धोबी घाट पर माँ और मैं - desi chudai mom son - Full Story Part 1
बात बहोत पुरानी हैं पऱ आज आप् लोगों केँ संग बांटने कां मन किया, इसलिये बतारहा हूं।
हमारा पारिवारिक काम धोबी कां थां, हम् लोग एक् छोटे सें गाँव मे रहते थें औऱ वहा गाँव मे धोबियों कां एक् हि घऱ हैं इसलिये हम् लोगों कों हि गाँव केँ सारे कपड़ेसाफ करने कों मिलते थें।
मेरे परिवार मे मे, मेरी एक् बेहन औऱ मां-पापा हैं। गाँव केँ माहौल मे लड़कियों कि कमउमर मे शादीयाँ हौ जाती हैं। इसलिये जैसे हि मेरी बेहन कि रजस्वला हुईँ, उसकी विवाह कर दि गई औऱ वोँ पड़ोस केँ गाँव मे चली गई।
पिछले एक् साल सें घऱ मे अब मे, मेरी मां औऱ पिताजी केँ अलावा कोई नहि बचा थां। मेरीउमर मेरी बेहन सें एक् सालकम हि थि, गाँव केँ विद्यालय मे हि पढ़ाई-लिखाई चलरही थि। हमारा एक् छोटा सां खेत भि थां, जिस पर्र पापा काम करते थें औऱ मैंने औऱ मां नें कपड़े धोने कां काम संभाल रखा थां।
कुल मिलाकर हम् बहोत सुखी-संपन्न थें औऱ किसीचीज कि दिक्कत नहि थि। मेरे सें पहले कपड़े धोने मे, मां कां हाथ मेरी बेहन बटाती थि।
मगरअब मे येकाम करता थां हम् दोनों मां-बेटे हफ्ते मे दोबार नदी पऱ जाते थें औऱ धुलाई करते थें।
फिनघऱ आकरउन कपड़ों कि ईस्त्री करके उन्हें गाँव मे वापस लौटाकर फिन सें पुराने गन्दे कपड़े इकट्ठे कर लेते थें। हर बुधवार औऱ शनिवार कों सुभह 9 बजे केँ वक़्त मे औऱ मम्मी एक् छोटे सें गधे पऱ, पुराने कपड़ेलाद करनदी कि औऱ निकल पड़ते।
हम् गाँव केँ पास बहने वालीनदी मे कपड़े नाँ धोकर गाँव सें थोड़ादूर जाकर सुनसान स्थान पऱ कपड़े धोते थें क्योंकि गाँव केँ पास वाली
नदी पर्र साफ पानी भि नहि मिलता थां औऱ डिस्टर्बन्स भि बहोत होता थां।
अब मे जरा अपनी मां केँ बारे मे बतादूँ। वोँ 34-35 साल कि एक् बहोत खूबसूरत गोरी-चिट्टी महिला हैं, अधिक लंबी तौ नहि परंतु उसकी लंबाई 5’3″ हैं औऱ मेरी 5’7″ कि हैं।
मम्मी देखने मे बहोत हसीन हैं, धोबियों मे वैसे भि गोरारंग औऱ खूबसूरत होनाकोई नईबात नहि हैं। मम्मी केँ खूबसूरत होने केँ कारण गाँव केँ लोगों कि नजर भि उसकेऊपर रहती होगी, ऐसा मे समझता हूं।
औऱ शायदइसी कारण सें वोँ कपड़े धोने केँ लिये सुनसान स्थान पऱ जानां अधिक पसन्द करती थि।
सबसे आकर्षक उसके मोटे-मोटे चूतड़ औऱ नारियल केँ जैसे बूब्ज़ थें जौ ऐसे लगते थें जैसे ब्लाउज़ कों फाड़कर निकल जाएंगे औऱ भाले कि तरह सें नुकीले थें। उसके चूतड़ भि कम सेक्सी नहि थें। जब वोँ चलती थि तोँ ऐसे मटकते थें कि देखने वाले उसकी हिलती गांड कों देखकर हिल जाते थें।
पऱ उस वक़्त मुझेइन बातों कां कम हि ज्ञान थां।
फिन भि थोड़ा बहोत तौ गाँव केँ लड़कों केँ संग रहने केँ कारणपता चल हि गय़ा थां।
औऱ जब भि मे औऱ मां कपड़े धोने जाते तोँ मे बड़ी खुशी केँ संग कपड़े धोने उसकेसंग जाता थां।
जब मां कपड़े कों नदी केँ किनारे धोने केँ लिये बैठती थि, तब वोँ अपनी साड़ी औऱ पेटिकोट कों घुटनों तक ऊपरउठा लेती थि औऱ फिन पीछे एक् पत्थर पर्र बैठकर आहिस्ता दोनों टांगें फैलाकर जैसे औरतें पेशाब करते टाइम करती हें, कपड़ों कों धोती थि।
मे भि अपनी लुंगी कों जांघ तक उठाकर कपड़े धोता रहता थां।
इस स्थिति मे मम्मी कि गोरी-गोरी टांगें मुझे देखने कों मिल जाती थि औऱ उसकी साड़ी भि सिमटकर उसके ब्लाउज़ केँ बीच मे आँ जाती थि औऱ उसके मोटे-मोटे चूचों केँ ब्लाउज़ सें दर्शन होते रहते थें। कईबार उसकी साड़ी जांघों केँ ऊपर तक उठ जाती थि औऱ ऐसे वक़्त, मे उसकी गोरी-गोरी, मोटी-मोटी केले केँ तने जैसी चिकनी जांघों कों देखकर मेरा लन्ड खड़ा होँ जाता थां।
मेरेमन मे कई प्रश्न उठने लगते, फिन मे अपनासिर झटककर काम करने लगता थां।
मे औऱ मम्मी कपड़ों कि सफाई केँ संग-संग तरह-तरह कि गाँवभर कि बातें भि करते जाते। कई बार हमेंउस सुनसान स्थान पऱ ऐसा
