Sagar (Full Storyd) – New Episode
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Sagar (Full Storyd) – New Episode
Update 6 A.
भीड़ भाड़ तक मैंने वाहनठीक चलाईं फिन मैंने अपनी बांई बांह उसके कन्धे केँ पीछे लपेटी औऱ उसे अपनीतरफ खींचने कि कोशिश कि।
" वाहन चलाने कि तरफ तवज्जो दो " - वो मेरी बांहपरे करतेहुए बोलीं " एक्सीडेंट होँ जाएगा। "
" तुम् तोँ दिल तोड़रही हौ "
" ऐसे हि हरकतों केँ कारण ट्रेन सें अधिकरोड एक्सीडेंट्स होते हें "
" अच्छा। " मे मायूसी सें बोला।
" एक् बात बताओ "
" पुछो "
" ऐसी हरकतों सें कितनी लड़कियां पटा चुके हौ "
" एक् भि नहि "
" झुठमत कहो। इतने हैंडसम होँ, सुन्दर होँ, पढ़ें लिखे होँ औऱ उससे भि बड़ीबात लच्छेदार बातें करते हौ। "
" धन्यवाद। मुझे नहि पता थां कि मेरे मे इतने सारेगुण हैं। "
" कहो नाँ "
" अरे बोला न्। कोई नहि हैं।.वैसे एक् हैं जिस पर्र मे ट्राई कररहा हूं मगर वोँ तौ मेरी बांह हि झटक देती हैं "
" सोसैड। " मुस्करा कर बोलि - " कौन हैं वोँ "।
" हमारे रोहिणी कि हि हैं। बेचारी कि विवाह गाजियाबाद मे एक् खुसट सें हुई हैं "
" च.च.च। बेचारी। " - अफसोस भरे स्वर मे बोलि।
" एक् बात कहूं ! "
" हां.हां। कहो। "
" अगर उसकी विवाह नहि हुई होती न् तोँ मे उसे जबरदस्ती उड़ा लेँ गय़ा होता। "
" औऱ वोँ नहि जानां चाहती तोँ। "
" बोला न् जबरदस्ती उड़ा लेँ गय़ा होता। "
" जबरदस्ती ! "
" हां, जबरदस्ती। "
" उसका हसबैंड तुम्हें गोलीमार देता। "
" मैंने कहाअगर उसकी विवाह नहि हुइ होती तोँ.। वैसे भि मे ब्लैक बेल्ट हूं, उसके हसबैंड जैसेतीन चार लोगों कों तौ मे दो मिनट मे छठी कां दूधयाद दिलादूं। " - मैंने उसे अपनामसल दिखाते हुएकहा।
" बड़ा घमंड हैं अपनी ताकत पऱ। "
" घमंड नहि विश्वास हैं।.कभी आजमा लेना। "
" मे क्यूं आजमाऊ। जिसे आजमानी हैं वोँ आजमाएं। "
" सच कहूं तोँ मुझे उसके पति सें बड़ीजलन होती हैं। "
" वोँ क्यूं भला। "
" इतनी शानदार रसमलाई कां रोजरोज भोग लगाता होगा। "
उसने मेरे भुजाओं मे एक् जोरदार कां पंच मारा।
" आउच " - मे अपनी भुजाएं सहलाने लगा।
" क्याँ जोर सें लगी। " - उसने संवेदना प्रकट करतेहुए कहा।
" नहि नहि। ठीक हूं। " - मैंने उसकेबाल सहलाते हुएकहा।
थोड़ी देरबाद हम् गाजियाबाद उसके फ्लेट केँ नीचे पहुंचे। गाड़ी सें उतरकर मैंने कहा - " श्वेता दि ! आप् अन्दर चलो, मे थोड़ी देर मे आँ रहा हूं। "
" कहां जारहे हौ। " उसने पूछा।
