रोंये वाली मखमली चूत - Desi sex story - Full Story Part 1
रोंये वाली मखमली बुर
नमस्ते दोस्तो, मेरानाम संदीप हैं, दोस्तो किस्सा उस वक़्त कि हैं जब मेरी उम्रबीस वर्ष थि औऱ मे बी.एस.सि। फाइनल कां छात्र थां। मुझे कॉलेज मे सभी चॉकलेटी ब्वॉय कहते थें, मेरारंग गोरा औऱ बदन सामान्य हैं। मेरी ऊंचाई 6 स्लिम औऱ वैभव कि ऊंचाई मेरी ऊंचाई सें थोड़ी कम हैं। वोँ एक् गोरा औऱ हसीन सां लड़का थां।
मे एक् किराए केँ घर-मकान मे अपनेयार वैभव केँ संग रहता थां, जौ मेरे हि क्लास मे पढ़ता थां।
एक् साल पहले फर्स्ट इयर मे एक् हसीन लड़की नें प्रवेश लिया। उस तीखे नैन-नक्श 5.3 इंच हाईट वाली खूबसूरत गोरी लड़की कां नाम भावना थां, उसका फिगर 32-24-32 थां।
उस गदराए हुए जिस्म कि लड़की कों देखते हि मैंने ठान लिया थां कि इसकी बुर मे अपना लन्ड घुसाकर हि रहूँगा।
कॉलेज कि सब लड़कियों कि तरह वोँ भि मुझे देखती थि।
मैंने उसके लगभग जाने कि कोशिश कि, मगरबात नहि बनी.बस एक्-दो बार नोट्स कों लेकर बातें हुईं। इसी बातचीत मे मैंने उसका औऱ उसने मेरेघऱ कां पतापूछ लिया। वोँ मेरे रूममेट कों भि पहचानने लगी थि।
ऐसे हि दिनबीत रहे थें। मगर मुझे आहिस्ता लगनेलगा कि मे उससे प्रेम करता हूं। इसलिये मे भावना कों पाने कां कोई भि मौकाहाथ सें नहि जाने देना चाहता थां।
हमारे कॉलेज मे एक् फंक्शन थां। जिसमें कुछ गेम्स भि होने थें। सीनियर होने कि वजह सें कॉलेज केँ सब फंक्शन औऱ गेम्स कि तैयारी हमारा ग्रुप हि करता थां।
एक् गेमचिट निकालने वाला थां औऱ उसचिट मे लिखेहुए टास्क कों पूरा करना थां।
उसमें भावना नें भि हिस्सा लिया थां, मेरे दिमाग़ मे शरारत सूझी, मैंने गेम सें पहले हि भावना कों पीला कार्ड उठाने कह दिया।
अब गेम केँ वक्त भावना नें पीला कार्ड उठाकर पढ़ा औऱ पढ़कर स्टेज पर्र हि रोनेलगी।
सबने पूछा कि टास्क क्याँ हैं, पर्र वोँ कुछ नहि बोलि औऱ स्टेज सें उतर गई।
सभीउसे चिढा़ने औऱ हँसने लगे।
सफेद सलवार कुर्ती औऱ प्रिंटेड लाल दुपट्टे मे गुस्से औऱ लज्जा सें लाल भावना हॉल सें बाहर् चली गई।
मुझे अपनी गलती कां अहसास थां। क्योंकि मैंने हि उस पीले कार्ड मे टास्क लिखा थां कि अपनेऊपर कां कपड़ा हटाकर वाककरो। औऱ वोँ इसीवजह सें रोनेलगी थि, उसने किसी कों कुछ नहि कहा।
अब मे उसी कि सोच मे डूबाहुआ फंक्शन निपटा करघऱआया औऱ थकावट मिटाने केँ लिए नहाने चला गय़ा।
मे बाथरूम सें निकला हि थां कि मुझे सामने भावना नजरआई। उसे देखते हि मेरेहोश उड़गए।
इससमय मैंने तौलिया केँ अलावा कुछ नहि पहना थां। वोँ दरवाजे पर्र हि खड़ी थि।
मैंने कहा-अरे भावना तुम्। आओ अन्दर बैठो।
उसने वैभव कि तरफ देखते हुएकहा- आप् बाहर् जाइए!
वैभव बिनाकुछ बोले निकल गय़ा।
वैभव केँ बाहर् जाते हि उसनेरूम मे कदमरखा।
भावना नें कहा- तुम् जानते होँ संदीप मे स्टेज पर्र क्यूं रोई?
मैंने बिनाकुछ बोले अपनी नजरें झुकालीं।
‘संदीप शायद तुम् समझे हि नहि? मे तुमसे प्रेम करनेलगी थि। मगर तुम् मेरेबदन केँ भूखे निकले। ’
इतना सुनकर मे खुश भि थां औऱ लज्जित भि थां।
मैंने कहा- नहि भावना। ऐसाकुछ भि नहि हैं।
उसनेकहा- सफाई देने कि जरूरत नहि हैं।
येकहकर उसने मुड़कर दरवाजा बंदकर दिया।
रूम मे ट्यूब लाईट कां भरपूर प्रकाश थां औऱ उसने मुझसे थोड़ी दूर खड़े होकर रोतेहुए अपना दुपट्टा बदन सें अलगकर दिया। मे मूर्ति बन गय़ा थां, मेरेकुछ बोलने सें पहले हि उसनेकहा- तुम्हें यही चाहिए थां नां?
ये कहतेहुए एक् हि झटके मे अपनी कुर्ती निकाल दि।
लालरंग कि ब्रा मे कसे उसके सुडौल दूधिया झांकते बड़े-बड़े स्तनों कों देखकर मेरा लन्ड अकड़ने लगा। तभी उसने सलवार कां नाड़ा खींचा औऱ सलवार जमीन पर्र आँ गिरी।
अनायास हि मेरीनजर उसकी चिकनी टाँगों कां मुआएना करनेलगी।
मेरीनजर टाँगों सें शुरुआत होकर उसकी सुडौल जाँघों सें होकर बुर मे चिपकी लालकलर कि पेंटी केँ अन्दर घुस जाने कां प्रयास कररही थि।
तभी उसने अपनी ब्रा भि निकाल फेंकी मे उसके गुलाबी निप्पल देख हि रहा थां कि उसकी आवाज़ आई‘लो बुझालो अपनीहवस कि आग.’
