खजाने-की-तलाश (Khazane ki Talash) complete - khazane ki talash - Real Story Continue Part 1
खजाने-कि-तलाश (Khazane कि Talash)
उन तीनों केँ बीचउस समय सें गहरी दोस्ती थि जबवे लंगोटी भि नहीं पहनते थें.उनमें सें शमशेर सिंह अपनेनाम केँ अनुरूप भारी भरकम थां। मगरदिल कां उतना हि कमज़ोर थां। कुत्ता भि भौंकता थां तोँ उसकेदिल कि धड़कनें बढ़ जाया करतीथीं। फिरभी दूसरों पर्र यही ज़ाहिर करता थां जैसे वो दुनिया कां सबसे बहादुर व्यक्ति हैं। बाप मर चुके थें औऱ ख़ुद बेरोजगार थां। यानि तंगहाल थां.
दूसरा दुबला पतला लम्बी हाइट काठी कां रामसिंह थां। इनके भि बाप मर चुके थें। औऱ मरने सें पहले अपने पीछे बहुत रुपया छोड़गए थें। जिन्हें जल्द हि नालाएक बेटे नें दोस्तों मे उड़ा दिया थां। यानीइस समय रामसिंह भि फटीचर थां.
औऱ तीसरा यार देवीसिंह, जिसके पास इतना रुपया रहता थां कि वो आहिस्ता अपनाकाम चला सकता थां। मगर वो भि अपनेशौक केँ कारण हमेशा फक्कड़ रहता थां। उसे वैज्ञानिक बनने कां शौक थां। अतः वो अपना सारा रुपया लाइब्रेरी मे पुराणी औऱ नई साइंस कि किताबें पढने मे औऱ तरहतरह केँ एक्सपेरिमेंट पढने मे लगा देता थां। वो अपने कों प्रोफ़ेसर देव कहलाना मनपसंद करता थां। ये दूसरी बात हैं कि उसके एक्सपेरिमेंट्स कों ज्यादातर नाकामी कां मुंह देख्ना पड़ता थां। मिसाल केँ तौर पऱ एक् बार इन्होंने सोचा कि गोबर कि खाद सें अनाज पैदा होता हैं जिसे खाकरलोग तगडे हौ जाते हें। क्यूं नडायरेक्ट गोबर खिलाकर लोगों कों तगड़ा कियाजाए। एक्सपेरिमेंट केँ लिए इन्होंने मुहल्ले केँ एक् लड़के कों चुना औऱ उसे ज़बरदस्ती ढेर साराभैंस कां गोबर खिला दिया। बच्चा तौ बीमार होकर अस्पतालपहुँचा औऱ उसके पहलवान बाप नें प्रोफ़ेसर कों पीटपीट करउसी अस्पताल मे पहुंचा दिया.
प्रोफ़ेसर देव उर्फ़देवीसिंह कों एक् शौक औऱ थां। लाइब्रेरी मे ऐसी पुरानी किताबों कि खोज करना जिससे किसी पुराना छुपेहुए खजाने कां पता चलता हौ। इसकाम मे उनके दोनों मित्र भि गहरी दिलचस्पी लेतेथे। कईबार इन्हें घरके कबाड़खाने सें ऐसे नक्शे मिले जिन्हें उनहोंने किसी पुराने गडेहुए खजाने कां नक्शा समझा.बाद मे पताचला कि वो घऱ मे बिजली कि वायेरिंग कां नक्शा थां.
एक् दिन शमशेर सिंह औऱ रामसिंह बैठे किसी गंभीर मसले पऱ विचार विमर्श कररहे थें। मामले कि गंभीरता इसी सें समझीजा सकती थि कि दोनों चाये केँ संगरखे सारे बिस्किट खा चुके थें मगर प्यालियों मे चायेज्यों कि त्यों थि। उसीसमय वहां देवीसिंह नें प्रवेशकिया। उसके चेहरे सें गहरी प्रसन्नता झलकरही थि."क्याँ बात हैं प्रोफ़ेसर देव, आज बहुतखुश दिखाई देरहे हौ। क्याँ कोई एक्सपेरिमेंट कामयाब होँ गय़ा हैं?" रामसिंह नें पूछा."शायेद वोँ वालाहुआ हैं जिसमें तुम् बत्तख केँ अंडे सें चूहे कां बच्चा निकालने कि कोशिश कररहे हौ." शमशेर सिंह नें अपनीराय ज़ाहिर कि."यहबात नहीहै। वोँ तोँ नाकाम हौ गय़ा। क्योंकि जिस चुहिया कों अंडा सेने केँ लिए दिया थां उसने उसको दांतों सें कुतर डाला.अब मैंने उस नालायेक कों उल्टा लटकाकर उसके नीचे पानी सें भरी बाल्टी रख दि हैं। क्योंकि मे नें सुना हैं कि ऐसा करने पऱ चूहे एक् ख़ास एसिडउगल देते हें जिसको चांदी मे मिलाने पऱ सोनाबन जाता हैं."
"फिन तुम् दांत निकालनिकाल कर इतनाखुश क्यूं हौ रहे हौ?" शमशेर सिंह नें पूछा.
"बात यह हैं कि इस बारमैं नें छुपा खजाना ढूंढ लिया हैं."
"क्याँ?" दोनों नें उछालने कि कोशिश मे प्यालियों कि चाए अपनेऊपर उँडेल ली। अच्छा यहहुआ कि चाएअब तक ठंडी हौ चुकी थि.
"हाँ। मे नें एक् ऐसा खजाना ढूँढ लिया हैं जौ आठसौ सालों सें दुनिया कि नज़रों सें ओझल थां। अब मे उसको ढूँढने कां गौरव हासिल करूंगा." प्रोफ़ेसर अपनीधुन मे पूरेजोश केँ संगबोल रहा थां.
"करूंगा? यानी तुमनेअभी उसे प्राप्त नहीं किया हैं." शमसेर सिंह नें बुरा सां मुंह बनाया.
"समझो प्राप्त कर हीलिया हैं। क्योंकि मे नें उसके बारे मे पूरी जानकारी नक्शे समेत हासिल करली हैं."
"कहीं वो शहर केँ पुराने सीवर सिस्टमका नक्शा तौ नहीं हैं?"रामसिंह नें कटाक्ष किया.
"ऐसे नक्शे तुम् हि कों मिलते होंगे." प्रोफ़ेसर नें बुरा मानकर कहा, "ये नक्शा मुझे एक् ऐसी लाइब्रेरी सें मिला हैं जहाँ बहोत पुरानी किताबें रखीहैं। पहले तुम् यह पुस्तक देखलो, फिनआगे मे कुछ कहूँगा."कहते हुए देवीसिंह नें एक् पुस्तक उसकी तरफ़ बढ़ा दि। पुस्तक बहोत पुरानी थि। उसके पन्ने पीले होकर गलने कि हालत मे पहुँच गए थें.
