MAA MERI UMMID - माँ बेटा – New Episode
अब अचानक सें मैने महसूस किया कि मेरेपास एक् मौका हैं कम सें कमयहपता करने कां मे कितने पानी मे हूं। अगर मे चुंबन कों अपनीतरफ सें किसीतरह कोईअलग रूपदे सकूँ, उसे एक् इशारा भरकर सकूँ, उसे एक् अलग एहसास करा सकूँ, उस चिंगारी कों जौ उसके अंदरदहक रही थि हवा देकर एक् मर्द कि तरह भड़का सकूँ नां कि एक् बेटे कि तरहतब शायद मे किसी संभावना कां पतालगा सकूँगा।
उसरात मे बहोत बहोत देर तक सोचता रहा, औऱ एक् योजना बनाने लगा कि किसतरह मे हमारी रात्रि केँ चुंबनो मे कुछ बदलाव कर उनमेकुछ एहसास डाल सकूँ.
जब मे नतीजे केँ बारे मे अलगअलग दिशाओं सें सोचा तौ उत्तेजना सें मेरा जिस्म काँपने लगा। एक् तरफयहा मे येसोच कर बहोत उत्तेजित होँ रहा थां कि अगर मैने अपनी योजना अनुसार काम किया तौ उसका नतीजा क्याँ होगा। वहीं दूसरी ओर मुझे अपनी योजना केँ विपरीत नतीजे सें भय भि महसूस हौ रहा थां। उसकी प्रतिक्रिया याँ तोँ सकारात्मक होँ सकती थि, जिसमे वोँ कुछएसी प्रतिक्रिया देती जोँ इसआग कों औऱ भड़का देती, याँ फिन उसकी प्रतिक्रिया नकारात्मक होती जिससे उस संभावना केँ सब दरवाज़ा हमेशा हमेशा केँ लिएबंद होँ जाते जौ संभावना असलियत मे कभी मोजूद हि नहीं थि.
अब योजना बहोत हि साधारण सि थि। मे उसकी सूक्ष्म प्रतिक्रिया कों एक् इशारा मानकर चलरहा थां औऱ इसकेसंग अपने तरीके सें एक् प्रयोग करके देख्ना चाहता थां। चाहेये कुछ बेवकूफ़काना अवश्य लग सकता थां मगर मेरी योजना सें मुझे वोँ सुईमिल सकती थि जोँ मे उसघास फूस केँ भारीढेर सें ढूँढरहा थां
जैसा कि मे पहले हि कह चुका हूं हमारे रात्रि विदा केँ चुंबन हमेशा सूखे, हल्के सें औऱ नमालूम होने वाले होंठो कां होंठो सें स्पर्श सिर्फ होते थें। अगर--मे स्वयं सें दोहराता जारहा थां----अगर वोँ इतने सूखे नाँ रहें तोँ? मे अपने होंठ उसके होंठो पऱ दबा तौ नहीं सकता थां क्योंकि वोँ मर्यादा केँ खिलाफ होतामगर अगर मेरे होंठ सूखे नां रहें तोँ? अगर उसको होंठो पर्र मुखरस कां एहसास होगा तौ? तब उसकी प्रतिकिरया क्याँ होगी? क्याँ वोँ इसका ज्वाब देगी?!
जितना अधिक मे अपनी योजना कों व्यावहारिक रूप देने केँ बारे मे सोचता रहा उतना हि अधिक मे आंदोलित होता गय़ा। मेरी हालतएसी थि कि उसरात मे सो भि नाँ सका, बस उससे पॉज़िटिव रियेक्शन मिलने केँ बारे मे सोचता रहा.
अगलीरात मे प्लान केँ मुताबिक टेलीविज़न केँ आगे थां। वोँ आई, जैसी मे उम्मीद लगाए बैठा थां कि वोँ आएगी औऱ मुझेवहा मोजूद देखकर शायद थोड़ी एग्ज़ाइटेड होगी.मगर वोँ चेहरे सें कुछ भि एग्ज़ाइट्मेंट याँ खुशी दिखा नहींरही थि, इससे मुझे निराशा हुईँ औऱ अपनी योजना कों लेकर मे फिन सें सोचने लगा कि मुझे वोँ करना चाहिए याँ नहींमगर उदास होने केँ बावजूद मैने प्लान कों अमल मे लाने कां फ़ैसला किया। हमेशा कि तरह हम् कुछ टाइम तक टेलीविज़न देखते रहे, अंत मे वोँ बोलि, "मुझे सोना चाहिए बेटा! रात बहोत होँ गयीँ, हैं"
" ओके" मैने जबाब दिया औऱ अपने सूखे होंठो पर्र जल्द सें जीभ फेरी।
वोँ मेरीओर नहींदेख रही थि जब मैने अपने होंठो पर्र जीभ फेरी। मैनेफिन सें चार पाँचवार ऐसे हि किया ताकि होंठ अच्छे सें गीले हौ जाएँ। मे होंठो सें लार नहीं टपकाना चाहता थां मगर उन्हे इतना गीलाकर लेना चाहता थां कि वोँ उस गीलेपन कों, मेरेरस कों महसूस करसके। उसकेबाद मैने स्वयं कों उसकी प्रतिक्रिया केँ लिए सजधजकर कर लिया.