कुछ दिख जाता थां जिसको देखकर हम् दोनों एक् दूसरे सें बात करते, कपड़े धोने केँ बाद हम् वहीं पर्र नहाते थें औऱ फिनसंग लायाहुआ खानां खानदी किनारे सुखाये हुए कपड़े कों इकट्ठा करकेघऱ वापसलौट जाते थें।
मे तौ खैर लुंगी पहनकर नदी केँ अंदरकमर तक पानी मे नहाता थां, मगर मां नदी केँ किनारे हि बैठकर नहाती थि।
नहाने केँ लिये मम्मी सबसे पहले अपनी साड़ी उतारती थि, फिन अपने पेटिकोट केँ नाड़े कों खोलकर पेटिकोट ऊपर कों सरकाकर अपने दांत सें पकड़ लेती थि।
इस तरीके सें उसकीपीठ तौ दिखती थि मगरआगे सें ब्लाउज़ पूराढक जाता थां। फिन वोँ पेटिकोट कों दांत सें पकड़ेहुए हि अंदरहाथ
डालकर अपने ब्लाउज़ कों खोलकर उतारती थि औऱ फिन पेटिकोट कों छाती केँ ऊपर बांध देती थि, जिससे उसके चूचे पूरीतरह सें पेटिकोट सें ढक जाते थें, कुछ भि नजर नहि आता थां औऱ घुटनों तक पूरा जिस्म ढक जाता थां।
फिन वोँ वहीं पर्र नदी केँ किनारे बैठकर एक् बड़े सें जग सें पानी भर-भर केँ पहले अपने पूरे शरीर कों रगड़-रगड़ करसाफ करती थि औऱ साबुन लगाती थि, फिननदी मे उतरकर नहाती थि।
मम्मी कि देखा-देखी मैंने भि पहलेनदी केँ किनारे बैठकर अपने शरीर कों साफ करना शुरुकर दिया, फिन मे नदी मे डुबकी लगाकर नहाने लगा। मे जब साबुन लगाता तोँ अपने हाथों कों अपनी लुंगी मे घुसाकर पूरे लन्ड औऱ गांड पऱ चारोतरफ घुमा घुमा केँ साबुन लगा केँ सफाई करता थां क्योंकि मे भि मां कि तरह बहोत सफाई पसन्द थां।
जब मे ऐसाकर रहा होता तौ मैंने कईबार देखा कि मां बड़ीगौर सें मुझे देखती रहती थि औऱ अपने पांव कि एड़ियाँ पत्थर पर्र आरामसे
रगड़कर साफ करती होती।
मे सोचता थां, वोँ शायद इसलिये देखती हैं कि मे ठीक सें सफाई करता हूं याँ नहि। इसलिये मे भि बड़े धीरे-धीरे खूब दिखा दिखाकर साबुन लगाता थां कि कहीं डांट नाँ सुनने कों मिल जाये कि ठीक सें साफ-सफाई कां ध्यान नहि रखता हूं मे।
मे अपनी लुंगी केँ भीतर पूराहाथ डालकर अपने लौड़े कों अच्छे तरीके सें साफ करता थां। इसकाम मे मैंने गौर किया कि कईबार
मेरी लुंगी भि इधर-उधर हौ जाती थि जिससे मां कों मेरे लन्ड कि एक्-आध झलक भि दिख जाती थि।
जब पहलीबार ऐसाहुआ तौ मुझेलगा कि शायद मम्मी डांटेगी मगरऐसा कुछ नहि हुआ। तब मे निश्चिंत हौ गय़ा औऱ मजे सें अपना पूरा ध्यान साफ सफाई पऱ लगाने लगा।
मां कि सुंदरता देखकर मेरा भि मनकईबार ललचा जाता थां औऱ मे भि चाहता थां कि मे उसे सफाई करतेहुए देखूँ पऱ वोँ ज़्यादा कुछ देखने नहि देती थि औऱ घुटनों तक कि सफाई करती थि औऱ फिनबड़ी सावधानी सें अपने हाथों कों अपने पेटिकोट केँ अंदर लें जाकर अपनी छाती कि सफाई करती।
जैसे हि मे उसकीओर देखता तोँ वोँ अपनाहाथ छाती मे सें निकाल कर अपने हाथों कि सफाई मे जुट जाती थि।
इसलिये मे कुछ नहि देख पाता थां औऱ चूँकि वोँ घुटनों कों मोड़कर अपनी छाती सें सटाये हुए होती थि इसलिये पेटिकोट केँ ऊपर सें
छाती कि झलक मिलनी चाहिए, वोँ भि नहि मिल पाती थि।
इसीतरह जब वोँ अपने पेटिकोट केँ अंदरहाथ घुसाकर अपनी जांघों औऱ उसकेबीच कि सफाई करती थि, ये ध्यान रखती कि मे उसेदेख रहा हूं याँ नहि।
जैसे हि मे उसकीओर घूमता, वोँ झट सें अपनाहाथ निकाल लेती थि औऱ अपने जिस्म पर्र पानी डालने लगती थि।
मे मन-मसोस केँ रह जाता थां।
एक् दिन सफाई करते-करते मम्मी कां ध्यान शायद मेरीतरफ सें हट गय़ा थां औऱ बड़े धीरे-धीरे अपने पेटिकोट कों अपने जांघों तक
उठाकर सफाईकर रही थि।
उसकी गोरी, चिकनी जांघों कों देखकर मेरा लन्ड खड़ा होनेलगा औऱ मे, जोँ कि उससमय अपनी लुंगी कों ढीला करके अपने हाथों कों लुंगी केँ अंदरडाल कर अपने लन्ड कि सफाईकर रहा थां, आहिस्ता अपने लन्ड कों मसलने लगा।
तभी अचानक मम्मी कि नजर मेरेऊपर गई औऱ उसने अपनाहाथ निकाल लिया औऱ अपने जिस्म पऱ पानी डालती हुईँ बोलि- क्याँ कररहा हैं? जल्द सें नहा केँ काम ख़त्म कर!