"ये पुस्तक तौ किसी अनजान भाषा मे लिखी हैं."
"हाँ। मैंने यह किताबभाषा विशेषज्ञों कोदिखाई थि। उनका कहना हैं कि ये भाषा असमिया सें मिलती जुलती हैं। औऱ ये देखो." कहतेहुए प्रोफ़ेसर नें पन्ने पलटकर एक् नक्शा दिखाया."ये कहां कां नक्शा हैं?"
"यह तौ भारत केँ पूर्वी छोर कां नक्शा लगरहा हैं." रामसिंह नें कहा.
"हाँ। यह भारत केँ पूर्वी छोर कां नक्शा हैं। इसमें असम साफ़ दिखाई पड़रहा हैं.इसका मतलबयह हुआ कि यह पुस्तक असम सें सम्बंधित हैं। औऱ ये एक् औऱ नक्शा देखो। क्याँ तुम्हें ये मिकिर पहाडियों कां नक्शा नहींलग रहा हैं?"
"लग तौ रहा हैं." दोनोंने एक् संगकहा.
"मुझे पूरा विश्वास हैं कि ये खजाने कां नक्शा हैं। जोँ मिकिर पहाडियों मे कहीं छुपाहुआ हैं। क्योंकि मे नें पढ़ा हैं कि वहां पहले एक् सभ्यता आबाद थि। जोँ बाहरी आक्रमण केँ कारण नष्ट होँ गई थि। उसके अवशेष अब भि वहां मिलते हें। वो सभ्यता बहोत धनवान थि। मे नें ये भि सुना हैं कि वहां कां राजा बाहरी आक्रमण सें पहले हि आशंकित थां। इसलिये उसने अपने फरार कां पूरा इन्तिजाम कर लिया थां। औऱ इसी इन्तिजाम मे उसने अपना खजाना एक् गुफा मे छुपा दिया थां। हालाँकि वो फरार नहीं हौ पाया क्योंकि महल केँ एक् निवासी नें गद्दारी कर दि थि। शत्रु राजाने उस राजा कों मरवा दिया किंतु उसे राजा कां खजाना नहींमिल सका। उसकेबाद खजाने कां पता लगाने कि बहोत कोशिश कि गई, किंतु कोई सफलता नहीं मिली."
"तुम्हारे अनुसार उसी खजाने कां ये नक्शा हैं?" रामसिंह नें पूछा.
खजाने कां ये नक्शा हैं?" रामसिंह नें पूछा.
________"हाँ। क्योंकि ये पुस्तक भि उतनी हि पुरानी हैं जितनी पुरानी वो सभ्यता थि। अतः मुझे पूरा विश्वास हैं कि इसमें बना नक्शा उसी खजाने कां नक्शा हैं."
"तोँ अब क्याँ विचार हैं?" राम सिंह नें पूछा.
"ये तौ तुम् हि लोग बताओगे." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"मेरा ख्याल हैं कि हमें खजाना खोजने कि कोशिश करनी चाहिए। हौ सकता हैं किवह हमारे हि क़िस्मत मे लिखा हौ." रामसिंह नें कहा.
"तोँ फिनठीक हैं। तुम् लोगअसम चलने कि तैयारी करो। मे भि घऱ जाकर तैयारी करता हूं। फिनकल परसों तक हम् लोग प्रस्थान करेंगे." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"ओ.केँ। प्रोफ़ेसर। हम् लोगकल रात कि ट्रेन सें निकल चलेंगे। क्योंकि अब खजाना मेरी नज़रों केँ सामने नाचने लगा हैं। अतःअब हमें बिल्कुल देर नहीं करनी चाहिए." शमशेर सिंह बोला.
"ठीक हैं। मगरइस बात कां ध्यान रखना कि यहबात हमारे अलावा औऱ किसी केँ कान मे नहि पहुंचनी चाहिए। वरनावह हमारे पीछेलग जाएगा। औऱ जैसे हि हमखजाना खोजकर निकलेंगे वो हमारी गर्दन दबाकर खजाना समेटकर रफूचक्कर होजाएगा."
"तुम् फिक्र मतकरो प्रोफ़ेसर। येबात हमारे कानों कों भि नं मालुम होगी." दोनों नें एक् संगउसे भरोसा दिलाया
.
इसकेदो दिनबाद वेलोग गौहाटी केँ रेलवे प्लेटफोर्म पऱ खड़े थें। इस वक़्त रात केँ बारहबज रहे थें.
"क्याँ ख्याल हैं? मिकिर पहाडियों तक बस सें चलें याँ किसी औऱ सवारी सें?" प्रोफ़ेसर नें पूछा.
"दोस्त अभि सुभह तक तौ यहींरहो। इस टाइम तोँ मार्ग बहुत सुनसानहोगा." शमशेर सिंह नेराय दि.
"वो स्थान तौ दिन मे भि सुनसान रहती हैं। जहाँ हम् लोगजा रहे हें। क्योंकि वहां सिर्फ खंडहर औऱ जंगल हें." रामसिंह नें फ़ौरन उसकीबात काटी.
"फिन तोँ वहां भूतों कां भि डेरा होँ सकता हैं." शमशेर सिंह नें आशंका प्रकट कि.
"बकवास। मे भूतों परविश्वास नहीं करता। मेरा विचार हैं कि हम् लोगों कों इसी वक्त प्रस्थान कर देना चाहिए। क्योंकि खजाना ढूँढने मे बहोत दिनलग सकते हें। अतः बेकार मे टाइम नष्ट नहीं करना चाहिए." देवीसिंह उर्फ़ प्रोफ़ेसर देवने कहा.
फिन यहीतै पाया गय़ा कि वेलोग उसी टाइम बसद्वारा मिकिर पहाडियों केँ लिए प्रस्थान कर जाएँ.कुछ हि देर मे उन्हें बसमिल गई औऱ वे उसमें बैठगए। इस वक़्त बस मे करीबतीस पैंतीस लोग बैठे थें। ज्यादातर तोँ ऊंघरहे थें। यहलोग भि बैठकर ऊंघने कां कार्य करनेलगे। बस अपनी रफ़्तार सें यात्रा पूरी करने लगी.अचानक बस एक् झटके केसाथ रूक गई। ऊंघने वालेइस झटके सें चौंक पड़े औऱ आँखें फाड़ फाड़कर बस केँ ड्राईवर कि तरफ़ देखने लगे, मानो वो किसी दूसरी दुनिया कां शख्स हौ। होँ सकता हैं येबात कुछ लोगों केँ लिए सत्यरही होँ। क्योंकि वेलोग शायद सपनादेख रहेहों कि उनकी यात्रा किसी रॉकेट पर्र दूसरे ग्रह केँ लिए हौ रही हैं। वैसेइस बारे मे ख्वाब देखने वाले हि बता सकते थें.
