Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन completee - desi kamuk - Complete Kahani Part 1
साहस रोमांच औऱ उत्तेजना केँ वोँ दिन!
जिंदगी कि भूलभुलैया मे कुछऐसे लम्हे आते हें।
जिन कों हम् कितना हि चाहें फिन भि न् कभीभूल पाते हें।।
जब मानिनियोँ कां मन लाखों मिन्नत मन्नत नहि मानता हैं।
तबकभी कभीकोई बिरला रखजान हथेली ठानता हैं।।
कमसिन कातिल कामिनियाँ भि होती कुर्बां कुर्बानी पर्र।
न्यौछावर कर देती वो सभीकुछ ऐसी वीरल जवानी पर्र।
राहों मे मिले चलते चलते हमराही हमारे आज हें वो।
जिनको नाँ कभी देखा भि थां देखो हम् खाटआज हें वो।।
वो क्याँ दिन थें! आज भि उन दिनोंकी यादआते हि रोंगटे खड़े होँ जाते हें। वो सुंदर वादियां, वो दिलचश्प नज़ारे, वो जिंदगी औऱ मौत कि टक्कर, वो तनावभरे दिन औऱ रातें, वो उन्मादक बाहें, वो टेढ़ी निगाहें, वो गरम आहें, वो दुर्गम राहें औऱ वो जिस्म सें जिस्म केँ मिलन कि चाहें!!
ये किस्सा केवल मनोरंजन केँ आशय सें लिखी गई, हैं। इनका किसी जीवित याँ मृत शख्स सें कुछ भि लेना देना नहि हैं औऱ ये स्टोरी किसी भि सरकारी याँ गैर सरकारी संस्थान याँ समाज कि नाँ तौ सच्चाई दर्शाता हैं औऱ नां हि ये किस्सा उन पऱ कोई समीक्षा याँ टिपण्णी करने केँ आशय सें लिखी गयीँ, हैं।
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सुनील एक् सम्मानित औऱ देश विदेश मे बहुत प्रसिद्ध राजकीय पत्रकार थें। देश कि राजकीय घटना पऱ उनकी अच्छी खासी पकड़ मानी जाती थि। वो ख़ासतौर पर्र देश कि सुरक्षा सम्बंधित घटनाओं पर्र लेख लिखते थें। देश कि सुरक्षा सेवाओं सें जुड़े हुए लोगो मे उनका बहुत उठना बैठना होता थां।
उन दिनों सुनील लगभग४० साल केँ थें औऱ उनकी पत्नि सुनीता लगभग३५ कि होगी। सुनील औऱ उनकी पत्नि सुनीता उनकी एक् संतान केँ संग एक् आर्मी हाउसिंग कॉलोनी मे किराए केँ घर-मकान मे रहने केँ लिएआये थें। उनका अपनाघऱ नजदीक कि हि कॉलोनी मे हि निर्माणरत थां।
सुनील कि बीबी सुनीता लगभग३५ कि होतेहुए भि २५साल कि हि दिखती थि। खानपान पर्र कडा नियत्रण औऱ नियमित व्यायाम औऱ योग केँ कारण उसने अपना आकार एकदम चुस्त रखा थां। सुनीता कां चेहरा वयस्क लगता हि नहि थां। उसके मम्मों परिपक्व होतेहुए भि तने औऱ कसेहुए थें। उसके बूब्ज़ ३४ + औऱ मम्मों सि कप साइज केँ थें।
बर्ताव औऱ विचार मे आधुनिक होतेहुए भि सुनीता केँ मन पर्र कौटुम्बिक परम्परा कां बहुत प्रभाव थां। कईबार जब ख़ास प्रसंग पर्र वो राजस्थानी लिबास मे सुसज्जित होकर निकलती थि तौ उसकी जवानी औऱ रूपदेख करकईदिल टूट जाते थें। राजस्थानी चुनरी, चोली औऱ घाघरे मे वो ऐसे जँचती थि कि दूसरों कि तोँ बात हि क्याँ, स्त्रियां भि सुनीता कों ताकने सें बाज नाँ आतीथीं। सुनीता कों ऐसे सजने पर्र कई मर्दों कि मर्दानगी फूल जाती थि औऱ कईयों कि तोँ बहने भि लग जाती थि।