मेरे तौ होश हि उड़गये औऱ मे जल्द सें नदी मे जाने केँ लियेउठ करखड़ा हौ गय़ा, पर्र मुझेइस बात कां तौ ध्यान हि नहि रहा
कि मेरी लुंगी तौ खुली हुइ हैं औऱ मेरी लुंगी सरसराते हुए नीचेगिर गई। मेरा पूरा शरीर नंगा होँ गय़ा औऱ मेरा 8 ईंच कां लन्ड जोँ पूरीतरह सें खड़ा थां, धूप कि रोशनी मे नजरआने लगा।
मैंने देखा कि मां एक् समय केँ लिये चकित होकर मेरे पूरे शरीर औऱ नंगे लन्ड कि ओर देखती रह गई।
मैंने जल्द सें अपनी लुंगी उठाइ औऱ चुपचाप पानी मे घुस गय़ा।
मुझेबड़ा डरलगरहा थां कि अब क्याँ होगा, अब तौ पक्की डांट पड़ेगी।
मैंने कनखियों सें मां कि ओर देखा तोँ पाया कि वोँ अपनेसिर कों नीचे किये हल्के-हल्के मुस्कुरा रही हैं औऱ अपने पैरों पऱ अपनेहाथ चलाकर सफाईकर रही हैं।
मैंने राहत कि सांसली औऱ चुप-चाप नहाने लगा।
उस दिन हम् अधिकतर चुप-चाप हि रहे। घऱ वापस लौटते वक़्त भि मम्मी अधिक नहि बोलीं।
दूसरे दिन सें मैंने देखा कि मां, मेरेसंग कुछ अधिक हि खुलकर हंसी मजाक करती रहती थि, औऱ हमारे बीच दोहरे अर्थो मे भि बातें होनेलगी थि।
पता नहि मां कों पता थां याँ नहि पऱ मुझेबड़ा मज़ा आँ रहा थां।
मे जब भि किसी केँ घऱ सें कपड़े लेकर वापस लौटता तोँ मां बोलती- क्यूं, रधिया केँ कपड़े भि लाया हैं धोने केँ लिये क्याँ?
तोँ मे बोलता- हां!
इस पर्र वोँ बोलती- ठीक हैं, तूँ धोना उसके कपड़े…बड़ा गन्दा करती हैं। उसकी सलवार तोँ मुझसे धोई नहि जाती।
फिन पूछती थि- अंदर केँ कपड़े भि धोने केँ लिये दिये हें क्याँ?
अंदर केँ कपड़ों सें उसका मतलब पेन्टी औऱ ब्रा याँ फिन अंगिया सें होता थां, मे कहता- नहि!
तोँ इस पर्र हंसने लगती औऱ कहती-ती लड़का हैं नां, शायद इसलिये तुम को नहि दिये होंगे, देख अगलीबार जब मे माँगने जाऊँगी तोँ जरूर देगी।
फिन अगलीबार जब वोँ कपड़े लाने जाती तोँ सच-मुच मे वोँ उसकी पेन्टी औऱ अंगिया लें केँ आती थि औऱ बोलती- देख, मे नाँ कहती थि कि वोँ तुम्हारी तरफ नहि देगी औऱ मुझेदे देगी, तूँ लड़का हैं नां, तेरे कों देने मे शरमाती होगी, फिन तूँ तौ अब जवान भि हौ गय़ा हैं।
मे अन्जान बना पूछता कि क्याँ देने मे शरमाती हैं रधिया?
तोँ मुझे उसकी पेन्टी औऱ ब्रा याँ अंगिया फैलाकर दिखाती औऱ मुस्कुराते हुए बोलती- लेँ, स्वयं हि देख लेँ।
इस पर्र मे शरमा जाता औऱ कनखियों सें देखकर मुंह घुमा लेता तोँ, वोँ बोलती- अरे, शरमाता क्यूं हैं? यह भि तेरे कों हि धोने पड़ेंगे। कहकर हंसने लगती।
फिर भी, सच मे ऐसाकुछ नहि होता औऱ अधिकतर मर्दों केँ कपड़े मे औऱ औरतों केँ मां हि धोया करती थि। क्योंकि उसमें ज़्यादा मेहनत लगती थि।
पऱ पता नहि क्यूं मम्मी अबकुछ दिनों सें इसतरह कि बातों मे अधिक दिलचस्पी लेनेलगी थि। मे भि चुपचाप उसकी बातें सुनता रहता औऱ मजे सें जवाब देता रहता थां।
जब हम् नदी पऱ कपड़े धोने जातेतब भि मे देखता थां कि मम्मी अब पहले सें थोड़ी अधिक खुलेतौर पऱ पेशआती थि। पहले वोँ मेरीतरफ पीठ करके अपने ब्लाउज़ कों खोलती थि औऱ पेटिकोट कों अपनी छाती पऱ बांधने केँ बाद हि मेरीतरफ घूमती थि। पर्र अब वोँ इस पऱ ध्यान नहि देती औऱ मेरीतरफ घूमकर अपने ब्लाउज़ कों खोलती औऱ मेरे हि सामने बैठकर मेरेसंग हि नहाने लगती।
जबकि पहले वोँ मेरे नहाने तक इन्तजार करती थि औऱ जब मे थोड़ादूर जाकरबैठ जाता, तब पूरा नहाती थि।
मेरे नहाते टाइम उसका मुझे घूरना बदस्तूर जारी थां। मुझ मे भि अब हिम्मत आँ गई थि औऱ मे भि जब वोँ अपनी छातियों कि सफाईकर रही होती तौ उसेदेख कर देखता रहता।
मम्मी भि मजे सें अपने पेटिकोट कों जांघों तक उठाकर एक् पत्थर पर्र बैठ जाती औऱ साबुन लगाती, औऱ ऐसे दिखावा करती जैसे मुझेदेख हि नहि रही हैं।
