नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story – New Episode
भाग 3
अब तक आपने पढ़ा कि केसे अपनीजिद केँ दम पर्र नंदिता नें अपने चाचू केँ लन्ड कां रस कां स्वाद चखा।
अब आगे
जैसे हि उसका मुँह खालीहुआ, नंदिता नें बोलने केँ लिए अपना मुँह खोला औऱ मेरा वीर्य उसके मुँह सें निकल गय़ा। वीर्य उसकी ठुड्डी सें उसके शर्ट पर्र छलकने लगा। मगर जब मे उस पर्र हंसने लगा तौ नंदिता कों क्रोध आँ गय़ा"ये क्याँ थां चाचू? मेरादम घुटरहा थां। क्याँ कोईऐसा करता हैं? जाओ मे आपसेफिन कभीबात नहि करूंगी। " नंदिता गुलाबी गुलाबी गालों केँ संग मुझसे बातकर रही थि औऱ मे उसके चेहरे पर्र फैले अपने चिपचिपे पानी कों निहार रहा थां।
उसके क्रोध कर लेने केँ बाद मैंने "माफ़ करना नंदिता, मे अपनेजोश कों कण्ट्रोल नहि कर पाया। अब तुम्हे पताचला कि पुरुष जब झड़ता हैं तोँ जोश मे उसका दिमाग़ काम नहि करता?चलो, बाथरूम मे जाओ औऱ अपना चेहरा साफकर लो। औऱ इस शर्ट कों भि धो डालो। नहि तोँ तुम्हारी मां कों सभीपता चल जायेगा। "
"वाउ चाचू, तौ मे पूरीरात आपकेसंग नंगे शरीर सोऊंगी? क्याँ आप् बैठकर मेराबड़े बड़ेथन नहि देखोगे?" नंदिता नें टेढ़े मुहं केँ संग मुझसे कहा। "पागल, तुमने मुझे अपनेथन औऱ बुर सभी स्वयं हि दिखा दि। औऱ अब तुम् इतनी शर्मिंदगी कां नाटककर रही होँ। जाओ, अपना शर्ट उतारकर धोलो। भाभीइन धब्बों कों पहचान लेंगी। तुम् उन्हें क्याँ जवाब दोगी?" मैंने पूछ लिया।
"मे उनको बताऊंगी कि मैंने अपने चाचा केँ लन्ड कों चूसा थां, " नंदिता नें एक् फीकी मुस्कान केँ संगकहा मगर उठकर बाथरूम चली गई। अपना चेहरा धोने केँ बाद, वो बिना कपडे केँ नंगी छातियों केँ संग वापस आँ गई। मगर उसके गोरे स्तनों पर्र पानी कि बुँदे अभि भि चमकरही थि। मुझे उन्हें घूरते देख नंदिता मेरेपास आकरबैठ गई। औऱ मेरीकमर पऱ हाथरख कर बोलि "चाचू, क्याँ आपको मेरे बूब्ज़ मनपसंद हें?" मैंने उसकेनम बूब्ज़ पर्र अपनाहाथ घुमाया औऱ कहा, "नंदिता, तुम्हारे मम्मों अद्भुत हें। वेइस उम्र मे इतने बड़े हें, मगर सख्त हें। वर्ना मात्र बड़ी उम्र कि औरतों केँ हि ऐसे मम्मों होते हें, मगरवे लटकेहुए होते हें। "
अपने स्तनों कि तारीफ सुनकर नंदिता कां सीना औऱ भि फूल गय़ा। " चाचू, मेरे मम्मों ठीक सें हाथ मे पकड़कर देखिये नां, " उसनेकहा। मे हमेशा अपनी पत्नि केँ लटकते स्तनों कों दबाते हुए युवा स्तनों कि कल्पना करता थां। अब नंदिता मुझे अपने स्तनों कों छूने केँ लिए आमंत्रित कररही थि, मैंने स्वीकार कर लिया।
नंदिता केँ सुडौल स्तनों कों देखते हुए मेरा ताजाझडा हुआ लन्ड आरामसे उठनेलगा। मीठे गुलाबी सख्त निप्पल उन मोटे स्तनों पर्र थिरकरहे थें। निप्पल केँ चारों ओर केँ घेरे एक् रुपये केँ सिक्के जितने बड़े थें। हल्के गुलाबी घेरे केँ चारों ओर बिखरे सख्त कालेबाल उगेहुए। गोरे स्तनों पर्र वे कालेबाल जानबूझ कर लगाएगए थें ताकिकोई उन्हें देख न् सके। उसके बाएंथन कों धीरे-धीरे सें अपनेहाथ सें उठाते हुए, मैंने अपनीजीभ कों गोले केँ ऊपर घुमाया। नंदिता सीहर गई। उन स्तनों पर्र केँ बाल तक खड़े होँ गए। मैंने धीरे-धीरे सें उसके निप्पल कों अपने मुँह मे लेँ लिया। जीभ सें निप्पल सें खेलने लगा। नंदिता नें सि। सि। करतेहुए मेरासिर अपनी छाती सें दबा लिया।
