दिल अपना प्रीत परायी Written By FTK (Completed) - Dil Ka Dard - Full Story Part 1
#1
“तुझेही नां देखू तौ सुकून मुझेआता नहि, इक तेरे सिवाकोई औऱ मुझे भाता नहि कही मुझे प्रेम हुआ तौ नहि कही मुझे प्रेम हुआ तोँ नहि। नाआअन ऩाऩा नां नना ”
कमरे कि खिड़की सें बाहर् होती बरसात कों देखते हुए मे यह गानासुन रहा थां धीमी आवाज़ मे बजतेइस गाने कों सुनते हुए बाहर् बरसात कों देखते हुएपता नहि मे क्याँ सोचरहा थां शायदयह उसहवा कां असर थां जौ हौले हौले सें मेरे गालो कों चूमकर जारही थि याँ फिनउस अल्हड जवानी कां नूर थां जोँ अब दस्तक देरही थि
पता नहि कब मेरे होंठउस गाने केँ अल्फाजो कों गुनगुनाने लगे थें चेहरे पर्र एक् मुस्कान थि जिसका कारण मे नहि जानता थां पऱ कुछ तोँ थां इन फिज़ाओ मे कोई तोँ बात थि इन हवाओ मे जौ सबकुछ अच्छा अच्छा सां लगरहा थां पहले कां तोँ पता नहि पर्र अबदिल यह जरुर कहता थां कि कोई तौ हौ, मतलब.
“क्याँ बात हैं आज तोँ साहब कां मूडअलग अलग सां लगरहा हैं यह बरसात कि बुँदे यह चेहरे पऱ हसी औऱ रोमांटिक गानेआज तौ बदले बदलेलग रहे हौ ”
“आप् कबआई भाभी, ” मैंने पीछेमुड करकहा
“क्याँ फरक पड़ता हैं देवरु जी, अब आपको हमारा होशकहा आजकल भाभी आपको दिखाई कहा देती हैं वैसे भि ”
“क्याँ भाभी आपको तौ बस मौका चाहिए टांग खीचने कां ”
“अच्छा, बच्चू, औऱ जोँ मेरागला बैठ गय़ा कितनी देर सें चिल्ला रहीहु मे कि स्पीकर कि आवाज़ कमकरलो कमकरलो निचे सें मुम्मी जी क्रोध कररही हैं ”
“मे कम हि तौ हैं भाभी ”
“माँ जी कों पसन्द नहि घऱ मे डेक बजाना पर्र आप् मानते नहि हौ ”
“भाभी इसके सहारे हि तौ थोडा समयपास होँ जाता हैं ”
“मुझे नहि पता मे बस बोलने आई थि अच्छा, मौसम थोडा मस्ताना हैं तौ ऐसे मे एक् एक् कपगरम चाय होँ जाये ”
“मे भि आपकोयह हि कहने वाला थां भाभी ”
“बनाती हु किचन मे आँ जानां जल्द हि ”
“आताहु ”
मैंने एक् गहरी साँसली औऱ डेक कों बंद किया औऱ सीढिया उतरते हुए निचेआने लगातभी माँ सें मुलाकात होँ गई,
“ओये, कितनी बार तुम कोकहा कि बरसात मे आँगन मे पानी इकठ्ठा होँ जाता हैं फिन नालीजाम हौ जानी हैं तौ साफकर दियाकर पऱ तूने तौ शपथखा ली हैं कि मां कां कहा नहि करना ”
“मे, अभि कर दूंगा मुम्मी जी ”
“यह तोँ तूँ कब सें बोलरहा हैं कुछदिन पहलेजब बरसात आई थि तब भि ऐसे हि बोलरहा थां नालायक कुछ जिम्मदार बन तूँ कब तक मुझसे बाते सुनता रहेगा ”
“मे करताहु ”
मुझे बरसात मे भीगना बहोत बुरा लगता थां पऱ क्याँ करू आँगन मे पानी इकठ्ठा होँ जाता तौ भि दिक्कत तोँ मैंने कपडे उतारे औऱ कच्छे बनियान मे हि लग गय़ा पानी बाहर् निकालने कों, पर्र बरसात कों भि पता नहि क्याँ दुश्मनी थि अपने सें वोँ भि तेज होनेलगी
शरीर मे हल्ल्की हलकी सि कम्पन होनेलगी बरसात कि ठंडी बुँदे मेरे वजूद कों भिगोने लगी बनियान मेरेबदन सें चिपकने लगी तोँ एक् कोफ़्त सि होनेलगी मे तेजी सें झाड़ू कों बुहारते हुए पानी कों इधरउधर कररहा थां पऱ मरजानी बारिश भि आज अपनीमूड मे थि
तभी मैंने देखा कि भाभी एक् बाल्टी औऱ डिब्बा लिए मेरी हि औऱ आँ रही हैं
“आप् क्यूं भीगते होँ भाभी मे कर तौ रहाहु ”
“तेरी तोँ पता हैं मुझे बारिश मे भीगना कितना अच्छा लगता हैं औऱ इसी बहाने तेरी सहायता भि होँ जाएगी वर्ना साम होँ जानी पर्र तूने न् ख़तम करनायह काम ”
