MAA MERI UMMID - माँ बेटा - Latest Update 1
दोस्तो यह एक् ऐसा संयोग थां अपनी मां केँ संग जिसके बारे मे मे आपको बताने जारहा हूं।
दोस्तो यहतभी होता हैं जब सितारे किसी बहोत खास मौके पऱ किसीखास दिशा मे लाइन बद्धहों। मेरे ख़याल सें इसे औऱ किसी तरीके सें परभाषित नहीं कियाजा सकता। मे घऱ केँ पिछवाड़े मे क्यारियों मे खोई अपनीबॉल ढूढ़रहा थां जब मैने मां कि आवाज़ अपने माता पिता केँ कमरे केँ संग अटॅच्ड बाथरूम कि छोटी सि खिड़की सें आती सुनी। खिड़की थोड़ी सि खुली थि औऱ मे उसमे सें अपनी मम्मी कि फुसफुसाती आवाज़ कों सुन सकता थां जब वोँ मोबाइल पर्र किसी सें बातकर रही थि।
वोँ वास्तव मे एक् अदुभूत संयोग थां। वोँ शायद बाथरूम मे टाय्लेट इस्तेमाल करनेआई थि औऱ संजोग वश उसकेपास फोन थां, जोँ अपने आप् मे एक् दुर्लभ बात थि क्योंकि मां बाथरूम मे कभीफोन लेकर नहीं जाती थि औऱ संयोगवश मे भि खिड़की केँ इतने नज़दीक थां कि वोँ क्याँ बातें कररही हैं सॉफसॉफ सुन सकता थां.
मे कोई जानबूझकर उसकी बातें नहींसुन रहा थां मे तौ अपनीबॉल ढूँढरहा थां मगरकुछ अल्फ़ाज़ ऐसे होते हें कि व्यक्ति चाहकर भि उन्हे नज़रअंदाज़ नहींकर सकता, खास करअगर वोँ अल्फ़ाज़ अपनी सग़ी मां केँ मुँह सें सुनरहा होँ तौ। जब मैने मां कों वोँ बात कहते सुना तौ मेरेकान खड़े होँ गये:"अब मे तुम्हे क्याँ बताऊ। मुझे तोँ अबये भि याद नहीं हैं कि लन्ड कां स्पर्श कैसा होता हैं। इतना वक्त होँ गय़ा हैं मुझे बिना सेक्स केँ"
पहलेपहल तौ मुझे अपने कानों पर्र यकीन हि नहींहुआ कि शायद मैनेसही सें सुना हि नहीं हैं, मे अपनी साँसे रोककर बिनाकोई आवाज़ किए पूरे ध्यान सें सुनने लगा.
तब वोँ काफ़ी वक़्त तक चुपरही जैसे वोँ मोबाइल पऱ दूसरी औऱ सें बोलने वाले कों सुनरही थि औऱ बीचबीच 'हाँ', 'हुंग', 'मे जानती हूं' कररही थि। आख़िरकार अंत मे वोँ बोलीं "मे वोँ सभी करकेदेख चुकी हूं मगरकोई फ़ायदा नहीं.अब हमारी ज़िंदगी उस पड़ाव पर्र पहुँच गयीँ, हैं जिसमे सेक्स हमारी रोजमर्रा कि जीवन कि ज़रूरत नहींरहा"
उफफफ्फ़ मे अब जाकर समझा थां। मेरी मां अपनी सेक्स लाइफ सें संतुष्ट नहीं थि औऱ मोबाइल पऱ किसी सें शिकायत कररही थि याँ अपना दुखड़ा रोरही थि। मोबाइल केँ दूसरे सिरे पऱ कॉन थां मुझे मालूम नहीं थां मगर जौ कोई भि थां जाहिर थां मम्मी केँ बहोत नज़दीक थां। इसीलिए वोँ उस आदमी सें इतने खुलेपन औऱ भरोसे सें बातकर रही थि।
