना हैं।
तभी नीचे सें आवाजें आने लगीं। दरवाजे कि घंटीबजी औऱ नौकरानी नें दरवाजा खोला। इराबती नें अपनी डायरी बंद कि औऱ सीढ़ियों कि ओर बढ़ी।
"इरावती!" आवाज़ अर्जुन कि थि।
सीढ़ियों सें उतरते हुए उसने देखा कि अर्जुन औऱ आर्यन लॉबी मे खड़े थें। अर्जुन हमेशा कि तरह आकर्षक दिखरहा थां। सफेद शर्ट केँ ऊपर काला ब्लेज़र, औऱ चेहरे पऱ वोँ मुस्कान जोँ किसी कां भि दिलजीत लें। आर्यन थोड़ी दूरी पऱ खड़ा थां, जैसेउसे यहा होना नापसंद हौ।
"अर्जुन, इतनी सुभह?" इरावती नें हल्की मुस्कान केँ संग पूछा।
"तुमसे मिलने कां समयकब देखा हैं?" अर्जुन नें उसकीओर बढ़ते हुएकहा।
इरावती नें अपनी मुस्कान कों बनाएरखा, मगर उसकादिल तेजी सें धड़कने लगा। अर्जुन कां ये अचानक आनांउसे असहजकर रहा थां।
"तुम्हारे दफ़्तर जाने सें पहले सोचा तुम्हें गुड मॉर्निंग कहदूं। औऱ देखो, आर्यन कों भि लेँ आया हूं। " अर्जुन नें हँसते हुएकहा।
आर्यन नें हल्की सि मुस्कान दि औऱ सिर हिलाया।
"गुड मॉर्निंग, आंटी। "
"आंटी नहि, बस इरावती बोलो, " उसने आर्यन कि ओरदेख करकहा।
"अरे छोड़ो यह फॉर्मल बातें। " अर्जुन नें इरावती केँ हाथ कों पकड़ते हुएकहा, "मैंने सोचा थां कि तुम्हारे संगकुछ वक़्त बिताऊं। वैसे भि तुम् काम मे इतनी व्यस्त रहती हौ कि स्वयं कों वक़्त नहि देती। "
इरावती नें धीरे-धीरे सें अपनाहाथ छुड़ाया। "तुम् जानते होँ, मेराकाम मेरेलिए कितना ज़रूरी हैं। "
"पता हैं, " अर्जुन नें उसकी आँखों मे झाँकते हुएकहा, "पऱ कभी-कभी तुम्हें भि आराम कि ज़रूरत होती हैं। औऱ शायद.थोडा प्रेम कि भि। "
इरावती नें अर्जुन केँ इस सीधेपन पऱ एक् क्षण केँ लिए अपनी आँखें झुकालीं। उसे अर्जुन कि बातों मे एक् अनजानी सि चुभन महसूस हुई। वोँ जानती थि कि अर्जुन कां इरादा कुछ औऱ थां, मगर वोँ उसकी बातों मे फंसना नहि चाहती थि।
"चलो, बैठते हें। " इरावती नें माहौल कों हल्का करने कि कोशिश करतेहुए कहा।
वोँ सब ड्राइंग रूम मे आँ गए। अर्जुन नें कुर्सी पऱ बैठते हुएकहा, "याद हैं, जब पहलीबार हम् मिले थें? तुमने अपनी कंपनी कों बचाने केँ लिए कितनी मेहनत कि थि। "
"हाँ, औऱ वोँ दिनअब भि याद हें। " इरावती नें हल्के स्वर मे जवाब दिया।
"मुझे तुम्हारा हौसला हमेशा सें पसन्द हैं, इरावती। तुम् केवल हसीन नहि हौ, बल्कि एक् मजबूत औरत भि होँ। " अर्जुन कि आवाज़ मे एक् अलग हि मिठास थि।
इरावती नें उसकीओर देखा, मगर कुछ नहि कहा।
"क्याँ मे गलतकह रहा हूं?" अर्जुन नें मुस्कुराते हुए पूछा।
"नहि, मगर." इरावती नें अपनीबात अधूरी छोड़ दि।
अर्जुन नें धीरे-धीरे सें उसकाहाथ पकड़ लिया। "तुम्हें स्वयं कों थोडा खुला छोड़ने कि ज़रूरत हैं। मैंने हमेशा तुम्हारे बारे मे सोचा हैं, औऱ आज भि सोचता हूं। "
आर्यन, जौ अब तक चुप थां, नें हल्की खांसी कि। "बापू, मुझे लगता हैं कि हमें चलना चाहिए। आंटी कों दफ़्तर जानां हैं। "
"आर्यन!" अर्जुन नें उसे डांटते हुएकहा।
"नहि, आर्यन सहीकह रहा हैं। मुझे निकलना होगा। " इरावती नें अपनाहाथ छुड़ाते हुएकहा।
"ठीक हैं, मगर हम् साम कों मिलरहे हें, हैं नां?" अर्जुन नें पूछा।
इरावती नें मुस्कुराते हुएसिर हिला दिया। "देखती हूं। "
अर्जुन औऱ आर्यन जाने केँ लिएउठे। जाते-जाते अर्जुन नें कहा, "तुम्हारे बिना मेरी सुभह अधूरी हैं, इरावती। "
दरवाजा बंद होते हि इरावती नें एक् गहरी सांसली। उसेपता थां कि अर्जुन केँ इरादे कुछ औऱ हें, औऱ वो उसे इतनी आसानी सें अपनेजाल मे फंसाने नहि देगी।
सुभह कि हल्की धूप दफ़्तर कि बड़ी खिड़कियों सें छनकर अंदर आँ रही थि। इराबती अपनी वाहन मे आर्यन केँ संग बैठी हुइ थि। दोनों केँ बीच अजीब सि चुप्पी थि। इराबती नें आर्यन कि ओर देखा। वोँ खिड़की सें बाहर् झांकरहा थां, जैसेसोच मे डूबा हौ।
"आर्यन, " इराबती नें धीमे स्वर मे कहा, "क्याँ तुम् मुझसे कुछ कहना चाहोगे?"
आर्यन नें सिर हिलाते हुएकहा, "नहि आंटी.मेरा मतलब हैं, इराबती आंटी। "
इरावती नें गहरी सांसली। उसे आर्यन केँ चेहरे पर्र एक् अजीब सि दूरी महसूस होँ रही थि। वोँ जानती थि कि आर्यन केँ लिएयह नाताअब भि नया औऱ असहज थां। मगर कहीं नं कहीं, उसकेदिल मे एक् उम्मीद थि कि शायद आर्यन उसे अपनाने कि कोशिश करेगा।
"आर्यन, क्याँ तुम् आज मुझे केवल 'मां' कह सकते होँ? बस एक् बार। "
आर्यन नें चौककर उसकीओर देखा। उसकी आँखों मे हल्का सां संकोच थां। "आप्.आप् मुझेऐसा क्यूं कहने कों कहरही हें?"
