गाँव का राजा (Completed) - Gaon Ka Raja - Latest Update 1
गाँव कां राजा (COMPLETED)
हेलो दोस्तो मे एक् औऱ नईकथा गाँव कां राजा लेकर हाजिर हूं दोस्तो कथा कैसी हैं यह तौ आप् हि बताएँगे दोस्तो
गाओं कां माहौल बड़ा हि अज़ीब किस्म कां होता हैं। वेहा एक् ओर तौ सभी कुच्छ ढका छुपा होता हैं तोँ दूसरी ओर अंदर हि अंदरऐसे ऐसे कारनामे होते हैं कि जानजाओ तोँ दन्तो तले उंगली दबालो। थोडा सां भि झगड़ा होने पर्र लोगऐसी मोटी मोटी गलिया देंगे मगर, अपनीबहू बेटियो कों दोगज कां घूँघट निकालने केँ लिए बोलेंगे। फिनयही लोग दूसरो कि बहू बेटियों पर्र बुरी नज़र रखेंगे औऱ ज़रा सां भि मौकाअगर मिलजाए तोँ अपने अंदर कि सारी कुंठा औऱ गंदी वासना निकाल देंगे। कहने कां मतलबयह कि गाओं मे जौ यहदबी छुपी कामुक भावनाए हैं वोँ विभिन्न अव्सरो पऱ भिन्न भिन्न तरीक़ो सें बाहर् निकलती हैं। खेत, खलिहान, आमो कां बगीचा आदिकई ऐसी जगहे हैं जहा पऱ छुपछुप केँ तरहतरह केँ कुकर्म होते हैं कभी उनकापता चल जाता हैं कभी नहींचल पाता। गाओं केँ बड़े बड़ेघरो केँ मर्द तौ बकाएदा एक् आध रखैले भि रखते हैं, जिनकी रखैल नाँ हौ उनकी इज़्ज़त कम होती थि। यहअलग बात हैं कि इन बड़ेघरो कि औरते पयासी हि रह जाती थि क्यूं कि मर्द तौ किसी औऱ हि कुंआ कां पानीपी रहा होता थां। दूसरो केँ कुए कां पानी पीने केँ बाद अपनेघऱ केँ पानी कों पीने कि उनकी ख़्वाहिश हि नहीं होती थि। औऱ अगर किसीदिन पी भि लिया तोँ उन्हे मजा नहींआता थां। इन औरतो नें भि अपनी प्यास भुझाने केँ लिएतरह तरह केँ उपाएकर रखे थें। कुच्छ नें अपने नौकरो कों फसारखा थां औऱ उनकी बाँहो मे अपनी सन्तुस्ति खोज़ती थि कुच्छ नें चोरी छुपे अपने दोस्त बनारखे थें औऱ कुच्छ यू हि दिनरात वासना कि आग मे जलकर हिस्टीरिया कि मरीज़ बन चुकी थि। खैरयह तोँ हुआ गाओं केँ माहौल कां थोडा सां परिचय। अब आपको गाओं कि हि एक् बड़ेघऱ कि किस्सा सुनाता हू। वैसे तोँ सबसमझ गये होंगे कि यह गाओं कि कोई वासनात्मक किस्सा हैं, फिन इसको बताने कि क्याँ ज़रूरत हैं जब इसमे कुच्छ भि नया नहीं हैं, तोँ दोस्तो इसमे बताने केँ लिए एक् अनोखी बात हैं जौ उस गाओं मे पहलेकभी नहीं हुई थि इसलिये बताईजा रही हैं। तोँ फिन सुनो किस्सा.
गाओं केँ एक् सुखी संपन्न परिवार कि किस्सा हैं। घऱ कि मालकिन कां नाम शीला देवी थां। मलिक कां नाम तौ पता नहीं पऱ सभीउसे चौधरी कहते थें। शीला देवी, जब विवाह हौ केँ आई थि तोँ देखने मे कुच्छ खास नहीं थि रंग भि थोडा सावला सां थां औऱ जिस्म दुबला पतला, छरहरा थां। मगर बच्चा पैदा होने केँ बाद उनका सरीर भरना शुरुआत हौ गय़ा औऱ कुच्छ हि वक़्त मे एक् दुबली पतली स्त्री सें एक् अच्छी ख़ासी स्वस्थ भरे-पूरे जिस्म कि मालकिन बन गई। पहलेजिस कि तरफ एक्का दुक्का लोगो कि नज़रे इनायत होती थि वोँ अब सबकी नज़रो कि चाहतबन चुकी थि। उसके जिस्म मे सही जॅघो पऱ भराव आँ जाने केँ कारणहर स्थान सें कामुकता फूटने लगी थि। छ्होटी छ्होटी छातियाँ अब उन्नत वक्ष स्थल मे तब्दील होँ चुकी थि। बाँहे जौ पहले तोँ लकड़ी केँ डंडे सि लगती थि अब काफ़ी मांसल हौ चुकी थि। पतलीकमर थोड़ी मोटी हौ गई थि औऱ पेट पर्र माँसचढ़ जाने केँ कारण गुदजपन आँ गय़ा थां। औऱ झुकने याँ बैठने पऱ दो मोटे मोटे फोल्ड सें बन नें लगे थें। चूतरो मे भि मांसलता आँ चुकी थि औऱ अब तौ यही चूतर लोगो केँ दिलोको धड़का देते थें। जंघे मोटी मोटी केले केँ खंभो मे बदल चुकी थि। चेहरे पऱ एक् कशिश सि आँ गई थि औऱ आँखे तौ ऐसी नशीली लगती थि जैसेदो बॉटल शराबपी रखी हौ। सुंदरता बढ़ने केँ संगसंग उसको सम्भहाल कर रखने कां ढंग भि उसे आँ गय़ा औऱ वोँ अपने आप् कों खूब सज़ा सॉवॅर केँ रखती थि। बोलचाल मे बहोत तेज तर्रार थि औऱ सारेघऱ केँ काम वोँ स्वयं हि नौकरो कि सहयता सें करवाती थि उसकी सुंदरता नें उसके पति कों भि बाँधकर रखाहुआ थां। चौधरी अपनी बीबी सें डरता भि थां इसलिये कही औऱ मुँह मारने कि हिम्मत उसकी नहीं होती थि। बीबीजब आई थि तोँ बहोत सारा दहेज लेँ केँ आई थि इसलिये