फिन सें एक् लंबी चुप्पी छा जाती हैं औऱ वोँ सिर्फ़ सुनती रहती हैं। तब वोँ बोलती हैं "मुझे नहीं मालूम मे क्याँ करूँ, मेरीसमझ मे कुछ नहींआता। कभीकभी मुझे इतनी ख़्वाहिश होती हैं चुदवाने कि, मेरी बुर जैसेजल रही होती हैं, कामोउत्तेजना जैसेसर चढ़कर बोलती हैं, औऱ मे रातभर सो नहीं पाती औऱ वोँ दूसरी औऱ करवट लेकरऐसे सोता हैं जैसेसभी कुछसही हैं, कुछ भि ग़लत नहीं हैं"
मैनेकभी भि मम्मी कों कामोउत्तेजना शब्द केँ संग जोड़कर नहीं देखा थां। वोँ मेरेलिए इतनी पूर्ण, इतनी निष्कलंक थि कि मे जानता भि नहीं थां कि उसकी भि शारीरिक ज़रूरतें थीं मेरी.मेरी हि तरह। वोँ मेरेलिए सिर्फ़ मां थि सिर्फ़ मां, एक् स्त्री कभी नहीं।
मे जानता थां मां औऱ पापा एक् संग सोते हें औऱ मेरेमन केँ किसी कोने मे येबात भि अंकित थि कि उनकेबीच आत्मीय संबंध थें मगरअब जब मैने अपनेमन कों दौड़ाया औऱ इसबात कि ओर ध्यान दिया कि आत्मीयता कां असली मतलबयहा चुदाई सें थां। मैनेकभी येबात नहीं सोची थि कि मेरे पापा नें मेरी मां कों चोदा हैं औऱ अपना लन्ड मां कि बुर मे घुसेड़ा हैं, वोँ लन्ड जिसका एहसास मम्मी केँ अनुसार वोँ कब कि भूल चुकी थि।
मम्मी औऱ बुर येदोऐसे लफ़्ज थें जोँ मेरेलिए एक् लाइन मे नहीं हौ सकते थें। मेरी मां तोँ बस मां थि, पूरी शुद्ध औऱ पवित्र। जब उसकी बातचीत नें इसओर इशारा किया कि उसकेपास भि एक् बुर हैं जोँ लन्ड केँ लिए तड़परही हैं। बस, मे औऱ कुछ नहीं सुनना चाहता थां। मे ये भि भूल गय़ा कि मे वहा क्याँ कररहा थां जा क्याँ करने गय़ा थां। मे वहा सें दूरहट जानां चाहता थां इतनादूर केँ मां कि आवाज़ नाँ सुन सकूँ
उस दिन केँ बाद मे जब मैनेउसे किचन मे देखा तोँ मुझे उसकी उपस्थिती मे बेचैनी सि महसूस होनेलगी। मुझे थोडा अपराध बोध भि महसूस होँ रहा थां केँ मे उसकी अंतरंग दूबिधा कों जान गय़ा थां औऱ उसेइस बात कि कोई जानकारी नहीं थि। उस अपराधबोध नें मां केँ लिए मेरीसोच कों थोडा बदल दिया थां। उसकी समस्या कि जानकारी नें उसके प्रति मेरे नज़रिए मे भि तब्दीली ला दि थि। मे शायदइसे सहीढंग सें बता तोँ नहीं सकतामगर मेरे अंदरकुछ अहसास जनम लेनेलग थें.
उसदिन जब वोँ ड्रॉयिंग रूम मे आई तौ बरबस मेरा ध्यान उसकी टाँगो कि ओर गय़ा। मे चाहता नहीं थां मगरफिन भि स्वयं कों रोक नहीं पाया। सिर्फ़ इतना हि नहीं, मेरी नज़र उसकी टाँगो सें सीधेउस जगह पऱ पहुँच गयीँ, जहाँ उसकी टाँगे आपस मे मिलरही थीं, उस जगह पऱ जहाँ उसने नां जाने कितने टाइम सें लन्ड महसूस नहीं किया थां। उपर सें वोँ टाइट जीन्स पहनेहुए थि औऱ उसने अपनी टीशर्ट जीन्स केँ अंदरदबा रखी थि जिस सें उसकी टाँगो कां वोँ मध्यभाग मुझे बहोत अच्छे सें दिखाई देरहा थां बल्कि थोडा उभराहुआ नज़र आँ रहा थां। उसके वोँ लफाज़ मेरे कानो मे गूँजरहे थें जब मे उसकी जाँघो कों ताड़रहा थां.