" यहींबगल मे। आप् चलो मे दस मिनट मे आया। "
" अच्छा। " कहकर जैसे हि वो पलटी कि मैंने उसे रोकते हुएकहा - " श्वेता दि। एक् मिनट, रुकना जरा। "
" क्याँ हुआ। " - वो रूकते हुए बोलि।
" मुझे राजीव जीजू सें कुछ personal बातें करनी थि, इसलिये आप् हम् दोनों कों कुछदेर केँ लिए अकेला छोड़ देंगी ? "
" क्यूं ! क्याँ बात हैं। " - वो संशयभरे स्वर मे बोलि।
" हैं कूछबात जोँ मे आपको अभि नहि बता सकता। "
" नहि। पहले मुझे बताओबात क्याँ हैं। "
" जब तक उनसेबात नहि हौ जातीतब तक आप् कों नहि बता सकता। हां उनसेबात होने केँ बाद मे आप् कों बता दूंगा, वादा करता हूं आपसे। " - मैंने उनके दोनों हथेलियों कों अपने हाथों सें सहलाते हुएकहा।
" कोई गड़बड़ वालीबात नहि हैं न्। "
" नहि। ऐसीबात नहि हैं। " मैंने उन्हें विश्वास दिलाते हुएकहा।
" ठीक हैं फिन। " कहकर वोँ अपने फ्लैट कि तरफचली गई।
उनके जाने केँ पश्चात मे भि एक् तरफचला गय़ा। थोड़ी पुछताछ करने पर्र मे उस PCO मे प्रवेश किया जहां सें किसी अज्ञात आदमी नें पुलिस कों अजय केँ मर्डर कि सूचना दि थि।
PCO वालाकोई साठ पैंसठ साल कां बुजुर्ग थां जोँ आंखों मे चस्मा लगाएहुआ थां। मे वहांइस मकसद सें आया थां कि शायद वोँ उस अज्ञात मुखबिर केँ बारे मे कुछ जानकारी देदे। पहले तौ बुड्ढा बड़ा नाँ नुकुर किया। फिन बहुत समझाने केँ बाद बोला कि उसदिन सुभहदस बजे सें हि बहुत बारिश हौ रही थि। औऱ इस कारण PCO मे भीड़ नहि थि। मात्र पांच याँ छःलोग हि उसदिन आये थें जौ सब केँ सब मर्द थें। वोँ उनमें सें किसी कों भि पहचानता नहि थां। औऱ जौ लोगआये थें उन्हें दुबारा देखने पऱ पहचान भि नहि पाएगा। यह सारी बातें तौ पुलिस केँ द्वारा मुझे पहले सें हि मालूम थि।
मे उदास हौ कर श्वेता दि केँ फ्लेट केँ तरहचला गय़ा।
जब मे जीजा केँ घऱ पहुँचा तब श्वेता दि नें अपने कपड़े चेंजकर ली थि औऱ जीजू कमरे मे blanket सें ढके टीबीदेख रहे थें। मुझे देखते हि उनके चेहरे पऱ मुस्कान आई।
" आओ सागर। बैठो। " उन्होंने बैठते हुएकहा।
मैंने उनको नमस्ते करतेहुए कहा - " अरे ! अरे ! आप् लेटेरहो। कैसी तबीयत हैं अभि। "
" ठीक हूं। पहले सें बेहतर हूं। "
मैंने उनका नब्जछुआ। बुखार नहि थां। मे उनकेबगल मे पलंग पर्र बैठ गय़ा। तभी श्वेता दि नें गरमचाय लाई औऱ वोँ बैड केँ पासलगे सोफे पर्र बैठ गई।
गरमचाय पीतेहुए जीजा नें कहा - " तुम्हारे साथीअमर केँ क़ातिल कां कुछपता चला ?"
