Adultery नेहा बह के कारनामे - Desi sex story – New Episode
अब नेहा कों लेकर प्रवींद्र केँ फैंटेसी बढ़ती जारही थि। वोँ नेहा कों किसी सें भि कुछ भि करते देख्ना चाहता थां। औऱ प्रवींद्र उस टाइम जानबूझकर लाउंज सें निकल गय़ा, अपने पिता कों आसानी सें नेहा केँ संग एंजाय करने केँ लिए। अब प्रवींद्र कि समझ मे नहि आँ रहा थां कि कहां सें उन दोनों कों देखे?
उसने सोचा एक् हि तरीका हैं उनको देखने कों, वोँ थां बाहर् सें। वोँ बाहर् गय़ा लाउंज मे झाँकने केँ लिएमगर परदा खींचा हआ थां तौ कुछ भि नजर नहि आँ रहा थां, तौ वोँ फिन सें अंदर आँ गय़ा, मगरउस सोफे पर्र नहि बैठा, किसी दूसरी स्थान बैठा जौ खिड़की केँ पास थि, फिन उसने धीरे-धीरे सें पर्दे कों जरा सां खींचा बस एक् पतली सि झिरी बनाने केँ लिए ताकी उसको बाहर् सें अंदरदिख सके।
फिन उसनेकहा कि अब वोँ सोनेजा रहा हैं। तब प्रवींद्र बाहर् गय़ा औऱ उस झिरी सें लाउंज केँ अंदर देख्ना शुरुआत किया। अब वोँ अपने पिता कों अपनी भाभी केँ संग एंजाय करतेहुए बहोत अच्छी तरह सें देख सकता थां, जौ
छोटी सि स्थान बनाया थां खिड़की केँ पर्दे कों हटाकर बिल्कुल ठीक थां उन दोनों कों देखने केँ लिए।
औऱ लाउंज मे जब पिता नें सुना कि प्रवींद्र सोनेचला तौ वोँ अपना मुँह नेहा कि ड्रेस केँ अंदरडाल चुका थां, उसके जांघों कों चाटने केँ लिए। नेहा कि नर्म, रसीले जांघे जिसकी हल्की गर्मी सें ससुरजी कों गाल सें दबाते हुए बहोत आनंद आँ रहा थां। यही दिखा प्रवींद्र कों बाहर् सें जब वोँ वहा पहुंचा तौ। उसके पिता कां सर नहि दिखरहा थां उसे, क्योंकी सर नेहा केँ गोद मे उसके ड्रेस केँ नीचे थां।
यह देखकर प्रवींद्र कां लण्ड बिल्कुल खड़ा हौ गय़ा औऱ उसने अपनेहाथ कों अपने लण्ड पर्र रखा अंदर कां खेल देखते हुए। प्रवींद्र केँ पिता नें नेहा कि दोनों टाँगों केँ थोडा फैलाया औऱ उसकी बुर कों, पैंटी केँ ऊपर सें हि होंठों मे दबाते हुए चूमने लगा। तब तक गर्म स्पॉट पर्र नेहा कि पैंटी पऱ एक् भीगाहुआ धब्बा आँ गय़ा थां। फिन
ससुरजी नें अपनीबहू कि बुर कों चूमते हुए, पैंटी कों आरामसे नीचे करना शुरुआत किया। घुटनों तक पैंटी कों खींच दिया थां।
तौ नेहा बोलीं- “यहीं तक रहनेदो पापा कहीं प्रवींद्र वापस नाँ आँ जाये। अगर आएगा तौ मे जल्द सें ऊपर खींच पाऊँगी पैंटी कों."