वोँ अपनी फॅवुरेट जीन्स पहनेहुए थि औऱ वोँ जगह जहाँ उसकी जांघे आपस मे मिलरही थि वहा थोडा गॅप थां जोँ उसकी बुर कों हाइलाइट कररहा थां.खूब उभरकर। मैने मम्मी कों पहले भि उस जीन्स मे देखा थां मगर टाँगो केँ बीच कां वोँ गॅप मुझेकभी नज़र नहींआया थां नाँ हि वोँ तिकोने आकर कां भाग। असलियत मे, शायद मैने वोँ उभराहुआ हिस्सा देखा हि नहीं थां, शायद वोँ मेरी कल्पना सिर्फ थि। उसकी जीन्स काफ़ी मोटे कपड़े कि बनी हुई थि इसलिये उस हिस्से कों देख्ना बहोत मुश्किल थां मगरआज मे उसे एक् अलग हि रूप मे देखरहा थां.
उसकी बुर कि ओरबार बार ध्यान जाने सें मुझेकुछ बेचिनी महसूस होनेलगी थि। उसरात मे सो नां सका।
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रातजब मेरे माता पिता अपने कमरे मे सोने केँ लिएचल तौ मे कल्पना करनेलगा केसे मेरी मम्मी मेरे पापा केँ नीचे होगी औऱ उस लन्ड कों अपनी बुर मे लेँ रही होगी जोँ उसने नां जाने कितने वक्त सें महसूस भि नहीं किया थां। मैनेये सभी फितूर अपने दिमाग़ सें निकालने कि बहोत कोशिश कि मगरघूम फिनकर वोँ बातें फिन सें मेरे दिमाग़ मे आँ जाती। मेरा ध्यान उसकी पॅंट केँ उसगॅप वाले हिस्से कि ओरचला जाता औऱ मे कल्पना मे अपने पापा केँ लन्ड कों उसगॅप कों भरते देखता.
मेरे ख़याल मुझे बैचैन कररहे थें औऱ मे ठीक सें कह नहीं सकता कि मुझेकिस बात सें ज़यादा तकलीफ़ हौ रही थि, इसबात सें कि मम्मी कि बुर बारबार मेरी आँखो केँ सामने घूमरही थि याँ फिनइस ख़याल सें कि मेरे पापा उसेचोद रहे होंगे।
अगलेदिन मेरामूड बहोत उखड़ा हुया थां। मेरेहाव भाव मेरी हालतबता रहे थें, स्वयं मम्मी नें भि पूछा कि मे ठीक तोँ हूं। वोँ उसदिन भि वोही जीन्स पहनेहुए थि मगर उसकेसंग एक् फॉर्म फिटिंग टी-शर्ट डाली हुई थि। उसदिन जीवन मे पहलीबार मेरा ध्यान मां केँ स्तन कि ओर गय़ा। एक् बारगी तौ मुझे यकीन हि नहींहुआ कि उसके मम्मे इतने बड़े औऱ इतने खूबसूरत थें। उसके भारी मम्मो केँ एहसास नें मेरी हालत औऱ भि पतलीकर दि थि.
बाकी कां पूरादिन मेरामन उसकी टाँगो केँ जोड़ सें उसके मम्मो, उसकेउन गोल-मटोल भारी स्तन केँ बीच उछलता रहा। मेरे कानो मे बारबार उसकी वोँ बात गूँज उठती कि उसेअब लन्ड कां एहसास भि भूल गय़ा थां कि कभीकभी उसको चुदवाने कां कितना मन होता थां.