" अभि तक तोँ नहि " मे गरमचाय कि चुस्की लेतेहुए कहा।
" मेरे तौ समझ मे नहि आँ रहा हैं कि वो यहांकर क्याँ रहा थां ? किसी नें आखिरउसे क्यूं मारा। "
" यह तौ मुझे भि नहि पतामगर वोँ जोँ भि होँ आखिर मे कब तक कानून केँ नजरों सें छुपा रहेगा, कभी नाँ कभी तोँ पकड़ा जाएगा हि। " - कहतेहुए मैंने श्वेता दि कों इशारा किया तोँ वोँ आंखों हि आंखों सें हामीभरी।
" मे जरा किराने कि दुकान सें आँ रही हूं " श्वेता दि नें जीजू सें कहा। औऱ फिन मुझसे बोलि - " तुम् बैठो। खानां खाकर हि जानां। मे बस थोड़ी देर मे आईं। "
मैंने सहमति मे सिर हिलाया। वो चली गई।
गरमचाय खतम होँ गई थि। मैंने क्लासिक कां पैकेट निकाला औऱ जीजा कों आफर किया। उन्होंने सिगरेट निकाली मगर पीने कां उपक्रम नहि किया। मैंने अपनी सिगरेट सुलगाई, एक् गहराकश लगाया फिन जीजा कि तरफ देखते हुएकहा।
" जीजू, मुझे आप् सें कूछ बातें पुछनी थि। "
" पुछो। "
" मुझे पुरा विश्वास हैं कि मे आप् सें जौ कुछ पूछूंगा उसका जवाब आप् सचसच देंगे। "
" क्याँ बात हैं ! क्याँ पुछना चाहते होँ। " उन्होंने संशयभरे स्वर मे कहा।
" क्याँ आप् नें अमर कां खून किया। " - मैंने स्पष्ट शब्दों मे कहा।
" क्याँ बकवास करते हौ। मे क्यूं भला उसकाखून करूंगा। मे तौ उसेढंग सें जानता तक नहि। "
" ओके। मान लिया। " - मे उनके आंखों पऱ अपनी नजरें टिकाए बोला - " आप् केँ फ्लेट मे उसदिन जोँ लड़की थि, वोँ कौन थि। "
" म। मुझे क्याँ पता। होगीकोई। शायदकोई चोर होगी। "
" आप् उस लड़की कों नहि जानते। "
" नहि। मे नहि जानता। "
" आप् कि जानकारी केँ लिएबता दूं कि मे उस लड़की, उसकटे बालों वाली लड़की सें मिल चुका हूं। "
" क्याँ ! " अब जीजाकुछ बेचैन सां हौ गय़ा। उसने पहलु बदलते हुएकहा - " क.कौन हैं वोँ। "
" यह तोँ आप् मुझे बताइए कि वोँ कौन हैं जोँ आप् केँ फ्लेट मे आप् कां इन्तजार कररही थि। औऱ अगर। अगर उसनेलाश नहि देखी होती तोँ वोँ वहां सें भागती नहि बल्कि आप् केँ आने तक आप् कां इन्तजार कररही होती। "
अब जीजा केँ सर पऱ हवाइयां उड़ने लगा। वोँ बैचैन हुआ। इसबार उसने सिगरेट सुलगाई औऱ उसके लम्बे लम्बे कश लगाया लगा |
वोँ बड़ी मुश्किल सें बोला - " म। मे तुम्हें सारी बातें बताता हूं मगर तुम्हें एक् वादा करना होगा कि यहसभी तुम् श्वेता कों नहि बताओगे। "
" जीजा ! यह एक् कत्ल कां मामला हैं। मेरे सबसे अजीज मित्र अमर केँ कत्ल कां। एक् बुड्ढी महिला केँ एकलौते पुत्र कां जिसकी जिन्दगी मे उसके अलावा औऱ कोई सहारा नहि थां। जिसकी जिन्दगी मे अब दुःख औऱ सिसकियों केँ अलावा कुछ नहि बचा। "
" वोँ अनुष्का थि। - " जीजाथके स्वर मे बोला - " कालेज केँ दिनों मे हम् बहोत अच्छे यारहुआ करते थें। धीरे-धीरे धीरे-धीरे हममें प्रेम हुआ। मे उससे विवाह करना चाहता थां मगर."।
" मगर क्याँ ? " मे उत्सुकता सें बोला।
" उसके ड्रीम्स बहुत ऊंचे थें। वोँ लक्ज़री कि जिन्दगी जीने मे यकीन करती थि। उसका सपना थां कि उसका पति बहुत अमीर हौ। उसकेपास कार हौ, शोपिंग करने केँ लिए अनाप-शनाप पैसेहों, सोसल स्टेटस होँ। मगर मे ठहरा एक् मध्यम वर्गीय परिवार कां। मे भला कहां सें उसेयह सभीदे पाता। एक् साल केँ अफेयर केँ बाद उसने मुझे छोड़ दिया। फिन नाँ जाने कहां वोँ गायब होँ गई। "
" फिन आप् सें दुबारा कब मुलाकात हुइ। "
