♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Super & Jabardast & Gajab & Very Nice update bro
Har mummy की tarh gori ne bi apne bete पर aane wale khatre ko pehle hi उसके dill ❤️ ne bhap लिया yahi too sbi chijo से upr aur alag jai maata di
Shiva kaa character har bar choka deta hain पर ispr too jese full too sock bro
Aakhir एक stri aur mummy jaag hi gyi pratibha mai aakhir kb tk apne aapko y dilasa deti की ajay singh b usse pyar krta hain
Waiting for next
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो, आज आख़िरी कां एपसोड देने कि कोशिश करूॅगा। हलाॅकि एपसोड लिखने कां बिलकुल भि मन नहि कररहा। क्योंकि मेरी दादीमा कि तबीयत मे बिलकुल भि सुधार नहि हौ रहा हैं।
मन मे तरहतरह कि आशंकाएॅ उत्पन्न होँ रही हें। आप् सबसे प्रार्थना हैं कि आप् सभी भगवान सें मेरी दादीमा केँ बेहतर स्वास्थ केँ लिए दुवा करें।
daadi k swasthya mai jald hi sudhar hoga yakin rakhiye. Agar mann na hu too update naa likhe koy bi kaam adhure mann say karne say parinam aasha anurup nahee nikalta
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 63 》
अब तक,,,,,,,,
शिवा कि इसबात पऱ कमिश्नर बुरीतरह हैरान रह गय़ा। लेकिन अपराधी जब स्वयं हि अपना गुनाह कबूलकर रहा थां तोँ भला उन्हें क्याँ आपत्ति होँ सकती थि? कमिश्नर नें अपनेसंग आए एक् एसआई कों इशारा किया। एसआई नें शिवा केँ हाॅथ सें रिवाल्वर कों रुमाल मे लपेटकर लिया औऱ फिन उसके दोनो हाॅथों मे हॅथकड़ी डाल दि।
मे दौड़ते हुए रितू दिदी केँ पासआया थां। रितू दिदी कों आदित्य अपनी गोंद मे लिए बैठा थां। रितू दिदी कि साॅसें अभि चलरही थि। पवनअभय चाचा केँ पासचला गय़ा थां। जहाॅ पऱ प्रतिमा अभय कि हालत कों देखकर रोरही थि। अभय चाचा कि हालत भि बहुत ख़राब थि। उनका पूराबदन उनकेखून सें नहाया हुआ थां। प्रतिमा बारबार एक् हि बातकह रही थि कि मुझेमर जाने दिया होता। मुझ पापिन कों क्यूं बचाया तुमने?
पुलिस सायरन कि आवाज़ सुनकर इमारत केँ अंदर सें बाॅकी सभीलोग भि आँ गए थें। यहाॅ कां मंज़र देखकर सबकी चीख़ें निकल गई थि। माॅ नें जब मुझेसही सलामत देखा तौ मुझे स्वयं सें छुपका लिया औऱ मेरे चेहरे पऱ हर स्थान चूमने चाटने लगीं। मैने उन्हें स्वयं सें अलग किया औऱ बताया कि रितू दिदी वअभय चाचा कों गोलीलगी हैं। उन्हें जल्द हि हास्पिटल लेँ जानां पड़ेगा। मेरीबात सुनकर सभीलोग रितू दिदी वअभय चाचा केँ पास आँ गए।
रितू दिदी वअभय चाचा कि हालत बहोत ख़राब थि। सभीलोग रोरहे थें। मे औऱ पवन दौड़ते हुएकुछ हि दूरी पऱ खड़ीकई सारी गाड़ियों कि तरफगए। उनमें सें एक् व्हीकल कों स्टार्ट कर मे जल्दी हि उसेइस तरफ लेँ आया। आदित्य नें रितू दिदी कों उठाकर जल्द सें टाटा सफारी मे बड़े एहतियात सें बिठाया। रितू दिदी केँ बैठते हि नैना फूफी भि उनकेपास आकरबैठ गईं। आदित्य भागकर गय़ा औऱ दूसरी कार लेँ आया। उस व्हीकल मे अभय चाचा कों जल्दी लेटाया गय़ा। उसमें करुणा चाची व रुक्मिणी चाची बैठगईं। दूसरी अन्य गाड़ियों मे बाॅकी सभीलोग भि बैठगए। इसकेबाद हम् सभी तेज़ी सें गुनगुन कि तरफबढ़ चले।
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अबआगे,,,,,,,
ऑधी तूफान बने हम् सभी आख़िर हास्पिटल पहुॅच हि गए। जल्द जल्द हमने रितू दिदी वअभय चाचा कों स्ट्रेचर पर्र लिटाकर हास्पिटल केँ अंदर लेँ गए। कुछ हि देर मे उन दोनो कों ओटी केँ अंदर लें जाया गय़ा। उन्हें अंदर लेँ जाते हि ओटी कां द्वार (दरवाज़ा) बंद होँ गय़ा औऱ हम् सभी बाहर् हि चिंता व तकलीफ़ कि हालत मे खड़ेरह गए।
