मासूम बहु Incest(sasur-bahu) - Hindi Sex Story - Complete Kahani Part 1
मासूम बहु Incest(sasur-bahu)
वक्त भि क्याँ क्याँ खेल दिखता हैं, अभि दोसाल पहले कि हि बात हैं जब मेरी मम्मी कां देहांत होँ गय़ा थां, लगा कि जैसे दुनिया हि लूट गई, मेरीमा हि थि जिनसे मेरेदिल कां नाता थां, वोँ मेरे औऱ पिता जी केँ बीच संवाद कां माध्यम थि, मेरे पिता जीफौज मे थें बहोत हि अनुशासित जिंदगी कां पालन करने वाले औऱ बहोत हि कड़क उनसे मेरेकभी नहींबनी, मे उनसे इतना डरता थां कि उनके सामने होने सें हकलाने लगता थां वोँ भि मुझे बिल्कुल भि मनपसंद नहीं करते थें, मे उनके जैसा नहीं थां उन्हें एक् कड़क मर्द चाहिए थां औऱ मे एक् सामान्य सां लड़का थां जौ जोर सें चिल्लाने सें हि डर जाया करता थां, मे अपनीमा पर्र गय़ा थां, उनकी कोमलता शायद महिला होने केँ कारण सबको बहोत पसन्द आती थि मगर मेरी कोमलता मेरे पिता कों बिल्कुल भि पसंद नहीं थि, मे हमेशा हि अपनीमा केँ पल्लू मे छिपकर रहा करता थां, कुछ चाहिए तोँ अपनीमा सें मांगता वोँ मेरे पिता सें कहती थि,
“उसे मेरे सामने आने सें इतनाडर क्यो लगता हैं, अब वोँ बड़ा हौ गय़ा हैं जोँ कहना हैं मेरे सामने आँ करकहे “यह आवाज़ अक्सर मेरे कानो मे पड़ा करती थि, पिता जी लंबे चौड़े औऱ भारी भरकमबदन केँ मालिक थें औऱ संग हि उनका व्यक्तित्व बहोत हि जानदार थां, अक्सर लडकिया उनपरमर जाया करती थि, वोँ मेरेलिए कितने भि सख्त क्यो नाँ रहे पऱ मम्मी कि हरबात वोँ मान हि लिया करते थें, वोँ मां सें बहोत प्रेम करते थें औऱ कभी उनपररौब झड़ते हुए मैंने उन्हें नहीं देखा वोँ आखरी वक्त मे भि उनका बहोत ख्याल रखते थें, यही वजह थि कि जब मम्मी नें अपनी आखरी ख़्वाहिश रखी तोँ वोँ नां नहींकर पाए …
“मेरे जाने केँ बाद विकास कि विवाह कर देना, यह तौ तुमसे नहींकह पायेगा मगर मेरे जाने केँ बाद वोँ बेसहारा नां हौ जाय, औऱ इसघऱ मे एक् लड़की कां होना जरूरी हैं “मां नें जबयहबात कही थि तौ मेरे औऱ पिता जी केँ आँखों मे आंसू आँ गए, मां केँ जाने केँ कुछ हि महीनों केँ बाद मेरी विवाह कर दि गई, मे शहर मे एक् साफ्टवेयर इंजीनियर थां औऱ शहर मे हि रहता थां, पिता जी देहात मे रहकर देहात कि खेती देखते थें, नां मेरीकभी इतनी हिम्मत हुईँ कि मे उन्हें अपनेसंग शहरआने कां निमंत्रण दु नाँ हि वोँ स्वयं सें कभीशहर आये, मगर सभीकुछ बदलने वाला थां, यह बदलाव आया मेरी पत्नि कि वजह सें नेहा …
रूप कि रानी औऱ मासूमियत कि देवी नेहा, देहात कि लड़की थि, बेहद हि खूबसूरत, मेरी अच्छी नॉकरी औऱ मेरे परिवार कि इज्जत कां परिणाम थि नेहा, एक् बड़े किसान परिवार सें आयी थि औऱ संस्कारो सें भरी हुईँ थि, घऱआने केँ कुछ हि दिनों मे उसने नां जाने क्याँ चमत्कार चला दिया, वोँ मेरे औऱ पिता जी केँ दिलो मे राज करनेलगी, मे तोँ उसकी सुंदरता पर्र मोहित थां हि, पिता जी भि उसे बेहद प्रेम किया करते थें, उसने कुछ हि दिनों मे मेरीमा कि स्थान लें ली, मगर अब मुझे देहात सें शहर जानां थां …
