Incest अनचाहे रिश्तों में पनपती कामुकता की छाया - Desi sex story – New Episode
उनके हाथों कां नग्न स्पर्श पाकर मम्मों औऱ कड़े होँ गए। स्तनों केँ निप्पल पत्थर कि तरह होँ गए थें। जब उनकी उंगलियों निप्पलों सें टकराती मेरी राजकुमारी कांप उठतीतथा जिस्म मे एक् अजीब सि लहर दौड़ जाती। नग्न स्तनों कि संवेदना सें उनका लिंग वापस पूरे उफान पर्र आँ चुका थां औऱ मेरी जांघों केँ बीचआने कि कोशिश कररहा थां। उनके दोनों स्तनों पऱ व्यस्त थें। मे नहि चाहती थि कि वो अपनाहाथ हटाए इसलिये मैंने स्वयं हि अपनी स्कर्ट ऊपरकर दि। अब उनका लिंग मेरी जांघों केँ बीच सें सामने कि तरफआने लगा। पैंटी हट जाने कि वजह सें लिंग कां मार्ग बिल्कुल आसान होँ गय़ा थां वो मेरी योनि सें सटतेहुए आगे कि तरफ आँ गय़ा थां। उनके लिंग सें निकलरहे द्रव्य नें मेरी जांघों केँ बीच केँ उस हिस्से कों पूरीतरह गीलाकर दिया थां। राजकुमार राजकुमारी केँ बिल्कुल समीप पहुंच चुका थां। अभि तक मानस कों मेरी पैंटी हटाने कां एहसास नहि थां पर्र लिंग केँ चारोओर मिलरही चिकनाहट सें वोँ उत्तेजित थें.
मानस अपना एक् हाथ स्तनों सें हटाकर राजकुमारी केँ समीपला रहे थें। नाभि केँ नीचेआते आते मेरी धड़कनें तेज हौ गई। जैसे हि उनकी उँगलियाँ नें आगे कां सफर किया उन्हें कोई रूकावट नहि मिली। पैंटी पहले हि हट चुकी थि। पैंटी केँ हटने कां एह्साह होते हि मानस नें मेरेगाल पर्र चुम्बनों कि बारिश कर दि तथाकान मे धीरे-धीरे सें कहा “ थैंकयू”। मैंने भि अपनी उंगलियों सें राजकुमार कों सहलाकर उन्हें खुस किया। उनकी उंगलियां मेरी राजकुमारी केँ बिल्कुल समीप पहुंच चुकीं थि। आहिस्ता ये प्रतीक्षा समाप्त हौ गय़ा उनकी उंगलियां मेरे दरार केँ बीच मे पहुंच गयीं। उत्तेजना अपनेचरम पर्र थि इस अद्भुत औऱ नईचीज कों उनकी उंगलियां महसूस करनाचाह रहींथीं। जैसे हि वो दरार मे थोडा नीचेगए उनकी तर्जनी मेरी राजकुमारी केँ मुह मे चली गयीँ,। मैंने उन्हें धीरे-धीरे सें कहा…
“अन्दर मत लेँ जाइएगा.” वोँ समझगए। मे भि उनके लिंग कों प्रेम सें सहलाने लगी। मुझेयाद आया कि मानस अभि तक अपने घुटने मोड़े हुए थें। मैंने “एक् मिनट” कहकर अपने आप् कों उनसेअलग किया.तथा उनकीतरफ घूमी। उनका राजकुमार अब बहुत बड़ा होँ गय़ा थां। वो अँधेरे मे भि आकर्षक लगरहा थां। मैंने उन्हें स्टूल पऱ बैठने कों कहा.
मानस स्टूल पऱ बैठ चुके थें। उन्होंने अपने राजकुमार कों व्यवस्थित कर लिया थां। मानस भैया नें अपनीपीठ दीवाल सें लगाली थि औऱ वो आरामदायक स्थिति मे आँ गए थें उनकीकमर अब स्टूल पऱ थि। उनका नाभि प्रदेश बिल्कुल सपाट थां। उनका राजकुमार उर्ध्व स्थिति मे छत कि तरफदेख रहा थां। मैंने वापस अपनीपीठ मानस भैया कि तरफ कि तथा अपना एक् पेर उठाकर उन्हें अपने दोनों पैरों केँ बीच लें लिया। अपने आप् कों संतुलित करतेहुए मैंने अपनीकमर कों नीचे करना शुरुआत किया। जैसे जैसे मे नीचे आँ रही थि मेरी धड़कन तेज हौ रही थि। औऱ नीचेआने पऱ राजकुमार नें मेरी राजकुमारी कों छू लिया। राजकुमारी पूरीतरह प्यार रस मे डूबी हुइ थि। राजकुमार भि अपने चेहरे पर्र प्यार रस लपेटे हुए थां। मैंने राजकुमार कां मुखड़ा अपनी राजकुमारी केँ मुंह मे जाने दिया। दोनों नें एक् दूसरे कां स्पर्श किया। मैंने महसूस किया कि मानस भैया कां हाथ मेरे नितंबों कों सहलारहा हैं। इस उत्तेजना कि घड़ी मे भि मे पूरीतरह सतर्क थि। मे किसी भि स्थिति मे अपना कौमार्य नहि खोना चाहती थि.
कुछ हि देर मे राजकुमारी केँ प्यार रस मे राजकुमार पूरीतरह डूब चुका थां। मेरी जांघों पऱ भि चिपचिपपा सां महसूस होँ रहा थां। मेरे पांवअब दर्द करनेलगे थें। मैंने राजकुमार कों थोडा आगे किया औऱ मानस कि नाभि औऱ लिंग केँ बीच केँ भाग मे बैठ गई। मैंने पीछे मुड़कर मानस कि तरफ देखा वो खुशी मे डूबेहुए थें। उन्होंने अपने दोनों पांवआपस मे सटालिए थें ताकि मुझे अपनेपेर ज़्यादा न् फैलाने पड़े। उनकेहाथ वापस मेरे स्तनों तक आँ चुके थें। मेरी उंगलियां उनके राजकुमार कों छूरही थि। मैंने अपनी हथेली औऱ योनि केँ बीच मे एक् मार्ग जैसाबना दिया थां। उनका राजकुमार इसी पतलीगली मे उछलकूद कररहा थां। मे इसगली कि चौड़ाई कम अधिक करती औऱ वो स्वयं उछलने लगता। बीच-बीच मे मे उसे राजकुमारी केँ पास भि लेँ जातीतथा दोनों कि मुलाकात कराती। मिलन केँ वक़्त राजकुमार कां उछलना तेजी सें बढ़ जाता। (जिन्दा मछली पकड़ते टाइम मुझेकभी कभीइस टाइम कि यादआती हैं.)
मुझसे औऱ बर्दाश्त नहि हौ रहा थां मैंने राजकुमार कों अपनी राजकुमारी केँ मुख पऱ रगड़ना शुरुकर दिया। अपनी हथेली सें राजकुमार कों सहारा देकर अपनी राजकुमारी कों आगे पीछे करनेलगी। मेरीकमर मे हरकतदेख कर मानस सतर्क हौ गए थें। राजकुमार मेरे हाथों सें भि ज़्यादा रसीले थां उसके स्पर्श सें राजकुमारी बहोत प्रफुल्लित थि औऱ थोड़ी देर मे उसका कंपन भि अतिरेक तक पहुंच गय़ा। मेरेपेर तननेलगे थें। मैंने मानस भैया केँ पैरों मे भि तनाव देखा। उनकी पकड़ मेरे स्तनों पऱ औऱ ज़्यादा होँ गई थि। कुछ हि पलों मे राजकुमार मे लावा उड़ेल दिया। राजकुमारी सें भि खुशी केँ आंसूझर झरबहरहे थें। मेरे छोटेहाथ इतने सारेकाम रस कों समेट पाने मे असमर्थ थें। मानस कां भि हाथ भि कुरुक्षेत्र मे आँ गय़ा थां उनकाहाथ भि प्यार रस सें सराबोर हौ चुका थां। उन्होंने राजकुमारी केँ चेहरे पऱ उंगलियां फेरी पऱ मैंने उनकाहाथ पकड़ लिया। राजकुमारी बहोत संवेदनशील हौ गई थि। आज उसकेसंग कुछ अद्भुत हुआ थां। वो अभि तक फड़करही थि.
मे धीरे-धीरे सें उठी। मानस भि उठगए। मैंने स्टूल पऱ पड़ी अपनी पेंटी कों उठाया। मैंने उससे मानस केँ राजकुमार कों पोछा इसकेबाद मैंने अपनी राजकुमारी तथा जांघों कों साफ किया। पेंटी करीब-करीब आधी गीली होँ चुकी थि। मेरेहाथ पोछे केँ बाद मानस नें भि पैंटी मांगी। हाथ पोछने केँ बाद वो पेंटी कों अपनीजेब मे रखनेलगे। मैंने उनकाहाथ पकड़ने कि कोशिश कि तोँ वो बोले…
“ मे इसेरख लेता हूं” मैंने पूछा.
“क्यूं “ तौ उन्होंने कहा
“गुरु दक्षिणा”
ये सुनकर मे निरुत्तर हौ गयीँ, तथा बाहर् आँ गई। साहिल मुझेदेख करखुस हौ गय़ा मैंने खेल समाप्ति कि घोषणा कि तथा अपनेघऱ आँ गई.
ग्रामीण परिवेश मे भि काम वासना उसीतरह फलती फूलती हैं जिसतरह शहरों औऱ विदेशों मे। अंतर मात्र इतना होता हैं कि गांवों मे सेक्स मे इतना नंगापन नहि होता.