मे मानता हूउसे केवल एक् मां कि तरह देखने कि वजाय एक् हसीन, कामनीय नारी केँ रूप मे देखने कां बदलाव मेरेलिए अप्रत्याशित थां। ऐसा लगता थां जैसे एक् परदाउठ गय़ा थां औऱ जहाँ पहले एक् धुन्धलका थां वहाअब मे एक् स्त्री कि तस्वीर सॉफसॉफ देख सकता थां। लगता थां जैसे मेरीकुछ इच्छाएँ मन कि गहराइयों मे कहींदबी हुईँ थीं जौ ये सुनने केँ बादउभर कर सामने आँ गई, थि कि उसकोकभी कभी चुदवाने कां कितना मन होता थां। वोँ जैसेबदल करकोई औऱ होँ गई, थि औऱ मेरेलिए सर्वथा नयी थि। जहाँ पहले मुझे उसके मम्मो औऱ उसकी जाँघो केँ जोड़ पर्र देखने सें अपराधबोध, झिजक महसूस होती थि, अबहर बितते दिन केँ संग मे उन्हे आसानी सें बिना किसी झिजक केँ देखने लगा थां बल्कि जोँ भि मे देखता उसकी अपनेमन मे खूबजम कर उसकी तारीफ भि करता। मुझे नहीं मालूम उसनेइस बदलाव पर्र कोई ध्यान दिया थां याँ नहींमगर कयि मौकों पऱ मे बड़ी आसानी सें पकड़ा जा सकता थां।
एक् दिनआधी रात कों मे टेलीविज़न देखरहा थां, मुझे रसोई मे मम्मी केँ कदमो कि आहट सुनाई दि। उस वक्तउसे सोते होना चाहिए थां मगर वोँ जागरही थि। वोँ ड्रॉयिंग रूम मे मेरेपास आई। उसकेहाथ मे जूस कां ग्लास थां।
"मे भि तुम्हारे संग टेलीविज़न देखूँगी?" वोँ छोटे सोफे पऱ बैठ गई, जोँ बड़े सोफे सें नब्बे डिग्री केँ कोने पर्र थां जिस पे मे बैठाहुआ थां। उसने नाइटी पहनी हुइ थि जिसका मतलब थां वोँ सोई थि मगरफिन उठ गई थि.
"नींद नहीं आँ रही" मैने पूछा। मेरे दिमाग़ मे उसकी टेलिफोन वाली बातचीत गूँजउठी जिसमे उसनेकहा थां कि कभीकभी उसे चुदवाने कि इतनी जबरदस्त ख़्वाहिश होती थि कि उसे नींद नहींआती। मे सोचने लगा क्याँ उस वक्त भि उसकी वोही हालत हैं, कि शायद वोँ काम कि आग यानी कामाग्नी मे जलरही हैं औऱ उसे नींद नहीं आँ रही हैं, इसीलिए वोँ टेलीविज़न देखने आई हैं। इसबात कां एहसास होने पऱ कि मे अती कामोत्तेजित नारी केँ संग हूं मेरा शरीर सिहरउठा.
वोँ वहा बैठकर आहिस्ता जूस पीनेलगी, उसे देखकर लगता थां जैसेउसे कोई जल्दबाज़ी नहीं थि, जूस ख़तम करके वापस अपने बेडरूम मे जाने कि। जब उसका ध्यान टेलीविज़न कि ओर थां तोँ मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके शरीर कां मुआइना कररही थि। उसके मोटे औऱ ठोस स्तन कि ओर मेरा ध्यान पहले हि जा चुका थां मगरइस बार मैनेगौर किया उसकी टाँगे भि बेहद सुंदर थि। सोफे पे बैठने सें उसकी नाइटी थोड़ी उपरउठ गयीँ, थि औऱ उसके घुटनो सें थोडा उपर तक उसकी जाँघो कों ढांपरही थि.
शायदरात बहोत गुज़र चुकी थि, याँ टेलीविज़न पर्र आधीरात कों परवीन बाबी केँ दिलकश जलवे देखने कां असर थां, मगर मुझे मम्मी कि जांघे बहोत प्यारी लग रहीं थि। बल्कि सही लफ़्ज़ों मे बहोत सेक्सी लगरही थि। सेक्सी, यही वोँ लफ़्ज थां जौ मेरे दिमाग़ मे गूंजा थां जब हम् दोनो टेलीविज़न देखरहे थें याँ मेरेकेस मे मे, टेलीविज़न देखने कां नाटककर रहा थां। असलियत मे अगर मुझेकुछ दिखाई देरहा थां तौ वोँ उसकी सेक्सी जांघे थि औऱ ये ख़याल मेरे दिमाग़ मे घूमरहा थां कि वोँ इस टाइम शायद वोँ बहोत कामोत्तेजित हैं.