सुनीता केँ खानदान राजपूती परम्परा सें प्रभावित थां। कहते हें कि हल्दीघाटी कि लड़ाई मे सुनीता केँ दादाजी पऱ दादाजी हँसते हँसते लड़ते हुए शहीद होँ गए थें। सुनीता केँ पिता भि कुछऐसी हि भावना रखते थें औऱ अपनी बेटी कों कईबार राजपूती शान कि कहानियां सुनाते थें। उनका कहना थां कि असली राजपूत एहसान करने वाले पऱ अपनातन औऱ मन कुर्बान कर देता हैं, पऱ अपने शत्रु कों वो बख्शता नहि हैं। उन्होंने दो बड़ी लड़ाइयां लड़ी औऱ घायल भि हुए। पर्र उन्हें एक् अफ़सोस रहा कि वो रिटायर होने सें पहले अपनीजान कोई भि लड़ाई मे देश केँ लिए बलिदान नहि करपाए।
सुनीता कि कमर कां घुमाव औऱ उसकी गाँड़ इतनी चुस्त औऱ लचीली थि कि चाहेकोई भि पोशाक क्यूं नां पहनी होँ वो गजब कि सेक्सी लगती थि। उस कॉलोनी केँ ब्लॉक मे उनकेआते हि सुनील कि बीबी सुनीता केँ आशिकों कि जैसे झड़ीलग गई, थि। दूध वाले सें लेकर अखबार वाला। सब्जी वाले सें लेकर हमारी कॉलोनी केँ जवान बूढ़े बच्चे सभी उसके दीवाने थें।
विद्यालय औऱ कॉलेज मे सुनीता एक् अच्छी खासी खिलाड़ी थि। वो लम्बी कूद, दौड़ इत्यादि खेल प्रतियोगिता मे अव्वल रहती थि। इसके कारण उसका शरीर गठीला औऱ चुस्त थां। उन दिनों भि वो हर सुभह चड्डी पहनकर उनकीछत पऱ व्यायाम करती रहती थि। जब वो व्यायाम करती थि तौ कईबार उनके सामने रहते एक् आर्मी अफसर कर्नल जसवंत सिंह कों सुनीता कों चोरी चोरी ताकते हुए सुनीता केँ पति सुनील नें देख लिया थां। फिरभी सुनील कों कर्नल जसवंत सिंह सें मिलने कां मौक़ा नहि मिला थां, सुनील नें कर्नल साहब कि तस्वीर अखबारों मे देखि थि औऱ उन केँ बारेमें बहुत पढ़ा थां। कर्नल जसवंत सिंह जैसे सुप्रतिष्ठित औऱ सम्मानित आदमी कों अपनी बीबी कों ताकते हुएदेख कर सुनील मन हि मन मुस्करा देता थां। कर्नल साहब केँ घऱ कि एक् खिड़की सें सुनील केँ घऱ कि छत साफ़ दिखती थि।
चूँकि मर्दलोग हमेशा सुनीता कों घूरते रहते थें तोँ सुनील हमेशा अपनी बीबी सुनीता सें चुटकी लेता रहता थां। उसे छेड़ता रहता थां कि कहीं वो किसीछैल छबीले केँ चक्कर मे फँस नाँ जाये।
सुनीता भि अपने पति सुनील कों येकहकर शरारत सें हँसकर उलाहना देती रहती कि, "अरे डार्लिंग अगर तुम्हें ऐसा लगता हैं कि दूसरे लोग तुम्हारी बीबी सें ताक झाँक करते हें तौ तुम् अपनी बीबी कों याँ ताक झाँक करने वालों कों रोकते क्यूं नहि? यदि कहीं किसीछैल छबीले नें तुम्हारी बीबी कों फाँस लिया तौ फिन तुम् तौ हाथ मलते हि रह जाओगे। फिन मुझेये नां कहना कि अरेये क्याँ होँ गय़ा? जिसकी बीबी हसीन होँ नां, तोँ उस पर्र नजर रखनी चाहिए। "