ये कहने केँ संग हि उसने अपनी पेंटी भि टाँगों सें अलगकर दि।
मैंने एक् झटके सें अपना पहनाहुआ तौलिया निकाला औऱ उसकीतरफ बढ़ गय़ा।
वोँ रोतेहुए भि मेरे खड़े लन्ड कों देखरही थि औऱ मुझसे नजरें मिलते हि अपनी आँखें बंदकर लीं।
मे उसकेपास जाकर अपने घुटनों पऱ बैठ गय़ा, जिससे कि उसकी भूरे रोंये वाली मखमली बुर मेरी आँखों केँ सामने आँ गई।
मैंने उसकी बुर केँ ऊपर हल्का सां चुम्बन लिया औऱ उसकी बुर सें मदहोश कर देने वाली खुशबू कों लंबी सांस केँ संग अपने अन्दर भर लिया।
फिन उसकीकमर मे अपनाहाथ घुमाकर उसको तौलिया पहना दिया।
मेराऐसा करते हि उसका रोनाबंद होँ गय़ा औऱ मैंने खड़े होकर उसके गालों कों थामकर माथे कों चूमते हुएकहा- भावना अगर मे शरीर पाना चाहूँ तोँ रोज एक् नई लड़की मेरेखाट पऱ होगी, पऱ सच्चाई तोँ यह हैं कि मे भि तुमसे प्रेम करता हूं। लोपहन लो अपने कपड़े औऱ मेरे मजाक केँ लिए मुझेमाफ करदो।
अब भावना फिन सें रोतेहुए मेरे सीने सें चिपक गई औऱ कहा- तुम् सचकहरहे होँ नां संदीप? तुम् नहि जानते कि मे तुम्हें कितना चाहती हूं।
मैंने कहा- तुम् भि नहि जानती कि मे तुम्हें कितना प्रेम करता हूं।
मैंने उसेगोद मे उठाकर बैड मे बिठा दिया चूंकि मैंने अपना तौलिया भावना कों पहना दिया थां। इसलिये अब मे पूरीतरह नंगा थां औऱ भावना भि केवल तौलिये मे थि।
भावना मेरीगोद मे बैठी थि, अब हम् प्रेम भरी बातें करनेलगे।
मेराहाथ भावना केँ उरोजों पर्र जारहा थां। पऱ मे पहल नहि करना चाहता थां।
भावना नें अपनी बांहों कां हार मेरेगले मे डालरखा थां। वोँ मेरे गालों कों चूमरही थि। अब तौ उसका एक् हाथ मेरे सीने कों भि सहलारहा थां।
लड़की केँ नाजुक हाथ कां स्पर्श पाकर मेरा लौड़ा अकड़ने लगा। शायद भावना कों मेरा खड़ा लन्ड चुभा। वोँ मुस्कुरा कर मेरीगोद सें उतरकर मेरे सामने जमीन पर्र बैठ गई औऱ मेरे लन्ड कों गौर सें देखने लगी।
मे समझ गय़ा कि इसकेमन मे कुछ सवाल हें।
मैंने कहा- क्याँ सोचरही हौ?
उसनेकहा- यह कितना बड़ा औऱ खूबसूरत लगरहा हैं, क्याँ सबका इतना हि बड़ा होता हैं?
मैंने हँसते हुए जवाब दिया- नहि अधिकतर लोगों कां इससे छोटा होता हैं, पऱ कुछ लोगों कां इससे भि बड़ा होता हैं।
हमारी बातों केँ टाइम भावना मेरे लन्ड कों सहलारही थि। फिन मैंने उसे लन्ड कों चूसने केँ लिएकहा, शायद वोँ भि इसी प्रतीक्षा मे थि।
पहले उसने लन्ड कि पप्पी ली, फिन धीरे-धीरे सें लन्ड चूसना शुरुआत किया।
उसने एक् बार मेरे चेहरे कि ओर देखा। उत्तेजना मे मेरी आँखें छोटी हौ रहीथीं।
दूसरे हि लम्हा भावना नें लन्ड अपनेगले तक डाल लिया औऱ चूसने केँ संग हि आगे-पीछे भि करनेलगी।
मैंने उसकासर थाम लिया औऱ उसके मुँह कों हि चोदने लगा, वोँ गूं-गूं कि आवाज़ करनेलगी मगर मैंने अपना लन्ड जोरों सें पेलना जारीरखा।
उसने मुझसे छूटने कि कोशिश कि। पर्र मे कहां छोड़ने वाला थां, मैंने धक्के औऱ तेजकर दिए।
मैंने अचानक हि लन्ड मुँह सें बाहर् खींचकर पूरामाल उसके उरोजों पऱ गिरा दिया। उसकी आंखों मे आंसू आँ गए थें।
उसने मेरे वीर्य कों छूकर देखा औऱ मुँह बनाते हुए बाथरूम मे चली गई।
उसने बाथरूम सें निकलते हि कहा-मार डालते क्याँ?
मैंने ‘सॉरी’कहा।
‘कोईबात नहि मे तुम्हारे लिएमर भि सकती हूं। ’
ये कहतेहुए उसने मुझेचूम लिया औऱ कहा- तुम् तौ खुश हौ नाँ?
इसकेबाद हम् दोनों लेटेरहे, उसने लन्ड कों फिन सें टटोलना शुरुआत किया। कुछ समयबाद उसने मेरे लन्ड कों पकड़कर कहा-वाउ जनाब। इतनी जल्द सुस्त पड़गए। मगर मे तुम्हें ऐसे हि नहि छोड़ने वाली।
उसकी बातें सुनकर मुझेशक हुआ कि भावना चुदाई केँ बारे मे इतना केसे जानती हैं। वोँ पहलीबार मे भि इतनी खुलकर बात केसेकर रही हैं।
मैंने पूछा- भावना क्याँ तुम्हारा कोई अतीत थां, मे क्याँ कहनाचाह रहा हूं तुम् समझरही हौ नाँ?
भावना नें कहा- पहले तुम् अपना अतीत बताओ।
मैंने खुलकर कह दिया- मैंने तीनबार सेक्स किया हैं। दोबार रंडी कों चोदा औऱ एक् बारयार कि गर्लफ्रेंड केँ संग किया हैं।
बस इतना सुनते हि भावना बैड सें उतर गई।
मैंने कहा- क्याँ हुआ?
अब मे असमंजस मे थां कि क्याँ होने वाला हैं।
‘क्याँ हुआ भावना तुमको मेरासच बुरालगा क्याँ?’
उसनेकहा- कुछ नहि। मे सोचरही हूं कि मेरासच जानने केँ बाद क्याँ होगा।
मेरा दिमाग़ घूमा। मैंने कहा- तुम्हारा मतलब?
‘हाँ। मैंने भि दोबार चुदाई कि हैं पर्र वोँ मात्र मेरा अतीत थां। क्याँ तुम् मेरेलिए यह बातें भूल सकते होँ?’
येकहकर वोँ रोनेलगी।
मैंने उसेचुप कराया औऱ खाट पे लेँ गय़ा। अब दोस्त, उसकी चुदाई सें मुझे क्याँ फर्क पड़ना थां। तोँ मे मुस्कुरा दिया औऱ बात वहीं समाप्त होँ गई।
मैंने भावना सें कहा-फिन लन्ड केँ बारे मे अनजान क्यूं बनरही थि?