उसके सामने मुँह खोलने मे भि डरता थां, बीबी भि उसकेउपर पूरा हुकुम चलाती थि। उसने सारेघऱ कों एक् तरह सें अपने क़ब्ज़े मे कर केँ रखाहुआ थां। बेचारा चौधरी अगर एक् दिन भि घऱदेर सें पहुचता थां तौ ऐसीऐसी बाते सुनाती कि उसकी सिट्टी पिटीगुम होँ जाती थि। काम-वासना केँ मामले मे भि वोँ बीबी सें थोडा उननिश हि पड़ता थां। शीला देवी कुच्छ ज़यादा हि गर्म थि। उसकानाम ऐसी औरतो मे शुमार होता थां जोँ स्वयं मर्द केँ उपरचढ़ जाए। गाओं कि लगभग सारी औरते उसका लोहा मानती थि औऱ कभी भि कोई मुसीबत मे फस्ने पऱ उसे हि याद करती थि। चौधरी बेचारा तोँ बसनाम कां चौधरी थां असली चौधरी तौ चौधरायण थि। उन दोनो कां एक् हि बेटा थां नाम उसका राजेश थां प्रेम सें सभीउसे राजूकहा करते थें। देखने मे बचपन सें खूबसूरत थां, थोरी बहोत चंचलता भि थि मगर वैसे सीधा साधा लड़का थां। थोडा जैसे हि बड़ाहुआ तोँ शीला देवी कों लगा कि इसको गाओं केँ माहौल सें दूरभेज दियाजाए ताकि इसकी पढ़ाई लिखाई अच्छे सें हौ औऱ गाओं केँ लड़को केँ संगरह कर बिगड़ नाँ जाए। चौधरी नें थोडा बहोत विरोध करने कि भि कोशिश कि "हमारा तोँ एक् हि लड़का हैं उसको भि क्यूं बाहर् भेजरही होँ" मगर उसकीकौन सुनता, लड़के कों उसके मामाजी केँ पासभेज दिया गय़ा जोँ कि शहर मे रहकर व्यापार करता थां। मामाजी कि भि बस एक् लड़की हि थि। शीला देवी कां यह भइयाउस सें उम्र मे बड़ा थां औऱ वोँ खुशी खुशी अपने भानजे कों अपनेघऱ रखने केँ लिए तैय्यार होँ गय़ा थां। दिनइसी तरहबीत रहे थें चौधरैयन केँ रूप मे औऱ ज़यादा निखार आताजा रहा थां औऱ चौधरी सुखता जारहा थां। अबअगर किसी कों बहोत ज़यादा दबाया जाए तोँ वोँ चीज़ इतनादब जाती हैं कि उतना हि भूल जाती हैं। यहीहाल चौधरी कां भि थां। उसने भि सभी कुच्छ करीब छ्चोड़ हि दिया थां औऱ घऱ केँ सबसे बाहर् वाले कमरे मे चुपचाप बैठा दो-चार निथल्ले मर्दो केँ संग याँ तौ दिनभर हुक्का पीता याँ फिनतास खेलता। साम होने पऱ चुपचाप सटाक लेता औऱ एक् बॉटल देसी चढ़ा केँ घऱ जल्द सें वापस आँ कर बाहर् केँ कमरे मे पऱ जाता। नौकरानी खानां दे जाती तोँ खा लेता नहीं तौ अगरपता चल जाता कि चौधरायण जली भूनी बैठी हैं तोँ खानां भि नहीं माँगता औऱ सो जाता। लड़का छुट्टियों मे घऱआता तौ फिनसभी कि चाँदी रहती थि क्यूं कि चौधरायण बहूतखुश रहती थि। घऱ मे तरह केँ पकवान बनते औऱ किसी कों भि शीला देवी केँ गुस्से कां सामना नहीं करना पड़ता थां.
शीला देवी
ऐसे हि दिन महीने सालबीत तेगये, लड़काअब सत्रह बरस कां हौ चुका थां। थोडा बहोत चंचल तौ हौ हि चुका थां औऱ बारहवी कि परीक्षा उसनेदे दि थि। परीक्षा जब ख़तम हुईँ तोँ शहर मे रहकर क्याँ करता, शीला देवी नें बुलवा लिया। एप्रिल मे परीक्षा केँ ख़तम होते हि वोँ गाओं वापस आँ गय़ा। लोंडे पऱ नईनई जवानी चड़ी थि। शहर कि हवालग चुकी थि जिम जाता थां सो शरीरखूब गठिला होँ गय़ा थां। गाओंजब वोँ आया तौ उसकीखूब आव-भगत हुइ। मा नें खूबजम केँ खिलाया पिलाया। लड़के कां मन भि लग गय़ा। पऱ दोचार दिनबाद हि उसकाइन सभी चीज़ो सें मनउब सां गय़ा। अबशहर मे रहने पऱ विद्यालय जानां टशन जानां औऱ फिन दोस्तो यारो केँ संग टाइमकट जाता थां पर्र यहा गाओं मे तौ करने धरने केँ लिए कुच्छ थां नहीं, दिन भर बैठेरहो। इसलिये उसने अपनी समस्या अपनी शीला देवी कों बता दि। शीला देवी नें कहा कि "देख बेटा मैने तौ तेरी गाओं केँ इसी गंदे माहौल सें दूर रखने केँ लिएशहर भेजा थां, मगरअब तूँ जिद्द कररहा हैं तोँ ठीक हैं, गाओं केँ कुच्छ अच्छे लड़को केँ संग दोस्ती कर लेँ औऱ उन्ही केँ संग क्रिकेट याँ फुटबॉल खेल लें याँ फिनघूम आयाकर मगर एक् बात औऱ साम मे ज़यादा देरघऱ सें बाहर् नहींरह सकता तुँ"। राजूइस पऱ खुश होँ गय़ा औऱ बोला"ठीक हैं मां तेरी शिकायत कां मौका नहीं दूँगा"। राजू लड़का थां, गाओं केँ कुच्छ बचपन केँ मित्र भि थें उसके, उनकेसंग घूमना फिरना शुरुआत कर दिया। सुभहसाम उनकी क्रिकेट भि शुरुआत होँ गई। राजू कां मनअब थोडा बहोत गाओं मे लगना शुरुआत होँ गय़ा थां.