जबकुछ देरबीत गई औऱ बस नहींचली तौ वेलोग बेचैन होनेलगे। फिन किसी नें ड्राईवर सें कारण जानना चाहा.
"बस केँ इंजन मे लगता हैं कुछ खराबी आँ गई हैं। मे देखता हूं." उसने खटारा बस कां टूटा फूटा बोनट उठाया औऱ कुछदेर इधरउधर इंजन मे हाथ चलाया.
फिन इंजन स्टार्ट करने कि कोशिश कि। मगर इंजन नें साँस लेने सें साफ इंकार कर दिया.
"क्याँ हुआ? खराबी समझ मे आई?" कंडक्टर नें पूछा.
"कुछ समझ मे नहीं आँ रहा हैं। हमारा क्लीनर भि छुट्टी पऱ गय़ा हैं। वरनावही कुछ करता."
उधर यात्री बेचैन होकरबार बार कंडक्टर औऱ ड्राईवरसे व्हीकल केँ बारे मे पूछरहे थें। कुछ यात्री बस सें उतरकर इधरउधर टहलने लगे.अंत मे कंडक्टर नें कहा,
"अब येबस सुभह सें पहले नहींचल सकती। वैसेयहा सें मिकिर पहाडियां अधिकदूर नहीं हें। जिन लोगों कों वहां जानां हैं वे पैदलजा सकते हें। "
लोगों मे ये सुनकर घबराहट फ़ैल गई। वेलोग जिन्हें सिर्फ मिकिर पहाडियों तक जानां थां, अपना सामान उठाकर चलने कां निश्चय करनेलगे.
"क्याँ विचार हैं? इन लोगों केँ संग निकल लियाजाए याँ सुभह तक रुकाजाए?" रामसिंह नें पूछा.
"मेरा ख्याल हैं कि सुभह तक देख लियाजाए। होँ सकता हैं बसतब तक ठीक होँ जाए। वैसे भि इस वक़्त अंधेरे मे हम् लोग मार्ग भटक सकते हें." शमशेर सिंह नें कहा.
"बस कां ठीक होना तोँ मुश्किल हैं। एक् काम करते हें। सामने दो शख्सजा रहे हें। वेलोग अवश्य पहाड़ियों कि ओरजारहे हें। उनकेसंग होलेते हें." प्रोफ़ेसर नें अपनीराए दि.
"तोँ फिन जल्दआओ। वे बहोत दूर निकलगए हें."रामसिंह नें कहा.फिन वेलोग उन व्यक्तियों केँ पीछेचल पड़े.
खजाने-की-तलाश (Khazane ki Talash) complete - khazane ki talash – New Episode
करीबआधा घंटा चलने केँ बाद एक् आबादी दिखाई पड़ी। जिसमें मात्र सातआठ घऱ थें। शायदयह कोई छोटा मोटा गाँव थां। वे आदमी चलतेहुए एक् घर-मकान मे घुसगए.
"क्याँ यही हें मिकिरपहाडियाँ?" शमशेर सिंह नें पूछा.
"अबे बेवकूफ यहा तोमैदान हैं। पहाडियाँ किधर हें?" रामसिंह नें शमशेर सिंह कों ठहोका दिया.
"किसी सें पूछकर देखते हें." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"तुम् हि पूछो। हमें तोँ यहा कि भाषा आतीनहीं."
फिन प्रोफ़ेसर नें एक् घर-मकान कां द्वार (दरवाज़ा) खटखटा कर वहां केँ निवासी सें इसके बारे मे पूछा तौ पताचला कि मिकिर पहाडियाँ अभि तीन किलोमीटर दूर हें.
"क्याँ यहा ठहरने किकोई व्यवस्था हैं?" प्रोफ़ेसर नें पूछा.
"हाँ। पास हि मे एक् छोटा सां ढाबा हैं। वहांदो तीन लोगों केँ ठहरने कि व्यवस्था होँ सकती हैं." उस शख्स नें ढाबे कां पताबता दिया.यह लोग वहां पहुँच गए.
इस वक़्त ढाबे मे पूरीतरह सन्नाटा छाया थां। ढाबे कां मालिक सामने चारपाईडालकर सोया पड़ा थां.किंतु स्थान केँ बारे मे पूछने पर्र इन लोगों कों निराशा हुईँ। क्योंकि वहां बिल्कुल स्थान नहीं थि.
"अब क्याँ कियाजाए?" शमशेर सिंह नें पूछा.
"अब तौ यही एक् चारा हैं कि अपनासफर जारी रखें.अब मिकिर पहाड़ियों मे पहुंचकर खजाने कि खोज शुरुआत कर देनी हैं." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"तुमने हम् लोगों कों मरवा दिया.ये वक्त तोआराम करने कां थां। अब वहां तक फिनतीन किलोमीटर पैदल चलनापड़ेगा." रामसिंह रूहांसी आवाज़ मे बोला प्रोफ़ेसर सें.
"आराम तोँ वैसे भि नहीं मिलना थां। क्योंकि पहाड़ियों पर्र कोई हमारा घऱ नहीं हैं। अब अपना अभियान चाहे हम् इस वक्त शुरुआत करें याँ सुभह सें, कोईफर्क नहीं पड़ता." प्रोफ़ेसर नें इत्मीनान सें कहा.
फिन वे तीनों आगे बढ़ते रहे। करीब-करीब डेढ़ घंटा चलने केँ पश्चात् उन्हें पहाडियां दिखाई देने लगीं.
"लो यहा तक तौ पहुँच गए, अब किधर चलना होगा?" रामसिंहने पूछा.
"ज़रा ठहरो। मे नक्शा निकाल कर देखता हूं." प्रोफ़ेसर नें जवाब दिया.फिन तीनों नें अपने सामान वहीँरख दिए औऱ हांफने लगे। प्रोफ़ेसर नें अपनीजेब सें वही पुस्तक निकली औऱ पलटकर नक्शा देखने लगा.
"प्रोफ़ेसर, तुमने इतनी कीमती पुस्तक जेब मे रखी थि। अगर किसी नें पारकर ली होती तौ?" रामसिंह नें झुरझुरी लेकरकहा.
"तौ इसे बेकार कि चीज़ समझकर फेंक गय़ा होता। क्योंकि मे नें इसकाकवर उतरकर दूसरा कवरचढा दिया हैं। जिसपर लिखा हैं मरने कां तर्कशास्त्र। अब तर्कशास्त्र सें भलाकिसी कों क्याँ दिलचस्पी हौ सकती हैं."
