जहन्नुम की अप्सरा - Jahannum Ki Apasara - Complete Kahani Part 1
जहन्नुम कि अप्सरा
फिनवही हुआ जिसका अन्दाज़ा इमरान पहले हि लगा चुका थां.जैसे हि वो ‘भयानक व्यक्ति’ वालाकेस खत्म करके शादाब नगर सें वापसआया, उसके बाप केँ ऑफिस मे उसकी पेशी हौ गई,.
उसके बाप रहमान साहब इंटेलिजेंस ब्यूरो केँ डायरेक्टर जनरल थें औऱ होम सेक्रेटरी नें कईबार इमरान केँ कारनामों कां ज़िक्र उनसेकर दिया थां, वरनावे तोँ अब तक उसे निकम्मा औऱ बेवक़ूफ़ समझते थें।
इमरान अपनीसब बेवक़ूफ़ियों समेत उनके सामने पेशहुआ।
पहलेवे उसे ख़ूँख़ार नजरों सें घूरते रहे, फिन झल्लायी हुई आवाज़ मे बोले, ‘‘बैठ जाओ। ’’
उनकी मेज़ केँ सामने तीन ख़ाली कुर्सियाँ थीं। इमरान कुछइस तरह बौखला कर इधर-उधर नाचने लगा जैसे उसकीसमझ मे हि नं आँ रहा हौ कि उसेकिस कुर्सी पऱ बैठना चाहिए।
‘‘बैठो!’’ रहमान साहब मेज़ पर्र घूँसा मारकर गरजे। औऱ इमरान एक् कुर्सी मे ढेर हौ कर हाँफने लगा।
‘‘तुम् बिलकुल गधे होँ.!’
‘‘जीहाँ.!’’
‘‘शटअप!’’
इमरान नें बच्चे कि तरहसिर झुका लिया।
‘‘तुमने शादाब नगर केँ स्मगलर कों पकड़ने केँ लिए कौन-सां तरीक़ा अपनाया थां?’’
‘‘वो.बात दरअसल ये हैं कि.मैंने एक् जासूसी नॉवेल मे पढ़ा थां.। ’’
‘‘जासूसी नॉवेल.?’’ रहमान साहब ग़ुर्राये।
‘‘जी हाँ.भला-सां नाम थां.चेहरे कि होरी.ओ लल लाहौल.हीरे कि चोरी!’’
‘‘देखो! मे बहोत बुरीतरह पेश आऊँगा। तुम् डिपार्टमेंट कों बदनाम कररहे होँ। शादाब नगर वाले ऑफिस सें तुम्हारे लिएकोई अच्छी रिपोर्ट नहि आयी। ये सरकारी डिपार्टमेंट हैं, कोई थियेटर कम्पनी नहि, जिसमें जासूसी नॉवेल स्टेज किये जायें औऱ वो स्त्री कौन हैं, जौ तुम्हारे संगआयी हैं?’’
‘‘वो.वो रूशी हैं!.जी हाँ.’’
‘‘उसे क्यूं लाये हौ?’’
‘‘वो मेरे सेक्शन केँ लिए एक् टाइपिस्ट कि ज़रूरत थि नं। ’’
‘‘टाइपिस्ट कि ज़रूरत थि?’’ रहमान साहब नें दाँतपीस कर दोहराया।
‘‘जीहाँ.!’’
रहमान साहब नें एक् सादा काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाते हुएकहा, ‘‘लिखो। ’’
इमरान लिखने लगा, ‘मेरे सेक्शन केँ लिए एक् टाइपिस्ट कि जरूरत थि.’
‘‘क्याँ लिखरहे होँ?’’
इमरान नें जितना लिखा थां, सुना दिया।
‘‘मैंने इस्तीफ़ा लिखने कों कहा थां?’’ रहमान साहब मेज़ पर्र घूँसा मारकर बोले।
इमरान नें दूसरा काग़ज़ उठाया औऱ अपने चेहरे पर्र किसी किस्म केँ भाव ज़ाहिर किये बग़ैर इस्तीफा लिख दिया।
‘‘मुझे ख़ुद लज्जा आती थि?’’ इमरान नें इस्तीफा रहमान साहब कि तरफ़ बढ़ाते हुएकहा। ‘‘इतने बड़े व्यक्ति कां लड़का औऱ जॉब करता फिरे, लाहौल विला क़ूवत.’’