ऐसे हि उनकी नोंक झोंक चलती रहती थि। सुनील सुनीता कि बातों कों हँसकर टाल देता थां। उसे सुनीता सें कोई शिकायत नहि थि। उसे अपनी बीबी पऱ खुदसे भि ज़्यादा भरोसा थां। सुनील औऱ सुनीता एक् हि कॉलेज मे पढ़े थें। कॉलेज मे भि सुनीता पऱ कई लड़के मरते थें, येबात सुनील भाली भाँती जानता थां। पऱ कभी सुनीता नें उनमें सें किसी कों भि अपने लगभग फटकने नहि दिया थां।
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बल्कि सुनीता सें जब कॉलेज मे हि सुनील कि मुलाक़ात हुइ औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों कि दोस्ती प्रेम मे बदल गई, औऱ विवाह भि पक्की हौ गयीँ, तब भि सुनीता सुनील कों आगे बढ़ने कां कोई मौक़ा नहि देती थि। उनमें चुम्माचाटी तोँ चलती थि पर्र सुनीता सुनील कों वहीँरोक देती थि।
सुनीता एक् प्राथमिक विद्यालय मे अंग्रेजी शिक्षक कि जॉब करती थि। औऱ वहा भि विद्यालय केँ प्रिंसिपल सें लेकरसभी उसके दीवाने थें।
वैसे तोँ सुनील कि प्यारी बीबी सुनीता बहुत शर्मीली थि, पऱ चुदाई केँ टाइमबैड मे एकदम शेरनी कि तरह गर्म हौ जाती थि औऱ जब वो मूड़ मे होती थि तौ गजब कि चुदाई करवाती थि। सुनीता कि पतलीकमर सुनील कि टांगों केँ बिच स्थापित जनाब कों हमेशा टाइमबे टाइम खड़ाकर देती थि। अगर वक़्त होता औऱ मौक़ा मिलता तोँ सुनील सुनीता कों वहीँ पकड़कर चोद देता। पर्र वक्त गुजरते उनकी चुदाई कुछ ठंडी पड़ने लगी क्यूंकि सुनीता विद्यालय मे औऱ घऱ केँ कामों मे व्यस्त रहनेलगी औऱ सुनील उसके व्यावसायिक कामों मे।
सुनील औऱ सुनीता कईबार खाट मे पड़े पड़े उनकी विवाह केँ कुछ सालों तक कि घमासान चुदाई केँ दिनों कों याद करते रहते थें। सोचते थें कुछऐसा हौ जाए कि वो दिनफिन आँ जाएँ। उनकाकई बारमन करता कि वो कहीं थोड़े दिन केँ लिए हि सही, छुट्टी लें औऱ सभी रिश्ते दारी सें दूर कहीं जंगलों मे, पहाड़ियों मे झरनों केँ किनारे कुछदिन गुजारें, जिससे वो उनकी बैटरियां चार्ज कर पाएं औऱ अपनी जवानी केँ दिनों कां आनंदफिन सें उठाने लगें, फिन वही चुदाई करें औऱ खूबमौज मनाएं।
चूँकि दोनों पति पत्नि मिलनसार स्वभाव केँ थें इसलिये सोचते थें कि अगर कहींकोई उनके हि समवयस्क ग्रुप केँ संग मे जाने कां मौक़ा मिले तोँ औऱ भि आनंदआये। सुनीता केँ विद्यालय मे छुट्टियां होने केँ बावजूद सुनील अत्याधिक व्यस्तता केँ चलतेकोई कार्यक्रम बन नहि पारहा थां। सुनीता कों मूवीज औऱ घूमने कां बहुतशौक थां पर्र यहा भि सुनील गुनेहगार हि साबित होता थां। इस केँ कारण सुनीता अपने पति सुनील सें बहुत नाराज रहती थि।