मेरादिल बड़े ज़ोरों सें धड़कने लगाजब वोँ मेरे सोफे कि ओरआई। मे थोडा सां आगे जौ झुक गय़ा ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने मे आसानी हौ सके। मे स्वयं कों संयत करने केँ लिएमुख सें साँस लेनेलगा जिसके फलसरूप मेरे होंठकुछ सूखगये। मैने जल्द जल्दजीभ निकाल होंठो पऱ फेरी ताक़ि उन्हे फिन सें गीलाकर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन सें पहले, मुझे नहीं मालूम उसने मुझेऐसा करतेदेख लिया थां याँ नहीं।
जब मम्मी केँ होंठ मेरे होंठो सें छुए तौ मेरीआँख बंद हौ गयीँ,। मेरा चेहरा आवेश मे जलतेहुए लाल हौ गय़ा थां। मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मे नहीं चाहता थां कि मेरी भारी होँ चुकी साँस उसके चेहरे पऱ इतने ज़ोर सें टकराए.
होंठो केँ गीले होने सें चुंबन कि सनसनाहट बढ़ गई, थि। ये वोँ पहले वालाआम सां, करीब नां मालूम चलने वाला होंठो कां स्पर्श नहीं थां। आज मे हमारे होंठो केँ स्पर्श कों भली भाँति महसूस कर सकता थां, औऱ मुझे यकीन थां उसने भि इसे महसूस किया थां.
वोँ धीरे-धीरे सें 'गुडनाइट' फुसफुसाई औऱ अपनेरूम मे जाने केँ लिएमूड गई,। उसकीओर सें कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नहींआई थि हालाँकि मुझे यकीन थां वोँ अपने होंठो पर्र मेरा मुखरस लेकर गई, थि। कुछ भि ऐसा असाधारण नहीं थां जिस पर्र मे उंगली रख सकता.ऐसा लगता थां जैसे हमारा वोँ चुंबन उसकेलिए बाकी दिनो जैसा हि आम चुंबन थां। कुछ भि फरक नहीं थां। मे उसेअलग बनाना चाहता थां, औऱ उम्मीद लगाए बैठा थां कि उसका ध्यान उस अंतर कि ओर जाएगा मगर नहींऐसा कुछ भि नहींहुआ। अब उदास होने कि बारी मेरी थि। जितना मे पहले आवेशित थां अब उतना हि हताश होँ गय़ा थां.
मैने किसी सकरात्मक याँ नकारात्मक प्रतिक्रिया कि आशा कि थि। अपनेबेड पे लेटाहुआ मे उसरात बहोत थकाहुआ, जज़्बाती तौर पऱ उदास औऱ हताश थां। मे किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया कों आसानी सें स्वीकार कर लेतामगर कोई भि प्रतिक्रिया नाँ मिलने कि स्थिति केँ लिए मे बिल्कुल भि रेडी नहीं थां। उसरात जब मे नींद केँ लिएबेड पर्र करवटें बदलरहा थां, तौ मेरा ध्यान अपने लन्ड पर्र गय़ा जौ मेरेजोश सें थोडा आकड़ा हुया थां इसके बावजूद कि बाद मे मुझे निराशा हाथलगी थि।
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मेरी निराशा अगलेदिन भि मेरेसंग रही। निराशा केँ संगसंग आत्मग्लानी औऱ शरम कां एहसास हौ रहा थां। जोँ मैने किया थां वोँ समाज, कुदरत, मान मरियादा केँ खिलाफ थां इसलिये मेरेमन मे ऐसा करने केँ लिए पछतावे कां एहसास भि हौ रहा थां। अगलीरात जब हमारे ड्रॉयिंग रूम मे टेलीविज़न देखने कां वक्त होँ गय़ा तोँ मे करीब-करीब नहीं जाने वाला थां। मे शायद अपने कमरे मे हि रुकता मगरयह बात कि मेरे नजानें सें वोँ मेरेरूम मे आँ सकती हैं मैने टेलीविज़न रूम जाने मे हि भलाई समझी.अब मैने जौ धुन बनाई थि, उसका सामना करने कां वक्त थां.