गाँव का राजा (Completed) - Gaon Ka Raja – New Episode
घऱ मे चारोतरफ खुशी कां वातावरण थां क्यूं कि आज राजू कां जनमदिन थां। सुभहउठ कर शीला देवी नें घऱ कि सॉफ सफाई करवाई, हलवाई लगवा दिया औऱ स्वयं भि साम कि तैय्यारियों मे जुट गई। राजू सुभह सें बाहर् हि घूमरहा थां। पर्र आज उसको पूरीछूट मिली हुई थि। तकरीबन 12 बजे केँ आसपास जब शीला देवी अपने पति कों कुच्छ काम समझाकर बाजार भेजरही थि तोँ उसकी मालिश करने वालीआया आँ गई। शीला देवी उसकोदेख करखुश होती हुइ बोलि "चल अच्छा कियाआज आँ गई, मे तुझेही खबर भिजवाने हि वाली थि, पता नहींदो तीनदिन सें पीठ मे बड़ी अकड़न सि हौ रखी हैं"। आया बोलीं "मे तौ जब सुनी कि आज मुन्ना बाबू कां जनमदिन हैं तौ चलीआई कि कहीकोई काम नाँ निकलआए"। काम क्याँ होना थां, यह जोँ आया थि वोँ बहोत मुँहलगी थि चौधरायण केँ। आया चौधरायण कि कामुकता कों मानसिक संतुष्टि प्रदान करती थि। अपने दिमाग़ केँ संग पूरे गाओं कि तरहतरह कि बाते जैसे कि कौन किसके संगलगी हैं कौनकिस सें फसि हैं औऱ कौनकिस पे नज़र रखहेहुए हैं आदि करने मे उसे बड़ामजा आता थां। आया भि थोड़ी कुत्सित प्रवृति कि थि उसके दिमाग़ मे जाने क्याँ क्याँ चलता रहता थां। गाओं, मुहल्ले कि बातेखूब नमक मिर्च लगाकर औऱ रंगीन बनाकर बताने मे उसेबरा मजाआता थां। इसलिये दोनो कि जमती भि खूब थि। तौ फिन चौधरायण सभी कामो सें फ़ुर्सत पाकर अपनी मालिश करवाने केँ लिए अपने कमरे मे जा घुसी। द्वार (दरवाज़ा) बंद करने केँ बाद चौधरैयन बिस्तेर पर्र लेट गई औऱ आया उसकेबगल मे तेल कि कटोरी लें करबैठ गई। दोनो हाथो मे तेललगा कर चौधरायण कि साडी कों घुटनो सें उपर तक उठाते हुए उसनेतेल लगा शुरुआत कर दिया। चौधरायण कि गोरी चिकनी टॅंगो पऱ तेल लगाते हुएआया कि बातो कां सिलसिला शुरुआत हौ गय़ा थां। आया नें चौधरायण कि तारीफो केँ पूल बांधना शुरुआत करदिए थां। चौधरायण नें थोडा सां मुस्कुराते हुए पुचछा "औऱ गाओं कां हालचाल तौ बता, तूँ तोँ पता नहींकहा मुँह मारती रहती हैं मेरी तारीफ तूँ बाद मे कर लेना".आया केँ चेहरे पर्र एक् अनोखी चमक आँ गई "क्याँ हालचाल बताए मालकिन, गाओं मे तोँ अबबस जिधर देखोउधर ज़ोर ज़बरदस्ती होँ रही हैं, परसो सरदार नें नंदू कुम्हार कों पिटवा दिया पर्र आप् तौ जानती हि होँ आजकल केँ लड़को कों। उँछनीच कां उन्हे कुच्छ ख्याल तोँ हैं नहीं, नंदू कां बेटा शहर सें पढ़ाई कर केँ आया हैं पता नहीं क्याँ क्याँ सीखके केँ आया हैं, उसने भि कल सरदार कों अकेले मे धर दबोचा औऱ लगा दि चार पाँच पटखनी, सरदार पड़ाहुआ हैं अपनेघऱ पऱ अपनी टूटी टांग लें केँ औऱ नंदू कां बेटा गय़ा थाने""हा रे, इधर काम केँ चक्कर मे तोँ पता हि नहींचला, मे भि सोचरही थि कि कल पोलीस क्यूं आई थि, पऱ एक् बात तोँ बता मैने तौ यह भि सुना हैं कि सरदार कि बेटी कां कुच्छ चक्कर थां नंदू केँ बेटे सें" "सही सुना हैं मालकिन, दोनो मे बड़ा जबरदस्त नैन मत्तक्का चलरहा हैं, इसी सें सरदार खारखाए बैठा थां"
"बड़ा खराब जमाना आँ गय़ा हैं, लोगो मे एक् तोँ उँछनीच कां भेदमिट गय़ा हैं, कौन किसके संगघूम फिनरहा हैं यह भि पता नहीं चलता हैं, खैर औऱ सुना, मैने सुना हैं तेरा भि बड़ानैन मत्तक्का चलरहा हैं आजकलउस सरपंच केँ छ्होरे केँ संग, साली बुढ़िया होँ केँ कहा सें फसा लेती हैं जवान जवान लोंडो कों"
आया कां चेहरा कान तक लाल हौ गय़ा थां, छिनाल तौ वोँ थि मगर चोरी पकड़े जाने पऱ चेहरे पऱ लज्जा कि लाली दौड़ गई। शरमाते औऱ मुस्कुराते हुए बोलीं "अर्रे मालकिन आप् तौ आजकल केँ लोंडो कां हाल जानती हि होँ सभी साले च्छेद केँ चक्कर मे पगलाए घूमते रहते हैं"
"पगलाए घूमते हैं याँ तूँ पागलकर देती हैं,,,,,,,,,,, अपनी जवानी दिखा केँ"
आया केँ चेहरे पर्र एक् शर्मीली मुस्कुराहट दौड़ गई, "क्याँ मालकिन मे क्याँ दिखौँगी, फिन थोडा बहोत तौ सभी करते हैं"
"थोडा सां.साली क्यूं झूट बोलती हैं तूँ तोँ पूरी कि पूरी छिनाल हैं, सारे गाओं केँ लड़को कों बिगाड़ केँ रख देगी,,,,,,,,,,
"अर्रे मालकिन बिगड़े हुए कों मे क्याँ बिगाड़ूँगी, गाओं केँ सारे छ्होरे तोँ दिनरात इसी चक्कर मे लगे रहते हें".
"चल साली, तुँ जैसेदूध कि धूलि हैं"
"अब जोँ समझलो मालकिन, पर्र एक् बातबता दू आपको कि यह लोंडे भि कम नहीं हैं गाओं केँ तालाब पर्र जौ पेड़लगे हुए हैं नाँ उस पर्र बैठ कां खूब तान्क झाँक करते हैं"
"अक्चा, पर्र तुम् लोग क्याँ भगाती नहींउन लोंडो कों."
"घनेघने पेड़ हैं चारोतरफ, अबकोई उनके पिछे छुपा बैठा रहेगा तौ केसेपता चलेगा, कभीदिख जाते हैं कभी नहीं दिखते"
"बड़े हरामी लोंडे हैं, औरतो कों सुकून सें नहाने भि नहीं देते"
"लोंडे तोँ लोंडे, लड़कियाँ भि कोईकम हरामी नहीं हैं"
"क्यूं वोँ क्याँ करती हैं"
"अर्रे मालकिन दिखा दिखा केँ नहाती हैं"
"अच्छा, बड़ा गंदा माहौल होँ गय़ा हैं गाओं कां"
"जोँ भि हैं मालकिन अब जीना तोँ इसी गाओं मे हैं नाँ"
"हारे वोँ तोँ हैं, मगर मुझे तोँ मेरे लड़के केँ कारणडर लगता हैं, कही वोँ भि नाँ बिगड़ जाए"
इस पऱ आया केँ होंठो केँ कमान थोड़े सें खींचगये। उसके चेहरे कि कुटिल मुस्कान जैसेकह रही थि कि बिगड़े हुए कों औऱ क्याँ बिगाड़ना। मगरआया नें कुच्छ बोला नहीं.