वोँ बाल्टी मे पानी इकट्ठा कर केँ फेकने लगी औऱ मे नाली कों साफ़ करनेलगा तभी मेरीनजर भाभी पर्र पड़ी औऱ मेरीनजर रुक सि गयीँ,, देखा तोँ मैंने उसे कितनी बार थां पऱ इस लम्हा मेरी नजरो नें वोँ देखा जोँ मैंने पहलेकभी नहि देखा थां याँ युकहू कि कभी महसूस नहि किया थां
काली साड़ी मे वोँ बारिश मे भीगती, उसने जोँ साड़ी केँ पल्लू कों अपनीकमर मे लगाया हुआ थां तौ उसकेपेट पऱ पड़ती वोँ बारिश कि बुँदे जैसेचूम रही होँ उसकीनरम खाल कों, उसने जौ धीरे-धीरे सें अपने चेहरे पऱ आँ गई, जुल्फों कि उन गीलीलटो कों अहिस्ता सें कान केँ पीछे किया तौ मैंने जानां कि नजाकत होती क्याँ हैं
पता नहि यह मेरीनजर कां खोट थां याँ कोई औऱ दौर थां पऱ कुछ भि थां आज पहलीबार महसूस हुआ थां उसके हाथो मे पड़ी वोँ चूडिया जोँ खनक पर्र बरसात केँ हंगामा केँ संग अपना म्यूज़िक बाँटरही थि याँ फिन उसके होंठो पऱ वोँ लाल लिपिस्टक जिसे बुँदे अपनेसंग हलके हलके सें बहारही थि
भीगी साड़ी जौ उनके जिस्म सें इसतरह चिपकी हुई थि पता नहि क्यूं मुझेजलन सि हुई वोँ हसीन सां चेहरा, पतलीकमर वोँ सलीका साड़ी बंधने कां वोँ बड़ी बड़ी आँखे एक् मस्ताना पण सां थां उनमे, तभी मर ध्यान टुटा मैंने नजर नीचीकर ली औऱ नाली साफ़ करनेलगा पऱ दिलयह क्याँ सोचने लगा थां यह मे नहि जानता थां
लगभगआधे घंटे तक हम् पानीसाफ करतेरहे बरसात भि अबमंद हौ चली थि भाभी मेरी औऱ आँ हि रही थि कि तभी उनका शायद पांव फिसला औऱ गिरने सें बचने केँ लिए उसने अपनाहाथ मेर कंधे पर्र रखा मे एक् दम सें हडबडा गय़ा पर्र किसतरह सें थाम हि लिया
पऱ मेराहाथ भाभी केँ कुलहो पर्र आँ गय़ा, वोँ अधलेटी सि मेरी बाहों मे थि आँखेबंद हौ गयीँ, उनकेआज पहलीबार उनको मैंने युछुआ थां मेरी नजरे भाभी केँ ब्लाउज सें दिखती उनकी मम्मों कि उस घाटी पऱ जौ लगी तोँ हट नां पाई
“अब छोड़ो भि, ”उन्होंने कहा तौ मुझेहोश आया
मैंने देखा मेराहाथ भाभी केँ कुलहो पऱ थां तोँ मुझे लज्जा सि आई औऱ मैंने अपनाहाथ हटा लिया भाभी नें कुछ नहि बोलाबस अंदरचली गई, मे बाल्टी उठाने कों हुआ तौ मैंने देखा मेरे कच्छे मे तनाव थां, ओहकही भाभी नें देखा तौ नहि
अगरदेख लिया तोँ क्याँ सोचेगी वोँ कही मेरे बारे मे कुछगलत तोँ नहि सोचेंगे मे लज्जा सें पानी पानी हौ गय़ा पर्र पता नहि क्यूं अच्छा भि लगापता नहि यह उफनती हुईँ सांसो मे जौ एक् खलबली सि मची थि याँ फिनऊपर आसमान मे उमड़ते हुएउन बादलो कां जोश थां जौ अभि अभि ठन्डे हुए थें पऱ फिन सें बरसने कों मचलरहे थें
उस एक् समय मे भाभी कां वोँ रूप किसी हीरोइन सें कम नाँ लगाकुछ देरबाद काम समेटकर मे अन्दर गय़ा भीगाहुआ तोँ थां हि बसअब नाहाकर कपडे बदलने थें मे बाथरूम मे गय़ा पर्र दरवाजा बंद थां मैंने हलके सें खटखटाया
“मे हु अन्दर ” भाभी कि आवाज़ आई
“भाभी ”
“मुझे थोडा समय लगेगा तुम् बाहर् नलके पे नाहालो ”
“मे पर्र भाभी ”
“पऱ वर क्याँ अब सुकून सें नहाने भि नां दोगे क्याँ वैसे तौ रोज क्याँ नलके पे नहि नहाते हौ ”
“भाभी वोँ दरअसल मेरा कच्छा बाथरूम मे हैं ”
“तूँ भि नाँ, अच्छा रुक एक् मिनटजरा ”
तभी सिटकनी खुलने कि आवाज़ आई औऱ फिन भाभी कां हाथ बाहर् आया कच्छा पकड़ते हुए जौ उनकी गीली उंगलिया मेरी हथेली सें छू गई, शपथ सें पुरे जिस्म मे करंट सां दौड़ गय़ा कंपकंपाहट लगनेलगी
“अब छोड़ भि मेराहाथ याँ ऐसे हि खड़ा रहेगा ”
