Bahan ki ichha -बहन की इच्छा complete - Desi sex story - Complete Kahani Part 1
बेहन कि ख़्वाहिश
"कैसालगा, दिदी?"
"बिल'कुल अच्च्छा!! "
"ऐसासुख पहेले कभी मिला थां तुम्हें?"
"कभी भि नहीं!। कुच्छ अलग हि भावनाएँ थि। पह'लीबार मेनेऐसा अनुभाव किया हैं."
"जीजू नें तुम्हें कभीऐसा खुशी नहीं दिया? मेने किया वैसे उन्होने कभी नहीं किया, दिदी??"
"नहींरे, सागर!। उन्होने कभीऐसे नहीं किया। उन्हे तौ शायदयह बात मालूम भि नहीं होंगी."
"औऱ तुम्हें, दिदी? तुम्हें मालूम थां यह तरीका?"
"मालूम यानी। मेने सुना थां केँ ऐसे भि मूँ'ह सें चूस'कर कामसुख लिया जाता हैं इस दूनीया मे."
"फिन तुम्हें कभीलगा नहीं केँ जीजू कों बता केँ उनसेऐसे करवाए?"
"कभीकभी 'ख़्वाहिश' होती थि। मगर उन'कों यह मनपसंद नहीं आएगायह मालूम थां इस'लिए उन्हे नहींकहा."
"तोँ फिनअब तुम्हारी 'ख़्वाहिश' पूरी होँ गई नां, दिदी?"
"हां ! हां !। पूरी होँ गई। औऱ मे तृप्त भि हौ गई। कहां सीखा तुम्'नें यहसभी? बहोत हि 'छुपे रुस्तमा' निकले तुम्!"
इसीकथा केँ कुछअंश.
007 bro बुरा नहि mano . कुछ टाइम aur दो aapko coment jaroor milenge. free mind hokar update दो yar जैसे mai de raha hoon . he he he he he he he he
Pls wait response come
यार जैसा कि मैने पहले भि कहा हैं धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलकर हि एक् मुकाम मिलता हैं औऱ किसी ग्यानि नें भि कहा हैं लगारह दिल किनारे पऱ कभी तौ लहर आएगी विश्वास करो एक् दिनइस साइट पऱ भि लिखने औऱ कमेंट देने वालों कि कोईकमी नहीं होगी
सहीकहा
Bahan ki ichha -बहन की इच्छा complete - Desi sex story – New Episode
चेतावनी। यह किस्सा समाज केँ नियमो केँ खिलाफ हैं क्योंकि हमारा समाजमा बेटे औऱ भइया बेहन औऱ बाप बेटी केँ रिश्ते कों सबसे पवित्र नाता मानता हैं अतःजिन भाइयो कों इन रिश्तो कि कहानियाँ पढ़ने सें अरुचि होती होँ वो यह किस्सा नाँ पढ़े क्योंकि यहकथा एक् पारवारिक सेक्स कि किस्सा हैं
दोस्तो यह एक् पुरानी किस्सा हैं इसे मैने हिन्दी फ़ॉन्ट मे कॅन्वेर्ट किया हैं उम्मीद करता हूं यहकथा आपको मनपसंद आएगी
कथा किसने लिखी हैं यह तोँ मे नहीं जानता पर्र इसकथा कां क्रेडिट इस स्टोरी केँ रायटर कों जाता हैं
बेहन कि ख़्वाहिश--1
जब मे**** साल कां थां तब सें मेरेमन मे लड़कियो केँ बारे मे लैंगिक आकर्षण चालूहुआ थां। मे हमेशा लड़'कि औऱ सेक्स केँ बारे मे सोचने लगा। 18/19 साल केँ लडके केँ अंदर सेक्स केँ बारे मे जौ जिग्यासा होती हैं औऱ उसे जान'नें केँ लिए वोँ जोँ भि करता हैं वो सभी मे कर'नें लगा। मिसाल केँ तौर पऱ, लड़कियों औऱ औरतों कों चुपके सें निहारना, उनके गदराए अंगो कों देख'नें केँ लिए छटपटाना। उनके पह'नें हुए कपडो केँ अंदर केँ अंतर्वस्त्रों केँ रंग औऱ पैटर्न जान'नें कि कोशिस कर'नाँ। चुपके सें वयस्कों कि फिल्में देख'नां, ब्लू-फिल्म देख'नाँ। अश्लील कहानियाँ पढ़ना वग़ैरा वग़ैरा। धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे संपर्क मे रह'नेवाली औऱ मेरे नज़र मे आनेवाली सब लड़कियों औऱ औरतों केँ बारे मे मेरेमन मे काम लालसा जाग'नें लगी। मे विद्यालय कि मेरे सें बड़ी लड़कियों, चिक'नी औऱ खूबसूरत मेंडम, रास्ते पे जारही लड़कियों औऱ औरतें, हमारे अडोस पडोस मे रहेनेवाली लड़कियों औऱ औरतें इनसभी कि तरफकाम वासना सें देख'नें लगा.