"क्योंकि मे चाहती हूं कि तुम् मुझे एक् मम्मी कि तरह देखो। मे जानती हूं कि यह आसान नहि हैं। मगर मे कोशिश करना चाहती हूं। "
आर्यन नें कुछ क्षण सोचा, फिन धीरे-धीरे सें कहा, "मे.देखूंगा। "
इरावती नें हल्की मुस्कान केँ संग उसकाहाथ थाम लिया। "बस इतना हि बहुत हैं। "
गाड़ी दफ़्तर केँ गेट पर्र रुकी। दोनों अंदर कि ओर बढ़े। इराबती कां दफ़्तर बड़ा औऱ भव्य थां। सफेद दीवारों पर्र लगी पेंटिंग्स, चमचमाते फर्नीचर, औऱ हरतरफ काम मे डूबेलोग। इराबती कां वहां एक् अलग हि रुतबा थां। हरकोई उसेआदर औऱ सम्मान केँ संग देखता थां।
"मां, यह दफ़्तर कितना बड़ा हैं!" आर्यन नें हैरानी सें कहा।
इरावती केँ दिल मे हल्का सां चैनआया। उसने 'मम्मी' शब्द सुना औऱ उसकी आँखों मे चमक आँ गई।
"हाँ बेटा, औऱ आज तुम् भि इसका हिस्सा हौ। चलो, मे तुम्हें सभी सें मिलवाती हूं। "
वोँ आर्यन कां हाथ पकड़कर आगे बढ़ी। सबसे पहले वोँ अपने असिस्टेंट रोहन केँ पास पहुंची।
"रोहन, यह आर्यन हैं। आज सें यह हमारे संग रहेगा। इसेसभी काम सिखाओ औऱ ध्यान रखना कि इसे किसीतरह कि दिक्कत न् होँ। "
रोहन नें मुस्कुराते हुए आर्यन सें हाथ मिलाया। "स्वागत हैं आर्यन। यहाकाम करना तुम्हें मनपसंद आएगा। "
इसकेबाद इराबती नें आर्यन कों अपने केबिन मे लेँ जाकर कुर्सी पर्र बैठाया। "देखो आर्यन, यह दफ़्तर मात्र एक् काम करने कि स्थान नहि हैं। यह मेरा सपना हैं, मेरी मेहनत हैं। औऱ अब मे चाहती हूं कि तुम् भि इस ड्रीम्स कां हिस्सा बनो। "
आर्यन नें सर हिलाते हुएकहा, "मे कोशिश करूंगा। "
इरावती नें मुस्कुराकर कहा, "बस इतना हि बहुत हैं। चलो, अब तुम्हें सभी सें मिलवाते हें। "
वोँ आर्यन कों लेकर बाकी कर्मचारियों केँ पास गई। हर किसी सें आर्यन कां परिचय करवाया। "यह आर्यन हैं, मेरा बेटा। आज सें यह हमारे संगकाम सीखेगा। "
कर्मचारी हैरान थें। कई लोगों नें पहलीबार सुना कि इराबती कां एक् बेटा भि हैं। मगर सबने मुस्कुराकर आर्यन कां स्वागत किया।
"आपका बेटा तोँ बहोत होनहार लगता हैं, " एक् कर्मचारी नें कहा।
"हाँ, औऱ मे चाहती हूं कि वोँ हरकाम मे निपुण बने, " इराबती नें गर्व सें कहा।
आर्यन नें सबकीओर देखा। उसे एहसास हुआ कि यहालोग इराबती कां कितना सम्मान करते हें। उसनेमन हि मन सोचा कि शायदयह मौका उसकी जीवनबदल सकता हैं।
दिनभर केँ इससफर मे इराबती नें महसूस किया कि आर्यन थोडा खुलने लगा हैं। औऱ शायद एक् दिन वोँ उसे मां केँ रूप मे पूरीतरह स्वीकार कर लेगा।
पूरादिन इरावती नें आर्यन कों अपनेसंग रखा। हर बारजब वोँ आर्यन कि तरफ देखती, उसकी आँखों मे गहरी तड़प झलकती। आर्यन कि मासूमियत, उसकी आँखों कां चमकता हुआ नूर—सबकुछ उसे अपने बेटेकरण कि याद दिलारहा थां।
वोँ अपनेमन मे बार-बार स्वयं सें कहती, "मेराकरण भि ऐसा हि होगा। उतना हि मासूम, उतना हि होशियार। क्याँ वोँ भि ऐसे हि प्रश्न करता होगा? क्याँ वोँ भि ऐसे हि मुझे 'मां' बुलाने कां प्रतीक्षा कररहा होगा?"
आर्यन नें जब देखा कि इरावती कहींखोई हुई हें, तोँ उसने धीरे-धीरे सें कहा, "आंटी। क्याँ हुआ? आप् इतने ध्यान सें मुझे क्यूं देखरही हें?"
इरावती चौंकी। उसने जल्दी स्वयं कों संभाला औऱ मुस्कुराने कि कोशिश कि। "कुछ नहि बेटा, बसयूं हि.। तुम्हारी बातें सुनते हुए मुझे बहोत अच्छा लगरहा हैं। "
आर्यन नें अपनी भौंहें चढ़ाते हुएकहा, "सच बताइए। कहीं आप् मुझे किसी औऱ सें तोँ नहि मिलारही?"
इरावती नें गहरी सांसली। वोँ चाहती थि कि वोँ सभीकुछ बतादे, मगर अभि समयसही नहि थां। उसनेसिर हिलाते हुएकहा, "नहि बेटा, ऐसाकुछ नहि हैं। चलो, अब हम् थोड़ी देरकाम पर्र ध्यान दें। "
तभी गीता, इरावती कि सेक्रेटरी, कमरे मे दाखिल हुई। उसकी निगाहें आर्यन पर्र पड़ीं औऱ उसने हल्की मुस्कान केँ संगकहा, "तोँ यह हें आपके नन्हे मेहमान?"
"हाँ गीता, " इरावती नें मुस्कुराते हुएकहा, "आर्यन आज पूरादिन हमारे संग रहेगा। मे चाहती हूं कि तुम् इसे दफ़्तर केँ कामकाज समझाओ। "
गीता नें सिर हिलाया औऱ आर्यन कि तरफ मुड़कर कहा, "तुम्हें यहाकोई तकलीफ़ तौ नहि हौ रही?"
आर्यन नें सिर हिलाते हुए जवाब दिया, "नहि, यहासभी बहोत अच्छे हें। मगरयह सभीकाम मेरेलिए नया हैं। "
गीता नें हँसते हुएकहा, "कोईबात नहि। मे तुम्हें सभी सिखा दूँगी। वैसे तुम्हें यहाआकर कैसालग रहा हैं?"
आर्यन नें थोडा सोचकर कहा, "अच्छा लगरहा हैं.मगर थोडा अजीब भि। "
गीता नें उसकीतरफ देखते हुएकहा, "अजीब क्यूं?"
आर्यन नें हल्के सें मुस्कुराकर कहा, "क्योंकि मे अब तक सोचता थां कि दफ़्तर कां माहौल बहोत सख्त होता हैं। मगरयहा तोँ सभी बहोत प्रेम सें बातकर रहे हें। खासकर आंटी."
इरावती नें गहरी मुस्कान केँ संगकहा, "क्योंकि हम् यहा केवलकाम नहि करते, एक् परिवार कि तरह रहते हें। "
गीता नें इरावती कि ओर देखते हुए महसूस किया कि वोँ आर्यन केँ संग एक् खास जुड़ाव महसूस कररही थीं। उसने मजाक मे कहा, "लगता हैं आर्यन नें आपकादिल जीत लिया हैं। "
इरावती नें हल्के सें हँसते हुएकहा, "क्यूं नहि? वोँ इतना प्यारा बच्चा हैं। "
गीता नें आर्यन कि तरफ मुड़कर कहा, "चलो, अब मे तुम्हें कुछ दस्तावेज दिखाती हूं। तुम्हें जानना चाहिए कि यहाकाम केसे होता हैं। "
आर्यन नें उत्सुकता सें सिर हिलाया औऱ गीता केँ संग जानेलगा। मगर जाते-जाते उसने पलटकर इरावती कि तरफ देखा। उसकी आँखों मे प्रश्न थें, जैसे वोँ जानना चाहता हौ कि इरावती उससेकुछ क्यूं छिपारही हें।
जब आर्यन औऱ गीताचले गए, तौ इरावती अपनी कुर्सी पर्र बैठ गई। उसने एक् गहरी सांसली औऱ स्वयं सें बुदबुदाई, "क्यूं हरबार आर्यन कों देखकर मुझेकरण कि यादआती हैं? क्याँ यह नियति कां कोई संकेत हैं? याँ फिन मे हि अपने बेटे कों हर चेहरे मे ढूंढने कि कोशिश कररही हूं?"
उसकी आँखों मे आँसू आँ गए। उसने अपनीमेज पर्र रखी एक् फोटो फ्रेम कों उठाया, जिसमें करण कि छोटी सि तस्वीर थि। वोँ तस्वीर उसने सालों सें अपनेदिल केँ लगभगरखी थि।
"करण, " उसने धीरे-धीरे सें कहा, "तुम्हारी मां नें बहोत गलतियाँ कि हें। मगर मे अब वापस आनां चाहती हूं.तुम्हारे पास। क्याँ तुम् मुझेमाफ करोगे?"
इसबीच, गीता आर्यन कों दस्तावेज समझारही थि। उसने मुस्कुराते हुएकहा, "तुम् बहोत जल्दसीख रहे हौ। तुम्हें दफ़्तर कां काम मनपसंद आँ रहा हैं?"
आर्यन नें सिर हिलाते हुएकहा, "हाँ, मगर मे सोचता हूं कि क्याँ मे इसे लंबे वक़्त तक कर पाऊँगा?"
गीता नें हँसते हुएकहा, "क्यूं नहि? तुममें वोँ सभीकुछ हैं जोँ यहा चाहिए। औऱ वैसे भि, इरावती मैम कों तुम् पर्र बहोत भरोसा हैं। "
आर्यन नें संजीदगी सें कहा, "इरावती आंटी बहोत अच्छी हें। मगर मुझे कभी-कभी लगता हैं कि वोँ मुझसे कुछ छिपारही हें। "
गीता नें हैरानी सें पूछा, "तुम् ऐसा क्यूं सोचते हौ?"
आर्यन नें थोड़ी देरचुप रहकरकहा, "उनकी आँखों मे कुछ दर्द हैं, कुछ अधूरी बातें। जैसे वोँ मुझे देखकर कुछयाद करती हें। "
गीता नें गंभीर होकरकहा, "शायद उनकेपास भि अपनी कहानियाँ हें, जोँ समयआने पऱ सामने आएंगी। तब तक तुम्हें धैर्य रखना होगा। "
आर्यन नें गहरी सांस लेतेहुए कहा, "शायद तुम् सहीकह रही होँ। "
गीता नें मुस्कुराते हुएकहा, "चलो, अब काम पर्र ध्यान दें। अगर ज़्यादा सोचा, तोँ काम केसे करेंगे?"