हम् सभी बेहद दुखी थें औऱ ईश्वर सें उन दोनो कों सलामत रखने कि मिन्नतें कररहे थें। करुणा चाची केँ ऑसूबंद हि नहि होँ रहे थें। कमिश्नर साहब नें पहले हि मोबाइल करके यहाॅ पऱ डाक्टरों कों बता दिया थां ताकि यहाॅ पर्र किसी प्रकार कि तकलीफ़ न् हौ सके औऱ जल्द हि उनका इलाज़ शुरुआत होँ जाए।
बड़ीमाॅ हम् सभी सें अलग एक् तरफ गुमसुम सि खड़ीथीं। उनकी माॅग कां सिंदूर मिटाहुआ थां तथा हाॅथ कि चूड़ियाॅ भि कुछ टूटी हुईँ थीं। मतलबसाफ थां कि पति कि मौत केँ बाद उन्होंने स्वयं कों विधवा बना लिया थां। इससमय उनके चेहरे पऱ संसार भर कि वीरानी थि। ऑखों मे सूनापन थां।
अधर्म पर्र धर्म कि तथा बुराई पऱ अच्छाई कि जीत तौ हौ चुकी थि लेकिन इसजीत मे सच्चाई कि राह पर्र चलने वालेदो ब्यक्ति जिंदगी औऱ मृत्यु केँ बीच लटकेहुए थें। मे रितू दिदी केँ लिए सबसे अधिक दुखी थां। मेरी ऑखों केँ सामने रहरहकर उनकी खूबसूरत छविचमक उठती थि। उनकेसंग बिताए हुएहर लम्हें याद आँ रहे थें। रितू दिदी नें शुरुआत सें लेकरअब तक मेरा कितना संग दिया थां यह बताने कि आवश्यकता नहि हैं। अगर मे यह कहूॅ तोँ ज़रा भि ग़लत नं होगा कि इसजीत कां सारा श्रेय हि उनको जाता हैं। उन्होंने क़दम क़दम पऱ मुझे सम्हाला थां औऱ मेरी रक्षा कि थि। यूॅ तौ मे जिंदगी भर उनकाऋणी हि बन चुका थां लेकिन एक् यह भि सच्चाई थि कि मे उन्हें किसी भि सूरत मे खोना नहि चाहता थां। मे बचपन सें हि उन्हें बेहद मनपसंद करता थां औऱ उनकेलिए कुछ भि कर गुज़रने कि चाहत रखता थां। अब तक तोँ नहि पऱ अबलगरहा थां कि अगर उन्हें कुछ हौ गय़ा तौ मे एक् समय भि जी नहि पाऊॅगा।
आदित्य मेरेपास आया औऱ मुझसे बोला कि मे स्वयं कों सम्हालूॅ औऱ सबको भि सम्हालूॅ। वोँ स्वयं भि बेहद दुखी थां। उसने हम् सबको अपना हि मान लिया थां। उसने मुझे समझाया कि मे स्वयं कों मजबूत करूॅ वरनासभी इस सबसे दुखी होते रहेंगे। आदित्य कि बातसुन कर मैने स्वयं कों सम्हाला औऱ फिन सबको वहीं एक् तरफ लम्बी सि बेंच मे बैठ जाने केँ लिएकहा। मेरे ज़ोर देने पर्र आख़िर सभीलोग बैठ हि गए। मेरी नज़रदूर एक् तरफ खड़ी बड़ीमाॅ पर्र पड़ी तोँ मे उनकेपास चला गय़ा।
बड़ीमाॅ कहींखोई हुईँ सि खड़ी एकटक शून्य कों घूरेजा रहीथीं। मे उनकेपास जाकर उनके कंधे पर्र हाॅथरखा तोँ जैसे उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने मेरीतरफ अजीबभाव सें देखा औऱ फिन बिनाकुछ बोलेफिन सें शून्य मे देखने लगीं। मैने बड़ीमाॅ सें भि बैठ जाने केँ लिएकहा तोँ वोँ मेरेसंग हि दूसरी साइड कि बेंच कि तरफआईं औऱ बैठगईं। उनकेपास हि मे भि बैठ गय़ा। हलाॅकि मेरे उनकेपास बैठ जाने सें सामने हि बेंच पर्र बैठेसभी लोग मुझेदेख कर देखने लगे थें मगर मैने उनके घूरने कि कोई परवाह नहि कि।
मेरेमन मे बड़ीमाॅ कि उस टाइम कि बातें गूॅजरही थि जब उन्होंने मुझे मोबाइल किया थां। इतना तौ मुझेपता थां कि हर इंसान कों एक् दिन अपने गुनाहों कां एहसास होता हैं। समय औऱ हालात इंसान कों ऐसी स्थान लाकर खड़ाकर देते हें जबउसे शिद्दत सें अपने गुनाहों कां एहसास होने लगता हैं। वहीहाल बड़ीमाॅ कां भि थां। एक् यह भि सच्चाई थि कि उन्होंने अपने पति सें ऑखबंद करकेतथा बिनाकुछ सोचे समझे बेपनाह प्यार किया थां। जिसका सबूतयह थां कि उन्होंने अजय सिंह केँ हर गुनाह मे उसका खुशी खुशीसंग दिया थां। उन्होंने कभी भि अपने पति सें यह नहि कहा कि वोँ ग़लतकर रहा हैं औऱ वोँ ग़लत मे उसकासंग नहि देंगी। इंसान जबबार बार गुनाह करने लगता हैं तब उसका ज़मीर ख़ामोश होकरबैठ जाता हैं। याँ फिन इंसान ज़बरदस्ती अपने ज़मीर कां करुण क्रंदन दबाता चला जाता हैं। मगरअंत तौ हर चीज़ कां एक् दिन होता हि हैं। फिन चाहे वोँ जिसरूप मे हौ। ख़ैर, मेरेमन मे बड़ीमाॅ सें मोबाइल पऱ हुई वोँ सभी बातें चलरही थीं।