“पिता जी आप् भि चलिए नाँ हमारे संग “
नेहासर मे घूंघट डाले पिता जी केँ सामने खड़ी थि जौ अभि एक् आराम कुर्सी मे बैठे थें, नेहा कां चहरासाफ दिखरहा थां वोँ नई दुल्हन केँ लिबास मे हि रहना मनपसंद करती थि, हाथो मे भरी चूड़ियां औऱ मांग मे भराहुआ सिंदूर। हाथो मे एक् ट्रे थां जिसमे पानी कां एक् ग्लास औऱ गरमचाय कां कप थां, पिता जी नें पहले पानीपी फिनगरम चाय कां कप पकड़ते हुए कुर्सी मे पसरगए,
“नहींबहु यहां बहोत काम हैं, औऱ इस देहात मे हि तोँ मेरा सबकुछ हैं इसे छोड़कर केसेजा सकताहु, यहांबसी यादे….”बस वोँ इतना हि बोलपाए
“तौ क्याँ हम् आपके अपने नहीं हैं “
पिता जी केँ होठो पऱ मुसकान आँ गई
“बेटा यह तुमसे किसने कह दिया कि तुम् मेरे अपने नहीं होँ, मगर अभि अभि तोँ तुम् दोनो हि विवाह हुई हैं, थोडा प्रिवेसी भि तौ चाहिए तुम् दोनो कों, औऱ यहां मेरी सेवा करने केँ लिए नॉकर भि तौ हैं “
नेहा केँ आंखों मे आंसू आँ गए थें
“क्याँ मेरे होतेहुए आपकी सेवा नॉकर किया करेंगे, ”वोँ सुबकते हुए बोलि, पिता जी खड़े होँ गए औऱ उसकेसर पर्र अपनाहाथ फेरने लगे, नेहा पिता जी केँ छातियों तक हि आँ रही थि,
“अरे बेटा दुःखी क्यो होँ रही होँ, मे आऊंगा नाँ तुमसे मिलने केँ लिए, मगर अभि नहीं अभि तुम् दोनोजाओ अपनी गृहस्थी सम्हालो “
पिता जी मेरीतरफ देखने लगे, अचानक उनके चहरे मे आयेभाव सें मेरा कलेजा कांप गय़ा, वोँ मुझसे कभी इतने प्रेम सें बात नहीं करते थें …
“विकास “
“जीजी पिता जी “मे हकलाया जिससे नेहा थोड़ी हँस पड़ी, जिससे मे औऱ भि नर्वस हौ गय़ा
“अगरबहु कों कोई भि शिकायत हुईँ तोँ ….”
“जीजी पिता जी, ”
नेहासर गड़ाकर हँसने लगीवही पिता जी नेहा कों देखकर मुस्कुराने लगे ……….conti.
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देहात सें शहरआकर मुझे बहोत हि हल्का महसूस हुआ, देहात मे पिता जी कि उपस्तिथि मे मुझे बंधाहुआ सां फील होता थां, मगर मेरे पत्नि केँ लिए चीजे बिल्कुल हि अलग थि, वोँ हमेशा हि देहात मे पली बढ़ी थि बड़े सें घऱ मे रहने कि आदत, खुलाहुआ आंगन, बड़े बड़ेखेत औऱ बगीचे औऱ शहर मे मेरा 2bhk कां घऱ, जितना बड़ा यहां पर्र गार्डन थां उतनी तोँ मेरेघऱ कि बाड़ी थि जंहा हम् सब्जियां बोया करते थें, उसे यहसभी कुछ अजीब सां लगरहा थां, मगर वोँ अपनी पूरी कोशिस कररही थि, मे एक् साफ्टवेयर} इंजीनियर थां औऱ मेरे आसपास केँ लोग भि ज्यादातर IT केँ लोग थें, उनकारहन सहनसभी नेहा सें अलग हि थां, वोँ साड़ी सें लिपटी हुईँ, हल्का घूंघट डालेजब मेरे फ्लेट सें निकलती थि तोँ लोगउसे अजीब नजरो सें देखते थें, ऐसा नहीं थां कि वोँ पढ़ी लिखी नहीं थि, उसने भि ग्रेजुएशन किया थां मगर माहौल कां फर्कउसे रास नहींआता थां, उसके बावजुद उसके मिलनसार स्वभाव औऱ देहात सें मिलाहुआ अपनत्व कि भावना सें उसने अपनेआस पास केँ लोगो कां दिल जितना शुरुआत कर दिया थां, मेरा शमशान सां घऱअब बगीचे कि तरह महकने लगा थां, लोग मुझे भाभीजी केँ पति केँ रूप मे जानने लगे थें, मेरेघऱ मे आसपास कि औरतेआने जानेलगी थि, औऱ यहसभी 1 हि महीने मे होना शुरुआत हौ गय़ा थां, नेहा कों लोग बहोत मनपसंद करते कारण थां कि वोँ खुलकर लोगो कि सहायता करती, मे एक् बुझाहुआ व्यक्ति थां वही नेहा एक् जिंदादिल औरत……