उसके बर्ताव मे कोई भि बदलाव दिखाई नहींदे रहा थां जौ शायद एक् अच्छी बात थि। उसकीकोई भि प्रतिक्रिया नाँ देख मुझे बड़ी राहत हुई थि नाकी पिछली रात कि तरहजब उसकीकोई भि प्रतिक्रिया नाँ देख मे उदास हौ गय़ा थां। मुझे एहसास हुआ कि हमारी दिनचर्या मे किसी तब्दीली केँ लिए मे अभि सजधजकर नहीं थां। मैने अचानक महसूस किया कि रात कों मम्मी केँ संग इकट्ठे वक्त बिताने सें मुझे भि खुशी मिलती हैं। इससंग सें मां केँ द्वारा मेरी भि एक् ज़रूरत पूरी होती थि चाहे मनोवैग्यानिक तौर पऱ हि सही.
मैने हमारे चुंबन मे थोडा सां बदलाव कर उनको थोडा ठोस बनाने कि कोशिश कि थि औऱ मे ऐसा बिनाकोई संकेत दिए याँ बिनाकुछ जताए करने मे सफलरहा थां। मेरीशरम औऱ आत्मग्लानि धीरे-धीरे धीरे-धीरे इस राहत सें गायब होनेलगी कि मे बिनाकोई कीमत चुकाए याँ बिनाकोई सज़ापाए सॉफबच निकला थां.
हालाँकि मेरे वार्ताव मे तब्दीली आँ गई, थि। मेरा उसको देखने कां नज़रिया बदल गय़ा थां। उसे देखते हुए मुझेअब उतनी बैचैनि महसूस नहीं होँ रही थि। मैने एक् कदम औऱ आगे बढ़ा दिया थां औऱ उसने मुझे नां कोसा थां थां नां हि कोई आपत्ति जताई थि। उसरात मां कों निहारने मे मुझे एक् अलग हि खुशी प्राप्त होँ रहा थां। येबात जुदा थि कि मे यकीन सें नहींकह सकता थां कि जोँ कुछहुआ थां उसे उसकीकोई भनक भि लगी थि.
फिन सें वहीसभी कुछ, हम् बैठे टेलीविज़न देखरहे थें, उसनेकहा "बेटा! मे चलती हूं, रात बहोत हौ गयीँ, हैं"। इसवार मैने अपने होंठ गीले नहींकिए। चाहे मुझेकोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली थि फिन भि मैनेरात कां तजुर्बा दोहराने कि हिम्मत नहीं कि। मे आगे कों होकर थोडा सां झुक गय़ा औऱ उसके चूमने कां प्रतीक्षा करनेलगा ताकि मे भि अपनेरूम मे जा सकूँ औऱ उस सुखद मीठे एहसास मे स्वयं कों डुबो सकूँ जिसकी लहरें मेरे शरीर मे घूमरही थि.
उसके होंठ रोजाना कि तरह मेरे होंठो सें छुए जिसमे मेरे महसूस करने केँ लिएकुछ भि ख़ास नहीं थां.
मगर मैनेकुछ महसूस किया, कुछ हल्का सां, अलग सां.
ये बिल्कुल हल्का सां थां, करीब नां महसूस होने वाला। मेरे दिलो दिमाग़ मे कोई संदेह नहीं थां कि मैने उसके होंठो कों हल्के सें, बिल्कुल हल्के सें सिकुड़ते महसूस किया थां। जैसे हमारे होंठ किसी केँ गाल पऱ चुंबन लेतेहुए सिकुड़ते हें ठीक वैसे हि मगर बहोत महीन सें। यह मेरी मम्मी कां होंठो सें होंठो कां स्पर्श नहीं थां बल्कि एक् चुंबन थां। ये पहलीबार थां जब मां केँ होंठो नें मेरे होंठो पर्र कोई हलचल कि थि। आम हालातों मे, मे इसे उसके होंठो कां असमय सिकुड़ना मानकर रद्दकर देतामगर यह कुदरती तौर पऱ होने कि वजाय स्वैच्छिक ज्यादा लगरहा थां। एक् हल्का चुंबन होने केँ अलावा एक् हल्का सां, महीन सां दबाब भि थां जौ उसके होंठो नें मेरे होंठो पर्र लगाया थां.