उसनेकहा- ताकि तुम्हें मुझ पऱ शक नां हौ।
‘ओहऐसा क्याँ.!’ यह कहतेहुए मैंने अपनी उंगली उसकी पहले सें गीली हौ चुकी बुर मे डाल दि।
भावना चिहुंक उठी औऱ आँखें बंद करके आनन्द केँ सागर मे डूब गई।
अब मे उसके निप्पल कों चूसने लगा। उसका एक् हाथ मेरे लन्ड कों सहलारहा थां औऱ दूसरे हाथ सें वोँ अपने उरोजों कों मसलने लगी।
भावना कि आँखें हवस केँ मारेलाल होँ रहीथीं।
मेरा लन्ड भि बेहाल हौ रहा थां। अब मैंने जल्दी हि अपनी दिशा बदली औऱ उसके पैरों कों मोड़कर उसकी बुर कां दीदार किया। फिन उसकी मखमली बुर कों छूतेहुए उस नजारे कों अपनी आंखों मे कैदकर लेना चाहा।
हल्के भूरे रोंए। गुलाबी फांकें औऱ शबनम कि चमकती बूंदों केँ संग स्वत: हि सांस लेती उसकी मनमोहनी बुर नें मुझे पागलबना दिया।
मे झुका औऱ मैंने एक् हि बार मे अपनीजीभ उसकी बुर केँ नीचे सें ऊपर तक फिराई। फिन आँखें बंद करकेजीभ कों मुँह केँ अन्दर करके चटखारा लिया। जैसे बहोत लजीजचीज खाई हौ।
मैंने भावना कों देखा वोँ अपने उरोजों कों गूँथे जारही थि। जैसे हि उससे मेरी नजरें मिलीं। उसने मेरा लन्ड चूसने कि मंशा इशारों मे हि जाहिर कर दि।
मैंने 69 कि पोजिशन सैट करके लौड़ा उसके मुँह मे दे दिया औऱ मे पुनः बुर चाटने लगा। हम् दोनों हि पागलों कि तरह लन्ड औऱ बुर कां रसास्वादन कररहे थें।
अब मैंने अपनीकला कां प्रदर्शन करतेहुए बुर कों चांटा मारा। इससे भावना कि चुदने कि भूख औऱ बढ़ गई, उसने मेरा लन्ड चूसना छोड़ दिया औऱ बुर चोदने केँ लिए कहनेलगी।
पऱ मे तोँ उसकारस जीभ सें हि निकालना चाहता थां, इसलिये मैंने उसकीबात पर्र ध्यान नहि दिया। तौ उसने स्वयं मुझे धकेल दिया औऱ मे पलंग मे हि चितलेट गय़ा। अब वोँ स्वयं मेरेऊपर आँ गई औऱ लन्ड पकड़कर अपनी बुर पऱ टिकवा लिया।
अगले हि उसने अपने जिस्म कां पूराभार मेरे लन्ड पऱ धर दिया। एक् ‘ऊओंह.’ कि आवाज़ उसके मुँह सें भि निकली औऱ मेरे मुँह सें भि निकल गई।
उसने लन्ड कों अपनी बुर मे जड़ तक घुसवा लिया औऱ कुछसमय ऐसे हि आँखें मूँदें शांत बैठेरही। दूसरे हि लम्हा उसने अपना मम्मों हाथों सें पकड़ा औऱ झुककर मेरे मुँह मे दे दिया।
अब उसनेकमर उचकाकर चुदाई शुरुआत कर दि, मैंने भि ताल मिलाकर नीचे सें झटके देने शुरुआत करदिए।
वोँ बदहवास होकर चुदेजा रही थि, ‘उम्म्ह… आहह-आहह… हय…याह…’ कि आवाजें अब मादक सीत्कारों मे बदल गई थीं। वोँ अपने होंठों कों दांतों सें काटरही थि औऱ मे भि उसकेइस रूप कों देख केँ पागलहुआ जारहा थां।
मैंने उसके उरोजों कों चूसने काटने मसलने केँ अलावा उसे भड़काने केँ लिए चांटे भि मारे औऱ हम् दोनों हि बहोत तेज चुदाई कां आनन्द लेनेलगे।
अचानक हि उसने मेरे सीने केँ बालों कों नोचते हुए चुदाई कि गति बढ़ा दि। मैंने भि उसकीकमर पकड़ी औऱ झटकेतेज करदिए। शायदयह शांति केँ पहले कां तूफान थां- ओहहह संदीप। आईलवयू मेरे राजा। मेरेसभी कुछ। ऊह्ह.
वोँ ये कहतेहुए मुझ पऱ झुक गई।
मैंने उसकेपीठ पऱ हाथ रखतेहुए ‘ओहह। मेरी रानी। मेरी भावना.’ कहतेहुए लन्ड कां लावा उसकी बुर मे हि निकाल दिया।
दोनों कां स्खलन करीब एक् संगहुआ थां औऱ दोनों ऐसे हि चिपककर लंबे वक़्त तक पड़ेरहे।
कुछ वक्तबाद वैभव नें दरवाजा खटखटाया तौ उसेदो मिनट रुकने कों कहकर हम् दोनों नें जल्द सें कपड़े पहने।
चूंकि रात केँ 9 बजरहे थें, मैंने भावना कों छोड़ना चाहा। पऱ भावना नें मनाकर दिया औऱ अपनी स्कूटी सें चली गई।
उसदिन केँ बाद हमारे मिलन कां सिलसिला शुरुआत होँ गय़ा। भावना मेरे दोस्तों कों औऱ मे उसकी सहेलियों कों जानने लगा। उनसे हमारी मेलजोल भि अच्छी हौ गई थि।
रोंये वाली मखमली चूत - Desi sex story – New Episode
एक् दिन मे कॉलेज केँ बाहर् अकेले बैठा थां, तभी भावना कि सहेली काव्या आई औऱ उसने मुझे एक् चिट्ठी थमाई, चिट्ठी देते वक़्त वो बहोत शरमारही थि, उसनेकहा- अकेले मे पढ़ना।
कहतेहुए वोँ चली गई।
काव्या बहोत गोरी 5’5″ हाईट कि हसीन लड़की थि। पर्र ईश्वर नें उसेबदन केँ नाम पर्र कंगाल रखा थां अर्थात काव्या केँ उरोज औऱ कूल्हे एकदम नां केँ बराबर थें।
मे चिट्ठी खोलने हि वाला थां कि भावना आँ गई औऱ मैंने चिट्ठी उसके देखने सें पहले हि जेब मे रखली।
हम् लोग मेरेरूम मे आए। हमेशा कि तरह चुदाई कि औऱ भावना अपनेघऱ चली गई।
भावना इसीशहर कि लड़की थि। जबकि काव्या बाहर् सें आई थि। इसलिये वोँ औऱ उसकी एक् सहेली हमारी तरह हि रूम लेकर रहतीथीं।
भावना केँ जाने केँ बाद मैंने चिट्ठी खोली चिट्ठी जौ आपके सामने पेश हैं।
‘हाय संदीप। मे भावना कि पक्की सहेली हूं, इसलिये भावना नें मुझे तुम्हारे बारे मे सारी बातें बताई हें कि तुमको लड़कियों कि सोच औऱ शारीरिक तकलीफों केँ बारे मे भि अच्छी जानकारी हैं। मुझे लगता हैं तुम् मेरी एक् समस्या कां हलकर सकते हौ। सब लड़कियों कि तरह मुझे भि हसीन सुडौल औऱ आकर्षक दिखने कां शौक हैं। पर्र तुम् तोँ जानते हि होँ कि ईश्वर नें मुझे शक्ल तोँ अच्छी दि, पऱ सुडौल नहि बनाया हैं। मुझे अपने उरोजों औऱ कूल्हों कों उभारने केँ लिए क्याँ करना चाहिए? अगर तुम्हें बुरा नाँ लगे तोँ मुझे @@@@@ इस नम्बर पर्र फोन करना।
तुम्हारी मित्र- काव्या’
मे चिट्ठी पढ़कर चौंक गय़ा औऱ मेरेमन मे लड्डू फूटा कि एक् नई लड़की चोदने कों मिलेगी, मैंने जल्दी हि काव्या कों फोन किया।
काव्या नें एक् हि घंटी मे मोबाइल उठाया। पर्र कोई आवाज़ नहि आई।
मे एक्-दो बार ‘हैलो। हैलो.’ बोलने केँ बादसमझ गय़ा कि काव्या शरमारही हैं।
मैंने कहा- देखो काव्या, जब तुमने हिम्मत करके मुझेयह चिट्ठी दि हैं, तौ अब शरमा क्यूं रही होँ। औऱ ऐसे भि इसमें शरमाने वालीकोई बात नहि हैं।
उतने मे उधर सें आवाज़ आई-दो मिनट रुको। मे काव्या कों मोबाइल देरही हूं।
मेरी खोपड़ी सटक गई- अरररे तेरी। तौ मे बातें किस सें कररहा थां? बेटा मन मे दूसरा लड्डू फूटा। एक् औऱ चोदने कों मिलेगी।
तभीउधर सें काव्या कि आवाज़ आई- हैलो संदीप?
मैंने जल्दी कहा- दोस्त अपना नम्बर किसी कों क्यूं उठाने देती हौ?
उसने पूछा- तुमने उसेकुछ कह दिया क्याँ?