तौ पैंटी कों वहीं घुटनों तक छोड़ा औऱ चाटते हुए ससुरजी उसकी बुर कां रस पीनेलगा। नेहा केँ हाथ मे ससुरजी कां मोटा लण्ड थां जिस पर्र वोँ हाथचला रही थि बिल्कुल जैसेमूठ मारते समय चलाते हें। नेहा अनुभवी हौ गई थि, उसको मर्दो कों खुश करना आँ गय़ा थां इतने दिनों मे, 5 महीनों मे।
ससुरजी जितना उसकी बुर केँ संवेदनशील हिस्सों कों जीभलगा रहा थां उतना हि जोरों सें नेहा लण्ड रगड़रही थि अपनेहाथ मे। येसभी देखकर प्रवींद्र कों भि मूठ मारने कां मनकररहा थां, उसका जमके बिल्कुल खड़ा थां। नेहा नें झुककर ससुरजी केँ गले कों चाटा औऱ दाँत काटा। नेहा केँ वैसा करने सें ससुरजी कि उत्तेजना दोगुना हौ गई। फिन एक् लम्हा बाद ससुरजी नें नेहा कों अपनीगोद मे बिठाया, औऱ अपने लण्ड कों उसकी बुर मे डाला। आखिरकार, पैंटी निकाल दि गई औऱ नेहा कों लण्ड केँ ऊपरउठक बैठक करना पड़ा, जौ बुर केँ अंदर थां। ससुरजी नें नेहा कि कमर कों पकड़ा औऱ उसकी चूचियों कों चूसने केँ लिए उसकी चूचियों पऱ अपना मुँह डाला, जौ ब्रा मे नहि थें, बस वैसे लटकेहुए थें ड्रेस केँ अंदर।
ससुरजी नेहा कि चूचियों कों चाटता चूसता गय़ा, उसका लण्ड नेहा कि बुर केँ अंदर थां, नेहा ऊपर-नीचे उछालरही थि औऱ ससुरजी उसकी चूचियों कों चूसेजा रहा थां। फिन ससुरजी भि अपने पंजे पऱ जोर देतेहुए कमर कों थोडा उठाकार धक्का देनेलगा। नेहा केँ ऊपर-नीचे होने केँ संग-संग उसके धक्के, नेहा केँ उठक बैठक, लण्ड कों रफ़्तार सें अंदर-बाहर् किएजा रहे थें। जिससे नेहा हाँफने लगी थि औऱ उसकी सिसकारियां लाउंज मे गूंजने लगी
थीं। नेहा कों बाहों मे जाने कि जरूरत महसूस हुई तोँ उसनेझट सें अपनी दोनों बाहों कों ससुरजी केँ कंधों पर्र लपेटा औऱ ससुरजी केँ मुँह कों अपने मुँह मे लेकर उसको जबरदस्त गरमा गर्मकिस करनेलगी, बुर मे लण्ड कों बराबर अंदर-बाहर् लेतेहुए। नीचे बुर औऱ लण्ड केँ रसबहरहे थें औऱ ऊपर दोनों एक् दूसरे केँ मुँह केँ रसपीरहे थें।
बाहर् प्रवींद्र सें यहसभी देखकर रहा नहि गय़ा, वोँ भि मूठ मारने लगा, नेहा कों अपने बाप सें चुदवाते हुए देखकर। नेहा अपने ससुरजी पऱ औऱ जोरों सें उछलती गई, लण्ड कों अपने अंदर महसूस करतेहुए औऱ आह
औऱ हाँफने सें उसके साँसें भि फूलने लगीं, दिल कि धड़कनें बढ़ने लगी औऱ जिश्म पशीना-पशीना होँ गय़ा थां दोनों केँ।
फिन होना क्याँ थां नेहा चिल्लाई- “हाँ पताजी इस्स्स्स। हाँ पिताजीईई, बहोत अच्छा लगरहा हैं। आआहह। इस्स्स्स.” औऱ अचानक हाँफते हुए नेहा शांत हौ गई अपनेगाल कों ससुरजी कि छाती सें लगाएहुए, ससुरजी कि दिल कि धड़कनों कों सुनती गई।
नीचे उसकी बुर नें पूरा पानी छोड़ दिया थां संग-संग ससुरजी कां वीर्य भि संगमिल चुका थां नेहा केँ पानी सें। ससुरजी नें जोर सें नेहा कों बाहों मे जकड़कर- “आआघग। उफफ्फ़.' किया, जब उसके लण्ड वीर्य छोड़ते हुए बुर सें बाहर् नेहा कि गाण्ड केँ छेद पर्र रगड़रहा थां। फिन जल्द सें ससुरजी नें लण्ड कों नेहा केँ हाथ मे थमाया, बाकी केँ वीर्य केँ कतरों कों नेहा सें निकलवाने केँ लिए।
नेहा मुश्कुरा रही थि अपने ससुरजी केँ लण्ड सें बाकी केँ पानी निचिड़ते हुए। एक्-एक् कतरा निकला तौ नेहा नें स्वयं-बा-स्वयं अपनीजीभ कों लण्ड केँ छेद पऱ हल्के सें फेरा औऱ नजरों कों ऊपर उठाकर मुश्कुराते हुए ससुरजी केँ चेहरे मे देखा, औऱ एक् लंबी सांस लेतेहुए कहा-“लो अब मुरझाने लगा आपका जबरदस्त औजार पापा। हीहीहीही."