वोँ काफ़ी वक़्त वहा बैठीरही, अंत मे बोलते हुएउठ खड़ी हुइ "ओफफ्फ़! रात बहोत गुज़र गई, हैं। मे अब सोनेजा रही हूं"
मे कुछ नहीं बोला। वोँ उठकर मेरेपास गुडनाइट बोलने कों आई। नॉर्मली रात कों मम्मी विदा लेतेहुए मेरे होंठो पर्र एक् हल्का सां चुंबन लेती थि जैसा मेरे बचपन सें चला आँ रहा थां। वोँ सिर्फ़ सूखे होंठो सें सूखे होंठो कां क्षणिक स्पर्श सिर्फ होता थां औऱ उसरात भि कुछऐसा हि थां, एक् सूखा, हल्का सां करीब-करीब नां मालूम होने वाला चुंबन। मगरउस रातउस चुंबन केँ अर्थबदल गये थें, क्योंकि मेरे दिमाग़ मे उसके कामुक अंगो कि धुंधली सि तस्वीरें उभररही थीं। वोँ एक् हल्का सां अच्छी गंध वाला पर्फ्यूम डालेहुए थि जिसने मेरीदशा औऱ भि खराबकर दि। मे उत्तेजित होनेलगा थां।
मे उसेमूड कररूम कि ओर जाते देखता रहा। उसका रेशमी, सॉफ्ट नाइट्गाउन उसके जिस्म केँ हर कटावहर मोड़हर गोलाई कां अनुसरण कररहा थां। वोँ उसकी गान्ड केँ उभार औऱ ढलान सें चिपका हुआ उसके चुतड़ों केँ बीच कि खाई मे हल्का सां धंसाहुआ थां। उस दृश्य सें मम्मी कों एक् खूबसूरत, कामनीय नारी केँ रूप मे देखने केँ मेरे बदलाव कों पूर्ण कर दिया थां।
"मां कितनी हसीन हैं, कितनी सेक्सी हैं" मे स्वयं सें दोहराता जारहा थां। मगर उसकी सुंदरता किसकाम कि! वोँ आकर्षक औऱ कामनीय नारीहर रात मेरे पापा केँ पास उनकेबेड पर्र होती थि मगरफिन भि उनके अंदर वोँ ख़्वाहिश नहीं होती थि कि उस कामोत्तेजित नारी सें कुछ करें। मुझे पापा केँ इस रवैये पऱ वाकाई मे बहोत हैरत हौ रही थि।
मुझेइस बात पर्र भि ताज्जुब होँ रहा थां कि मेरी मां अचानक सें मुझे इतनी खूबसूरत औऱ आकर्षक क्यूं लगनेलगी थि। वैसेयह इतना भि अचानक सें नहीं थां मगर यकायक मम्मी मेरेलिए इतनी हसीन, इतनी कामनीय हौ गई, थि इसबात कां कुछ मतलब तोँ निकलता थां। क्यूं मुझे वोँ इतनी आकर्षक औऱ सेक्सी लगनेलगी थि? मुझे एहसास थां कि इस सबकी शुरुआत मुझे मां कि अपूर्ण जिस्मानी ख्वाहिशों कि जानकारी होने केँ बाद हुई थि, मगरफिन भि वोँ मेरी मम्मी थि औऱ मे उसका बेटा औऱ एक् बेटा होने केँ नाते मेरेलिए उन बातों कां अधिक मतलब नहीं होना चाहिए थां। उसकी हसरतें किसी औऱ केँ लिएथीं, मेरेलिए नहीं, मेरेलिए बिल्कुल भि नहीं।
अगरउस टाइम मे कुछसोच सकता थां तौ सिर्फ़ अपनी हसरतों केँ बारे मे, औऱ मां केँ लिए मेरेदिल मे पैदा होँ रही हसरतें। मगरफिन मे उसकी ख्वाहिश क्यूं कररहा थां? क्याँ वाकाई वोँ मेरी खावहिश बन गयीँ, थि? मेरेपास किसी प्रश्न कां जवाब नहीं थां। येबात कि वोँ कभीकभी बहोत उत्तेजित हौ जाती थि औऱ येबात कि उसकी जिस्मानी हसरतें पूरी नहीं होतीथीं,