उसके निप्पल केँ आसपास केँ मोटेबाल मेरीजीभ कों गुदगुदी कररहे थें। बदकिस्मत टीचर नें इस खजाने कों मेरेलिए छोड़ दिया थां। इसीलिए वो मेरेपास आया। मे अपने किस्मत केँ विचार सें खुशी सें पागल हौ गय़ा थां। उस उन्माद केँ बीच उसका बूब्ज़ चूसते-चूसते नंदिता केँ बूब्ज़ मे मेरा दाँतलगा चुभ गय़ा। नंदिता नें कहा“अहह सि! चाचू धीरे-धीरे करो प्लीज" मे अब उसके ब्रेस्ट कों जितना होँ सके अपने मुंह मे लें रहा थां। भले हि मे इसबात कां ध्यान रखरहा थां कि अपने दाँत नं चुभ जाएँ, मगर बीच-बीच मे दाँतों केँ निशान उसके कुँवारे स्तनों पर्र दिखाई देने लगते थें। नंदिता उसकेलिए खेद महसूस किए बिना मुझेसंग देरही थि।
मैंने अपने मुंह सें मम्मों बाहर् निकाला तोँ नंदिता नें पूछा"पेट भर गय़ा हैं चाचू?" मे मुस्कुराया औऱ कहा, "हाँ, मेरी मम्मी, तुम्हारा दूध पीकर मेरापेट भर गय़ा हैं, मगर तुम् अभि भि भूखी हौ। " नंदिता नें मुझे आश्चर्य सें देखा। फिन मैंने उसेफिन सें सिखाना शुरुआत किया, "तुम्हारे मुँह मे जोँ मेरा पानी निकलाथा नां ? इसे वीर्य कहते हें। अगरये सही वक़्त पर्र तुम्हारी बुर मे प्रवेश कर गय़ा, तौ तुम् मां बन सकती हौ। एक् बार वीर्य निकल जाने केँ बाद पुरुष संतुष्ट। मगर औरते इतनी जल्द स्खलन नहि करती हें मतलब झडती नहि हैं। लंबे वक़्त तक रगड़ने केँ बाद स्त्री संतुष्ट होँ जाती हैं। फिन उसकी योनि सें पानी भि आता हैं। मगर पुरुषों केँ वीर्य जितना नहि। मगर क्याँ तुम्हे कभी संतुष्ट होने कां सुख मिला हैं? "
इस पऱ नंदिता नें कहा "नहि चाचू, मे अपनी योनि कों कईबार अपनेहाथ सें रगड़ती हूं मगर मे कभी भि आपके बताया वैसे संतुष्ट नहि हुईँ। मुझेसमझ नहि आँ रहा कि आप् क्याँ कहरहे हें। मगर मुझे अपनी बुर मे इतनाबड़ा लन्ड डलवाकर रगड़ने मे बहोत डर लगता हैं। एक् दोबार मैंने अपनी उंगली डालने कि कोशिश कि। मगर मे सिर्फ एक् हि उंगली डालसकी। फिन मेरी बुर मे दो दिनों तक बहोत दर्दरहा। "
"ये पहलीबार मे ऐसा हि होता हैं, बेटा, मगर एक् बारजब ये लन्ड अंदरचला गय़ा, तौ आप् इसके बिना नहि जा सकते। मगर चिंता मतकरो। मेरेइस विशाल हथियार कों तुम्हारी छोटी सि बुर मे डालने कां मेराकोई इरादा नहि हैं। आखिरकार, मे तुम्हारा चाचू औऱ तुम् मेरी नंदू बच्ची हौ। तुम्हे सेक्स केँ बारे मे जानना थां। इसलिये केवल तुम्हे सभी सिखाने केँ लिए हि मे सजधजकर हुआ थां। तुम् हि थि जिसने मुझ सें ज़िद करके मेरा लन्ड अपने मुँह मे लेँ लिया, क्याँ तुमको याद नहि हैं?" मैंने उससे पूछा।
इस पऱ वो शर्माते हुए बोलीं "आप् हि हौ जिसने मुझे जिद्दी बना दिया, चाचू। आपको यकीन होने केँ बावजूद कि मुझे किसी सें चुनौती मनपसंद नहि हैं, आपनेकहा थां कि चाची कि तरहकोई भि लन्ड नहि चूस सकता। तोँ क्याँ, मैंने आपका लन्ड अपने मुँह मे लेँ लिया। "मगर क्याँ मैंने इसे अच्छी तरह सें चूसा, चाचू?""हाँ बेटी, तुम् बहोत अच्छा चूसती होँ। जब मैंने आखिर मे तुम्हारे मुँह मे पानी छोड़ा तोँ तुम्हें दर्दहुआ होगा, " मैंने कहा।
"ये थोडा तकलीफ भरा थां मगर मुझे अपने चाचू कां स्वाद पसन्द आया। इसे अपने मुंह मे भरकर चूसने मे बहोत मजाआया। मगर आप् औरत संतुष्टि केँ बारे मे क्याँ बातकर रहे थें?" नंदिता नें पूछा। मैंने अपनी ट्युशन क्लास फिन सें शुरुआत कि, "एक् महिला कि बुर एक् कड़क लन्ड सें संतुष्ट होती हैं, मगर औऱ भि तरीके हें। आप् अपनी उंगली याँ ककड़ी डालकर भि संतुष्टि कां आनंद लेँ सकते हें। एक् स्त्री कि बुर कों चाटना जैसे मैंने किया थां, वो भि उसे संतुष्ट करती हैं। "
