Incest बदनसीब रण्डी - randi ki kahani - Latest Update 1
बदनसीब रण्डी
ट्रक हिचकोले खातेहुए पंजाब कि कच्ची मार्ग कों पार करता अपने मुकाम कि ओरबढ़ रहा थां। ट्रक मे जमा ‘माल़ ‘ 14 औरतें / लड़कियां थि। कुछ कुंवारियां थि जिन्हें मुंबई याँ दिल्ली मे काम दिलाने कां वादा किया गय़ा थां पर्र अब किसी कि गुलाम बनने वाली थि। इनमें सें करीबहर एक् रोरही थि। एखाददो पुरानी रंडियां थि जोँ एक् कोठे सें बिककर दूसरे कोठे केँ लिए नीलाम होँ रही थि।
ऐसी हि दो औरतें मिली। एक् थि 18 साल कि काली, जोँ बंगाल मे स्वयं कों पांच हजार रुपए मे बेचकर एक् रण्डी कि जीवन अपनाने कों स्वयं कों तयारकर रही थि। दूसरी थि 37 साल कि फुलवा, जिसे उसके बाप नें 18 कि होते हि कोठे पर्र बेचा औऱ फिन एक् मर्द सें दूसरे मर्द कों जातीरही।
काली नें अपनेडर कों दबाने केँ लिए फुलवा सें उसकी स्टोरी पूछी। फुलवा कों एहसास थां कि ये उसका आखरीसफर हैं औऱ कलउसे कोईयाद नहि रखेगा। किसी कि यादों मे हि सही पर्र जिंदा रहने कि चाहत बड़ी तेज़ होती हैं।
भोली काली कि सहमी हुईँ आंखों मे देखते हुए बेजान सि आंखों कि फुलवा अपनी स्टोरी बताने लगी।
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1
फुलवा पैदाइशी बदनसीब थि। उसकी मम्मी देहात कि रण्डी थि। उसका सबसे बड़ा भइया छोड़ बाकीसभी उसके पिता केँ बच्चे नहि थें। फुलवा केँ पैदा होने केँ कुछसाल बाद उसकी मम्मी एक् औऱ बारपेट सें हौ गई। फुलवा कि माँ नें बच्चा गिराने केँ लिए जोँ दावाखाई उस सें वो भि मर गई।
फुलवा केँ पिताजी नें उसकी माँ सें विवाह केँ अलावा कोईकाम करने कां किसी कों याद नहि। जब छोटी कि बच्ची घऱ कि महिला बनीतब उसे सहायता करने वाला मात्र एक् थां। फुलवा कां बड़ा भइया शेखरउस सें 6 साल बड़ा थां औऱ देहात मे चोरीकर अपने भाइयों औऱ बेहन कों संभालता थां। फुलवा केँ जुड़वा भइया बबलू औऱ बंटी फुलवा सें 3 साल बड़े थें। शेखर सबकेलिए खाने कां इंतजाम करता तौ बबलू औऱ बंटी फुलवा कों संभालते।
जैसे चारों बढ़ने लगे शेखर मजदूरी करनेलगा तोँ बबलू औऱ बंटी चोरियां करते। फुलवा घऱ मे रहकर सबकेलिए खानां बनाती औऱ घऱ संभालती। फुलवा बड़ी होनेलगी तोँ सबकोपता चल गय़ा कि वो अपनी माँ जैसी खुबसूरती कि मिसाल बनेगी। शेखर नें फुलवा कों पराए मर्दों सें दूर रहने कों कहा औऱ स्वयं सबकी बेहतर जीवन केँ लिएशहर चला गय़ा। कुछ सालों बाद बबलू औऱ बंटी देहात मे गुंडागर्दी करते औऱ फुलवा इनसभी कि वजह सें दुनिया सें अनजान अपनेघऱ मे बेखबर बचीरही।
शेखरहर महीने पैसे भेजता पर्र बबलू औऱ बंटी अपने पिताजी सें परेशान हौ कर अपने भइया कि सहायता करने 18 केँ होते हि चलेगए। जातेहुए बंटी नें फुलवा कों अपने पिताजी सें बचकर रहने कों कहा पऱ भला पिताजी सें क्यूं डरना? वो तौ अपना हैं नाँ? हैं नाँ?