"तुम्हारी अक्ल कि दाद देनी पड़ेगी प्रोफ़ेसर। अब बताओ कि नक्शा क्याँ कहता हैं?" शमशेर सिंह नें तारीफी नज़रों सें उसे देखा.
"नक्शे केँ अनुसार हमइस स्थान पर्र हें." प्रोफ़ेसर नें एक् स्थान पर्र ऊँगली रखतेहुए कहा."अब हमें बाईंओर बढ़ना होगा."
"क्याँ यह सामान भि लेँ चलना होगा। मेरे कंधे मे तौ दर्द होनेलगा येबैग लादेहुए." रामसिंह कराहकर बोला.
"सामान यहा क्याँ उचक्कों केँ लिए छोड़ जाओगे। मे नें पहले हि कहा थां कि हल्का सामान लो.अब तुम्हें तोँ हर चीज़ कि ज़रूरत थि। चाए बनने केँ लिए स्टोव, पानी कि बोतल, एक् सेरनाश्ता, लोटा, तीन तीन कम्बल औऱ पता नहीं क्याँ क्याँ। मे कहता हूं कि इन चीज़ों कि क्याँ ज़रूरत थि." शमशेर सिंह पूरीतरह झल्लाया हुआ थां.
"मुझे क्याँ पता थां कि यहा पऱ ठण्ड नहीं होती। वरना मे तीन कम्बल नं लें आता। मे नें तोँ समझा कि चूंकि यहा पहाड़ हें इसलिए ठण्ड भि होती होगी."इस स्थान पऱ घुप्प अँधेरा थां। क्योंकि आज अमावस्या थि औऱ ये जंगली इलाका थां। प्रोफ़ेसर नें नक्शा देखने केँ बाद टॉर्च बुझा दि थि.
"दोस्त, कहींकोई जंगली जानवर नं आकर हमें दबोच लें." शमशेरसिंह नें कांपते हुएकहा। अभि उसकीबात पूरी भि नं होनेपाई थि कि धप्प कि आवाज़ आई औऱ सबसेआगे चलतेहुए रामसिंह कि चीख सुनाई पड़ी.
"भ.भागो." शमशेर सिंहने प्रोफ़ेसर कां हाथ पकड़कर खींचा, "हम् पर्र जंगली जानवरों नें हमलाकर दिया हैं."
"र.रुको!" प्रोफ़ेसर नें कांपते हुए कहा, "मे अभि सूटकेस सें अपनी राइफल निकलता हूं."
इससे पहले कि वो सूटकेस खोलकर राइफलनिकलता, शमशेर सिंह नें उसे खींच लिया। औरफिर प्रोफ़ेसर कां भि साहसटूट गय़ा औऱ दोनों पीछे मुड़कर भाग खड़ेहुए। किंतु डर केँ कारण उनकेपेर मानो एक् एक् क्विंटल केँ हौ गए थें। क्योंकिलाख चाहने पर्र भि वे पाँचछह कदम सें आगे नहींबढ़ पाए.फिन वहांगालियों कां तूफ़ान आँ गय़ा। यह गालियाँ रामसिंह केँ गले सें निकलरही थीं.
"ल--लगता हैं रामसिंह पर्र जानवरों कां हमला नहींहुआ हैं, बल्कि कोई औऱ मुसीबत आई हैं.आओ देखते हें." प्रोफ़ेसर नें कहा.फिन दोनों साहस करकेआगे बढे। अचानक उन्होंने कालीरात कि चादर मे दो चमकती हुइ ऑंखें देखीं, औऱ दोनों केँ होशफिन उड़ गए."भ--भूत." दोनों केँ मुंह सें घिघियाती चीख निकली औऱ उन्होंने फिन भागनेका इरादा किया.
तभी रामसिंह कि आवाज़ सुनाई पड़ी, "कमबख्तों, तुम् लोगभाग कहां रहे हौ। ये मे हूं। अब जल्द सेटॉर्च जलाओ."
दोनों कि ये सुनकर जान मे जानआई। फिन प्रोफ़ेसर नें कांपतेहाथों सें टॉर्च जलाकर उसकी रौशनी रामसिंह पऱ डाली। वो ऊपर सें नीचे तक कीचड़ मे लथपथ खड़ा थां.
"ये क्याँ हुआ?" दोनोंके मुंह सें निकला.
"ये तुम् लोगों कि बेवकूफी कां फल हैं। जबइतना अँधेरा छाया हैं तौ टॉर्च जला लेनी चाहिए थि। अब इसअंधेरे मे सामने कां तालाब भला केसे दिखाई पड़ता। उसी केँ कीचड़ मे मे फिसल गय़ा औऱ येगतबन गई."
"टॉर्च तौ तुम्हारे पास भि थि। तुम् नें क्यूं नहि जलाली?" प्रोफ़ेसर नें पूछा.
"टॉर्च तोँ हैं, मगरयहा पहुंचकर यादआया कि उसकासेल डाउन हैं। अबउस टॉर्चकी रौशनी मे सिर्फ खजाना देखने केँ लिए डालूँगा."
"तुम्हें घऱ पर्र हि येसभी बातें अच्छी तरहदेख लेनी चाहिए थीं." शमशेर सिंह नें डपटा.
"कोई बात नहि." प्रोफ़ेसर नें ढाढस बंधाई, "हम् लोग पेशेवर खजाना खोजनेवाले तोँ हें नहि कि हरबात यादरहे। अब मे नक्शा निकालकर ये देखता हूं कि कहीं हम् लोग ग़लत स्थान तौ नहीं आँ गए। क्योंकि आगे तालाब हैं। जिसके कारण मार्ग बंद हैं.".
मे नक्शा निकालकर ये देखता हूं कि कहीं हम् लोग ग़लत स्थान तौ नहीं आँ गए। क्योंकि आगे तालाब हैं। जिसके कारण मार्ग बंद हैं.".अब आगे"नक्शा बाद मे देख्ना। पहलेये बताओकि मेरा क्याँ होगा। क्याँ मे ऐसे हि कीचड़ मे लथपथ रहूँ? मेरा सामान भि कीचड़ मे सन गयाहै." रामसिंह नें कहा.
"तुम् अपना मुंह तोँ तालाब केँ पानी सें धोलो। औऱ कपड़े ऐसे हि पहनेरहो। जबसूख जाएँ तौ सूखी मिटटी झाड़ लेना." कहते हुएप्रोफ़ेसर नें नक्शा निकाला। कुछदेर टॉर्च केँ प्रकाश मे उसे देखता रहाफिन बोला, "नक्शे मे ये तालाब मौजूद हैं। यानि हम् सही रास्ते पर्र हें। अब नक्शे केँ अनुसार हमें दाएँओर मुड जानां चाहिए."