‘हूं.मगर अब तुम्हारे लिए कोठी मे कोई स्थान नहि?’’ रहमान साहब नें जवाब दिया।
‘‘मे गैराज मे सो जाया करूँगा.आप् उसकी फ़िक्र न् करें। ’’
‘‘नहि! अब तुम् फाटक मे भि क़दम नहि रखोगे?’’
‘‘फाटक!’’ इमरान कुछ सोचता हुआ बड़बड़ाने लगा। ‘‘चारदीवारी.तोँ काफ़ी ऊँची हैं। ’’
वो ख़ामोश हौ गय़ा। फिन थोड़ी देरबाद बोला, ‘‘नहि जनाब! फाटक मे क़दमरखे बग़ैर तोँ कोठी मे दाख़िल होना मुश्किल हैं। ’’
‘‘गेटआउट.!’’
इमरान सिर झुकाये उठा औऱ कमरे सें निकल गय़ा।
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जहन्नुम की अप्सरा - Jahannum Ki Apasara – New Episode
२
तीन घण्टे केँ अन्दर-अन्दर पूरे डिपार्टमेंट कों मालूम हौ गय़ा कि इमरान नें इस्तीफा दे दिया हैं.इस ख़बर पर्र सबसे अधिक ख़ुशी कैप्टन फ़ैयाज़ कों हुइ.वो इमरान कां मित्र अवश्य थां, मगरउसी हद तक जहाँ ख़ुद उसके फ़ायदे कों ठेस नं लगती हौ.इमरान केँ बाक़ायदा जॉब मे आँ जाने केँ बाद सें उसकी इज़्ज़त खतरे मे पड़ गई, थि।
जॉब मे आँ जाने सें पहले इमरान नें कुछ केसों केँ सिलसिले मे उसकी जोँ सहायता कि थि उसकी बिना पऱ उसकीसाख बन गयीँ, थि, मगर इमरान केँ जॉब मे आते हि अमलीतौर पऱ फ़ैयाज़ कि हैसियत ज़ीरो केँ बराबर भि नहि रह गयीँ, थि।
‘‘इमरान डियर!’’ फ़ैयाज़ उससेकह रहा थां। ‘‘मुझे अफसोस हैं कि तुम्हारा संगछूट रहा हैं। ’’
‘‘किसी दुश्मन नें उड़ायी होगी!’’ इमरान नें लापरवाही सें कहा.फिन फ़ैयाज़ कां कन्धा थपकता हुआ बोला।
‘‘नहि साथी! मे क़ब्र मे भि तुम्हारा संग नहि छो़ड़ूँगा! फ़िलहाल अपने बँगले केँ दो कमरे मेरेलिए ख़ाली करादो। ’’
‘‘क्याँ मतलब?’’
‘‘वालिद साहब कहते हें कि मे अब उनकी कोठी मे क़दम भि नहि रख सकता, हालाँकि मुझे यक़ीन हैं कि मे रख सकता हूं। ’’
‘‘ओह.अब मे समझा.शायद इसकीवजह वो महिला हैं!’’ फ़ैयाज़ हँसने लगा।
‘‘हाँ, वो महिला!’’ इमरान आँखें फाड़कर बोला। ‘‘तुम् मेरे बाप कों बदनाम करने कि कोशिश कररहे हौ.शटअप यू फ़ूल!’’
‘‘मेरा मतलबये थां.!’’
‘‘नहि! बिलकुल शटअप! ख़बरदार, होशियार.तुम् मेरीबात कां जवाबदो! कमरे ख़ाली कररहे होँ.याँ नहि?’’