सुनील कों अपनी पत्नि कों खुले मे छेड़ने मे बड़ा आनंदआता थां। अगर वो कहीं बाहर् जाते तोँ सुनील सुनीता कों खुले मे छेड़ने कां मौक़ा नहि चुकता थां। कईबार वो उसे सिनेमा हाल मे याँ फिन रेस्तोरां मे छेड़ता रहता थां। दूसरे लोगजब देखते औऱ आँखे फिरा लेते तोँ उसे बड़ी उत्तेजना होती थि। सुनीता भि कईबार नाराज होती तोँ कईबार उसकासंग देती।
नए घऱ मे आने केँ कुछ हि दिनों मे सुनीता कों लगभग पड़ोस कि सभी महिलाएं भि जानने लगीं क्यूंकि एक् तौ वो एकदमसरल औऱ मधुर स्वभाव कि थि। दूसरे उसे किसी सें भि जान पहचान करने मे वक़्त नहि लगता थां। सब्जी लेतेहुए, आते जाते पड़ोसियों केँ संग वो आसानी सें हेलो, ओह सें शुरुआत करकईबार अच्छी खासी बातें कर लेतीथीं।
घऱ मे सुनील जब अपने कमरे मे बैठकर कंप्यूटर पर्र कुछकाम कररहा होता थां तोँ अक्सर उसे खिड़की मे सें सामने केँ फ्लैट मे रहने वाले कर्नल साहब औऱ उनकी पत्नि दिखाई देते थें। उनकी एक् बेटी थोड़ी बड़ी थि औऱ उनदिनों कॉलेज जाया करती थि।
कर्नल साहब औऱ सुनील कि पहेली बारजान पहचान कुछ अजीबो गरीब तरीके सें हुईँ। एकदिन सुनील कुछ जल्द मे घऱआया तोँ उसने अपनी वाहन कर्नल साहब केँ गेराज केँ सामने खड़ीकर दि थि। शायद सुनील कों जल्द टॉयलेट जानां थां। घऱ मे आने केँ बाद वो भूल गय़ा कि उसे अपनी गाडी हटानी चाहिए थि। अचानक सुनील केँ घऱ केँ दरवाजे कि घंटीबजी। उसने जैसे हि दरवाजा खोला तोँ कर्नल जसवंत सिंह कों बड़े हि गुस्से मे पाया। आते हि वो सुनील कों देखकर गरज पड़े, "श्रीमान, आप् अपनी गाड़ी कों ठीकतरह सें क्यूं नहि पार्क पऱ सकते?"
सुनील नें उनको बड़े सम्मान सें बैठने केँ लिएकहा तोँ बोल पड़े, " मुझे बैठना नहि हैं। आप् कों समझना चाहिए कि कईबार कोई जल्द मे होता हि तोँ कितनी दिक्कत होती हैं."
आगे वो कुछ बोलने वाले हि थें कि सुनील कि पत्नि सुनीता जौ कुछ हि वक़्त पहले बाथरूम सें निकली हि थि, गरमचाय बनाकर किचन सें गरमचाय कां प्याला लेकर ड्राइंगरूम मे दाखिल हुई। सुनीता केँ बालघने, गीले औऱ बिखरे हुए थें औऱ उनको सुनीता नें तौलिये मे ढककर लपेटरखा थां।
ब्लाउज गीला होने केँ कारण सुनीता कि छाती पऱ उसके फुलेहुए मम्मों कुछ ज़्यादा हि उभरेहुए लगरहे थें। सुनीता कां चेहरे कि लालिमा देखते हि बनती थि। सुनीता कों इसहाल मे देखते हि कर्नल साहब कि बोलती बंद होँ गयीँ,। सुनीता नें आगे बढ़कर कर्नल साहब केँ सामने हि झुककर मेज पऱ जैसे हि गरमचाय कां कपरखा तौ सुनील नें देखा कि कर्नल साहब कि आँखें सुनीता केँ वक्षों केँ बिच कां अंतराल देखते हि फ़टी कि फटीरह गयीं।
सुनीता नें गरमचाय कां कप रखकर बड़े हि सम्मान सें कर्नल साहब कों नमस्कार किया औऱ बोलि, "आप् ज्योतिजी केँ हस्बैंड हें नाँ? बहोत अच्छीं हें ज्योतिजी। "
सुनीता कि मीठी आवाज़ सुनते हि कर्नल साहब कि सिट्टीपिट्टी गुम होँ गई,। वो कुछबोल नहि पाएतब सुनीता नें कहा, "सर, आप् कुछकह रहे थें न्?"