“सॉरी भाभी ” मैंने जल्द सें हाथ हटाया औऱ दौड़ पड़ा नलके कि औऱ
नलके पे नहाते हुए पानी मुझे भिगो तौ रहा थां पर्र मेरे अन्दर एक् आग सि लग गई, थि एक् खलबली सि मच गई, थि उनकी उंगलियों नें जौ छुआ थां वैसे तोँ कईबार उन्होंने मुझेछुआ थां पर्र ऐसाकभी महसूस नहि किया थां मैंने जैसे तैसे मे नहाया उसकेबाद मे अपना कच्छा सुखाने बाथरूम मे गय़ा तब तक भाभी निकल चुकी थि
पर्र उनके गीले कपडेवही थें, मैंने एक् बारइधर उधर देखा औऱ फिन अपने कापते हुए हाथो सें उसकी ब्रा कों उठाया ओफफ्फ्फ्फ़ ऐसालगा कि भाभी कि मम्मों कों हि हाथ मे लेँ लिया होँ मैंने धड़कने बढ़ सि गयीँ, पास हि उसकी कच्छी पड़ी थि एक् बार उसको भि देखने कि आस थि पर्र बाहर् किसी केँ कदमो कि आहातआई तौ फिन मे वहा सें निकल गय़ा
बस कपडेपहन कर सजधजकर हि हुआ थां कि भाभी कि आवाज़ आई“गरम चायपी लो ” तोँ मे निचे किचन मे आया भाभी नें गिलास मुझे पकडाया औऱ उसकी उंगलिया एक् बारफिन सें मेरी उंगलियों सें टकरा गयीँ, भाभी नें सूट-सलवार पहनाहुआ थां जोँ उनके जिस्म पऱ खूबजंच रहा थां
“क्याँ हुआ देवरु जीऐसे क्याँ ताकरहे होँ मुझे ”
“नहि तोँ भाभी, ऐसाकहा ”
“वैसे आजकलकुछ खोये खोये सें लगते हौ क्याँ माजरा हैं ”
“ऐसा तोँ कुछ नहि भाभी ”
“कुछ तौ हैं देवर जीजी वैसे आजकल मुझसे बाते छुपाने लगगए हौ ”
भाभी, कुछ होता तौ आपको नां बताता ”
“चलोकोई बात नां, मे कहरही थि कि बारिश भि रुक गयीँ, हैं तोँ याद सें बनिए कि दुकान सें घऱ कां राशन-पानी लें आनां माँ जी कों मालूम हुआ तौ फिन क्रोध करेगी ”
“मे ठीक हैं पऱ हमेशा मे हि क्यूं कामो मे पिलता हु ”
“क्योंकि घऱ मे आप् हि तोँ हौ आपके भइया औऱ तोँ साल मे दोतीन बार हि आते औऱ पापा तोँ बस सरपंची केँ कामो मे हि ब्यस्त रेहते तौ बाकि वक्त आपको हि सभी संभालना होगा ”
मे- ठीक हैं भाभी लें आऊंगा औऱ कोई फरमाइश
वोँ बस मुस्कुरा दि औऱ मे अपनी साइकिल उठा केँ घऱ सें निकल गय़ा बरसात सें रस्ते मे कीचड सां होँ रहा थां तोँ मे थोडा संभल केँ चलरहा थां पऱ वोँ कहते हें नाँ कि बस होँ हि जाता हैं तोँ पता नहि कहा सें एक् चुनरिया उडती हुईँ आई औऱ मेरे चेहरे पर्र आँ गिरी
दिल अपना प्रीत परायी Written By FTK (Completed) - Dil Ka Dard – New Episode
#2
उसमे मे ऐसा उलझा कि सीधा कीचड मे जा गिरा कपडे हि क्याँ मे मेरा चेहरा सभीसन गय़ा आसपास केँ लोग हसनेलगे मुझे क्रोध भि आया पर्र उठा साइकिल कों भि उठाया औऱ देखने लगा कि चुन्नी आईकहा सें तौ देखा कि साइड वालेघऱ कि छत पऱ एक् लड़की खड़ी हैं
बिना दुपट्टे केँ गुस्से सें उसकोकुछ कहने हि वाला थां कि नजरो नें धोखादे दिया एक् बारनजर जौ उस पऱ रुकी तोँ बस बगावत हि हौ गयीँ, समझो सफ़ेद सूट मे खुल्ल्ले बाल उसके गोरारंग लम्बी सि गरदान औऱ उसकी वोँ नीली आँखेबस फिनकुछ कह हि नाँ पाए
जैसे हि उसने मुझे देखा एक् बार तौ उसकी भि हंसीछुट गयीँ, पर्र फिन उसने धीरे-धीरे सें कान पकड़ते हुए जोँ सॉरीकहा शपथ सें हम् तौ पिघल हि गयीँ, बसहसदिए कीचड मे सने अपने दांत दिखा केँ, अब कैसा जानां थां बनिए केँ पास तौ हुए वापिस घऱ कों
औऱ जैसे हि रखाकदम मां नें बारिश करदी हमारे ऊपरजली- कटी बातो कि
“अबकहा लोटआया तुँ, एक् कामठीक सें नां होतापता नहि क्याँ होगाइस लड़के कां हमेशा उल जलूल हरकते करनी हैं इसकोजा मरजा बाथरूम मे औऱ जल्द सें नहा लेँ राणाजी आते हि होंगे तेरीऐसे देखंगे तौ क्रोध करेंगे ”