दोनों हँस पड़े औऱ दस्तावेजों मे डूबगए। मगर आर्यन केँ मन मे अब भि प्रश्न थें। वहीं, इरावती अपने कमरे मे करण कि यादों मे खोई हुईँ थि, उम्मीद करतेहुए कि शायद एक् दिन वोँ अपने बेटे सें फिनमिल सकेगी।
देहात मे सुभह कां उजाला धीरे धीरेहर ओरफैल रहा थां। पंछियों कि चहचहाहट औऱ हल्की-हल्की ठंडीहवा वातावरण कों ताजगी सें भररही थि। करण कि दादीमा, जोँ रोज़ कि तरह सूरज निकलने सें पहलेउठ चुकीथीं, धीरे धीरे आंगन मे आईं। उनकी आँखें करण कों ढूँढरही थीं, औऱ जब उन्होंने देखा कि करण आंगन केँ एक् कोने मे अपने व्यायाम मे मग्न हैं, तौ उनके चेहरे पर्र एक् गर्वभरी मुस्कान आँ गई।
करण केँ घुंघराले बाल सुभह कि रोशनी मे चमकरहे थें। उनकीहरी आँखें मानो गहरे सागर कि तरह गहराई सें भरी हुई थीं। वो अपनी चौड़ी छाती औऱ मज़बूत कंधों केँ संग किसी योद्धा कि तरहदिख रहा थां। उनकी दादीमा नें जबउसे देखा तौ उनकादिल गर्व सें भरउठा।
"क्याँ ज़माना आँ गय़ा हैं, " दादीमा नें मन हि मन सोचा। "आजकल केँ बच्चे इतनी मेहनत कहां करते हें? मगर मेराकरण अलग हैं। मैंने इसे अच्छे संस्कार औऱ अनुशासन मे पाला हैं। "
करण नें अपनी एक्सरसाइज ख़त्म कि औऱ गहरी सांस लेतेहुए सीधा खड़ा हौ गय़ा। पसीने कि बूँदें उसके माथे पर्र चमकरही थीं। उसने पानी कां घूंट लिया औऱ जब मुड़ा तौ उसकी नजरें दादीमा पर्र पड़ीं।
करण: "दादीमा, आप् इतनी सुभहउठ गईं? आराम करना चाहिए थां नां। "
दादीमा मुस्कुराते हुएपास आईं औऱ उसकेसिर पऱ हाथ फेरा।
दादीमा: "अरे, तेरे जैसा पोता होँ तौ नींद कहां आती हैं? तुम्हें यूँ मेहनत करते देख्ना मेरेलिए किसी वरदान सें कम नहि हैं। "
करण हल्का सां मुस्कुराया औऱ कहा, "दादीमा, मेहनत तौ करनी पड़ती हैं। आप् हि नें तौ सिखाया हैं कि बिना मेहनत केँ कुछ नहि मिलता। "
दादीमा कि आँखों मे नमी आँ गई। उन्होंने करण केँ चेहरे कों अपने हाथों मे लिया औऱ कहा, "हाँ, बेटा। औऱ तेरे जैसा पोता पाकर मे स्वयं पर्र गर्व करती हूं। तेरे पिताजी भि तुझ पर्र बहोत गर्व करतेअगर आज जिंदा होते। "
ये सुनकर करण थोड़ी देर केँ लिएचुप होँ गय़ा। वो हमेशा सें अपने पिता केँ बारे मे सोचता थां, मगर उसनेकभी इस बारे मे अधिकबात नहि कि। उसने दादीमा केँ हाथों कों पकड़ा औऱ कहा, "दादीमा, आप् हमेशा मुझे मजबूत बनाती हें। औऱ मे वादा करता हूं कि आपकी मेहनत कभी बेकार नहि जाएगी। "
दादीमा नें करण कों गलेलगा लिया। उनकेदिल मे विश्वास थां कि करण नं मात्र उनकी बल्कि उनके पिता कि भि इच्छाओं कों पूरा करेगा।
आंगन मे ये दृश्य मानो देहात कि उस शांति औऱ प्रेम कां प्रतीक बन गय़ा थां, जोँ करण औऱ उसकी दादीमा केँ रिश्ते मे थां।
देहात कि उस शांत सुभह मे हल्की ठंडीहवा बहरही थि। पंछियों कि चहचहाहट केँ बीचकरण अपनी दादीमा केँ संग आंगन मे बैठा थां। दादीमा नें अपनेहाथ मे गरमचाय कां कप थामाहुआ थां औऱ उनकी नजरें करण पर्र टिकीथीं। वो अपने पोते कि मेहनत औऱ लगन पर्र गर्वकर रहीथीं।
कुछ पलों कि खामोशी केँ बाद दादीमा नें गहरी सांसली औऱ बोलीं, "बेटा, तुम्हारी मां। इरावती."
करण कां चेहरा जल्दी सख्त होँ गय़ा। उसकीहरी आँखों मे एक् अजीब सि चमक आँ गई, जोँ गुस्से औऱ दर्द दोनों कां मेल थि। उसने दादीमा कि तरफ देखा, मगर कुछ नहि कहा।
दादीमा नें अपनीबात जारीरखी, "वोँ चाहे जैसी भि थि, मगर तुम्हारी मां थि। कभी सोचा हैं कि वोँ क्यूं चली गई? शायदकोई मजबूरी रही हौ। "
करण केँ हाथ मे पकड़ी पानी कि बोतल केँ ढक्कन पऱ उसकी पकड़कस गई। वो गुस्से मे बुदबुदाया, "मजबूरी? कैसी मजबूरी, दादीमा? एक् मम्मी अपने बच्चे कों छोड़ने कि क्याँ मजबूरी बता सकती हैं?"
दादीमा नें उसकी आँखों मे दर्द देखा। वो जानती थीं कि ये विषयकरण केँ लिए कितना संवेदनशील हैं, मगर उन्होंने हिम्मत जुटाकर कहा, "बेटा, इंसान गलतियां करता हैं। हमेंउसे माफ करना सीखना चाहिए। "
करण कां क्रोध अब खुलकर सामने आनेलगा। उसने बोतल कों ज़मीन पर्र रख दिया औऱ खड़ा हौ गय़ा। "माफ करना? दादीमा, आप् जानती हें मे क्याँ महसूस करता हूं? उसने मुझे नहि छोड़ा, उसने हमें बर्बाद कर दिया। मेरे पिताजी कों उसकी यादों मे घुट-घुटकर मरते देखा हैं मैंने। औऱ आप् मुझसे कहती हें कि मे उसेमाफ करदूँ?"
दादीमा नें अपनी स्थान सें उठतेहुए कहा, "बेटा, मे जानती हूं तुम्हारे दिल मे कितना दर्द हैं। मगर नफरत केँ संग जीना आसान नहि होता। तुम्हें स्वयं कों इसबोझ सें मुक्त करना होगा। "
करण कि आँखों मे आंसू नहि थें, मगर उसकी आवाज़ कांपरही थि। "बोझ? दादीमा, बोझ तौ वोँ थां जिसे मेरे बापू उठाते रहे। उन्होंने मुझे अकेला नहि छोड़ा, वोँ मेरेसंग थें, मगर उन्होंने भि मुझसे बिनाकुछ कहेचले जाने कां फैसला किया। औऱ इसकीवजह मात्र वही थि। मेरी मम्मी, आपकीबहू, इरावती। "
दादीमा चुपचाप करण कि बातें सुनती रहीं। उन्हें पता थां कि करण कि नफरत सालों सें उसके अंदरउबल रही थि। उन्होंने शांत स्वर मे कहा, "बेटा, तुम्हारी मम्मी नें गलत किया, मे मानती हूं। मगरहर किस्सा केँ दो पहलू होते हें। तुमने कभी उसकी किस्सा जानने कि कोशिश कि?"
करण नें गुस्से सें अपनी दादीमा कि तरफ देखा। "उसकी स्टोरी? मुझे उसकी किस्सा नहि जाननी। मुझेपता हैं कि एक् मम्मी अपने बेटे केँ लिए क्याँ करती हैं। औऱ उसने क्याँ किया? अपने बेटे औऱ पति कों छोड़कर चली गई। बस इतनी सि स्टोरी हैं। "
दादीमा नें उसकीपीठ थपथपाने कि कोशिश कि, मगरकरण पीछेहट गय़ा। "आपको नहि पता, दादीमा। आपने हमेशा मेरेलिए सभीकुछ किया, मगर वोँ स्त्री। उसने मुझेकभी कुछ नहि दिया। मे उसके बारे मे औऱ कुछ सुनना नहि चाहता। "
दादीमा नें गहरी सांसली। उन्होंने देखा कि करण कां क्रोध उसकी तकलीफ सें उपजा थां। वो जानती थीं कि इस नफरत कों मिटाने केँ लिएसमय औऱ प्रेम कि जरूरत होगी।
दादीमा नें अंतिम बारकहा, "बेटा, जब टाइम आएगा, तब तुम् जानोगे कि माफी मे भि ताकत होती हैं। मगरतब तक, मे तुम्हें नफरत मे जलतेहुए नहि देख सकती। "
करण नें कोई जवाब नहि दिया। उसने अपनासिर झुकाया औऱ वहा सें चला गय़ा। दादीमा उसकीपीठ पर्र निगाहें टिकाए रहीं, उनकी आँखों मे चिंता साफझलक रही थि।
करण खेतों केँ बीच खड़ा थां, उसकी आंखों मे क्रोध औऱ दर्द एक् संग उमड़रहे थें। उसकी मुट्ठियां भींची हुइ थीं औऱ सांसें तेज़ हौ रहीथीं। अचानक उसने ज़ोर सें चिल्लाया, "इरावती! तूने हमें क्याँ समझरखा थां? खिलौना थें हम् तेरेलिए? जबजी चाहा, छोड़ दिया!"