उसके दोनों घुटने मुड़ेहुए होते थें औऱ एक् पांव थोड़ा पहलेआगे पसारती औऱ उस पर्र पूरा जांघों तक साबुन लगाती थि, फिन पहलेपेर कों मोड़कर दूसरे पेर कों फैलाकर साबुन लगाती। पूरा अंदर तक साबुन लगाने केँ लिये वोँ अपने घुटने मोड़े रखती औऱ अपने बांये हाथ सें अपने पेटिकोट कों थोड़ाउठा केँ, याँ अलगकर केँ दाहिने हाथ कों अंदरडाल केँ साबुन लगाती।
मे चूंकि थोड़ीदूर उसकेबगल मे बैठा होता, इसलिये मुझे पेटिकोट केँ अंदर कां नजारा तौ नहि मिलता थां। जिसके कारण सें मे मन मसोस केँ रह जाता थां कि काश मे सामने होता।
पर्र इतने मे हि मुझेगजब कां मज़ा आँ जाता थां, उसकी नंगी, चिकनी चिकनी जांघें ऊपर तक दिख जाती थि।
मां अपनेहाथ सें साबुन लगाने केँ बादबड़े मग कों उठा केँ उसका पानी सीधे अपने पेटिकोट केँ अंदरडाल देती औऱ दूसरे हाथ सें संग हि संग रगड़ती भि रहती थि।
ये इतना जबरदस्त नज़ारा होता थां कि मेरा तोँ लन्ड खड़ा होकर फुफकारने लगता औऱ मे वहीं नहाते-नहाते अपने लन्ड कों मसलने लगता।
जब मेरे सें बरदाश्त नहि होता तौ मे सीधानदी मे कमर तक पानी मे उतर जाता औऱ पानी केँ अंदरहाथ सें अपने लन्ड कों पकड़कर खड़ा होँ जाता औऱ मां कि तरफघूम जाता।
जब वोँ मुझे पानी मे इसतरह सें उसकीतरफ घूमकर नहाते देखती तौ मुस्कुरा केँ मेरीतरफ देखती हुई बोलती- ज़्यादा दूरमत जानां, किनारे पऱ हि नहा लें, आगे पानी बहोत गहरा हैं।
मे कुछ नहि बोलता औऱ अपने हाथों सें अपने लन्ड कों मसलते हुए नहाने कां दिखावा करता रहता।
इधर मां मेरीतरफ देखती हुइ अपने हाथों कों ऊपर उठा-उठा केँ अपनी कांख कि सफाई करती, कभी अपने हाथों कों अपने पेटिकोट मे घुसाकर छाती कों साफ करती, कभी जांघों केँ बीचहाथ घुसा केँ खूब तेजी सें हाथ चलाने लगती…दूर सें कोई देखे तोँ ऐसा लगेगा कि मुठमार रही हैं, औऱ शायद मारती भि होगी।
कभी कभी वोँ भि खड़ी होकरनदी मे उतर जाती औऱ ऐसे मे उसका पेटिकोट, जोँ उसके शरीर सें चिपका हुआ होता थां, गीला होने केँ कारण मेरी हालत औऱ अधिक खराबकर देता थां।
पेटिकोट चिपकने केँ कारण उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ नुमाया होँ जाती थि। कपड़े केँ ऊपर सें उसके बड़े-बड़े, मोटे-मोटे निप्पल तक दीखने लगते थें।
पेटिकोट उसके चूतड़ों सें चिपककर उसकी गांड कि दरार मे फंसाहुआ होता थां औऱ उसके बड़े-बड़े चूतड़ साफ-साफ दिखाई देते रहते थें।
वोँ भि कमर तक पानी मे मेरेठीक सामने आकरखड़ी होकर डुबकी लगाने लगती औऱ मुझे अपने चूचियों कां नजारा करवाती जाती।
मे तोँ वहींनदी मे हि लन्ड मसल केँ मुठमार लेता थां, फिरभी मुठ मारना मेरीआदत नहि थि।
घऱ पर्र मे येकाम कभी नहि करता थां, पऱ जब सें मां केँ स्वभाव मे परिवर्तन आया थां, नदी पर्र मेरी हालतऐसी हौ जाती थि कि मे मजबूर होँ जाता थां।
अब तौ घऱ पर्र मे जब भि इस्तरी करने बैठता, तोँ मुझे बोलती- देख, ध्यान सें इस्तरी करियो। पिछली बार श्यामा बोलरही थि कि उसके ब्लाउज़ ठीक सें इस्तरी नहि थें।
मे भि बोल पड़ता-ठीक हैं, कर दूँगा। इतना छोटा-सां ब्लाउज़ तौ पहनती हैं, ढंग सें इस्तरी भि नहि होँ पाती। पता नहि केसेकाम चलाती हैं, इतने छोटे सें ब्लाउज़ मे?
धोबी घाट पर माँ और मैं - desi chudai mom son – New Episode
Part 2
घऱ पर्र मे जब भि इस्तरी करने बैठता, तौ मुझे बोलती- देख, ध्यान सें इस्तरी करियो। पिछली बार श्यामा बोलरही थि कि उसके ब्लाउज़ ठीक सें इस्तरी नहि थें।
मे भि बोल पड़ता-ठीक हैं, कर दूँगा। इतना छोटा-सां ब्लाउज़ तोँ पहनती हैं, ढंग सें इस्तरी भि नहि हौ पाती। पता नहि केसेकाम चलाती हैं, इतने छोटे सें ब्लाउज़ मे?