बड़ीमाॅ सें मोबाइल पर्र पहले तौ मैने कठोरतापूर्ण हि बातें कि थि लेकिन जब उन्होंने अभय चाचा कि असलियत औऱ अपने पति सें उनके द्वारा मोबाइल पर्र हुई बातों केँ बारे मे बताया तौ पहले तौ मे हॅसा थां, क्योंकि मुझेलगा कि बड़ीमाॅ मुझसे कोईचाल चलने कां सोचरही हें जिसमें वोँ अभय चाचा केँ खिलाफ ऐसी बातें बताकर मेरेमन मे चाचा केँ प्रति शंका याँ दरार जैसा माहौल बनाना चाहती हें। मगर उनकी बातों नें जल्द हि मुझेयह सोचने पऱ मजबूर कर दिया थां कि भला उन्हें ऐसा करने कि क्याँ ज़रूरत थि? दूसरी बात उन्होंने मुझसे कुछऐसी बातें भि कींजिन बातों कि मे उनसे उम्मींद हि नहि कर सकता थां।
बहुत वक़्त तक हम् सभीऐसे हि बैठेरहे थें। हम् सबकी साॅसें हमारे हलक मे अटकी हुई थि। नाँ चाहते हुए भि मन मे ऐसे भि ख़याल आँ जाते जिनके तहत हमारे बदन कां रोयाॅ रोयाॅ तक काॅप जाता थां। आख़िर लम्बे इन्तज़ार केँ बादओटी केँ ऊपरलगा लाल बल्ब बुझा औऱ फिन दरवाजा खुला। द्वार (दरवाज़ा) खुलते हि हम् सभी एक् संग हि खड़े होकर डाक्टर केँ पास तेज़ी सें पहुॅचे।
"डाक्टर साहब। " सबसे पहलेमाॅ गौरी नें हि ब्याकुल भाव सें पूछा___"मेरा बेटा औऱ बेटी कैसी हैं अब? वोँ दोनोठीक तौ हें न्? जल्द बताइये डाक्टर साहब। वोँ दोनोठीक तोँ हैं न्?"
गौरीमाॅ कि ब्याकुलता कों देखकर डाक्टर जल्दी कुछ न् बोला। यह देखकर हम् सभीपलक झपकते हि घबरागए। एक् संग हम् सभी डाक्टर पऱ चढ़ दौड़े। करुणा चाची बुरीतरह रोनेलगी थि। उन्हें इसतरह रोतेदेख दिव्या भि रोनेलगी थि। हम् सभी कों इसतरह ब्यथित देख डाक्टर केँ चेहरे केँ भाव बदले।
"आप् सबकोइस तरह। " डाक्टर नें कहा___"दुखी होने कि ज़रूरत नहि हैं। वोँ दोनो हि अब खतरे सें बाहर् हें। हमने उनकेबदन सें बुलेट निकाल दि हैं। फिलहाल वोँ खतरे सें बाहर् हें लेकिन खून ज़्यादा बह जाने सें उनकी हालत अभि बेहतर नहि हैं। ख़ैर अभि तौ वोँ दोनो बेहोश हें। इसलिए आप् लोग उनसेबात नहि कर सकते हें। "
डाक्टर कि बातसुन कर हम् सबके निस्तेज पड़ चुके चेहरों पऱ जैसेनई ताज़गी सि आँ गई। हम् सभी एक् दूसरे कि तरफदेख देखकर एक् दूसरे सें कहनेलगे कि सभीठीक हैं। डाक्टर कुछ औऱ भि बातें बताकर चला गय़ा। उसके जाते हि हम् सबने भगवान कां लाखलाख शुक्रिया किया। गौरीमाॅ कों अचानक हि जाने क्याँ हुआ कि वोँ पलटी औऱ गैलरी मे एक् तरफ कों करीब-करीब दौड़ते हुई गईं। हम् सभी उन्हें इसतरह जातेदेख चौंके तथासंग हि हम् सभी भि उनके पीछे कि तरफ तेज़ी सें बढ़चले।
कुछ हि देर मे हम् सभीजिस स्थान उनका पीछा करतेहुए पहुॅचे उस स्थान कां दृष्य देखकर हम् सबकी ऑखेंनम होँ गईं। दरअसल वोँ गणेशजी कां एक् छोटा सां मंदिर थां। जिसके सामने अपने दोनो हाॅथ जोड़े बैठी गौरीमाॅ नज़रआईं हमें। हम् सभी भि उनकेपास जाकर गणेशजी केँ सामने अपने अपने हाॅथ जोड़कर खड़े हौ गए। गणेशजी कि मूर्ति केँ सामने खड़े हौ कर हम् सबने उनकी स्तुति कि औऱ उनकीइस कृपा केँ लिए हम् सबने उन्हें सच्चे दिल सें शुक्रिया दिया।