ये सुनकर नंदिता शरम सें लाल होँ गई "क्याँ सच मे चाचू, बुर कों चूसा औऱ चाटा जाता हें? क्याँ कोईउस गन्दी स्थान कों चाटता होगा?" उसने चौड़ी आँखों सें पूछा। मैंने कहा, "क्यूं कोई, मुझेये मनपसंद हैं। तुमने मेरे वीर्य कों अपने मुँह मे लेँ लिया। अब मे तुम्हारी बुर कों चाटकर तुम्हें संतुष्ट करता हूं। आओइस गद्दे पऱ लेटजाओ। " मगर नंदिता कों ऐसा करने मे लज्जा आँ रही थि। जब उसने “नहि” कहा, तौ मे उसे गद्दे तक खींचकर लें गय़ा औऱ उसकी स्कर्ट खोल दि। उसनेकहा नहि नहि औऱ अपनी स्कर्ट कों हटाने केँ लिएकमर उठाकर मेरी सहायता कि। मैंने उसकी पैंटी उतार दि थि।
मैंने नंदिता कां पूरा नग्नरूप अपनी आंखों केँ सामने रखतेहुए एकटक देखा। उसके कुँवारे जिस्म पऱ उनदो उन्मत्त स्तनों कां राज थां। बाकी मांस कों अभि खिलना बाकी थां। उसके कांख मे काले बालों कां एक् घना गुच्छा बढ़ गय़ा थां। नितंब पऱ अधिक चर्बी नहि थि। कमर नाज़ुक थि पऱ पेट पर्र अब भि बचपन कि निशानियाँ थीं। मगर उसके नीचे बालों कां घना जंगल थां। जांघों पर्र बाल थें। मे उस पऱ हाथ फेरने लगा। नंदिता नें अपने अंगों कों सख्तकर लिया औऱ अपनीकमर उठाली क्योंकि मैंने धीरे-धीरे सें अपने नाखूनों सें उसकेपेट कों खरोंच कर अपनाहाथ ऊपरकर दिया।
उसका इशारा समझ केँ मैंने अपना मुँह बालों केँ घने जंगल मे घुसा दिया। बालों केँ नीचे सें एक् अलग तीखीमहक आँ रही थि जोकि सिर्फ कुंवारी लड़कियों कि बुर कि होती हैं। कितने बरसबीत गए थें इसगंध सें सीने कों भरतेहुए। अबइस ढलती उम्र मे मे अपने सीने मे खुशबू केँ उस ख़ज़ाने सें भररहा थां जोँ एक् बारफिन मिला थां।
नंदिता बुर चटवाने केँ लिए आतुर होनेलगी। वो स्वयं हि अपनापेट कां निचला हिस्सा मेरे चेहरे पऱ रगड़ने लगी। उन सख्त झांटो कि गुदगुदी कों नज़रअंदाज़ करके मैंने उसके घुँघराले झांटो कों हटाया औऱ उसमें जन्नत कां द्वार (दरवाज़ा) ढूँढ़ने लगा। बेतहाशा बढ़ते झांटो केँ बीच सें गुजरते हुए आखिरकार मुझे नंदिता कि कुंवारी बुर मिल गई। औऱ उसकी कामातुर बुर पर्र एक् प्यारा सां चुंबन उसके फुदकते हुए बुर केँ दानेऊपर जड़ दिया। नंदिता सीहर गई।
बहुतदेर तक मे नंदिता कां मीठा स्वाद चखतारहा। नंदिता प्यासी नदी कि तरह एक् किनारे सें दूसरे किनारे पर्र जारही थि। उसके प्यारे हाथ मेरे बालों मे पानी कि लहरों कि तरहतैर रहे थें। कभी मेरे बालों सें, कभी मुझेकस कर खींचकर। येऐसा थां जैसे मुझे अपने मे समा लेना चाहती हौ। नंदिता कि उमड़ती छाती सें हल्की आहेंउठ रहीथीं। उसघने जंगल मे उसकीअहह गूँजरही थि। मेरीजीभ उसके झांटो सें भरी घाटियों मे सें स्वछन्द रूप सें विचरण कररही थि। जब मे अपनेसफ़र पऱ चलरहा थां, नंदिता कि नदी मे बाढ़ आँ गई थि। उस उफनती हुइ अनवरत नदी कि गति असामान्य थि। अपनी सहस्रों धाराओं सें उफनती नदी सागर कों आलिंगन कररही थि। रास्ते मे आने वाले पेड़ औऱ झाड़ी कि तरह उसने मुझे अपने बहाव मे समाहित कर लिया। सब बाधाओं कों पार करतेहुए, पीछे छोड़ते हुए वो नदी अपनी मंजिल तक पहुँची। औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे यह तूफान शांत हौ गय़ा।