इधर हमारा शाररिक आकर्षण भि एक् दूसरे केँ लिए बढ़ने लगा थां, उसकी चंचलता, सादगी औऱ प्रेम नें मुझे उसका दीवाना बना दिया थां, मे उसका गुलाम हि होताजा रहा थां, उसकी हरअदा मुझे उसका दीवाना बना देती, मेरे साथी भि मेरी किश्मत पर्र रक्स करनेलगे थें, वोँ गदराए हुए शरीर कि मलिका थि, जिसे वोँ ज्यादातर अपनी साड़ी सें ढककर हि रखती, कालोनी कि दूसरी औरतों केँ कहने पऱ उसने अभि अभि सलवार पहनना भि शुरुआत कर दिया थां मगरकम हि, मैंने भि अपनीतरफ सें उसे खोलने कि बहोत कोशिस कि औऱ उसकेलिए नएनए डिजाइनर अंडरगारमेंट्स उसे लाकर दि, उसके पुराने अंडरगारमेंट्स कों फेकना पड़ातब जाकर वोँ नए पहनना शुरुआत कि, औऱ टाइम केँ संगसंग हि वोँ बैड पऱ भि खुलने लगी थि, जब वोँ बस अपने पेंटी औऱ ब्रा मे होती तोँ उसका जिस्म जानलेवा हौ जाता थां, दूध मे सिंदूर मिलेरंग सि उसकी त्वचा औऱ भराहुआ जिस्म मेरे पसीने हि छुड़ा देता, मगर उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका शर्माना थां, उसकी लज्जा सचमे जानलेवा थि, वोँ अपने पत्नि केँ धर्म कों बखूबी निभाती औऱ गरम होने पर्र पूरासंग देती थि…
उसके अंदर कां जानवर जब बाहर् आता तौ मेरेलिए भि उसे सम्हालना मुश्किल होँ जाता, वोँ ठहरी देहात कि तुस्त दुरुस्त गदराई लड़की, जिसका पूरा जिंदगी हि मेहनत केँ कामो मे निकला थां वही मे एक् मरियल सां सॉफ्टवेयर इंजीनियर, उसकी ताकत केँ सामने मे ज्यादातर हि फीकापड़ जाता थां, मगर देहात मे मिले उसके संस्कारो नें शाररिक सुख कों कभी भि हमारे बीच कां बहस बनने नहीं दिया, उसे जितना भि मे दे पाया मैंने दिया औऱ उसे जितना मिला वोँ उसमे हि बहोत खुस रही, कभी कभी मुझे इसका अफसोस भि होनेलगा थां, मे उसके सामने टिक हि नहींपता थां, मैंने कुछ तरीके खोजे जिससे मे उसे संतुस्ट कर पाउ, जैसे कि सेक्स सें पहले उसकी योनि कों खूब चाटना, उंगली करना, फोरप्ले मे ज़्यादा वक़्त देना औऱ जब वोँ झरने वाली हौ तब अपने लिंग कों उसके अंदर घुसना, वोँ इससे संतुस्ट हौ जाती थि, मगर एक् मर्द कि तरह मे उसे रगड़ नहींपता थां, सप्ताह दो सप्ताह मे उसे रगड़ने केँ लिएकुछ दवाईया लेता, जाहिर हैं कि मे दवाईरोज नहीं लेँ सकता थां क्योकि उनका साइड इफेक्ट नपुंसकता हि होता हैं, दवाइयों केँ असर मे मे मर्दबन जाता थां मगरफिन भि नार्मल सेक्स कां आनंद दवाई वाले सेक्स मे नहीं होता, फिन भि हम् दोनोखुस थें एक् दूसरे कि बहोत इज्जत औऱ प्रेम करते थें, एक् दूसरे कां ख्याल रखते थें, कुल मिलाकर एक् परफेक्ट कपल कि तरह समाजहमे देखने लगा थां …….