जैसा कि डाक्टर नें बताया थां कि अभि रितू दिदी वअभय चाचा बेहोश हें। अतः हम् सभी उनकेहोश मे आने कि इंतज़ार करनेलगे थें। ख़ैरदिन ढल चुका थां। मुझेपता थां कि इस सबके चक्कर मे किसी नें सुभह सें कुछ खाया भि नहि थां। अतः मैंने आदित्य वपवन कों संग लिया औऱ पास केँ हि एक् होटेल सें सबकेलिए खाने पीने कां प्रबंध किया। मेरे औऱ आदित्य केँ ज़ोर देने पऱ आख़िर सबको थोडा बहोत खानां हि पड़ा। हलाॅकि इसकेलिए कोई सजधजकर नहि थां क्योंकि आज हमारे परिवार केँ एक् बड़े सदस्य कि मौत होँ चुकी थि तथा दूसरा अपने पिता केँ कत्ल केँ इल्ज़ाम मे गिरफ्तार हौ चुका थां। निश्चय हि उसे याँ तोँ फाॅसी कि सज़ा होगी याँ फिन ऊम्रकैद।
वोँ दोनो बुरे हि सही लेकिन उनसेखून कां नाता तौ थां हि। फार्महाउस पर्र कदाचित अभि भि अजय सिंह कां मृत जिस्म पड़ा होगा। हम् सभी तोँ रितू दिदी वअभय चाचू कों लेकर हास्पिटल आँ गए थें। उसकेबाद वहाॅ पऱ अजय सिंह कि लाशयूॅ हि लावारिश हि पड़ीरह गई होगी। याँ फिनऐसा हुआ होगा कि कमिश्नर नें इस पऱ कोई कानूनी प्रक्रिया कि होगी। जिसके तहत वोँ अजय सिंह कि लाश कां पंचनामा करउसे पोस्टमार्डम केँ लिए लें गए होंगे। इस बारे मे हमेंकोई जानकारी अभि तक मिली नहि थि, बल्कि यहमहज हम् सबका ख़याल हि थां।
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उस टाइमरात केँ दसबजरहे थें जब हास्पिटल कि एक् नर्स नें आँ कर हमें बताया कि रितू दिदी वअभय चाचू कों होश आँ गय़ा हैं। हम् सभी नर्स कि यहबात सुनकर बेहदखुश हुए औऱ फिन जल्दी हि हम् सभीउस कमरे मे पहुॅचे जहाॅ पर्र रितू दिदी वअभय चाचू कों शिफ्ट किया गय़ा थां। हम् सबनेउन दोनो कों सही सलामत देखा तौ जान मे जानआई। करुणा चाची अभय केँ पासजा कर रोनेलगी थि। यहदेख करमाॅ नें उन्हें समझाया कि अबउसे रोना नहि चाहिए बल्कि खुश होना चाहिए कि भगवान नें सभीकुछ ठीककर दिया हैं।
मे रितू दिदी केँ पास हि बैठ गय़ा थां औऱ एकटक उनके चेहरे कि तरफदेख रहा थां। वोँ स्वयं भि मुझे देखेजा रही थि। उनकी ऑखों मे खुशी केँ ऑसू थें तथा होंठकुछ कहने केँ लिए काॅपे जारहे थें। यहदेख कर मैने उन्हें इशारे सें हि शान्त रहने कों कहा औऱ फिनझुक कर उनके माथे पऱ चूम लिया। मेरेऐसा करते हि उनकी ऑखेंबंद हौ गईं। ऐसे जैसे कि मेरेऐसा करने सें उन्हें कितना चैन मिला होँ। नीलम, सोनम दिदी, आशा दिदी, निधीव दिव्या पास हि चारोतरफ सें घेरे खड़ीथीं।
यहाॅ पऱ मुझे एक् चीज़ बहोत अजीबलग रही थि औऱ वोँ थां बड़ीमाॅ कां बिहैवियर। वोँ हम् सबसेअलग दूर खड़ीथीं। दूर सें हि वोँ अपनी बेटी रितू कों देखरही थि। उनकी ऑखों मे ऑसू थें। उनसेकोई बात नहि कररहा थां औऱ नां हि वोँ किसी सें बात करने कि कोई कोशिश कररही थीं। उन्होंने तोँ जैसे स्वयं कों हम् सबसेअलग समझ लिया थां।
उसरात हम् सभी हास्पिटल मे हि रहे। दूसरे दिन डाक्टर सें मिले तोँ डाक्टर नें कुछदिन बेड रेस्ट केँ लिए यहीं रहने कां कहा। इस बीच कमिश्नर साहब भि हमसे मिलने आए औऱ सबकाहाल अहवाल लिया। रितू दिदी सें वोँ बड़े प्रेम सें मिलेतथा उन्हें यह भि कहा कि उन्हें उन पर्र नाज़ हैं। कमिश्नर साहब नें बताया कि अजय सिंह कि डेड बाॅडी पोस्टमार्डम केँ बादआज दोपहर तक मिल जाएगी। ताकि हम् उनका आखिरी संस्कार कर सकें।
अभय चाचा केँ बारबार ज़ोर देने पर्र माॅइस बात पऱ राज़ी हुइ कि वोँ बाॅकी सबको लेकर गाॅव जाएॅ। अभय चाचा नें बड़ीमाॅ सें भि आग्रह किया कि वोँ सबकेसंग गाॅव जाएॅ। मैने नैना फूफी आदि कों पवन केँ संग हि हवेली जाने कां कह दिया। जबकि मे औऱ आदित्य रितू दिदी वअभय चाचा केँ पास हि रुकना चाहते थें।