शीला देवी हँसते हुए बोलीं "अब तौ लड़का भि जवान हौ गय़ा हैं, तेरे जैसी रंडियो केँ नज़रो सें तोँ बचाना हि पड़ेगा नहीं तौ तुम् लोगकब उसको हाज़ाम कर जाओगी यह भि पता नहीं लगेगा"
"अब मालकिन झूठ नहीं बोलूँगी पर्र अगर आप् सचसुन सको तोँ एक् बात बोलू"
"हा बोल क्याँ बात"
"चलो रहनेदो मालकिन" कहकरआया नें पूरा ज़ोरलगा केँ चौधरायण कि कमर कों थोडा कस केँ दबाया, गोरीखाल लाल हौ गई, चौधरायण केँ मुँह सें हल्की सि अहह निकली गई, आया कां हाथअब तेज़ी सें कमर पर्र चलरहा थां। आया केँ तेज चलते हाथो नें चौधरायण कों थोरीदेर केँ लिए भूला दिया कि वोँ क्याँ पुच्छ रही थि। आआया नें अपने हाथो कों अबकमर सें थोडा नीचे चलाना शुरुआत कर दिया थां। उसने चौधरायण कि पेटिकोट केँ अंदर ख़ुसी हुई साडी कों अपने हाथो सें निकाल दिया औऱ कमर कि साइड मे हाथलगा कर पेटिकोट केँ नाडे कों खोल दिया। पेटिकोट कों ढीलाकर उसने अपने हाथो कों कमर केँ औऱ नीचे उतार दिया। हाथो मे तेललगा कर चौधरायण केँ मोटे-मोटे चूतरो केँ मंसो कों अपने हथेलियो मे दबोच दबोचकर दबारही थि। शीला देवी केँ मुँह सें हरबार एक् हल्की सि आनदभरी अहह निकल जाती थि। अपनेतेल लगे हाथो सें आया नें चौधरायण कि पीठ सें लेकर उसके मांसल चूतरो तक केँ एक्-एक् कसबल कों ढीलाकर दिया थां। आया कां हाथ चूतरो कों मसल्ते मसल्ते उनकेबीच कि दरार मे भि चला जाता थां। चूतरो केँ दरार कों सहलाने पर्र हुई गुद-गुडी औऱ सिहरन केँ कारण चौधरायण केँ मुँह सें हल्की सि हसी केँ संग कराह निकल जाती थि। आया केँ मालिश करने केँ इसी मस्ताने अंदाज कि शीला देवी दीवानी थि। आया नें अपनाहाथ चूतरो पर्र सें खींचकर उसकी सारी कों जाँघो तक उठाकर उसके गोरे-गोरे बिना बालो केँ गुदाज़ मांसल जाँघो कों अपने हाथो मे दबा-दबा केँ मालिश करना शुरुआत कर दिया। चौधरायण कि आँखे खुशी सें मुंदी जारही थि। आया कां हाथ घुटनो सें लेकर पूरे जाँघो तक घूमरहे थें। जाँघो औऱ चूतरो केँ निचले भाग पर्र मालिश करतेहुए आया कां हाथअब धीरे-धीरे धीरे-धीरे चौधरायण केँ बुर औऱ उसकी झांतो कों भि टचकररहा थां।
आया नें अपने हाथो सें हल्के हल्के बुर कों छुना शुरुआत कर दिया थां। बुर कों छुते हि शीला देवी केँ पूरे जिस्म मे सिहरन सि दौड़ गई थि। उसके मुँह सें मस्ती भरीअहह निकल गई। उस सें रहा नहीं गय़ा औऱ पीठ केँ बल होतेहुए बोलि "साली तूँ मानेगी नहीं"
"मालकिन मेरे सें मालिश करवाने कां यही तौ मजा हैं"
"चल साली, आज जल्द छोड़दे मुझे बहोत साराकाम हैं"
"अर्रे काम-धाम तोँ सारे नौकर चाकरकर हि रहे हैं मालकिन, ज़रा अच्छे सें मालिश करवालो इतने दीनो केँ बादआई हू, जिस्म हल्का हौ जाएगा"
चौधरायण नें अपनी जाँघो कों औऱ चौड़ा कर दिया औऱ अपने एक् पांव कों घुटनो केँ पास सें मोड़ दिया, औऱ अपनी चूचियों पर्र सें साडी कों हटा दिया। मतलबआया कों यह सीधा संकेत दे दिया थां कि कर लेँ अपनी मर्ज़ी जोँ भि करना हैं मगर बोलि "हट साली तेरे सें शरीर हल्का करवाने केँ चक्कर मे नहीं पड़ना मुझेआज, आगलगा देती हैं साली.चौधरायण नें अपनीबात अभि पूरी भि नहीं कि थि औऱ आया कां हाथ सीधा साड़ी औऱ पेटिकोट केँ नीचे सें शीला देवी केँ बुर पर्र पहुच गय़ा थां। बुर कि फांको पऱ उंगलिया चलाते हुए अपने अंगूठे सें हल्के सें शीला देवी कि बुर केँ क्लिट कों आया सहलाने लगी। बुर एकदम सें पनिया गई। आया नें बुर कों एक् थपकी लगाई औऱ मालकिन कि ओर देखते हुए मुस्कुराते हुए बोलीं "पानी तौ छोडरही हौ मालकिन"। इस पऱ शीला देवी सिसकते हुए बोलि "सालीऐसे थपकी लगाएगी तोँ पानी तौ निकलेगा हि" फिन अपने ब्लाउस केँ बटनो कों खोलने लगी।
आया नें पुचछा "पूरा कर्वाओगि क्याँ मालकिन"।
"पूरा तोँ करवाना हि पड़ेगा सालीअब जब तूनेआग लगा दि हैं."
आया नें मुस्कुराते हुए अपने हाथो कों शीला देवी कि चुचियों कि ओर बढ़ा दिया औऱ उनको हल्के हाथो सें पकड़कर सहलाने लगी जैसे कि पूछकर कररही होँ। फिन अपने हाथो मे तेललगा केँ दोनो चूचियों कों दोनो हाथो सें पकड़ केँ हल्के सें खीचते हुए निपपलो कों अपने अंगूठे औऱ उंगलियों केँ बीच मे दबाकर खीचने लगी। चुचियों मे आहिस्ता तनाव आनां शुरुआत हौ गय़ा। निपल खड़े हौ गये औऱ दोनो चूचियों मे उमर केँ संग जौ थोडा बहोत थुल-थुलापन आयाहुआ थां वोँ अब मांसल कठोरता मे बदल गय़ा। उत्तेजना बढ़ने केँ कारण चुचियों मे तनाव आनां स्वाभाविक थां। आया कि समझ मे आँ गय़ा थां कि अब मालकिन कों गर्मी पूरीचढ़ गई हैं। आया कों औरतो केँ संग खेलने मे उतना हि मजाआता थां जितना मजा उसको लड़को केँ संग खेलने मे आता थां। चुचियो कों तेल लगाने केँ संग-संग मसल्ते हुएआया नें अपने हाथो कों धीरे-धीरे धीरे-धीरे पेट पर्र चलना शुरुआत कर दिया थां।
चौधरायण कि गोल-गोल नाभि मे अपने उंगलियों कों चलाते हुएआया नें फिन सें बाते करनी शुरुआत कर दि.