वोँ पिता जी कों बहोत याद करती करीबरोज हि उनसेबात करती थि, मे इससेदूर हि रहता थां, अब शहरआये हमे 3 महीने हौ चुके थें, आखिर पापा कों भि अपनीबहु सें दूरी बर्दास्त नहीं हुइ औऱ खेती कां काम निपटते हि उन्होंने कुछ दिनों केँ लिएशहर आने कां मन बनाया …….
नेहा नें यहखबर मुझे सुनाई, मे नाँ हि ज़्यादा खुस थां नां हि दुखी, ऐसे भि मे सुभह सें काम पर्र निकल जाता औऱ साम कों आता थां, अब मे थोड़े औऱ देर सें कामकर पाऊंगा क्योकि अब मुझेघऱ आने कि कोई जल्द नहीं होगी, मे मन मे हि सोचकर हँस पड़ा ….
सफेद शर्ट औऱ नीला जीन्स, रौबदार मूंछे, सफेद पड़ने कों हुएबाल, सलीके सें पहनेगए काले जूते, जौ दर्पण कि माफिक चमकरहे थें, चौड़ी छाती जिसका पता शर्ट केँ ऊपर सें भि लगाया जा सकता थां, आंखों मे काला रेबेन कां चश्मा, हाथो मे टाइटन कि महंगी घड़ी, वोँ किसी बड़े अधिकारी कि तरह रौबदार लगरहे थें, जब वोँ ट्रेन सें उतारे तौ मे औऱ नेहामुह फाडे उन्हें देखने लगे, पिता जी कों हमनेऐसे वेशभूषा मे कभी नहीं देखा थां, मगर मुझेयाद आया कि वोँ जब फ़ौज मे थें औऱ मम्मी जिंदा थि तौ वोँ मम्मी कों पूरादेश घुमा चुके थें, वोँ देहात मे आने केँ बाद सें देहात कि वेशभूषा अपना चुके थें,
“ऐसे क्याँ देखरहे हौ, जैसादेश वैसाभेष “उन्होंने अपना लगेज मुझे थामते हुएकहा, हम् दोनो हि उनके पैरो मे झुकगए.उन्होंने नेहा केँ सर पर्र हाथ फेरा जोँ कि बहोत हि खुसदिख रही थि,
“कैसी हौ बेटी तुम्हे देखे जैसे सादिया बीत गई “
“अच्छी हु बाबूजी आप् तोँ बहोत हि हेंडसम लगरहे हैं “वोँ चहकी, पीली साड़ी मे गहनों सें ढकी हुईँ औऱ घूंघट कियेहुए उसका चहरा कुंदन कि तरह दमकने लगा थां…
बाबूजी उसके मुस्कुराते हुए खिले चहरे कों देखकर औऱ भि खुस होँ गए औऱ उन्होंने प्रेम सें उसके गालो पर्र हाथफेर दिया, मे समझ सकता थां कि वोँ नेहा कों बहोत हि प्रेम करते हैं,
“मे समानकार मे रखताहु “
हमने एक् ओला किराए पर्र लिया थां,
“तूँ स्वयं कि कार क्यो नहीं लेँ लेता “
बाबूजी औऱ नेहा पीछे कि सीट पऱ बैठे थें वही मे सामने ड्राइवर केँ संग,
“बाबूजी जरूरत नहीं हैं “
मे थोडा डरतेहुए कहा
“अरे ऐसे केसे तुँ हमेशा सें नालायक हैं, बहु मे तुम्हारे लिए वाहन लूंगा औऱ जब तक मे यहांहु तुम्हे चलना भि सीखा दूंगा “
मे उनकीबात काटने कि हिमाकत केसेकर सकता थां,
“सच्ची बाबुजी “
नेहाफिन सें चहकी, ऐसा लगरहा थां जैसे किसी बच्ची कों उसके बाप नें चॉकलेट दे दि होँ,
“हाँ बिल्कुल अभि तौ मैंने फसल बेची हैं, बहोत रुपया हैं मेरेपास बैंक मे, औऱ मेरी बच्ची यहां किराए कि कार मे घूमरही हैं “
हे ईश्वर काशकभी बाबुजी नें मेरेऊपर इतना प्रेम दिखाया होता,
“बिकास अभि चलो, हम् कार लेकर हि घऱ जाएंगे”
मे हड़बड़ाया
“बाबुजी अभि “
“क्यो सुनाई नहीं देता क्याँ “
“जीजी “मैंने ड्राइवर कों इशारा किया जौ कि हमारी बात सुनकर मुस्कुरा रहा थां, उसने वाहन मारुति केँ शोरूम मे लें जाकररोक दि औऱ बाबुजी नें जल्दी एक् Swift Dzire खरीदकर नेहा कों तोहफा कर दि, मेरा पिताजी हैं तोँ दिलदार व्यक्ति, पहलीबार मुझे उनके फैसले सें बहोत खुसी हुई क्योकि व्हीकल तोँ मेरे नीचे हि आनी थि, अभि तौ मे उसे चलतेहुए घऱ भि लें आयाअब कल सें शुरुआत होनी थि नेहा कि ट्रेनिंग ….continue.