बहोत देर तक मे नंदिता कि बुर मे अपनीजीभ गड़ाकर वहीं पड़ारहा। वोँ भि अपनी झांटों वाली बुर पर्र मेरासिर रखकर सुस्ता रही थि। अंत मे उसने मेरेबाल आजाद किये औऱ मे उठकरबैठ गय़ा। मैंने यह क्याँ कर दिया थां? बेटी समान नंदिता कि कुंवारी बुर कों चाटकर मैंने उसे जिंदगी कां पहला संतुष्टि कां लम्हा दिया थां। हालाँकि ये अच्छा थां कि उसे खुशी कां लम्हा मिल गय़ा, मगर उसके परिवार नें मुझ पऱ भरोसा करके नंदिता कों मेरेसंग भेज दिया। मे स्वयं कों दोषी महसूस कररहा थां कि मैंने उसे धोखा दिया थां।
बुद्धिमान नंदिता नें मेरे चेहरे केँ भाव कों पहचान लिया। उसने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर्र रखकर मेरे सामने घुटने टेकखड़ी हौ गई। अब उसका चेहरा मेरेसिर केँ ऊपर थां। उसने मेरी आँखों मे देखते हुए मुझसे कहा "चाचू, मुझेपता हैं कि आप् क्याँ महसूस कररहे हें। दुःखी मत होइए। ये मेरे जिंदगी कां सबसे खुशी कां समय थां। मे इस लम्हा कों कभी नहि भूल पाऊँगी। आपनेकुछ भि गलत नहि किया हैं। आप् मेरे प्यारे चाचा, मेरे साथीरहे हें, बिलकुल बचपन सें मेरे मित्र। मैंने आपकोहर छोटी बड़ीबात पहले बताई हैं। मैंने अपनी छोटी-छोटी खुशियों केँ समय आपकेसंग साझाकिए हें। आज आपने मेरे हिस्से मे इतनी बड़ी खुशी कां समय दिया हैं। आज पहलीबार मुझे संतोष हुआ हैं। शुक्रिया चाचू। "
औऱ अचानक उसबड़ी होँ चुकीउस लड़की नें अपने नाजुक काँपते होठों कों नीचे लाया औऱ उन्हें मेरे होठों पर्र रख दिया। उसकी आँखों सें एक् आंसू मेरेगाल पऱ लुढ़क गय़ा। मैंने उसे औऱ लगभग खींच लिया। उसकी नंगीदेह बेल कि तरह मेरेबदन सें कसकर लिपटी हुई थि। उसके फुलेहुए सीने कि धड़कन मेरे सीने मे गूँजरही थि। उसका चुंबन गहरा होताचला गय़ा।
जब उसकी भावना शांत होँ गईं, तोँ उसने अपनी पकड़ ढीलीकर दि औऱ मेरी आँखों मे देखा"अब, तोँ आप् कों बुरा महसूस नहि होगा नाँ, चाचू?" "नहि, मेरी लाडली, मे अब बेहतर महसूस कररहा हूं। बहोत देर होँ चुकी हैं, चलोअब पलंग पऱ चलते हें। मुझे सुभह दफ़्तर जाने केँ लिए जल्द उठना हैं। " मैंने कहा।
नंदिता नें कहा, "मगर हम् दोनों एक् हि गद्दे पऱ सोयेंगे, हाँ चाचू। जैसा आपनेकहा थां, वैसेमत सोइए। " औऱ यूं हि नंगी गद्दे पर्र फैल गई। उसने एक् छोटे सें गद्दे पर्र मेरेलिए स्थान बनाते हुए एक् तरफहट गई औऱ बोलि, ''आओ चाचू, यहींसो जाओ। '' मैंने सोचा कि पूरीरात उसकेसंग नंगा सोना, कुछ ज़्यादा नहि होँ गय़ा, मैंने कहा, "नंदिता, एक् स्कर्ट तौ पहनलो। तुम्हारा शर्ट तौ अभि भि गीला हि होगा। " तोँ जब मे अपनी लुंगी डालने केँ लिए उठनेलगा तौ नंदिता नें मेराहाथ पकड़कर मुझे नीचे बिठा लिया। उसनेकहा, "चाचूआज हम् एक्-दूसरे केँ कितने लगभग आँ गए हें। अब हमें कपड़े कि क्याँ जरूरत हैं? अबसो भि जाओ। वैसे भि गर्मी तौ हौ हि रही हैं। "
हालाँकि उसकी बातें सचथीं, मगर मुझे अपने संस्कारों पऱ विश्वास नहि थां। मैंने उठने कि कोशिश कि तोँ उसने मेराहाथ खींच लिया औऱ मे गद्दे पर्र गिर गय़ा। मौका पाकर उसने अपने पांव मेरीगोद मे रखदिए औऱ अपनेहाथ मेरी गर्दन पर्र रख मुझे भि लेटने पऱ मजबूर कर दिया। नां चाहते हुए, मैंने भि उठने कि कोशिश करना छोड़ दिया औऱ गद्दे पऱ लेटारहा।