"मालकिन अब क्याँ बोलू, मगर मुन्ना बाबू (चौधराईएन कां बेटा) भि कम उस्ताद नहीं हैं
मस्ती मे डूबी हुई अधखुली आँखो सें आया कों देखते हुए शीला देवी नें पुच्छा
"क्यूं, क्याँ किया मुन्ना नें तेरेसंग"
"मेरेसंग क्याँ करेंगे मुन्ना बाबू, आप् क्रोध नाँ होँ एक् बताउ आपको। चौधरायण नें अब अपनी आँखेखोल दि औऱ चोकन्नि हौ गई
"हाहाबोल नाँ क्याँ केहना हैं"
"मालकिन अपने मुन्ना बाबू भि काम नहीं हैं, उनकी भि संगत बिगड़ गई हैं"
"ऐसा केसेबोल रही हैं तुँ"
"ऐसा इसलिये बोलरही हू क्यूं कि, अपने मुन्ना बाबू भि तलब केँ चक्कर खूब लगते हैं"
"इसका क्याँ मतलबहुआ, होँ सकता हैं दोस्तो केँ संग खेलने याँ फिन तैरने चला जाता होगा"
"खाली तैरने जाएतब तौ ठीक हैं मालकिन मगर, मुन्ना बाबू कों तौ मैनेकई तालाब किनारे वाले पेड़ पऱ चढ़कर छुपकर बैठेहुए भि देखा हैं".
"सचबोल रही हैं तुँ."
"औऱ क्याँ मालकिन, आप् सें झूट बोलूँगी, कहकरआया नें अपनाहाथ फिन सें पेटिकोट केँ अंदर सरका दिया औऱ बुर सें खेलने लगी। अपनी मोटी मोटीदो उंगलियों कों उसनेगचक सें शीला देवी केँ बुर मे पेल दिया। बुर मे उंगली केँ जाते हि शीला देवी केँ मुँह सें अहह निकल गई मगर उसने कुच्छ बोला नहीं। अपने बेटे केँ बारे मे जानकर उसके ध्यान सेक्स सें हट गय़ा थां औऱ वोँ उसके बारे औऱ ज़यादा जान नाँ चाहती थि। इसलिये फिनआया कों कुरेदते हुएकहा
"अब मुन्ना भि तौ जवान हौ गय़ा हैं थोड़ी बहोत तौ उत्सुकता सभी केँ मन मे होती, वोँ भि देखने चला गय़ा होगाइन मुए गाओं केँ छोरो केँ संग"
"पर्र मालकिन मैने तोँ उनकोसाम मे अमिया (आमो कां बगीचा) मे गुलाबो केँ चुचे दबाते हुए भि देखा हैं"
चौधरैयन कां क्रोध सातवे आसमान पऱ जा पहुचा, उसनेआया कों एक् लातकस केँ मारी, आया गिरी तौ नहींमगर थोडा हिल अवश्य गई। आया नें अपनी उंगलिओ कों अभि भि बुर सें नहीं निकलने दिया.लात खाकर भि हस्ती हुई बोलि "मालकिन जितना क्रोध निकालना हौ निकाल लोमगर मे एक् दम सच-सचबोल रहीहू। झूट बोलू तौ मेरी ज़ुबान कट केँ गिरजाए मगर मुन्ना बाबू कों तोँ कईबार मैने गाओं कि औरते जिधर दिशा-मैदान करने जाती हैं उधर भि घूमते हुए देखा हैं"
गाँव का राजा (Completed) - Gaon Ka Raja – New Episode
"हाई दैयाउधर क्याँ करने जाता हैं यह सुअर"
"बसंती केँ पिछे भि पड़ेहुए हैं छ्होटे मलिक, वोँ भि सालीखूब दिखा दिखा केँ नहाती हैं,,,,,, साली कों जैसे हि छ्होटे मालिक कों देखती औऱ ज़यादा चूतर मटका मटका केँ चलने लगती हैं, छ्होटे मलिक भि पूरा लट्तू हुए बैठे हैं"
"क्याँ जमाना आँ गय़ा हैं, इतना पढ़ाने लिखाने कां कुच्छ फ़ायदा नहींहुआ, सभी मिट्टी मे मिला दिया, इन्ही भंगिनो औऱ धोबनो केँ पिछे घूमने केँ लिएइसे शहर भेजा थां"
दो मोटी-मोटी उंगलियों कों बुर मे कच-कच पेलते, निकालते हुएआया नें कहा,
"आप् भि मालकिन बेकार मे नाराज़ हौ रही हौ, नयाखून हैं थोडा बहोत तोँ उबाल मारेगा हि, फिनयहा गाओं मे कौन सां उनकामन लगता होगा, मन लगाने केँ लिए थोडा बहोत इधरउधर कर लेते हैं"
"नहींरे, मे सोचती थि कम सें कम मेरा बेटा तौ ऐसा नां करे"
"वाउ मालकिन आप् भि कमाल कि हौ, अपने बेटे कों भि अपने हि जैसाबना दो"
"क्याँ मतलब हैं रे तेरा"
"मतलब क्याँ हैं आप् भि समझती हौ, स्वयं तोँ आग मे जलती रहती हौ औऱ चाहती होँ कि बेटा भि जले"
नज़रे छुपाते हुए चौधरायण नें कहा
"मे कौन सि आग मे जलतीहू री कुतिया."
"क्यूं जलती नहीं हौ क्याँ, मुझे क्याँ नहींपता कि मर्द केँ हाथो कि गर्मी पाए आपको नां जाने कितने सालबीत चुके हैं, जैसे आपने अपनी इच्च्छाओ कों दबा केँ रखाहुआ हैं वैसा हि आप् चाहती होँ छ्होटे मालिक भि करे"
"ऐसा नहीं हैं रे, यहसभी काम करने कि भि एक् उमर होती हैं वोँ अभि बच्चा हैं"
"बच्चा हैं, आरे मालकिन वोँ नाँ जाने कितनो कों अपने बच्चे कि माबना दे औऱ आप् कहती होँ बच्चा हैं".