‘‘दोस्त, बात दरअसल ये हैं कि मेरी पत्नि.क्याँ वो स्त्री भि तुम्हारे संग हि रहेगी। ’’
‘‘उसकानाम रूशी हैं। ’’
‘‘ख़ैर, कुछ हौ! हाँ, तौ मेरी पत्नि कुछ औऱ समझेगी। ’’
‘‘क्याँ समझेगी। ’’
‘‘यही कि वो तुम्हारी नौकरानी हैं। ’’
‘‘लाहौल विला क़ूवत.मे तुम्हारी पत्नि कि बहोत इज़्ज़त करता हूं। ’’
‘‘मे उस स्त्री केँ बारे मे कहरहा थां। ’’ फ़ैयाज़ झेंपा भि औऱ झल्ला भि गय़ा।
‘‘ओह तोँ ऐसेकहो नाँ! अच्छा ख़ैर.अगर तुम् बँगले मे स्थान नहि देना चाहते तौ वो फ़्लैट हि मुझेदे दो जिसे तुम् पगड़ी पऱ उठाने वाले होँ। ’’
‘‘कैसा फ़्लैट?’’ फ़ैयाज़ चौंककर उसे घूरने लगा।
‘‘छोड़ो दोस्त! अब क्याँ मुझेये भि बताना पड़ेगा कि तुमने चार-पाँच फ़्लैटों पर्र नाजायज़ तौर पर्र क़ब्ज़ा कररखा हैं!’’
‘‘ज़रा धीरे-धीरे सें कहो!गधे कहीं केँ!’’ फ़ैयाज़ चारों तरफ़ देखता हुआ बोला।
‘‘फ़रमान बिल्डिंग वाले फ़्लैट कि चाभी मेरे हवाले करो। समझे!’’
‘‘ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे!’’ फ़ैयाज़ उसे घूँसा दिखाता हुआ दाँतपीस कर बोला।
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जहन्नुम की अप्सरा - Jahannum Ki Apasara – New Episode
३
तीन-चार दिनबाद शहर केँ एक् अख़बार मे एक् अजीबो-गरीब इश्तहार छपा। जिसकी सु़र्खी थि, ‘तलाक़ हासिल करने केँ लिए हमसे मिलें। ’
इश्तहार कां मज़मून थां :
‘‘अगर आप् अपने शौहर सें तंग आँ गयीँ, हें, तोँ तलाक़ केँ अलावा औऱ कोई चारा नहि.मगर अदालत सें तलाक़ हासिल करने केँ लिए शौहर केँ खिलाफ़ ठोस क़िस्म केँ सबूतपेश करने पड़ते हें। हम् कम मेहनताना लें कर आपकेलिए ऐसे सबूत मुहैया कर सकते हें जौ तलाक़ केँ लिए काफ़ी हों, सिर्फ़ एक् बार हमसेमिल कर हमेशा केँ लिए सच्ची ख़ुशी हासिल कीजिए। मिलने कां पता : रूशी ऐण्ड कों., फ़रमान बिल्डिंग, फ़्लैट नम्बर ४। ’’
कैप्टन फ़ैयाज़ नें ये इश्तहार पढ़ा औऱ उसका मुँह हैरत सें खुल गय़ा! फ़रमान बिल्डिंग कां चौथा फ़्लैट वही थां जिसकी चाभी इमरान उससे लें गय़ा थां। रूशी ऐण्ड कों.!
फ़ैयाज़ सोचने लगा! रूशी.ये उसी स्त्री कां नाम हैं जिसे इमरान शादाब नगर सें लाया हैं।
फ़ैयाज़ अपनासिर खुजाने लगा.ये बिलकुल नयी हरकत थि.इससे शहर मे अफ़वाहों कि लहर दौड़ सकती थि, मगरइसे ग़ैरक़ानूनी नहि कहाजा सकता थां.यक़ीनन रूशी ऐण्ड कम्पनी उसके डिपार्टमेंट केँ लिए एक् सिर दर्द बनने वाली थि.