मे आज हुइ इस अनोखी घटना केँ बारे मे सोचरहा थां। नींद तोँ उड़ गई थि। नंदिता चुपचाप अपनी नाजुक उँगलियाँ मेरे सीने केँ बालों मे फेररही थि। उसकी नन्ही उंगलिया मेरे छाती केँ बालों केँ संगखेल रही थि। उसकेऐसा करने सें मेरे सीनेबाल खींचगए, "नंदिता, मुझे सोनेदो नां। तुम् भि सोजाओ अब। " बोलीं, "आप् सोइए चाचू, मुझे अभि नींद नहि आँ रही हैं। तब तक मे आपकेइन बालों सें खेललूं। आपके सीने पऱ कितने घनेबाल हें। बापू केँ सीने मे नहि हैं। " औऱ उसने मेरे सीने केँ बालों सें खेलना जारीरखा। उसने अपना पांव जौ मेरे पैरों केँ ऊपररखा थां वोँ घुटने सें मोड़कर ऊपरकर लिया औऱ जिससे उसकी जांघ मेरी जांघ कों छू गई, औऱ नंदिता मेरे औऱ लगभगचली आई। उसके बड़े मम्मों मेरे नंगे शरीर मे चुभने लगे थें। इसकाअसर जहाँ होना थां हौ गय़ा। मेरे लन्ड महाराज, जौ अब तक शांतपड़े थें, जागने लगे थें। जैसे हि मेरेखडे लन्ड नें उसकी जाँघ कों छूआ, नंदिता नें अपनाहाथ मेरी छाती पर्र नीचे किया औऱ आसानी सें मेरे लन्ड कों अपनेहाथ मे पकड़ लिया। मानो वो रोज हि मेरेतने हुए लौड़े कों अपने हाथों मे पकड़ती होँ, याँ उसको इसकीआदत होँ गिया होँ। ऊपर सें वो मुझसे कहती हैं, "चाचा, आपका लौड़ाफिन सें जाग गय़ा हैं। शायदउसे भि नींद नहि आँ रही हैं। " मैंने कहा, "तौ तुम् भि पूरीरात उसकेसंग खेलती रहोगी क्याँ? छोड़ो मेरे लन्ड कों। "
"जाइये मे नहि छोड़ने वाली। मुझेआज एक् नया खिलौना मिला हैं। जोँ आपने मुझे मेरे बचपन मे बार्बी डॉल दि थि वो मेरेपास अभि भि हैं। मुझेआज मिलेइस नए खिलौने कों मे केसे छोड़दू?" उसका तर्क सुनकर मे अवाकरह गय़ा। मैंने सोचा कि इसेकिस भाषा मे समझाऊँ कि मेरातना हुआ लौड़ा उसका खिलौना नहि हैं, अभि मे यहसोच हि रहा थां कि, नंदिता अपने हाथों सें मेरा लवड़ा हिलाने लगी। चमड़ी सें अन्दर बाहर् होती लन्ड कि टोपी केँ संग खेलने मे उसे बहोत मजा आँ रहा होगा। क्योंकि मे उसकी आंखों मे खुशीदेख सकता थां। आखिर मुझेपता थां कि नंदिता अपनीजिद पूरी करेगी चाहे मे उससेकुछ भि कहूं। इसलिये मे चुपरहा औऱ अपने लन्ड कि ओर देखा जौ उसके नाजुक हाथों कि छुवन कां मजा लें रहा थां।
जैसे हि लन्ड कि टोपी पर्र पानी कि एक् बूंद उभरी, नंदिता नें उसे अपनी उंगली सें पकड़ा औऱ उसी उंगली कों अपने मुंह मे डाल लिया। मेरा पानी अपनीजीभ सें चखतेहुए उसने अपनीजीभ निकाली औऱ जीभ कों अपने होठों पर्र फेरकर बोलि "चाचू, इस पानी कां स्वाद अलग हैं। आपने जौ वीर्य मेरे मुँह मे डाला थां, वो अलग थां। ऐसा क्यूं?" मेरी नंदिता केँ अन्दर कि शिष्या अभि भि जागरही थि।
"अरे पगली, जब एक् लन्ड उत्तेजित होँ जाता हैं, तौ उसका पानीअलग होता हैं औऱ जब एक् व्यक्ति संतुष्ट होता हैं, तोँ उसका पानीअलग होता हैं। ये वीर्य नहि हैं जिसे तुमने चाटा हैं। " वो मेरे जवाब सें संतुष्ट होँ गई मगर उसके दिमाग़ मे एक् औऱ नया प्रश्न रेडी थां। "तोँ अगरये पानी मेरी बुर मे चला जाये, तोँ मे मम्मी नहि बनूँगी। ठीक हैं नां चाचा?" मे उसके प्रश्न सें हैरान थां। "तुम्हारा इरादा क्याँ हैं, नंदिता? क्याँ तुम् सच मे इस पानी कों अपनी बुर मे डालने केँ बारे मे सोचरही होँ?" मैंने आश्चर्य सें पूछा।
नंदिता नें मेरी बातों पऱ मुस्कराते हुएकहा "चाचू, मे न् मात्र यह पानी बल्कि आपके लन्ड कों भि अपनी बुर मे डालने कि सोचरही हूं। " उसके शब्दों नें मेरे कानों कों गरमकर दिया। लौड़े नें उसकेहाथ मे एक् झटका दिया। "देखो, आपका लन्ड भि यहीकह रहा हैं, चाचू। देखो तौ वो मेरी बातों पर्र केसेउछल पड़ा। "ये नं जानते हुए कि क्याँ वो सच मे नंदिता बात कां मतलबसमझ रही हैं याँ नहि, मैंने उससेकहा, "तुम् मुझसे पहलेकह रहीथीं कि तुम् अपनी बुर मे इतना बड़ा लन्ड कभी नहि डालोगी। तोँ फिनअब तुम्हारी हिम्मत केसे हुईँ?"