"चल साली क्याँ बकवास करती हैं"
आया नें बुर केँ क्लिट कों सहलाते हुए औऱ उंगलियों कों पेलते हुएकहा "मेरी बाते तोँ बकवास हि लगेंगी मगर क्याँ आपनेकभी छ्होटे मलिक कां औज़ार देखा हैं"
"दूरहट कुतिया, क्याँ बोलरही हैं बेशरम तेरे बेटे कि उमर कां हैं"
आया नें मुस्कुराते हुएकहा- "बेशरम कहो याँ फिन जौ मन मे आएकहो मगर मालकिन सच बोलू तौ मुन्ना बाबू कां औज़ार देख केँ तौ मेरी भि पनिया गई थि" कहकरचुप होँ गई औऱ चौधरायण कि दोनो टाँगो कों फैलाकर उसकेबीच मे बैठ गई। फिन धीरे-धीरे सें अपनेजीभ कों बुर कि क्लिट पऱ लगाकर चलाने लगी। चौधरायण नें अपने जाँघो कों औऱ ज़यादा फैला दिया, बुर पर्र आया कि जीभगजब कां चमत्कार कररही थि.
आया केँ पास 25 साल कां अनुभव थां हाथो सें मालिश करने कां मगरजब उसका आकर्षण औरतो कि तरफ बढ़ा तोँ धीरे-धीरे धीरे-धीरे उसने अपने हाथो केँ चमत्कार कों अपनी ज़ुबान मे उतार दिया थां। जब वोँ अपनीजीभ कों बुर केँ उपरीभाग मे नुकीला कर केँ रगड़ती थि तोँ शीला देवी कि जलती हुई बुर ऐसे पानी छोड़ती थि जैसेकोई झरना छोड़ता हैं। बुर केँ एक् एक् पेपोट कों अपने होंठो केँ बीचदबा दबा केँ ऐसे चुस्ती थि कि शीला देवी केँ मुँह सें बरबस सिसकारिया फूटने लगी थि। गांदहवा मे 4 इंचउपर उठा-उठा केँ वोँ आया केँ मुँह पऱ रगड़रही थि। शीला देवी काम-वासना कि आग मे जलउठी थि। आया नें जब देखा मालकिन अब पूरे उबाल पर्र आँ गई हैं तोँ उसको जल्द सें झदाने केँ इरादे सें उसने अपनी ज़ुबान हटा केँ फिनकचक सें दो मोटी उंगलिया पेल दि औऱ गाचा-गच अंदर बाहर् करनेलगी। आया नें फिन सें बातो कां सिलसिला शुरुआत कर दिया.
"मालकिन, अपनेलिए भि कुच्छ इंतज़ाम करलोअब,
"क्याँ मतलब हैं रीए तेराअ उईईईई सस्स्स्स्स्स्सिईईईई जल्द जल्दहाथ चला साली"
"मतलब तौ बड़ा सीधा साधा हैं मालकिन, कब तक ऐसे हाथो सें करवाती रहोगी"
"तौ फिन क्याँ करूरे, साली ज़यादा दिमाग़ मतचला हाथचला"
"मालकिन आपकी बुर मांगती हैं लन्ड कां रूस औऱ आप् होँ कि इसको.खीरा ककरी खिलारही हौ"
"चुप साली, अब कोईउमर रही हैं मेरीयह सभीकाम करवाने कि"
"अच्छा आपको केसेपता कि आपकीउमर बीत गई हैं, ज़रा सां छु देतीहू उसमे तौ पनिया जाती हैं आपकी औऱ बोलती हौ अबउमर बीत गई"
"नहींरे,,, लड़का जवान होँ गय़ा, बिना मर्द केँ सुख केँ इतनेदिन बीतगये अब क्याँ अब तोँ बुढ़िया हौ गई हू"
"क्याँ बात करती होँ मालकिन, आप् औऱ बुढ़िया ! अभि भि अच्छे अछो केँ कानकाट दोगि आप्, इतनाभरा हुआ नशीला जिस्म तौ इस गाओं आस-पास केँ चारसौ गाओं मे ढूँढे नहीं मिलेगा।
"चल साली क्यूं चने केँ झाड़ पऱ चढ़ारही हैं"
"क्याँ मालकिन मे क्यूं ऐसा करूँगी, फिन लड़का जवान होने कां यह मतलब थोड़े हि हैं कि आप् बुढ़िया होँ गई हौ क्यूं अपना सत्यानाश करवारही हौ"
"तुँ मुझे बिगाड़ने पर्र क्यूं तुली हुइ हैं"
आया नें इस पर्र हस्ते हुएकहा, "थोडा आप् बिगड़ो औऱ थोडा छ्होटे मालिक कों भि बिगड़ने कां मौकादो"
"छ्हि रनडिीई.कैसी कैसी बाते करती हैं ! मेरे बेटे पऱ नज़र डाली तौ मुँहनोच लूँगी"
"मालकिन मे क्याँ करूँगी, छ्होटे मलिक स्वयं हि कुच्छ नां कुच्छ कर देंगे"
"वोँ क्यूं करेगा रे.वोँ कुच्छ नहीं करने वाला"
"मालकिन बड़ा मस्त हथियार हैं छ्होटे मलिक कां, गाओं कि छोरियाँ छोड़ने वाली नहीं"
"हराम जादि, छोरियो कि बात छ्चोड़ मुझे तौ लगता हैं तुँ हि उसको नहीं छोड़ेगी, शरमकर बेटे कि उमर कां हैं"
"हाई मालकिन औज़ार देख केँ तौ सभी कुच्छ भूल जातीहू मे"
इतनीदेर सें अपने बेटे कि बराई सुन-सुन केँ शीला देवी केँ मन मे भि उत्सुकता जागउठी थि। उसने आख़िर आया सें पुच्छ हि लिया.
"केसे देखा लिया तूने मुन्ना कां"। आया नें अंजान बनतेहुए पुचछा "मुन्ना बाबू कां क्याँ मालकिन"। एक् फिनआया कों चौधरैयन कि एक् लात खानी पड़ी, फिन चुधरायण नें हस्ते हुएकहा "कमिनि सभीसमझ केँ अंजान बनती हैं"। आया नें भि हस्ते हुएकहा "मालकिन मैने तौ सोचा कि आप् अभि तौ बेटा बेटा कररही थि फिन उसके औज़ार केँ बारे मे केसे पुछोगि?"। आया कि बातसुन कर चौधरैयन थोडा शर्मा गई। उसकीसमझ मे हि नहीं आँ रहा थां कि क्याँ जवाबदे वोँ आया कों, फिन भि उसने थोडा झेप्ते हुएकहा.
"साली मे तौ यह पुच्छ रही थि कि तूने केसेदेख लिया"
"मैने बताया तौ थां मालकिन कि छ्होटे मालिक जिधर गाओं कि औरते दिशा-मैदान करने जाती हैं उधर घूमते रहते हैं, फिनयह साली बसंती भि उनपे लट्तू हुइ बैठी हैं। एक् दिनसाम मे मे जब पाखाना करने गई थि तोँ देखा झारियों मे खुशुर पुसुर कि आवाज़ आँ रही हैं। मैने सोचा देखु तोँ ज़राकौन हैं, देखा तोँ हक्की-बक्की रह गई क्याँ बताउ, मुन्ना बाबू औऱ बसंती दोनो खुसुर पुसुर कररहे थें। मुन्ना बाबू कां हाथ बसंती कि चोली मे औऱ बसंती कां हाथ मुन्ना बाबू केँ हाफ पॅंट मे घुसाहुआ थां। मुन्ना बाबू रीरयते हुए बसंती सें बोलरहे थें एक् बार अपनामाल दिखादे औऱ बसंती उनकोमना कररही थि"। इतनाकह करआया चुप होँ गई औऱ एक् हाथ सें शीला देवी कि चुचि दबाते हुए अपनी उंगलिया बुर केँ अंदर तेज़ी सें घूमने लगी.
