खलिश - Desi sex story - Complete Kahani All Parts
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खलिश - Desi sex story – New Episode
अध्याय - 01
"आप् क्याँ लेना मनपसंद करेंगे सर"। मे जौ अपने पुराने ख्यालों मे गुम थां इस सुंदर बला नें मुझे नींद सें जगाया उसके चहरे सें साफपता चलता थां कि वोँ मुझेडर औऱ घ्रंणा सें देखरही थि।.
वैसेकोई भि मुझेइस टाइम देखता तोँ इनदो भावों केँ अलावा तीसरा उसकेमन मे आता भि नहि क्योंकि इससमय सर सें लेकरपैर तक खून केँ छींटों केँ दाग़ मेरे कपड़ों पऱ थें। मेरे दाईंतरफ सें चेहरा पूराखून सें सनाहुआ थां।
"वनकेग वीयर प्लीज़".इतना सुनते हि वोँ वेट्रेस चली गई औऱ मैंने भि अपना सिगरेट कां डिब्बा खोला औऱ एक् सिगरेट सुलगा लीकुछ हि मिनटों मे एक् ट्रे मे वेट्रेस मेरा आर्डर लेकरआई।
आज मे एक् बारफिन इस मयकदा (मयखाने) मे मौजूद थां। औऱ इसकी सिर्फ़ एक् हि वजह थि यही वोँ स्थान थि जौ मुझेचैन केँ दो लम्हा देसकी थि नां तोँ इस दुनिया नें तौ रुसवाई हि दि थि।
आजअगर कोई इंसान.हाहाह इंसान कों छोडोइस दुनिया कों बनाने वाला भि अगरमुझ सें ये पूछता कि मेरी आखरी ख्वाहिश क्याँ हैं तौ मेरादिल चीखचीख करयही कहता कि आज सें ठीक एक् महीने पहले तक कां टाइम मेरी जीवन सें हटजाए।
अभि मैंने उस वीयर केँ मग सें तीन घूंट हि अपनेहलक सें नीचे उतारे होगें कि मेरी नज़रउस कांच केँ गेट पऱ पड़ीउधर सें एक् मेरी हम् उम्र लड़की भीतरआई औऱ अंदरआते हि उसने चारों ओरनजर दौड़ाई औऱ जैसे हि उसकी आंखें मुझसे मिली वोँ बिनादेर किए सीधे मेरेपास आई औऱ पासआकर जैसे हि उसने मेरी हालत देखी तोँ उसकी आंखों सें अनायास हि आंसू बहनेलगे.
"मयंक क्याँ हुआ आपको.आअ्आप यहांइस हालत मे बैठे हें चलिए हमारे संग.चलिए भि खुदा केँ लिएआज तोँ हमारे कहे लफ्ज़ों कां मान रखें.".औऱ मे तौ उसकेउन आंसूओं कों देखरहा थां। जोँ उसकी नीली आंखों सें बहकर गालों सें बहतेहुए मेरेहाथ पऱ गिरेतब होशआया वोँ मुझे उठाने कि कोशिश कररही हैं वोँ भि कुछइस तरह कि मे कोई घायल हूं औऱ उसकेइस तरहजोर लगाने सें मेरेलग नां जाए।
"इस मग कों खाली होनेदो फिन चलते हें"। सिगरेट कां कश लगाते हुए मैंने कहा।.उसने पहले मेरी सिगरेट हाथ सें निकाली औऱ मुझेनजर भर देखा.उसकी नीली आंखों नें जल्दी अपनाअसर दिखाया।
मैंने भि अपना जिस्म ढीला छोड़ा औऱ उसकेकहे अनुसार चलनेलगा पऱ उससे पहले मैंने अपनी जीन्स मे हाथ डाला औऱ अपना पर्सउस वीयर केँ ग्लास केँ बगल सें रख दिया।
वोँ मुझे अपनेसंग इसवार सें बहार लें गई औऱ मुझे सबसे बहार वालेगेट केँ बगल सें लगी टेबल पऱ बैठाया औऱ स्वयं दौड़ते हुए पार्किंग मे जाकर अपनी जिप्सी लेकरआई जिस पऱ बड़े बड़े अक्षरों मे लिखा थां म.प्र पुलिस खेर सायरन बजती वोँ कारठीक मेरे सामने रुकी औऱ जैसे हि वोँ उतरकर मेरेपास आनेलगी तौ मैंने उसेहाथ केँ इशारे सें रोका औऱ स्वयं लड़खड़ाहट केँ संगआगे बढ़ते हुए ड्राइविंग सीट केँ बगल वालीसीट पर्र आँ बैठा।
"आपकोयह चोट केसे लगी.औऱ आप् इतने टाइम सें कहां थें?".