कभीकभी इतना क्रोध आता थां कि घऱ कां छोटा बेटा न् बनाये भगवन किसी कों मेरा भइया फ़ौज मे थां साल मे दोतीन बारआता तोँ सभी उसकेआगे पीछे हि फिरते पऱ उसके जाने केँ बाद मे थक सां गय़ा थां यहसभी काम संभालते हुए पापा बहोत कमजाते थें खेतो पर्र अधिकतर वोँ अपनी सरपंची मे भि रहते मे पढाई करता औऱ दोपहर बादखेत संभालता ऊपर सें घरवालो कि बाते भि सुनाता
अब मे नां जाऊंगा बनिए कि दुकान पर्र चाहेकुछ भि हौ ”
“तौ फिन खानां तूँ रोटीआज मे भि देखती हु, तेरे नखरेकुछ अधिक होनेलगे हैं आजकल मे बतारही हु तूँ उल्टा जवाब नां दियाकर वर्ना फिर् मेराहाथ उठ जानां हैं ”
गुस्से मे भराहुआ मे अपने कमरे मे आया औऱ बिस्तर पर्र बैठ गय़ा पर्र निचे सें माँ कि जलीकटी बाते सुनता रहा तोँ औऱ मन ख़राब होनेलगा मे घऱ सें बाहर् निकल पड़ा खेतो कि तरफसाम होनेलगी थि चूँकि बरसात हुइ थि तोँ अँधेरा थोडा सां जल्द होनेलगा थां मे खेतो केँ पास पुम्प्सेट पऱ बैठासोच रहा थां कुछ
जब मैंने भाभी कों थामा थां अपनी बाँहों मे तोँ केसे उसके चूतडो पऱ मेराहाथ कस गय़ा थां कितने रसीले लगे थें वोँ औऱ भाभी कि चुचियो कि घाटी मेरामन डोलने लगा अजीब सें ख्याल मेरमन मे आनेलगे भाभी केँ बारे मे औऱ मेरा लन्ड टाइट होनेलगा उसमे तनावआने लगा मुझे बुरा भि लगरहा थां कि भाभी केँ बारे मे सोच केँ मेरा लन्ड तनरहा हैं औऱ अच्छा भि लगरहा थां
मेरी कनपटिया इतनी ज़्यादा गर्म होगयी थि कि मे क्याँ बताऊ, मैंने अपनाहाथ पायजामे मे डाला औऱ अपने लन्ड कों सहलाया पऱ वोँ औऱ ज़्यादा खड़ा हौ गय़ा, वैसे मौसम भि थां अब अपने कों बुर कहा मिलनी थि तोँ सोचा कि हिला हि लेताहु आज मैने उसको बाहर् निकाला औऱ सहला हि रहा थां कि.
मैंने पायजामे कों थोडा सां निचे सरकाया औऱ अपने लन्ड कों कस लिया मुठी मे उसको दबाने लगा जैसे बिजली कि सि तरंगे दौड़ने लगी थि मेरेतन शरीर मे लिंगआज हद सें अधिक कठोर हौ गय़ा थां उसकी वोँ हलकी नीली सि नसेफूल गयीँ, थि जिन्हें मेरी हथेली साफ़ महसूस कररही थि मैंने धीरे-धीरे सें अपने सुपाडे कों पीछे कि तरफ किया औऱ उस पऱ अपनी उंगलिया फेरी
सुपाडे कि संवेदन शील चमड़ी सें जैसे हि मेरी सख्त हथेली रगड़ खायी, जिस्म मे कंपकंपी सि मच गयीँ, “अहह ” धीमे सें एक् अहह मेरे होंठो सें फुटपड़ी पता नहि यह भाभी केँ ख्यालो कां असर थां याँ बरसात केँ बाद कि चलती ठंडीहवा कां जोर थां हाथो मे उत्तेजित लिंगलिए मे पंप हाउस केँ पासखड़ा मे मुठी मारने कां सुख प्राप्त कररहा थां
धीमी धीमीआहे भरतेहुए मे भाभी केँ बारे मे सोचते हुए अपने लन्ड कों मुठिया रहा थां आज सें पहले मैंने भाभी केँ बारे मे नाँ कभीऐसा महसूस किया थां औऱ नाँ हि कभीऐसे हालात हुए थें जब कच्छा पकड़ाते हुए उनकी वोँ नरम उंगलिया मेरेहाथ सें उलझ गयीँ, थि याँ जब मेरे कठोर हाथो नें भाभी केँ नितम्बो कों सहलाया थां उफ्फ्फ मेरा लन्ड कितने झटकेमार रहा थां
रगों मे खौलता गर्मखून वीर्य बनकरबह जानां चाहता थां समय लम्हा मेरी मुठी लन्ड पर्र कसतीजा रही थि बसदोचार लम्हों कि बात औऱ खेलख़तम हौ जानां थां दिल मे बस भाभीसमा गयीँ, थि उस लम्हा मे ऐसी कल्पना करतेहुए कि मे भाभी हि चोदरहा हु मे अपनी वासना केँ चरम पर्र बस किसी भि समय पहुच हि जाने वाला थां मेरा जिस्म अकड़ने लगा थां पर्र तभी