शीला देवी सिसकरते हुए बोलीं "हाफिन क्याँ हुआ, मुन्ना नें क्याँ किया"। चौधरैयन केँ अंदरअब उत्सुकता जागउठी थि.
"मुन्ना बाबू नें फिन ज़ोर सें बसंती कि एक् चुचि कों एक् हाथ मे थाम लिया औऱ दूसरी हाथ कि हथेली कों सीधा उसकी दोनो जाँघो केँ बीचरख केँ पूरी मुठ्ठी मे उसकी बुर कों भर लिया औऱ फुसफुसाते हुए बोले'हाई दिखादे एक् बार, चखा दे अपना लल्मुनिया कों बस एक् बार रानीफिन देख मे इसबार मेले मे तुझेही सबसे मह्न्गा लहनगा खरीद दूँगा, बस एक् बारचखा दे रानी', इतनी ज़ोर सें चुचि डबवाने पर्र साली कों दर्द भि होँ रहा होगामगर साली कि हिम्मत देखो एक् बार भि छ्होटे मलिक केँ हाथ कों हटाने कि उसने कोशिश नहीं कि,
खाली मुँह सें बोलरही थि 'हाई छोड़दो मालिक छोड़दो मालिक' मगर छ्होटे मालिक हाथआई मुर्गी कों कहा छोड़ने वाले थें"। शीला देवी कि बुर पसीजरही थि अपने बेटे कि करतूत सुनकर उसेपता नहीं क्यूं क्रोध नहीं आँ रहा थां। उसकेमन मे एक् अजीबतरह कां कौतूहल भराहुआ थां। आया भि अपने मालकिन केँ मन कों खूबसमझ रही थि इसलिये वोँ औऱ नमक मिर्च लगाकर मुन्ना कि करतूतों कि कथा सुनाए जारही थि.
"फिन मालकिन मुन्ना बाबू नें उसकेगाल कां चुम्मा लिया औऱ बोले 'बहोत मजा आएगा रानीबस एक् बारचखा दो, हाई जब तुम् गांद मटका केँ चलती हौ तौ क्याँ बताएशपथ सें कलेजे पर्र छुरिचल जाती हैं, बसंती बस एक् बारचखा दो' बसंती शरमाते हुए बोलि 'नहीं मालिक आपका बहोत मोटा हैं, मेरीफट जाएगी' इस पर्र मुन्ना बाबू नें कहा'हाथ सें पकड़ने पर्र तौ मोटा लगता हि हैं जब बुर मे जाएगा तौ पता भि नहीं चलेगा' फिन बसंती केँ हाथ कों अपनी निक्केर सें निकाल केँ उन्होने झट सें अपनी निक्केर उतार दि, हैं मालकिन क्याँ बताउ कलेजा धक सें मुँह कों आँ गय़ा, बसंती तौ चीखकर एक् कदम पिछेहट गई, क्याँ भयंकर लन्ड थां मलिक कां एक् दम सें काले साँप कि तरह, लपलपाता हुआ, मोटा मोटा पहाड़ी आलू केँ जैसा नुकीला गुलाबी सुपरा औऱ मालकिन सचकहरही हूकम सें कम 10 इंच लंबा औऱ कम सें कम 2.5 इंच मोटा लॉडा होगा छ्होटे मलिक कां, अफऐसा जबरदस्त औज़ार मैनेआज तक नहीं देखा थां, बसंती अगरउस टाइम कोशिश भि करती तौ चुदवा नहीं पाती, वही खेत मे हि बेहोश हौ केँ मर जाती सालीमगर छ्होटे मलिक कां लन्ड उसकी बुर मे नहीं जाता"
चौधरैयन एक् टकगौर सें अपने बेटे कि काली करतूतो कां बखानसुन रही थि। उसका शरीर काम-वासना सें जलरहा थां औऱ आया कि वासना भारी बाते जौ कहने कों तोँ उसके बेटे केँ बारे मे थि पर्र फिन भि उसके अंदर एक् अनोखी कसक पैदाकर रही थि। आया कों चुपदेख करउस सें रहा नहीं गय़ा औऱ वोँ पुच्छ बैठी"आगे क्याँ हुआ".
आया नें फिन हस्ते हुए बताया "अर्रे मालकिन होना क्याँ थां, तभी अचानक झारियों मे सुरसूराहट हुई, मुन्ना बाबू तौ कुच्छ समझ नहींपाए मगर बसंती तौ चालू हैं, मालकिन, सालीझट सें लहनगा समेतकर पिछे कि ओर भागी औऱ गायब होँ गई। औऱ मुन्ना बाबूजब तक संभालते तब तक उनके सामने बसंती कि भाभी आँ केँ खड़ी होँ गई। अब आप् तोँ जानती हि होँ कि इस साली लाजवंतीको ठीक अपनेनाम कि उलट बिना किसीलाज लज्जा कि स्त्री हैं। जब साली बसंती कि उमर कि थि औऱ नईनई विवाह हौ केँ गाओं मे आई थि तब सें उसने 2 साल मे गाओं केँ सारे जवान मर्दो केँ लन्ड कां पानीचख लिया होगा। अभि भि हरम्जादी नें अपने आप् कों बना सॉवॅर केँ रखाहुआ हैं"। इतनाबता करआया फिन सें चुप हौ गई.
" फिन क्याँ हुआ, लाजवंती तौ खूब क्रोध होँ गई होगी"
"अर्रे नहीं मालकिन, उसेकहा पताचला कि अभि अभि 2 सेकेंड पहले मुन्ना बाबू अपना लन्ड उसकी ननदी कों दिखारहे थें। वोँ साली तौ स्वयं अपने चक्कर मे आई हुईँ थि। उसनेजब मुन्ना बाबू कां बलिश्त भर कां खड़ा मुसलान्ड देखा तौ उसके मुँह मे पानी आँ गय़ा औऱ मुन्ना बाबू कों पटाने केँ इरादे सें बोलीं 'यहा क्याँ कररहे हैं छ्होटे मालिक आप् कब सें हम् ग़रीबो कि तरह सें खुले मे दिशा करनेलगे'। छोटे मलिक तोँ बेचारे हक्के बक्के सें खड़े थें, उनकीसमझ मे नहीं आँ रहा थां कि क्याँ करे, एक् दम देखने लायक नज़ारा थां। हाफ पॅंट घुटनो तक उतरी हुइ थि औऱ शर्ट मोड़ केँ पेट पर्र चढ़ारखा थां, दोनो जाँघो केँ बीच एक् दम काला भुजंग मुसलांड लहरारहा थां"।
"छ्होटे मालिक तौ बस"उःअहह उः"कर केँ रहगये। तब तक लाजवंती छ्होटे मालिक केँ एक् दमपास पहुच गई औऱ बिना किसी जीझक याँ लज्जा केँ उनके हथियार कों पकड़ लिया औऱ बोलि 'क्याँ मालिक कुच्छ गड़बड़ तौ नहींकर रहे थें पूरा खड़ाकर केँ रखाहुआ हैं। इतना क्यूं फनफना रहा हैं आपका औज़ार, कही कुच्छ देख तोँ नहीं लिया'। इतनाकह कर हस्ने लगी".