राजकुमारी दर्शन
अपनेरूम मे पहुंचने केँ बाद मे खाट पऱ लेट गय़ा। आज जोँ हुआ थां उसकी कल्पना भि मुझे नहि थि। लड़कियों कां वो अंग इतना कोमल होता हैं मे नहि जानता थां। उसकी राजकुमारी अत्यंत कोमलतथा रसभरी थि तथा दोनों मम्मों भि अत्यंत कोमल थें। मैंने अपनीहाथ कि उंगलियों कों चुम्मा जौ अभि-अभि राजकुमारी सें मिलकर आयींथीं। उंगलियों पऱ राजकुमारी केँ खुशी केँ आंसूतथा मेरा लावा दोनों मिलेहुए थें। ब्लू फिल्मों मे मैंने देखा थां कि नायिका वीर्य कों अपने मुंह मे लें लेती हैं तथा नायक नायिका कि योनि अपनी जिह्वा सें छूता हैं। मेरेलिए ये एक् घृणास्पद क्रिया थि परंतु आज सीमा कि योनि छूने केँ बाद उससे एक् अजीब किस्म केँ आत्मीयता हौ रही थि नाँ चाहते हुए भि मैंने उसका स्वाद कों जानने कि कोशिश कि। मेरी उंगलियां गीली होकर वापस चिपचिपी होँ गयीं पर्र स्वाद केँ बारे मे मे कोईराय नहि बना पाया.
अगली सुभह सीमा नहि आई। मे समझ गय़ा थां कि वो कल कि घटना केँ बाद मुझसे मिलने मे कुछ वक्त अंतराल चाहरही थि। सीमा नें कल जोँ किया थां वो उस उम्र कि लड़की केँ लिए बहोत बड़ीबात थि। मुझेइस बात कां पूरा एहसास थां कि मेरे राजकुमार केँ अलावा उसने औऱ भि राजकुमारों कि सेवा कि थि परंतु उसका कौमार्य सुरक्षित थां ऐसा मुझे प्रतीत होता थां। उसका पढ़ाई मे संजीदा होना भि इसबात कां परिचायक थां। 2 दिनों बाद सीमाफिन आई अपनी पढ़ाई केँ संबंध मे औऱ कुछ बातें कि। मैंने पूरी तन्मयता सें उस विषय कों समझाया वो खुश हौ गयीँ,। उसके संतुष्ट होने केँ बाद मैंने उसे छेड़ा “राजकुमारी कुशल मंगल सें तोँ हैं नां?” वो हंसने लगी औऱ बोलीं…
“आपके राजकुमार नें उसे इतनी चुम्मियाँ ली हैं कि वो बार-बार खुशी केँ आंसू बहाती रहती हैं” मे उसकी भाषा समझने लगा थां। आज वो फिन सें स्कर्ट औऱ टॉपपहन करआई थि छोटा रोहन सीढ़ियों सें आकर सीमा सें बोला….
“दिदी आप् 2 दिनों सें खेलने नहि आयीं.आज चलिए नाँ। मानस भैया आप् भि आइए”
“ चलिएआइए बच्चों कां मनरख लेते हें” हम् सभी नीचे आँ गए। सीमा कों फिन अलमारी कि तरफ छुपते देखमन प्रफुल्लित हौ उठा थां आज भि मे उसी उत्साह केँ संग सीमा केँ पीछे हौ लिया.अब हम् दोनों इसखेल केँ खिलाड़ी हौ चुके थें। हमने 2 - 3 बारखेल केँ दौरान अपनीकाम पिपासा बुझाई औऱ वापस आँ गए। सीमा नें इसबार हमारे प्यार रस कों अपनी स्कर्ट मे हि पोछ लियाआज वो पैंटी नहि पहने हुयी थि.
अगलेकुछ दिनों तक सीमा लगातार मेरेपास आतीरही औऱ अपनी पढ़ाई केँ बारे मे मुझसे कई चीजें समझती रही.कई बार वो पजामी पहनकर आती थि तौ कईबार स्कर्ट पहनकर। मैंने नोटिस किया कि जब वो पजामी पहनकर आती थि तोँ छुपन छुपाई खेल सें बचती थि औऱ जब स्कर्ट पहनकर आती थि तौ खुशी-खुशी छुपन छुपाई खेलने कों रेडी हौ जाती। मेरेलिए याँ इशारा बन चुका थां कि यदि मैंने उसे स्कर्ट मे आतेहुए देखा तौ मेरे राजकुमार कों आजसुख मिलना पक्का लगता थां। कुछ हि दिनों मे हमारा येसुख खत्म होने वाला थां.
सीमा केँ दिल्ली जाने कां टाइम लगभग आँ रहा थां। सीमा नें बताया कि 3 दिनों केँ बाद वो वापसजा रही हैं। मे दुखी होँ गय़ा मैंने कहा ….
“सीमा तीन-चार दिन औऱ रुकजाओ मे भि तुम्हारे संग वापस चलूंगा”.
“उसनेकहा मानस भैया पिताजी टिकटकरा चुके हें” उसने मुझेखुश करने केँ लिए मेरेसंग बिताए पलों कों याद किया औऱ कहा.
“आपके राजकुमार नें तौ राजकुमारी सें मुलाकात करली”
मैंने उसेयाद दिलाया कि उसने मुझे राजकुमारी कों दिखाने कां वचन 2 वर्ष पूर्व दिया थां। वो पशोपेश मे पड़ गई,। हमारे पास बहोत कमसमय बचा थां सीमा नें कहा अच्छा मे कोशिश करूंगी। 2 दिनबाद अचानक सुभह-सुभह मायाजी कि तबीयत खराब हौ गई उनकेपेट मे दर्द हौ रहा थां। बापू उनकोशहर मे डॉक्टर सें दिखाने लें गए छाया भि संग मे जाने कि जिद करनेलगी औऱ वो भि व्हीकल मे बैठकर चली गयीँ,। बापू नें कहा…
“ बेटा कुछबना करखा लेना हम् लोग दोपहर तक लौट आएंगे” जाते टाइम मंजुला चाची भि वहांथीं। वोँ पिताजी कि बात सुनकर येसमझ गयींथीं कि मैंने ब्रेकफास्ट नहि किया हैं.
[मे सीमा]
चाची नें कहा…
“ मानस नें ब्रेकफास्ट नहि किया हैं। तुम् जाकर मानस कों ब्रेकफास्ट देआवो वो घऱ पऱ अकेला हैं” मे ये सुनकर बहोत खुश होँ गई औऱ बोलीं। “चाची मे नहाकर जाती हूं उन्होंने कहा बेटा वो भूखा होगा मैंने कहाबस 5 मिनट लगेगा”
“ ठीक हैं” मे फटाफट बाथरूम मे चली गयीँ,। बाथरूम जाने केँ बाद मैंने ये निर्णय कर लिया कि आज अपनी राजकुमारी केँ दर्शन मानस भैया कों करा हि दूंगी पता नहि फिनकभी मौका मिले नाँ मिले। अपनी राजकुमारी कि दाढ़ी मूछें मे 2 दिन पहले हि साफकर चुकी थि। मेरी राजकुमारी अब अत्यंत खूबसूरत औऱ चमकदार लगरही थि। शीशे मे मे स्वयं कों देखकर शरमा गयीँ,। मैंने अपनी राजकुमारी कों साबुन सें धोया औऱ नहाकर वापस बाहर् आँ गई,। मे सीधा माँ केँ कमरे मे गई अपनी पहलेदिन वाली स्कर्ट औऱ टॉप पहनी। माँ कां वही परफ्यूम लगाया औऱ चाची केँ पासआकर बोलीं.
“लाइए चाची दीजिए” चाची नें मानस भैया केँ लिए ब्रेकफास्ट निकाल कररखा थां जिसे लेकर मे धड़कते ह्रदय केँ संग मानस भैया केँ पास पहुंच गयीँ,। मानस भैया थोड़े दुखी थें क्योंकि मायाजी औऱ उनके बापूसब लोगशहर गएहुए थें। मे उनकी स्थिति समझ सकती थि। मैंने कहा…
“छोटी मोटी तकलीफ होगी। वो जल्दठीक हौ जाएंगीं आप् प्यार सें ब्रेकफास्ट कर लीजिए.” मैंने उन्हें अपने हाथों सें एक् रोटी खिलाई। मे अभि अभि नहाकर आई थि वो मुझे एकटकदेख रहे थें। ब्रेकफास्ट करने केँ बाद मैंने उनसेकहा कि कल मे चली जाऊंगी। वोँ मेरे जाने कि बात सें अधिक दुखी हौ गए। मैंने उनके हांथों कों अपने हाँथ मे लेँ लिया औऱ उनसेकहा…
“मेरी राजकुमारी आपको दर्शन देना चाहती हैं” उनकागम एक् समय मे गायब होँ गय़ा। तभी फ़ोन कि घंटीबजी। मानस नीचेगए औऱ वापसआकर बताया.
“बापू कां मोबाइल थां। मायाजी ठीक हें। ड्रिप लगरहा हैं एक् दो घंटे मे वापसघऱ आँ जाएंगें.” वोँ खुश होँ गए थें। उन्होंने मुझे अपने आलिंगन मे खींच लिया। मैंने उनसेकहा.
“आप् आखेंबंद कर लीजिए जब मे कहूंतब खोलिएगा.”
उन्होंने अपनी आखेंबंद करलीं। मैंने अपनी स्कर्ट उतार दि पता नहि मेरेमन मे क्याँ आया कि मैंने अपनाटॉप भि उतार दियाअब मे उनके सामने पूर्ण नग्न खड़ी थि। मेरेमन मे एक् औऱ शरारत सूची मैंने मानस भैया सें कहा अपनीआंख बंदकिए रहिए औऱ अपने राजकुमार कों भि आजादकर दीजिए। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी पजामी कों अलगकर दिया। मैंने उनसेकहा आप् अपना कुर्ता भि हटा दीजिए.मेरे कहने पर्र अब वो पूरीतरह मेरे सामने नग्न खड़े थें। मे उन्हें देखकर मन हि मन उत्तेजित हौ रही थि। वोँ नग्न अवस्था मे औऱ भि सुन्दर लगरहे थें। मे भि नग्न थि पऱ वो मुझेदेख नहि पारहे थें। उन्होंने ईमानदारी सें अपनी आंखें बंद कि थि। मे खाट पऱ बैठी हुइ थि। मे खड़ी हुइ औऱ उनसेकहा आप् अपनी आंखें खोल सकते हें.