" उसकेछः सालबाद एक् दिन मे अपने दोस्तों केँ संग पैराडाइज क्लब गय़ा। वहां वोँ मिली। स्वीमिंगपूल मे। फिन उसकेबाद हम् कईबार मिले। उसने बताया उसकी विवाह हौ चुकी हैं किसी कुलभूषण खन्ना सें। वोँ उसी पैराडाइज क्लब कां मैनेजर थां। कहने कों तोँ वोँ क्लब कां मैनेजर थां मगर असलियत मे उस क्लब केँ पचास पर्सेंट कां हिस्सेदार थां। उस क्लब केँ अलावा वोँ एक् नाइटक्लब कां भि मालिक हैं जौ पहाड़गंज मे हैं। "
जीजा थोड़ी देर रुकाफिन बोला।
" उसकी विवाह एक् अमीर शख्स सें हौ तोँ गई थि, उसके ड्रीम्स भि पुरे होँ रहे थें मगर शारीरिक जरूरतें सें वोँ महरुम हौ गई थि। उसका पति उसके जरूरतों कों पूरा करने मे असक्षम थां। औऱ कहते हें नाँ पहला प्रेम भुलाए नहि भूलता। हम् मिलने लगे। औऱ फिन बहुत लगभग हौ गये। " कहकर जीजाचुप हौ गय़ा।
" तोँ उसदिन आप् दोनों कि डेटिंग थि। "
" हां। इसीलिए आफिस सें बहाने बनाकर जल्दघऱ आँ गय़ा थां। "
" आप् कों क्याँ लगता हैं ? क्याँ उसनेखून किया होगा ? क्याँ वोँ हिंसक प्रवृत्ति कि हैं। "
" नहि, नहि। वोँ कुछ भि हौ सकती हैं मगर खुनी नहि होँ सकती हैं। "
मे उनसेकुछ औऱ पुछता तभी श्वेता दि आँ गई औऱ हमारी बातों पऱ विराम लग गय़ा।
उसकेबाद कुछखास नहि हुआ। खानां खाने केँ दौरान श्वेता दि नें जीजू सें कहा - " उर्वशी औऱ उसके हसबैंड नें हमें अपनेघऱ बुलाया हैं। उनकी विवाह कि रिसेप्शन हैं परसों। "
तभी मुझेयाद आया कि जिसदिन अमर कां खूनहुआ थां उसीदिन उनकी विवाह थि।
" मे केसेजा सकता हूं। अभि मुझे तोँ ठीक होने मे कम सें कम पांचसात दिन तक तोँ लग हि जायेंगे। " - जीजा नें कहा।
श्वेता दि दुःखी हौ गई।
" जानां कहां हैं। " मे खाते खाते पुछा।
" आगरा। " श्वेता दि गई कहा।
" तुम् सागर केँ संग क्यूं नहि चली जाती " - श्वेता दि कि उदासी देखकर जीजा नें कहा।
" म.म। मे। " मे हड़बड़ा कर बोला।
" हां। यहसही रहेगा। चलो न् सागर। प्लीज़ ! एक् हि तौ सहेली हैं मेरी। मेरे नहि जाने सें वोँ बहोत क्रोध करेगी। " श्वेता दि नें कहा।
" अरे ! मे केसेजा सकता हूं। कालेज जानां हैं फिनसाम कों कराटे क्लास केँ लिए जानां हैं। "
" प्लीज़ ! एक् दिन कि तोँ बात हैं। क्याँ एक् दिन केँ लिए भि मेरेलिए तुम्हारे पास वक्त नहि हैं। " - उसने इमोशनल होतेहुए कहा।
" ओकेओके। चलूंगा। " मैंने मुस्कराते हुएकहा।
तभी जीजा नें अपनीराय दि। " सागर, तुम् दिल्ली सें ट्रेन सें हि आँ जानां औऱ यहां सें मेरी गाड़ी सें आगराचले जानां। "
" ठीक हैं। " कहकर मे खाने कि थाली सें उठा औऱ मुंह धोकर वापसआया।
फिन मैंने जीजा सें जाने कि अनुमति लेँ कर दरवाजे कि तरफचल दिया। श्वेता दि मुझे छोड़ने दरवाजे तक आई।
" बातें हौ गई। " श्वेता दि नें पूछा।
" हां। बातें हौ गई। "
" फिन बताओ। "
" मैंने आपको बताया थां नं कि बताउंगा। थोड़ी सब्रकरो। " कहकर मैंने उनकोहग किया औऱ दरवाजे सें बाहर् निकल गय़ा। तभी श्वेता दि बोलि -
" रूको।
मे रूक गय़ा।
" यहांआओ। "
मे उनकेपास गय़ा।
वोँ मेरेगले लगी औऱ मेरे दाहिने गाल पर्र एक् किसकर दि।
" अबजाओ। " उन्होंने मुस्करा करकहा।
मैंने अपने होंठ कि तरफ इशारा किया तोँ मुस्कराते हुए मुझे धक्का दिया औऱ बोलि - " परसो सुभहआठ बजे तक आँ जानां। "
" जोँ आज्ञा तुफाने हमदम। " - मैंने हल्के सें सर कों झुकाया औऱ अपनेघऱ कों निकल गय़ा।
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Update 7.