फिनवे दाएँओर मुडगए। प्रोफ़ेसर नें फिन टॉर्च बुझा दि थि। ताकि बैट्री कम सें कम खर्च हौ। अभि उस टॉर्च सें बहोत काम लेना थां। हालाँकि बाकि दोनों इससे सहमत नहीं थें, मगरजब प्रोफ़ेसर नें आगे रहना स्वीकार कर लिया तौ वे भि चुप होगए। औऱ इसतरह अब तीनों कि टोली मे सबसेआगे प्रोफ़ेसर थां.
अचानक प्रोफ़ेसर नें शमशेर सिंह केँ हाथ मे कोई चमकती हुइ वस्तु देखी, "ये क्याँ हैं?" कहतेहुए प्रोफ़ेसर नें शमशेर सिंह केँ हाथ पर्र टॉर्च कां प्रकाश डाला.ये एक् छोटा सां खंजर थां.
"ये मे नें जंगली जानवरों सें बचाव केँ लिए पकड़ लिया हैं। अगरकोई जानवर अचानक हमलाकर देगा तौ उसकापेट इसतरह सें चीरकर रख दूँगा." कहतेहुए उसने खंजरहवा मे लहराया। प्रोफ़ेसर नें जल्द सें अपनासर पीछे खींच लिया वरना खंजर कि नोक नें उसकीनाक कि नोक उड़ा दि थि.
"क्याँ तुम् इसका इस्तेमाल कर पाओगे? क्योंकि तुम्हारा हाथ तौ कांपरहा हैं। कहीं हडबडाहट मे अपने हि न् मार लेना." रामसिंह नें कहा.
"चुप रहो। मे तुम्हारी तरह अनाड़ीनही हूं." शमशेर सिंहने क्रोधित होकरकहा.
फिन प्रोफ़ेसर नें दोनों कों शांत किया। औऱ वेआगे बढ़ने लगे.अब तक सुभह कां उजाला फैलने लगा थां। औऱ चिड़ियों केँ चहचहानेकी आवाजें सुनाई पड़ने लगीथीं। इस समयवे ऐसे रास्ते पऱ चलरहे थें जिसके एक् किनारे पऱ कोई पहाड़ी नदीबह रही थि औऱ दूसरे किनारे पऱ छोटी मोटी पहाडियोंकी एक् श्रृंखला थि। अचानक प्रोफ़ेसर चलते चलतेरूक गय़ा.
"क्याँ हुआ प्रोफ़ेसर?" शमशेर सिंह नें पूछा.
"मेरा ख्याल हैं, ये स्थान आराम करने केँ लिए अच्छी हैं। हम् लोगकुछ देरठहर करइसनदी मे स्नान करेंगे, फिनआगे बढ़ेंगे."
फिन तीनों नें अपने अपने सामान नीचेरखे औऱ नदी कि औऱ बढ़गए। इस वक्तनदी केँ ठंडे पानी नें तीनों कों एक् नई स्फूर्ति दि औऱ उनकीअब तक कि यात्रा कि साड़ी थकानउतर गई। जबवेलोग पानी सें बाहर् निकले तौ पूरीतरह ताज़ादम हौ रहे थें। उन्होंने अपने सूटकेस सें कुछ सैंडविच निकले औऱ ब्रेकफास्ट करनेलगे। रामसिंह नें झोले सें स्टोव निकला औऱ उसपर बहुत बनाने लगा.कुछ देरबाद वेलोग गरमागरम बहुतपी रहे थें.
"इस टाइम रामसिंह केस्टोव नें बहुतकाम किया हैं। हम् लोग बेकार मे उसके स्टोव लाने कि बुराई कररहे थें." शमशेर सिंह नें कहा.
"मुझसे कभीकोई काम ग़लत नहीं होता." रामसिंह नें अकड़कर कहा.
"तुमने सिर्फ़ एक् काम ग़लत किया हैं कि इस दुनिया मे पैदा हौ गए होँ." शमशेर सिंह नें टुकड़ा लगाया.
"औऱ दूसरा ग़लतकाम मैंने ये किया हैं कि तुम्हारे जैसेगधे कों अपनायार बना लिया हैं." रामसिंह नेदांत पीसते हुएकहा.
"ठीक हैं। अब तुम् लोगआपस मे लड़ते रहो। खजाने कि खोज तौ हौ चुकी." प्रोफ़ेसर नें दोनों कों घूरते हुएकहा.
"सोरी प्रोफ़ेसर, बातयह हैं कि हम् लोग कसरतकर रहे थें."
"ये कैसी कसरत? मैंने तौ आज तक ऐसी कसरत नहीं देखी जिसमें लोग झगड़ा करते हें." प्रोफ़ेसर नें आश्चर्य सें कहा.
"ये ऐसी हि कसरत हैं। इसमें मन मज़बूतहोता हैं औऱ अगरहाथ पेर चलाने कि नौबत आँ जाए तोँ हाथ पैरों कि भि कसरत हौ जाती हैं."
"अच्छा अच्छा ठीक हैं.अब अपने अपने सामान उठाओ। हम् लोगों नें बहोत देर आरामकर लिया." प्रोफ़ेसर नें उठतेहुए कहा.तीनों नें फिन अपनी यात्रा शुरुआत कि.
अचानक प्रोफ़ेसर देवने रूककर किसी वस्तु कों गौर सें देख्ना शुरुआत कर दिया."क्याँ देखरहे होँ प्रोफ़ेसर?" शमशेरसिंह नें प्रोफ़ेसर कि दृष्टि कि दिशा मे अपनी दृष्टि दौड़ाई। येकोई घास थि.
"मे उसघास कों देखरहा हूं."
"क्यूं? उसघास मे ऐसी क्याँ बात हैं?" रामसिंह नें हैरत सें पूछा.
"अगर मेरा विचार सहीहै तोँ ये एक् महत्वपूर्ण बूटी हैजिसके बारे मे मैंने किताबों मे बहुतकुछ पढ़ा हैं."
"फिन तौ कबाड़ा होँ गय़ा। क्योंकि अब तुम् यहीं अपनी रिसर्च शुरुआत कर दोगे औऱ खजाना हमारी याद मे पड़ा पड़ासूख कर कांटा होँ जाएगा." रामसिंह नें अपनेसर पर्र हाथ मारते हुएकहा.
"अभि जब मे इस बूटी कां नाम बताऊंगा तोँ तुम् लोग खजाने केँ बाप कों भि भूल जाओगे.ये संजीवनी बूटी हैं जौ मुर्दों मे भि जानडाल देती हैं." प्रोफ़ेसर नें रहस्योदघाटन किया.