आंखें खोलने केँ पश्चात उन्होंने अपने जिंदगी मे पहलीबार किसी लड़की कों नग्न देखा थां। उनका राजकुमार तौ इस परिस्थिति कि कल्पना मे पहले हि तनकर खड़ा हौ चुका थां। राजकुमार पहले सें बड़ा हौ चुका थां ये मैंने पहले हि नोटिस कर लिया थां। वो मुझे एकटक देखते रहे मे लज्जा सें अपनी आंखें नीचे कि हुईँ थि पर्र मेरी आंखें उनके राजकुमार पऱ हि टिकी थि। करीब एक् मिनट तक देखने केँ बाद वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरेपास आए औऱ बोले “सीमा तुम् बहोत हि सुंदर होँ मे तुम्हें जीभरकर देख्ना चाहता हूं.” मैंने फिनवही सवाल किया.
“मे याँ राजकुमारी?”
“ दोनों” उन्होंने मुझे सहारा देकर पलंग पऱ लिटा दिया। उन्होंने मेरे पैरों कों छुआ। आरामसे उनकेहाथ मेरी जांघों तक आँ गए। उन्होंने अपनेगाल मेरी जांघों पऱ सटादिए। उन्होंने मुझसे पूछा.
“ क्याँ लड़कियां इतनी कोमल होती हैं?” ये कहतेहुए वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे राजकुमारी केँ पास आँ गये.
राजकुमारी कों देखकर वो अपनी नजरें नहि हटापा रहे थें। वोँ बहोत देर तक उसे देखते रहेफिन मेरी अनुमति सें उन्होंने उसेछुआ। मैंने जानबूझकर अपनी जांघें अलगकर दि। वो आश्चर्य सें मेरी राजकुमारी कों देखते रहे राजकुमारी अपनीलार टपकारही थि। वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपना ध्यान नाभि प्रदेश सें होतेहुए स्तनों कि ओरतरफ लें आये। मेरे दोनों बूब्ज़ तनेहुए थें। मेरे स्तनों कों वो पहले भि छू चुके थें इसलिये उन्होंने मेरी इजाजत केँ बिना हि उन दोनों कों छू लिया.कुछ देर उन्हें सहलाने केँ बाद उन्होंने मेरे दोनों निप्पलों कों भि अपनी उंगलियों मे लेकर महसूस किया। वोँ अपनेहाथ मेरी गर्दन सें होतेहुए मेरे चेहरे पर्र लेँ गए औऱ दोनों हाथों मे मेरा चेहरा लेकर मुझे माथे पऱ चूम लिया औऱ बोले.
“ सीमा तुम् मेरे जिंदगी कि पहली लड़की होँ जिसे मैंने नग्न देखा हैं मे तुम्हारा ऋणी हूं। काश तुम् मेरी जीवनसंगिनी बन पाती.” उन्होंने मुझे होठों पर्र चुम्बन नहि दिया। वो वापस मेरी राजकुमारी कि तरफगए तथा अपनी हथेलियों केँ दबाव सें मेरी जाँघों कों अलगकर रहे थें। मे समझ गई थि वो क्याँ चाहते हैं मैंने उनका सहयोग करने केँ लिए अपने दोनों हाथों सें अपने पैरों कों पकड़ लिया औऱ जितना संभव हौ सकता थां उसे फैला दिया।। राजकुमारी कि दरारअब बढ़ गई थि वोँ पूरीतरह रस मे डूबी हुईँ थि ठीकउसी तरहजिस तरह
किसी ताजेफल मे चीरा लगाने केँ बादउस कां रसछलक कर बाहर् आँ जाता हैं.
मानस नें मेरीतरफ देखा औऱ अपनी उंगलियों कों मेरी राजकुमारी केँ पास लें आये औऱ मेरी इजाजत केँ लिए धीमी आवाज़ मे पूछा…
“क्याँ मे इसेछू सकता हूं?” मैंने सिर हिलाकर इसकी सहमति दे दि। वो अपनी उंगलियों सें राजकुमारी कां मुआयना करनेलगे। पहले उन्होंने अपनी तर्जनी सें मेरी दरार कों ऊपर सें नीचे तक छुआ.ऐसा लगरहा थां जैसे वोँ उसकेरस कों बराबर सें बांट देना चाहते हें। उनकी तर्जनी पूरीतरह गीली होँ गई थि। अगलीबार उन्होंने तर्जनी कां दबाव बढ़ाया तौ दरार अपने आप् फैल गई उन्हें अंदर औऱ भि गीलापन महसूस हुआ। हमारी उंगलियों केँ 3 भाग होते हें उन्होंने उन्होंने अपनी तर्जनी कां पहलाभाग मेरी दरार केँ अंदरडाल दिया थां। अब उनकी तर्जनी नीचे सें ऊपर कि तरफ आँ रही थि। जैसे हि उनकी उंगली मेरी भग्नासा सें टकराई मे बेचैनी उठी। मेरे पैरों कि हरकत सें उन्हें मेरेइस भाग कि अहमियत कां अंदाजा हुआ। उन्होंने अपनी उंगली पीछेकर ली। भग्नासा सें नीचेआने केँ बाद तर्जनी राजकुमारी केँ मुख मे प्रविष्ट होनेलगी। वो आगे बढ़ना चाहरहे थें उन्होंने अपनी तर्जनी कां दबाव बढ़ाया। यदि मे उन्हें नं रुकती तौ वो अपनी अज्ञानता मे अपनी तर्जनी सें हि मेरा कौमार्य भेदनकर देते। वो अपनीइन क्रियाओं केँ दौरान बीच-बीच मे मेरीतरफ देखते थें शायद मेरी रजामंदी केँ लिए.
मैंने उन्हें सिर हिलाकर मनाकर दिया थां उन्होंने मेरी दरार केँ दोनों होंठों कों अब अपने दोनों हाथों केँ अंगूठे औऱ तर्जनी तर्जनी सें औऱ फैलाने कि कोशिश कि ताकि वो अनजानी गुफा केँ रहस्य सें परिचित हौ सकें। दरार कों फैलाते हि अंदर गुलाबी गुफा दिखाई दे गई.
गुफा केँ शीर्ष पर्र स्थित भग्नासा कों भि उन्होंने बहोत ध्यान सें देखा। उनका अंगूठा गुफा मे प्रवेश करने कों आतुर हौ रहा थां। मैंने इशारे सें उन्हें रोक दिया। उन्होंने अपने हाथों केँ सहारे मुझे करवट लेटने कों कहा.फिन आरामसे मुझेपेट केँ बल लिटा दिया.कभी कभी मुझेऐसा एहसास हौ रहा थां जैसेकोई डॉक्टर मेरा मुआयना कररहा हौ। लड़कियों केँ जिस्म मे कोमलता हर स्थान होती हैं। मेरे नितंब देखकर बिनाकहे उन्होंने अपनेगाल उससेसटा दिए। उन्होंने अपने दोनों हाथों सें नितंबों कों नापातथा उन कों अलगकर अलग करके देखने कि कोशिश। मेरे दूसरे दरवाज़ा कों देखते हि उन्होंने अपेक्षाकृत तेज आवाज़ मे बोला…
“दासी भि राजकुमारी जितनी हि हसीन हैं” उन्होंने उसेछुआ नहि औऱ मेरीपीठ सें सहलाते औऱ गर्दन पर्र चुंबन करतेहुए बालों केँ पास आँ गए औऱ मेरेकान मे धीरे-धीरे सें कहा….
“सीमा मे राजकुमारी कों एक् अभूतपूर्व तोहफा देना चाहता हूं” मैंने कुछ नहि बोलाबस सहमति मे सर हिला दिया। मानस भैया पऱ मुझे पूरा विश्वास थां.
इससमय मे भि वासना मे पूरीतरह घिरी हुइ थि। स्वीकृति पाकर वो मेरीपीठ सहलाते हुए नितंबों तक आँ गए औऱ मेरीकमर कों पकड़कर मुझे एक् बारफिन पीठ केँ बल लिटा दिया। उन्होंने मुझे आंखेबाद करने केँ लियेकहा औऱ अगलेदो मिनट तक आंखें खोलने केँ लिएमना किया.मै उनके चमत्कारी तोहफा कि इंतजार करनेलगी.
अचानक मेरी राजकुमारी कि दरार मे मे किसी मोटी पऱ चिपचिपी चीज केँ रेंगनें कां एहसास हुआ। वो दरारों केँ बीच सें होतेहुए मेरी भग्नासा तक गई, औऱ वापसलौट आयी.ये बड़ा हि उत्तेजक एहसास थां। एक् दोबार इसयही क्रिया कों दोहराने कि बादउस रहस्यमई चीजें नें गुफा केँ दरवाज़ा पर्र दस्तक दि औऱ प्रवेश करने कि कोशिश कि। ये इतनी रसीले थि कि मेरा कि मेरा कौमार्य भेदन इसकेबस कां नहि थां। मे निश्चिंत थि। उसने मेरी गुफा मे मे प्रवेश पाने कि भरसक कोशिश कि तथाकुछ देर प्रयास करने केँ पश्चात मेरी भग्नासा पऱ थिरकने लगी। मेरी राजकुमारी केँ लिएये बिल्कुल नईचीज थि। इस स्पर्श सें राजकुमारी केँ अंदर धड़कन बढ़ गई थि। मुझसे अब बर्दाश्त नहि होँ रहा थां। मुझेऐसा महसूस हुआ जैसे उसकासंग देने केँ लिए उसके दोस्त भि आँ गए हें। मेरी राजकुमारी पर्र तीनतरफ सें वार होँ रहा थां। वो रहस्यमई चीजकभी मेरी दरारों कों फैलाती कभी भग्नाशा पऱ थिरकती। मे उत्तेजना केँ चरम पर्र थि मेरी राजकुमारी स्खलित होनेलगी। मे अपने पैरों कों अपने सीने कि तरफ तेजी सें खींचे हुए थि। उत्तेजना केँ आखिरी पड़ाव पर्र मे अपने पैरों कों छोड़कर अपनेहाथ अपनी राजकुमारी तक लें जारही थि ताकि उसकी सहायता कर सकूं।। मेरेहाथ वहां तक मेरेहाथ वहां तक पहुंचते, इससे पहले वो मानस भैया केँ बालों सें टकरागए। मे सारीबात समझ चुकी थि.