नंदिता नें मुस्कुराते हुएकहा "क्याँ आपनेये नहि कहा थां कि सब लड़कियां कभी न् कभी अपनी बुर मे लन्ड लेती हि हें, चाचू? तौ मे डरपोक थोड़े हि हूं। औऱ किसीगैर मर्द कां लन्ड लेने सें अच्छा हैं कि मे अपने प्यारे चाचू कां लन्ड अपनी बुर मे डलवाना मनपसंद करुँगी। आप् अपना लन्ड मेरी बुर मे डालेंगे नाँ?"
"अरे बेटी, मेरे बड़े लन्ड सें तुम्हारी बुर फट जाएगी। तुम् अभि छोटी हौ। जिदमत करो। अगर तुम् चाहो तौ मे तुम्हारी बुर कों एक् बार औऱ चाट लूंगा, मगर अपनी बुर कों फडवा लेने कां ख्याल अपनेमन सें निकाल दो। " मेरी बातों कां उस पऱ उल्टा असरहुआ। किसी केँ द्वारा चैलेंज दिए जाने पर्र जिद्दी बनने कि उसकीआदत आड़े आँ गई।
"नहि चाचू, आज मे आपके लन्ड कों अपनी बुर मे लेकर रहूंगी। मुझे डराइये मत। अब आप् इसेडाल रहे होँ याँ मे स्वयं इस पर्र बैठकर अपनी बुर मे लें लू " ऐसा कहते नंदिता नें मेरे लन्ड कों जोर सें दबा दिया। अपने बाएंहाथ केँ सहारे सें उठतेहुए, उसने अपने भारी भरकम थनों कां वजन मेरी छाती पर्र रखा, औऱ अपने दाहिने हाथ सें लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे पकड़ लिया औऱ अपने होंठ मेरे होठों सें लगा दिये।
मे भि वासना सें जलउठा औऱ अपनीजीभ उसके मुँह मे ठूंस दि। औऱ नंदिता केँ दाँतों पऱ जीभफेर कर मे उसके मुँह कों चूमने लगा। उसने अपने दाँतअलग करलिए औऱ मेरीजीभ कों परमिशन दि। वोँ अपनीजीभ सें मेरीजीभ सें लड़ने लगी। उस युद्ध मे वो विजयी हुई थि औऱ नंदिता कि विजयी जिव्हा उसके विजित क्षेत्र मे प्रवेश कर गई थि - मेरेमुख मे। मैंने उस लपलपाती जीभ कों चाटकर उसकी खातिरदारी कि।
नंदिता नें आखिर मे अपना मुंह हटाते हुएकहा "फिन क्याँ कहते होँ चाचू? आप् डालोगे याँ मे इस बुर मे घुसालूँ?" "तुम्हारी बुर छोटी हैं नंदिता। तुम्हें बहोत तकलीफ होगी। क्याँ तुम् वोँ सहनकर सकती हौ?" मैंने पूछ लिया। नंदिता नें घबराते हुएकहा, "चिंता मतकरो चाचू। मुझे आप् पऱ पूरा भरोसा हैं। अगर आप् प्रेम सें अपना लन्ड मेरी बुर मे डालेंगे, तोँ मुझे तकलीफ़ नहि होगी। " मे उसके दृढ़ संकल्प केँ आगे बेबस थां। मैंने कहा, "तुँ ऐसे हि पीठ केँ बललेट जा। मे तेरेऊपर आँ जाऊँगा। पहले तुँ मेरे लन्ड कों थूक सें गीलाकर दे ताकि तेरा दर्दकम हौ जाए। "
नंदिता नें प्रेम सें अपने मुट्ठी मे पकडेहुए लन्ड कां चुम्बन लिया औऱ प्रेम सें उसकेऊपर लार कि एक् परत फैला दि। फिन वो वापसपीठ केँ बल गद्दे पऱ लेट गई। उसने अपनेपेर स्वयं हि फैलादिए। मे उसके पैरों केँ बीचआया औऱ नंदिता कि झांटों वाली बुर पर्र हाथ फेरा। नंदिता मुस्कुराने लगी जैसे हि मैंने उसके कोमलपेट कों छूतेहुए उसकी छोटी सि नाभि मे अपनी उंगली डाली, उसनेकहा "चाचू, मैंने आपसे पहले भि कहा थां कि जब आप् गुदगुदी करते हें तोँ अपनी उंगली नाभि मे न् डालें। मैंने आपको बुर मे लौडा डालने केँ लिएकहा थां। "