अगलेदिन सुभहजब मे सोकरउठा तब हल्की हल्की बारिश होँ रही थि। मैंने खिड़की सें झांककर देखा तौ आसमान मे हल्के-हल्के बादलआंख मिचौली खेलरहे थें। अप्रैल कां महीना बारिश कां नहि होता हैं मगर हमारे यहां मौसमकब पलटजाए कोई नहि जानता। शायद इसीलिए भारतीय मानसून कों जुए कां खेलकहा जाता हैं। मे नित्य कर्म सें निवृत्त होँ कर अपने पलंग पऱ बैठ गय़ा औऱ पिछले कुछ दिनों सें चलरहे घटनाओं केँ बारे मे सोचने लगा।
तभी वहां रीतुआईं।
" ब्रेकफास्ट नहि करना हैं क्याँ " रीतु बोलीं।
मैंने उसे देखा। नहाधो कर वो किसी ताजा ताजा खिलेकली केँ समानलग रही थि। उसके जिस्म सें किसी सुगन्धित सेंट कि खुशबू आँ रही थि। वैसेउसे किसी भि आर्टिफिशियल सेंट कि कोई जरूरत नहि थि। उसने लेगिंग्स औऱ टाप पहना थां जिसमें उसकेबदन केँ उतार चढ़ाव किसी भि भि विश्वामित्र कि तपस्या भंग करने केँ लिए बहुत थां। कितनी सुंदर हैं मेरी बेहन।
मैंने एक् लम्बी सांसली औऱ उसकेसंग नीचेहाल मे आँ गय़ा।
" क्याँ बात हैं ! आज बड़ीदेर कर दि। " माॅम नें पूछा।
" कोईखास बात नहि हैं माॅम। चलो जल्द सें ब्रेकफास्ट लगाओ। " मे कुर्सी पऱ बैठते हुए बोला।
माॅम नें ब्रेकफास्ट निकाला। हम् दोनों भइया बेहन ब्रेकफास्ट करनेलगे। डैड ड्यूटी चलेगए थें। थोड़ी देरबाद माॅम भि अपना ब्रेकफास्ट लें कर हमारे संग हि बैठ गई।
" माॅम ! कल मुझे श्वेता दि कों लेकर आगरा जानां हैं। " मैंने खाने केँ दौरान कहा।
" क्यूं। " माॅम नें सवाल सूचक दृष्टि सें देखा।
" उनकी सहेली उर्वशी कि विवाह कि रिसेप्शन हैं। "
" तौ तुम् क्यूं जारहे हौ। जीजू नहि हैं क्याँ। " रीतु नें बीच मे टोकते हुएकहा।
" नहि। उनकी तबीयत थोड़ी रिवर्स गियर मे चलरही हैं। " मैंने उसे देखकर मजाक करतेहुए कहा।
" तबकल तौ आँ नहि पाओगे ? " माॅम नें पूछा।
" पता नहि। यह तौ वहां जाने केँ बाद मालूम पड़ेगा। "
अभि हम् बातें कर हि रहे थें कि मेराफोन बजनेलगा। मैंने देखा किसी अनजान नंबर सें मोबाइल थां। मैंने मोबाइल रिसीव की अप किया।
" हैलो ! सागरजी ? "
" हांजी। बोलिए। " मैंने कहा
" मे अनुष्का। "
" जी, जी अनुष्का जी कहिए। "
" यदिआज आप् फ्री होँ तोँ क्याँ हम् मिल सकते हें। "
" क्यूं नहि। बोलिए कहा औऱ कब आनां होगा। "
" निजामुद्दीन स्टेशन केँ पासदो बजे तक आँ जाइए। "
" ओके। मे पहुंच जाऊंगा। "
फिन ' बाय ' बोलकर उसने मोबाइल काट दिया। अभि उस वक़्त दस हि बजे थें मतलबचार घंटेबाद। ब्रेकफास्ट भि हमारा होँ गय़ा थां। फिन मैंने माॅम कों कालेज जाने कि बोलकर घऱ सें निकल गय़ा।