उसकी आवाज़ खेतों केँ शांत वातावरण मे गूंजउठी। उसनेघास पऱ ज़ोर सें लात मारी औऱ पत्थर दूर फेंक दिया। "कैसी मां थि तूँ? अपने हि बेटे कों छोड़कर चली गई, औऱ क्यूं? क्योंकि तेरी अपने आराम कि पड़ी थि!"
उसके अंदर कां क्रोध बाहर् निकलरहा थां। उसकी आंखें आंसुओं सें भरआईथीं मगर उसने उन्हें बहने नहि दिया। तभी पीछे सें एक् जानी-पहचानी आवाज़ आई, "करण। तुम्हारी तरफ क्याँ हौ गय़ा हैं?"
करण नें जल्दी पीछे मुड़कर देखा। वोँ सिया थि, उसकी बचपन कि मित्र, जौ हमेशा सें उसकेसंग थि। सिया खेतों केँ किनारे खड़ी थि, उसके चेहरे पऱ चिंता साफझलक रही थि।
"तूँ यहा क्यूं आई हैं, सिया? मुझे अकेला छोड़दे!" करण नें गुस्से मे कहा।
सिया आहिस्ता उसके लगभगआई औऱ शांत स्वर मे बोलीं, "मे तेरी आवाज़ सुनकर दौड़ी चलीआई। तुम्हे इसतरह देख नहि सकती। तुझेही किसबात नें इतना तोड़ दिया हैं, करण?"
करण नें गुस्से मे सिर हिलाते हुएकहा, "तुझेही नहि समझेगी सिया। यह मेरी लड़ाई हैं, मेरा दर्द हैं। तुँ इसमें मतपड़। "
सिया नें उसकी आंखों मे देखा औऱ बोलीं, "मे तुझेही तब सें जानती हूं जब हम् बच्चे थें। तेरा दर्द मेरा भि हैं, करण। मगर तूँ इसे अकेले सहताजा रहा हैं। यहसही नहि हैं। "
करण नें गहरी सांसली औऱ नजरें फेरलीं। "मुझे नफरत हैं उससे। जिसने हमें छोड़ दिया। मेरे पिता कों तोड़ दिया। मुझेइस दर्द केँ संग जीने दिया। मुझे उससे नफरत हैं!"
सिया नें उसके कंधे पऱ हाथ रखतेहुए कहा, "नफरत तेरी अंदर सें खा जाएगी, करण। यह तुझेही कहीं नहि लें जाएगी। तुम्हारी तरफइस नफरत सें बाहर् आनां होगा। "
करण नें उसकाहाथ झटकते हुएकहा, "मुझे नहि चाहिए किसी कां सहारा। नफरत हि मेरा सहारा हैं, औऱ मे इसे नहि छोड़ सकता। "
सिया कि आंखें नम होँ गईं। उसने गहरी सांस लेतेहुए कहा, "अगर तुझेही मेरी जरूरत कभी भि महसूस हौ, तौ मे हमेशा तेरेसंग हूं। पऱ स्वयं कों इस नफरत मे मत डुबा। मे तेरी टूटते हुए नहि देख सकती। "
करण नें कोई जवाब नहि दिया। वो बस वहीं खड़ारहा, उसकी आंखों मे क्रोध औऱ दर्दभरा हुआ थां। सिया नें उसे एक् अंतिम बार देखा औऱ धीरे धीरे वहां सें चली गई।
करण वहीं खड़ारहा, अपने दर्द औऱ नफरत केँ जाल मे उलझाहुआ।
करण नें गहरी सांसली औऱ फिन सें सिया कि तरफ देखा, "मे जानता हूं कि मैंने तुम्हारे संगगलत किया। गुस्से मे आकर जौ बातें मैंने कही, वोँ बिल्कुल गलतथीं। मगरअब मुझेये समझ मे आँ रहा हैं कि तुमसे ऐसाबात करके मुझे मात्र अपने आप् कों चोट पहुंचाई। तुम्हारे संग अच्छा व्यवहार करना चाहिए थां, औऱ मुझेखेद हैं कि मैंने ऐसा नहि किया। "
सिया नें उसकी बातों कों ध्यान सें सुना, फिन उसने हल्की मुस्कान केँ संगकहा, "करण, हमें नहि भूलना चाहिए कि हम् सभी इंसान हें, औऱ इंसान गलतियाँ करते हें। मगर क्याँ तुम् समझते हौ कि जब तक हम् अपनी गलतियों सें नहि सीखते, तब तक हम् कभीबदल नहि सकते?"
करण नें नर्म होतेहुए सिर झुका लिया औऱ धीमे सें कहा, "हाँ, सिया, मे समझता हूं। औऱ अब मुझेये भि एहसास हुआ कि किसी सें बुरा बर्ताव करने सें केवलदिल हि नहि, आत्मा भि टूट जाती हैं। "
सिया नें उसकी बातों कों ध्यान सें सुना औऱ फिनउसे थोडा समझाया, "तुम् सहीकह रहे हौ, करण। मगर इसबार तुमने येसभी केवल अपनी भावनाओं केँ कारण किया। फिन भि, इससे फर्क नहि पड़ता कि तुम् क्यूं ऐसाकर रहे थें। जोँ महत्वपूर्ण हैं, वो ये हैं कि अब तुम्हारे भीतर बदलाव कि चाह हैं, औऱ ये मुझे लगता हैं कि तुम् वाकई बदलने केँ लिए रेडी हौ। "
करण नें हल्के सें सिर झुकाते हुएकहा, "मे येसमझ चुका हूं, सिया। अब सें मे तुम्हारे संगऐसा कभी नहि करूंगा। अगर मुझेकभी कुछ कहना होँ, तोँ मे सीधे तुमसे बात करूंगा। गुस्से मे आकर याँ किसी औऱ कि बातों मे बहकर मे फिनकभी ऐसी गलती नहि करूंगा। "
सिया नें थोडा औऱ नरम होतेहुए कहा, "ये अच्छा हैं, करण। मगर क्याँ तुम् ये समझते होँ कि अब सें हमें एक् दूसरे केँ संगसच केहना होगा, न् कि केवल वो बातें जौ हमेंसही लगें? क्योंकि सच हमेशा अच्छा होता हैं, औऱ तुम्हें उसे मानने कां हौसला रखना चाहिए। "
"मे वादा करता हूं, सिया, "करण नें उसकी बातों कों पूरीतरह सें समझते हुएकहा। "अब सें मे कभी भि तुम्हारे संगकोई छुपीबात नहि करूंगा। औऱ अगरकभी कुछगलत हुआ तोँ मे तुम्हारे सामने सच्चाई रखूँगा। "
सिया नें एक् लंबी सांसली औऱ फिनकहा, "देखो, करण, हम् सभी इंसान हें। कोई भि स्वयं कों बदलने केँ लिए पूरीतरह सें रेडी नहि होता, मगर मुझे लगता हैं कि तुममें वो समझ औऱ शक्ति हैं, जोँ तुम्हें सही रास्ते पर्र लेँ जाएगी। "
"मे स्वयं कों सुधारने कि पूरी कोशिश करूंगा, " करण नें कहा औऱ फिन हल्की सि मुस्कान दि, "शुक्रिया, सिया, तुमने मुझे समझाया। "
सिया नें मुस्कराते हुएकहा, "तुम्हें शुक्रिया नहि, करण। ये सभी तुम्हारे अपनेलिए हैं। स्वयं कों बेहतर बनाने केँ लिए। "
करण नें सिर हिलाया औऱ कहा, "हां, मुझे एहसास हैं। औऱ मे इसे हमेशा याद रखूंगा। "
दोनों केँ बीच कि बातचीत कां ये लम्हा अब एक् नई शुरुआत कि ओरबढ़ रहा थां। इस वक़्त दोनों नें अपने-अपने दिलों कि बातों कों एक् दूसरे सें साझा किया औऱ समझा कि किसी भि रिश्ते मे केवल सच्चाई औऱ एक्-दूसरे कि समझ सें हि सफलता मिलती हैं।
ठीक हैं, अब मे उसीसीन कों नएनाम केँ संगलिख रहा हूं:
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यूएसए मे, इरावती औऱ परिवार केँ संग डिनरकर रहे थें। संग मे अरजन औऱ आर्यन भि थें। इरावती अपनी हाथों सें अर्यन कों खानां खिलारही थि। उसकी आँखों मे एक् गहरी भावनात्मक लहर थि, जैसे वो स्वयं अपने बेटेकरण कों खिलारही हौ। हर निवाला जैसे एक् अव्यक्त याद कों ताजाकर रहा थां। इरावती कि नज़रें थोड़ी नम हौ गईं, मगर उसने अपने आंसुओं कों थाम लिया औऱ मुस्कुराने कि कोशिश कि। वो ये महसूस कररही थि कि उसकी दुनिया फिन सें एक् लम्हा केँ लिए पूरी हौ गई हैं, जैसेकरण फिन सें उसकेपास होँ।
उसीसमय, अभिषेक कि बेटी कियारा, जोँ इरावती कि बिल्कुल सामने बैठी थि, मुस्कुराते हुए कहनेलगी, "आंटी, आप् तौ जैसे अर्यन कों स्वयं करणबना देती हें। क्याँ आप् भूलगईं कि करणयहा नहि हैं?"