आख़िर बहोत समझाने बुझाने केँ बादसभी जाने केँ लिए राज़ी हुए। हास्पिटल सें बाहर् आकर मैने सबको गाड़ियों मे बैठा दिया। मैने केशवजी कों मोबाइल करके बुला लिया थां। सारी घटना केँ बारे मे जानकर पहले तौ वोँ हैरान हुए उसकेबाद खुश भि हुए। मैने उनकेकुछ आदमियों कों माॅ लोगों केँ संग हल्दीपुर जाने केँ लिए उनसेकहा। केशवजी मेरीबात जल्दी मानगए औऱ फिन उन्होंने सीघ्र हि अपने आदमियों बुला लिया।
करुणा चाची जाने कों सजधजकर हि नहि होँ रही थि। मैने बड़ी मुश्किल सें उन्हें समझाया औऱ कहा कि वोँ किसीबात कि फिक्र न् करें। ख़ैरउन सबके जाने केँ बाद मैने कमिश्नर साहब सें शिवा केँ बारे मे पूछा तौ उन्होंने बताया कि उन्होंने शिवा सें बात कि थि कि वोँ चाहे तोँ कानून सें छूट सकता हैं। लेकिन शिवा अपनीबात पर्र अडिग हैं। उसका कहना हैं कि वोँ इस जिंदगी सें मुक्ति चाहता हैं। उसमें अब इतनी हिम्मत नहि हैं कि वोँ वापस सबकेबीच रहसके। सारी ज़िंदगी वोँ सबके सामने लज्जा सें गड़ा रहेगा औऱ सुकून सें जी नहि पाएगा। शिवा केँ नं मानने पऱ हि कमिश्नर साहब नें केस फाइल किया। अपने बाप कि चिता कों आग देने केँ लिएउसे यहाॅ लाया जाएगा उसकेबाद पुलिस उसे वापसजेल मे बंदकर देगी। अदालत कां फैसला क्याँ होगा इसकापता चलते हि उस पऱ कानूनी कार्यवाही होगी।
कमिश्नर साहब केँ जाने केँ बाद मे औऱ आदित्य वापस रितू दिदी वअभय चाचा केँ पास आँ गए। अभय चाचा नें मुझसे कहा कि मे इस सबके बारे मे अपनी बड़ी फूफी यानी सौम्या फूफी कों भि बतादूॅ औऱ यहाॅ बुलालूॅ। मोबाइल पऱ सारी बातें बताना उचित नहि थां। चाचा कि बातसुन कर मैने फूफी कों मोबाइल लगाया। थोड़ी हि देर मे दूसरी तरफ सें फूफी कि आवाज़ मेरे कानों मे पड़ी। मैने उन्हें अपना परिचय दिया औऱ जल्द सें जल्द हल्दीपुर आने कों कहा। मेरेइस तरह बुलाने पर्र वोँ चिंतित होकर पूछने लगीं कि बात क्याँ हैं? उनके पूछने पऱ मैनेबस यहीकहा कि आप् बस आँ जाइये।
साम होते होते कमिश्नर साहब कि मौजूदगी मे शिवा नें अपने बाप अजय सिंह कि चिता कों अग्नि दे दि। हल्दीपुर हि नहि बल्कि आसपास केँ गाॅव मे भि यह ख़बर जंगल कि आग कि तरहफैल गई थि कि ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल कां बड़ा बेटा अबइस दुनियाॅ मे नहि रहा। शमशान पर्र लोगों कि भारी भीड़जमा थि। आदित्य कों रितू दिदी वअभय चाचू केँ पास छोड़कर मे भि गाॅव आँ गय़ा थां।
सौम्या फूफी आँ चुकी थि। यहाॅ आँ करजब उन्हें अपने भइया कि मौत कां पताचला तौ वोँ दहाड़ें मारमार कर रोनेलगी थि। लेकिन बड़ीमाॅ नें उन्हें सम्हाल लिया थां औऱ कठोरभाव सें यह भि कहा कि ऐसे इंसान केँ मरने कां शोकमत करो जिसने अपने जिंदगी मे किसी केँ संगकोई अच्छा काम हि नं किया हौ। बड़ीमाॅ कि ऐसी बातें सुनकर सौम्या फूफी हतप्रभ रह गई थीं। उन्हें थोड़ी बहोत पता तौ थां लेकिन सारी असलियत सें वोँ अंजान थीं।
सारी क्रिया संपन्न होते हि सभी अपने अपनेघऱ चलेगए। इधर हवेली मे हरतरफ एक् भयावह सां सन्नाटा फैलाहुआ थां। हवेली केँ नौकर चाकरसभी संजीदा थें। सौम्या फूफी केँ संग उनके पति भि आए थें। मैने उनसेसभी कां ख़याल रखने कां कहा औऱ जीप लेकर वापस गुनगुन आँ गय़ा। ऐसे हि एक् हप्ता गुज़र गय़ा। मे औऱ आदित्य डाक्टर कि परमीशन सें रितू दिदी वअभय चाचा कों हास्पिटल सें घऱ लें आए। दोनो कि हालत अभि नाज़ुक हि थि। इसलिए उनकीदेख रेख केँ लिएसभी मौजूद थें।