जब फुलवा जवानी कि कगार पऱ आँ गई तौ उसके पिताजी नें उसकी तारीफ करना शुरुआत कर दिया। केसे उसकी हुस्न उसकी मम्मी जैसी थि। जिसे अपनी मम्मी याद नहि उसकेलिए इस सें अधिक खुबसूरती कुछ नहीं। पिताजी फुलवा कों अक्सर कहता कि वो अपनी राजकुमारी केँ लिएशहर कां राजकुमार लाएगा।
जवानी कि कगार पर्र लड़खड़ाती खूबसूरत औरत केँ लिएइस सें बेहतरीन सपना क्याँ होगा?
फुलवा केँ 18वे बर्थडे पऱ पिताजी एक् व्हीकल लेकरआया।
पिताजी नें फुलवा कों बताया कि येकार उसे औऱ फुलवा कों शहर लें जायेगी जहां उसकायार फुलवा केँ लिए लड़का ढूंढने मे उनकी सहायता करेगा। फुलवा कों पिताजी पर्र शक करने कि जरूरत नहि पड़ी औऱ वो अपनेकुछ अच्छे कपड़े लेकर पिताजी केँ संगचली गई।
पिताजी नें कार दोपहर सें रात तक चलाई औऱ देररात कों लखनऊ केँ बाहर् एक् सुनसान स्थान पर्र रुकगए।
पिताजी, “रात बहोत हौ चुकी हैं। इतनीरात किसी केँ घऱ पहुंचना ठीक नहि। हम् इस स्थान पर्र आज कि रात रुकेंगे औऱ कल सुभह मेरेयार सें मिलेंगे। “
फुलवा देहात केँ बाहर् पहलीबार आई थि औऱ इस बड़ी हवेली कों देखकर अंदर देखने कों उत्सुक हौ गई। फुलवा कां हाथ पकड़कर पिताजी उसे अंदर लें गय़ा।
दरवाजा छूते हि खुल गय़ा औऱ दोनों केँ अंदर दाखिल होते हि बंद होँ गय़ा। फुलवा कों इससाफ औऱ हसीनमहल मे कुछ अजीबबू आँ रही थि। वो गंदी थि पर्र इंसान कों अपनीओर आकर्षित करती थि। फुलवा कों अपनेहर कदम केँ संग घुंगरू केँ आवाज़ सुनाई देरहे थें पर्र उसने तौ पायल भि नहि पहनी थि।
फुलवा, “पिताजी! यह कैसी स्थान हैं? मुझेडर लगरहा हैं!”
अंधेरे मे सें पिताजी कि आवाज़ अजीब सि हौ गई।
पिताजी, “मेरी बच्ची यह“राज नर्तकी कि हवेली” हैं। आओ, दरबार कि इस बड़ी कुर्सी पऱ बैठो। मे तुम्हें उसकीकथा बताता हूं!”