कियारा कि बात सुनते हि इरावती केँ चेहरे पऱ थोड़ी असहजता आँ गई। वो कुछ लम्हा केँ लिएचुप हौ गई, मगर कियारा नें उस पऱ जोर देतेहुए कहा, "सच मे आंटी, अगर करणयहा होता तोँ क्याँ आप् उसे भि अर्यन कि तरह खिलातीं?"
इसी दौरान, अर्यन नें कियारा कि बात पऱ हंसते हुएकहा, "क्याँ मतलब हैं तुम्हारा, कियारा? आप् क्याँ मेरेसंग मजाककर रही हौ?"
कियारा नें हंसते हुएकहा, "नहि, नहि! मे तौ केवलयह देखरही थि कि आंटी कों कितना प्रेम हैं अर्यन सें। "
इरावती नें कियारा कि ओर देखा औऱ एक् हल्की सि मुस्कान केँ संगकहा, "तुम्हें क्याँ लगता हैं, कियारा? मे किसी औऱ कों इतना प्रेम कर सकती हूं, जौ करण सें ज़्यादा हौ?"
कियारा नें एक् चुटीली मुस्कान केँ संगकहा, "मगर आंटी, आप् तौ अब अर्यन कों ज़्यादा वक़्त देती हौ, औऱ वो भि आपके खाने सें खुश हैं। "
इसीबीच, अर्यन नें कियारा कि तरफ देखा औऱ कहा, "अब देखो, कियारा! तुम् कभी भि मजाक नहि छोड़ सकती होँ। पर्र इरावती आंटी केँ बारे मे ऐसामत कहो। वो मेरेलिए बहोत खास हें। "
इरावती कि आँखों मे एक् भावुकता आई औऱ उसने हल्का सां सिर झुकाते हुएकहा, "हर इंसान कि यादें, उनकी ज़िंदगी केँ बहोत अहम हिस्से होते हें, कियारा। कभी-कभी हम् अपने अतीत कों छोड़ नहि पाते, मगर जौ हमारे पास होता हैं, उस पर्र हमें ध्यान देना चाहिए। "
कियारा थोडा चुप होँ गई, उसकी आँखों मे एक् गहरीसमझ थि। वो अब इरावती कि बातों कों हलके मे नहि लें रही थि। अर्यन कि ओर देखा औऱ हल्के सें मुस्कुराई, जैसे कि वो कहरही होँ कि "ठीक हैं, अबसमझ गई। "
इसी दौरान, इरावती नें अपनी नजरें अर्यन पर्र डाली औऱ धीरे-धीरे सें कहा, "कभी सोचा हैं कि मे तुम्हारे संग कितना खुश हूं?" ये एक् प्रश्न थां, मगर जवाब अर्यन कि आँखों मे पहले सें हि थां। वो हल्के सें सिर झुका दिया औऱ एक् चुप्प मुस्कान केँ संग इरावती कां हाथथाम लिया।
डिनर केँ बाद, इरावती औऱ अर्जुन अकेले टाइम बितारहे थें। दोनों एक् शांत स्थान पर्र बैठे थें, जहांरात कां माहौल औऱ हल्की सि ठंडीहवा उनकेबीच कि दूरी कों औऱ भि कमकररही थि। इरावती थोड़ी चुप थि, जैसे वोँ कुछसोच रही होँ। अर्जुन नें उसे देखा औऱ हल्की मुस्कान केँ संगकहा,
"इरावती, तुम्हारी आँखों मे कुछ गहरी सि उदासी हैं। क्याँ बात हैं, क्याँ तुम् सोचरही हौ?"
इरावती नें धीरे-धीरे सें सिर उठाया औऱ अर्जुन कि आँखों मे देखा। "मे केवलयह सोचरही थि कि इंडिया लौटने केँ बादसभी कुछ कैसा होगा। वहां बहोत कुछबदल चुका हैं। मगर तुम्। तुम् मेरेसंग होँ, यहसोच कर अच्छा लगता हैं। "
अर्जुन नें उसकी बातों कों ध्यान सें सुना औऱ फिन थोडा लगभग होकर बोला, "तुम्हें हमेशा मेरेपास मिलेगा, इरावती। चाहे तुम् कहीं भि हौ, तुम्हें कभी अकेला महसूस नहि होने दूंगा। "
इरावती कि आँखों मे एक् नर्मी थि। वो धीरे-धीरे सें मुस्कराई औऱ कहा, "तुमसे बात करके, अर्जुन, मुझे लगता हैं कि कभी भि कुछ भि आसान होँ सकता हैं। तुम्हारा संगसच मे बहोत खास हैं। "
अर्जुन नें उसकी हाथों कों धीरे-धीरे सें पकड़ा औऱ कहा, "तुम्हारे संगहर मुश्किल आसान लगती हैं। मुझे लगता हैं, हम् दोनों मे एक् अजीब सां तालमेल हैं। "
इरावती नें धीरे-धीरे सें अपनी आँखें बंद कि औऱ हल्का सां सांस लिया, जैसे वो उसकी बातों कों पूरीतरह सें महसूस कररही होँ। फिन उसने अपनी आँखें खोलते हुएकहा, "मैंने कभी सोचा नहि थां कि किसी केँ संग इतनी गहरी कनेक्शन महसूस करूंगी, मगर तुम्हारे संग.ये सभीकुछ बहोत अलग सां हैं। "
अर्जुन नें उसकी आंखों मे प्रेम सें देखा औऱ कहा, "कभी सोचा नहि थां, मगरअब सभीकुछ बहोत साफ हैं। तुम् औऱ मे, दोनों एक् दूसरे केँ लिएबने हें। मे तुम्हारे संगहर समय जीना चाहता हूं। "
इरावती नें उसकीतरफ देखा, औऱ उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चमक थि। उसने हल्की सि मुस्कान केँ संगकहा, "अर्जुन, तुम् बहोत सच्चे हौ। तुमसे अधिक औऱ क्याँ चाहिए? तुम् मेरे जिंदगी मे वोँ चीज हौ, जौ कभी मैंने सोचा नहि थां। "
अर्जुन नें धीरे-धीरे सें उसके चेहरे केँ पास अपनाहाथ बढ़ाया औऱ उसकी बालों कों झुकाकर कहा, "औऱ मे तुम्हारे बिना अपनी ज़िन्दगी कि कल्पना भि नहि कर सकता, इरावती। तुम् हि मेरी दुनिया हौ। "
इरावती कां दिल थोडा तेज़ धड़कने लगा, औऱ उसने अपना चेहरा उसकीतरफ झुका दिया। "तुमसे मिलकर मुझेलगा कि सभीकुछ सही होँ जाएगा। औऱ अब मे जानती हूं कि कुछ भि होँ, तुम्हारे संगसभी कुछठीक रहेगा। "
अर्जुन नें हल्के सें उसकी ठोड़ी कों पकड़ते हुएकहा, "औऱ मे तुम्हारे संग हूं, इरावती। हमेशा तुम्हारे संग। "
दोनों कि आँखों मे एक् अजीब सि गहराई थि, जैसे दोनों एक्-दूसरे केँ बिना जीने कि कल्पना भि नहि कर सकते थें। येरात उनकेलिए बहोत खास थि, क्योंकि इसरात नें दोनों केँ रिश्ते कों एक् नई दिशा दि थि, जहां प्रेम औऱ विश्वास केँ साए मे उनका भविष्य चमकता हुआनजर आँ रहा थां।
एक् हफ्ता बीत चुका थां, औऱ अबसभी इंडिया केँ लिए निकलने कि तैयारी मे थें। इरावती इस दौरान अपने कमरे मे बैठी हुईँ थि, औऱ उसकेहाथ मे एक् तस्वीर थि – वही तस्वीर, जिसमें करन कां चेहरा थां। वो उसे घूरेजा रही थि, जैसेहर एक् नज़र मे अपने बेटे केँ संग बिताए गएसमय उसेफिन सें जीने कां मौकादे रहेहों। उसके चेहरे पऱ हल्की सि मुस्कान थि, मगर आंखों मे एक् गहरी उदासी थि।
"मे आँ रही हूं, मेरे बच्चे, " इरावती धीरे-धीरे सें अपनी हँसी दबाते हुए बुदबुदाई, जैसे वो करन सें बातकर रही हौ, "मम्मी आकर तुम्हें अपने सीने सें लगा लेगी, तेरेपास, जैसे पहलेकभी मे तेरेपास थि। सभीकुछ ठीक हौ जाएगा, मेरे बेटे। "
वो तस्वीर कों देखते हुए एक् बारफिन सें वोँ सब यादें ताजा करने कि कोशिश कररही थि, जब वो करन कों अपनेपास रखती थि। फिन एक् दिन, सभी कुछछूट गय़ा। वो अपनासभी कुछ छोड़कर चलीआई थि, मगरअब वो वापस लौटने कि कोशिश कररही थि, उस गलती कों सुधारने केँ लिए जौ उसने कि थि।
मगरतभी, अचानक बाहर् सें अरायण केँ चिल्लाने कि आवाजें आईं। इरावती कि सोच अचानक टूट गई। वो डरतेहुए खड़ी हुई औऱ बिना सोचे-समझे दरवाजे कि ओर दौड़ पड़ी। उसे इसबात कां होश भि नहि थां कि उसकेहाथ मे पकड़कर रखेहुए तसवीर केँ कागज पर्र सें स्याही फैलरही थि औऱ वोँ फटकरगिर चुका थां, ज़मीन पर्र बिखर गय़ा थां।
अरायण कि आवाज़ सुनते हि इरावती कि तम्मनाओं नें उसे पूरीतरह सें घेर लिया। उसे ये भि याद नहि रहा कि उसकी ज़रा सि असावधानी सें तस्वीर अबटूट चुकी थि, औऱ वो ज़मीन पऱ गिर गई थि। उसकी आँखों मे अचानक ये ख्याल आया कि अगर वो सही वक़्त पऱ करन केँ पास वापसलौट पाई तोँ क्याँ होगा? क्याँ उसेफिन सें अपनाया जाएगा? याँ वो अब भि वैसे हि अस्वीकार कर दिया जाएगा, जैसा पहलेहुआ थां?