तेरवीं केँ दिन ब्राम्हणों कों भोज कराया गय़ा। सबनात रिश्तेदार आएहुए थें। सबकी ज़ुबान पऱ बस एक् हि बात थि कि ठाकुर खानदान मे यह अचानक क्याँ हौ गय़ा हैं? हलाॅकि इतना तोँ सभी समझते थें कि ठाकुर खानदान मे कुछ सालों सें ग्रहण सां लगाहुआ थां। दबी ज़मान मे तौ लोगयह भि कहते थें कि अजय सिंह नें घऱ कि खुशियों मे स्वयं आग लगाई थि। ख़ैर, एक् दिन कमिश्नर साहब कां मोबाइल आया उन्होंने बताया कि अदालत नें शिवा कों ऊम्रकैद कि सज़ा सुनाई हैं। यहजान कर हम् सबको बहोत अजीबलगा थां। शिवा नें अपनी मर्ज़ी सें अपनेइस अंजाम कां चुनाव किया थां, जबकि वोँ चाहता तौ बड़े आहिस्ता वोँ कत्ल केँ इल्ज़ाम सें बरी होँ जाता। बल्कि अगरयह कहाजाए तोँ ग़लत न् होगा कि उस पऱ कत्ल जैसाकोई इल्ज़ान लगता हि नहि। मेरे ज़हन मे उससे आखिरी मुलाक़ात कि वोँ सभी बातें घूम रहीं थि। मे समझ सकता थां कि वो एकदम सें जुनूनी हौ चुका थां। उसकीसोच ऐसी हौ चुकी थि कि उसेकोई समझा नहि सकता थां।
अजय सिंह कि मौत केँ बारे मे मैने जगदीश ओबराय कों पहले हि सभीकुछ बता दिया थां। वोँ यहजान कर आश्चर्यचकित थें कि अभय चाचा नें इतना बड़ा धोखा किया थां हमारे संग। तेरवीं केँ दिन जगदीश ओबराय हमारे गाॅवआए थें। एक् दोदिन रुककर वोँ वापस मुम्बई चलेगए थें। संग हि हम् सबको समझाया बुझाया भि थां कि अब हम् सभी एक् नये सिरे सें जिंदगी पथ पर्र आगे बढ़ें। जाते वक़्त वोँ थोडा मायूस लगे मुझे तोँ मैने औऱ माॅ नें उनसे पूॅछ हि लिया कि क्याँ बात हैं? हमारे पूछने पऱ उन्होंने बस इतना हि कहा कि वोँ अकेले मुम्बई मे रह नहि पाएॅगे। उनकी बातों कों हम् बखूबी समझते थें। इसलिए उन्हें तसल्ली दि कि वोँ फिक्र न् करें। माॅ नें कहा कि राज औऱ गुड़िया कि तौ पढ़ाई हि चलरही हैं अभि। इसलिए वोँ बहोत जल्द मुम्बई आँ जाएॅगे।
जैसा कि आप् सबकोपता हैं कि हवेली मे तीनों भाइयों कां बराबर हिस्सा थां तथा हवेली बनाई भि इसतरह गई थि कि सबको बराबर बराबर मिलसके। अतः हवेली मे आते हि हम् सभी अपने अपने हिस्सों मे रहनेलगे थें। लेकिन इसमें नईबात यह थि कि हम् सबका खानां पीना एक् हि किचन मे बननेलगा थां। रितू दिदी वअभय चाचा कि सेहत मे बहुत सुधार होँ गय़ा थां। रितू दिदी हमारे हिस्से पऱ हि एक् कमरे मे रहरही थीं। बड़ी माॅ(प्रतिमा) अपने हिस्से पऱ अकेली रहती थि। वोँ किसी सें कोईबात नहि करती थि औऱ नाँ हि किसी केँ सामने आती थि। सारादिन औऱ रात वोँ अपने कमरे मे हि रहती। रितू दिदी व नीलम उनसेकोई बात नहि करतीथीं। हलाॅकि ऐसा नहि होना चाहिए थां मगर कदाचित दिलो दिमाग़ सें वोँ सभी बातें अभि निकली नहि थि। इसलिए उनसेकोई बात करना ज़रूरी नहि समझता थां। हलाॅकि मे आदित्य वपवन उनसेबात करते थें औऱ उनकेलिए दोनो वक्त कां खानां वगरमचाय नास्ता मे हि लेकर उनकेपास जाता थां औऱ तब तक उनकेपास रहताजब तक कि वोँ खा नहि लेती थि।
ऐसे हि टाइम गुज़र रहा थां। धीरे-धीरे धीरे-धीरे सभी नार्मल होँ रहे थें। लेकिन एक् चीज़ऐसी थि जिसने मुझे दुखी कियाहुआ थां औऱ वोँ थां गुड़िया(निधी) कां मेरे प्रति व्यवहार। इतनाकुछ होने केँ बाद औऱ इतनेदिन गुज़र जाने केँ बाद मैनेयह देखा थां कि उसने मुझसे कोईबात नहि कि थि औऱ नाँ हि मेरे सामने आने कि कोई ख़ता कि थि। मे समझ नहि पारहा थां कि अपनेदिल कि इस धड़कन कों केसे मनाऊॅ? मेरेमन मे कईबार यह विचार आया कि मे उसकेपास जाऊॅ औऱ उससे बातें करूॅ। उससे पूछूॅ कि ऐसा क्याँ हौ गय़ा हैं कि उसने मुझसे बात करने कि तौ बातदूर बल्कि मेरे सामने आनां भि बंदकर रखा हैं? मगर मे चाहकर भि ऐसाकर नहि पारहा थां क्योंकि गुड़िया केँ पासहर वक़्त आशा दिदी बनी रहती थि। अपनीइस बेबसी कों मे किसी केँ सामने ज़ाहिर भि नहि कर सकता थां।