"कर चुका हूं मे बंद कश्ती कां वोँ सुराख
पर्र आज अपनीजान बचाने कां मन नहि,
इकरोग हैं जोँ तुझ कों बताना नहि कभी
इक जख्म हें जोँ तुझको दिखाने कां मन नहि। "
.उसके प्रश्न कां ज़बाब दिया मैंने।
औऱ इतनीदेर मे पहलीबार उसने मुझेघूर कर देखा बिनाकुछ कहे सायरन बंद किया औऱ वाहनआगे बड़ा दि।
खलिश - Desi sex story – New Episode
अध्याय -02
7 महीने पहले.
महर्षि पाणिनि इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस
( ******, मध्यप्रदेश )
" पंडत साले जीवन मे देखी हैं इतनी बड़ी बिल्डिंग ".मेरीपीठ पर्र हाथ जड़ते हुए मेरे इकलौते मित्र.नां नाँ नाँ.मित्र नहि अपनीजान सें भि प्यारे भइया नें मुझसे कहा।
"चल भीतर चुपचाप.औऱ पहले हि कहरहा हूं मार पड़ी तोँ बचाने खातिर नां आने वाला मे ध्यान राखिए"। मैंने आगे बढ़ते हुएकहा।
" रे पडंत तोँ पहलाऐसा चूतिया पडिंत हैं जौ पूजा करने सें पहले हि अपशगुन कहके खत्मकर देता हैं.अभि पहलापेर भीतररखा नाँ औऱ तूनेमार पहले पडवा दि ".मुंह बनाते हुए राजीव नें मुझसे कहा।
नाँ चाहते हुए भि मेरे चहरे पर्र एक् मुस्कान आगईऐसी चुतियापंती पऱ.पर्र मैंने उससेकुछ कहा नहि औऱ आगेबढ़ गय़ा।
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"सरयह पी.सि.एस केँ न्यूबैच कि क्लासेस किसरुम मे लगती हैं बताएंगे".एक् 40-45 साल केँ आदमी जौ एक् शिक्षक जैसेलग रहे थें उनसे हमने पूछा.अब हम् दोनों पहलीबार इस कोचिंग मे आए थें। औऱ तौ औऱ इतनी बड़ी कोचिंग मे पहलीबार हि देखरहा थां अपनी क्लास केँ बारे मे नाँ पता होने केँ चलते हमने सहायता लेना हि मुनासिब समझा।
पता नहि गुरुजी कों क्याँ हुआ जौ अपनी उंगली उठाई हम् दोनों कि तरफकरी। बगेर पीछे मुडे हि अपने पीछे कि ओर उगली कां इशारा कियाउसी कों दाएं मोडाफिन सीधी कि फिन बांए मोडा औऱ आगेबढ गए अपने रास्ते।
"रुकजा भो*डी केँ क्याँ कररहा हैं".करीब-करीब हवा मे राजीव कों पकड़ते हुए मैंने कहा जैसे हि गुरु अपने रास्ते हुए राजीव नें पहले अपनाहाथ माथे पर्र रखा एक् सेकेंड सोचा औऱ एकदम सें उनसर कि तरफ भागा जैसे एक् मुक्के मे उनकी जिंदगी लीला ख़त्म कर देगा।
"छोड पंडत.अगर हम् इस स्थान कों इतने अच्छे सें हि जानते कि उंगली केँ आधे अधूरे इशारों सें समझ जाते तोँ अबतक क्लासरूम मे नाँ होते".अपने आप् कों छुड़ाते हुए राजीव नें मुझसे कहा।