जसवंत सिंघजी कां क्रोध सुनीता कि सूरत औऱ शब्दों कों सुनकर हवा हौ गय़ा थां। वो झिझकते हुए बड़बड़ाने लगे, "नहि, कोई ख़ासबात नहि, हमें कहीं जानां थां तौ मे (सुनीलकी औऱ इशारा करतेहुए बोले) श्रीमान सें आपकी गाडी कि चाभी मांगने आया थां। आपकी गाडी थोड़ी हटानी थि। "
सुनीता समझ गयीँ, कि जरूर उसके पति सुनील नें वाहन कों कर्नल साहब कि गाड़ी केँ सामने पार्क कर दिया होगा। वो एकदम सें हँस दि औऱ बोलि, "साहब, मेरे पति कि औऱ सें मे आपसे माफ़ी मांगती हूं। वो हें हि ऐसे। उन्हें अपनेकाम केँ अलावा कुछ दिखता हि नहि। व्यावहारिक वस्तुओं कां तौ उन्हें कुछ ध्यान हि नहि रहता। हड़बड़ाहट मे शायद उन्होंने अपनी गाड़ी आपकी गाड़ी केँ सामने रख दि होगी। आप् प्लीज बैठिये औऱ गरमचाय पीजिये। " फिन सुनीता नें मेरी औऱ घूमकर मुझे उलाहना देतेहुए कहा, "आप् कों ध्यान रखना चाहिए। जाइये औऱ अपनी गाड़ी हटाइये। "
फिन कर्नल साहब कि औऱ मीठीनजर सें देखते हुए बोलि, "क्षमा कीजिये। आगे सें ये ध्यान रखेंगे। पऱ आप् प्लीज गरमचाय पीजिये औऱ (मेज पर्र रखेकुछ नास्ते कि चीजों कि औऱ इशारा करतेहुए बोलि) औऱ कुछ लीजिये नाँ प्लीज?"
सुनील हड़बड़ाहट मे हि उठे औऱ अपनी गाड़ी कि चाभी लें करभाग कर अपनी वाहन हटाने केँ लिए सीढ़ियों कि औऱ निचे उतरने केँ लिए भागे। सुनीता ठीक कर्नल साहब केँ सामने एक् कुर्सी खिसका कर थोडा सां कर्नल साहब कि औऱ झुककर बैठ गयीँ, औऱ उन्हें अपनी औऱ ताकते हुएदेख कर थोड़ी शर्मायी।
शायद सुनीता कहनाचाह रही थि कि "सर आप् क्याँ देखरहे हें?" पर्र झिझकती हुईँ बोलीं, "सर! आप् क्याँ सोचरहे हें? गरमचाय पीजिये नां? ठंडी होँ जायेगी। " सुनीता कों पता नहि थां उसे कर्नल साहब केँ ठीक सामने उसहाल मे बैठाहुआ देखकर कर्नल साहब कितने गर्म होँ रहे थें।
कर्नल साहब कों ध्यान आया कि उनकी नजरें सुनीता केँ बड़े बड़े हसीन बूब्ज़ मंडल केँ बिच वालीखाई सें हटने कां नाम नहि लें रहे थि। सुनीता कां उलाहना सुनकर कर्नल साहब नें अपनीनजर सुनीता केँ ऊपर सें हटायीं औऱ कमरे केँ चारों औऱ देखने लगे। क्याँ बोले वो समझ नहि आया तौ वो थोड़ी सि खिसियानी शक्लबना कर बोले, "सुनीताजी आप् कां घऱ आपने बड़ी हि सुन्दर तरीके सें सजाया हैं। लगता हैं आप् भि ज्योति कि तरह हि सफाई मनपसंद हें। "