पर्र तभी एक् स्वर मेरे कानो मे गूंजा “यह क्याँ कररहे होँ तुम् ”
औऱ झट सें मेरी आँखेखुल गयीँ, औऱ मैंने देखा कि हमारी पड़ोसन चंदा चाची मेरे बिलकुल सामने खड़ी हैं मेरी आँखे जोँ कुछसमय पहले मस्ती मे डूबी हुई थि अब वोँ हैरत औऱ डर सें फटी हुई थि
“चाची। aaappppppppppp यहाह्ह्हह्ह ” मे बस इतना हि बोल पाया औऱ अगले हि लम्हा मेरे लन्ड सें वीर्य कि पिचकारिया निकलकर सीधा चाची केँ पेट पर्र गिरने लगी हालत बिलकुल अजीब थि चाची उस छोटे सें लम्हा मे अपनी आँखे फाडे मेरीतरफ देखरही थि औऱ मे चाहते हुए भि कुछ नहि पारहा थां बल्कि वीर्य छुटने सें जौ मज़ामिल रहा थां उसकेसंग हि सामने खड़ी चाची कों देखकर दिल मे दोतरह कि भावनाए उमड़आई थि
हम् दोनों बस एक् दुसरे कों देखरहे मेरा झटके खाताहुआ लन्ड चाची केँ पेट औऱ साडी कों पर्र अपनीधार माररहा थां चाची कुछकदम पीछे कों हुईँ औऱ तभी मेरी आखिरी धारठीक उसकी नाभि पऱ पड़ी स्खलित होते हि डरचढ़ गय़ा मैंने जल्दी अपने पायजामे कों ऊपर किया चाची कि आँखेतब तक गुस्से सें दहकउठी थि
“मरजाने यह क्याँ कर दिया ” चिल्लाते हुए वोँ मेरा वीर्य साफ़ करतेहुए बोलि
“माफ़कर दो चाची वोँ, वोँ बस। ”
“लज्जा नहि आती तुझेही, केसे गंदेकाम कररहा हैं नालायक औऱ मुझे भि गन्दी कर दिया तुँ आजघऱचल तेरी मां कों बताती हु तेरी करतुते मे तोँ कितना भोला समझती थि पर्र देखो खुले मे हि केसे। तूँ आज आँ घऱ ”
“चाची, चाची जैसा आप् समझरही हैं वैसाकुछ नहि हैं ” मैंने नजर झुकाए हुएकहा
“पूरी कों चिचिपी कर दिया औऱ कहता हैं ऐसाकुछ नहि हैं ”
“चाची, गलती हौ गई, माफ़ीदे दोआगे सें ऐसाकुछ नहि होगा वोँ बस। ”
“बस क्याँ। ”
“चंदा कितनी देर लगाएगी अँधेरा होँ रहा हैं देर हौ रही जल्द आँ ” मैंने देखा थोड़ीदूर सें हि एक् महिला चाची कों पुकार रही थि तोँ चाची नें एक् बार मुझे देखा औऱ फिन बोलि “आँ रहीहु ”
थोड़ीदूर जाने पऱ वोँ पलटी औऱ बोलीं “तेरी मां कों बताउंगी ” औऱ फिनचल दि
मे घबरा गय़ा बुरीतरह सें क्योंकि घऱ मे वैसे हि डांट पड़ती रहती थि औऱ अबयह चंदा चाची नें भि मुठी मारते हुएपकड़ लिया थां अब वोँ घऱ पे कह देगी तौ मुसीबत होँ हि जानी थि कुछ देरवही बैठा बैठा मे सोचता रहा पप्रघऱ तौ जना हि थां वहा नहि जाऊ तोँ कहाजाऊ
जबकुछ नहि सुझा तोँ धीमे कदमो सें चलतेहुए मे घऱ पंहुचा तोँ देखा कि राणाजी आँगन मे बैठे हुक्का पीरहे थें मुझेदेख कर बोले “आँ गय़ा, मे तेरी हि राहदेख रहा थां ”
औऱ उसीसमय मेरी गांडफट गयीँ, मे जान गय़ा कि चंदा चाची शिकायत कर गई, हैं औऱ अब सुताई होगी तगड़े वाली
“योकोई टेम हैं तेराघऱ लौट केँ आने कां कितनी बारकहा हैं कि फालतू मे चक्कर नाँ काटाकर ”
“पिताजी, सां वोँ खेतो पऱ गय़ा थां आने मे देर हौ गई ”
“देर तोँ चोखी पऱ केँ बात हैं आजकल नवाब साहब कि कुछ अधिक हि शिकायते मेरे कानो मे आँ रही हैं आज थारा मास्टर जी मिले थें बतारहे थें कि पढाई मे ध्यान कम हि हैं तुम्हारा ”
“पिताजी सां वोँ थोडा अंग्रेजी मे हाथतंग हैं बाकिसभी ठीक हैं ”
“देख छोरे, मन्ने तेरे बहाने न् सुन नें, पढाई करनी हैं तौ ठीक सें कर नहि तोँ अपनाकाम संभाल इतने लोगो मे उस मास्टर नें बेइज्जती सि कर दि यो बोलके कि राणाजी थारा छोराठीक नं हैं पढाई मे, औऱ तन्ने तोँ पता हैं राणा हुकम सिंह जीवन मे कि चीज़ सें प्रेम करे हैं तौ वोँ हैं उसकीशान सें तौ कानखोल केँ सुन लें पढाईबस कि नाँ हैं तोँ बोलदे ”