"क्याँ?" दोनों उछल पड़े, "तुम्हें केसेपता?"
"मैंने इसकी पहचान किताबों मे पढ़ी हैं। ऊपर कां भाग सफ़ेद होता हैं, बीच कां हरा औऱ नीचे कां कत्थई। यहबिल्कुल वैसी हि घास हैं."
"हाँ। हैं तोँ वैसी। फिरतो हम् लोगों नें एक् नईखोज कर डाली। प्रोफ़ेसर, इसकेकुछ नमूने तोड़कर रखलो.घऱ पर्र इसका अच्छी तरह टेस्ट कर लेना." शमशेर सिंह नें कहा.
"मे यहीं इसका टेस्ट किए लेता हूं."कहते हुए प्रोफ़ेसर नें एक् मुठ्ठी घास तोड़कर अपने मुंह मे रखली। "अभि थोड़ी देर मे इसकाअसर पतालग जाएगा। तुम् लोग थैलों मे इसेभर लो."
वेलोग थैलों मे घास भरनेलगे। कुछदेर मे दो थैलेघास सें पूरीतरह भरगए.अब उन्होंने आगे कां सफर शुरुआत किया.
वे लोग थैलों मे घास भरनेलगे। कुछदेर मे दो थैलेघास सें पूरीतरह भरगए.अब उन्होंने आगे कां सफर शुरुआत किया.,
अब आगे., कुछ दूर जाने केँ बादएकाएक प्रोफ़ेसर नें अपनापेट पकड़ लिया औऱ कराहने लगा.
"तुम्हें क्याँ हुआ?"शमशेर सिंह नें पूछा.प्रोफ़ेसर नें कुछ कहने कि बजाए झाड़ियों कि तरफ़ छलांग लगा दि। फिन झाड़ियों सें इसतरह कि आवाजें आने लगीं मानो वो उल्टियाँ कररहा हौ। औऱ संग हि 'धड़ाक' कि दोतीन आवाजें भि सुनाई दीं.
"इसे क्याँ हुआ? अभि तौ अच्छा खासा थां." रामसिंह नें हैरत सें कहा.
"लगता हैं इसनेघास खाकर अपनापेट ख़राब कर लिया हैं." शमशेर सिंह नें अनुमान व्यक्त किया.फिन कुछदेर बाद प्रोफ़ेसर कि ज़ोर ज़ोर सें कराहने कि आवाजें आने लगीं.
"क्याँ हम् लोग तुम्हारी सहायता कों आयें?" रामसिंह नें चीखकर पूछा.
"आँ जाओ। मुझसे तोँ अबउठा भि नहींजा रहा हैं." प्रोफ़ेसर कि कमज़ोर आवाज़ सुनाई दि। वेलोग झाड़ियों केँ पास पहुंचे औऱ वहां पहुंचकर उन्हें अपने मुंह पर्र रूमाल रख लेना पड़ा। क्योंकि वहां उल्टियों केँ कारण अच्छी खासी बदबू फैली थि औऱ प्रोफ़ेसर औंधे मुंहपड़ा कराहरहा थां। उसका पैंट भि पीछे सें भीगा थां.
खजाने-की-तलाश (Khazane ki Talash) complete - khazane ki talash – New Episode
"मैंने मना किया थां कि यहा अपनी रिसर्च सें बाज़ आँ जाओ, मगर तुम् नहीं माने.अब थोडी हिम्मत करो ताकि हम् लोग तुम्हें यहा सें लेँ चलें." रामसिंहने कहा.फिन दोनों नेमिलकर उसे उठाया औऱ झाड़ियों सें बाहर् लें आए.उसे एक् पेड़ केँ सहारे लिटा दिया गय़ा। फिनउसे पानी पिलाया गय़ा.
"खजाने कि खोज तोँ पाँचछह घंटों केँ लिए कैंसिल हुईँ। क्योंकि जब तक प्रोफ़ेसर ठीक नहीं हौ जाता हम् आगे नहींबढ़ सकते." शमशेर सिंहने चिंताजनक लहजे मे कहा.
"हाँ। इसे तोँ अपनी मूर्खता सें हि छुट्टी नहीं मिलती." रामसिंह नें प्रोफ़ेसर कों घूरा.
"अब कुछ भि कहलो.अब तोँ मूर्खता हौ हि गई.हाय राम। अब तक पेट मे मरोड़ हौ रही हैं। पतानही वो कैसीघास थि। यह कमबख्त किताबों मे भि झूटी बातें लिखी रहती हें." प्रोफ़ेसर नें कराहतेहुए कहा.
फिन तीनों नें वहीँ डेराजमा लिया। चूंकि वेरात भर केँ जागेहुए थें, अतः शमशेर सिंह औऱ रामसिंह कि आँखलग गई। जबकि प्रोफ़ेसर काफ़ी देर परेशान रहा.साम तक प्रोफ़ेसरकी हालत बहुत सुधर चुकी थि, अतः उनहोंने आगे बढ़ने कां निश्चय किया। प्रोफ़ेसर नें अपने कपड़े बदललिए थें.
धीरे-धीरे धीरे-धीरे अँधेरा छानेलगा थां., औऱ जंगली जानवरों कि आवाजें आनेलगी थीं.इन आवाजों कों सुनकर तीनों कि हालत ख़राब होँ रही थि, किंतु ज़ाहिर यहीकर रहे थें कि उन्हें इसकीकोई परवाह नहीं हैं। सबसे ख़राब हालत शमशेर सिंह कि थि। उसकादिल इस वक्त दूनी रफ़्तार सें धड़करहा थां औऱ हाथ मे पकड़ा खंजर करीब-करीब चालीस दोलन प्रति सेकंड कि रफ़्तार सें काँपरहा थां। इसी कम्पन मे उसका खंजर एक् बार रामसिंह केँ हाथ सें छू गय़ा.
"अरे बाप रे, यह किसने मेरेऊपर दांत गड़ादिए." रामसिंह नें घबराकर प्रोफ़ेसर कि दि हुइ टॉर्च जलाई, फ़िर खंजर देखकर उसका पारा फ़िरचढ़ गय़ा, "अबे ये खंजर जहाँ सें निकाला हैं वहीँरख दे वरना जंगली जानवरों कां तौ कुछ नहीं होगा, हम् लोगों कि जान अवश्य चली जाएगी."
मजबूर होकर शमशेर सिंह नें दोबारा खंजर अपनीजेब मे रख लिया। उसने तेज़ तेज़ चलना शुरुआत कर दिया। क्योंकि उसकामूड ख़राब होँ गय़ा थां.