ससुरजी नें कहा-“इसी लण्ड सें तुम् भि पैदा हुईँ होँ बहू."
नेहा नें होंठ कों दाँत मे दबाते हुएकहा- “हाँ पापा, सही हैं। पर्र आपने मुझे मेरे पिताजी कि याद दिला दिया.”
जब नेहा नें येकहा तोँ ससुरजी नें चिहुँकते हुएकहा- “क्याँ मेरे लण्ड नें तुमको अपने पिता कि याद दिला दि?
क्याँ तुमने कभीउनक। लण्ड देखा हैं?"
नेहा नें मुश्कुराते हए जवाब दिया-“अरे नहि पापा, मेरा मतलब वोँ नहि थां, मतलबये कि जब आपनेकहा कि इसी सें मे भि पैदा हुइ हूं, तौ मैंने सोचा कि मेरे पिता नें भि इसी सें मेरी मम्मी केँ संग करके मुझको पैदा किया हैं। अजीबबात हैं नां पापा कि जिसचीज नें हमको पैदा कियाआज बड़े होकर हम् उसीचीज कों इतना पसन्द करते हें? नाता हि ऐसा हैं इसचीज सें हमारा हैं, नाँ पापा?"
ससुरजी मुश्कुराया औऱ नेहा कों वापस उसकी पैंटी पहनाते हुएकहा- “सो तौ हैं, अब मे भि ऐसे हि एक् बुर सें निकला हूं नाँ। औऱ इसी कों पसन्द करता हूं। बिल्कुल सहीकह रही होँ बेटी, अजीबबात हैं हमारा नाता हि बनाहुआ हैं इन चीज़ों सें। एक् मग्नेटिक अट्रॅक्सन जैसा हैं इनकेबीच बहू.”
बाहर् सें प्रवींद्र भि उनकी सारे बातें सुनरहा थां। प्रवींद्र कों यकीन नहि आया जौ नेहा नें कहा अपने पापा केँ बारे मे। कुछ तोँ बात होगी नेहा कि अपने स्वयं केँ पापा केँ संग जौ उसकीयाद आँ गई ससुरजी कां लण्डहाथ मे थामेहुए? प्रवींद्र सोच मे डूब गय़ा- “दाल मे कुछ तौ काला जरूर हैं?” प्रवींद्र नें सोचा।
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कड़ी_12
एक् घंटे केँ बादसभी काम हौ गय़ा, प्रवींद्र सभीकुछ देखने केँ बाद अपने कमरे मे चला गय़ा औऱ नेहा भि ससुरजी कों छोड़कर चली गई, क्योंकी उसने तोँ अपनाकाम पूराकर लिया थां। प्रवींद्र अपने कमरे मे बेड पऱ लेटेसोच रहा थां कि उसके पिता नें नेहा सें कर लिया तोँ मतलब कि आजरात कों नेहा उसके कमरे मे नहि जाएगी। तौ प्रवींद्र नें सोचा केँ क्यूं नां आज अपनी भाभी कों अपने कमरे मे लेकरआए?