"ठीक हैं बेटा, मगर तुम्हे क्याँ लगता हैं कि सेक्स मतलब केवल बुर मे कों लन्ड डालकर कुंटना हैं? ऐसा नहि हैं। आज हम् जोँ करनेजा रहे हें उसे सम्भोग कहा जाता हैं। दोनों पार्टनर्स कों एक्-दूसरे सें बराबर आनंद लेना होता हें। ये मात्र ओखली मे मुसल डालकर तेजी सें कुंटना नहि होता हैं, पागली। " मेरे अनुभव कि बातें सुनकर नंदिता कि आंखें भरआईं। "तोँ चाचू सम्भोग केँ दौरान औऱ क्याँ करते हें?" उसने पूछा। मे उसके भोलेपन पर्र हँसा औऱ कहा, "रुको, अब जब तुम्हे ट्यूशन देना शुरुआत कर हि दिया हैं, तोँ मात्र बताने सें बेहतर हैं कि मे तुम्हें करके दिखाऊ। "
कुछनया सीखने आस मे नंदिता चुपरही। वो बड़ी-बड़ी आँखों सें मेरी हरकतों कों गौर सें देखरही थि। मैंने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ उसके पूरे जिस्म पर्र घुमाया। उसके गोरे माथे सें लेकर उसके हसीन पैरों केँ लाल औऱ सफेद नाखून तक। उसकेटंच शरीर कां रोमरोम खिलउठा।
उसकी भौंहों केँ बीच कि स्थान मे बाल भि उगआए थें। मानोउन दो धनुषाकार भौंहों केँ बीच एक् पुलबन गय़ा होँ। वहा सें धीरे-धीरे सें उसकी पलकों कों छुआ। उसकी गहरी आँखों पर्र लंबे बालों वाली पलकें, जैसेआपस मे बात करने वालेदो पंछीलग रहे थें।
जैसे हि मैंने उसके रसीले गालों पऱ चिकोटी काटी नंदिता नें गुस्से मे मेराहाथ एक् तरफकर दिया औऱ "क्याँ कररहे हैं चाचू? मैंने कितनी बार आपसेकहा हैं कि मुझेगाल खींचना मनपसंद नहि हें। आपकीये आदत मुझे बचपन सें परेशान कररही हैं। " मैंने उसकी बातों कों अनसुना करतेहुए अपनेहाथ सें छुवन कां सफ़र जारीरखा। नंदिता केँ हसीन शरीर पऱ हाथ फिराने केँ बाद मैंने अपने होठों कों नंदिता कि चिकनी गर्दन पऱ रख दिया। हाथ केँ बाद नंदिता केँ खूबसूरत बदन कि यात्रा करने कि अब मेरीजीभ कि बारी थि।
मैंने नंदिता केँ सुडौल स्तनों पर्र थोडा अधिक वक्त बिताया। वर्ना जैसे इतने बड़े स्तनों कां अपमान होँ जाता। उन दोनों पहाड़ियों केँ बीच कि खाई कों जिह्वा सें छूकर पूरा सम्मान दिया। उसके गुलाबी निप्पलों कों जीभ सें सहलाया। उँगलियों सें छेड़ते हि दोनों बड़ी सि छाती दोनों शिखर गुस्से मे खड़े होकर आँखें फाड़-फाड़ कर देखने लगे। फिन मैंने उन्हें शांत करने केँ लिए, उन्हें अपने होठों सें लगा लिया।
फिन, अपनीजीभ कों उठाए बिना, मे उसके सीने सें उसकेपेट तक लेँ आया। नाभि केँ चारों ओर चक्कर लगाने केँ बाद, मैंने अपनीजीभ कि नोक कों नंदिता कि नाभि मे घुसाते हुए गुदगुदी शुरुआत कर दि। गुदगुदी सें आने वाली हँसी कों दबाने केँ लिए उसने अपना मुँह अपनेहाथ सें ढँक लिया। बाद मे, जैसे हि मैंने नंदिता केँ पेट पर्र अपनीजीभ घुमाई, उसकेपेट केँ निचले हिस्से पर्र उभरेहुए नए रुओं कों चुन लिया।
वहां सें मे निचले बालों वाले जंगल मे उतरा। उस स्थान कि कोमल सुगंध कों मैंने अपने हृदय कि गहराई तक भर दिया। घने जंगल मे मार्ग बनाते हुए जैसे हि मेरी जिव्हा नें उसकेउठे हुए मदन-ध्वज कों छुआ, नंदिता केँ कोमलबदन मे जैसे तूफान मचल गय़ा। उस तूफान सें घिरी उसकी नाजुक देहलता कि तरह फड़फड़ा रही थि। अगर तौ मेरीजीभ बालों वाली जंगल कि झील मे उतर जाती नंदिता उस तूफान मे बह जाती। इसलिये उसकोबह जाने सें बचाते हुए मेरीजीभ उसकी सख्त जांघ कि औऱ मुड़ गई।
उसकी केलेतने जैसी जांघों कों छूतेहुए, जीभ नंदिता कि गोरी पिंडलियों सें होतेहुए उसके पतले पैरों कि उंगलियों तक घूमाली औऱ इस हसीनसफ़र केँ अंत केँ दर्द कों भूलने केँ लिएउन हसीन नाजुक पेर कि उंगलियों कों अपने होठों मे लेकर सहलाने लगा।