इसीबात नाँ मां केँ प्रति मेरे अंदरकुछ एहसास जगादिए थें। येबात कि वोँ चुदवाने केँ लिए तरसती हैं, मगर मेरा पिता उसे चोदता नहीं हैं, इसबात सें मेरे दिमाग़ मे ये विचार आनेलगा कि शायद इसमे मे उसकीकुछ सहायता कर सकता थां। मगर हमारा नाता रास्ते मे एक् बहोत बड़ी बढ़ा थि, इसलिये वास्तव मे उसकेसंग कुछकर पाने कि संभावना मेरेलिए नाबराबार हि थि। मगर मेरे दिमाग़ केँ किसी कोने मे ये विचार अवश्य जनम लें चुका थां कि कोशिस करने मे कोई हर्ज नहीं हैं। उस संभावना नें एक् मर्द होने केँ नाते मां केँ लिए मेरे जज़्बातों कों औऱ भि मज़बूत कर दिया थां चाहे वोँ संभावना नां केँ बराबर थि।
ज़्यादातर मे रात कों काफ़ी लेट सोता थां, येआदत मेरी विद्यालय दिनो सें बन गयीँ, थि जब मे आधीरात तक पढ़ाई करता थां, कॉलेज जाय्न करने केँ बाद सें येआदत औऱ भि पक्की हौ गई, थि। मेरा ज़्यादातर वक्त कंप्यूटर पऱ काम करते गुज़रता थां मगर मम्मी केँ बारे मे वोँ जानकारी हासिल होने केँ बाद, औऱ जब सें मुझेइस बात कां एहसास हुया थां कि मां कां शरीर कितना कामुक हैं वोँ कितनी सेक्सी हैं, औऱ उसकी उपस्थिति मे जौ कामनीय मजा मुझे प्राप्त होनेलगा थां उससे मे अब टेलीविज़न देखने कों महत्व देनेलगा थां। मे अक्सर ड्रॉयिंग रूम मे बैठकर टेलीविज़न देखता औऱ आशा करता कि वोँ आएगी औऱ मुझेफिन सें वोही खुशी प्राप्त होगा.
मां कां ध्यान मेरीनयी दिनचर्या कि ओर जाने मे थोडा वक्तलगा। शुरुआत शुरुआत मे वोँ कभीकभी संयोग सें वहा आँ जाती औऱ थोडा वेकार बैठती, औऱ टेलीविज़न पऱ मेरसंग कुछ देखती। मगर जल्द हि वोँ नियमित तौर पऱ मेरेसंग बैठने लगी.मगर वोँ कभी भि लंबे वक़्त तक नहीं बैठती थि मगर इतना वक्त काफ़ी होता थां एक् सुखद एहसास केँ लिए। मुझेलगा वोँ घऱ मे अपनी मोजूदगी कां किसी कों एहसास करवाना चाहती थि
रात कों जाने केँ वक्त उसकी विशेज़ कयिबार ज़ुबानी होती थि, वोँ हल्के सें गुडनाइट बोल देती थि औऱ कयिबार वोँ हल्का सां होंठो सें होंठो कां स्पर्श, वोँ एक् सूखा सां स्पर्श सिर्फ होता थां औऱ मेरे ख्याल सें वोँ किसी भि प्रकार चुंबन कहकर नहीं पुकारा जा सकता थां। जौ गर्माहट मुझे पहले पहले मम्मी केँ चुंबन सें होती थि वोँ वक़्त केँ संग उनकीआदत होने सें जातीरही। उन चुंबनो मे नाँ कोईअसर होता थां औऱ नाँ हि उनकाकोई खास मतलब होता थां। वोँ तौ सिर्फ़ हमारे विदा लेने कि औपचारिकता केवल थि, एक् ऐसी औपचारिकता जिसकी मुझेकोई खास परवाह नहीं थि।
MAA MERI UMMID - माँ बेटा – New Episode
मे अपनी पुरानी दिनचर्या कि ओरलौट गय़ा औऱ अपना सारा वक़्त फिन सें अपने कंप्यूटर पे बिताने लगा.अब आधीरात तक टेलीविज़न देखने मे वोँ मजा हि नहीं थां जैसा पहलेआया करता थां। मां कों मेरे फ़ैसले कि मालूमात नहीं थि। पहले हि दिनजब उसने मुझे ड्रॉयिंग रूम सें नदारद पाया तौ वोँ मेरेरूम मे मुझे देखने कों आई.