“पिताजी सां मे कोशिश कररहा हु सुधार कि ”
“केसे, पढाई थारे सें होँ नां रही, घऱ कां काम करना नहि थारी मां बतारही थि कि बनिए कि दूकान सें खाने-पीने जैसे छोटे मोटेकाम भि नाँ करतेबस गाने सुनते होँ ”
“जी, वोँ कभीकभी बसऐसे हि ”
“मेरेघऱ मे ऐसे हि नाँ चलेगी, याँ तौ कायदे सें रहोकाम करो ”
“ जी वोँ मे कचड़ मे गिर गय़ा थां औऱ इसलिये नां जा पाया ”
“बहाने नहि छोरे, काम नं होता तौ कोईबात नाँ पऱ बहाने नां बना ”
“जी मे क्याँ नहि करता पढाई सें आते हि सीधा खेतो मे जाताहु औऱ मजदूरो जितना हि काम करताहु फलो केँ बाग़ देखता हु औऱ आपकेहर हुकम कों पूरा करताहु अब राशन-पानी केँ दिनलेट आँ जायेगा तोँ कौन सि आफत आँ गई,, आपकेपास इतने नौकर हैं पर्र घऱ मे एक् भि नहि बस मुझे हि। “
“आवाज़ नीचीरख छोरे ” माँ नें बोला
“ नं, नां रखु आवाज़ निचे, आखिर क्यूं सुनु मे जबइसघऱ केँ लिए मे इतनाकाम करताहु इर भि जलीकटी बातेसुन नें कों मिलती हैं यहमतकरो वोँ मतकरो इसघऱ मे कैदी जैसा महसूस करताहु मे सच तोँ यह हैं रोटी भि गिन केँ खाऊसु, ”
तड़कतड़क बातख़तम होने सें पहले हि मां कां हाथ मेरेगाल पर्र थां, “कहा, न् आवाज़ नीचीरख औऱ केँ गलतकह रहे हैं राणाजी, थारेभला हि चाहते हैं वोँ इतनाकुछ किया हैं तुम्हारे लिए वोँ त्र भइया तौ फौज मे जाकेबैठ गय़ा औऱ तूँ नालायक कभी सोचा केसेसभी होँ रहा हैं ”
“तौ मे भि तोँ अपनी तारफ सें पूरी कोशिश करताहु ” रोतेहुए बोला मे
“छोरे, सुधरजा, इसे मेरी आखिरी बात समझियो जाअब अन्दर जा ”
“जस्सी, आजइसे खानां नाँ दिए, मरनेदे भूखा, तब जाकेहोश ठिकाने आयेंगे नवाबजादे केँ ” माँ चिल्लाई
अपने दर्द कों दिल मे छुपाये मे अपने कमरे मे आँ गय़ा गाल अभि भि दर्दकर रहा थां, बहुतदेर खिड़की केँ पासखड़ा मे सोचता रहा अपने बारे मे घऱ वालो केँ बारे मे राणाजी कां नालायक बेटा बसइस सें ज़्यादा मेरीकोई हसियत नहि थि औऱ नालायक इसलिये थां क्यंकि पिता जैसा नहि बन नं चाहता थां
राणा हुकम सिंह, गाँव केँ सरपंच पर्र विधायक कि हसियत रखते थें बाहुबली जौ थें, कट्टर इन्सान पऱ वचन केँ पक्के इनके हुकम कों टालदे किसी कि हिम्मत नहि औऱ मे जैसेकैद मे कोई परिंदा, नफरत करता थां मे उनकेइस अनुशाशन सें जीना चाहता थां अपनी शर्तो पे दुनिया देख्ना चाहता थां
कालीरात मे टिमटिमाते तारो कों देखते हुए मे सोचरहा थां कि तभी कमरे मे किसी कि आहाट हुईँ खट्ट कि आवाज़ हुइ औऱ बल्बजल गय़ा सामने भाभीखड़ी थि हाथो मे खाने कि थालीलिए
“आपको नहि आनां चाहिए थां भाभी, मां कों पता चलेगा तोँ आपको भि डांट पड़ेगी ”
“सभीसो रहे हैं औऱ वैसे भि जब तुम् भूखे होँ तोँ मुझे नींद नहि आएगी ”
“भूख नां हैं भाभी ”
“ऐसे केसेभूख नहि हैं देख मैंने भि अभि तक खानां नहि खाया हैं तूँ नहि खायेगा तोँ मे भि भूखी हि सो जाउंगी सोच लें ”
अब भाभी केँ सामने क्याँ बोलता, बैठ गय़ा उनकेपास भाभी नें निवाला तोडा औऱ मुझे खिलाने लगी मेरीआँख सें दर्द कि एक् बूंद गालो कों चुमते हुए निचेगर गई,
इसघऱ मे अगरकोई थां जोँ मुझे समझती थि तौ वोँ जस्सी भाभी थि कितनी फ़िक्र करती थि मेरी भाभी केँ जाने केँ बाद मे अपराध बोध सें भर गय़ा कि भाभी मेरेलिए इतना करती हैं औऱ मे उसके बारेसोच केँ.