तोँ मां बोलती- अरे, उसकी छातियाँ ज़्यादा बड़ी थोड़े हि हें, जौ वोँ बड़ा ब्लाउज़ पहनेगी, हाँ उसकी सासू केँ ब्लाउज़ बहोत बड़े-बड़े हें।
बुढ़िया कि छाती पहाड़ जैसी हैं।
कहकर मां हंसने लगती।
फिन मेरे सें बोलती- तूँ सबके ब्लाउज़ कि लंबाई-चौड़ाई देखता रहता हैं क्याँ? याँ फिन इस्तरी करता हैं?
मे क्याँ बोलता, चुपचाप सिर झुकाकर इस्तरी करतेहुए धीरे-धीरे सें बोलता- अरे, देखता कौन हैं, नजरचली जाती हैं बस।
इस्तरी करते-करते मेरा पूरा जिस्म पसीने सें नहा जाता थां। मे सिर्फ लुंगी पहने इस्तरी कररहा होता थां, मम्मी मुझे पसीने सें नहाये हुएदेख कर बोलती- छोड़अब तुँ कुछ आरामकर लेँ, तब तक मे इस्तरी करती हूं।
मां येकाम करने लगती।
थोड़ी हि देर मे उसके माथे सें भि पसीना चूने लगता औऱ वोँ अपनी साड़ीखोल कर एक् ओर फेंक देती औऱ बोलती- बड़ी गरमी हैं रे, पता नहि तुँ केसेकर लेता हैं, इतने कपड़ों कि इस्तरी? मेरे सें तौ ये गरमी बरदाश्त नहि होती।
इस पर्र मे वहींपास बैठा उसके नंगेपेट, गहरी नाभि औऱ मोटे चूचों कों देखता हुआ बोलता- ठंडीकर दूँ तुम्हे?
‘केसे करेगा ठंडी?’
‘डण्डे वाले पंखे सें… मे तुम्हे पंखाझाल देता हूं, फेन चलाने पऱ तौ इस्तरी हि ठंडीपड़ जायेगी। ’
‘रहनेदे, तेरे डण्डे वाले पंखे सें भि कुछ नहि होगा, छोटा-सां तौ पंखा हैं तेरा। ’
कह कर अपनेहाथ ऊपरउठा कर, माथे पऱ छलकआये पसीने कों पोंछती तोँ मे देखता कि उसकी कांख पसीने सें पूरीभीग गई हैं, औऱ उसकी गरदन सें बहताहुआ पसीना उसके ब्लाउज़ केँ अंदर, उसकी दोनों चूचियों केँ बीच कि घाटी मे जाकर उसके ब्लाउज़ कों
भीगारहा होता।
घऱ केँ अंदर, वैसे भि वोँ ब्रा तौ कभी पहनती नहि थि, इस कारण सें उसके पतले ब्लाउज़ कों पसीना पूरीतरह सें भीगा देता थां औऱ उसकी चूचियां उसके ब्लाउज़ केँ ऊपर सें नजरआती थि।
कईबार जब वोँ हल्के रंग कां ब्लाउज़ पहनी होती तौ उसके मोटे- मोटे भूरेरंग केँ निप्पल नजरआने लगते। ये देखकर मेरा लन्ड खड़ा होने लगता थां।
कभी-कभी वोँ इस्तरी कों एक् तरफरख कर अपने पेटिकोट कों उठाकर पसीना पोंछने केँ लिये अपनेसिर तक लें जाती औऱ मे ऐसे हि मौके केँ इन्तजार मे बैठा रहता थां क्योंकि इस टाइम उसकी आंखें तोँ पेटिकोट सें ढक जाती थि, पर्र पेटिकोट ऊपर उठने केँ कारण उसकी टांगें पूरी जांघ तक नंगी होँ जाती थि औऱ मे बिना अपनी नजरों कों चुराये उसकी गोरी- चिट्टी, मखमली जांघों कों तोँ जीभर केँ देखता थां।
मम्मी अपने चेहरे कां पसीना अपनी आंखें बन्द करके पूरे आहिस्ता पोंछती थि औऱ मुझे उसके मोटे कदली केँ खम्भे जैसी जांघों कां पूरा नजारा दिखाती थि।
गाँव मे औरतें साधारणतया पेन्टी नहि पहनती हें, कईबार ऐसाहुआ कि मुझे उसके झांटों कि हल्की सि झलक देखने कों मिल जाती। जब वोँ पसीना पोंछ केँ अपना पेटिकोट नीचे करती, तब तक मेराकाम हौ चुका होता औऱ मेरे सें बरदाश्त करना संभव नहि हौ पाता, मे
जल्द सें घऱ केँ पिछवाड़े कि तरफभाग जाता, अपने लन्ड केँ खड़ेपन कों थोड़ा ठंडा करने केँ लिये।
जब मेरा लन्ड डाउन हौ जाता, तब मे वापस आँ जाता।
मम्मी पूछती- कहां गय़ा थां?