"आज टेलीविज़न नहीं देखोगे क्याँ"
"नहीं, मुझे अपना प्रॉजेक्ट पूरा करना हैं" मैने बहाने बनाया.
"ओह!" वोँ थोड़ी उदासलगी, कम सें कम मुझे तोँ ऐसा हि जान पड़ा.
कहने केँ लिए औऱ कुछ नहीं थां, मगर वोँ अभि जानां नहीं चाहती थि। वोँ बेड केँ किनारे पर्र बैठ गई, औऱ टेबल पर्र सें एक् मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी। मे बिज़ी होने कां नाटक करतारहा, औऱ वोँ चुपचाप मॅगज़ीन मे खोईरही। कुछदेर बाद मैनेउसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना."ठीक हैं, मे चलती हूं" वोँ खड़ी होकर बोलि.
मैने अपनी कुर्सी उसकीओर घुमाली औऱ कहा, "मेराकाम करीब ख़तम हौ चुका हैं मां, अगर तुम् चाहो तौ थोड़ी देर मे हम् टेलीविज़न देखने चलते हें"
"नहीं, नहीं। तुम् पढ़ाई करो" उसने जबाब दिया औऱ मेरीतरफ आई.अबये हिस्सा कुछ अर्थलिए हुए थां.
शायद मेरायह अंदाज़ा ग़लत होँ केँ मुझे ड्रॉयिंग रूम मे टेलीविज़न देखते नाँ पाकर वोँ थोडा उदास होँ गयीँ, थि, मगरजब वोँ मुझसे विदा लेने केँ टाइम चुंबन लेनेआई तौ मैने उसकेहाव भाव मे एक् निस्चय देखा औऱ इसबार मेरेमान मे कोई संदेह नहीं थां जैसे ज़ुबानी विदा कि जेगह वोँ चुंबन लेकरकोई बात जताना चाहती थि.
मे थोडा आगे कों झुक गय़ा औऱ उसके गुडनाइट चुंबन कां इंतेज़ार करनेलगा। आमतौर पऱ वोँ थोडा सां झुककर अपने होंठ मेरे होंठो सें छुया देती थि। उसकेहाथ उसकीकमर पऱ होते थें। मगरउस रात उसने अपना दायां हाथ मेरे बाएँ कंधे पऱ रखा औऱ फिन मुझे वोँ चुंबन दिया याँ मेरा चुंबन लिया। मैनेइसे महज इतेफ़ाक़ माना औऱ इसेकोई गुप्त इशारा समझकर इसकाकोई दूसरा अर्थ नहीं निकाला। कारणये थां कि मे कुर्सी पर्र बैठाहुआ थां नाँ केँ सोफे पर्र, इसीलिए उसे बॅलेन्स केँ लिए मेरे कंधे पऱ हाथ रखना पड़ा थां। मगर वोँ चुंबन आजकुछ अलगतरह कां थां, इसमेकोई शक नहीं थां.
येकोई बहहुत बड़ीबात नहीं थि, मगर मुझेलगा कि वोँ हमारे इकट्ठे बैठने, संगसंग टेलीविज़न देखने कि आस लगाए बैठे थि, उसे किसी केँ संग कि ज़रूरत थि। शायद वोँ हमारे आधीरात तक ड्रॉयिंग रूम केँ संग कि आदि हौ गई, थि औऱ मेरेवहा नां होने पऱ उससेरहा नहीं गय़ा थां। मुझे उसके चुंबन सें उसकी निराशा झलकती दिखाई दि.