‘नहि। कहा तौ कुछ नहि। पर्र वोँ हैं कौन?’
उसने बताया- वोँ मेरीरूम मेट निशा हैं औऱ यह नम्बर उसी कां हैं। मेरा मोबाइल अभि बनने गय़ा हैं। आपने मेरी चिट्ठी पढ़ी क्याँ। मुझे आपको कहतेहुए अच्छा नहि लगरहा थां। पर्र मुझेकुछ औऱ नहि सूझा।
मैंने कहा-कोई बात नहि। मुझे खुशी हैं आपनेमुझ पऱ भरोसा करके मुझे अपनी तकलीफ बताई।
मैंने उसे मम्मों सुडौल करने वाली एक् क्रीम बताई औऱ उसे लगाने केँ उपाय बताए।
तभी वैभव चिल्लाने लगा औऱ मैंने मोबाइल रख दिया।
मे इन दिनों खुश थां, मगर मेरेरूम पार्टनर कां बर्ताव अब अजीब रहनेलगा थां। हम् सारेकाम बांटकर किया करते थें। पर्र अब वोँ हरबात मे झगड़ने लगा।
एक् दिन भावना मेरेघऱ आई तौ वैभव नें बाहर् जाने सें मनाकर दिया। फिन मे औऱ भावना अनमने मन सें पार्क मे जाकरबैठ गए औऱ थोड़ी बहोत चूमा-चाटी करकेघऱ आँ गए।
मैंने घऱआकर वैभव सें रूम नाँ छोड़ने कां कारण पूछा, वैभव नें साफकहा- तूँ अकेले हि मजे लेता हैं। अबअगर भावना इसघऱ मे आई। तौ मे भि चोदूँगा।
येसुन कर मेरी गांडफट गई, मैंने उसे समझाने कि कोशिश कि।
मगर उसनेसाफ कह दिया- तूँ चाहे गांडमरा। मगर मे अपनी शर्त नहि बदलूँगा।
अब मैंने भि कुछ नहि कहा औऱ भावना सें अब पार्क मे हि मिलने लगा।
मे भावना कों ठेस नहि पहुंचाना चाहता थां। इसलिये मैंने भावना कों आधीबात बताई कि वैभव कों हमारा रूम मे मिलना पसन्द नहि हैं।
भावना नें मुस्कुरा कर मुझेगले लगा लिया औऱ कहा-कोई बात नहि संदीप। मे तुम्हारी बांहों मे हूं। मेरेलिए यही बहोत हैं। पऱ कोई औऱ जुगाड़ होँ तौ देखो नां। तुमसे चुदवाए बिना रातों कों नींद नहि आती।
उसकीयह बातें मेरे कानों मे गूँजरही थीं। अभि मे कोई उपायसोच हि रहा थां कि मेरेमन मे काव्या कां ख्याल आया, मैंने काव्या कों मोबाइल करके उसकी समस्या केँ बारे मे बात कि तौ उसने बताया कि क्रीम कां कोईअसर नहि हौ रहा हैं।
तौ मैंने उसे तरीका दुबारा बताया कि उसे निप्पल औऱ पूरे उरोजों पर्र बहोत सारी क्रीम लगाकर लंबे वक्त तक मालिश करना चाहिए।
तौ उसनेकहा- मे मालिश करती तोँ हूं। पऱ थक जाती हूं औऱ स्वयं सें करते भि नहि बनता।
मैंने तपाक सें कह दिया- तोँ हमें बुला लियाकरो।
उसने भि शरारत मे जवाब दिया- आए.हाय रे.ऐसी भाग्य हमारी कहां.
मैंने कहा- इशारा तौ करो तुम्हारी भि क़िस्मत बना देंगे।
अब दोस्तो, मुझे लगनेलगा कि काव्या भि चुदने केँ लिएमचल रही हैं।
मैंने कहा- इशारा तोँ करो तुम्हारी भि भाग्य बना देंगे।
उसने ‘मजाकबंद करो.’कह कर मोबाइल रख दिया।
पऱ उसकी बातों नें मेरे लन्ड मे आगलगा दि थि, मैंने मुठमार केँ पानी निकाला।
तभी मेरे दिमाग़ मे एक् तरकीब सूझी कि क्यूं नां दोनों कों एक् संग चोदाजाए।
जब मे दूसरे दिन भावना सें मिला तोँ कहा- क्यूं नाँ हम् काव्या सें रूम केँ लिएबात करें?
तोँ उसकी आंखें खुशी सें बड़ी होँ गईं, उसनेकहा- अभि तोँ उसकी पार्टनर भि एक् हफ्ते केँ लिएघऱ गई हैं, अच्छा मौका हैं। मे उससे जल्दी बात करती हूं।
पर्र मैंने उसे रोका औऱ कहा- थोडा सुन तोँ लो.फिन बातकर लेना। पहलीबात तोँ यह कि वोँ मानेगी याँ नहि। औऱ दूसरी बातयह कि वोँ मान भि गई तोँ कहीं एक्-दो बार केँ बाद वैभव जैसे हि नौटंकी करनेलगी, तौ फिन हमारे पास औऱ कोई ठिकाना नहि रहेगा। इसलिये मे चाहता हूं कि काव्या कों ऐसे पटाया जाए कि वोँ हमेंकभी मना नहि करे।
भावना नें कहा-फिन तुम्हीं बताओ कि केसे पटाया जाए?
मैंने थोडा झिझकते हुए काव्या कि चिट्ठी औऱ उसकेसंग हुईँ बातों कों बताते हुएकहा- अगर तुम्हें एतराज नाँ हौ तोँ हम् थ्री-सम चुदाई कर सकते हें। इससे काव्या हम् लोगों कों कभीरूम केँ लिएमना नहि करेगी औऱ उसकी समस्या भि हल होँ जाएगी।
भावना मेरे मुँह सें यहसभी सुनकर नाराज होँ गई।
फिन मैंने अपना दांव फेंका, मैंने उसेहाथ पकड़कर खड़ा किया औऱ उसके गालों कों पकड़कर उसकी आंखों मे आंखें डालीं, मैंने कहा-जान मे तुमसे बहोत ज़्यादा प्रेम करता हूं। मैंने सारी बातें केवल तुम्हारे संग अधिक सें अधिक वक़्त बिताने केँ लिएकही हें। मुझे काव्या सें कोई मतलब नहि। अगर तुम्हें कोई एतराज हैं तौ मे उसकीतरफ देखूँगा भि नहि।
उसकी आँखों मे आंसू आँ गए औऱ उसनेकहा- मे अपना प्रेम नहि बांट सकती।
मैंने कहा-हट पागल। चुदाई करने सें प्रेम थोड़ी न् होता हैं। मे तोँ तुम्हारा थां औऱ तुम्हारा हि रहूँगा।
इतना सुनते हि भावना नें कहा-सच जान.!ऐसी बात हैं तोँ मुझे भि कोई एतराज नहि।
इतना सुनते हि मे तोँ खुशी सें पागल हौ गय़ा, अगर मे चाहता तौ काव्या कों भावना कों बिना बताए भि चोद सकता थां। मगर मेरेमन मे भावना केँ जान लेने कां डरबना रहता औऱ कभी नां कभीराज खुल हि जाता।
मैंने भावना कों एक् प्लान बताया औऱ दो घंटेबाद पहुंच जाने कि बोलकर मे काव्या केँ घऱचला गय़ा।
मेरा प्लान ये थां कि मे काव्या कों पटाकर चोदते रहूँ, उसी वक्त भावना पहुंचे औऱ नाराज होने कां नाटककरे, फिन मे दोनों कों एक् संगचोद सकूँ।
मे भावना कों प्लान बताकर औऱ काव्या केँ घऱचला गय़ा। उसकेघऱ पहुंचा तौ उससेबात शुरुआत हुईँ- अरे काव्या कैसी हौ?