"कोई नां चलआजा चक्रव्यूह थोड़ी हैं मिल जाएगी क्लास"। मैंने उसे शांत करतेहुए कहा। जैसे तैसे क्लास मिली।
" मैआईकम इन टीचर "। मैंने औऱ राजीव नें क्लास केँ दरवाजे पऱ आतेहुए कहा.अरे क्लास मे तौ टीचर हि नाँ हैं मेरेकान केँ पास खुशपुशाते हुए राजीव नें कहा।
"बेटा आप् दोनो हि लेट हें.आइए भीतरकोई बात नहि पऱ आगे सें ध्यान रखेंइस बात कां ".क्लास केँ पीछे कि ओर सें बढी हि मीठी आवाज़ आई। बहोत हि शालीन दिखने वाली लगभग 33 केँ आसपास कि टीचर नें हमारी तरफ मुस्कुराते हुएकहा
औऱ हम् दोनों हि चुपचाप खाली स्थान देखकर बैठगए।
एक् केँ बाद एक् टीचरआए औऱ सबका परिचय लिया औऱ चलेगए
माहौल बहुतसही थां क्लास कां जिसमें नये स्टूडेंट थें औऱ इसी केँ बगल मे रिपीटर्स कि क्लास लगती थि। औऱ ये इतनी बड़ी बिल्डिंग थि मानोकोई कोलेज होँ इस संस्था मे सब राज्य स्तरीय परीक्षाओं कि तैयारी कराई जाती हैं औऱ सब केँ दो क्लास रूम एक् फ्रेस्सर औऱ एक् रिपीटर्स कि थि औऱ हमेंरोज यहां 7 क्लासेस लेनी होती थि जोँ कि करीब 45 मिनट कि हुआ करती हैं।
सभी टीचर्स कां पढ़ाने कां अंदाज अलग थां। पहलेदिन हमनेसभी क्लास लीं औऱ बहार कि ओरचलदिए आज राजीव भि मेरेसंग मेरेरुम पर्र जाने वाला थां। वैसे तोँ राजीव मेरेशहर सें हि थां औऱ बचपन सें हि मेरेसंग रहा पऱ पिछले हि महीने उसके पापा कां तबादला इसशहर मे हौ गय़ा थां। औऱ यही वोँ एकमात्र वजह थि जिसके कारण मे अपनेशहर सें 556 कि.मीदूर यहां अपने एक् सिर्फ लक्ष्य MPPSC केँ लिए आँ सका थां। चूंकि राजीव कां परिवार एक् सरकारी घऱ मे रहता थां जौ उसके परिवार केँ लिए पर्याप्त थां पर्र बहार कां कोईउस घऱ मे नहि रह सकता थां। वैसे तोँ अनिल अंकल (राजीव केँ पापा) नें मुझसे बहोत जिद कि उनकेसंग रहने कि पऱ मुझेसही नहि लगा औऱ तोँ औऱ मेरे पिताजी नें भि अलग रहने कि सलह दि उनका मानना थां कि मे एक् नालायक हूं जोँ राजीव केँ परिवार कों केवल परेशान हि करूंगा हाहहाहा.
वैसे तोँ बड़े शहरों मे एक् रूम ढूंढना बहोत आसान होता हैं औऱ ऐसा थां भि पऱ जब भि घर-मकान मालिक मेरे पहचान पत्र मे मेरेशहर कां नाम पढता तोँ मुझेरुम देने सें साफसाफ मनाकर दिया जाता (सत्य घटना पर्र आधारित )। अमूमन ऐसा होता नहि कि 550 km दूर होने केँ बाद भि आपके कस्बे कां किसी नें नाम भि सुना होँ औऱ यहां हमेंरुम भि नहि मिलता।
खैर अनिल काका नें हि मेरेलिए रुम कां जुगाड किया जौ कि एक् बहोत हि अच्छे इलाके मे थां। औऱ राजीव केँ घऱ सें 3 कि.मी.दूर थां। तोँ आज राजीव मेरेरुम कों हि देखने जारहा थां।