कालेज सें हि मे निजामुद्दीन स्टेशन पहुँचा। वहांअगल बगल नजरें दौड़ाई तभी किसी नें मेरानाम लेकर पुकारा। मैंने देखा अनुष्का वाहन मे बैठे मुझे ईसारे सें बुलारही थि। मे उसकेपास गय़ा। उसने मुझे गाड़ी मे बैठने कों कहा। मे उसकेबगल बैठ गय़ा। गाड़ी मे उसके सिवा औऱ कोई नहि थां।
" मुझेशक हैं कि मेरी निगरानी केँ लिए मेरे पति नें किसी कों मेरे पिछेलगा रखा हैं। एक् व्यक्ति मुझे अपने पिछेलगा हुआ दिखामगर मे उसेडाज देने मे कामयाब हौ गई। " अनुष्का ड्राइव करती हुई बोलीं।
" अच्छा ! बहोत होशियार हैं आप्। "
" वोँ तोँ मे हूं। " वोँ मुदित मन सें बोलीं।
" अब हम् कहां जारहे हें। "
" जहां तुम् बोलो। "
" जी ! किसीखास स्थान चलें। "
" कैसीखास स्थान। "
" जहां तन्हाई होँ। नीम अंधेरा हौ। रोमांटिक म्यूजिक होँ। जहांजाम छलकते हों। शराब केँ भि औऱ शवाव केँ भि। "
" ऐसीकोई स्थान हैं यहां
" एक् नहि कई हैं। "
" कहां हैं ? " वो संशयभरे दृष्टि डाली।
" होटल मे। "
" बीबी झाड़ू लेकरसर गंजीकर देगी। "
" आप् केँ खादिम केँ पास झाड़ू तोँ हैं मगर बीबी नहि। "
" क्यूं। मायके गई हैं। "
" हैं हि नहि। "
" इसबात कां अफसोस हैं याँ खुशी। "
" दोनों। कभी अफसोस कभी खुशी। "
" मतलब। "
" " सर्दियों कि तन्हा रातों मे अफसोस औऱ बाकी खुशी। "
" बहुत रंगीन किस्म केँ व्यक्ति हौ। "
" ऐसा हि हैं कुछ। "
" बातें बढ़िया करते होँ। "
" मे औऱ भि कईकाम बढ़िया करता हूं मगर वोँ फिनकभी। "
उसकेबाद हम् निजामुद्दीन मे हि कनिष्क नामकबार एंड रेस्टोरेंट मे गये। वहां एक् कोने कि टेबल पर्र आमने-सामने बैठने कि स्थान अगलबगल बैठगये।
" क्याँ लोगे " " उसनेकहा।
" जोँ आप् बोलो। "
थोड़ी देरबाद हमारे टेबल पर्र बहुत कि ग्लास आई।
" उसदिन मेरे पति केँ सामने मेरीपोल नं खोलने केँ लिए धन्यवाद। "
" वोँ सभी छोड़ो, उसदिन मैंने जोँ प्रश्न पूछा थां उसका जवाबदो। "
" देखो ! मुझे राजीव नें बता दिया हैं कि उससे तुम्हारी बात हुइ हैं। तुम् सभीकुछ तौ जान हि चुके होँ। "
" सभीकुछ नहि। दि केँ आने सें बात अधुरी रह गई थि। तुम् अपने बारे मे कुछ बताओ। "
" मे, मे मेरठ कि रहने वाली हूं। मेरेघऱ मे मेरे अलावा मात्र एक् बेहन हैं जोँ वहीं रहती हैं। हमारे माँ बाप बहोत पहले गुजर चुके थें। हमारी जीवन बहुत ग़रीबी मे कटी हैं, हमने अपने जिन्दगी मे इतने अभाव देखें हैं कि उन दिनों कि याद करकेआज भि हमारी रूह कांप जाती हैं। " वोँ जैसे बिते दिनों मे खो सि गई थि।