मैंने उनकासिर अपनी जांघों केँ बीच सें हटाने कि। उन्होंने अंत मे मेरी राजकुमारी कों दोनों होठों सें चुंबन लियाएवं एवं अपनीजीभ कों दरारों केँ बीच सें लें जातेहुए मेरी भग्नासा कों छू लिया। मे एक् फिनउछल पड़ी। उत्तेजना केँ बाद भग्नासा बहोत संवेदनशील हौ जाती हैं। मैंने अपनी जाँघों कों वापससटा लिया औऱ धीरे-धीरे सें उठकरबैठ गई,.
मानस कि आखों मे वासना थि। उनके होठों पर्र मेरा प्यार रस दिखाई पड़रहा थां। वो कमरे सें सटे बाथरूम मे चलेगए मे खाट पऱ अभि भि नग्न बैठी थि। अब मेरी राजकुमारी कि धड़कन शांत हौ चुकी थि.
मैंने आज तक सोमिल ( मेरा चंडीगढ़ वालायार) केँ संग इतने खुलेमन सें सेक्स नहि किया थां। हमनेआज तक एक् दूसरे कों नग्न नहि देखा थां मैंने उसका हस्तमैथुन कई तरीकों सें किया थां तथा इसमें महारत हासिल कर चुकी थि। वो बार-बार अपना वीर्य मेरेबदन पर्र गिराने कों उत्सुक रहता पऱ मे हमेशा उसे अपनी रुमाल याँ उसकी रुमाल मे गिरा देती थि। कभी कभार लापरवाही बरतने पऱ उसने अपना वीर्य मेरे कपड़ों पऱ गिरा दिया थां। दरअसल सोमिल मे धीरज नहि थां। वो सेक्स कों बहोत जल्दजी लेना चाहता थां। उसने मुझे नग्न करने केँ लिएकई प्रकार केँ प्रलोभन दिए थें पर्र मे हमेशा टाल जाती थि। वो मुझसे बहोत प्रेम करता थां औऱ मुझेसर आंखों पऱ बिठाये रखता थां। उसनेआज तक मेरीकोई बात नहि टाली। मे अपनीसोच मे डूबी हुयी थि तभी बाथरूम कां दरवाजा खुला औऱ मानस भैया बाहर् आँ गये.
उनके लिंग कां तनावकुछ कम हौ गय़ा थां वो चेहरा धोकर वापसआए थें। वापसआकर वो वापस कुर्सी पऱ बैठगए मुझे अभि तक नग्न देखकर उनकी उम्मीदें जागउठी थि। मैंने अपने कपड़े क्यूं नहि पहने थें शायद वोँ यहीसोच रहे थें। मे धीरे-धीरे सें उठकर उनकेपास गई। पास पहुंच कर मैंने बिना उनसे पूछे उनके राजकुमार कों अपने हाथों मे लेँ लिया। राजकुमार जल्दी अपनीतनी हुईँ अवस्था मे आँ गय़ा। मैंने देखा कि राजकुमार 2 सालों मे पर्याप्त बड़ा होँ गय़ा थां। सुनील केँ जितना तोँ नहि पर्र उससे थोडा हि कम थां। ये राजकुमार बहोत हि कोमल थां। मैंने उसे प्रेम सें आगे पीछे करना शुरुआत किया। मे स्टूल लेकर उनके दोनों पैरों केँ बीचबैठ गई औऱ अपने हाथों सें राजकुमार कों खिलाने लगी मैंने अपनी सारी कार्यकुशलता औऱ अनुभव जोँ सोमिल नें मुझे सिखाया थां उसका प्रयोग करनेलगी। हरबार नए अंदाज सें मानस भैया खुश होँ जातेतथा स्खलित होने केँ लिए सजधजकर होँ जाते। फिन मे उनका तनावकम करती.
इस प्रक्रिया मे राजकुमार केँ दोनों अन्डकोशों केँ वीर्य उत्पादन कि गति बढ़ती जारही थि। कुछ वीर्य तौ राजकुमार केँ मुंह सें लार कि तरहटपक रहा थां यही राजकुमार कों सहलाने मे मेरी सहायता कररहा थां। जरूरत पड़ने पऱ मे अपनी राजकुमारी केँ प्यार रस कां उपयोग भि कर लेँ रही थि। मानस भैया अपनेहाथ कभी मेरेपीठ पऱ रखतेकभी स्तनों पऱ। राजकुमार कां उछलना बढ़ चुका थां मानव भैया कां चेहरा लाल होँ चुका थां औऱ वो अपनी गर्दन कों इधर-उधर कररहे थें तथाकमर कों ऊंचाकर राजकुमार कों मेरीतरफ लाने कां प्रयास कररहे थें। मे समझ गयीँ, मैंने भि उन्हें अधिक परेशान नां करतेहुए राजकुमार केँ शिश्नाग्र केँ नीचे वालेभाग पऱ अपनी रगड़ बढ़ा थि.
ज्वालामुखी कां विस्फोट हौ गय़ा वीर्य कि पहलीधार मेरे गालों पर्र पड़ी.इस अप्रत्याशित विस्फोट सें लिंग पर्र मेरी पकड़ ढीली हुई। उसकेमुख पऱ जब तक मे अपनाहाथ लगाती तब तक वो वीर्य वर्षा प्रारंभ कर चुका थां मैंने जल्दी हि अपनी हथेली राजकुमार केँ मुख पर्र रख दि अब वीर्य मेरी हथेलियों सें टकराकर वापस राजकुमार पऱ हि गिररहा थां ऐसालग रहा थां जैसे उसका दुग्ध स्नान होँ रहा होँ। मानस भैया मेरे एक् मम्मों कों तेजी सें दबाएहुए थें तथा मेरे कंधे पऱ उनकाहाथ कसाहुआ थां। लिंग सें हौ रहे वीर्य प्रवाह केँ रुकने केँ पश्चात मैंने अपनाहाथ लिंग पर्र सें हटा लिया.
मानस भैया केँ चेहरे पर्र संतुष्टि थि। उनकी आंखें बंद थि मेरेहाथ हटाने केँ बाद उन्होंने आंखें खोलीं औऱ मुस्कुराते हुए मुझे देखा उनका वीर्य मेरेगाल गर्दन तथा स्तनों पर्र गिराहुआ थां। मे उसे पोछने केँ लिए किसी उचित वस्त्र कि तलाश मे इधरउधर देखरही थि तभी मानस भैया नें हाथ पकड़कर मुझे अपनी जांघ पर्र बैठा लिया। उन्होंने अपने हाथों सें मेरे जिस्म पर्र गिरेहुए वीर्य कों पोछा औऱ स्तनों पऱ मलनेलगे। मुझे थोड़ी असमंजस हौ रही थि। मेरेगाल पऱ गिराहुआ वीर्य मेरे होठों तक आँ चुका थां मानस भैया कि नजर पड़ते हि जल्दी उन्होंने अपने हाथों सें पोछा पऱ तब तक वीर्य मेरे होठों केँ रास्ते अंदर प्रवेश कर चुका थां। वीर्य कां अजीब सां स्वाद मेरे चेहरे घृणा कां भाव उत्पन्न करता इससे पहले हि उनके होंठ मेरे होंठों पर्र आकर चिपकगए। जैसे अपने वीर्य कि इस गुस्ताखी पर्र वो उसेसजा देनाचाह रहे हें औऱ उसे मेरेमुख मे प्रवेश करने सें पहले हि रोक लेना चाहते हें। मे इस अप्रत्याशित कदम सें हतप्रभ थि। इतने दिनों मे कभी भि होठों पऱ चुंबन कि स्थिति नहि आई थि। मानस भैया मेरे होंठचूस रहे थें मे स्वयं कों रोक नहि पाई औऱ इसमें सहयोग करनेलगी.
राजकुमारी मे एक् अजीब सि हलचल हुइ राजकुमार कां तनाव भि मुझे महसूस होनेलगा थां। कुछ हि पलों मे मैंने अपने आपको उनसेदूर किया। मेरी नजरें अभि भि झुकी हुइ थि। मैंने अपने वस्त्रों कि तरफ देखा जोँ उपेक्षित सें पड़ेहुए थें। शायदइस रासलीला मे उनकी अहमियत नहि रह गई थि.
मे अपने वस्त्र लेकर बाथरूम मे चली गई। वापसआकर मैंने देखा मानस भैया नें भि अपने कपड़े पहनलिए थें। अभि मे बातकर पाने कि स्थिति मे नहि थि। अतः मैंने नाश्ते कि थाली उठाई बिनाकुछ बोले अपनेघऱ कि तरफ आँ गई। मानस भैया नें भि कुछ नहि बोला पऱ मुझे छोड़ने सीढ़ियों तक आए। अंततः आज उन्होंने राजकुमारी केँ दर्शन उसके प्यार रसएवं स्पर्श कां पूर्ण खुशी लिया थां.
युवाओं कां शांत औऱ सौम्य बर्ताव चंचल युवतियों कि उत्तेजना जगाने मे मददगार होता हैं। वोँ जब अपने दोस्त पऱ पूर्ण विश्वास कर लेतीं हें तौ नग्नता कां उतना हि मजा लेतीं हैं जितना कि उनके मित्र युवा.
मंजुला चाची नें मुझे देखते हि पूछा
“बेटा कितनी देरलगा दि” मुझेलगा मेरी चोरी पकड़ी गई। मैंने जल्दी अपने कपड़े ठीक करतेहुए कहा.