वो बेसुध होकर दरवाजे कि ओर दौड़रही थि, जैसे किसी नें उसे किसी अनजानी ताकत सें खींच लिया हौ। उसकी चप्पलें ज़मीन पर्र बेतहाशा गिररही थीं, मगर उसेकोई फर्क नहि पड़रहा थां। वो बस बाहर् पहुंचने केँ लिए बेताब थि।
"अरायण! क्याँ हुआ?" इरावती तेजी सें बाहर् भागते हुए चिल्लाई। उसकी आँखों मे हल्की घबराहट औऱ बेचैनी थि।
यहा पऱ कुछ सुधार किएगए हें ताकिये वाक्य सही औऱ स्पष्ट होँ:
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इरावती भागते हुए बाहर् आईं औऱ देखा कि काइरा अरायन कों परेशान कररही थि। येदेख इरावती काइरा कों डांटते हुए कहती हें, "तुम् क्याँ कररही हौ?" औऱ अरायन कों अपनेपास खींचती हें। काइरा शरारत सें मुस्कुराते हुए कहती हैं, "मे तोँ बस मज़ाक कररही थि, " मगर इरावती कां ग़ुस्सा बढ़ता जाता हैं। इरावती नें काइरा कों सख्त तरीके सें कहा, "तुम्हारे मज़ाक केँ लिए वो लड़का इतनासहन नहि कर सकता। ये खेल नहि हैं!" फिन इरावती अरायन कि ओर मुड़ती हें औऱ प्रेम सें कहती हें, "क्याँ तुम् ठीक हौ?"
अरायन हल्के सें सिर हिलाता हैं, मगर इरावती उसकी आँखों मे स्पष्ट रूप सें डर औऱ बेचैनी देख सकती हें। वो उसे शांत करने केँ लिए उसके कंधे पऱ हाथ रखती हें। "तुम् कमरे मे जाओ, काइरा!" इरावती नें सख्त आवाज़ मे कहा। "हम् बाद मे बात करेंगे। "
काइरा नाराज होकर मुंह लटकाती हैं, पर्र वो बिनाकुछ कहे कमरे मे चली जाती हैं।
इरावती थोड़ी देर वहीं खड़ी रहती हें, ये सुनिश्चित करने केँ लिए कि काइरा वहां सें जा चुकी हैं, फिन वो धीरे धीरे वापस कमरे मे जाती हें। जैसे हि वो कमरे मे प्रवेश करती हें, उसकी नजरें उन तसवीरों पर्र जाती हें, जौ अबटूट चुकी हें। करण कि तस्वीर, जौ कभी उसकी खुशी कां प्रतीक थि, अब बिखरी हुईँ पड़ी थि। उस दृश्य नें इरावती केँ दिल कों चीर डाला।
वो तस्वीर केँ पास जाती हें औऱ टूटी हुईँ तस्वीरों कों इकट्ठा करने लगती हें। "मैंने इसे केसे होने दिया?" इरावती कि आवाज़ मे दर्द थां। तस्वीर केँ टूटने केँ संग हि इरावती कि आत्मा भि टूट चुकी थि। करण कां चेहरा उसकी यादों मे थां, मगरअब वो मात्र एक् दर्द बनकररह गय़ा थां।
वो जमीन पऱ घुटनों केँ बल बैठकर करण कि तस्वीर कों उठा लेती हैं। उसकी आँखों मे आँसू होते हें, औऱ वो स्वयं कों कसकर कोसने लगती हें, "मैंने तुम्हें छोड़ दिया, करण। मे तुम्हारा संग नहि देपाई। "
वो स्वयं कों क्षमा नहि करपारही थि। काइरा सें पहले हि उलझन औऱ ग़ुस्से मे वो अपने बेटे सें अलग होँ गई थि। अब वो दर्द औऱ पछतावे सें घिरी हुइ थि, औऱ ये सोचने मे बर्बाद हौ गई थि कि उसकी गलती क्याँ थि।
काइरा सें कुछ वक़्त पहले हि वो येसोच रही थि कि शायद उसकेपास अबकोई उम्मीद बची नहि हैं, मगरये तस्वीर, ये दर्द, अब उसके सामने थां। अब इरावती कों लगता थां कि शायदकरण केँ संग हि उसकी सारी
उम्मीदें औऱ जिंदगी कां एक् हिस्सा भि समाप्त हौ गय़ा।
"मैंने तुम्हें खो दिया, करण, " इरावती फुसफुसाती हें।
इरावती कि नज़रें खिड़की सें बाहर् आकाश कि ओर चिपकी हुइ थीं। फ्लाइट कां सफर लंबा थां, मगर उसकी नजरों मे बस एक् हि चेहरा थां — करण कां। उसकी आंखों केँ सामने वही चेहरा घूमरहा थां, जौ कभीउसे अपनी गोदी मे खेलता हुआ नज़रआता थां, जोँ अब एक् अजनबी सां लगता थां, क्योंकि वक़्त केँ संग उसकी यादें भि जैसे फीकीपड़ गई थीं।
कभी उसकी गोदी मे खिलते हुएउस छोटे सें बच्चे केँ नन्हे हाथों नें उसे मम्मी कां एहसास कराया थां। अब वो बचपन कहींखो चुका थां। क्याँ करण कां चेहरा वैसा हि होगा, जैसा इरावती केँ दिल मे थां, याँ फिन वो भि टाइम कि धारा मे बदल चुका होगा? इरावती केँ मन मे तमाम सवालों कां जाल थां। उसकी आँखें किसीखास इमोशन सें भरगईं थीं, औऱ उसे महसूस होँ रहा थां कि कहीं न् कहीं उसकेदिल मे एक् दर्द थां, जौ कभी ख़त्म नहि होँ सकता थां।
वोँ फ्लाइट केँ भीतर अकेली बैठी थि, मगर उसके दिमाग़ मे बसकरण हि थां। यादों केँ जाले नें उसे जकड़ लिया थां। जब वो अपने बेटे सें दूर होँ गई थि, तोँ उसकेदिल मे जोँ खालीपन थां, वो आज भि नहि भरा थां। करण कां चेहरा उसकी आंखों केँ सामने थां, जैसे वो अब भि उसकी गोदी मे खेलरहा होँ, जैसे वो उसे छोड़कर कहीं नहि गय़ा थां।
“क्याँ तुम् अब भि मेरे जैसा दिखते होँ?” इरावती नें अपने आप् सें पूछा, जब उसनेकरण कि टूटी हुईँ तस्वीर कों देखा थां। उसकी आंखों मे आंसू थें, मगर उसने उन्हें रोक लिया। वोँ सोचने लगी, "क्याँ वोँ भि मेरे जैसा हि दिखता हैं? क्याँ उसकी आँखों मे वही दर्द हैं, जौ मेरेदिल मे थां? क्याँ उसने भि मुझेयाद किया?"