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पिता जी केँ आने केँ बादघऱ कां माहौल हि बदल गय़ा थां, नेहा ऐसेखुस थि जैसेकोई मिल कां चमत्कार आँ गय़ा हौ, वोँ दिनभर हि उससे चिपकी रही, यहां आने केँ बाद औऱ मेरे औऱ उसके सहेलियों केँ कहने केँ बाद सें हि उसने साड़ी पहनना बंदकर दिया थां मगरआज वोँ फिन सें अपनी सहेजी हुई साड़ियां निकाल कररख ली, वोँ फिनउसी भेष मे घूमने लगी जोँ वोँ विवाह केँ बाद घुमा करती थि, वही हाथो मे भरी चूड़ियां, मांग मे गढ़ा सिंदूर आदिआदि ….
रात पिता जी केँ पास बैठकर वोँ देहात केँ बारे मे सभी पूछने लगी जैसे कि सालो होँ गए होँ उसे देहात छोड़े, पता नहीं पिता जी कों भि क्याँ होँ गय़ा थां कि वोँ उससे इतने प्रेम सें बर्ताव करते, मुझसे तोँ कभी सीधेमुह बात तक उन्होंने नहीं कि थि, रात बीती औऱ पिता जी केँ कारण मे सेक्स सें वछितरह गय़ा, नेहा नें मुझेबस इतना हि कहा कि जब तक पिता जी हैं कोई सेक्स नहीं छोटा सां घऱ हैं अगर उन्हें पताचल गय़ा तोँ,.
मे तोँ कंडोम कां फैमली पैक लेकररखे हुए थां, अभि उनमे 20-25 कॉन्डोम पड़े हि थें, सोचा थां कि 15-20 दिन मे समाप्त होँ जाएगा मगरअब लगा कि यह महीना तोँ गय़ा, सुभह मे जल्द सें रेडी होँ कर दफ़्तर गय़ा औऱ देर सें वापसआया, मेराबॉस तौ इसबात कों लेकर बहोत हि खुसहुआ मगर मे थककरचूर हौ चुका थां, दरवाजा नेहा नें खोला औऱ उसेदेख कर मेरामन हि ठनक गय़ा, वोँ सलवार मे थि, हाथो मे वैसे हि चूड़ियां औऱ मांग मे वैसा हि सिंदूर मगर साड़ी केँ स्थान सलवार.मेरीनजर कि तकलीफ़ समझकर वोँ बोल पड़ी.