अगलेदिन भर मे बहोत परेशान रहा। मे बसयही सोचेजा रहा थां कि ये वास्तव मे हुआ थां याँ येसभी मेरी कल्पना कि उपज थि क्योंकि मे पहले सें कुछ अच्छा होने कि उम्मीद लगाए बैठा थां। क्याँ वोँ भि मेरीतरह हमारे चुंबन कों औऱ अधिक गहरा बनाना चाहती थि याँ फिन इसकेउलट वोँ चुंबन कों औऱ गहरा होने सें रोकने कि महज कोशिश कररही थि जैसे मेरे होंठो केँ गीलेपान नें जोँ एहसास हमारे चुंबन मे भरा थां वोँ उसको रोकना चाहती होगी जिससे होंठो कों सिकोड़ने सें वोँ शायद पक्का कररही थि कि उसके होंठो कां कम सें कम हिस्सा मेरे होंठो कों छुए.
अपनी जिग्यासा शांत करने केँ लिए ज़रूरी थां कि मे इसे एक् बारफिन सें महसूस करता। मुझे उसकेसंग कलरात जैसी स्थिति मे होना थां औऱ इसबार मे हमारे शुभ रात्रि चुंबन कि हर तफ़सील पऱ पूरा ध्यान देने वाला थां। मे इसबात पर्र भि तर्क वितर्क कररहा थां कि मुझे अपने होंठ गीले करने चाहिए याँ नहींमगर इससे हालातों मे बदलाव होँ जाता। मुझेकल हि कि तरहआज भि अपने होंठ सूखे रखने थें औऱ फिन देख्ना थां कि उसके होंठ क्याँ कमाल दिखाते हें!
वोँ साम औऱ रात शुरुआत होने कां टाइम औऱ भि बैचैनि भरा थां, मगर उतना बैचैनि भरा नहीं थां जितना जब हम् टेलीविज़न देखरहे थें, तब थां जब मे अपने शुभरात्रि चुंबन कां प्रतीक्षा कररहा थां औऱ टाइमलग रह थां जैसेथम गय़ा होँ। वोँ प्रतीक्षा बहोत कष्टदाई थां.
मगरअंत मे उसके जाने कां वक्त हौ गय़ा औऱ हमारे रात्रि विदा केँ उस चुंबन कां भि.
मे हमेशा कि तरहआगे कों झुक गय़ा। मैने अपनी आँखेबंद करलीं ताकि मे अपना पूरा ध्यान उस चुंबन पर्र केंद्रित कर सकूँ.
मैने उसके होंठ अपने होंठो पऱ महसूस किए.
मगर मैने उसके होंठो कां कोई भि दबाब अपने होंठो पऱ महसूस नहीं किया जैसा मैने पिछली रात महसूस किया थां। उसने अपने होंठ भि नहीं सिकोडे जैसे उसने पिछली दफ़ा किया थां.
मगरफिन भि कुछअलग थां, कुछ अंतर थां। मेराउपर कां होंठ उसकेबंद होंठो कि गहराई मे आसानी सें फिसल गय़ा.
जाहिर थां इसबार उसने अपने होंठ गीलेकिए थें.
अबये सिर्फ एक् संजोग थां याँ फिन उसने जानबूझकर उन्हे गीला किया थां, मे कुछ नहींकह सकता थां क्योंकि मैनेउसे अपने होंठ गीले करते नहीं देखा थां। मैने उनका गीलापन तभी महसूस किया थां जब उसने मेरे होंठछुए थें। मे येमान कर नहींचल सकता थां कि उसनेऐसा जानबूझकर किया थां, चाहे उसनेऐसा जानबूझकर किया होँ तोँ भि। मगर एक् बाततय थि; अगर उसने उन्हे जानबूझकर गीला किया थां तोँ इसका मतलब वोँ भि हमारे रात्रि चुंबन कों औऱ ठोस बनाना चाहती थि, उसमे औऱ ज़यादा गहराई चाहती थि, ठीक वैसे हि जैसे मैने कोशिश कि थि हमारे चुंबन कों औऱ गहरा बनाने कि, उसमे औऱ एहसास जगाने कि.