“चाची वो भैया सें कुछ पढ़ाई कि बातें होनेलगी” मेरीये दलील उन्हें मनपसंद नाँ आयी पऱ मानस भैया पे शक करने कां कोई कारण नहि थां। मे अपने कमरे मे जाकर पलंग पऱ लेट गई। आज कि घटना सें मेरे हृदय मे मानस भैया केँ लिए प्यार उत्पन्न होँ गय़ा थां। मेरेमन मे सोमिल औऱ मानस कों लेकर पशोपेश कि स्थिति होँ गई थि। मुझेये भि नहि पता थां कि इसकेबाद मानस भैया सें अगलेसाल हि मुलाकात होगी कि नहीं.
मानस सें 1 महीने मे हुई अंतरंग मुलाकातों मे उनका कामुक परंतु सहज बर्ताव मेरेदिल कों प्रभावित कर गय़ा थां.
प्यार मे बिताए गएकुछ समय आपकेदिल पऱ एक् गहरीछाप छोड़ जाते हें। कामुकता सें जन्मलिए इस प्रेम कां अपना महत्व थां.
[मे मानस]
सीमा कों छोड़कर आने केँ बाद मेरा ध्यान केवल होंठों केँ चुम्बन पऱ केंद्रित हौ गय़ा थां। होठों केँ चुम्बनों केँ दौरान सीमा नें मेरा बराबरी सें संग दिया थां। मेरेमन मे उसके प्रति प्रेम पनपरहा थां। 1 महीने मे उसने मेरीकाम पिपासा कों एक् अलग ऊंचाइयों तक आया दिया थां। पिछले 1 महीने मे वो कईबार मेरा वीर्य प्रवाह कर चुकी थि। क्याँ उसकी भि कामुकता मेरे हि जितनी थि प्रबल थि? परंतु सीमा कों येसभी केसेपता थां? ये मेरेलिए सवाल चिन्ह थां.
मुझेऐसा प्रतीत होता थां कि वो किसी औऱ केँ संग भि येसभी करती हैं। परंतु राजकुमारी कों छूने केँ दौरान उसकी प्रतिक्रिया अलग हि थि। इससे भ्रम होता थां जैसेये सभी उसकेलिए पहलीबार हुआ थां।। उसका कौमार्य सुरक्षित थां येबात अलग थि परंतु उसे अपनी प्रेमिका कां जगहदे पाना पाना कठिन थां। मगर सीमा नें मेरे हृदय मे अपनाजगह बना लिया थां.
मायाजी दोपहर केँ पश्चात डॉक्टर सें मिलने केँ बादघऱ वापस आँ चुकी थि। उनकी तबीयत अबठीक लगरही थि साम तक सभीकुछ सामान्य हौ गय़ा.
सीमा कों वापस जानां थां मे बहोत दुखी थां। अगलेदिन मे बाजार गय़ा औऱ उसकेलिए कुछ तोहफा खरीदे। सीमा जाने सें पहले मुझसे मिलने आईआज भि उसने स्कर्ट पहनी थि पऱ मुझेपता थां आज हम् दोनों कों वो सुख नहि मिलने वाला थां। मैंने उसे अगलेसाल होने वाले एग्जाम केँ लिए शुभकामनाएं दीं औऱ मुस्कुराते हुए राजकुमारी दर्शन केँ लिए उसका शुक्रिया क्याँ। उसनें मुस्कुराते हुएकहा.
“ आपने तौ दासी केँ भि दर्शन करलिए थें” मे भि मुस्कुरा पड़ा। मैंने उसे उपहार वालाबैग पकड़ाया। इससे पहले कि वो वापस मुड़ती मैंने उसे अपने आलिंगन मे लें लियातथा उसके गालों कों चुमते हुए होठों पऱ आँ गय़ा। होठों पर्र चुंबन लेने केँ पश्चात वो मुझसे अलग हुइ आज कामुकता कां कोईजगह नहि थां। हमारी आंखें नामथीं। मे सीमा केँ संग नीचे आँ गय़ा। सभी सीमा कां हि प्रतीक्षा कररहे थें। वो अपनीजीप मे पीछे बैठी औऱ जीपधूल उड़आती हुईँ नजरों सें ओझल होँ गई। मेरी सीमा भि इसीधूल मे खो गई। मै रुवांसा होँ कर अपने कमरे मे वापस आँ गय़ा
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सीमा कि यादें
एक्-दो दिन दुःखी रहने केँ बाद मे आहिस्ता सामान्य होँ गय़ा मेरे वापस दिल्ली जाने कां टाइम भि आँ गय़ा थां। मायाजी नें मेरेलिए कई सारे नाश्ते केँ सामान बनाए थें। छाया मेरेलिए अभि भि एक् अपरिचित हि थि। इसबार मे उसकी नजरें मुझसे मात्र दोबार मिली थि वो भि खेल केँ दौरान, वापसआते वक्त भि वो मुझे छोडने नहि आयीआई। मैंने बापू केँ पांवछुए तथा मायाजी कों हाथ हिलाकर अभिवादन किया औऱ दिल्ली केँ सफर पऱ रवाना हौ गय़ा। मायाजी कां पांव न् छूना शायद बापू कों अजीबलगा हौ पऱ वो मेरी स्थिति समझते थें। मायाजी मेरे पांव छूने कां प्रतीक्षा नहि थां। इस एक् महीने मे उन्होंने मेरी बहुत सहायता कि थि जैसे मेरे पसन्द केँ पकवान बनाना तथा मेरे कपड़ों आदि कां ख्याल रखना। दिल्ली पहुंच कर मे अपने दोस्तों मे मशगूल हौ गय़ा। मे अपनी पढ़ाई पऱ वापस ध्यान देनेलगा इसबार कि छुट्टियां मेरेलिए यादगार छुट्टियां थि। मे 19 वर्ष कां होँ चुका थां औऱ मुझे अपने युवा होने पर्र उचित इनाम भि मिल चुका थां इसका सारा श्रेय सीमा कों जाता थां.
मेरामन अब ब्लू फिल्मों सें पूरीतरह हट चुका थां। मशीनों कि तरह एक् दूसरे सें संभोग करने वाले नायक औऱ नायिका मुझेअब प्रभावित नहि करते थें। नायक द्वारा नायिका कां बेरहमी सें योनि मर्दन अब मुझे हास्यास्पद लगता थां। पऱ ब्लू फिल्मों सें मुझे मुखमैथुन कि शिक्षा मिली थि। मैंने इसइस विद्या कां प्रयोग सीमा कि राजकुमारी पर्र किया थां औऱ इसका परिणाम सुखदरहा थां। उसे मेरीये कला पसन्द आई थि। इसबात कि तस्दीक उसने अपने प्रत्युत्तर मे कर दि थि.
सीमा केँ संग बिताए पलों सें मुझे लड़कियों केँ लज्जा औऱ हया कां मूल्य समझ आँ चुका थां। लड़कियों कि योनि इतनी कोमल होती हैं मैंने ये नहि सोचा थां। मेरीजीभ भि उसकी कोमलता सें प्रभावित थि। सीमा केँ स्तनों कां स्पर्श औऱ उसकी कोमलता मुझेयाद हैं परंतु उसका आकार अभि छोटा थां। ब्लू फिल्मों कि नायिकाओं कि तरह उसके बूब्ज़ विकसित नहि थें। मे इसबात सें लज्जित महसूस कररहा हूं कि मैंने सीमा कि ब्लू फिल्म कि नायिका केँ संग तुलना कि। सीमा कि हाजिर जवाबी औऱ कामुक परिस्थितियों मे भि बिना दोस्त कों दुखीकिए अपने कौमार्य कि रक्षा करने कि कला अद्भुत थि.
मुझे दिल्ली आए 4 महीने बीत चुके थें इस दौरान नां तोँ मैंने कोई ब्लू फिल्म देखी नहि नां कोई गंदे औऱ कामुक साहित्य पढ़े। मे अपनी पढ़ाई पर्र पूरीतरह ध्यान देरहा थां हां कभी-कभी सीमा कों याद करके हस्तमैथुन कर लिया करता थां। चंडीगढ़ यहां सें बहोत दूर नहि थां पऱ सीमा सें मिलने जाने कि मेरी हिम्मत नहि थि। वहां जाने कां औऱ उससे मिलने कां रिस्क मे नहि लें सकता थां। उस वक़्त फोन कि उपलब्धता आम नहि थि औऱ सीमा सें बात करने कां कोई तरीका नहि थां। मुझे नहि पता थां कि सीमा मुझे कितना याद करती हैं पर्र मे उसको अक्सर याद करता थां केवल हस्तमैथुन केँ वक्त हि नहि अपितु उसकी बातें उसका राजकुमारी कहने कां अंदाज ये हमेशा मेरेमन कों गुदगुदाते रहते थें.
छायाचित्र “लम्हें”
सेमेस्टर एग्जाम ख़त्म होने केँ बाद मे अपने दोस्तों केँ संग “लम्हे” पिक्चर देखने गय़ा। ये अनिल कपूर औऱ श्रीदेवी द्वारा अभिनीत फिल्म थि। इसमें अनिल कपूर अपने सें उम्र मे बहुत बड़ी युवती सें प्रेम करता हैं बाद मे उसकी विवाह उसी युवती कि पुत्री सें होती हैं,। फिल्म मुझे मेरेसब दोस्तों कों भि पसन्द आई थि। परीक्षा ख़त्म होने केँ कारण मे भि तनाव मुक्त थां पलंग पर्र लेटते हि मुझे सिनेमा केँ दृश्य यादआने लगे। मे श्रीदेवी जैसी मादक हीरोइन कों अपनी कल्पना मे नग्न करनेलगा। साड़ी केँ पीछे श्रीदेवी केँ नितंबों कि कल्पना करते करते अचानक मिले मायाजी कि याद आँ गई। उनकी उम्र फिल्म कि नायिका केँ लगभग हि थि मैंने उससे ध्यान हटाने कि कोशिश कि। माना कि मेरे सें उनसेकोई नाता नहि थां फिन भि वो मेरेघऱ मे रहती थि मुझेइस बात पर्र थोड़ी ग्लानि हुई औऱ मे श्रीदेवी कों आगे नग्न नहि कर पाया परंतु श्रीदेवी केँ उरोज औऱ नितंब भुलने लायक नहि थें। मैंने श्रीदेवी केँ दूसरे किरदार कि ओर ध्यान लगाया जिसमें वो नायिका कि बेटी बनी थि। वो मेरी उम्र केँ हिसाब सें हस्तमैथुन केँ लिए उपयुक्त नायिका बन सकती थि। मैंने श्रीदेवी केँ वस्त्र उतारने शुरुआत किए औऱ फिन मायाजी कां ध्यान वापस दिमाग़ मे आँ गय़ा। दरअसल श्रीदेवी केँ नितंब औऱ उरोज मायाजी सें हुबहू मिलते थें। मैंने हस्तमैथुन कां विचार त्याग दिया औऱ सो गय़ा.