“पिता जी नें कहा पहनने कों “मेरी आंखे औऱ चौड़ी होती उससे पहले हि पिता जी कि दमदार आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी
“बहु कों शहर लें आयामगर रखना देहात कि तरह हि चाहता हैं, इतनापढा लिखा हैं औऱ अपनी पत्नि कों थोड़ी भि छूट नहीं देता, यह तेरी पत्नि हैं कोई गुलाम नहीं, अब बहु वोँ सभीकुछ पहनेगी जोँ शहर कि लडकिया पहनती हैं समझा …”
वोँ डांटने केँ अंदाज मे बोले
“मगर पापा मे तोँ “
“चुपरहो, इतना पढ़ाया लिखाया मगर अभि भि दिमाग़ तेरा गवार कां हि हैं “
नेहा उनकीबात सुनकर हल्के हल्के हँसने लगी, मे गुस्से सें उसे देखा वोँ मुझेआंख मारकर अंदरचली गई …
रात मे उसका प्रतीक्षा करतारहा, 12 बजे वोँ कमरे मे आयी औऱ मेरे बाजू मे आकरलेट गई
“अच्छा डांट खिला दिया तुमने “वोँ जोरो सें हँसी, औऱ मेरे सीने सें जालगी
“आज पिता जी मुझे वाहन सीखने लेँ गए थें, तौ उन्होंने कहा कि जैसादेश वैसाभेष अबऐसे कपड़े मत पहनाकर औऱ मुझे सलवार खरीदने कि बात करने लगे, मैंने कहा कि मेरेपास तोँ बहोत सें कपड़े हैं तौ वोँ यहांआकर मेरी अलमारी देखने लगे, ”नेहा कां चहरालाल होँ गय़ा थां, मुझेसमझ नहींआया क्यो
“तोँ क्याँ हुआ तुम् ऐसे क्यो शरमारही होँ, ”
“ओहो आपनेकभी मेरी अलमारी देखी हैं क्याँ ?”वोँ थोड़े गुस्से मे बोलीं, मैंने नाँ मे सर हिलाया
“जा केँ देखो “
मे झट सें उठाकर उसकी अलमारी खोली, ओ माईगॉड.इतने दिनों मे मैंने उसे बहोत सि सेक्सी पेंटी औऱ ब्रा तोहफा कि थि, इंटरनेट सें एक् सें बढ़कर एक् बेबीडॉल मांगवाए थें, जिसमे सें कई कों तोँ पहनी भि नहीं थि, वोँ सब वँहा खुले पड़े थें, बाकी केँ कपड़े तह कियेहुए रखे थें, उसमे उसके सेक्सी नाइट गाउन्स भि थें.मुझे पिता जी पर्र क्रोध भि आया कि कोईऐसे केसे किसी कि पर्शनल चीजो कों देख सकता हैं …
मे वापसआया तोँ नेहा मुस्कुरा रही थि
“जब उन्होंने सभी देखा हि थां तोँ मुझे क्यो डांटा “
वोँ फिन सें मुस्कुराई
“क्योकि जब उन्होंने यहसभी देखा तोँ मे बहोत हि घबरा गई थि, औऱ जब उन्होंने आश्चर्य सें पूछा कि यहसभी तुम्हारा हैं औऱ तूम इसे पहनती होँ तौ मे डरकरबोल दि कि नहींयह सभी हमसे पहले यहां रहने वाली लड़कियों कां हैं, आपकोयह सभी मनपसंद नहीं तौ मे इसे नहीं पहनती, औऱ वोँ यानी कि आप् इसे फेंकने कि सोचरहे हैं, वोँ गुस्से मे बोले कि आनेदो उसे तुम्हे क्याँ गुलाम समझता हैं कि जोँ वोँ बोलेगा वही तुम् पहनोगी, उन्होंने कहा तूम इसे पहनाकरो औऱ तुम्हारी मर्जी हौ तोँ औऱ कपड़े ला दूंगा यह दुसरो केँ कपड़े क्यो पहनोगी, अब आप् हि बताओ मे क्याँ कह सकती थि “
उसकी मासूम सें जवाब नें मुझेचुप करा दिया थां
“मगरयह क्याँ बात हुई वोँ केसे तुम्हारे पर्सनल चीजो कों देख सकते हैं “मे हल्के सें भुनभुनाया, वोँ हँसी
“अच्छा तौ कलबता दूंगी क्याँ उन्हें कि आप् ऐसाबोल रहे थें “मे बुरीतरह सें हड़बड़ाया
“पागल हौ क्याँ”वोँ खिलखिलाकर हँस पड़ी
“अच्छा तोँ आज व्हीकल सीखने गए थें क्याँ हुआआज “वोँ एक् अजीबनजर सें मुझे देखने लगी
“अरे क्याँ हुआ ???”
“कुछ नहीं बाबुजी नें मुझे थोडा सां सिखाया औऱ स्वयं भि चलाकर दिखाया, वोँ बोलरहे थें कि कुछ हि दिन मे मे अच्छे सें सिख जाऊंगी “
नेहा नें कभी मुझसे झूट नहींकहा थां मगरआज जब वोँ बोलरही थि उसकीनजर नीचे थि, मे समझ नहीं पाया कि वोँ मुझसे क्याँ छुपारही हैं, मगरकुछ तोँ थां खैर जोँ भि हौ बाबुजी उसकेसंग थें तौ मुझे डरने कि क्याँ जरूरत थि, मे उसकेपास आनेलगा मगर वोँ मुझे झटके सें दूरकर दि
“बाबुजी हैं “उसनेमझे समझने वाले अंदाज मे कहा औऱ मे मन मसोजकर हि रह गय़ा। continue.
मासूम बहु Incest(sasur-bahu) - Hindi Sex Story - Next part miss mat karna
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