"अरे इतनी तेज़ क्यूं चलरहे होँ। मैंकमजोरी केँ कारणचल नहींपा रहा हूं." देवीसिंह नें कराहतेहुए कहा.
"तौ तुम् धीरे-धीरे आओ। मे तोँ अब खजाने केँ पास हि रुकूंगा." शमशेर सिंह नें पीछे मुडे बिना कहाधीरे धीरे-धीरे शमशेर सिंह कां मूडठीक होता गय़ा। वो सोचने लगा कि रामसिंह नें ठीक हि तोँ कहा थां कि खंजररख लें। उस बेचारे कों तोँ पता हीनही कि मे कितना बहादुर हूं। खैरसमय आने पर्र मालूम हौ जाएगा। उसे किसी कां हाथ अपने कंधे परमहसूस हुआ.
"ओह, तोँ रामसिंह मुझे मनाने आया हैं."उसने कहा, "अरे दोस्त, मे तुमसे ज़रा भि नाराज़ नहीं हूं। मुझेपता हैं कि तुम् मुझे नहीं जानते कि मे कितना बहादुर हूं। मे इसीलिए तेज़चल रहा हूं कि कोई जंगली जानवर पहले मेरेऊपर हमलाकरे औऱ मे उसे परलोक पहुंचाकर अपनी बहादुरी सिद्धकर दूँ."
अब उसे रामसिंह कां हाथ कंधे कि बजाएसर पऱ महसूस होनेलगा थां."अरे दोस्त क्याँ कररहे होँ। मुझे गुदगुदी होँ रही हैं। अच्छा तौ चुपचाप अपनाकाम किया करोगे, कुछ बोलोगे नहि." शमशेर सिंह नेएक झटके सें अपनासर पीछे किया औऱ उसकी सिट्टी पिट्टी गुम होँ गई। क्योंकि पीछे रामसिंह कि बजाए एक् खूंखार गोरिल्ला खड़ा थां.
"अरे बाप रे!" शमशेर सिंह चीखा औऱ आगे कि तरफ़ दौड़लगा दि। गोरिल्ले नें पीछा किया, किंतु उसी वक़्त शमशेर सिंह कों एक् पेड़ऐसा दिख गय़ा जिस पऱ वो आसानी सें चढ़ सकता थां। फिन वो बिनादेर किएउस पेड़ पऱ चढ़ गय़ा। गोरिल्ले नें पेड़ पर्र चढ़ने कि कोशिश कि किंतु फिसलकर गिर गय़ा औऱ फिन खड़ा होकर पेड़ कों हिलाने लगा.
"द.देखो, अगर मे नीचे आँ गय़ा तोँ बहोत बुराहाल करूंगा." शमशेर सिंह नें कांपते हुएकहा। फिनउसे अपने खंजर कि यादआई औऱ उसेजेब सेनिकाल कर गोरिल्ले कों दिखाने लगा, "इसे पहचानते हौ, ये खंजर हैं। अगर तुम् नहि भागे तोँ तुम्हारा पेटचीर दूँगा." उसनेपेड़ पर्र बैठे बैठेकहा.
गोरिल्ला भला शमशेरसिंह कि भाषा क्याँ समझता। वो क्रोधित दृष्टि सें उसकीओर देखरहा थां औऱ शायद आश्चर्यचकित भि थां.क्योंकि इस जंगल मे उसने पहलीबार मनुष्य देखे थें.
उधर रामसिंह औऱ देवीसिंह काफ़ी पीछेरह गए थें। रामसिंह देवीसिंह सें कहरहा थां, "प्रोफ़ेसर ये शमशेर सिंह भि अजीब हैं। कहां तौ वो हम् लोगों केँ पीछेचल रहा थां औरकहाँ इतनीदूर निकल गय़ा कि हम् लोगउसे देख भि नहींपा रहे हें."
"मूडी व्यक्ति हैं। अभि जब जंगली जानवरों कि तरफ़ ध्यान जाएगा तौ ख़ुद हि पलट आयेगा."
तभी उन्हें शमशेर सिंह कि चीख सुनाई दि.
अभि जब जंगली जानवरों कि तरफ़ ध्यान जाएगा तौ ख़ुद हि पलट आयेगा."
तभी उन्हें शमशेर सिंह कि चीख सुनाई दि.अब आगे."ओह, लगता हैं वो खतरेमें हैं। आओ रामसिंह." प्रोफ़ेसर नें कहा औऱ वे आवाज़ कि दिशा मे दौड़ पड़े। फ़िरजब उन्हें शमशेर सिंह दिखाई पड़ा तोँ वो इसदशा मे थां कि गोरिल्ला उसकी टांगपकड़े खींचरहा थां औऱ शमशेर सिंह दोनों हाथों सें पेड़ कि एक् डाल पकड़े चीखरहा थां। खंजर उसकेहाथ सें छूटकर नीचे गिरा पड़ा थां.
प्रोफ़ेसर नें अपनी राइफल निकाल करहवा मे दो फायरकिए। गोरिल्ला चौंककर उनकी औऱ देखने लगा। फ़िर उसने एक् संगतीन मनुष्यों सें मुकाबला करना उचित नहीं समझा औऱ झाड़ियों कि तरफ़भाग गय़ा.
"प्रोफ़ेसर, वो भागरहा हैं। गोली चलाओ वरनायदि वो जिंदा रहा तौ तौ फिन हमें परेशान करेगा." रामसिंह नें कहा.
"गोली केसे चलाऊं। यहतो नकली राइफल हैं औऱ मात्र पटाखे कि आवाज़ करती हैं। इससे तोँ एक् चिडिया भि नहीं मारीजा सकती." प्रोफ़ेसर नें अपनी विवशता प्रकट कि.
"तोँ इसको लाने कि क्याँ ज़रूरत थि। असली राइफल क्यूं नहीं लाये?" रामसिंह नें झल्लाकर कहा.
"उसका लाइसेंस कहां मिलता। औऱ फ़िरये भि तोँ काम आँ गई। वरना गोरिल्ला शमशेर सिंह कां कामकर डालता." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"ठीक हैं प्रोफ़ेसर। वास्तव मे तुम् बहोत अक्लमंद हौ." रामसिंह नें कहा.फिन उनहोंने पेड़ कि तरफ़ ध्यान दिया जहाँ शमशेर सिंहडाल सें चिपटा हुआ आँखें बंदकिए थरथर काँपरहा थां.
"शमशेर सिंह, अब नीचेउतर आओ। हम् लोग आँ गए हें। अब डरने कि कोईबात नहि." प्रोफ़ेसर नें उसे पुकारा.
"क.क्याँ वो गोरिल्लाभाग गय़ा?" शमशेर सिंह नें आँखें खोलते हुए पूछा.