मेरे अचानक पहुंचने सें उसके चेहरे पऱ खुशी, आश्चर्य औऱ डर केँ भाव एक् संगउभर आए।
‘अरे संदीप केसे आनांहुआ.?’ कहतेहुए काव्या नें मुझे बिठाया।
मैंने कहा-बस ऐसे हि तुमसे मिलने औऱ तुम्हारे हाथों कि गरमचाय पीने कां मन किया।
‘ओह। तोँ आप् कैसीगरम चाय पीते हें। बताइए। मे बनाती हूं। ’
उसनेकहा औऱ गरमचाय बनाने लगी।
चूंकि उसका भि रूम किराए कां थां इसलिये एक् हि रूम औऱ अटैच लेटबाथ वाला हि थां। रूम केँ एक् किनारे पलंग औऱ एक् किनारे गैसआदि सामान रखाहुआ थां। जिधर काव्या गरमचाय बनारही थि।
काव्या नें लोवर औऱ टॉपपहन रखा थां। जोँ करीबबदन सें चिपका हुआ थां।
गरमचाय बनाते हुए वोँ मुझसे बातकर रही थि औऱ मे उसे पीछे सें निहार रहा थां। वोँ बहोत हि कामुक लगरही थि। उसके कूल्हे छोटे थें। मगर घुटने मोड़कर जमीन मे बैठने सें उनके आकार स्पष्ट होँ रहे थें।
मेरे लौड़े मे सुरसुराहट शुरुआत हौ गई। मेरी नजरें उसके चिपके हुए कपड़ों केँ ऊपर सें उसकी ब्रा-पेंटी कां उभार महसूस करपारही थीं। चिपकी टी-शर्ट मे उसकी नाजुक पतलीकमर मुझे रिझारही थि।
मैंने काव्या सें कहा- मेरी दवाई नें असर किया याँ नहि?
काव्या नें कहा- तुम्हें क्याँ लगता हैं तुम् हि देखकर बताओ।
मैंने कहा- कपड़ों केँ ऊपर सें पता नहि चलता.जरा कपड़े उतारकर दिखाओ। तोँ बताऊँ।
‘अच्छा। अकेली लड़कीदेख कर पटाने कि कोशिश कररहे होँ?’ कहतेहुए गरमचाय लेकर मेरे सामने आँ गई।
मैंने गरमचाय लेतेसमय उसकेहाथ कों छुआ औऱ कहा- तुम्हें पटाने कि क्याँ जरूरत। तुम् तौ पहले सें पटी हुईँ होँ।
वोँ मुस्कुरा कर मेरे सामने बैठ गई औऱ गरमचाय पीनेलगी।
मैंने बड़ी बेशर्मी सें उसके अंग-अंग कों ताड़कर देखा। मेराऐसा करने सें जरूर उसकी बुर मे भि पानी आँ गय़ा होगा।
मैंने कहा- लगता हैं। दवाईअसर कररही हैं। मगर मालिश औऱ बढ़ाने कि जरूरत हैं। कहो तौ आज मौका हैं अच्छे सें मालिश करदूँ?
उसने नजरें नीचीकर लीं।
मे इसेमौन स्वीकृत समझा औऱ उठकर दरवाजे कों बंदकर आया।
असल मे मैंने दरवाजे मे कुण्डी नहि लगाई थि। क्योंकि मुझेपता थां अभि भावना आने वाली हैं।
काव्या नें कहा-यह सभी मुझे अच्छा नहि लगरहा हैं।
मैंने उसेहक सें कहा- क्रीम कहां हैं? वोँ बताओ, बाकी बातें मत सोचो।
उसने क्रीम उठाकर दि, मैंने जैसे हि उसकी टी-शर्ट कों उठाने केँ लिएछुआ। उसने मेराहाथ पकड़ लिया। उसकी सांसें तेज होँ गई थीं।
उसनेकहा- मे स्वयं निकालती हूं।
उसने नाँ-नुकुर करतेहुए अपनी टी-शर्ट कों जिस्म सें अलगकर दिया।
उसकेदूध जैसे सफेद जिस्म कों देखते हि मेरा लौड़ा सलामी देनेलगा।
उसकी पतलीकमर। सच मे गजबढा रही थि। मगर ब्रा छोटे उरोजों कि वजह सें भरी हुई नहि थि। इसलिये अच्छी नहि लगरही थि।
मुझे थोड़ी हँसी भि आई। पऱ वोँ मैंने मन मे हि रोकली औऱ उसे ब्रा भि उतारने औऱ मालिश केँ लिए लेटने कों कहा।
वोँ शरमाते हुए ब्रा उतारकर लेटी, मगर लज्जा केँ मारेलाल हौ चुके अपने चेहरे कों अपने दोनों हाथों सें ढक लिया। मे उसके बहोत हि हसीन छोटे गोरे उरोजों केँ बीच गुलाबी निप्पल देखकर अपने आपको छूने सें नहि रोक पाया, मैंने उनके उरोजों पऱ हाथ फिराते हुएकहा- काव्या तुम्हारे उरोज छोटेभले हें। पऱ बहोत हि आकर्षक औऱ मदहोश करने वाले हें।
मेरे शब्द सुनकर औऱ मेरे हाथों कां स्पर्श पाकर वोँ बेचैन सि होकर कसमसाने लगी।
जैसे हि मैंने क्रीम लगाना शुरुआत किया। काव्या नें आँखें बंदकर लीं औऱ अपने हाथों सें खाट कों कसके पकड़ लिया।
मैंने भि अपने कपड़े गंदे होने कां बहाने करके उतारदिए।
अब मे मात्र चड्डी बनियान मे थां।
मे काव्या केँ छोटे उरोजों कों मालिश केँ बहाने गूँथे जारहा थां। मेरे लौड़े नें चड्डी कों तंबूबना दिया थां। काव्या कों दर्द भि होँ रहा होगा। पऱ उसकी बेचैनी साफझलक रही थि।
मैंने अपनाहाथ काव्या केँ लोवर मे घुसाना चाहा तौ काव्या नें आँखें खोली औऱ मेराहाथ पकड़कर कहा- मात्र दवाई लगाओ औऱ कुछ करने कि इजाजत नहि हैं।
मैंने उसकी आँखों मे आँखें डालकर कहा- क्याँ कुछ औऱ नहि?
उसनेकहा- कुछ नहि। मतलबकुछ नहि।
मैंने कहा- तुम्हारा मतलब चुदाई सें हैं क्याँ?
तौ वोँ शरमा गई औऱ मुस्कुरा कर आँखें बंदकर लीं।
मे फिन उसका लोवर उतारने लगा। पऱ उसने मेराहाथ फिन पकड़ लिया।
मैंने कहा-ठीक हैं बाबा। मे केवल कूल्हों मे दवाईलगा देता हूं। फिनकुछ नहि करूँगा।
उसनेकहा- पक्का नां?