फुलवा सिंहासन पऱ बैठ गई औऱ उसेऐसे लगा जैसे किसी जानवर नें उस पऱ अपनी ठंडी सांस छोड़ी हौ। फुलवा सिकुड़ करबैठ गई औऱ पिताजी किस्सा बताने लगा।
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Incest बदनसीब रण्डी - randi ki kahani – New Episode
2
सदियों पहलेजब नवाब पहले लखनऊआए तौ उन्होंने अपनाराज बनाते हुएकई जुल्म किए। उन्हीं मे सें एक् दास्तान हैं राज नर्तकी कि। नवाब केँ 4 बेटे थें। सबसे बड़ा बेटा सबसे बेरहम थां तोँ तीसरा कला प्रेमी थां। सबसे बड़े कि एक् हि कमजोरी थि।
उसे नाँ सुनने कि आदत नहि थि।
नवाबजादे कों एक् दिन एक् मंदिर मे नाचती नर्तकी दिखी औऱ उसनेइस लड़की कों अपने कमरे मे पेश करने कां हुकुम दिया। सिपाही खालीहाथ लौट क्योंकि तीसरे बेटे नें उसे अपनी पत्नि बनाने कां मंसूबा बनाया थां। नवाबजादे कां सरघूम गय़ा पऱ वो अभि नवाब सें लड़ने लायक नहि हुआ थां।
तोँ नवाबजादे नें लखनऊ केँ बाहर् जंगल मे अपना शिकार खेलने कां महल बनवाया औऱ वहां पऱ सबको न्योता दिया। पहलेदिन नवाबजादा सिंहासन पर्र बैठा औऱ उसनेकहा कि इसमहल कि सही शुरुवात केँ लिएइसे किसी कां खून पिलाया जाए।
क्योंकि यहां पऱ राज नर्तकी केँ अलावा कोईऐसा नहीं थां तौ उसे पकड़कर आगे लाया गय़ा। तीसरे बेटे नें नवाबजादे कों रोकने कि कोशिश कि पर्र उसे गिरफ्तार कर लिया गय़ा।
राज नर्तकी समझ गई कि आज उसकीमौत होनी हैं। उसने नवाबजादे कों उसे चुनौती देने कों कहा।
अगर वो चुनौती हार गई तौ उसकागला काट दियाजाए। नवाबजादे नें शर्त मंजूर करतेहुए इशारा किया औऱ दीवान नें राज नर्तकी कों जबरदस्ती एक् घोल पिलाया।
नवाबजादा, “सुनए नाचनेवाली! तूँ हमारी खिदमत मे पूरे 3 घंटे नाचेगी! अगर तेरे घुंगरू रुके तौ तेराखून बहेगा! औऱ हां, तूँ मौत केँ लिए तड़पेगी पऱ वो भि तुझेही नसीब नहीं होगी!अब नाच!!”
राज नर्तकी अपनेमान केँ लिए, अपनी साधना केँ लिए, अपनीजान केँ लिएनाच रही थि। घोल मे एक् ऐसा द्रव थां जोँ नवाब केँ हरम मे महिला कों नवाब केँ पास भेजने सें पहलेउसे पिलाया जाता थां।
नचाते हुए राजनर्तकी कां खून गर्म होते गय़ा। उसकी सांसे फूलने लगी। पसीने सें लथपथ होँ कर भि राज नर्तकी अपनी साधना मे लगीरही। एक् प्रहर होने कों आया औऱ राज नर्तकी अब भि रुकी नहि थि। नवाबजादे नें अपनी बंदूक मे सें छर्रे निकाले औऱ फर्श पर्र बिखेर दिए।
राज नर्तकी कां पेर फिसला औऱ वो जमीन पर्र गिर गई।
गुस्से सें आग बबूला राज नर्तकी नें इससभा कों श्राप दिया, “अगर मेरी साधना सच्ची हैं औऱ अगर मे पवित्र हूं तोँ जब तक ये स्थान न्याय नहि देखती तब तक ये स्थान हररात कि खून मे कीमत लेगी!मौत इस स्थान पऱ वास करेगी औऱ कर्ज नाँ चुकाने वालों कां सबेरे हिसाब करेगी!”
नवाबजादा हंसकर बोला कि रियासत केँ बोलने सें नवाब कों कुछ नहि होता पऱ अब पूरा दरबार देखेगा कि नवाबजादे केँ बोलने सें रियासत कां क्याँ होता हैं!
नवाबजादे नें इशारा किया औऱ सिपाहियों नें राज नर्तकी केँ हाथ पकड़लिए। नवाबजादे नें आगे बढ़कर पूरे दरबार केँ सामने राज नर्तकी केँ कपड़े उतारदिए। राज नर्तकी रोरही थि पर्र घोल अपनाअसर कर चुका थां!