उसकेकमल जैसे नाजुक गुलाबी तलवों कि सबदस पतली उंगलियाँ एक्-एक् करके मेरे होठों सें अंदर-बाहर् होने लगीं। नंदिता इसअति खुशी सें काँपने लगी। जैसे ठण्ड लगने सें कांपरही होँ। मैंने उसकी कपकपाती देह कों गर्मी देने केँ लिए अपने जिस्म सें मैंने नंदिता केँ तन-जिस्म कों ढँक लिया। उसको बाँहों मे लेकर उसके पऱ लेटारहा। मेरी मर्दानगी नंदिता कि जाँघों मे चुभरही थि। नंदिता नें अपनी जांघें खोलीं औऱ उन्हें अंदरआने कां न्यौता दिया। मार्ग ढूंढने मे मेरेहाथ नें उसे सहायता कि। नंदिता तरसती आंखों सें उस लम्हा कां प्रतीक्षा कररही थि। औऱ अबये होनेजा रहा थां। मैंने अपना लन्ड नंदिता केँ द्वारा हल्के प्रतिरोध बावजूद पहले हि झटके मे, उसके कपकपाती देह मे गहराई तक धकेल दिया।
एक् लम्हा केँ लिए नंदिता कि आंखें वेदना सें छलक उठींमगर इसे अनदेखा करतेहुए वो इसनए अनुभव कों अपने मनमस्तिष्क मे संगृहीत करने लगीं। उसके जिस्म नें समझदारी सें आरामसे मेरे लन्ड केँ लिए स्थान बनाई। होठों नें उसका एक् छोटा सां चुंबन लिया औऱ मेरेहाथ सुडौल स्तनों पऱ पहुँच गए। देखते हि देखते अब नंदिता कि आँखों मे वासना सें चमक दिखने लगीं थि।
नंदिता नें अब मुझेकस कर पकड़ लिया औऱ मेरेसंग वासना केँ झूले पऱ झूलने लगी। प्रत्येक झूला ऊंचाई तक जारहा थां। दोनों शरीरों केँ बीच थोडा सां फासला बना, मगर जल्दी हि वेफिन सें एक् दूसरे केँ बदन मे तेजी प्रवेश करगए औऱ जोर सें झटके मारने लगे। झूलों कि गति बदलते हुए मे नंदिता कों इसनई हसीन वादियों मे घुमाने लें गय़ा वो भि ख़ुशी सें मेरासंग देरही थि। भले हि ये उनकी पहली यात्रा थि, मगर नंदिता नें बिना किसी हिचकिचाहट केँ हर धक्के कां स्वागत किया। इन हसीन वादियों कि यात्रा केँ बादअब हमारी यात्रा हमारे मंजिल केँ लगभग आँ गई हैं। घुड़दौड़ कि रफ्तार बहुतबढ़ गई। घोड़ों केँ मुंह सें झाग निकलरहा थां। उन्हें जल्द हि पानी पऱ लें जानां होगा।
कमरे मे मादक चीखें औऱ आहों कि आवाज़ गूंजी। आहों औऱ चीखों कि आंधीचली। स्पर्श सुख केँ बादल नें उस तूफान कों भर दिया। औऱ नंदिता एक् भयानक आवेग केँ संग खुशी केँ भंवर मे डूब गई, जैसे कड़कती बिजली जमीन पर्र गिर गई होँ। मैंने भि अपना अंडकोष मे सें निकले लावा कों नंदिता कि देह मे उंडेल दिया।
तूफान केँ गुजर जाने केँ बादजब तक आसमान साफ नहि हुआतब तक हमारा आलिंगन ढीला नहि हुआ। थोड़ी सि सांस लेतेहुए मैंने उसकी बोलती आँखों कों पढ़ा। जैसे हि मेरी नंदिता नें अपनी शर्मीली आँखों सें इसनए एहसास कां मतलब मेरी आँखों मे ढूँढना शुरुआत किया, मैंने उसके गोरे विशाल माथे कों प्रेम सें चूम लिया। हालाँकि अब कहने केँ लिएकुछ नहि बचा थां, फिन भि एक् दूसरे सें लिपटकर हमारे रोमरोम सें एक् दुसरे कों शुक्रिया देतेहुए औऱ सोगए।
# ख़त्म #
नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story - Next part mein bada twist
तारीफ़ तौ इस उम्दा किस्सा केँ मूल लेखक सिराज भइया कि बनती हैं दोस्तों, मैंने तोँ मात्र अनुवाद करके स्टोरी केँ इमोशनस् कों बरकरार रखने कि कोशिश कि हैं
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