मेरे ‘पक्का.’ कहते हि वो उलट गई औऱ मैंने उसका लोवर उतार दिया।
अब तोँ मे पागलहुए जारहा थां। उसके कूल्हों कां बिल्कुल नर्मरुई सां अहसास औऱ चिकनी चमकदार त्वचा थि। मैंने स्वयं पऱ काबूरख कर दवाई सें मालिश शुरुआत कि। उसके कूल्हों मे हौ रहे कंपन औऱ खड़े रोंएं देखकर मे यकीन सें कह सकता हूं कि वोँ चुदाई केँ लिए सजधजकर औऱ बेचैन थि।
मैंने मालिश करते-करते अपनेहाथ उसकी बुर कि ओर बढ़ाए औऱ वोँ कसमसा कर सिमट गई।
उसने एक् बार मेराहाथ हटाने कि कोशिश कि। पर्र मे अब स्वयं पागल हौ चुका थां औऱ उसे भि पागलबना रहा थां।
मैंने अब दिमाग़ लगाया औऱ अपनी चड्डी निकाल कर काव्या केँ सर कि ओर खड़ा हौ गय़ा औऱ झुककर उसके कूल्हों कि मालिश करनेलगा। मेराऐसा करने सें काव्या केँ सर सें मेरा लन्ड टकरारहा थां।
काव्या नें मुझे देखने अपनासर उठाया औऱ उसने जैसे हि ‘यह क्याँ हैं.!’ बोलने केँ लिए अपना मुँह खोला। मेरा लौड़ा उसके मुँह मे घुस गय़ा।
मैंने उसकेसर कों वैसे हि एक्-दो मिनट पकड़े रखा। वोँ छटपटाने लगी तोँ मैंने लन्ड बाहर् निकाल लिया। उसने मुझे गालियां दि औऱ मुझे मारने लगी।
उसकीमार मुझे फूलों सें सहलाने जैसीलगी। फिन वोँ रोनेलगी औऱ मुझसे चिपक गई।
मैंने उसे ‘सॉरी’कहा औऱ कपड़े उठाने लगा, उसने मेराहाथ पकड़कर रोक दिया औऱ कहा- मे स्वयं यहसभी चाहती थि। पर्र तुमने जबरदस्ती कि। इसलिये रोना आँ गय़ा।
‘मेरी सोना.’कह कर मैंने उसेचूम लिया औऱ पलंग मे बैठकर आंखों सें इशारा किया कि आओ.अब बिना जबरदस्ती केँ लौड़ा चूसलो।
उसने भि थोडा मुँह बनाया औऱ हँसकर घुटनों पऱ बैठ गई, उसने पहले थोडा आहिस्ते सें चूसा.फिन लन्ड कों खा जाने कां प्रयास करनेलगी।
वोँ आंखें बंद करके बेसुध लन्ड चूसरही थि कि तभी भावना नें दरवाजा खोला औऱ वोँ अचानक हि अन्दर आँ गई।
यहसभी इतना जल्दहुआ कि काव्या तोँ अभि अपने मुँह सें लन्ड निकाल भि नहि पाई थि।
सभी मेरे प्लान केँ मुताबिक़ हि होँ रहा थां।
रोंये वाली मखमली चूत - Desi sex story – New Episode
मे काव्या केँ मुँह मे अपना लन्ड डालकर लन्ड चुसाई कां आनंद लेँ हि रहा थां कि तभी दरवाजा खोलते हि भावना कमरे मे अन्दर आँ गई।
भावना नें पहले दरवाजा अच्छे सें बंद किया औऱ सामने आकर खड़ी हौ गई। तब तक काव्या नें लन्ड छोड़कर अपने दोनों हाथों सें स्वयं कों ढकने कि नाकाम कोशिश कि।
भावना कुछ कहती। उससे पहले हि काव्या केँ मुख सें निकला- वोँ। ओह। वोँ। भावना संदीप दवाईलगा रहे थें।
भावना नें कहा-ओह दवाई.?भला मे भि तोँ देखूं कौन सि दवाई हैं जौ लन्ड कों मुँह मे लेकर लगवाई जाती हैं?
उसने मेरे लन्ड कों पकड़कर अपने मुँह मे डाल लिया, मेरे लन्ड कों एक्-दो बार आगे-पीछे किया।
कुछदेर तक काव्या कों खरी-खोटी सुनाने केँ बाद भावना नें मेरे प्लान केँ अनुसार अपनीबात पेशकर दि, काव्या सें कहा-ठीक हैं। अगर तुम् दवाई लगवाना चाहती होँ। तोँ मेरी एक् शर्त हैं।
काव्या नें जल्द सें कहा- क्याँ शर्त?
भावना नें कहा- मे जब चाहूँ यहाआके संदीप सें चुद सकती हूं।
काव्या नें थोडा सोचा औऱ कहा-ठीक हैं पऱ जब निशा नाँ हौ तोँ तुम् ऐसाकर सकती होँ।
फिन भावना नें काव्या कों ‘ओह। मेरी प्यारी.’ सहेली बोलकर गलेलगा लिया।
अब भावना नें मुझेपास बुलाकर मेरा लन्ड अपने हाथों सें काव्या केँ मुँह मे डाल दिया औऱ स्वयं अपने कपड़े उतारने लगी। काव्या केँ ऊपर भि वासना हावी होनेलगी थि, मेरा लन्ड भि आग उगलने कों बेचैन थां।
भावना नें नंगे जिस्म केँ पासआकर मेरी बनियान निकाल दि औऱ मुझसे सटकर मुझे बेतहाशा चूमने लगी। वोँ अपने उरोजों कों मेरे जिस्म सें रगड़ने लगी।
अचानक हि मेरे हाथों कि पकड़ काव्या केँ सर पऱ मजबूत होँ गई औऱ तीन-चार जबरदस्त धक्कों केँ संग हि मे काव्या केँ मुँह मे हि स्खलित होँ गय़ा।
काव्या नें मेरा वीर्य थूक दिया तौ भावना नें वीर्य कों हाथों सें उठाया औऱ काव्या केँ बदन मे मल दिया।
अब मुझेइन दोनों शेरनियों कि प्यास बुझानी थि इसलिये मे बिस्तर पऱ लेट गय़ा औऱ सभीकुछ उन्हें हि करने दिया, दोनों सहेलियां एक् दूसररी कों चूमने लगीं।
फिन दोनों एक् संग मेरा लन्ड चाटने औऱ चूसने लगीं।
काव्या बहुतदेर सें मेरे लन्ड केँ संगखेल रही थि। इसलिये वोँ बहोत उत्तेजित होकर अपनी बुर कों मारने लगी। वोँ मेरे लन्ड कों खींचने औऱ चूसने लगी।
मे समझ गय़ा कि अबइसे लन्ड चाहिए, मैंने भावना कों इशारा किया औऱ उसने काव्या कों लेटाकर उसके चेहरे केँ दोनों ओर अपनी टांगें रखकर अपनी बुर चटवाने लगी।
काव्या ‘ऊंह। उन्ह.गूं गूं। उम्म्ह… आहह-आहह… हय…याह… हिस्स्स…’ करनेलगी। मैंने काव्या कि टांगें फैलाईं औऱ नां चाहकर भि मे बुर कों चाटने झुक गय़ा। उसकी कोमल मखमली बुर देखकर किसी कां भि मन चाटने कों करता। मैंने पहलेऊपर केँ दाने कों जीभ सें सहलाया औऱ फिन बुर केँ अन्दर तक जीभ घुसाने कि चेष्टा कि।
काव्या कि हड़बड़ाहट उसकी चुदाई कि ख़्वाहिश बयानकर रही थि, उसकीसील नहि टूटी थि। इसलिये बुर कां मुँहबंद नजर आँ रहा थां। उसकी दोनों फांकों केँ बीचमहज एक् दरारनजर आँ रही थि।