नवाबजादे नें राज नर्तकी केँ नंगे जिस्म कि पूरे दरबार मे नुमाइश करतेहुए सबको उसकी सक्त चूचियां औऱ गीलीयौन पंखुड़ियां दिखाई। राज नर्तकी अब विरोध भि करने लायक नहि थि।
नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी केँ हाथ अपने सिंहासन केँ सर सें औऱ राज नर्तकी केँ पांव सिंहासन केँ पैरों सें बांधकर उसे अपने सिंहासन पऱ खोलकर बैठा दिया।
यौन उत्तेजना सें विवश हौ करराज नर्तकी आहें भरनेलगी। नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी कि खुली पंखुड़ियों कों सहलाते हुए उसके यौवन कों आग लगाई। राज नर्तकी कि आहें निकल गई औऱ योनि मे सें रस बहनेलगा। राज नर्तकी नें अपने यौवन कों काबू करने कि कोशिश कि पऱ तभी नवाबजाद नें राज नर्तकी कि योनि केँ ऊपर सें उभरेहुए मदन मोती कों निचोड़ दिया। राज नर्तकी कि चीख निकल गई औऱ पूरे दरबार केँ सामने उसेयौन रसों कि बौछार उड़ाने कों मजबूर कर दिया गय़ा। अपनी हि कामाग्नि मे जलतीराज नर्तकी अब अपने जिस्म पऱ सें पूरा नियंत्रण खो चुकी थि।
यौन स्खलन सें बेसुध पड़ीराज नर्तकी केँ सामने नवाबजादे नें अपना छिलाहुआ 7 इंच लम्बा यौनअंग लाया तौ राज नर्तकी उसेरोक नहि पाई। नवाबजादे नें सबके सामने अपने छोटे भइया कि पसन्द पऱ कब्जा कर लिया।
नवाबजादे कां पूराअंग बगावत कुचलते सुलतान कि तरहराज नर्तकी कि पवित्रता कों चीरता एक् झटके मे जड़ तक समा गय़ा। राज नर्तकी कि चीख नें उसके धक्के खाते घुंगरुओं केँ संग मिलकर महल मे जैसे बुरी इच्छाओं कों बुलाया।
नवाबजादा चाहता थां कि राज नर्तकी कि चीखें पूरा दरबार सुनता रहे। इसी वजह सें वो राज नर्तकी कि कुंवारी जवानी कों लूटते हुए उसके मुंह कों खुलारख रहा थां। राज नर्तकी करीब-करीब बेसुध होकर अपनीकमर हिलाकर अपने लुटेरे कां संग देनेलगी।
नवाबजादे नें धक्के खातीराज नर्तकी केँ भरेहुए स्तनों कों निचोड़ते हुए उनपार उभरेहुए लाल शिखरों कों अपने दातों मे पकड़कर दबाया। अपनी कोरी योनि मे पहलीबार होतीयौन उत्तेजना केँ संग अपने स्तनों मे सें आती तीव्र वेदना सें राज नर्तकी स्खलित होनेलगी।
राज नर्तकी कि वर्षों कि साधना सें निखरा हुआबदन नवाबजादे कों निचोडते हुए कामाग्नी कि आहुति बन गय़ा। नवाबजादे नें राज नर्तकी कां गलादबा कर गर्जना करतेहुए उसकी गर्म जख्म मे अपनाविष भर दिया।
नवाबजादे नें कुछ लम्हा राज नर्तकी केँ लूटेहुए शरीर पऱ आराम करतेहुए अपनीजीत कां मजा लिया। फिन नवाबजादे नें अपने लौड़े कों राज नर्तकी कि खून सें सनी बुर मे सें बाहर् खींच लिया। नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी कि फटी हुइ जवानी मे सें अपना वीर्य सबको दिखाते हुए अपनी नवाबी कि झलक दिखाई।
राज नर्तकी नें घोल कि चपेट मे आकर अपनीसुध खो दि थि। नवाबजादा राज नर्तकी कों उसपर अपनीजीत उसे दिखाना चाहता थां।
नवाबजादे नें राज नर्तकी केँ पैरों कों खोला औऱ स्वयं अपनी स्थान पऱ बैठ गय़ा। नंगी बेसुध राज नर्तकी अपने बंधेहुए हाथों सें नवाबजादे कि गोद मे बैठी हुइ थि जबउसे किसी अनहोनी कां अंदेशा हुआ।