उसने सोचा, क्याँ वो लड़काअब बड़ा होँ गय़ा होगा, जैसा वोँ कभी चाहती थि? क्याँ वो वही शांत, गंभीर लड़का थां, जिसकी उसनेकभी कल्पना कि थि, याँ फिन वोँ टाइम केँ संगबदल चुका होगा, जैसासब लोग बदलते हें? उसकी आँखों मे वोँ झलक थि, जोँ एक् माँ कि होती हैं।
वोँ धीरे-धीरे सें मुस्कुराई, "हे ईश्वर, क्याँ मे इतनी बड़ी होँ गई हूं कि अब तुम्हारी यादों कों भि पूराकर नहि पारही हूं?" उसकी हंसी हल्की थि, मगर उसकेदिल कां दर्द बहोत गहरा थां। वो जानती थि कि इस दर्द कों समाप्त करने कां कोई तरीका नहि थां, मगरफिन भि वो उम्मीद करती थि कि एक् दिन वो अपने बेटे कों अपनी गोदी मे फिन सें पाएगी।
फ्लाइट केँ दौरान उसकी सोचों मे अक्सर करण कां चेहरा आता औऱ वो उसे महसूस करती थि। वो सोचती, "क्याँ उसने मेरी यादों कों तहेदिल सें अपनाया हैं, याँ फिन उसने मुझे भुला दिया हैं?" इन सवालों कां कोई उत्तर नहि थां, मगर वो फिन भि अपनेदिल कि सुनने कि कोशिश करती थि।
उसेयाद आया कि जब वो छोटी थि, तोँ अपनी माँ केँ पास बैठकर अक्सर उसीतरह सें ड्रीम्स देखा करती थि। मगरअब उसे अपनी जीवन केँ फैसले पऱ अफसोस थां, जिसने उसे अपने बेटे सें दूरकर दिया। वो सोचती थि कि क्याँ उसकी तन्हाई मे वो कभीऐसा महसूस करेगा, जैसा वो स्वयं महसूस कररही थि।
इतना सोचते-सोचते वो थोड़ी देर केँ लिएचुप हौ गई, मगरफिन उसकी आँखों मे चमक आँ गई, जैसेउसे किसीबात कां अहसास हुआ हौ। उसकी आँखों मे एक् नयी उम्मीद थि। उसने स्वयं सें कहा, "मे उसेहर हाल मे वापस लाऊँगी। वो मुझेकभी नं कभी जरूर मिलेगा। "
वो जानती थि कि उसे अपने बेटे सें मिलने केँ लिए औऱ संघर्ष करना होगा, मगर इसबार वो किसी भि हालत मे हारने वाली नहि थि। ये थां उसका निर्णय।
फ्लाइट कि खामोशी मे, इरावती नें एक् गहरी सांसली औऱ स्वयं कों मजबूत किया। उसकीसोच मे अब एक् नई उम्मीद औऱ संघर्ष कां आलम थां।
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इरावती कि मम्मी कां नाम "संध्या" औऱ भइया कां नाम "अभिषेक" कर दिया गय़ा हैं। अब किस्सा कां अद्यतन संस्करण कुछइस प्रकार हैं:
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जैसे हि फ्लाइट भारत कि ज़मीन पऱ लैंड हुईँ, इरावती कि आँखें भरआईं। उसने खिड़की सें बाहर् झांकते हुए मिट्टी कों देखा औऱ गहरी साँसली। ऐसालगा जैसे उसने अपनीखोई हुईँ ज़िंदगी कों फिन सें पा लिया होँ।
"हम् वापस आँ गए, " उसने धीमी आवाज़ मे कहा।
उसके पिता विक्रम नें मुस्कुराते हुए उसके कंधे पऱ हाथरखा, "हाँ, बेटी। घऱ वापस। यह मिट्टी हमेंफिन सें अपने सें जोड़ेगी। "
इरावती नें अपने भइया अभिषेक कि ओर देखा, जौ हल्की मुस्कान केँ संग उनकी बातचीत सुनरहा थां।
फ्लाइट सें बाहर् निकलते हि इरावती कां दिल तेजी सें धड़कने लगा। हर चेहरा उसेकरण जैसालग रहा थां।
"मां, वोँ देखो, वोँ रहाकरण!" इरावती कि आवाज़ मे एक् मासूम उत्सुकता थि।
संध्या नें उसकीओर देखा औऱ हल्की मुस्कान केँ संगकहा, "बेटी, वोँ करण नहि हैं। इतनी बेसब्र क्यूं होँ रही होँ?"
"मां, मुझेलग रहा हैं जैसे वोँ यहीं आसपास हैं। हर चेहरा मुझेउसी कि याद दिलारहा हैं, " इरावती नें बेचैनी सें कहा।
अभिषेक नें हँसते हुएकहा, "दिदी, हर लड़काकरण केसेलग सकता हैं? थोडा शांतरहो। "
"अभिषेक, मज़ाक मतकरो। मुझेसच मे ऐसालग रहा हैं, " इरावती कि आवाज़ गंभीर होँ गई।
अभिषेक नें समझदारी सें कहा, "ठीक हैं दिदी, होटल पहुँच कर आरामकरो। फिन हम् सभी मिलकर करण कों ढूँढेंगे। "
कैब मे बैठते हि इरावती नें मम्मी सें प्रश्न करना शुरुआत कर दिया।
"मम्मी, क्याँ करण मुझे पहचानने सें इनकार कर देगा?"
"ऐसा क्यूं सोचरही होँ?" संध्या नें हैरानी सें पूछा।
"क्योंकि मैंने उसे इतनेसाल पहले छोड़ दिया थां। क्याँ वोँ मुझसे नफरत करेगा?"
संध्या नें प्रेम सें कहा, "मम्मी-बेटे कां नाता माफी कां नहि होता। यह दिल सें दिल कां नाता हैं। वक्त चाहे कितना भि बदलजाए, ममता हमेशा कायम रहती हैं। "
अभिषेक नें माहौल हल्का करने केँ लिएकहा, "चलो दिदी, यहसभी बातें बाद मे करेंगे। पहले होटलचलो, आरामकरो। "
इरावती नें खिड़की सें बाहर् झाँकते हुएफिन सें एक् लड़के कि ओर इशारा किया, "मम्मी, वोँ करण जैसालग रहा हैं!"
संध्या नें मुस्कुराते हुएकहा, "बेटी, तुम्हारा दिल तुम्हें हर स्थान करण दिखारहा हैं। मगर चिंता मतकरो, जल्द हि तुम्हें असलीकरण सें मिलने कां मौका मिलेगा। "
इरावती नें करण कि तस्वीर निकाली औऱ उसे ध्यान सें देखते हुए बुदबुदाई, "मे आँ रही हूं, मेरे बच्चे। तुम्हारी मां तुम्हें अबकभी अकेला नहि छोड़ेगी। "
अभिषेक नें उसकीओर देखा औऱ हल्की मुस्कान केँ संग पूछा, "दिदी, करण सें मिलने कि कोई योजना हैं?"
"हाँ, मगर पहले मे उसे ढूँढूंगी। चाहेकुछ भि होँ जाए, " इरावती कि आवाज़ मे दृढ़ता थि।
संध्या नें उसेगले लगाते हुएकहा, "सभीसही होगा, बेटी। बस विश्वास रखो। "
मगर इरावती केँ दिल मे बस एक् हि बात थि — करण सें मिलना औऱ उसे अपनी बाहों मे भरना।
होटल केँ गेट पर्र वाहन रुकते हि इरावती नें गहरी साँसली। उनकेदिल मे हलचल थि, मगर चेहरा शांत दिखाने कि कोशिश कररही थि। आर्यन औऱ अरजुन पहले सें हि होटल मे मौजूद थें।
जैसे हि परिवार होटल कि लॉबी मे दाखिल हुआ, आर्यन नें इरावती कि ओर देखा औऱ हल्की मुस्कान केँ संग स्वागत किया।
"आखिरकार आप् सभी आँ हि गए, " आर्यन नें कहा।
"हाँ, मार्ग लंबा थां, " इरावती नें जवाब दिया।
सबके चेहरे पऱ थकान केँ बावजूद राहत कां अहसास थां।
सभी अपना सामान लेकर रूम्स कि ओर बढ़ने लगे। तभी काइरा आर्यन केँ लगभगआकर बोलि, "तोँ जनाब, आजकल बहोत बिज़ी होँ गए हौ। इंडिया आने केँ बादसमय मिलेगा याँ वहीं सें नज़रअंदाज करोगे?"
आर्यन नें हल्के सें मुस्कुराते हुएकहा, "तुम्हारे ताने तोँ यहा भि पहुँच गए। "
काइरा हँसते हुए बोलीं, "तुम्हें ताने सुनने कि आदत डालनी चाहिए। वैसे भि, तुम्हारे चेहरे पऱ क्रोध आनां बहोत प्यारा लगता हैं। "
आर्यन नें अपनी भौहें चढ़ाते हुएकहा, "अगर तुम् चाहती होँ कि मे सीरियस रहूँ, तोँ यह बातें बंदकरो। "
काइरा नें शरारत सें कहा, "तुम्हारी सीरियसनेस औऱ मेरी शरारत कां कोई मुकाबला हि नहि। वैसे, जब सें यहाआए होँ, इरावती आंटीबस तुम्हें हि देखती जारही हें। कहीं तुम्हें करणसमझ तौ नहि रही?"