स्वप्नसुंदरी
एक् बड़े सें राजसी बिस्तर पर्र मे पीठ केँ बल लेटाहुआ थां बिस्तर पऱ सफेदरंग कि मलमल कि चादर पड़ी हुईँ थि। कमरे मे कई सारी मोमबत्तियां जलरही थि कमरे मे अद्भुत शांति थि। एक् नव योजना जिसने सफेदरंग कि लाल पाढ़ वाली साड़ी पहनरखी थि कमरे मे प्रविष्ट हुइ। उसकेहाथ मे एक् बड़ा कटोरा थां वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलतेहुए मेरे समीपआई। अधिक रोशनी नाँ होने कि वजह सें मे उसका चेहरा नहि देखपा रहा थां। उसके उरोज पूर्णतयः विकसित थें कटी प्रदेश केँ उभार दर्शनीय थें। ऐसालग रहा थां जैसे उसने मात्र एक् वस्त्र हि पहना हैं। मम्मों अंदर सें झांकरहे थें। उसकी नाभि स्पष्ट रूप सें दिखाई देरही थि। उसने साड़ी नाभि सें करीब-करीब चार अंगुल नीचे बांधी हुईँ थि। उसकेबाल खुलेहुए थें एवं सामने कि तरफ लटकेहुए थें उसकाकटी प्रदेश मादकतथा जांघें सुडौल थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे वो मेरे समीपआकर बैठ गई। उसने कटोरा बिस्तर पऱ रख दिया उसके दोनों घुटने मेरे मेरी जांघों सें सटेहुए थें वो मुझे वज्रासन मे बैठी हुई दिखाई देरही थि.
इस अवस्था मे मे उसके स्तनों कां उभार पूरीतरह देखपा रहा थां। ऐसा प्रतीत होँ रहा थां जैसे किसी नें सांची केँ स्तूप कों सफेद पारदर्शी चादर सें ढक दिया थां। कमर कां खुलाहुआ हिस्सा आकर्षक लगरहा थां। उसकी जांघें घुटना औऱ पिंडलियों सब दिखाई पड़रहे थें कभी वो नग्न दिखाई पड़ती कभी उसकी साड़ी सामने आँ जाती। उसनेपेर मे आलता लगाया हुआ थां तथा पैरों मे पाजेब पहनी हुई थि। वो साक्षात रतिलग रही थि। मे उसका चेहरा अभि तक नहि देखपा रहा थां। मे खुद एक् सफेदरंग कि धोती पहनेहुए लेटाहुआ थां। कमर केँ ऊपर मेरे जिस्म पर्र कोई वस्त्र नहि थां। उसने कटोरी मे सें सुगंधित तेल निकालकर मेरे पैरों कि उंगलियों मे लगाना शुरुआत किया औऱ धीरे धीरेऊपर कि तरफ बढ़ने लगी। मे बार-बार उसे पहचानने कि असफल कोशिश कररहा थां। उसकेहाथ अब मेरे घुटनों तक आँ चुके थें वो बढ़ती गई तथा मेरी जाँघों तक पहुंच गई। उसने मेरी धोती कि गाँठखोल दि तथा अपने दोनों हाथों सें धोती कों मेरीकमर केँ दोनों तरफ गिरा दिया.
मे उसके सामने पूरीतरह नग्न पड़ाहुआ थां। मेरा लिंग तनाव सें भर चुका थां। उसनव योजना केँ मादकता नें मेरे लिंग मे अभूतपूर्व तनाव पैदाकर दिया थां। उसकेहाथ मेरीकमर कों तेल सें सराबोर करतेहुए नाभि प्रदेश तक पहुंच गए उसने मेरे लिंग कों उपेक्षित संग छोड़ दिया थां। आहिस्ता वो मेरे सीने तक आँ गई सीने कि मालिश करते वक़्त उसने मेरे छोटे-छोटे निप्पलों कों अपनी उंगलियों सें दबाया मेरा लिंगअब औऱ भि उत्तेजित होँ चुका थां। वो मेरे बायीं तरफ बैठी थि। उसने मेरे बाएं कंधे औऱ बाएंहाथ मे तेल लगाया। जब वो दाहिने हाथ मे तेल लगाने केँ लिएआगे कि तरफ झुकी तोँ उसके मम्मों मेरे सीने केँ बिल्कुल समीप आँ गए.
मे अपना कौतूहल बर्दाश्त नहि कर पायातथा अपने बाएंहाथ सें उसके स्तनों कों छूने कि कोशिश कि। पऱ पता नहि मेरेहाथ क्यूं नहि उठरहे थें। जैसेलग रहा थां वो जड़ हौ गए हें। मे चाहकर भि वो वोँ कोमल मम्मों नहि छू नहि पारहा थां, बड़ी विषम परिस्थिति बन गई थि। मैंने अपने दाहिने हाथ कों भि उठाना चाहा पर्र असफलरहा। उसकेहाथ वापस मेरे सीने पऱ आँ चुके थें औऱ वो आरामसे मेरे नाभि कि तरफबढ़ रही थि। उसने अपनी उंगलियों सें मेरे नाभि केँ अंदरतेल लगाया उसने अपनी हथेलियों सें मेरे नाभि प्रदेश कों सहलाते हुए अपनेहाथ मेरे अंडकोष तक लेँ आई। मेरी व्यग्रता अब बढ़ती जारही थि.
मेरेहाथ पेर अपनी स्थान सें नहि उठरहे थें। मात्र लिंग केँ तनाव कां एहसास मुझे होँ रहा थां। अचानक मैंने अपने लिंग पर्र उसकाहाथ महसूस किया। जैसे वो लिंग कों मेरी नाभि कि तरफ व्यवस्थित कररही होँ। उसने मेरीपीठ औऱ मेरे नितंबों कों भि तेल सें सराबोर कर दिया मेरा पूराबदन तेल सें डूबाहुआ थां। आश्चर्यजनक रूप सें मुझे अपने पूरेबदन पर्र उसके हाथों औऱ उंगलियों कां दबाव महसूस होँ रहा थां परंतु मे अपनाहाथ औऱ पेर उठाने मे सक्षम नहि थां.
उसने मुझेफिन सें मुझेपीठ केँ बल लिटा दिया औऱ हाथों मे तेल लेकर मेरे लिंग केँ चारों तरफ मलनेलगी। मेरा लिंग भि उसके हाथों कि इंतजार कररहा थां। मैंने फिन सें उसे छूने कि कोशिश कि पऱ असफलरहा। अंततः उसने मेरे लिंग कों अपने कोमल हाथों मे लेँ लियातथा अपनी उंगलियों सें उसकी चमड़ी कों पीछे किया। जैसे वो लिंग केँ मुख कों देख्ना चाहती होँ.
उसकी उंगलियां तरह-तरह केँ करतब दिखारही थि। मैंने उससे पूछने कि कोशिश कि आप् कौन हें परंतु मुझेकोई जवाब नहि मिला। उत्तर मे उसने मेरे लिंग कों प्रेम सें सहला दिया.अब वो अपनेहाथ तेजी सें चलारही थि। मेरा लिंग लावा उगलने केँ लिए सजधजकर हौ चुका थां.अचानक मैंने देखा उसके बूब्ज़ सें साड़ी हट चुकी हैं वो कमर केँ ऊपर पूरीतरह नग्न दिखाई देरही थि। फिन मैंने उसे पुकारा “सीमा” मुझे उसके हंसने कि आवाज़ सुनाई दि। एक् लम्हा केँ लिए मुझेलगा जैसे वो कोई अप्सरा थि। उसने अपने हाथों कों तेजी सें चलाते हुए कहां
“मानस भैया मे आपकेमन मे हूं आप् मुझे क्यूं नहि पहचान पारहे हें?” मेरी धड़कनें तेज हौ गयीं औऱ उसकी उंगलियों कि चाल भि। मैंने कहा “मायाजी” वो हंस पड़ी औऱ मेरे शिश्नाग्र कों कसकरदबा दिया मेरे लिंग सें वीर्य कि धारफूट पड़ी। मुझेअब चेहरा साफसाफ दिखाई देरहा थां। माया जीके चेहरे औऱ स्तनों पऱ मेरे वीर्य केँ धार दिखाई पड़रही थि वो मुस्कुराते हुएखाट सें उठने लगीं मे भि उनके पीछे-पीछे उठनेलगा.
जमीन पऱ मेरेपेर पड़ते हि मेरी निद्रा भंग होँ गयीँ,। मेरी आंखें खुल चुकी थि औऱ मे अपने आप् कों हॉस्टल केँ कमरे मे अकेला अपनी पजामी कों नीचेकिए स्खलित हुए लिंग केँ संग असहाय सां खड़ा थां। मेरा स्वप्न टूट चुका थां। मे मायाजी कों याद करतेहुए पुनःसो गय़ा। मन हि मनये ख्वाहिश थि कि वो स्वप्न फिन सें आए.