कर्नल साहब कि बातसुन कर सुनीता हँस पड़ी औऱ बोलि, "नहि जी, ऐसी कोईबात नहि। बस थोडा घऱठीक ठाक रखना मुझे अच्छा लगता हैं। पऱ भला ज्योतिजी तौ बड़ी हि होनहार हें। उनसे बातें करतें हें तोँ टाइम कहां चल जाता हैं पता हि नहि लगता। हम् जबकल मार्किट मे मिले थें तौ ज्योति जीकहरही थीं। "
औऱ फिन सुनीता कि जबानबे लगाम शुरुआत होँ गयीँ, औऱ कर्नल साहब उसकीहाँ मे हाँ मिलाते बिनारोक टोक किये सुनते हि गए। वो भूलगए कि उनको कहीं जानां थां औऱ उनकी पत्नि निचे गाड़ी केँ पासउन कां प्रतीक्षा कररही थि। जाहिर हैं उनको सुनीता कि बातों मे कोई ख़ास दिलचश्पी नहि थि। पऱ बात करते करते सुनीता केँ हाथों कि मुद्राएँ, बारबार सुनीता कि गालों पऱ लटक जाती जुल्फ कों हटाने कि प्यारी कवायद, आँखों कों मटकाने कां तरिका, सुनीता कि अंगभंगिमा औऱ उसके शरीर कि कामुकता नें उनकामन हर लिया थां।
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जब सुनील अपनी गाड़ी हटाकर वापसआये तोँ कर्नल साहब कि तंद्रा टूटी औऱ सुनीता कि जबान रुकी।
सुनील नें देखा कि सुनीता नें कर्नल साहब कों अपनीचबड चबड मे फाँस लिया थां तौ वो बोले, "अरे जानू, कर्नल साहब जल्द मे हें। उनको कहीं जानां हैं। "
फिन कर्नल साहब कि औऱ मुड़कर सुनील नें कहा, "क्षमा कीजिये। आप् कों मेरीवजह सें तकलीफ़ झेलनी पड़ी। "
अपनी पत्नि सुनीता कि औऱ देखते हुए बोले, "डार्लिंग अबबस भि करो। कर्नल साहब कों बाहर् जानां हैं औऱ ज्योतिजी उनका निचे प्रतीक्षा कर रहीं हैं। "
सुनील कर्नल साहब कि औऱ मुड़कर बोले, "सुनीता जैसे हि कोई उसकी बातों मे थड़ी सि भि दिलचश्पी दिखाता हैं तौ शुरुआत होँ जाती हैं औऱ फिन रुकने कां नाम नहि लेती। लगता हैं उसने आप् कों बहोत बोरकर दिया। "
कर्नल साहबअब एकदमबदल चुके थें। उन्होंने गरमचाय कां कप उठाया औऱ बोले, "नहि जीऐसी कोईबात नहि। वो बड़ी प्यारी बातें करती हें। " सुनील कि औऱ अपना एक् हाथआगे करतेहुए बोले, "मे कर्नल जसवंत सिंह हूं। "
फिन वो सुनीता कि औऱ घूमकर बोले, "औऱ हाँ ज्योति मेरी पत्नि हैं। वो आपकी बड़ी तारीफ़ कररही थि। "
सुनील नें भि अपनाहाथ आगेकर अपना परिचय देतेहुए कहा, "मे सुनील मडगाँव कर हूं। मे एक् साधारण सां पत्रकार हूं। आप् मुझे सुनील कहकर हि बुलाइये। औऱ ये मेरी पत्नि सुनीता हैं, जिनके बारे मे तोँ आप् जान हि चुके हें। " सुनील नें हलके कटाक्ष केँ अंदाज सें कहा।
सुनील नें जैसे हि अपनी पहचान दि तोँ कर्नल साहबउछल पड़े औऱ बोले, "अरे भइया साहब! क्याँ आप् वही श्रीमान सुनील मडगाँव कर हें जिनकी कलम सें हमारी मिनिस्ट्री भि डरती हैं?"