राज नर्तकी नें अपनी आंखे खोली तौ पूरा दरबार ललचाती नजरों सें उसकी खुली जख्मी जवानी कों देखरहा थां। राज नर्तकी नें कुछ केहना चाहा पर्र उसकेगले मे सें चीख निकल गई।
नवाबजादे नें अपने सुपाड़े कों राज नर्तकी केँ गुदाद्वार पर्र लगाकर उसे बिठाना शुरुआत कर दिया थां।
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Incest बदनसीब रण्डी - randi ki kahani – New Episode
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“हे माँ!!…
रक्षा!!…
आँ!!…
आँ!!…
अहह!!!…”
पूरा दरबार लार टपकाते हुएदेख रहा थां कि नवाबजादा अपना नवाबी शौक केसे पूराकर रहा थां। नवाबजादा राज नर्तकी कों उठाकर अपने लौड़े कि जड़ पऱ पटक सकता थां पऱ वो चाहता थां कि राज नर्तकी औऱ पूरा दरबार देखे कि वो कितने संयम सें दर्दनाक बदला लेने केँ काबिल हैं। हर एक् बारराज नर्तकी कों उठाकर अपने लौड़े पऱ आधाइंच ज़्यादा धंसाते हुए नवाबजादा राज नर्तकी कि कुंवारी गांड़ मे सें एक् औऱ बूंदखून अपने सिंहासन पर्र टपका देता।
सभी कि नज़र नवाबजादे केँ लौड़े पर्र फटती गांड़ पर्र थि मगर किसी नें नहि देखा केसे वो खून सफेद फर्श पऱ पड़ते हि अंदरचूस लिया जाता। पहलीरात कां कर्जराज नर्तकी केँ कौमार्य सें चुकाया जारहा थां।
कुछदेर तक राज नर्तकी कों तड़पाने केँ बादजब नवाबजादे केँ लौड़े कि जड़ पर्र राज नर्तकी कि गांड़ दब गई तोँ उसने मुस्कुराते हुए अपनेहाथ उठाकर दरबारियों कों तालियां बजाने कों कहा।
राज नर्तकी अपनी गांड़ मे नवाबजादे कां मोटा लंड लिए बेबसी केँ आंसूबहा रही थि जब उसके बूब्ज़ कों दुबारा निचोड़ा जानेलगा। नवाबजादे नें राज नर्तकी कि चुचियों कों पकड़कर खींचते हुएउसे आगे बढ़ाया औऱ फिन अपने घुटने उठाकर राज नर्तकी कों वापस अपने लौड़े पऱ दबाया।
इस धीमी चुधाई सें राज नर्तकी कि गांड़ कों फैलकर नवाबजादे केँ आकार मे ढलने कां मौका मिला। नवाबजादे कों भि आराम करने कां मौका मिला थां औऱ उसनेअब राज नर्तकी कों तेज लूटने कि तयारी करली।
नवाबजादे नें अपने मोटे पंजों मे राज नर्तकी कि पतलीकमर कों पकड़कर उसके नंगे जिस्म कों अपने लौड़े केँ छोर तक उठाया। नवाबजादे कां सुपाड़ा “पक्क्!!…” कि आवाज़ सें राज नर्तकी कि कसी हुइ जख्मी कुंवारी गांड़ मे सें निकला।
राज नर्तकी नें अहहभरी औऱ नवाबजादे नें उसे दुबारा अपने लौड़े सें चीर दिया। राज नर्तकी केँ पैरों नें दर्द सें छटपटाकर कांपते हुए उसके घुंगरूओं कों बजाते हुए उसकीचीख कां संग दिया।
इस अमानवी गीता औऱ नृत्य केँ ताल पऱ नवाबजादे नें राज नर्तकी केँ कोमल शरीर पऱ अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरुआत कर दिया। तेज रफ्तार झटकों सें पूरे लौड़े पऱ चूधती राज नर्तकी कि चीखें धीरे-धीरे धीरे-धीरे आहेंबन करफिन खामोश सिसकियां बनगईं।