मे उसके होंठो कि नमी अपने होंठो पर्र महसूस कर सकता थां बल्कि जबबाद मे मैने अपने होंठ चाटे तोँ उसका स्वाद भि लें सकता थां। मे सोचरहा थां कि क्याँ उसने भि मेरे होंठो कां गीलापन ऐसे हि महसूस किया थां औऱ क्याँ उसने भि उसका स्वाद चखा थां जैसे मैने उसकाचखा थां। क्याँ उसको भि मेरा मुखरस मीठालगा थां जैसे उसका मुखरस मुझे मीठालगा थां। मे उसके जाने केँ काफ़ी वक़्त बाद तक अपने होंठो कों चाटता रहा ताकि चुंबन कां वोँ स्वाद औऱ सनसनाहट बनीरहे.
मेरी मां नें मुझे शुभरात्रि केँ लिए नहीं चूमा थां। मेरी मां नें मुझे असलियत मे चूमा थां चाहे बहोत हल्के सें हि सही। चाहे वोँ जानबूझकर किया थां चाहे वोँ सिरफ़ एक् संजोग थां, मेरी जाँघो केँ बीच पत्थर कि तरह कठोर लन्ड कों उस अंतर कां पता नहीं थां। उसरात मुझे नींद बहोत देरबाद आई क्योंकि मुझे बुरीतरह आकड़े लन्ड केँ संग सोना पड़ा थां
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मम्मी कैसी दिखती हैं, मे इसमे ख़ासी दिलचस्पी लेनेलगा। मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके जिस्म कां मुआईना करनेलगी जैसे वोँ मुझे खूबसूरत नज़रआने वाली किसी खूबसूरत लड़की क्याँ करती। मुझे मां कों, उसके जिस्म औऱ उसके शरीर कि विशेषताओ कां इसतरह चोरी चोरी अवलोकन करने मे बहोत खुशीआने लगा। वोँ मुझेहर दिन ज्यादा, औऱ ज्यादा हसीन दिखने लगी औऱ मे भि स्वयं कों अक्सर उत्तेजित होते महसूस करनेलगा.
मम्मी कि तरफ सें भि कुछ बदलाव देखने कों मिलरहा थां। मैने महसूस किया कि वोँ अब ज्यादा हँसमुख हौ गयीँ, थि। वोँ पहले कि अपेक्षा ज्यादा मुस्कराती थि, उसकीचाल मे कुछ अधिकलचक आँ गई, थि, औऱ तौ औऱ मैनेउसे कयिबार कुछ गुनगुनाते भि सुना थां। उसके स्वभाव मे हमारी 'उस मज़े कि रात' केँ बाद निश्चित तौर पऱ बदलाव आँ गय़ा थां। चाहे उसनेउस रात मुझेदूर हटा दिया थां औऱ जोँ कुछ हमारे बीच होँ रहा थां उसेरोक दिया थां इसके बावजूद हमारे बीच घनिष्टता पहले केँ मुक़ाबले बढ़ गई, थि। हम् एक् दूसरे केँ नज़दीक आँ गये थें- अध्यात्मिक दृष्टिसे भि औऱ शारीरिक दृष्टि सें भि।
वोँ मुझे अच्छी लगनेलगी थि औऱ मैनेउसे एक् दो मौकों पर्र बोला भि थां कि वोँ बहोत अच्छी लगरही हैं। उसने भि दोतीन बार मेरी प्रशंसा कि थि, मतलब एक् तरह सें मुझे विश्वास दिलाया थां कि हमारे बीच जोँ कुछ भि होँ रहा थां वोँ दोनो औऱ सें थां नाँ कि सिर्फ़ मेरी औऱ सें। कम सें कम मेरीसोच अनुसार तोँ ऐसा हि थां, मे पूरादिन मम्मी केँ ख़यालों मे हि गुम रहनेलगा थां। एक् दिन उमंग मे मैने उसकेलिए चॉक्लेट्स भि खरीदे.
मैने उसके मम्मे देखने केँ हर मौके कां फ़ायदा उठाया। उसके मम्मे इतने बढ़िया, इतने बड़े-बड़े औऱ इतने खूबसूरत थें कि मेरामन उनकी प्रशंसा सें भर उठता। हौ सकता हैं इसबात कां तालुक्क इसबात सें हौ कि कभीउन पर्र मेराहक़ थां मगर वोँ थें बहोत खूबसूरत। मे नहीं जानता उसका ध्यान मेरी नज़र पऱ गय़ा कि नहींमगर अगर उसने ध्यान दिया थां तौ उसने मेरी तान्क झाँक कों स्वीकार कर लिया थां औऱ इसकीआदि होँ गयीँ, थि.