मित्रो! यहकथा अब रोजाना एपसोड केँ संग शुरुआत कर दि हैं. पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दें
दिल अपना प्रीत परायी Written By FTK (Completed) - Dil Ka Dard – New Episode
#3
सुभह सावन कि रिमझिम नें अपनी बाहे फैलाकर मेरा इस्तकबाल किया खाकी पेंट औऱ नीली शर्टपहन कर मैंने बालो मे कंघी मारी औऱ साइकिल पे कपडामार केँ साफ किया औऱ पैडल मारते हुए निकल गय़ा घऱ सें हवा मे जौ हलकी हलकी बुँदे थि अच्छी लगरही थि चेहरे सें टकराते हुए
मोहल्ले कों पार करतेहुए ठीकउसी स्थान पहुचगए जहाकल गिरगए थें तोँ जान केँ साइकिल रोकली एक् नजर छज्जे पऱ डाली पऱ वहाकोई नहि थां तोँ बढ़गएआगे पऱ दिल नें पता नहि क्यूं कहा कि आस थि किसी केँ दीदार कि थोडा वक़्त तोँ ठीक गय़ा पऱ फिनपता नहि क्यूं बेचैनी सि होँ गयीँ, दिल मे कुछ घरवालो कि कडवी बातेयाद आँ गई, कुछ अपनी तन्हाई
तौ फिन निकलगए अपने खेतो पर्र जोँ लगभगडेढ़- दो किलोमीटर दूर पड़ते थें बारिश पिछली रातजोर कि हुईँ थि तोँ स्थान स्थान पानीजमा थां, वहा जाकर देखा कि चंदा चाची पहले सें हि मौजूद थि तोँ दिल मे थोड़ी सि कायली आँ गई, पऱ अब जाये भि तोँ कहाजाए, पंप कों चालू किया औऱ बैठगए वही पर्र कुछदेर मे चंदा चाची आई
औऱ बिना मेरीतरफ देखे अपनेपेर धोनेलगी जोँ कीचड़ मे सनेहुए थें उन्होंने अपने घाघरे कों घुटनों तक ऊँचाकर लिया जबकि उसकीकोई जरुरत नहि थि, मैंने देखा उनके पैरो कों गोरे छरहरे पैरो मे चांदी कि पायलपड़ी थि वोँ भि शायदकुछ अधिक टाइम लेँ रही थि उसकेबाद उन्होंने अपने चेहरे पऱ पानी उडेलना शुरुआत कियामुह धोरही थि इसी कोशिश मे आँचलसरक गय़ा औऱ ब्लाउज सें बाहर् कों झांकते
उनके उभार मेरीनजर मे आँ गए, जोँ कि उस गहरेगले वाले ब्लाउज कि कैद मे छटपटा रहे थें ऊपर सें पानी गिरने सें ब्लाउज कुछ गेला सां होँ गय़ा थां तौ औऱ नजरे तड़पने सि लगी थि पता नहि क्यूं मेरे लन्ड मी मुझे हलचल सि महसूस हुई तोँ मे उठ केँ पासबने कमरे मे चला गय़ा पऱ उत्सुकता, दहलीज सें फिन जोँ देखा चाची मेरीतरफ हि आँ रही थि
“लगता हैं बारिश पड़ेगी ”
“सावन हैं तोँ बारिश हि आएगी चाची ”
“तुम्हें बड़ापता हैं सावन कां ”थोडा हस्ते हुए सि बोलि वोँ
मे झेंप गय़ा चाची पासपड़ी चारपाई पऱ बैठ गई, मे खड़ा हि रहा, कलजिस तरह सें उसने मुझेदेख लिया थां तोँ अब नजरे मिलाने मे कतरारहा थां मे, तभी बूंदा- बांदी शुरुआत हौ गयीँ, जोँ जल्द हि तेज होँ गई, चाची बाहर् कों भागी औऱ थोड़ी दुरी पर्र रखीघास कि पोटली कों लेकर अन्दर आईतब तक वोँ आधे सें अधिकभीग गई, थि
चाची नें अपनी चुनरिया चारपाई पर्र रख दि औऱ जिस्म कों पौंचने लगी उसकीपीठ मेरीतरफ थि औऱ जैसे हि वोँ थोड़ी सि झुकी उसकेगोल मटौल चुतड पीछे कों उभरआये उफफ्फ्फ्फ़ फिरभी मैंने उसे भि कभीऐसे नहि देखा थां पर्र अबआँख थोड़ी नं मूँद सकता थां कुछदेर वोँ ऐसे हि रहीफिन उसने अपनामुह मेरी औऱ किया औऱ करीब अंगड़ाई सि ली