तौ मे बोलता- थोड़ी ठंडीहवा खाने…बड़ी गरमीलग रही थि।
‘ठीक किया, जिस्म कों हवा लगाते रहना चाहिये, फिन तुँ तौ अभि बड़ा हौ रहा हैं, तुम्हें औऱ ज़्यादा गरमी लगती होगी। ’
‘हाँ, तुम्हें भि तोँ गरमीलग रही होगी मां? जा तुँ भि बाहर् घूमकर आँ जा। थोड़ी गरमी शांत होँ जायेगी। ’
औऱ उसकेहाथ सें इस्तरी लें लेता।
पऱ वोँ बाहर् नहि जाती औऱ वहीं पऱ एक् तरफ मूढे पर्र बैठ जाती, अपने पांव घुटनों केँ पास सें मोड़कर औऱ अपने पेटिकोट कों घुटनों तक उठाकर बीच मे समेट लेती। मां जब भि इस तरीके सें बैठती थि तौ मेरा इस्तरी करना मुश्किल होँ जाता थां।
उसकेइस तरह बैठने सें उसकी घुटनों सें ऊपर तक कि जांघें औऱ दीखने लगती थि।
‘अरे नहि रे, रहनेदे मेरी तौ आदत होँ गई हैं गरमी बरदाश्त करने कि। ’
‘क्यूं बरदाश्त करती हैं? गरमीमन पऱ चढ़ जायेगी, जा बाहर् घूम केँ आँ जा। ठीक हौ जायेगा। ’
‘जानेदे, तुँ अपनाकाम कर, ये गरमीऐसे नहि शान्त होने वाली। तेरा पिताजी अगर समझदार होता तौ गरमी लगती हि नहि, पर्र उसे क्याँ, वोँ तौ कहीं देसीपी केँ सोयापड़ा होगा। साम होने कों आईमगर अभि तक नहि आया। ’
‘अरे, तोँ इस मे पिताजी कि क्याँ गलती हैं? मौसम हि गरमी कां हैं, गरमी तोँ लगेगी हि। ’
‘अब मे तेरी केसे समझाऊँ कि उसकी क्याँ गलती हैं? काश तूँ थोड़ा समझदार होता। ’
कह कर मां उठकर खानां बनाने चल देती।
मे भि सोच मे पड़ाहुआ रह जाता कि आखिर मम्मी चाहती क्याँ हैं?
रात मे जब खानां खाने कां वक़्त होता तौ मे नहा-धोकर किचन मे आँ जाता खानां खाने केँ लिये। मां भि वहींबैठ केँ मुझे गर्म-गर्म रोटियां सेक देती औऱ हम् खाते रहते।
इस वक्त भि वोँ पेटिकोट औऱ ब्लाउज़ मे हि होती थि क्योंकि किचन मे गरमी होती थि औऱ उसने एक् छोटा-सां पल्लू अपने कंधों पर्र डालरखा होता, उसी सें अपने माथे कां पसीना पोंछती रहती औऱ खानां खिलाती जाती थि मुझे।
हम् दोनों संग मे बातें भि कररहे होते।
मे मजाक करतेहुए बोलता- सच मे मां, तुम् तौ गर्म महिला हौ।
वोँ पहले तौ कुछसमझ नहि पाती, फिन जब उसकीसमझ मे आता कि मे आयरन-इस्तरी न् कह केँ, उसेऔरत कहरहा हूं तोँ वोँ हंसने
लगती औऱ कहती-हाँ, मे गरम इस्तरी हूं।
औऱ अपना चेहरा आगे करके बोलती- देख कितना पसीना आँ रहा हैं, मेरी गरमीदूर करदे।
‘मे तुम्हे एक् बात बोलूँ, तूँ गर्मचीज मत खायाकर, ठंडी चीजें खायाकर। ’
‘अच्छा, कौन सि ठंडी चीजें मे खाऊँ कि मेरी गरमीदूर होँ जायेगी?’
‘केले औऱ बैंगन कि सब्जियाँ खायाकर। ’
इस पऱ मां कां चेहरा लाल होँ जाता थां औऱ वोँ सिर झुका लेती औऱ धीरे-धीरे सें बोलती- अरे केले औऱ बैंगन कि सब्जी तोँ मुझे भि अच्छी
लगती हैं, पर्र कोई लाने वाला भि तोँ होँ, तेरा पिताजी तोँ यह सब्जियाँ लाने सें रहा, नां तौ उसे केले मनपसंद हें, नाँ हि उसे बैंगन।
‘तूँ फिकरमत कर, मे ला दूँगा तेरे लिये। ’
‘क्या बात है, बड़ा अच्छा बेटा हैं, मां कां कितना ध्यान रखता हैं। ’
मे खानां ख़त्म करतेहुए बोलता- चल, अब खानां तोँ हौ गय़ा समाप्त, तूँ भि जा केँ नहा लें औऱ खानां खा लेँ।
‘अरे नहि, अभि तोँ तेरा पिताजी देशीचढ़ा करआता होगा। उसको खिला दूँगी, तब खाऊँगी, तब तक नहालूँ… तूँ जा औऱ जाकरसो जा, कलनदी पऱ भि जानां हैं। ’
मुझे भि ध्यान आँ गय़ा कि हाँ, कल तोँ नदी पर्र भि जानां हैं। मे छत पर्र चला गय़ा। गरमियों मे हम् तीनों लोगछत पर्र हि सोया करते थें। ठंडी ठंडीहवा बहरही थि, मे पलंग पर्र लेट गय़ा औऱ अपने हाथों सें लन्ड मसलते हुए मां केँ हसीन शरीर केँ ख्यालों मे खोयाहुआ ड्रीम्स देखने लगा औऱ कल केसे उसके शरीर कों ज़्यादा सें ज़्यादा निहारुँगा, ये सोचता हुआकब सो गय़ा, मुझेपता हि
नहि लगा।
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Aakash.?
धोबी घाट पर माँ और मैं - desi chudai mom son – New Episode
Part 3
सुभह कि पहली किरण केँ संगजब मेरी नींद खुली तोँ देखा कि एक् तरफ पिताजी अभि भि लुढ़का हुआ हैं औऱ मां शायद पहले हि उठकरजा चुकी थि।
मे भि जल्द सें नीचे पहुंचा तौ देखा कि मम्मी बाथरुम सें आकर हेन्डपम्प पऱ अपने हाथ-पांव धोरही थि, मुझे देखते हि बोलि- चल जल्द सें सजधजकर होँ जा, मे खानां बना लेती हूं, फिन जल्द सें नदी पर्र निकल जायेंगे, तेरे पिताजी कों भि आजशहर जानां हैं बीज लाने, मे उसको भि उठा देती हूं।
थोड़ीदेर मे जब मे वापसआया तौ देखा कि पिताजी भि उठ चुका थां औऱ वोँ बाथरूम जाने कि तैयारी मे थां। मे भि अपनेकाम मे लग
गय़ा औऱ सारे कपड़ों केँ गट्ठर बना केँ रेडीकर दिया।
थोड़ीदेर मे हम् सभीलोग सजधजकर होँ गये, घऱ कों ताला लगाने केँ बाद पिताजी बस पकड़ने केँ लियेचल दिया औऱ हम् दोनों नदी कि ओर!