उसने अपने पिता केँ सोने कां इंतेजार किया। फिन औऱ एक् घंटे केँ बाद पूरेघऱ मे बिल्कुल अंधेरा हौ गय़ा थां। एक् भि बत्ती किसी भि कमरे मे नहि जलरही थि। सभीसो रहे थें। अपने कमरे केँ दरवाजे केँ पास खड़े होकर प्रवींद्र सुनने कि कोशिश कररहा थां कि बाहर् कारिडोर मे कोई आवाज़ तोँ नहि सुनाई देरही हैं, (इसे पोस्ट पर्र 271 पेज 28 पर्र चेक करें स्केच मे) तौ कुछ नहि सुनाई दिया तोँ प्रवींद्र कारिडोर मे निकला औऱ अंधेरे मे दीवार कों टटोलते हुए चलकर पहले अपने पिता केँ कमरे केँ पास गय़ा। वोँ जानना चाहता थां कि कहीं नेहा दोबारा उसकेपास तौ नहि चली गई।
अपने पिता केँ रूम केँ दरवाजे पऱ कान लगाकर सुना, औऱ अपने पिता केँ खर्राटे सुनकर उसकोपता चल गय़ा कि नेहा अपने कमरे मे हैं। वोँ चलकर वापस अपनी भाभी केँ कमरे कि तरफ गय़ा। प्रवींद्र नंगे पाँवचल रहा थां ताकीकोई आवाज़ नहि आए। पहले नेहा केँ कमरे केँ दरवाजे सें कान लगाकर सुनता हैं कि अंदर सें कोई आवाज़ तोँ नहि सुनाई देरही? फिन बहोत सावधानी सें दरवाजे केँ हैंडल कों धीरे-धीरे सें खोलने कि कोशिश किया औऱ दरवाजा लाक नहि थां तोँ आसानी सें खुल गय़ा।
वोँ बहोत खुशहुआ। अंदर झाँका औऱ धीरे-धीरे सें अंदर घुसा। उसकादिल बड़े जोरों सें धक-धककिए जारहा थां, थूक भि नहि थां मुँह मे सूखेगले कों भीगोने केँ लिए, गला सूखा पड़ा थां, थोडा बहोत काँप भि रहा थां, बिल्कुल एक् चोरलग रहा थां, अपने हि घऱ मे उस वक्त जैसे किसी औऱ केँ घऱ मे घुसा हौ, जबसभी सोरहे हें। थोडा डरतेहए वोँ नेहा केँ बैड कि तरफ बढ़ा। उसका बड़ा भइया रवींद्र तौ खर्राटे माररहा थां, बेड केँ इसतरफ रवींद्र हि सोया थां औऱ उसतरफ नेहा थि तौ प्रवींद्र कों औऱ चलना पड़ाबेड केँ उसतरफ जाने केँ लिए, उसकेपेर काँपने लगे।
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लगता थां दिल धड़कना बंद हौ जाएगा, साँसें तेज हौ गई थि औऱ उसको दरवाजे सें नेहा तक पहुँचने मे मीलों
कां सफरतय करना जैसेलग रहा थां। वोँ दोकदम चलकर नीचेबैठ गय़ा। लगता थां नेहा कों भि नींदलग गई थि। वोँ स्वयं अपनेदिल कि धड़कनों कों सुनपा रहा थां। वोँ जीवन मे कभी भि ऐसे हालात सें नहि गुजरा थां। सोचरहा थां कि रवींद्र कों उसकीतेज साँसों याँ दिल कि धड़कन नें जगा तोँ नहि देगी। उसके दोनों कानों मे 'फक-फक' केँ आवाजें आँ रहेथीं।
खैर, केसे भि करके हिम्मत जुटाया उसने औऱ नेहा तक पहुंचा औऱ उसकेऊपर सें चादर कों सरकाया, जोँ नेहाओढ़ चुकी थि। उसकी नेहा भाभी नाइट लैंप कि धीमी रोशनी मे परी जैसीदिख रही थि औऱ नींद मे तौ औऱ भि बहोत ज़्यादा सुंदर लगरही थि, बाहों मे कसके भरने कों मनकररहा थां उसे। मगर उसकी हालत बहोत खराब थि उससमय। नेहा कि हुस्न कों वहीं खड़े निहारने लगा वोँ। नेहा बेहद सेक्सी दिखरही थि सोतेहुए, उसकी चूचियां ऊपर-नीचे उठबैठ रहीथीं उसके साँस लेने सें, गहरी नींद मे थि वोँ। प्रवींद्र देखता गय़ा नेहा कों।
फिन धीरे-धीरे सें उसके एक् मम्मों कों छुआ उसने, बिना ब्रा केँ नाइटी मे थीं उसकी चूचियां औऱ नींद मे नाइटी कि एक् स्ट्रैप कंधे सें नीचे बाजू पऱ सरक गई थि। प्रवींद्र नें हल्के सें नाइटी कों मम्मों सें हटाया तौ नेहा कि पूरी गोल-गोल मम्मों सामने आँ गई जिसको प्रवींद्र निहारने लगा, औऱ हिम्मत करके उसने मम्मों कों हल्के सें होंठ लगाकर चूम भि लिया। डर रहा थां नेहा कों जगाने मे। उसने सोचा उसको डिस्टर्ब नां करें, सोनेदें औऱ वापसलौट चलें।
अब प्रवींद्र इतनाडरा हआ भि थां कि उसने खयाल किया कि नेहा कों वैसे देखने केँ बाद भि उसका लण्ड खड़ा नहि हुआ थां। वोँ हैरान होँ गय़ा औऱ सोचने लगा कि ये क्याँ बात हुइ? ऐसा तौ नहि होताकभी? इसलिये उसने नेहा कि दूसरी मम्मों कों भि नाइटी सें आजाद किया, नेहापीठ पर्र लेटी हुईँ थि जिससे दोनों चूचियां मस्तऊपर छत कि तरफ खड़ीनजर आँ रहीथीं औऱ निपल भि कड़क मजबूती खड़े थें। प्रवींद्र नें सभी देखा औऱ अपने लण्ड पर्र हाथ लगया तौ पाया कि लण्ड भि सोरहा हैं, मगर क्यूं?