यहा तक कि मेरे रिश्तेदारी कि कुच्छ लड़कियों औऱ औरतों कों भि मे काम वासना सें देख'नें लगा थां। एक् बार मेने अप'नी सग़ी बड़ी बेहन कों कपड़े बदलते सम'य ब्रेसीयर औऱ पैंटी मे देखा। जोँ मेने देखा उस'नें मेरेदिल मे घऱकर लिया औऱ मे काफ़ी उत्तेजित भि हुआ। पह'लेँ तोँ मुझेशरम आई केँ अप'नी सग़ी बेहन कों भि मे वासना भरी निगाहा सें देखता हूं। मगरउसे वैसे अधनन्गी अवस्था मे देख'कर मेरे शरीर मे जोँ काम लहरेउठी थि औऱ मे जितना उत्तेजीत हुआ थां वैसा मुझे पह'लेँ कभी महसूस नहींहुआ थां। बाद मे मे अप'नी बाहें कों अलग हि निगाह सें देख'नें लगा। मुझे एक् बार चुदाई कि कहानियो कि एक् हिन्दी कि पुस्तक मिली। उस पुस्तक मे कुच्छ कहा'नियाँ ऐसी थि जिनमें नज़दीकी रिश्तेदारो केँ लैंगिक संबंधो केँ बारे मे लिखा थां। जिनमें भइया-बहेन केँ चुदाइ कि कह'नी भि थि जिसे पढ़ते सम'यबार बार मेरेदिल मे मेरी बहेन, ऊर्मि दिदी कां ख़याल आँ रहा थां औऱ मे बहोत हि उत्तेजीत हुआ थां। वोँ कहा'नियाँ पढके मुझे थोड़ी तसल्ली हुइ कि इसतरह केँ नाजायज़ संबंध इस दुनीया मे हैं औऱ मे हि अकेला ऐसा नहीं हूं जिसके मन मे अप'नी बेहन केँ बारे मे कामवसना हैं। मेरी बहेन, ऊर्मि दिदी, मेरे सें 8 साल बड़ी थि। मे जब 16 साल कां थां तब वोँ 24 साल कि थि। उस'कां एकलौता भइया होने कि वजह सें वो मुझे बहोत प्रेम करती थि। काफ़ी बार वोँ मुझे प्रेम सें अप'नी बाँहों मे भरती थि, मेरेगाल कि पप्पी लेती थि। मे तौ उस कि आँख कां तारा थां। हम् एक् संग खेल'ते थें, हंस'ते थें, मजा कर'ते थें। हम् एक् दूसरे केँ काफ़ी लगभग थें। हम् दोनो भइया-बहेन थें मगर ज़्यादातर हम् दोस्तों जैसे रहते थें। हमारे बीच भइया-बहेन केँ नाते सें अधिक दोस्ती कां रिश्ता थां औऱ हम् एक् दूसरे कों वैसे बोलते भि थें। ऊर्मि दिदी साधारण मिडल-क्लास लड़कियो जैसीमगर आकर्षक चेहरेवाली थि। उस'कि फिगर 'सेक्ष्बम्ब' वग़ैरा नहीं थि मगरसही थि। उस'केँ जिस्म पऱ सही स्थान 'उठान' औऱ 'गहराइया' थि। उस'कां शरीरऐसा थां जोँ मुझे बेहद पागल करता थां औऱ हररोज मुझेमूठ मार'नें केँ लिए मजबूर करता थां। घऱ मे रहतेसम'य उसेपता चले बिनाउसे वासना भरी निगाहा सें निहार'नें कां मौका मुझे हमेशा मिलता थां। उस'केँ संग जोँ मेरे दोस्ताना ताल्लूकात थें जिस'कि वजह सें जब वोँ मुझे बाँहों मे भरती थि तब उस'कि गदराई छाती कां स्पर्श मुझे हमेशा होता थां। हम् कही खड़े होते थें तौ वोँ मुझ सें सट केँ खडी रहती थि, जिस'सें उस'केँ भरेहुए चुत्तऱ औऱ बाकी नज़ूक अंगो कां स्पर्श मुझे होता थां औऱ उस'सें मे उत्तेजीत होता थां। इसतरह सें ऊर्मि दिदी केँ बारे मे मेरा लैंगिक आकर्षण बढत हि जारहा थां। ऊर्मि दिदी केँ लिए मे उस'कां नट'खटछोट भइया थां। वोँ मुझे हमेशा छोट बच्चा हि समझती