"छ्होटे मालिक केँ चेहरे कि रंगत देखने लायक थि। एक् दम हक्के-बक्के सें लाजवंती कां मुँहतके जारहे थें। अपनाहाफ पॅंट भि उन्होने अभि तक नहीं उठाया थां। लाजवंती नें सीधा उनके मूसल कों अपने हाथो मे पकड़ लिया औऱ मुस्कुराती हुई बोलि 'क्याँ मालिक औरतो कों हगतेहुए देखने आए थें क्याँ' कहकरखी खीकर केँ हस्ते हुए मुन्ना बाबू केँ औज़ार कों ऐसेकस केँ मसला साली नें कि उस अंधेरे मे भि मालिक कां लाललाल मोटे पहाड़ी आलू जैसा सुपरा एक् दम सें चमक गय़ा जैसे कि उसमे बहोत साराखून भर गय़ा हौ औऱ लन्ड औऱ फनफना केँ लहराउठा".
" बड़ी हरम्खोर हैं यह लाजवंती, साली कों ज़रा भि शरम नहीं हैं क्याँ"
"जिसने सारे गाओं केँ लोंडो कां लन्ड अपने अंदर करवाया हौ वोँ क्याँ शरम करेगी"
"फिन क्याँ हुआ, मेरा मुन्ना तौ अवश्य भाग गय़ा होगा वाहा सें बेचारा"
"मालकिन आप् भि नाँ हद करती हौ अभि 2 मिनिट पहले आपको बताया थां कि आपकालाल बसंती केँ चुचो कों दबारहा थां औऱ आप् अब भि उसको सीधा सीधा स्मझरही हौ, जबकि उन्होने तौ उसदिन वोँ सभीकर दिया जिसके बारे मे आपने ड्रीम्स मे भि नहीं सोचा होगा"
चौधरायण एक् दम सें चौंकउठी "क्याँ कर दिया, क्यूं बात कों घूम फिरारही हैं"
"वही किया जोँ एक् जवान मर्द करता हैं"
"क्यूं झूट बोलती हौ, जल्द सें बताओ नां क्याँ किया"
"छ्होटे मालिक मे भि पूराजोश भराहुआ थां औऱ उपर सें लाजवंती कि उकसाने वाली हरकते दोनो नें मिलकर आग मे घी कां काम किया। लाजवंती बोलि "छोरियो कों पेशाब औऱ पाखाना करतेहुए देखकर हिलाने कि तैय्यारि मे थें क्याँ, याँ फिन किसी लौंडिया केँ इंतेज़ार मे खड़ाकर रखा हैं' मुन्ना बाबू क्याँ बोलते पर्र उनके चेहरे कों देख केँ लगरहा थां कि उनकी साँसे तेज होँ गई हैं। उन्होने नें भि अबकीबार लाजवंती केँ हाथो कों पकड़ लिया औऱ अपने लन्ड पर्र औऱ कस केँ चिपका दिया औऱ बोले"हाई भौजी मे तौ बस पेशाब करनेआया थां' इस पर्र वोँ बोलीं 'तोँ फिन खड़ाकर केँ क्यूं बैठे होँ मालिक कुच्छ चाहिए क्याँ' मुन्ना बाबू कि तौ बाँछे खिल गई। खुल्लम खुल्ला चुदाई कां निमंत्रण थां। झट सें बोले 'चाहिए तोँ अवश्य अगर तुँ देदे तौ मेले मे सें पायल दिलवा दूँगा'। खुशी केँ मारे तौ साली लाजवंती कां चेहरा च्मकने लगा, मुफ़्त मे मजा औऱ माल दोनो मिलने कां आसार नज़र आँ रहा थां। झट सें वही पर्र घास पऱ बैठ गई औऱ बोलीं 'हाई मालिक कितना बड़ा औऱ मोटा हैं आपका, कहा कुन्वारियो केँ पिछे पड़े रहते हौ, आपका तोँ मेरे जैसी विवाह शुदा औरतो वाला औज़ार हैं, बसंती तौ साली पूरा लेँ भि नहीं पाएगी' छ्होटे मालिक बसंती कां नामसुन केँ चौंकउठे कि इसको केसेपता बसंती केँ बारे मे। लाजवंती नें फिन सें कहा ' कितना मोटा औऱ लंबा हैं, ऐसा लन्ड लेने कि बड़ी तमन्ना थि मेरी'इस पऱ छ्होटे मालिक नें नीचेबैठ तेहुए कहा'आज तमन्ना पूरीकर लेँ, बसचखा दे ज़रा सां, बड़ीतलब लगी हैं' इस पऱ लाजवंती बोलीं 'ज़रा सां चखना हैं याँ पूरा मालिक' तोँ फिन मालिक बोले'हाई पूराचखा दे मेले सें तेरी मनपसंद कि पायल दिवा दूँगा'.
आया कि बात अभि पूरी नहीं हुई थि कि चौधरैयन नें बीच मे बोल पड़ी"ओह मेरी तोँ भाग्य हि फुट गई, मेरा बेटा रंडियों पर्र रुपया लूटारहा हैं, किसी कों लहनगा तोँ किसी हरम्जदि कों पायल बाँटरहा हैं, कहकरआया कों फिन सें एक् लात लगाई औऱ थोड़े गुस्से सें बोलीं "हरम्खोर, तुँ यह सारा नाटक वाहा खड़ी होँ केँ देखेजा रही थि, तुम को ज़रा भि मेरा ख्याल नाँ आया, एक् बारजा केँ दोनो कों ज़रा सां धमका देती दोनोभाग जाते".आया नें मुँह बिचकाते हुएकहा "शेर केँ मुँह केँ आगे सें नीवाला छीनने कि औकात नहीं हैं मेरी मालकिन मे तौ बसचुप चाप तमाशा देखरही थि"। कहकरआया चुप होँ गई औऱ बुर कि मालिश करनेलगी। चौधरैयन केँ मन कि उत्सुकता दबाए नहींदब रही थि कुच्छ देर मे स्वयं हि कसमसा कर बोलीं "चुप क्यूं होँ गई आगेबता नां"
गाँव का राजा (Completed) - Gaon Ka Raja - Continue reading next part
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