जिंदगी मे कुछ विचार औऱ भावनाएं मात्र सपनों मे हि आते हें हकीकत उन सें भिन्न होती हैं.
घऱ कि याद
पढ़ाई केँ बाद मुझेजब भि वक़्त मिलता मे रोमांटिक साहित्य पढ़ने लगा। मैंने कामसूत्र कि किताब पढ़ीं पर्र वो अत्यंत जटिल थि। लोलिता उपन्यास नें भि मुझे अंदर तक छू लिया थां। मेरेमन मे हमेशा नायिका केँ संगजी गयीँ, कामवासना एक् पूजा स्वरूप थि। मे हरहाल मे अपनी नायिका कों खुश औऱ मदमस्त देख्ना चाहता थां। नायिका कि स्वीकृति होने पर्र मेरेलिए उसकी उम्र औऱ यहां तक कि रिश्तों कि अहमियत भि नहि रह गई थि। ड्रीम्स मे मायाजी केँ आने केँ बाद मैंने कभीकभी उनके ड्रीम्स खुली आंखों सें भि देखे थें, मे भि अबकाम पिपासु हौ चुका थां, धीरे-धीरे धीरे-धीरे ये वर्षबीत गय़ा परीक्षा केँ बाद मुझे ट्रेनिंग मे जानां थां इसलिये मे देहात नहि जासका, बापू मुझसे मिलने दिल्ली आए उन्होंने बताया कि सीमा देहात पऱ आई हुईँ हैं औऱ उसका सिलेक्शन इंजीनियरिंग मे हौ गय़ा हैं। उसने तुम्हें शुक्रिया बोला हैं.
मैंने अपनी कामुकता औऱ कैरियर मे सें कैरियर कों चुना थां.
मे बापू सें मिलकर अपनी ट्रेनिंग पऱ चला गय़ा। रास्ते मे मुझे सीमा कि बहोत याद आँ रही थि। इस टाइम वो पूरीतरह तनाव मुक्त होती। औऱ हम् दोनों उन्मुक्त भाव सें प्यार रस मे डूबे होते। पऱ नियत कों ये मंजूर नहि थां। मेरी ट्रेनिंग उतनी हि जरूरी थि। अगलेकुछ महीने मैंने खूब पढ़ाई कि अपने कोर्स कि भि औऱ कामुक साहित्य कि भि। अपनी कामवासना कों शांत करने केँ लिए मेरी मुख्य नायिका सीमा हि थि परंतु कभी-कभी मेरी सहपाठी राधिका औऱ मेरी टीचर भि मेरासंग दे देतीं थीं.
कॉलेज मे मेरेदो वर्षबीत चुके थें। इस दौरान मे मात्र एक् बारघऱ गय़ा थां जब मे सीमा सें मिला थां.
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बदलते रिश्ते
छाया एक् अप्सरा
इसबार दीपावली कि छुट्टियां ज़्यादा हि लंबी थि मुझे करीब 7 दिनों कां वक्तमिल गय़ा थां। सबयार अपने अपने घरों कों जारहे थें मे भि घऱ जाने कि तैयारी करनेलगा। घऱ पऱ मुझे पिताजी सें हि मिलने कि खुशी थि। पऱ इस सीमा वहां नहि थि। अचानक मुझे मायाजी यादआई औऱ मेरे चेहरे पऱ मुस्कुराहट आँ गई। मे अगली सुभह अपने देहात पहुंच गय़ा.
पिताजी मुझे लेनेआए थें। घऱ पहुंच कर मे सबसे पहले मंजुला चाची केँ यहां गय़ा। उनसे बातें कि औऱ उनसे सीमा कां हालचाल पूछा। उन्होंने बताया कि सीमा नें बेंगलुरु केँ किसी अच्छे कॉलेज मे एडमिशन लेँ लिया हैं औऱ वो वही रहती हैं। मैंने उनसे कॉलेज कां नाम पूछा तोँ वो मुझे नहि बता पायीं। मुझे बापू नें बाद मे बताया कि सीमा केँ पिताजी कां उनके छोटे भइया सें जमीन कों लेकरकुछ विवाद हौ गय़ा हैं औऱ वो शायद देहात नहि आएंगे। उन्होंने अपने हिस्से कि जमीन भि बेच दि हैं.
मेरेपास सीमा कां हाल-चाल लेने केँ लिएकोई सूत्र नहि बचा थां। मे मायूस होकर अपने कमरे मे आँ गय़ा मेरेमन सें सीमा कि यादें नहि जारही थीं। अचानक मेरीनजर पलंग पऱ पड़ी मायाजी नें आजवही चादर बिछाई थि जिस पऱ मैंने सीमा कि राजकुमारी केँ दर्शन लिए थें। अचानक मुझे सीमा कि दि गई गुरुदक्षिणा कि यादआई। मैंने बैड केँ नीचेरखे अपने पुराने संदूक कां ताला खोला औऱ सीमा द्वारा दि गई हमारे प्यार रस मे डूबी सीमा कि पेंटी कों बाहर् निकाल लिया। पैंटी पूरीतरह सिकुड़ करआपस मे चिपक गई थि। मैंने उसे उसके पुराने स्वरूप मे लाने कि कोशिश कि.
पैंटी कां सुर्ख लालरंग थोडा बदल चुका थां उस पर्र स्थान-स्थान गहरे निशान पड़ चुके थें। मैंने अनायास हि उसे उठाकर चूम लिया औऱ औऱ उसकी खुशबू लेने कि कोशिश कि। उसमें सें अभि भि सीमा द्वारा उसदिन लगाएगए परफ्यूम कि खुशबू आँ रही थि। मे आज महसूस कर पाता हूं सीमा नें गुरुदाक्षिणा केँ लिए अपनी सुहागरात जैसी तैयारी कि थि औऱ मेरेमन मे उसदिन कि एक् अमिटछाप छोड़ गई थि.
नित्य कर्मों सें निवृत्त होकर मे अपनी किताबें पलटरहा थां तभी सीढ़ियों पर्र किसी केँ आने कि आहट हुइ। दरवाजा खुला औऱ मायाजी हाथ मे थालीलिए हुए अंदरआयी। मायाजी नें ठीक वैसी हि साड़ी पहनी थि जैसी मैंने अपने स्वप्न मे देखी थि। बस साड़ी पहनने कां ढंग पूर्ण व्यवस्थित थां। थालीरख कर वोँ वापस जानेलगी इसी दौरान मैंने उनके स्तनों, कमर औऱ जांघों कि तुलना स्वप्न मे देखी गई सुंदरी सें कर डाली। मायाजी शायदउस स्वप्न सुंदरी सें अधिक आकर्षक थीं.
“लम्हे” फिल्म नें मुझे अपने सें बड़ीतथा छोटी यौवनाओं मे प्रेम औऱ कामुकता ढूंढने कि इजाजत दे दि थि वो भि बिना आत्मग्लानि केँ.
थोड़ी देर मे रोहन औऱ रियाहाथ मे लूडोलिए मेरे कमरे मे आए। वो दोनों बहोत प्यारे बच्चे थें। उन्होंने मुझसे लूडो खेलने कि जिद कि। मैंने उसे स्वीकार कर लिया। हम् लोग लूडो खेलने लगे। मे बार-बार खिड़कियों सें बाहर् देखरहा थां अचानक मुझे एक् लड़की अपनेबाल तौलिए सें झड़ते हुए दिखाई दि। उसने गुलाबी रंग कां घाघरा चोली पहनाहुआ थां। उसकी हाइट काठी बहोत आकर्षक थि। मैंने उसे पहचानने कि बहोत कोशिश कि पर्र असफलरहा। मैंने छोटे रोहन सें पूछा.
“ वोँ कौन हैं? छोटा रोहन हंसने लगा औऱ बोला
“वो तौ छाया दिदी हें.” औऱ अपनेखेल मे लग गय़ा.
मेरी आंखों कों यकीन नहि हौ रहा थां। मेरेघऱ मे आज सें दो-ढाई साल पहलेआई छाया इतनी बड़ी हौ गई थि। मे उसे देखने कों लालायित हौ रहा थां। पिछले 2 सालों मे मैंने जितना उसे नजरअंदाज किया थां उतनी हि तड़प मुझेअब उसे देखने केँ लिए होँ रही थि। मेराखेल मे बिल्कुल भि मन नहि लगरहा थां। पऱ सीधाछत पऱ जाने कि हिम्मत नहि थि। मन कि बेचैनी बढ़ती जारही थि.
साम कों नीचे मे बापू केँ संग बैठकर गरमचाय पीरहा थां तभी वहां पर्र मायाजी आँ गई। उन्होंने बताया इसबार छुट्टियों मे जब सीमाआई थि तौ वो तुम्हारी बहोत तारीफ करती थि। तुमने पिछली छुट्टियों मे उसे जौ पढ़ाया थां उससे उसको बहोत फायदा हुआ थां। औऱ वो तुम्हारी बहोत शुक्रगुजार थि। इसबार आने केँ बाद उसने छाया कों भि परीक्षा कि तैयारी केँ बारे मे सिखाया तथा अपनी किताबें भि दि गई हैं.
पिताजी नें कहा
“मानस पिछले 2 साल मे छाया नें पढ़ाई मे बहोत प्रगति कि हैं। उसने 11 वीं कि परीक्षा भि 85% अंकों सें पास कि हैं। तुम् उसका मार्गदर्शन करो तौ शायद इंजीनियरिंग मे दाखिला पा सकती हैं.”
मैंने सहमति मे सर हिला दिया.रात कों करीब-करीब 8:00 बजे मे खाने कि इंतज़ार कररहा थां। तभी दरवाजे सें छाया नें हाथ मे थालीलिए प्रवेश किया। मुझे एक् समय केँ लिए विश्वास हि नहि हुआ कि छाया इतनी बड़ी हौ गई हैं.
युवावस्था मे लड़कियों मे शारीरिक विकास तीव्रता सें होता हैं.