सुनील नें कर्नल साहब कां नाम एक् सुप्रतिष्ठित औऱ अति सम्मानित आर्मी अफसर केँ रूप मे सुनरखा थां। सुनील नें हँसकर कर्नल साहब सें कहा, "कर्नल साहब आप् क्याँ बातकर रहे हें? आप् कोईकम हें क्याँ? मे समझता हूं आप् जैसा शायद हि कोई सम्मानित आर्मी अफसर होगा। आप् हमारे देश केँ गौरव हें। औऱ जहां तक मेरीबात हैं, तौ आप् देखरहे हें। मेरी बीबी मुझे केसे डाँटरही हैं? अरे भइया मेरी बीबी भि मुझसे डरती नहि हैं। मिनिस्ट्री तौ बहोत दूर कि बात हैं। "
सुनील कि बात सुनकर सभीजोर सें हँस पड़े। गरम चाय पीते हि मन नां करतेहुए भि कर्नल साहबउठ खड़ेहुए औऱ बोले, "आप् दोनों, प्लीज हमारे घऱ जरूर आइये। ज्योति कों औऱ मुझे भि बहोत अच्छा लगेगा। "
कर्नल साहब बाहर् सें कठोर पऱ अंदर सें बहुत रसीले औऱ संवेदनशील मिज़ाज केँ थें। येबात कों नकारा नहि जा सकता कि सुनीता कों देखते हि कर्नल साहब उसकी औऱ आकर्षित हुए थें। सुनीता कां व्यक्तित्व थां हि कुछऐसा। उपरसे कर्नल साहब कां रंगीन मिजाज़। सुनीता केँ कमसिन औऱ खूब सूरत जिस्म केँ अलावा उसकी सादगी औऱ मिठास कर्नल साहब केँ दिल कों छू गयीँ, थि। अपने कार्य काल मे उनकीजान पहचान कईअति सुंदर स्त्रियों सें हुई थि। आर्मी अफसर कि पत्नियाँ, बेटियाँ, उनकी रिश्तेदार औऱ कई सामाजिक प्रसंगों मे उनके साथी औऱ साथीदार महिलाओं सें उनकी मुलाक़ात औऱ जान पहचान अक्सर होती थि।
जसवंत सिंह (कर्नल साहब) केँ अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व, सुदृढ़ जिस्म, ऊँचे ओहदे औऱ मीठे स्वभाव केँ कारण उनकोकभी किसी सुन्दर औऱ वांछनीय महिला केँ पीछे पड़ने कि जरुरत नहि पड़ी। अक्सर कईबला कि सुन्दर स्त्रियां पार्टियों मे उनको अपने जिस्म कि आग बुझाने केँ लिए इशारा कर देतीथीं। जसवंत सिंह नें शुरुआत केँ दिनों मे, विवाह सें पहलेकई युवतियों कां कौमार्य भंग किया थां औऱ कईयों कि तन कि भूख शांत कि थि। उनमें सें कई तोँ विवाह होने केँ बाद भि अपने पति सें छुपकर कर्नल साहब सें चुदवाने केँ लिए लालायित रहतीं थीं औऱ मौक़ा मिलने पर्र चुदवाती भि थीं।
कर्नल साहब केँ संग जौ महिला एक् बार सोती थि, उसकेलिए कर्नल साहब कों भुल जानां नामुमकिन सां होता थां। आर्मी परिवार मे औऱ खासकर स्त्रियों मे चोरी छुपीये आम अफवाह थि कि एक् बार किसी स्त्री नें अगर जसवंत सिंह कां साथकर लिया (स्पष्ट भाषा मे कहे तौ अगर किसी महिला कों कर्नल साहब सें चुदवा नें कां मौक़ा मिल गय़ा) तौ वो कर्नल साहब केँ लण्ड केँ बारेमें हि सोचती रहती थि।
चुदवाने कि बात छोड़िये, अगर किसी महिला कों कर्नल साहब सें बात भि करने कां मौक़ा मिलजाए तोँ ऐसाकम हि होता थां कि वो उनकी दीवानी नाँ होँ। कर्नल साहब कि बातें सरल औऱ मीठी होतीथीं। वो महिलाओं केँ प्रति बड़ी हि शालीनता सें पेशआते थें। उनकी बातों मे सरलता, मिठास केँ संगसंग जोश, उमंग औऱ अपनेदेश केँ प्रति मर मिटने कि भावना साफ़ प्रतीत होती थि। संग मे शरारत, मशखरापन औऱ हाजिर जवाबी केँ लिए वो ख़ास जाने जाते थें।
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