घोल कां असरराज नर्तकी कों दर्द सें उत्तेजित कररहा थां। राज नर्तकी अपने यौवन सें मजबूर हौ कर जलनेलगी। राज नर्तकी कां बदन गरमी सें लाल हौ गय़ा औऱ कामागनी कि लाली सें उसकी मासूमियत जल गई। राज नर्तकी कों अपनीगंद मराई मे मज़ाआने लगा औऱ उसके जिस्म नें उसकी जख्मी गंद कों खोलते हुए नवाबजाद कों संग देना शुरुआत किया।
राज नर्तकी सिसकते हुए बेबस थि कि उसका जिस्म अब नवाबजाद कों अपनाने लगा थां। राज नर्तकी कि योनि मे सें काम रसों कां बहावतेज होँ गय़ा। राज नर्तकी केँ कामरस योनि मे सें बाहर् बहतेहुए नवाबजादे केँ मोटे हथियार कों रंगते। अपनी गांड़ मराते हुएराज नर्तकी अनेकों बार झड़ती रही।
राज नर्तकी इस अपमान केँ कड़वे घूंटों कों पीतेहुए काम उत्तेजना मे उतावलापन रही थि जब नवाबजादे नें वापस कराहते हुएउसे अपने लौड़े पऱ दबाया। राज नर्तकी कों अपनी आतों मे नवाबजादे कि गर्म ज़हर भरने कां एहसास हुआ औऱ वो अपने आप् सें घृणा करनेलगी।
नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी केँ हाथ छोड़े औऱ उसे अपने लौड़े पर्र सें उठाया।
राज नर्तकी कि जख्मी गांड़ खुलीरह गई थि। नवाबजादे नें पूरे दरबार कों अपना वीर्य राज नर्तकी कि गांड़ मे सें बाहर् बहता दिखाया औऱ दरबारियों नें उसकेफतह पर्र उसे बधाइयां दि। नवाबजादे नें फिन स्वयं केँ लिएकाम प्रेरक घोल मंगवाया औऱ उसे पीतेहुए राज नर्तकी कों अपना लौड़ा चूसने कों मजबूर किया।
राज नर्तकी अबटूट गई थि औऱ वो नवाबजादे कि बातचुप चापमान गई। नवाबजादे पर्र घोल कां असर होते हि उसनेराज नर्तकी कों अपनी बाहों मे उठा लिया औऱ दरबार केँ बीच मे आँ गय़ा।
नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी केँ पीछे सें खड़े होकर अपने लौड़े कों राज नर्तकी कि गांड़ मे पेल दिया। राज नर्तकी बेबस होँ कर नवाबजादे केँ लौड़े पर्र अपनीकमर हिलाकर अपनी गांड़ स्वयं मरवाते हुए खड़ीरही। नवाबजादे नें फिनराज नर्तकी कि गांड़ मारते हुएउसे हर दरबारी केँ सामने लाया।
किसी नें झड़ती हुईँ राज नर्तकी केँ मम्मे चूसे तौ किसीने राज नर्तकी कि जख्मी मगरयौन रस टपकाती बुर मे उंगली सें चुधाई कि। जंग केँ बाद औरतों कों लूटने मे माहिर सिपहसालार नें तौ राज नर्तकी केँ स्तन कों चूसते हुए उसकी बुर कों अपने खंजर कि पकड़ सें चोद दिया। अपनी बुर मे खुरतरे खंजर कि पकड़ कों नवाबजादे केँ लौड़े सें गांड़ मे भिड़त कों राज नर्तकी नें महसूस किया। राज नर्तकी इस अनोखे दर्द सें प्यास करबीच दरबार अपने रसों कि बौछार कर दि।
सबेरे तक नवाबजादे पऱ सें घोल कां असरउतर गय़ा औऱ उसका लौड़ा पिचक गय़ा। नवाबजादे नें फिनचुध कर बेसुध पड़ीराज नर्तकी कों दरबार केँ बीच मे फेंक दिया।
सुभह कि पहली किरण नें राज नर्तकी केँ जख्मी नंगे जिस्म कों बसछू लिया थां जब नवाबजादे नें राज नर्तकी कों मौत कि सजा सुनाई।
नवाबजादा, “इस बेगैरत कों सभी मिलकर तब तक चोदोजब तक इसकीरूह जहन्नुम मे इसके पुश्तों केँ संग जलने नाँ लगे!”
बाहर् केँ जंगल मे भि सन्नाटा छा गय़ा इसकदर राज नर्तकी कि चीखों सें जमीन तक दहल गई। उसदिन कां कोईअंत नहि थां!