मेरी पारखी निगाहों नें उसे बहोत ध्यान सें देखा। मैंने मौन तोड़ते हुएकहा
“थाली टेबल पऱ रख दीजिए.” हसीन लड़कियों केँ लिए मेरेमुख सें सम्मान सूचक शब्दखुद हि निकलते थें.
उसने सहमति मे सिर हिला दिया। वो दोकदम आगे बढ़ी औऱ टेबल पऱ थाली रखकर वापस मुड़कर जानेलगी। मैंने उसे रुकने कों कहा। वो वापस मुड़कर खड़ी होँ गई। मैंने उससे इशारा कर स्टूल पर्र बैठने केँ लिएकहा। वो खुशी-खुशी बैठ गई। वो प्रसन्न दिखाई देरही थि। मैंने हिचकिचाते हुएउसे पढ़ाई मे अच्छे नंबरों केँ लिए बधाई दि औऱ कहा कि वो मेरेपास कुछ भि पूछने आँ सकती हैं। मे बीच मे तिरछी नजरों सें छाया कों देखरहा थां। वो गर्दन झुकाकर अपने घुटनों कि तरफदेख रही थि। तथा अपनी उंगलियों कों आपस मे रगड़रही थि। वो अभि भि सामान्य नहि होँ पारही थि.
कुछदेर बाद वो चली गई। मे बैड पर्र आकर छाया केँ बारे मे सोचने लगा.आज सें करीब-करीब ढाईसाल पहलेजब वो यहांआई थि तब एक् ग्रामीण लड़की थि। पऱ अब वो एक् आकर्षक युवती मे परिवर्तित होँ चुकी थि। मैंने कभी भि उसे अपनी छोटी बेहन कि संज्ञा नहि दि थि। मेरी मुलाक़ात हि उससे बहोत कम होती थि बातचीत तोँ दूर कि बात थि। जब मेरा संबंध मायाजी सें हि नहि थां तौ छाया सें होने कां सवाल हि नहि उठता थां.
आज छाया कों देखकर मुझे उसमें सीमा दिखाई देरही थि। छाया सीमा कि तुलना मे पतली औऱ छरहरी थि उसकारंग बेहद गोरा थां तथा त्वचा बहोत हि कोमलएवं पतली थि। चेहरे पऱ नाक नक्श बेहद हसीन थें। आंखें बड़ी बड़ी थि औऱ होंठ गुलाबी थें। घागरा उसके नितंबो औऱ जांघों कां आकार ज़रूर छुपा लेँ गय़ा थां पऱ चोली स्तनों कां आकार छुपा पाने मे नाकाम थि। छाया केँ बूब्ज़ विकसित हौ चुके थें औऱ उसके कोमलबदन कि शोभा बढ़ारहे थें। उसकेबाल थोड़े घुंघराले थें तथा उसके कंधे तक आँ रहे थें। चेहरे पऱ मासूमियत कूट कूटकर भरी हुईँ थि। आज तक जितनी युवतियां मैने देखी थि उनमे छाया सबसे हसीन, कोमल औऱ मासूम थि। मे उसेयाद करतेहुए नींद केँ आगोश मे चल गय़ा.
अगली सुभह मे प्रसन्न मुद्रा मे उठा। बाहर् धूप खिली हुईँ थि। छत पऱ थोड़ी देर टहलने केँ बाद मे वहींधूप कां मजा लेतेहुए फिन छाया केँ बारे मे सोचने लगा। छाया नें अपने सौंदर्य सें मुझे उसके बारे मे सोचने पर्र मजबूर कर दिया थां.
छायाएवं सीमा
( मे छाया )
आप् सभी मुझसे परिचित होँ हि चुके हें। जब सें मे इसघऱ मे आई थि मुझेइस घऱ मे सभीकुछ मिला। मानस केँ पिताजी मुझे अपनी बेटी कि तरह हि प्रेम करते थें। उन्होंने मेरी पढ़ाई पऱ विशेष ध्यान दिया थां। वो चाहते थें कि मे पढ़लिख कर अपने पैरों पऱ खड़ी होँ जाऊं ताकि स्वयं कां औऱ अपनी माँ कां ख्याल रख सकूं.जब मे यहांआई थि तब मानस भैया अपनी पढ़ाई मे पूरीतरह मशगूल थें। वो मुझसे दूरदूर रहते थें ये मेरेलिए भि अच्छा थां। मे भि नए माहौल मे अपने आप् कों ढालने कि कोशिश कररही थि। मैंने घऱ मे इतनी संपन्नता कभी नहि देखी थि। मानस भैया केँ दिल्ली जाने केँ बादघऱ मे हम् 3 लोग हि बचे थें। मे अबघऱ कि लाडली बन चुकी थि। मैंने मन हि मन याँ निश्चय कर लिया थां मे अपनीआगे कि पढ़ाई पूरी इमानदारी सें औऱ मेहनत सें करूंगी। अपनी पुरानी जीवन मे मे पढ़ाई मे पहले हि पीछे होँ चुकी थि। पिछले सालजब सीमा दिदी औऱ मानस भैया यहांआए थें तौ सीमा दिदी सें मेरी दोस्ती होँ गयीँ, थि। उन्होंने मुझे पढ़ाई केँ लिए प्रेरित किया औऱ तरह-तरह कि बातें कि.
मे सीमा दिदी सें छोटी थि फिन भि मेरे बूब्ज़ उनसे थोड़े सें बड़े थें। वो बार-बार मुझसे मजाक मे इसे बदलने केँ लिए कहती औऱ मेरी हंसीछूट जाती थि। मेरी त्वचा औऱ उसका निखार भि उनकेलिए कौतूहल कां विषय थां। वो बार-बार मुझसे पूछती कि तुम् क्याँ लगाती हौ मे निरुत्तर थि। मैंने घरेलू चीजों केँ अलावा कभी किसी ब्यूटी प्रोडक्ट्स कां इस्तेमाल नहि किया थां। वो कहती कि तुम्हारी त्वचा बहोत कोमल हैं। एक् बार उन्होंने अपने हाथों सें मेरी कलाई कों तेजी सें पकड़कर मुझे खींचा। जब उन्होंने अपनाहाथ हटाया तोँ उंगलियों केँ निशान मेरी कलाई पर्र साफ दिखाई देरहे थें। उन्होंने हंसकर मुझे मेरी कलाई दिखाई औऱ कहा छायाजब तुम् लड़कों केँ हाथ लगोगी तब तौ पूरीतरह चितकबरी हौ जाओगी औऱ कहकरजोर जोर सें हंसने लगी,
छाया दिदी सें बातें कर कभी-कभी मुझे अपनी योनि मे गीलापन महसूस होता थां। वोँ मुझसे पूरीतरह खुल गई थि। एक् बार हम् दोनों अकेले थें तब उन्होंने मुझे अपने मम्मों दिखाए थें। वोँ मुझसे मेरे स्तनों कों दिखाने कि जिद कि उनके बार-बार आग्रह करने पर्र मैंने अपने मम्मों भि दिखादिए थें। उन्हें अपने हाथों सें छूने केँ बाद वो बहोत खुशलग रही थि। बार-बार यही कहती थि बूब्ज़ मुझेदे दे। मुझे शोले फ़िल्म कां डायलाग याद आँ जाता औऱ हम् दोनों हँस पड़ते.
एक् बार वो मेरे स्तनों कों देर तक सहलाती रही। उनके बार-बार छूने सें मेरे योनि मे गीलापन आँ चुका थां। उन्होंने मुझे मेरे नितंबों सें पकड़कर अपने आलिंगन मे लेँ लिया औऱ बोलि वो कौन भाग्यशाली होगा जौ मेरी सहेली कां कौमार्य भंग करेगा। जैसे उन्हें पूरा विश्वास हौ कि मेरा कौमार्य सुरक्षित हैं। उनके आलिंगन सें मे उत्तेजित होनेलगी थि। उनकासंग मुझे बहोत अच्छा लगता थां। एक् दिन उन्होंने मुझसे मानस भैया केँ संगचल रही उनकी रासलीला केँ बारे मे भि बताया। जितना वो बताती उतना हि मे उत्सुक होती.
जब श्रोता अच्छा हौ तौ वक्ता अपनेमन कि सारी बातें खुलकर बताता हैं.
सीमा दिदी नें छुप्पन छुपाई केँ दौरान कि गई कामुक गतिविधियों कि सारीकथा मुझे सुना दि। गुरुदक्षिणा औऱ राज कुमारी दर्शन कां वो वृत्तांत मेरी योनि कों प्यार रस मे भिगो दिया थां। मुझेएसा महसूस होँ रहा थां जैसे मे स्खलित होँ गई, थि.
सीमा नें मुझेये भि बताया थां कि उन्होंने मानस भैया केँ अलावा सोमिल ( जोँ उनका चंडीगढ़ मे यार थां) केँ संग भि इसी प्रकार मजे किये हें.
मेरेमन मे मानस भैया कि छविबदल चुकी थि उन्होंने मुझे शुरुआत सें हि अपनी बेहन कां दर्जा नहि दिया थां अतः मैंने भि उन्हें इस बंधन सें आजादकर दिया थां। अभि भि मे उन्हें मानस भैया बुलाती थि पर्र ये सीमा द्वारा बुलाए गए मानस भैया सें कहीं भि अलग नं थां। मे जान चुकी थि कि
अपनी कामुकता कों जीवंत रखतेहुए अपने कौमार्य कों सुरक्षित रखाजा सकता हैं.
। मैंने उन्हें अपना गुरुमान लिया थां.
इसबार मानस भैया पूरे डेढ़साल बादआए थें मेरा शारीरिक विकास भि होँ चुका थां। मेरी योनि केँ आसपास सुनहरे बाल आँ गए थें परंतु आश्चर्यजनक रूप सें मेरेहाथ पैरों याँ बदन केँ अन्य किसी हिस्से पऱ कोईबाल नहि थें। मैंने अपने आप् कों आईने मे नग्न देखती औऱ ईश्वर द्वारा दि गई इसइस हसीन काया केँ लिए उनकी कृतज्ञ होती.
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