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ऐसे हि कुछदिन औऱ गुज़र गए। नीलम तोँ अब करीब-करीब पूरीतरह ठीक हि होँ गई थि। उसकीपीठ कां ज़ख्म भि अबठीक हौ चला थां। मे नीलम कों अक्सर छेंड़ता रहता थां, जिसके जवाब मे वोँ बस मुस्कुरा कररह जाती थि। मे उसकीइस प्रतिक्रया सें हैरान भि होता औऱ मायूस भि। हैरान इसलिए क्योंकि वोँ मेरे छेंड़ने पर्र जवाब मे स्वयं भि मुझे छेंड़ने कां कोई उपक्रम नहि करती थि बल्कि मात्र मुस्कुरा कररह जाती थि। जबकि मायूस इसलिए क्योंकि मे उससेयही उम्मींद करता थां कि वोँ भि मुझें छेंड़े अथवा मुझसे लड़े झगड़े। मगरजब वोँ ऐसा नं करती तोँ मे बस मायूस हि होँ जाता थां। मुझेसमझ नहि आँ रहा थां कि नीलमऐसा क्यूं कररही थि। मे महसूस कररहा थां कि नीलमकुछ दिनों सें बड़ी अजीब अजीब सि बातें करती थि। उसकी बातों मे सबसे ज़्यादा इसीबात पऱ ज़ोर होता थां कि मे रितू दिदी कां हमेशा ख़याल रखूॅ औऱ उन्हें कभी दुखी नं होनेदूॅ।
एक् दिन सुभह केँ करीब-करीब आठबजे सोनम दिदी व नीलम अपने अपने हाॅथों मे छोटा सां बैगलिए तथा सजधजकर होकर हम् सबकेबीच आईं औऱ माॅ(गौरी) सें कहा कि वोँ मुम्बई जारही हें। कारणयह थां कि उनके काॅलेज कि पढ़ाई कां नुकसान होँ रहा थां। बात पढ़ाई कि थि इसलिए किसी नें उन दोनो कों जाने सें मना नहि किया। जाते टाइम नीलम मेरेगले लग मुझसे मिली औऱ एक् पुनः उसने रितू दिदी कां तथा सबका ख़याल रखने कां कहा औऱ फिन मेरीतरफ अजीबभाव सें देखने केँ बाद वो पलटकर सोनम दिदी केँ संग हवेली सें बाहर् निकल गई।
नीलम केँ जाने सें मुझेऐसा लगा जैसे मेराकुछ छूटाजा रहा हैं। नीलम कि ऑखों मे ऑसू केँ क़तरे थें। जिन्हें उसने बड़ी सफाई सें पोंछ लिया थां। दूसरे दिन रुक्मिणी चाची नें हम् सबसे अपनेघऱ जाने कों कहा। माॅ नें उनसेकहा भि मगर वोँ नहि मानी। अतः उन्हें उनके सामान केँ संग उनकेघऱ भेज दिया गय़ा। माॅ नें उनसेकहा थां कि उनकाजब भि दिलकरे वोँ यहाॅआती रहें।
हम् सभीअब फिन सें एक् संग हौ गए थें। इसबात सें गाॅव केँ लोग भि बहुतखुश थें। दिनभर किसी न् किसी कां आनां जानां लगा हि रहता थां हवेली पऱ। अभय चाचा व मे उन सबसे मिलते औऱ दुनियाॅ जहान कि बातें होतीं। बड़ीमाॅ कां रवैया वही थां यानी वोँ अपने कमरे सें बाहर् नहि निकलती थीं। पवन लोगों केँ जाने केँ बाद मुझेलगा कि अब गुड़िया सें बात करने कां मौका मिलेगा मगर मेरी उम्मीदों पऱ पानीफिन गय़ा। क्योंकि आशा दिदी केँ जाने केँ बाद गुड़िया कां सारा वक़्त उनकेघऱ पऱ हि गुज़रता थां औऱ रात मे भि वोँ उनकेघऱ पर्र हि सो जाती थि। हवेली मे अगर वोँ आती भि तोँ दिव्या व रितू दिदी केँ पास हि रहती। कहने कां मतलबयह कि वोँ स्वयं कों अकेली रखती हि नहि थि। कदाचित उसे अंदेशा थां कि मे उससे मिलने कि तथा उससेबात करने कि कोशिश करूॅगा। गुड़िया केँ इस रवैये सें मेरादिल बहोत दुखी होनेलगा थां। एक् नये संसार कां यहरूप देखकर मे ज़रा भि खुश नहि थां।
मेरा अधिकतर वक़्त याँ तोँ रितू दिदी केँ पास रहने सें याँ फिन आदित्य केँ संग हि गुज़र रहा थां। एक् दिनअभय चाचा नें कहा कि जब तक उनका स्वास्थ सही नहि होँ जाता मे खेतों कि तरफ कां हालचाल देख लिया करूॅ। चाचा कि इसबात सें मे औऱ आदित्य खेतों पर्र गए औऱ वहाॅ पर्र सभी मजदूरों सें मिला। खेतों पर्र कामकर रहेसब मजदूर मुझे वहाॅ पऱ इसतरह देखकर बेहदखुश हौ गए थें। सबकी ऑखों मे खुशी केँ ऑसू थें। सभी एक् हि बातकह रहे थें कि हम् अपनेजिन मालिक कों(मेरे पिता जी) देवता कि तरह मानते थें उनके जाने केँ बाद हम् सभी बेहद दुखी थें। अजय सिंह नें तौ हमेशा हम् पऱ ज़ुल्म हि किया थां। लेकिन अब वोँ फिन सें खुश होँ गए थें। अपनेअसल मालिक कि औलाद कों देखकर वोँ खुश थें औऱ चाहते थें कि अब वैसाकोई बुरा वक़्त नं आए।