थि औऱ पहलेसे मेरे शाम'नें हि कपड़े वग़ैरा बदलती थि। पह'लेँ मुझेउस बारे मे कभी कुच्छ लगता नहीं थां औऱ मे कभी उस'कितरफ ध्यान भि नहीं देता थां। मगरजब सें मेरेमन मे उस'केँ प्रति काम वासना जागउठी तब सें वोँ मेरी बड़ी बहेन नां रहके मेरी 'काम'देवी' बन गई, थि। अबजब वोँ मेरे शाम'नें कपड़े बदलती थि तब मे उसे चुपके सें कामूक निगाह सें देखता थां औऱ उस'केँ अधनन्गे शरीर कों देख'नें केँ लिए छटपटाता थां। जब वोँ मेरे शाम'नें कपड़े बदलती थि तब मे उस'केँ संग कुच्छ नाँ कुच्छ बोलता रहता थां जिस'कि वजह सें बोलते सम'य मे उस'कितरफ देख सकता थां औऱ उस'कि ब्रा मे कसी गदराई छाती कों देखता थां। कभीकभी वोँ मुझे उस'कि पीठ'पऱ अप'नें ड्रेस कि झीप लगाने केँ लिए कहती थि तोँ कभी अप'नें ब्लाउस केँ बटन लगाने केँ लिए बोलती थि। उस'किजिप याँ बटन लगाते सम'य उस'कि खुली पीठ'पर्र मुझे उस'कि ब्रा कि पत्तियां दिखती थि। कभी सलवार याँ पेटीकोट पहनते सम'य मुझे ऊर्मि दिदी कि पैंटी दिखती थि तौ कभीकभी पैंटी मे भरेहुए उस'केँ चुत्तऱ दिखाई देते थें। उस'केँ ध्यान मे यहकभी नहींआया केँ उस'कां छोट भइया उस'कितरफ गंदी निगाह सें देखरहा हैं।
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दिदी कि ब्रेसीयर औऱ पैंटी मुझेघऱ मे कही नज़रआई तौ उन्हे देख'कर मे काफ़ी उत्तेजीत हौ जाता थां। यहवही कपड़े हैं जिस मे मेरी बेहन कि गदराई छाती औऱ प्यारी बुर छुपी होती हैं इस ख़याल सें मे दीवाना हौ जाता थां। कभीकभी मुझे लगता थां केँ मे ब्रेसीयर याँ पैंटी होता तोँ चौबीस घंटे मेरी बहेन कि छाती याँ बुर सें चिपक केँ रह सकता थां। जबजब मुझे मौका मिलता थां तबतब मे ऊर्मि दिदी कि ब्रेसीयर औऱ पैंटी चुपके सें लेकर उस'केँ संगमूठ मारता थां। मे उस'कि पैंटी मेरे लन्ड'पऱ घिसता थां औऱ उस'कि ब्रेसीयर कों अप'नें मुँह'पर्र रख'कर उस'केँ कप चुसता थां। जब मे उस'कि पह'नी हुईँ पैंटी कों मूँ'ह मे भर'कर चुसता थां तब मे काम वासना सें पागल हौ जाता थां। उस पैंटी पऱ जहाँ उस'कि बुर लगती थि वहा पऱ उस'कि बुर कां रसलगा रहता थां औऱ उस'कां स्वाद कुच्छ अलग हि थां। मेरे कड़े लन्ड'पऱ उस'कि पैंटी घिसते घिसते मे कल्पना करता थां केँ मे अप'नी बेहन कों चोदरहा हूं औऱ फिन उस'कि पैंटी'पऱ मे अप'नें वीर्य कां पा'नी छोड'कर उसे गीला करता थां। ऊर्मि दिदी केँ नाज़ुक अंगो कों छू लेने सें मे वासना सें पागल हौ जाता थां औऱ उसे छूने कां कोई भि मौका मे छोडता नहीं थां। हमारा घऱ छोटा थां इस'लिए हम् सभी एक् संगहाल मे सोते थें औऱ मे ऊर्मि दिदी केँ बाजू मे सोता थां। आधीरात केँ बादजब सभीलोग गहरी नींद मे होते थें तब मे ऊर्मि दिदी केँ नज़दीक सरकता थां औऱ हरतरह कि होशीयारी बरतते मे उस'सें धीरे-धीरे सें लिपट जाता थां औऱ उस'केँ जिस्म कि गरमी कों महसूस करता थां। उस'केँ बड़े बड़े छाती केँ उभारो कों हलके सें छू लेता थां। उस'केँ चुत्तऱ कों जीभर केँ हाथ लगाता थां औऱ उनके भारीपन कां अंदाज़ा लेता थां। उस'कि जाँघो कों मे छूता थां तौ कभीकभी उस'कि बुर कों कपड़े केँ उपर सें छूता