जब हम् दोनों अपनी कोचिंग कि तीसरी मंजिल सें नीचेउतर रहेतब हि एक् लडकी नीचे सें मोबाइल पर्र बात करतेहुए आँ रही थि। अब चूंकि सीढियां कि चौड़ाई ज़्यादा नहि थि औऱ उसका ध्यान बिल्कुल भि सामने कि ओर नहि थां मे जानता थां उसको मुझसे टकाराना हि हैं राजीव मेरेठीक पीछे आँ रहा थां मे एक् स्थान रुक गय़ा औऱ राजीव पीछे सें टकरा गय़ा।
" रुक क्यूं गय़ा पडंत "। राजीव कां इतना हि बोल्ना थां कि वोँ लडकी कां ध्यान भि मेरीओर गय़ा पऱ उसका पांवजब आगे बढ़ने केँ लिए सीढी पर्र पड़ा तोँ वोँ पेरठीक पांव पर्र रखा क्योंकि जब उसका ध्यान मेरीओर आयातब तक वोँ मुझसे ठीक एक् सीढी नीचे थि औऱ जब उसको एहसास हुआ कि उसका पांव मेरेपेर पर्र हैं वोँ मुझसे टकराई उसका संतुलन बिगड़ा औऱ वोँ पीछे कि ओर घिरने लगी जैसे हि उसकाहाथ हवा मे लहराया.नाँ चाहते हुए भि मैंने उसकाहाथ पकड लिया औऱ झटके केँ संग अपनीओर खींचा जिससे उसकासर मेरी चेस्ट सें टकराया वोँ सीधी तौ खडी हुई पर्र जल्दी हि उसकाहाथ अपनेसर पर्र गय़ा उस स्थान कों सहलाते हुए उसने बोला
"हाथ छोडो मेरा बत्तमीज कहीं केँ शरम नहि आती".तब मुझे एहसास हुआ उसका एक् हाथअब भि मेरेहाथ मे हैं मैंने जल्दी उसकाहाथ छोडा।
"देख कर नहि चल सकते लडकी देखी नहि हौ गए शुरुआत सारे लड़के एक् जैसे हि होते हें हटो !".एक् समय केँ लिए तोँ मेरे दिमाग़ मे आया कि मोहतरमा माना 2003 वर्षचल रहा पऱ येकोई अमेरिका नहि जोँ आप् ऐसे अंग्रेजों जैसे कपड़े पहनेघूम रहीं हें औऱ मेरे किरदार पर्र उंगली उठा रहीं हें।
"अब क्याँ सोचरहे हौ गेटआऊट ऑफमाई वै"। मे जल्दी हि तिरछा हुआओर राजीव भि औऱ वोँ सीढियां चढ़ते हुए जानेलगी औऱ जाते जाते भि उसकी एक् अवाज मेरेकान मे पडी.
"पहाड़ कहीं कां"
अभि मे कुछसोच रहा थां कि मुझे अपने परममित्र कि हसने कि आवाज़ आई जौ कि अपनी बत्तीसी इसतरह दिखारहा थां माने इसके हसने कि बाद दुनिया समाप्त होँ जाएगी।
मयंक - "हस क्यूं रहा हैं। यहांकौन सां कार्टून दिखरहा हैं"। मैंने उसकेपीठ मे हाथ जमाते हुएकहा।
" तूँ हैं तौ साले कार्टून.देख साले अपना मुंहदेख कैसा होँ गय़ा हैं एक् अवाज भि नहि निकली तेरीउस लडकी केँ सामने। मुझसे कहरहा थां मार पड़ी तोँ बचाने नहि आएगा अभि वोँ तेरीमार करचली गई। वैसेकह तौ ठीक हि रही थि पहाड़ हाहाहा."