" फिन। फिन क्याँ हुआ। "
मेरे टोकने पर्र वो धरातल पर्र आई।
" हमारे पास इतने पैसे भि नहि थें कि हम् अपर क्लास कि शिक्षा पूरीकर पाते। वीणा कि तौ पढ़ाई मे कोईखास रूचि नहि थि मगर मे पढ़ना चाहती थि। मे कुछ करना चाहती थि। मे कुछ बनना चाहती थि। मैंने, मम्मी कि कुछ जेवर थि, वोँ बेचकर दिल्ली आँ गयीँ,। यहांआकर कालेज मे दाखिला लिया। यहीं राजीव सें मुलाकात हुइ। "
मे चुपचाप उसकी बातें सुनरहा थां। थोड़ी देरबाद वोँ बोलीं।
" वोँ मुझ सें विवाह करना चाहता थां मगर मैंने जौ कष्ट, जोँ जिल्लत, जौ अभाव देखा थां वोँ मुझेरह रहकर डरावने सपने कि तरह डसता थां। राजीव एक् अच्छा लड़का थां मगर वोँ मेरे सपनों कों पूरा करने मे सक्षम नहि थां। लगभग एक् साल केँ बाद हमने आपसी रजामंदी सें अलगअलग रास्ते चुनलिए। "
" तुम्हारी मुलाकात कुलभूषण खन्ना सें केसे हुईँ ? " मैंने पूछा।
" वोँ हमारे कालेज केँ principal कां मित्र थां। एक् दिन वोँ कालेज principal सें मिलने आया थां, तभी उसने मुझे देखा थां।
वोँ मुझ पऱ फिदा होँ गय़ा औऱ दोचार मुलाकात मे हि विवाह कां प्रस्ताव रख दिया।। मैंने बहोत सोचा। महिनों सोचाफिन लास्ट मे उसेहां कर दि। "
मे चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। मे उसके दुबारा बोलने कि इंतजार करतारहा।
" आप् उसदिन राजीव केँ फ्लेट मे क्याँ कररही थि। " मैंने पुरानां प्रश्न फिन दोहराया।
थोड़ी देरबाद वोँ बोलि।
" राजीव सें दुबारा छः महीने पहले मुलाकात हुइ। वोँ अपने दोस्तों केँ संग पैराडाइज क्लबआया थां। मे उस टाइम अपनी सहेलियों केँ संग स्वीमिंगपूल मे थि। हमारी बातें हुईँ। उसने बताया उसकी विवाह डेढ़साल पहले हौ चुकी हैं। मैंने भि अपने बारे मे बताया। फिनकुछ औऱ मुलाकातें हुईं औऱ हम् दुबारा साथीबन गए।.उसदिन हमारी राजीव केँ फ्लेट पर्र डेट थि। मे वहां सुभह केँ ग्यारह बजे पहुंची थि। राजीव नें अपने फ्लैट कि डुप्लीकेट चाबी मुझे पहले हि दे दि थि। जब मे वहां पहुंची तब दरवाजा खुला थां। मैंने सोचा वोँ फ्लेट मे हि होगामगर वोँ वहां नहि थां। मैंने उसे फ़ोन किया तोँ उसने बताया कि वो रास्ते मे हैं। मे थोड़ी देरबैड पऱ लेट गई। थोड़ी देरबाद मे हाथ मुंह धोने बाथरूम गई। वहां मैंने एक् व्यक्ति कों बाथ-टब मे पड़ेहुए देखा। मे डर गई फिन मैंने उसकेपास जाकर देखा तोँ वो मरा पड़ा थां। उसे गोलीलगी थि। मेरे छक्के छूटगये। मे बहुत भयभीत होँ गयीँ,। फिन जल्द सें वहां सें भागकर निकल हि रही थि कि तुम् आँ गए। "