अगले सबेरे तक नवाबजादा औऱ सारे दरबारी थककर दरबार केँ बीचों बीच नंगे पड़ेहुए थें जब घुंगरुओं कि हल्की आवाज़ केँ संग एक् रूह बाहर् कि ओर निकली। महल कि दहलीज पऱ कदम रखते हि उसे एहसास हुआ कि वो स्वयं अपने श्राप सें श्रापित हैं।
राज नर्तकी इसमहल मे कैद हौ करमौत बनकररह गई।
राज नर्तकी नें अपनेराज कुमार कि बेड़ियों कों छू लिया औऱ वो टूटकर बिखरगए। तीसरे बेटे नें राज नर्तकी सें बेखबर अपनी तलवार उठाई औऱ नवाबजादे कां सरकलम कर दिया। राज नर्तकी नाचउठी। उसकीभूख मिट गई थि। खून कां कर्ज चुकाया गय़ा थां। मगर तीसरा बेटा रुका नहि। उसने सारे दरबारियों कों काट दिया। सुभह कि पहली किरण नें दरबार कों इंसानी खून सें भरा देखा।
राज नर्तकी कों उम्मीद थि कि उसका प्रेमी उसकेबदन कों ढककरउसे अग्नि देतेहुए इस स्थान औऱ उसे श्राप मुक्त करेगा। मगर उसके प्रेमी नें उसके टूटेहुए जिस्म पऱ थूंका औऱ वहां सें चला गय़ा। दिनभर राज नर्तकी केँ घुंघरू खून औऱ शवों मे चलतेरहे पर्र सूरज कि आखरी किरण केँ संगमहल जिंदा होँ गय़ा। महल वहां केँ सारेशव औऱ खून अपने अंदरसमा गय़ा जैसेये बलि वेदी अगले शिकार केँ लिए तयार होँ गई हौ।
अगलीसाम नवाबजादे कि बेगम तीसरे बेटे केँ संग अपने शौहर सें मिलने आई। महल मे पहुंचते हि तीसरे बेटे नें अपनी भाभी कों नोचकर लूट लिया। नवाबजादे कां बदला उसने नवाबजादे कि बेकसूर पत्नि सें लिया। बेचारी बेगम सबेरे उठी तोँ अपनी बर्बादी झेल नहि पाई। बेगम नें अपने खंजर सें अपनादिल काट दिया।
खून फर्श पऱ गिरा औऱ राज नर्तकी नाचउठी। उसकीभूख मिट गई थि। खून कां कर्ज चुकाया गय़ा थां।
तीसरा बेटा अपनी भाभी कां शव वहीं फर्श पर्र छोड़ शिकार खेलने चला गय़ा। साम कों महल सें एक् शरीफ स्त्री नें एक् हम् दर्द सें रुखसत ली औऱ महल केँ बाहर् कदम रखते हि गायब हौ गई।
रात कों तीसरा बेटा लौटा पऱ उसे अपनी भाभी कां शव नहि दिखा। वो बिना सोचेसो गय़ा। नवाब केँ रक्षक दस्ते नें नवाबजादे कि मौत कां हिसाब लेने केँ लिएआधी रात कों महल पर्र हमला किया औऱ सोतेहुए तीसरे बेटे कां गलाकाट करचले गए। खून फर्श पर्र गिर गय़ा औऱ सोख लिया गय़ा। राज नर्तकी नाचउठी।
सदियां बीत गई हें पर्र येमहल आज भि वैसा हि हैं जैसातब थां जबराज नर्तकी नें इसके अंदर अपनाकदम रखा थां। यहांकई डाकुओं नें अपना खजाना छुपाया पऱ उसे वापस लेँ नहींपाए। कइयों नें यहां कुंवारियों कि नरबलि चढ़ाई उस खजाने केँ लिए पर्र कुछ हासिल नहि हुआ।
आज भि यहांरात गुजारने वालों सें राज नर्तकी खून कां हिसाब लेती हैं। कहते हें कि बेकसूर कों उसके घुंघरू सुनाई देते हें।
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