फ़ैयाज़ नें अंग-अंग फैलाकर लम्बी अँगड़ाई ली औऱ सिगरेट सुलगा कर दोबारा इश्तहार पढ़ने लगा।
उसने रूशी केँ बारे मे सिर्फ़ सुना थां.उसे देखा नहि थां।
वो थोड़ी देर बैठा सिगरेट पीता रहा.फिन उठकर ऑफिस सें बाहर् आया, मोटर साइकिल सँभाली औऱ फ़रमान बिल्डिंग कि तरफ़ रवाना हौ गय़ा।
फ़रमान बिल्डिंग तीन मंज़िला इमारत थि औऱ उसके फ़्लैटों मे ज़्यादातर प्राइवेट कम्पनियों केँ ऑफिस थें।
कैप्टन फ़ैयाज़ चौथे फ़्लैट केँ सामने रुक गय़ा जिस पऱ ‘‘रूशी ऐण्ड कों.’’ कां बोर्ड लगाहुआ थां.फ़ैयाज़ नें बोर्ड पर्र लिखी पूरी इबारत पढ़ी।
‘‘रूशी ऐण्ड कों.फॉरवर्डिंग ऐण्ड क्लीयरिंग एजेंट्स। ’’
फ़ैयाज़ नें बुरा-सां मुँहबना कर अपने कन्धों कों उचकाया औऱ चिकहटा कर अन्दर दाख़िल हुआ।
कमरे मे रूशी औऱ इमरान केँ अलावा औऱ कोई नहि थां। फ़ैयाज़ कों देखकर इमरान नें कुर्सी कि तरफ़ इशारा किया वो रूशी कों कुछ लिखवा रहा थां.‘‘मे डॉक्टर वॉटसन.’’ उसने डिक्टेशन जारीरखा औऱ रूशी कि पेन्सिल बड़ी तेज़ी सें काग़ज़ पर्र चलतीरही।
व्यक्ति कों ज़िन्दगी मे कभी-कभी ऐसे हादसे भि पेशआते हें जौ ज़िन्दगी केँ आख़िरी पलों मे भि अवश्य यादआते हें।
‘‘मे डॉक्टर वॉटसन.मरते वक्त.एक् बारये अवश्य सोचूँगा.सोचूँ.सोचूँ.सोचूँ.!’’
इमरान ‘‘सोचूँ.सोचूँ’’ रटताहुआ कुछ सोचने लगा.रूशी कि पेन्सिल रुक गयीँ,.वो पेन्सिल रखकर फ़ैयाज़ कि तरफ़ मुड़ी।
‘‘कहिए?’’ उसने फ़ैयाज़ सें कहा।
‘‘कहेंगे!’’ इमरान नें सिर खुजाते हुएकहा। ‘‘ज़रा देख्ना रजिस्टर मे हमारी किसी मुवक्किला कां नाम मिसेज़ फ़ैयाज़ तौ नहि हैं। ’’
‘‘मुवक्किला!’’ रूशी नें हैरत जाहिर कि।
‘‘ओह.हाँ.अच्छा.डिक्टेशन, ’’ इमरान नें फिनउसे लिखने कां इशारा किया।
‘प्लीज़.’’ फ़ैयाज़ हाथउठा कर बोला। ‘‘डिक्टेशन फिन होता रहेगा। ’’
‘‘क्याँ बात हैं सुपर फ़ैयाज़!’’ इमरान नें हैरत सें कहा। ‘‘क्याँ तुम् अपनी पत्नि कों तलाक़ देना चाहते हौ?’’
‘‘तुम्हारी फ़र्म केँ इश्तहार मे मेरा डिपार्टमेंट काफ़ी दिलचस्पी लेँ रहा हैं। ’’
‘‘वेरीगुड!’’ इमरान सिर हिलाकर बोला। ‘‘तब तौ मे इसीसाल इन्कम टैक्स अदा करने केँ क़ाबिल हौ जाऊँगा। ’’
‘‘बकवास मतकरो। ’’
‘‘सुपर फ़ैयाज़! तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँगा, अगर तुम् अपने डिपार्टमेंट केँ शादीशुदा लागों कि लिस्ट मुझेदे दो। मगर। हिप.डैडी कां नाम उसमें न् होना चाहिए। ’’
‘‘आख़िर इस हरकत कां मतलब क्याँ हैं?’’
‘‘कैसी हरकत?’’
‘‘यही इश्तहार.!’’
‘‘इश्तहार.हाँ, इश्तहार क्याँ.?’’
‘‘ये क्याँ मामला हैं.औऱ तुमने यहा फ़ॉरवर्डिंग औऱ क्लीयरिंग कां बोर्ड लगारखा हैं?’’