जिस सें दो लम्हा केँ लिए उसकी चुचिया हवा मे तन सि गई, पर्र फिन उसने चुनरिया ओढ़ली औऱ बद्बदाने लगी “कम्बक्त, बरसात कों भि अभि आनां थां अबघऱ केसे पहुचुंगी, थोड़ीदेर मे अँधेरा सां हौ जायेगा औऱ लगता नहि बरसात जल्द रुकेगी ”
“अब बरसात पे आपकाजोर थोड़ी नं हैं चाची ” चाची नें घुर केँ देखा मुझे औऱ फिन चारपाई पऱ बैठ गयीँ, मे दरवाजे पे खड़ेखड़े बरसात देखता रहा लगभग घंटाभर होँ गय़ा थां पर्र बारिश घनी हि होतीजा रही थि औऱ चंदा चाची कि बेचैनी बढतीजा रही थि थोड़ी ठण्ड सि लगनेलगी थि अँधेरा भि हौ गय़ा थां तोँ मैंने चिमनी जलाई थोड़ी रौशनी होँ गयीँ,
“कब तक खड़ा रहेगा बैठजा ”
तोँ मे चाची केँ पासबैठ गय़ा पऱ सायसाय हवा अन्दर आँ रही थि तोँ चाची उठी औऱ दरवाजे कों बंदकर दियाबस कुण्डी न् लगाई पर्र हमारे बीचकोई बातचित नहि होँ रही थि थोड़ीदेर औऱ ऐसे हि बीत गई,
“ऐसे गर्दन निचे करके क्यूं बैठा हैं ”
“बसऐसे हि चाची ”
“ऐसे हि क्याँ ”
“वोँ, दरअसल। कल ” मे चुप होँ गय़ा
“ओह, शर्मिंदा हौ रहा हैं हिलाने सें पहले नहि सोचाअब देखो छोरे कों ” वोँ करीब हस्ते हुए बोलीं “कोई नां बेटा हर पत्ते कों हवा लगती हैं ”
तभीपता नहि कही सें एक् चूहा चाची केँ पांव पर्र सें भाग गय़ा तौ वोँ जोर सें चिल्लाते हुए मेरीतरफ होँ गई, मतलब मुझेकस केँ पकड़ लिया औऱ उनकी चुचिया मेरे सीने सें टकरा गयीँ, औऱ गालो सें गाल चाची केँ शरीर कि खुशबु मुझमे समा गयीँ, पलभर मे हि लन्ड तन गय़ा
पऱ तभी चाची अलग हौ गयीँ, औऱ चूहे कों गालिया देनेलगी, मैंने चाची पऱ अबगौर किया 1 बच्चे कि मां उम्रकोई ३३-३४ सें ज़्यादा नहि होगी छरहरा जिस्म पर्र हसीन लगती थि लगभगदो घंटे तक घनघोर बरसने केँ बादमेह रुका तोँ हम् बाहर् आये
“मेरी पोटली उठवाजरा वैसे हि देर हौ गयीँ, हैं क्याँ पता कितनी देर रुका हैं अभि निकल लेतीहु ”
“साइकिल पे बैठजाओ, मे भि तोँ घऱ हि जारहा हु जल्द पहुच जायेंगे ”
“घास भि तौ हैं लाल मेरे ”
“चाची घास पीछेरखो औऱ आप् आगेबैठ जानां ”
“आगे डंडे पे, नां मे डंडे पे नहि बैठूंगी ”
“आपकी मर्ज़ी हैं ”
तभी बादलो नें तेजी सें गर्जना चालू किया तोँ चाची बोलपड़ी “ठीक हैं ”
मैंने घास कि पोटली कों पीछे लादा औऱ फिन चाची कों आगे डंडे पे आने कों कहा अपने घाघरे कों घुटनों तक करतेहुए वोँ बैठ गयीँ, औऱ हम् चलपड़े गाँव कि औऱ, पर्र पैडल मारते हुए मेरे घुटने चाची केँ चूतडो पऱ टकरारहे थें औऱ कुछ मेराबोझ भि उसकीपीठ पऱ पड़रहा थां
उसके शरीर सें रगड़ खातेहुए लन्ड तन नें लगा थां जोँ शायद वोँ भि महसूस करनेलगी थि अब मैंने हैंडल सँभालने कि वजह सें अपने हाथो कों चंदा चाची केँ दोनों हाथो सें रगड़ना शुरुआत कियाबड़ा आनंद आँ रहा थां ऐसे हि हम् जारहे थें गाँव कि औऱ कि तभी एक् मोड़आया औऱ.
दिल अपना प्रीत परायी Written By FTK (Completed) - Dil Ka Dard - Kahani ab aur interesting hogi
badiya shuruwat bro . thodi purani yade bi taja hoi jayegi . ayese aapki bato kaa mein bharosha too nahee krta , kyoki ap kai kaam bolke abi tak nahee kiye hu phir bi asha h kee daily post karoge
Relavant source : click here