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उसकोडर होनेलगा अब। तकलीफ़ मे उसने नेहा कि मम्मों कों छुआ, सहलाया औऱ दबाया जिससे नेहा चिहुँक करउठ बैठी, अपनी नाइटी कों मम्मों केँ ऊपर करतेहुए। नेहा बहोत हैरान होँ गई जब प्रवींद्र कों देखा, फिन अपने
कमरे केँ दरवाजे कि तरफ देखा, रवींद्र कों देखाफिन धीरे-धीरे सें प्रवींद्र सें कहा-“जाओ वापसजाओ, पागल हौ क्याँ तुम्? जाओयहा सें."
पऱ प्रवींद्र जैसे बौखलाया हुआ खड़ा थां। स्वयं अपने छाती पऱ अपनाहाथ रखा औऱ कहा- “भाभी एक् प्राब्लम हैं प्लीज चलो, बताता हूं."
नेहा नें कहा- “नहि, अभि नहि। तुम् जाओयहा सें वरना तुमको कभी अपनेपास नहि आने दूंगी समझे तुम्."
प्रवींद्र अब नेहा केँ लिये नहि अपने लण्ड कों लेकर परेशान थां। उसने धीरे-धीरे सें नेहा केँ कान मे कहा- “भाभी, मे तुमको, तुम्हारी चूचियों कों बहोत देर सें नंगादेख रहा हूं पऱ मेरा खड़ा नहि हौ रहा हैं, मुझे बहोत फिकर होनेलगी, डरलगरहा हैं." औऱ नेहा कां हाथ पकड़कर अपने सीने सें लगाया औऱ कहा- “देखो मेरेदिल कि धड़कनों कों महसूस करो, ऐसा होता हैं क्याँ? मे बहत चिंतित हँ भाभी, ऐसा क्यूं हौ रहा हैं?"
नेहा नें जब उसकेदिल कि धड़कनों कों इतने जोरों सें धड़कना महसूस किया तोँ उसको भि अजीबलगा औऱ हैरान प्रवींद्र केँ चेहरे मे देखते हुएकहा- “क्याँ हुआ? तुमने कोई बुरा सपना देखा क्याँ?” ये कहकर नेहाबेड सें उठकररूम कि लाइट कों ओन किया औऱ प्रवींद्र केँ चेहरे मे देखने लगी। वोँ बहोत डराहुआ दिखरहा थां, तोँ नेहा कों बहोत हैरानी हुइ औऱ ऊसने पूछा-“हुआ क्याँ? कहां थें तुम्? सोरहे थें नाँ? कहींगये थें क्याँ तुम्? भूत-व्रत तोँ नहि देखा नां?"
प्रवींद्र नें जोर सें नेहा कों बाहों मे जकड़ते हुए टूटी हुई आवाज़ मे कहा- “भाभीचलो नां मेरेसंग, इसका इलाज तोँ करो नां कि मुझे क्याँ हौ रहा हैं समझ मे नहि आता मुझे."
नेहा मुड़कर रवींद्र कों सोतेहुए देखती हैं औऱ मुश्कुराकर प्रवींद्र केँ होंठों पऱ अपनेहाथ रखकर'ओहह' कहती हैं,
औऱ धीरे-धीरे सें फुसफुसाते हुए प्रवींद्र सें कहा- “अच्छा तुम् चलो, मे पीछेआती हूं."