"हाँ। अबऊपर सें उतर आडरपोक कहीं कां। तूँ जिससे डर गय़ा थां वो तौ ख़ुद इतना डरपोक निकला कि हम् लोगों कि शक्ल देखकर भाग गय़ा." रामसिंह नें कहा.
"वो तुम् लोगों कि शक्ल देखकर नहीं भागा थां बल्कि राइफल देखकर भागा थां। इसलिये ज्यादा अपनी बहादुरी मत दर्शाओ." शमशेर सिंह नें उतरते हुएकहा.
"अब तुम् हमारे संग हि रहना। वरनाफिन किसी खतरे कां सामना करोगे." प्रोफ़ेसर नें कहा.
वे लोग उसकेबाद चुपचाप आगे बढ़ते रहे.कुछ दूर जाने केबाद रामसिंह नें कहा, "प्रोफ़ेसर, क्याँ हम् सही रास्ते पर्र जारहे हें?"
"अभि तक तोँ मेरे ख्याल मे सहीजा रहे हें। फिन भि मे नक्शा देख लेता हूं."कहते हुए प्रोफ़ेसर वहीँबैठ गय़ा औऱ जेब सें पुस्तक निकालकर नक्शा देख्ना शुरुआत कर दिया, "हूं। अभि तकतोठीक हि हैं। मगरअब हमें दाएँओर मुड़ना पड़ेगा."
उसकेबाद प्रोफ़ेसर नें फिन नक्शा जेब मे रख लिया औऱ वेलोग दाएँओर मुड़कर आगे बढ़ने लगे.कुछ दूर चलने केँ बाद एकदम सें जंगल ख़त्म हौ गय़ा औऱ सामने पहाडियाँ दिखाई देने लगीं। पहाड़ियों सें पहले एक् बड़ा सां मैदान थां.
"येआगे तौ मार्ग हि बंद हैं। तुमसे नक्शा देखने मे कोईभूल तोँ नहीं होँ गई?" शमशेर सिंह नें पूछा.
"नक्शा तौ मैंने ठीकदेखा थां। फिन भि एक् बार औऱ देख लेता हूं." प्रोफ़ेसर नें दोबारा जेब सें नक्शा निकाला औऱ देखने लगा.नक्शा देखने केँ बाद प्रोफ़ेसर बोला, "नक्शे केँ हिसाब सें तोँ मार्ग इन पहाड़ियों मे होना चाहिए.
"फिन उन्होंने काफ़ी देर पहाडियोंमें कोई मार्ग, कोईदरार इत्यादि ढूँढने कि कोशिश कि, किंतु कहींकोई मार्ग नहीं मिला.
"मेरा ख्याल हैं कि येजगह आराम करने केँ लिए बहुत अच्छा हैं। इस वक़्त आराम कियाजाए, सुभहदिन कि रौशनी मे मार्ग ढूँढा जाएगा."सब प्रोफ़ेसर कि बात सें सहमत होँ गए औऱ आराम करने केँ लिए वहीँलेट गए। जल्द हि सबकोनींद नें आँ घेरा.
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अगलेदिन सुभह उठकरवे लोगफिन पहाड़ियों केँ पास पहुंचे औऱ ध्यान सें उनका निरीक्षण करनाशुरू कर दिया, कि शायद कहीं सें कोई दर्रा इत्यादि दिखजाए जोँ उन्हें पहाड़ियों केँ दूसरी ओर पहुंचा दे। किंतु करीबदो घंटे कि माथापच्ची केँ बाद उन्हें दर्रा तौ क्याँ दरार भि न् दिखी.
"मेरा ख्याल हैं कि हमें पहाड़ियों पऱ चढ़कर इन्हें पार करना चाहिए." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"मगर ये पहाडियाँ तोँ एकदम सीधी हें। इनकेऊपर केसेचढा जाए?" रामसिंह नें विवशता केँ संगकहा.
"यदि अक्ल हौ तौ हरकाम हौ सकता हैं। वो पेडों कि लताएँ देखरहे होँ, " प्रोफ़ेसर नें पेडों कि ओर संकेत किया, "उसे बटकर हम् लोग रस्सी कि सीढ़ी बनाते हें फिन उसके द्वारा इन पहाड़ियों पऱ चढा जाएगा."
"गुड आईडिया प्रोफ़ेसर। हमेंइस कार्य मे देर नहीं करनी चाहिए." शमशेर सिंह नें कहा.फिन वेलोग पेडों कि तरफ़चल पड़े। शमशेर सिंह नें कुल्हाड़ी उठाकर लताओं कों काटना शुरुआत कर दिया औऱ बाकी दोनों उसे बटकर रस्सी बनाने लगे। करीबतीन घंटे केँ परिश्रम केँ बाद उन्होंने काफ़ी लम्बी रस्सी रेडीकर ली थि। प्रोफ़ेसर नें उसकेऊपर एक् हुकलगा दिया.
"अब हम् लोग पहाडी पऱ चढ़ सकते हें." प्रोफ़ेसर नें कहा.
"मगर इस रस्सी कों पहाडी केँ ऊपर केसे फंसाएंगे?" रामसिंह नें पूछा.
"इसकी चिंता मतकरो। मेरेपास इसका भि इलाज मौजूद हैं." कहतेहुए प्रोफ़ेसर नें अपना सूटकेस खोलकर एक् पटाखे वाला रॉकेट निकाला औऱ कहा, "ये रॉकेट इसहुक कों लेकर पहाड़ियों पऱ जाएगा। ये हैं तौ छोटा, किंतुबहुत शक्तिशाली हैं। औऱ इसको मैंने ख़ुद बनाया हैं."
प्रोफ़ेसर नें हुक कों रॉकेट केँ संग बाँध दिया औऱ रॉकेट कि दिशा पहाड़ियों कि ओर करके उसके पलीते मे आगलगा दि। रॉकेटसर्र सर्र कि आवाज़ करतेहुए उड़ गय़ा औऱ पहाड़ियों केँ ऊपर जाकर गिरा। इसके साथही रस्सी मे लगाहुक भि पहाड़ियों केँ ऊपर पहुँच गय़ा। प्रोफ़ेसर नें रस्सी कों दोतीन झटकेदिए किंतु हुक नीचे नहि आया.
"हुक पहाड़ियों पऱ अच्छी तरहफँस गय़ा हैं। अब हम् रस्सी केँ सहारे ऊपर पहुँच सकते हें." उसनेकहा। फिन उन्होंने रस्सीके सहारे ऊपर चढ़ना शुरुआत कर दिया। सूटकेस उन्होंने अपने कन्धों पर्र डाललिए थें। प्रोफ़ेसर उन तीनों मे सबसेआगे थां.
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