मयंक - "मैंने तोँ उसको बचाया साले औऱ मुझे बत्तमीज बोलरही थि स्वयं लड़कों केँ कपड़े पहनेघूम रही हैं। "
राजीव - "भइयाऐसा कुछ नहि हैं बता कहां लिखा हैं कि जीन्स केवल लडकेपहन सकते हें। ऐसे तोँ साले तूने जीन्स नहि पहना तोँ तूँ लडका नहि हैं क्याँ "। राजीव औऱ मे बात करते करते नीचेउतर चुके थें औऱ मैंनरोड कि ओरजारहे थें।
"मैंने ऐसा नहि कहा कि येगलत हैं पऱ थोडा अजीब नहि हैं कि लडकीऐसे घूम रहीं हें.औऱ वैसे भि लडकी अपनेदेश केँ परिधान मे कितनी सुन्दर लगती हैं तोँ इनसभी कि जरूरत हि क्याँ हैं.चल छोडये सभी "
। मैंने राजीव कि बात समझते हुएकहा अब राजीव नें 4 नंबर वाले टेम्पू कों रोका औऱ हम् दोनों उसमें बैठे।
कल तोँ मे राजीव केँ घऱ हि सोया थां पर्र आज मुझे राजीव मेरेरुम लेँ जाने वाला थां क्योंकि काका नें रुम कां एड्रेस तोँ दे दिया थां पऱ मे तौ इसशहर सें अंजान थां। तोँ ये डिसाइड हुआ कि आज क्लास केँ बाद राजीव मुझे मेरारुम दिखायेगा।
लगभग 25 मिनट केँ सफर केँ बाद हम् एक् चौक पऱ उतरे औऱ दाईंओर जाने वालीसडक पर्र चलतेहुए 7th घऱ हि वोँ थां जहां मुझे रहना थां येदो मंजिल घऱ थां।.जब हमनेउस घऱ कों देखा तोँ बहार एक् छ:फुट कि दीवार थि औऱ मेरे कंधे सें थोडा ऊंचा दरावाजा जिसेखोल कर हम् अंदरआए तौ एक् बगीचा थां जौ अधिकबडा नहि थां पऱ बहुततरह केँ फूल औऱ पौधे मौजूद थें उस बगीचे केँ बीच सें जाती सीमेंट कि पट्टी सें हम् घऱ केँ भीतर जाने वाले दरवाजे पर्र पहुंचे तौ राजीव नें वेल बजाईकुछ देरबाद एक् 40 साल केँ आसपास केँ शख्स नें दरवाजा खोला औऱ जैसे हि उसकीनजर हम् पऱ पड़ी तोँ वो बोले
"क्याँ मे आपको जानता हूं बरखुरदार ".
राजीव - "नमस्कार अंकल हम् यहांरुम पऱ रहनेआए हें दोदिन पहले हि मेरे पापा नें आप् सें बात कि होगी। "
"ओह्हह तोँ अनिल नें भेजा हैं तुम् दोनों नें आओ भीतरआओ"।.पहचाते हुए अंकल नें कहा औऱ एक् मुस्कान केँ संग हमें मार्ग दिया.
"रोमाजी.बहारआइए जरा ".अंकल नें हाॅल मे आतेहुए कहा औऱ हमें सामने वाले बड़े सोफे पर्र बैठने केँ लिएकहा औऱ स्वयं भि छोटे वाले पर्र बैठगए कुछदेर केँ बाद हि एक् आंटीजी एक् साड़ी मे बहारआई औऱ बोलि.
रोमा आंटी - "जी कहिए.अरे ये दोनोकौन हैं महमान आने वाले हें औऱ आपने बताया भि नहि"। आंटी नें हमेंदेख कर चौंकते हुए पूछा
"ये कोई महमान नहि हैं ये दोनो यहां पेएंग गेस्ट हें मैंने आपको बताया थां नां अपना दूसरा फ्लाॅर खाली हैं तौ वहीं रहेंगे ये दोनों अनिल नें इन दोनों बच्चों केँ लिए हि बोला थां।.औऱ भला हम् हाॅम मिनिस्टर कि परमिशन केँ बिनाकुछ कर सकते हें "। अंकल नें हसतेहुए कहा।.उनकी बात सुनकर हम् दोनों केँ चहरे पऱ भि मुस्कान आँ गई।
आंटी -"बेटा आप् दोनों इनकी बातों कों छोडो मे आप् दोनो केँ लिएकुछ खाने केँ लिए लाती हूं"
"अरे मैडमजी अब स्नेक्स कां समय नहि हैं लञ्च कां समय हैं खानां लगाओ। अनिल नें बताया थां ये दोनों क्लास लेकर सीधे यहां आएंगे"। अंकल नें कहा
कुछ हि देर मे हम् दोनों अंकल केँ संग टेबल पर्र थें औऱ आंटी हमें खानां परोसरही थि।
"बेटा आपने अपनानाम तौ बताया हि नहि अब बिना पहचान केँ तौ रहने कां इरादा नहि हैं आप् दोनो कां "। आंटी नें खानां परोसते हुएकहा।
राजीव - "आंटी मेरेनाम राजीव गोहिल हैं औऱ ये मेरा साथी हैं मयंक शर्मा औऱ हम् दोनों यहां नहि रहेंगे केवल मयंक हि यहां रहेगा"
राजीव नें निवाला तोड़ते हुएकहा।.