प्रवींद्र कि जान मे जानआई औऱ वोँ अपने कमरे मे गय़ा औऱ नेहा कां इंतेजार करनेलगा। नेहा पहले टायलेट गई औऱ टायलेट सें सीधे प्रवींद्र केँ कमरे मे गई। प्रवींद्र मात्र एक् अंडरवेर मे बेड पर्र लेटा इंतेजार कररहा थां। नेहा नें उसकीतरफ बढ़ते हुएकहा- “तुम् बहोत बुरे होँ, मे इतनी अच्छी नींद मे सोई हुई थि, केवलये सभी करने केँ लिए मुझको जगाया। कल कां इंतेजार नहि कर सकते थें तुम्? बहोत बदमाश होँ गए हौ तुम् आजकल."
प्रवींद्र नें कहा- “नहि भाभी, तुम् समझ नहि रही होँ, देखोअब भि खड़ा नहि हुआ हैं ये, तुम्हारे इस कमरे मे घुसते हि इसको चट्टान कि तरह खड़ा होँ जानां चाहिए थां। मेरीसमझ मे नहि आता, कोई प्राब्लम हैं, क्याँ होँ रहा हैं?"
नेहा मुश्कुराई औऱ कहा- “अच्छा येबात हैं, अभि देखती हूं केसे खड़ा नहि होताये पप्पू तेरा."
तब प्रवींद्र बोला- “नहि भाभी आपके बिनाछुए इसको खड़ा होना चाहिए थां। आप् एक् काम कीजिए आप् यहालेट जाइए मे आपकेपास खड़े होकरकुछ देर देख्ना चाहता हूं कि ये खड़ा होता हैं याँ नहि? अगरतब भि नहि हुआतब आप् इसको खड़ा करना."
तोँ नेहा हँसते हुए प्रवींद्र केँ बेड पऱ लेट जाती हैं। प्रवींद्र उसके पैरों कि तरफ जाता हैं औऱ अपनी भाभी सें कहता हैं- “भाभी अपने एक् पांव कों जराऊपर उठाओ नां प्लीज.”
जिस स्थान प्रवींद्र खड़ा थां, बेड केँ नीचे कि तरफ यानी नेहा केँ पाँव कि तरफ, वहा सें नेहा पांव उठती तौ उसकी जांघों केँ बीच उसकी पैंटी नजरआती।
तोँ नेहा मुश्कुराते हुए बोलती हैं- “क्यूं टांग क्यूं उठाऊँ? ऐसेकुछ नहि दिखता क्याँ तुमको? मेरी नाइटी इतनी छोटी हैं, जांघों केँ ऊपर हैं, इतनी पतली हैं कि मेरी चूचियां औऱ पैंटी दिखरही हैं, तोँ औऱ क्याँ चाहिए तेरी? हम्म्म."
प्रवींद्र अपने अंडरवेर केँ ऊपरहाथ फेरते हुए कहता हैं- “बात कों समझो नाँ भाभी, उठाओ नां अपनी एक् टांग
कों प्लीज."
नेहाछत कों ऊपर देखते हुए एक् टांग कों ऊपर उठती हैं जिससे उसकी दोनों जांघों केँ बीच वाले नर्म, नाजुक, रसीले हिस्से नजरआते हें, औऱ प्रवींद्र घुटनों केँ बल नीचे बैठता हैं औऱ एक् हाथ नेहा कि जाँघ पऱ फेरता हैं
औऱ अंडरवेर कों निकलकर एक् हाथ अपने लण्ड पर्र लें जाता हैं। ज्यों-ज्यों वोँ नेहा कि जांघों कों ऊपर सहलाता जाता थां वैसे-वैसे उसका लण्ड आरामसे ऊपरउठ रहा थां। जब उसकाहाथ बुर केँ ऊपर नेहा कि पैंटी कों छुआ तौ उसका लण्ड एकदम जमकेकडक खडा होँ गय़ा औऱ खशी सें प्रवींद्र खडा होकर नेहा कों अपना लण्ड दिखाते हुए एक् छोटे बच्चे कि तरहझूम कर कहता हैं- “होँ गय़ा भाभी, खड़ा होँ गय़ा, मे बहोत खुश हूं। मुझे फिकर होनेलगी थि। बाप रे."
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