मैंने अपनी उंगलियों सें एक् बार दोनों फांकों कों फैलाकर देखा औऱ अपने हाथों मे थूक लेकर उसकी गीली बुर कों औऱ अधिक चिपचिपा कर दिया, फिन उसकी नाजुक सि रसीले गोरी बुर मे अपना लम्बा लन्ड एक् झटके मे डाल दिया।
‘उउईईई। मां। मे मर गईईई.कोई बचाओ.कोई तौ बचाओ रे.उफ्फ। फट गई.’ वोँ चीखने लगी।
जबकि काव्या कि बुर मे अभि मेरा पूरा लौड़ा नहि गय़ा थां।
मैंने भावना कों उसेचुप कराने कों कहा, उसने अपनी पेंटी कों काव्या केँ मुँह मे ठूंस दिया औऱ बिस्तर सें उतरकर काव्या केँ सर कि तरफ खड़े होकर उसके हाथों कों कसके पकड़ लिया।
काव्या कि आंखें दर्द केँ मारे बड़ी होँ गई थीं, आंखों सें आंसू निरंतर गालों सें होकरबह रहे थें।
मैंने एक् जोर कां धक्का दिया औऱ अपना हब्शी लौड़ा उसकी बुर मे जड़ तक घुसा दिया।
काव्या तोँ अब चिल्ला भि नहि सकती थि उसका जिस्म ढीलापड़ गय़ा, उसने आंखें बंद करके चेहरे कों एक् ओर झुका लिया।
मे डर गय़ा। पऱ भावना नें कहा- निकालना नहि। वरनायह जीवन मे कभी चुदवा नहि पाएगी।
भावना नें काव्या केँ गालों मे थपकी देकरउसे पुकारा तौ काव्या नें आंखें खोलदीं।
उसनेमरी सि आवाज़ मे ‘हाँ’ करके एक् बार जवाब दिया, तब मेरीजान मे जानआई।
अब मे बिनाकुछ किए काव्या केँ सामान्य होने कां प्रतीक्षा करनेलगा। भावना नें अपनी पेंटी उसके मुँह सें निकाल दि औऱ मुँह मे दो-चार छींटे पानी केँ डालते हुएउसे चूमने लगी, उसकेबदन कों सहलाते हुएउसे बहलाने लगी।
काव्या कां रोना आहिस्ता बंद हौ गय़ा। मैंने भि मौके कि नजाकत समझते हुए लन्ड कों थोडा आगे-पीछे करना शुरुआत कर दिया। काव्या कों अब भि तकलीफ थि। पऱ अब शायद आनंद भि आनेलगा थां।
काव्या भावना कों चूमने लगी औऱ थोड़ी हि देरबाद चुदाई मे भि संग देनेलगी ‘अहहचोद मेरे राजा। फाड़डाल साली बुर कों। बहोत परेशान करती हैं यह। उउउह.हहह। इइई.ईईई। इआइ आहहहह.’
वोँ आवाज़ करनेलगी।
मैंने उसके छोटे उरोजों कों मसलते हुए अपनीगति तेजकर दि। भावना हम् लोगों कों देखकर अपनी बुर मे उंगली डालकर अन्दर बाहर् करनेलगी।
अब काव्या मदहोशी मे बड़बड़ाने लगी ‘उउउहह ऊऊ ईईईई। आहहह। संदीप.प.प औररर। जोररर सें। औररर। जोरर सें.’
इसी केँ संग हि वोँ अकड़ने लगी औऱ मेरी जांघों कों जोर सें पकड़कर अपनी बुर मे लौड़ा अन्दर तक लें जाकररुक गई, उसका स्खलन हौ गय़ा थां।
अब उसकाबदन एकदम ढीलापड़ गय़ा थां मगर मेरा पानी एक् बार काव्या केँ मुँह मे निकल चुका थां औऱ दूसरी बार कि चुदाई मे मेरा जल्द नहि निकलता सो मैंने काव्या कि बुर सें लन्ड निकाल लिया।
अब तक भावना मंजेहुए खिलाड़ी कि तरह पहले हि जमीन पर्र आकर घोड़ी बन गई थि, भावना नें भि बहोत दिनों सें चुदाई नहि कि थि। इसलिये वोँ भि बहोत अधिकगरम होँ चुकी थि। मैंने एक् हि झटके मे लौड़ा उसकी बुर कि जड़ मे बिठा दिया। भावना नें मजे सें ‘ऊह.उन्ह.’ कि आवाज़ निकाली औऱ बुर कों टाइट करतेहुए लन्ड कों अन्दर खींच लिया।
काव्या अब बिस्तर सें उठकर हमारे पास आँ गई औऱ हम् दोनों कों सहलाने लगी। हमारी चुदाई सीधे पहले गेयर सें छठे गेयर मे चली गई थि, भावना ‘ऊऊहहह। आआहह। आनंद आँ गय़ा जान। औऱ तेज उउहह ईईईईउउ हिस्स्स्। औऱ तेज.’ कि आवाज़ निकालने लगी।
मैंने भावना कि कमर कों थामकर चुदाई कि गति बढ़ा दि।
मेरे धक्कों सें भावना थकनेलगी। भावना कां सर झुकते-झुकते जमीन तक झुक गय़ा, जिससे उसकी बुर औऱ ऊपर आँ गई, अब मे लौड़ा पूरा बाहर् खींचता औऱ फिन एक् हि संगजड़ तक पेल देता थां।
कुछ धक्कों केँ बाद भावना कि आवाज़ मे थकान सि आँ गई। मे समझ गय़ा कि अब इसकाकाम भि होने वाला हैं। औऱ ऐसा हि हुआ। भावना एकदम सें अकड़ गई औऱ जमीन पर्र लुढ़क गई।
पऱ मेरा अभि भि निकलना बाकी थां, मे अपना लन्ड खड़े होकरहाथ सें हिलारहा थां, वे दोनों लड़कियां मेरे सामने बैठकर मेरे लन्ड केँ अमृत कि बूंद कां प्रतीक्षा करने लगीं।
जल्द हि मेरी आंखें बंद होँ गईं.हाथ कांपने लगे। मांशपेसियां अकड़ने लगीं औऱ मैंने दोनों हि लड़कियों केँ चेहरों पर्र फुहार छोड़ दि।
जितना माल उनके मुँह मे आया.वे चाटगईं औऱ जोँ जिस्म मे गिरा थां। उसे जिस्म मे हि मल लिया।
उसदिन हमनेकुल तीन राउंड चुदाई कि औऱ निशा केँ आते तक रोज चुदाई चलतीरही। कभी थ्री-सम चुदाई होती। तोँ कभी केवल काव्या केँ संग मेरी चुदाई चलती रहती, औऱ हाँ.अब तौ काव्या केँ उरोज औऱ कूल्हे भि मेरी मालिश कि वजह सें निकलआए हें।
इसतरह हम् तीनों कि चुदाई खूब मस्ती सें चलनेलगी।
एक् दिन काव्या केँ घऱ सें मोबाइल आया कि उसकी नानीमा मर गई हें औऱ उसे जानां हैं। काव्या करीब एक् महीने केँ लिए अपनेघऱ चली गई औऱ अभि हम् लोग काव्या कि रूममेट निशा कों पटा नहि पाए थें इसलिये अब हमारे पासफिन सें चुदाई केँ लिएकोई स्थान नहि थि।
हम् लोगों नें कुछदिन तौ ऐसे हि पार्क मे बैठकर बितालिए। पर्र अब चुदाई कां कीड़ा कुलबुलाने लगा थां।
एक् दिन भावना नें कहा- संदीप तुम्हारे पास औऱ कोई उपाय नहि हैं कि हम् चुदाई कर सकें।
मैंने जल्दी कहा-हाँ हैं नां। औऱ उपाय भि ऐसा कि तुमको चुदाई कां पहले सें अधिक मज़ा आएगा।
उसनेकहा- तौ फिनदेर किसबात कि हैं?