तभी वोँ ख़याल मेरेमन मे आया थां.
अगर उसकेलिए चुंबन कां एहसास बदलना संभव थां तोँ मेरेलिए भि संभव थां चाहे किसी औऱ तरीके सें हि सही.
जितना ज्यादा मे इस बारे मे सोचता उतना हि अधिक इसके नतीजे कों लेकर उत्तेजित होता गय़ा। जब सें मैनेउसे कहते सुना थां कि वोँ चुदवाने केँ लिए प्यास रही हैं तबसे मेरे अंदर एक् ज्वाला सि धधकरही थि। उस ज्वाला कि लपटें औऱ भि तेज़ होँ जातीजब वोँ मेरेसंग अकेली आधीरात तक टेलीविज़न देखती थि। उसकी मोबाइल वाली बातचीत सें मे जानता थां केँ वोँ कभीकभी इतनी उत्तेजित होती थि कि उसेरात कों नींद नहींआती थि। मुझे लगता थां कि जबजब वोँ आधीरात कों टेलीविज़न देखने आती थि उसकी वोही हालत होती होगी, चाहे मेरे कारण नहींमगर अती कामोत्तेजना कि हालत मे तोँ वोँ होती हि थि.
अगरउस दिन भि उसकी वोही हालत थि जब वोँ मेरेसंग थि तौ क्याँ वोँ मेरीओर हसरत सें देखेगी? जैसे मे उसकीओर देखता थां? क्याँ उसके हृदय मे भि वोहीआग जलरही थि जोँ मेरेदिल मे जलरही थि? क्याँ ये संभव थां कि उसके अंदर कि आग कों प्रोक्ष रूप सें औऱ भड़का दियाजाए ताकिकम सें कम वोँ मेरीओर किसी दूसरी भावना सें देखसके जैसे मे उसकीओर देखता थां? क्याँ मे उसके दिमाग़ मे वोँ विचार डाल सकता थां कि मे उसकी समस्याओ केँ समाधान कि एक् संभावना होँ सकता हूं, चाहे वोँ सिरफ़ एक् विचार होता इससे ज्यादा कुछ नहीं.
मेरेलिए इन सवालों केँ जबाब जानने कां कोई साधन नहीं थां, मेरा मतलब कि अगर मे शुरुआत भि करता तौ कहां सें। केयीबार मुझे लगता जैसे मे उसकी बैचैनि कों उसकी अकुलाहट कों महसूस कर सकता हूं मगर वोँ सिर्फ़ एक् अंदाज़ा होता। मे यकीन सें कुछ नहींकह सकता थां। कोईऐसा मार्ग नहीं थां जिससे एक् इशारा भर हि मिल जाता कि वोँ केसे महसूस करती हैं.
उसके चुंबन नें उसकीकुछ भावनाओ सें बग़ावत अवश्य कि थि मगर उनकाउस सभी सें कोई वास्ता नहीं थां जौ मे जानना चाहता थां। अवश्य उसे निराशा हुई थि जब मे उसकासंग देने केँ लिएवहा नहीं थां मगर वोँ प्रभाव एक् मनोवैग्यानिक थां। उसे मेरासंग अच्छा लगता थां इसलिये उसका उदास होना संभव थां जब उसका बेटा उसे कंपनी देने केँ लिएवहा मोजूद नहीं थां। मे उसे किसी औऱ वेजह सें उदास देख्ना चाहता थां। चाहे एक् अलग तरीके सें हि सहीमगर मे एक् ज़रूरत पूरीकर रहा थां, एक् बेटे कि तेरह नहीं बल्कि एक् मर्द कि तरह। मे वोँ जानना चाहता थां। मे महसूस करना चाहता थां कि जिस्मानी ज़रूरत पूरी करने कि संभावना हमारे बीच मोजूद थि, चाहे वोँ सिर्फ़ एक् संभावना होती औऱ हम् उस पर्र कभीअमल नां करते।
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