वोँ चुप हौ गई।
मे कुछसमझ तक चुपरहा फिन मैंने सिगरेट निकाल करउसे आफर कि तौ उसने पैकेट मे सें एक् सिगरेट निकाल ली। फिन मैंने भि सिगरेट निकाली औऱ उसकी सिगरेट सुलगाने केँ बाद अपनी सुलगाई।
सिगरेट केँ चार पांचकश लगाने केँ बाद वोँ थोड़ी नार्मल हुई।
" तुम्हारे पति कों राजीव केँ संग अफेयर कि कोईखबर हैं ? " मैंने सिगरेट कां धुआं छोड़ते हुएकहा।
" पता नहि। मेरा पति बहोत ईष्र्या करने वाला व्यक्ति हैं। " उसनेकहा।
" कोई बड़ीबात नहि। आप् जैसी खुबसूरत स्त्री कां पति जौ कोई भि होगा, ऐसा हि होगा। " मैंने मज़ाक करकहा।
" हर किसी पे शक करने वाला ? "
" वोँ हर किसी पे शक करता हैं ? "
" हां। "
" फिन तोँ मुझेयूं आपके लगभग नहि बैठा होना चाहिए। "
" अरे ! वोँ तुम् पर्र शक नहि करता। "
" मे इसे अपनी खुशकिस्मती समझु याँ तौहीन। "
वो हंसीफिन बोलि - " सुनो, मे तुमसे एक् वादा चाहती हूं। "
" कैसा वादा। '
" कि तुम् मेरेराज कों आगे भि राज रखोगे। "
" लगता हैं आप् अपने पति सें बहोत डरती हैं। "
" हां। बहोत ज़्यादा। "
" आप् कि बनती नहि उनसे। "
" नहि। "
" तोँ फिन छोड़ क्यूं नहि देती। "
" मे ऐसा नहि कर सकती। "
" क्योंकी वोँ अमीर हैं। क्योंकी दौलत केँ बिना आप् नहि रह सकती। "
उसनेआहत भाव सें मेरीतरफ देखा।
महिला हि ऐसाकर सकती हैं कि चित भि उसकी हौ औऱ पट भि उसकी। वोँ दो किशितयो मे सवार होकरचाह सकती हें कि मझधार मे न् गिरे। महिला केँ मन मे क्याँ हैं, कौन माँ कां लालबता सकता हैं। ( मे मन हि मन सोचा )
" फिलहाल मुझे नहि मालूम कि अमर कि मौत सें आपकाकोई नाता हैं याँ नहि। औऱ अभि तक आप् केँ बारे मे पुलिस कों भि कुछ नहि पता। अगर आप् बेगुनाह हैं तौ बेफिक्र होकर रहिए।। मगरअगर आप् गुनाहगार हैं तोँ अभि सें पनाह तलाश करनी शुरुआत कर दीजिए। " मैंने कहा।
उसके चेहरे पर्र सख्त नाराजगी केँ भाव उभरे । वोँ जोर सें लम्बी लम्बी सांसें लेनेलगी।
" मिस्टर सागर। '
" यस मैडम। "
" मुझे तुम् सें ऐसी उम्मीद नहि थि। "
" कैसी उम्मीद नहि थि मैडम ! "
" कि तुम्हें मेराजरा भि लिहाज नहि होगा। मे इतनीदूर सें तुम्हारे पासआईं औऱ तुम्."।
" इज्जत अफजाई कां धन्यवाद। " मैंने हल्के सें सिर झुकाकर कहा।
वोँ खड़ी हुई औऱ अपना पर्स उठाते हुए बोलि -" मे तुम् सें फिनबात करूंगी। "
" वैलकम मैडम। "
फिन दनदनाते हुए रेस्टोरेंट सें बाहर् निकल गई। मे कुछदेर तक वहीं बैठा सोचता रहाफिन मे वहां सें निकल गय़ा।
"
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