‘‘ये विवाह औऱ तलाक़ कां अंग्रेज़ी ट्रांसलेशन हैं। ’’
‘‘मगर तुम् ये गन्दा बिज़नेस नहि कर सकते। ’’
‘‘रूशी.तुम् दूसरे कमरे मे जाओ, ’’ इमरान नें रूशी सें कहा।
रूशीवहा सें चली गयीँ,।
‘‘स्त्री तोँ ज़ोरदार हैं!’’ फ़ैयाज़ अपनी एक् आँखदबा कर बोला।
‘‘यही जुमला तुम्हारी पत्नि तुम्हारे ख़िलाफ़ अदालत मे सबूत केँ तौर पऱ पेश करके तलाक़ लेँ सकती हैं। ’’
‘‘बकवास मतकरो! तुम् बड़ी मुसीबतों मे फँस जाओगे। ’’ फ़ैयाज़ नें कहा।
‘‘क्यूं माई डियर! सुपर फ़ैयाज़ ?’’
‘‘बसयूँ हि!
‘‘हरकत ग़ैरक़ानूनी तोँ नहि.!’’
‘‘ग़ैरक़ानूनी.’’ फ़ैयाज़ कुछ सोचने लगाफिन झल्ला कर बोला, ‘‘देखो इमरान, तुम् डिपार्टमेंट केँ लिएसिर दर्द बनने वाले हौ। ’’
‘‘बस.इतनी-सि बात.!’’
इमरान कुछ औऱ कहने वाला थां कि एक् अधेड़ उम्र कि स्त्री कमरे मे दाख़िल हुई। उसने दरवाज़े पऱ हि रुककर कमरे कां जायज़ा लिया.औऱ फिन बिना किसी हिचकिचाहट केँ बोलि। ‘‘मे आपका इश्तहार देखकर आयी हूं। ’’
‘‘ओह.अच्छा.मिस रूशी अन्दर हें। ’’ इमरान नें खड़े होँ कर दूसरे कमरे कि तरफ़ इशारा किया।
महिला जल्द सें कमरे मे चली गयीँ,।
फ़ैयाज़, जोँ महिला कों हैरत सें देखरहा थां, मेज़ पऱ कुहनियाँ टेककर आगे झुकता हुआ धीरे-धीरे सें बोला। ‘‘ये तुम् क्याँ कररहे होँ इमरान?’’
‘‘बिज़नेस माँ डियर.सुपर फ़ैयाज़!’’ इमरान नें लापरवाही सें जवाब दिया।
‘‘इस स्त्री कों पहचानते हौ?’’ फ़ैयाज़ नें पूछा।
‘‘मे शहर कि सारी बूढ़ी औरतों कों पहचानता हूं। ’’
‘‘कौन हैं?’’
‘‘एक् बूढ़ी स्त्री। ’’ इमरान नें जवाब दिया।
‘‘बको मतये लेडी तनवीर हैं। ’’
‘‘तोँ इससे क्याँ फ़र्क पड़ता हैं। ’’
फ़ैयाज़ थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहाफिन बोला। ‘‘आख़िर यहा क्यूं आयी हैं?’’
‘‘नोसर!’’ इमरान सिर हिलाकर बोला। ‘‘हरगिज़ नहि फ़ैयाज़ साहब! आपकोऐसी बात सोचने कां कोईहक़ नहि.ये मेरा औऱ मेरे मुवक्किलों कां मामला हैं। ’’
‘‘सर तनवीर कि शख़्सियत सें शायद तुम् वाकिफ नहि होँ। अगर मुसीबत मे फँसे तोँ रहमान साहब भि तुम्हें नहि बचा सकेंगे। ’’
‘‘मे अपने ऑफिस मे सिर्फ़ बिज़नेस कि बातें करता हूं!’’ इमरान बुरा-सां मुँहबना कर बोला। ‘‘अगर तुम् मेरे मुवक्किल बनना चाहते हौ तोँ शौक़ सें यहा बैठो, वरना.बाय! क्याँ समझे। अभि मैंने कोई चपरासी नहि रखा हैं, इसलिये मुझे ख़ुद हि परेशानी करनी पड़ेगी। ’’
फ़ैयाज़ उसे ग़ुस्से-भरी जैसी आँखों सें घूरने लगा!फिन थोड़ी देरबाद बोला।
‘‘सुनो!ये रहने वाला फ़्लैट हैं औऱ रहने हि केँ लिए इसका अलॉटमेंट हुआ थां। तुम् इसमें किसी क़िस्म कां ऑफिस नहि खोल सकते, समझे। ’’
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