मैंने मां सें पूछा- पिताजी कब तक आएँगे?
तोँ वोँ बोलि- क्याँ पता, कब आयेगा? मुझे तोँ बोला हैं कि कल आँ जाऊँगा, पऱ कोई भरोसा हैं तेरे पिताजी कां? चारदिन भि लगा देगा।
हम् लोगनदी पर्र पहुंच गये औऱ फिन अपनेकाम मे लगगये, कपड़ों कि सफाई केँ बाद मैंने उन्हें एक् तरफ सूखने केँ लियेडाल दिये
औऱ फिन हम् दोनों नें नहाने कि तैयारी शुरुकर दि।
मम्मी नें भि अपनी साड़ी उतारकर पहले उसको धोयाफिन हरबार कि तरह अपने पेटिकोट कों ऊपरचढ़ा कर अपना ब्लाउज़ निकाला, फिन उसको धोया औऱ फिन अपने शरीर कों रगड़रगड़ कर नहाने लगी।
मे भि बगल मे बैठा उसको निहारते हुए नहाता रहा।
बेख्याली मे एक् दोबार तोँ मेरी लुंगी भि मेरे जिस्म पर्र सें हट गई थि पऱ अब तौ यह बहोत बार होँ चुका थां इसलिये मैंने इस पऱ कोई ध्यान नहि दिया।
हर बार कि तरह मम्मी नें भि अपने हाथों कों पेटिकोट केँ अन्दर डालकर खूबरगड़ रगड़कर नहाना चालूरखा।
थोड़ीदेर बाद मे नदी मे उतर गय़ा।
मां नें भि नदी मे उतर केँ एक् दो डुबकियां लगाई औऱ फिन हम् दोनों बाहर् आँ गये।
मैंने अपने कपड़ेबदल लिये औऱ पजामा औऱ कुर्ता पहन लिया।
मां नें भि पहले अपने जिस्म कों तौलिये सें सुखाया, फिन अपने पेटिकोट केँ इजारबंध कों जिसको वोँ छाती पऱ बांधकर रखती थि, पऱ सें खोल लिया औऱ अपने दांतों सें पेटिकोट कों पकड़ लिया, ये उसका हमेशा कां काम थां, मे उसको पत्थर पर्र बैठकर एक्-टक देखेजा रहा थां।
इस प्रकार उसके दोनों हाथ फ्री हौ गये थें।
अब सूखे ब्लाउज़ कों पहनने केँ लिये पहले उसने अपना बांया हाथ उसमें घुसाया, फिन जैसे हि वोँ अपना दाहिना हाथ ब्लाउज़ मे घुसाने जारही थि कि पता नहि क्याँ हुआ, उसके दांतों सें उसका पेटिकोट छुट गय़ा औऱ सीधे सरसराते हुए नीचेगिर गय़ा। औऱ उसका पूरा कां पूरा नंगा जिस्म एक् लम्हा केँ लिये मेरी आंखों केँ सामने दिखने लगा।
उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ जिन्हे मैंने अब तक कपड़ों केँ ऊपर सें हि देखा थां, उसके भारी भारी चूतड़ उसकी मोटी-मोटी जांघें औऱ झांट केँ बालसभी एक् लम्हा केँ लिये मेरी आंखों केँ सामने नंगे होँ गये।
पेटिकोट केँ नीचे गिरते हि उसकेसंग हि मां भि हय करते हुईँ तेजी केँ संग नीचेबैठ गई। मे आंखें फाड़-फाड़ केँ देखते हुए गूंगे कि तरह वहीं पर्र खड़ारह गय़ा।
मम्मी नीचेबैठ कर अपने पेटिकोट कों फिन सें समेटती हुइ बोलि- ध्यान हि नहि रहा। मे तुम्हें कुछ बोल्ना चाहती थि औऱ ये पेटिकोट दांतों सें छुट गय़ा।
मे कुछ नहि बोला।
मम्मी फिन सें खड़ी हौ गई औऱ अपने ब्लाउज़ कों पहनने लगी। फिन उसने अपने पेटिकोट कों नीचे किया औऱ बांध लिया, फिन साड़ीपहन कर वोँ वहींबैठ केँ अपने भीगे पेटिकोट कों धो करके रेडी होँ गई।
फिन हम् दोनों खानां खानेलगे, खानां खाने केँ बाद हम् वहींपेड़ कि छांव मे बैठकर आराम करनेलगे।
स्थान सुनसान थि, ठंडीहवा बहरही थि, मे पेड़ केँ नीचे लेटेहुए मां कि तरफ घूमा तौ वोँ भि मेरीतरफ घूमी।
इस वक़्त उसके चेहरे पऱ एक् हल्की सि मुस्कुराहट पसरी हुईँ थि।
मैंने पूछा- मम्मी, क्यूं हंसरही हौ?
तोँ वोँ बोलीं- मे कहां हंसरही हूं?
‘झूठमत कहो, तुम् मुस्कुरा रही होँ। ’
‘क्याँ करूँ?अब हंसने पऱ भि कोईरोक हैं क्याँ?’