मेरा ध्यान उसकीपीठ पऱ भि गय़ा जब भि वोँ मुझसे विपरीत दिशा कि ओरमुख किए होती। उसकीपीठ बहोत हि हसीन थि। उसकीगंद कां आकर बहोत दिलकश थां, उभरी हुइ औऱ गोल मटोल, बहोत हि मादक थि। औऱ उसेउस मादक गान्ड कां इस्तेमाल करना भि खूबआता थां। उसकीचाल मे एसी कामुक सि लचक थि कि मे अक्सर उससे सम्मोहित हौ जाता थां.
एक् दिन मुझे देखने कां अच्छा मौका मिला, मेरा मतलब पूरीतरह खुलकर उसका चेहरा देखने कां मौका। वोँ कुछकर रही थि औऱ उसकी आँखे कहीं औऱ ज़मीन हुई थीं, इस तरह सें कि वोँ मुझे अपनीओर घूरते नहींदेख सकती थि। मैने उसका चेहरा, उसकेगाल, उसके होंठ औऱ उसकी तोढी देखी औऱ मेरामन उसकी सुंदरता सें मोहित हौ उठा। मैने ध्यान दिया कि मां केँ होंठ बड़ी हुस्न सें गढ़ेहुए थें जौ अपने आप् मे बहोत मादक थें। उन्हे देखकर चूमने कां मन होता थां। इनसे हमारे चुंबनो कों लेकर मेरी भावनाएँ औऱ भि प्राघड़ हौ गयीँ, थींजब मेरेदिल मे ये ख़याल आया कि हमारे रात्रि चुंबनो केँ वक्तयही वोँ होंठ थें जिन्हे मेरे होंठो नें स्पर्श किया थां। वोँ यादआते हि मुँह मे पानी आँ गय़ा.
मैनेइस बात पऱ भि ध्यान दिया कि वोँ बहोत प्यारी, बहोत आकर्षक हैं। वोँ अक्सर कुछ नं कुछऐसा करती थि कि मे अभिभूत होँ उठता। रसोई मे कुछ ग़लत होँ जाने पर्र जिसतरह वोँ मुँह फुलाती थि, जबकभी किसीकाम मे व्यस्त होने पऱ मोबाइल कि घंटी बजती थि औऱ उसकी थयोरियाँ चढ़ जातीथीं, जब वोँ बगीचे मे किसीफूल कों देखकर मुस्कराती थि। मुझे उसमे एक् बहोत हि प्यारी औऱ बहोत हि खूबसूरत नारी नज़रआने लगी थि.
जितना ज्यादा मेरी उसमे दिलचपसी बढ़ती गयीँ, उतना हि अधिक मे उसके प्यार मे पागल होता गय़ा। 'पागल'यही वोँ लगेज हैं जोँ मे समझता हूं मेरी हालत कों सही बयानकर सकता हैं। मगर मे नहीं जानता थां कि उसकी भावनाएँ कैसी थि जा वोँ क्याँ महसूस करती थि.
ये जैसे अवश्यंभावी थां कि मेरे पिता कों फिन सें शहर सें बाहर् जानां थां औऱ लगता थां जैसे वोँ इसी मौके कां इंतेज़ार कररही थि। इसबार स्वयं उसने हमारे रात कों देखने केँ लिए फिल्म खरीदी थि औऱ मे उस फिल्म कों उसकेसंग देखने केँ लिए सहमत थां। हम् नें रात केँ खाने कों बाहर् केँ एक् रेस्तराँ सें मँगवाया औऱ दोनो नें एकसाथ उस खाने कां बहोत मजा लिया। हम् दोनो नें सोफे पर्र बैठकर फिल्म देखी, जिसमे मे सोफे कि एक् तरफ बैठा हुया थां औऱ वोँ दूसरी तरफ। फिल्म ख़तम होने केँ बाद हम् नें टेलीविज़न पऱ थोडा टाइमकुछ औऱ देखा, अंत मे हम् टेलीविज़न देखदेख करथकगये। अपनेरूम मे जाने कि हमेकोई जल्दबाज़ी नहीं थि औऱ नाँ हि सुभरात्रि कहने कि कोई जल्दबाज़ी थि। हम् तभीउठे जब औऱ बैठना मुश्किल हौ गय़ा थां औऱ हमे उठना हि थां।
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