थां। मेरेमन मे मेरी बहेन केँ बारे मे जोँ काम लालसा थि उस बारे मे मेरे माता, पिता कों कभी कुच्छ मालूम नहींहुआ। उन्हे क्याँ? स्वयं ऊर्मि दिदी कों भि मेरे असली ख़यालात कां कभीपता नां चला केँ मे उस'केँ बारे मे क्याँ सोचता हूं। मेरे असली ख़यालात केँ बारे मे किसी कों पता नाँ चले इस'कि मे हमेशा खबरदारी लेता थां। मेरेमन मे ऊर्मि दिदी केँ बारे मे काम वासना थि औऱ मे हमेशा उसको चोद'नें केँ सप'नें देखता थां मगर मुझे मालूम थां केँ हक़ीकत मे यह नासमभव हैं। मेरी बेहन कों चोदना याँ उस'केँ संगकोई नाजायज़ काम संबंध बनाना यहमहज एक् सपना हि हैं औऱ वोँ हक़ीकत मे कभी पूरा होँ नहीं सकतायह मुझे अच्छी तरह सें मालूम थां। इस'लिए उसेपता चले बिना जितना होँ सके उतना मे उस'केँ नज़ूक अंगो कों छूकर याँ चुपके सें देख'कर खुशी लेता थां औऱ उसे चोद'नें केँ सिर्फ़ सप'नें देखता थां। जब ऊर्मि दिदी 26 साल कि हौ गयीँ, तब उस'कि विवाह केँ लिए लडके देख'नां मेरे माता, पिता नें चालू किया। हमारे रिश्तेदारो मे सें एक् 34 साल केँ लडके कां नाता उस'केँ लिएआया। लड़का पूना मे रहता थां। उस'केँ माता, पिता नहीं थें। उस'कि एक् बड़ी बहेन थि जिस'कि विवाह हुईँ थि औऱ उस'कां ससुराल पूना मे हि थां। अलग प्लोत पऱ लडके कां स्वयं कां घर-मकान थां। उस'कां स्वयं कां खाने-पीने कां दुकान थां जिसे वोँ मेहनत कर केँ चलारहा थां। ऊर्मि दिदी नें बीना किसी ऐतराज सें ये नाता मंजूर कर लिया.मगर मुझेइस लडके कां नाता पसन्द नहीं थां। ऊर्मि दिदी केँ लिएयह लडकाठीक नहीं हैं ऐसा मुझे लगता थां औऱ उस'किदो वजह थि। एक् वजहयह थि केँ लडक 34 साल कां थां यानी ऊर्मि दिदी सें काफ़ी बड़ा थां। विवाह नहीं हुई इस'लिए उसे लड़का कहना चाहिए नहीं तोँ वोँ अच्छा ख़ासा अधेड उम्र जैसा व्यक्ति थां। इस'लिए वोँ मेरी जवान बहेन कों कितना सुखीरख सकता हैं इस बारे मे मुझे आशंका थि। औऱ उनकी उम्र केँ अधिकफरक कि वजह सें उनके ख़यालात मिलेंगे केँ नहींइस बारे मे भि मुझे आशंका थि। सिर्फ़ उस'कां स्वयं कां घर-मकान औऱ दुकान हैं इस'लिए शायद ऊर्मि दिदी नें उस'केँ लिएहां कर दि थि। दूसरी वजहयह थि केँ उस'केँ संग विवाह हौ गई, तौ मेरी बहेन मुझसे दूर जाने वाली थि। उस'नें अगर मुंबई कां लडक पसन्द किया होता तौ विवाह केँ बाद वोँ मुंबई मे हि रहती औऱ मुझे उस'सें हमेशा मिलना आसान होता.मगर मेरी बहेन कि विवाह केँ बारे मे मे कुच्छ कर नहीं सकता थां, नां तोँ मेरेहाथ मे कुच्छ भि थां। देखते हि देखते उस'कि विवाह उस लडके सें होँ गई, औऱ वोँ अप'नें ससुराल, पूना मे चली गई,। उस'कि विवाह सें मे खुश नहीं थां मगर मुझे मालूम थां केँ एक् नां एक् दिनयह होने हि वाला थां। उस'कि विवाह होकर वोँ अप'नें ससुराल जा'नें हि वाली थि, चाहे उस'कां ससुराल पूना मे होँ याँ मुंबई मे। यानी मेरी बहेन मुझसे बिछड'नें वाली तोँ थि हि औऱ मुझे उस'केँ बिना जीना तौ थां हि.
Bahan ki ichha -बहन की इच्छा complete - Desi sex story - Kahani ab aur interesting hogi
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