ये सुनते हि इरावती जोँ थोड़ी दूर खड़ी थि, हल्की-सि चौंकी।
इरावती नें धीरे-धीरे सें काइरा कों डाँटा, "काइरा, यह क्याँ मज़ाक हैं? ऐसे तानेमत मारो। "
काइरा नें मासूमियत सें कहा, "आंटी, मज़ाक हि तोँ कररही थि। वैसे भि, आर्यन कि सीरियसनेस इतनी भारी हैं कि हल्की-फुल्की बातें ज़रूरी हौ जाती हें। "
आर्यन नें इरावती कि ओर देखते हुएकहा, "आप् परेशान मतहों, आंटी। मे काइरा कों झेलने कि आदतडाल चुका हूं। "
इरावती हल्का सां मुस्कुराई औऱ सोचने लगी, अगर मेराकरण यहा होता तोँ शायदकुछ ऐसा हि जवाब देता।
रूम मे पहुँचने केँ बाद इरावती नें द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ गहरी साँसली। उनकी नज़रपास रखीकरण कि तस्वीर पऱ पड़ी जौ टूट चुकी थि। तस्वीर केँ टूटने कां खयालआते हि उनकी आँखों मे आँसूभर आए।
उन्होंने तस्वीर उठाई औऱ उसे हल्के सें सहलाते हुएकहा, "मे आँ रही हूं, करण। तुम्हारी मां आँ रही हैं तुम्हें अपने सीने सें लगाने। पता नहि तुम् केसे दिखते हौ अब। कहीं तुम् मुझसे नाराज़ तौ नहि हौ? क्याँ तुम् मुझे पहचानोगे भि?"
उनकी आँखों सें बहते आँसूइस दर्द कों औऱ गहराकर रहे थें। तभी बाहर् सें हल्की खटपट कि आवाज़ आई।
इरावती नें स्वयं कों सँभालते हुए द्वार (दरवाज़ा) खोला तौ देखा आर्यन खड़ा थां।
"आप् ठीक हें?" आर्यन नें चिंतित होकर पूछा।
"हाँ। बस थोड़ी थकान हैं, " इरावती नें झूठी मुस्कान केँ संगकहा।
"आरामकर लीजिए, आंटी। कल कां दिन भि भारी रहेगा, " आर्यन नें कहा औऱ वापसचला गय़ा।
इरावती नें उसे जातेहुए देखा औऱ फिन तस्वीर कि ओर मुड़कर बुदबुदाई, "तुम्हारी उम्र कां हि हैं, मगरउसे देखकर बस तुम्हारी यादआती हैं, करण। कहीं मेरा बेटा भि ऐसा हि तोँ नहि होगा?"
रात कां डिनर: परिवार केँ बीच उथल-पुथल
होटल केँ बड़े डाइनिंग हॉल मे रात केँ डिनर कां माहौल बहोत खास थां। पूरा परिवार एक् हि टेबल पऱ इकट्ठा थां। हरकोई हल्की-फुल्की बातों मे लगाहुआ थां। काइरा अपनी शरारती मुस्कान केँ संग आर्यन कों चिढ़ाने मे लगी थि, जबकि इरावती केँ चेहरे पऱ एक् अजीब-सि शांति थि।
जैसे हि डिनर सर्व किया जानेलगा, होटल केँ स्टाफ नें एक् शख्स कों डाइनिंग हॉल मे प्रवेश करने कि अनुमति दि। वो शख्स साधारण कपड़ों मे थां, मगर उसकी आँखों मे गहरीसमझ औऱ चेहरे पऱ गंभीरता थि।
"येकौन हैं?" अरजुन नें चौंकते हुए पूछा।
"यह हमारे डिटेक्टिव्स हें, " इरावती नें शांत स्वर मे कहा।
डिटेक्टिव्स कों बुलाने कां निर्णय इरावती कां थां, औऱ ये निर्णय उनके बेटेकरण कि खोज केँ लिए थां। परिवार कों अब तक यही बताया गय़ा थां कि डिटेक्टिव्स इरावती केँ पुराने मामलों पऱ कामकर रहे हें।
डिटेक्टिव नें हाथ मे पकड़ी फाइल टेबल पर्र रखी औऱ गंभीर स्वर मे कहा, "मिस्टर औऱ मिसेज़, हमारी जांच पूरी हौ चुकी हैं। हमें एक् महत्वपूर्ण सुराग मिला हैं। "
इरावती केँ दिल कि धड़कनें तेज हौ गईं। उनकी आँखें डिटेक्टिव पर्र टिकगईं।
डिटेक्टिव नें अपनी रिपोर्ट जारी रखतेहुए कहा, "हमने आपके बेटेकरण केँ बारे मे जानकारी इकट्ठा करतेहुए ये पाया कि वो एक् गाँव केँ आस-पास देखा गय़ा हैं। उस गाँव केँ पास हि एक् पुरानी कब्र मिली हैं, जिस पर्र 'अमर'नाम लिखाहुआ हैं। "
"अमर?" अरजुन नें चौंककर पूछा।
"हाँ, अमर। हमारे पास पुख्ता सबूत हें कि येवही अमर हैं जोँ करण केँ जिंदगी मे किसी महत्वपूर्ण भूमिका मे थां। ये कब्र गाँव केँ ठीक बाहर् स्थित हैं। इससेये संकेत मिलता हैं कि करण वहीं आसपास हौ सकता हैं। "
ये सुनते हि इरावती केँ चेहरे कि रंगत उड़ी हुईँ लगनेलगी। उनकी साँसें रुक-सि गईं। उनकेहाथ कांपने लगे। ऐसा लगरहा थां जैसे किसी नें उनकी भावनाओं कां सैलाब खोल दिया होँ।
"आपका मतलब हैं कि। करणउस गाँव मे हैं?" इरावती नें धीमी, डरी हुई आवाज़ मे पूछा।
"हमें पूरा यकीन हैं, मैम। गाँव केँ लोगों सें मिली जानकारी केँ अनुसार, करण एक् गैराज चलाता हैं औऱ वहीं रहता हैं। "
इरावती नें गहरी साँसली, उनकी आँखों मे आँसू थें। उनकामन एक् हि प्रश्न पूछरहा थां, क्याँ मेरा बेटा मुझे पहचान पाएगा? क्याँ वो मुझे क्षमा करेगा?
इसखबर केँ बाद टेबल पऱ सन्नाटा छा गय़ा। सबकी निगाहें इरावती पऱ थीं। कोई नहि जानता थां कि क्याँ कहना चाहिए।
"मम्मी। आप् ठीक हें?" Aryan नें धीमी आवाज़ मे पूछा।
इरावती नें स्वयं कों संभालते हुएकहा, "हाँ, मे ठीक हूं। बस। मे सोचरही हूं कि करण कैसा होगा। क्याँ वोँ हमें देखेगा तोँ खुश होगा याँ नाराज़?"
काइरा नें माहौल कों हल्का करने कि कोशिश करतेहुए कहा, "aunti आप् करण सें मिलते हि सभीठीक हौ जाएगा। देख्ना, वोँ आपकी बाहों मे झूल जाएगा। "
इरावती नें हल्की मुस्कान दि मगर उनकी आँखों मे अब भि दर्द थां।
इरावती अपने कमरे मे जाकर पलंग पऱ बैठगईं। करण कि तस्वीर उनकेहाथ मे थि। उनकी आँखों मे आँसू थें।
"मे आँ रही हूं, मेरे बच्चे। तुम्हारी मां आँ रही हैं तुम्हें देखने। तुम्हारे गले लगाने। मे जानती हूं कि मैंने तुम्हें
बहोत दर्द दिया हैं, मगरअब औऱ नहि। मे तुम्हें ढूंढ लूँगी। "
उनकी आँखों सें बहते आँसू उनकी ख़्वाहिश शक्ति कों औऱ मजबूत कररहे थें। उनकादिल कहरहा थां कि करण उनसेदूर नहि हैं।
Karan
Who iss the mein character, what iss the use of Aryan, kahani seems disoriented, narration aesa kee every character iss going too fuck Irabati. Arjun and Aryan ,why these characters added.
joo bi hu bhay .woh too h albela .k prakaar kahani likha kisi k bas k baat nahii .ager yeh vahi h too yeh kahani bi mazedar hone wale h
RISTON KE RAKH ( maa beta story) - maa beta story – New Episode
bhay aaryan के prati itna zukao karan के zakhmon पर namak kaa कम karega। or arjun agni mai ghee kaa कम karega। Jisse ira और karan की duriya badhegi। or arjun karan ko galt sabit karega और aaryan के zariye Ira के kareeb hoga। Karan khoonkhar ban jayega। iss liye pahle karan के aaspas kahani rakhe और aaryan से zukao थोड़ा कम dikhe। Isse ira kaa pyaar bata huwaa lagta h। Jabki kahani kaa focus karan पर rakhna चाहिए na की aaryan पर। too अब aapki marji। Isse kahani mai boring part kaa roop aaryan h। or karan ko sex के prati अब badhana shuru kare। Baki aapki marji
RISTON KE RAKH ( maa beta story) - maa beta story - Aage kya hua? Next part padhiye
Ok ko mai samjh gaya.mai bund ker deta ho likhna .kisi doosre site per likh lunga .yeh site aab writers k liye jahanum ban gyee h
bhay ap galt sochna liye hu . Ab aapne itni achchi kahani band kr di upar say koy reason bi nahee diya . phir ap hi socho ham too aapki kahani ko aj bi padh rahe h . Itni achchi kahani ko chod k kya ap khud shmat h
भइया साहबअब ऐसा तौ मतकरो दोस्त इतनालेट एपसोड दोगे क्याँ ।। सब प्रतीक्षा कररहे हैं प्लीज भागदो।।
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