‘नहि, मे तोँ ऐसे हि पूछरहा थां। नहि बताना हैं तौ मत बताओ। ’
‘अरे, इतनी अच्छी ठंडीहवा बहरही हैं, चेहरे पऱ तोँ मुस्कान आयेगी हि। ’
‘हाँ, आज गर्म महिला (स्त्री) कि सारी गरमी जोँ निकल जायेगी। ’
‘क्याँ मतलब, इस्तरी (आयरन) कि गरमी केसे निकल जायेगी? यहा पऱ तोँ कहीं इस्तरी नहि हैं। ’
‘अरे मां, तुम् भि तोँ महिला (महिला) होँ, मेरा मतलब इस्तरी माने महिला सें थां। ’
‘चलहट बदमाश, बड़ा शैतान होँ गय़ा हैं। मुझे क्याँ पता थां कि तुँ इस्तरी माने स्त्री कि बातकर रहा हैं?’
‘चलो, अब पताचल गय़ा नाँ?’
‘हाँ, चल गय़ा। पर्र सच मे यहापेड़ कि छांव मे कितना अच्छा लगरहा हैं। ठंडी-ठंडी हवाचल रही हैं औऱ आज तोँ मे पूरीहवा खा हि
चुकी हूं। ’ मां बोलि।
‘पूरीहवा खा चुकी हैं, वोँ केसे?’
‘मे पूरी नन्गी जोँ हौ गई थि। ’
फिन बोलीं- हाय, तुम्हारी तरफ मुझेऐसे नहि देख्ना चाहिए थां?
‘क्यूं नहि देख्ना चाहिए थां?
‘अरे बेवकूफ, इतना भि नहि समझता, एक् मां कों उसके बेटे केँ सामने नंगा नहि होना चाहिए थां। ’
‘कहां नंगी हुईँ थि, तुम्? बस एक् सेकन्ड केँ लिये तोँ तुम्हारा पेटिकोट नीचेगिर गय़ा थां। ’
फिरभी, वही एक् सेकन्ड मुझे एक् घन्टे केँ बराबर लगरहा थां।
‘हाँ, फिन भि मुझे नंगी नहि होना चाहिए थां। कोई जानेगा तोँ क्याँ कहेगा कि मे अपने बेटे केँ सामने नन्गी होँ गई थि। ’
‘कौन जानेगा? यहा पर्र तोँ कोई थां भि नहि। तुँ बेकार मे क्यूं परेशान हौ रही हैं?’
‘अरे नहि, फिन भि कोईजान गय़ा तोँ। ’
फिनकुछ सोचती हुईँ बोलीं- अगरकोई नहि जानेगा तौ क्याँ तूँ मुझे नंगी देखेगा?
मे औऱ मां दोनों एक् दूसरे केँ आमने-सामने एक् सूखी चादर पर्र सुनसान स्थान पऱ पेड़ केँ नीचे एक् दूसरे कि ओर मुंह करके लेटेहुए थें औऱ मां कि साड़ी उसके छाती पऱ सें ढलक गई थि।
मां केँ मुंह सें येबात सुनकर मे खामोश रह गय़ा औऱ मेरी सांसें तेज चलनेलगी।
मम्मी नें मेरीओर देखते हुए पूछा- क्याँ हुआ?
मैंने कोई जवाब नहि दिया औऱ हल्के सें मुस्कुराते हुए उसकी छातियों कि तरफ देखने लगा जोँ उसकीतेज चलती सांसों केँ संगऊपर नीचे होँ रही थि।
वोँ मेरीतरफ देखते हुए बोलीं- क्याँ हुआ? मेरीबात कां जवाबदे नाँ। अगरकोई जानेगा नहि तोँ क्याँ तुँ मुझे नंगीदेख लेगा?
इस पऱ मेरे मुंह सें कुछ नहि निकला औऱ मैंने अपनासिर नीचेकर लिया, मम्मी नें मेरी ठुड्डी पकड़कर ऊपर उठाते हुए मेरी आँखों
मे झांकते हुए पूछा- क्याँ हुआरे? बोल नां, क्याँ तूँ मुझे नंगीदेख लेगा, जैसे तूनेआज देखा हैं?
मैंने कहा-अरे मम्मी, मे क्याँ बोलूँ?
मेरा तोँ गलासूख रहा थां, मां नें मेरेहाथ कों अपने हाथों मे लें लिया औऱ कहा- इसका मतलब तुँ मुझे नंगी नहि देख सकता, हैं नाँ?
मेरे मुंह सें निकल गय़ा- हाय मम्मी, छोड़ो नां!
मे हकलाते हुए बोला- नहि मम्मी, ऐसा नहि हैं।
‘तोँ फिन क्याँ हैं? तुँ अपनी मम्मी कों नंगीदेख लेगा क्याँ?’
‘हाय, मे क्याँ कर सकता थां? वोँ तोँ तुम्हारा पेटिकोट नीचेगिर गय़ा, तब मुझे नंगादिख गय़ा। नहि तौ मे केसेदेख पाता?’
‘वोँ तौ मे समझ गई, पर्र उससमय तुम कोदेख कर मुझेऐसा लगा, जैसे कि तुँ मुझेदेख रहा हैं… इसलिये पूछा। ’
‘क्या बात है मां, ऐसा नहि हैं। मैंने तुम्हें बताया नां, तुम्हें बसऐसा लगा होगा। ’
‘इसका मतलब तुम्हारी तरफ अच्छा नहि लगा थां नाँ?’
‘क्या बात है मम्मी, छोड़ो…’ मे हाथ छुड़ाते हुए अपने चेहरे कों छुपाते हुए बोला।
मम्मी नें मेराहाथ नहि छोड़ा औऱ बोलीं- सचसचबोल, शरमाता क्यूं हैं?
मेरे मुंह सें निकल गय़ा- हाँ, अच्छा लगा थां।
किस्सा जारी रहेगी।.
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