मैंने उससे वैभव कि कही हुईँ बातबात बताई कि अबजब भि भावना रूम मे आएगी मे भि चोदूँगा।
भावना नें ‘छी:.’ कहतेहुए जल्दी मनाकर दिया।
फिन मैंने समझाते हुएकहा- इसमें हर्ज हि क्याँ हैं? औऱ फिन मे भि तुम्हारे सामने काव्या कों चोदता हूं।
उसनेकहा- वैभव मुझे क्याँ समझेगा दोस्त? औऱ तुम् बर्दाश्त केसे करोगे?
मैंने फिन पहले वाला दांव फेंका- मे तुमसे प्रेम करता हूं औऱ तुम्हारे संग चुदाई केँ लिएकुछ भि कर सकता हूं।
मगर उसनेकहा- मे इतनी बेशर्म नहि हूं कि जाकर उसके लौड़े पऱ बैठ जाऊँ।
मैंने कहा- तुम्हें कौनऐसा करने कों कहरहा हैं? मेरेपास एक् तरीका हैं। सुनोजब वोँ घऱ पऱ नहि रहेगा। तब हम् चुदाई कर लेंगे.
अगर वोँ हमारी चुदाई करते तक नहि आया। तौ तुम्हें उससे चुदाई नहि करानी पड़ेगी। पऱ अगर वोँ आँ गय़ा औऱ जबरदस्ती कि। तौ करवा लेना। ऐसे मे वोँ तुम्हें गलत भि नहि समझेगा औऱ स्वयं कों दोषी समझेगा।
भावना कि आँखों मे आंसू थें। उसने मुझसे कहा-ठीक हैं। पऱ केवल तुम्हारी खातिर मे यहसभी कररही हूं।
प्लान केँ मुताबिक जब वैभवघऱ पऱ नहि थां। तब मैंने भावना कों बुलाया।
भावना केँ आते हि हम् एक्-दूसरे पऱ टूट पड़े, बहोत कम वक्त मे हमारे बदन सें कपड़े अलग होँ गए थें। भावना मजे लेकर लौड़े कों चूसरही थि। मे उसके उरोजों कों दबारहा थां।
तभी दरवाजे सें आवाज़ आई, भावना नें अपने आपको अपने हाथों सें ढकने कि नाकाम कोशिश कि पऱ वैभव कि आँखें फटी कि फटीरह गईं।
मैंने कहा-अबे, दरवाजा तोँ बंदकर!
तौ उसने जल्द सें दरवाजा बंद किया।
वैभव केँ हाथ मे सामान थां, उसने सामान रखा औऱ भावना केँ पासआकर सीधे भावना केँ उरोज कों दबाते हुए बोला- मतलब तुम् मुझसे चुदवाने केँ लिए राजी हौ नाँ?
भावना नें अनजान बनतेहुए कहा-यह क्याँ बोलरहे होँ.? चलोहटो मुझे जानेदो।
वैभव थोडा चौंका। मगर उसने भावना कों जकड़ लिया औऱ चूमते हुएकहा- एक् बार चुदवा कर तोँ देख मेरीजान। तेरी बुर मेरे लन्ड कि दीवानी होँ जाएगी।
भावना मुझेदेख रही थि, मैंने आंख मारी औऱ इशारे सें हि मजे लेने कों कहा, फिन भि भावना नें नौटंकी चालूरखी।
वैभव नें कहा- इतना क्यूं भावखा रही हैं। तुम्हे क्याँ लगता हैं मेरे लौड़े मे कांटे लगे हें?
ये कहतेहुए अपना लौड़ा निकाल लिया।
भावना उसके लम्बे औऱ तनेहुए लौड़े कों देखती रह गई। वैभव कां लन्ड हसीन। सफ़ेद चिकना सां लौड़ा साइज मे भि मेरे लन्ड केँ जैसा हि मस्त थां। पर्र उसका लन्ड मुझसे मोटाकुछ ज़्यादा लगा।
भावना नें कहा तौ कुछ नहि। पऱ मे उसकी खुशी उसके चेहरे मे पढ़ सकता थां।
‘चल आँ कुतिया। चूस मेरा लौड़ा.’ ये कहतेहुए वैभव नें लौड़ा हाथ मे पकड़कर भावना केँ मुँह केँ सामने लहराया।
भावना नें भि किसी गुलाम कि तरह जाकर उसके पैरों केँ नीचेबैठ कर उसके लन्ड मुँह मे भर लिया।
वैभव कां लन्ड कुछ मोटा थां। इसलिये भावना केवल ऊपर-ऊपर सें चाटपा रही थि, पऱ वैभव तौ बेचैन थां ‘सालीकब सें तुम्हारी तरफ चोदने केँ ड्रीम्स देखरहा हूं। लेँ अन्दर लें करचूस नाँ.’
ये कहतेहुए अपना लन्ड उसने भावना केँ गले तक ठेल दिया।
भावना ‘गूंगूं। ऊऊं.’ करनेलगी।
मेरा लन्ड भि अकड़रहा थां, मैंने पास जाकर अपना लौड़ा भावना केँ हाथ मे पकड़ा दिया। भावना मेरे लन्ड कों आगे-पीछे कररही थि औऱ वैभव भावना केँ मुँह कों हि चोदेजा रहा थां।
वासना मे डूबी भावना दो-दो लन्ड केँ मजे एक् संग लेँ रही थि।
तभी वैभव नें भावना कां सिर पकड़ा औऱ लौड़ा जोर-शोर सें ठेलने लगा। भावना कों सांस लेने मे भि तकलीफ होनेलगी। लौड़ा मुँह मे पूराघुस जाने कि वजह सें भावना कि आँखें जीभसभी बाहर् आँ गए थें। वोँ तौ अच्छा हुआ कि वैभव कां इसी टाइम स्खलन हौ गय़ा। नहि तोँ शायद भावना लस्त हि हौ जाती।
वैभव नें स्खलन केँ बाद भि भावना कां सर नहि छोड़ा। वोँ उसकेगले तक लौड़ा ठेलकर धीरे-धीरे आँखें बंद करके झड़ता रहा।
जब झड़ने केँ बाद लौड़ा सिकुड़ने लगा.तब जाकर वैभव नें उसे छोड़ा। मगरइधर मेरी हालत खराब हौ रही थि। मैंने भावना कों इशारों मे हि उसकी हालत पूछी। उसने आंसू पोंछते हुएसिर हिलाकर ठीक होने केँ संकेत दिए।
फिन मैंने उसे एक् प्रेम भरा चुम्बन दिया औऱ खाट पऱ लेटा दिया।
अबकीबार मैंने उसके मुँह मे अपना लौड़ा दे दिया। भावना मेरे लन्ड कि आदी थि। इसलिये उसने बड़ेमजे सें मेरा लन्ड चूस लिया।
उधर वैभव भावना कि टाँगों केँ बीचबैठ गय़ा औऱ बड़े प्रेम सें भावना केँ गीली होँ चुकी मखमली बुर कों सहलाते हुए तारीफें करनेलगा।
‘शपथ सें दोस्त। क्याँ बुर हैं तुम्हारी। इतनी इतनी कोमल, चिकनी गद्देदार औऱ कितनी सुन्दर गुलाबी फांकें हें। आज तोँ तुम्हें जी भरके चोदूँगा रानी। ’
यह कहतेहुए वैभव बुर पऱ जीभ फिराने लगा। वैभव कों बुर चाटने कि आदत नहि थि। इसलिये वोँ झिझकते हुए धीरे धीरे बुर चाटरहा थां।
जिन लड़कियों नें अपनी बुर चटवाई हैं। उन्हें पता होगा कि धीरे-धीरे चटवाने सें उत्तेजना औऱ बढ़ जाती हैं।
ऐसा हि हुआ, भावना औऱ उत्तेजित होकर मेरा लन्ड चूसने लगी।
हम् सबकी आवाज़ औऱ आँखों मे वासना हावी होँ चुकी थि।
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