" अच्छा तौ तुम् अनिल केँ लड़के हौ.औऱ मयंक केँ लिए उसने मुझे पूछा थां। "। अंकल नें मुस्कुराते हुएकहा।
"बदन सें तोँ पहलवान मालूम पडते होँ बरखुरदार."। अंकल नें मुझसे मजाक करतेहुए कहा।
"नहि अंकल वोँ तौ घऱ मे हि अखाड़ा थां तौ बसऐसे हि बाकी मे तौ यहां पी.सि.एस केँ लिएआया हूं"। मैंने जबाब देतेहुए कहा।
"अनिल नें बताया थां बैटा तुम्हारे बारे मे.इनकी तोँ आदत हैं मजाक करने कि अधिक ध्यान मत देना इनकी बातों पर्र.लगता हैं तुम् अनिल केँ रिश्तेदार हौ "। आंटी नें मुस्कुराते हुएकहा।
राजीव -"नहि आंटी मेरे बापू औऱ शर्मा अंकल तोँ बचपन केँ साथी हैं जैसे मे औऱ मयंक हैं"
अंकल - "मयंक तुम्हारे पिताजी कां नाम विष्णु शर्मा हैं नाँ?"
"जी अंकल पऱ आपको केसेपता"। मैंने थोडा चौंकते हुए पूछा
"बेटा मे औऱ अनिल (राजीव केँ पिता) सहकर्मी हैं औऱ एक् हि बैच सें हें ट्रैनिंग केँ बादजब मे तुम्हारे शहर अनिल केँ संगआया थां तब हि मिलना हुआ थां विष्णु सें भले हि बातहुए वक्त हौ गय़ा होँ पर्र उसका व्यक्तित्व आज भि याद हैं मुझे "। अंकल नें मेरीपीठ थपथपाते हुएकहा.
"वैसे भि पापा कोई भूलने वालीचीज थोडी हें"। मैंने अपनेमन मे सोचा।
अबतक हम् सभी खानां खा चुके थें औऱ वापस हाॅल मे बैठे थें आंटी बर्तन रसोई मे रखने गई थि।
"अब अनिल कां तबादला पिछले महीने यहांहुआ मेरेजगह पऱ औऱ मेरा **** शहर मे तौ तुम्हारी आंटी औऱ मेरी बेटी यहां अकेली होँ गई औऱ अभि कुछदिन पहले हि अनिल मुझसे जिक्र किया थां रुम केँ लिए औऱ मैंने पूछा किसके लिए चाहिए तोँ बताया भतीजे केँ लिए तोँ मैंने सोचाअब यहांकोई अपना जान-पहचान कां रहे तोँ ठीक हैं वैसे भि इतने बड़ेघऱ मे तीनलोग थें औऱ अबदो हि रहगएअब मयंक यहां होगा तौ मे भि बिना किसी चिंता केँ ड्यूटी कर पाऊंगा."। अंकल नें बातआगे बढ़ाते हुएकहा।
आंटी-"ठीक कहा आपने वैसे भि मयंक विष्णु भइया साहब कां लडका हैं जिन्हें आप् जानते हें तौ हमारे लिएठीक हि हैं"
अंकल - "हां बिल्कुल रोमा मुझे यकीन हैं मयंक भि विष्णु कि तरह हि होगा तोँ तुम्हें घबराने कि जरूरत नहि हैं अपना हि बच्चा समझना"
उसकेबाद मैंने औऱ राजीव नें अपनारूम देखा जोँ कि दूसरी मंजिल पर्र थां जहांदो औऱ कमरे थें वोँ भि बंद थें मेरे हि रूम मे अटेच बाथरूम थां।
सभी देखने केँ बाद हम् वापिस राजीव केँ घऱगए औऱ वहां सें मैंने अपना सामान लिया औऱ उधर सें राजीव कि बाइक पऱ आए सामान जमाते हुएसाम होँ गई जब तक अंकल भि अपने ड्यूटी वालेशहर जा चुके थें हमसे मिलकर। फि
र राजीव नें मुझेआस पास कां थोडा बहोत एरिया दिखाया जैसे पार्क औऱ सामान केँ लिए स्टोर बगैरा उसकाघऱ 3 km दूर थां यहां सें पऱ उसकोपता थां यहां केँ बारे मे सभी देखने केँ बाद वोँ मुझेघऱ केँ बहार छोडकर अपनेघऱ चला गय़ा।.
खलिश - Desi sex story - Next part mein bada twist
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