एक् दिन सुभहजब मे बड़ीमाॅ केँ लिएगरम चाय नास्ता देने उनके कमरे मे गय़ा तौ कमरे मे बड़ीमाॅ कहीं भि नज़र नं आईं। उनकीतरफ कां सारा हिस्सा छान मारा मैनेमगर बड़ीमाॅ कां कहीं पर्र भि कोई नामो निशान नं मिला। इस बात सें मे भचक्का रह गय़ा। मुझे अच्छी तरहयाद थां कि जब मे रात मे उनकेपास उन्हें खानां खिलाने आया थां तब वोँ अपने कमरे मे हि थीं। मैने अपने हाॅथ सें उन्हें खानां खिलाया थां। हर रोज़ कि तरह हि मेरे द्वारा खानां खिलाते वक़्त उनकी ऑखेंछलक पड़तीं थि। मे उन्हें समझाता औऱ कहता कि जौ कुछहुआ उसेभूल जाइये। मेरेदिल मे उनकेलिए कोई भि बुरा विचार नहि हैं।
मे कमरे कों बड़े ध्यान सें देखरहा थां, इस उम्मीद मे कि शायदकोई ऐसा सुराग़ मिलजाए जिससे मुझेपता सके कि बड़ीमाॅ कहाॅ गई होँ सकती हें। मगरलाख सिर खपाने केँ बाद भि मुझेकुछ न् मिला। थक हारकर मे कमरे सें हि क्यूं बल्कि उनके हिस्से सें हि बाहर् आँ गय़ा। अपनीतरफ डायनिंग हाल मे आकर मैनेअभय चाचा सें बड़ीमाॅ केँ बारे मे सभीकुछ बताया। मेरीबात सुनकर अभय चाचा औऱ बाॅकी सभी भि हैरान रहगए। इस सबसे हम् सभीयह तोँ समझ हि गए थें कि बड़ीमाॅ शायद हवेली छोंड़ कर कहींचली गई हें। उनके जाने कि वजह कां भि हमेंपता थां। इसलिए हमने फैसला किया कि बड़ीमाॅ कि खोज कि जाए।
नास्ता पानी करने केँ बाद मे आदित्य अभय चाचा बड़ीमाॅ कि खोज मे हवेली सें निकल पड़े। अपनेसंग कुछ आदमियों कों लेकर हम् निकले। अभय चाचा अलगकार मे कुछ आदमियों केँ संगअलग दिशा मे चले जबकि मे औऱ आदित्य दूसरी कार मे कुछ आदमियों केँ संग दूसरी दिशा मे। हमनेआस पास केँ सब गाॅवों मे तथाशहर गुनगुन मे भि सारादिन बड़ीमाॅ कि तलाश मे भटकते रहेमगर कहीं भि बड़ीमाॅ कां पता नं चला। रात हौ चली थि अतः हम् लोग वापस हवेली आँ गए। हवेली आँ कर हमने सबको बताया कि बड़ीमाॅ कां कहीं भि पता नहि चलसका। इसबात सें सभी बेहद चिंतित व परेशान होँ गए।
नीलम तोँ मुम्बई जा चुकी थि, उसेइस बात कां पता हि नहि थां। रितू दिदी कों मैने बताया तौ उन्होंने कोई जवाब न् दिया। उनके चेहरे पऱ कोईभाव न् आया थां। बस एकटक शून्य मे घूरती रह गई थि। उसरात हम् सभी नाँ तोँ ठीक सें खापीसके औऱ नाँ हि सोसके। दूसरे दिनफिन सें बड़ीमाॅ कि तलाश शुरुआत हुई मगरकोई फायदा न् हुआ। हमनेइस बारे मे पुलिश कमिश्नर सें भि बात कि औऱ उनसेकहा कि बड़ीमाॅ कि तलाश करें।
चौथेदिन सुभह हम् सभी नास्ता करने बैठेहुए थें। नास्ते केँ बाद एक् हि काम थां औऱ वोँ थां बड़ीमाॅ कि तलाश करना। नास्ता करते वक़्त हि बाहर् मुख्य दरवाज़ा कों किसी नें बाहर् सें खटखटाया। दिव्या नें जाकर द्वार (दरवाज़ा) खोला तौ बाहर् एक् व्यक्ति खड़ा थां। उसकी पोशाक सें हि लगरहा थां कि वोँ पोस्टमैन हैं। दरवाजा खुलते हि उसने दिव्या केँ हाॅथ मे एक् लिफाफा दिया औऱ फिनचला गय़ा।
दिव्या उससे लिफाफा लेकर द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ वापस डायनिंग हाल मे आँ गई। हम् लोगों केँ पासआते हि दिव्य नें वोँ लिफाफा अभय चाचा कों पकड़ा दिया। अभय चाचा नें लिफाफे कों उलटकर देखा तौ उसमें मेरानाम लिखाहुआ थां। यहदेख करअभय चाचा नें लिफाफा मेरीतरफ सरका दिया।
"यह तुम्हारे नाम पर्र आया हैं राज। "अभय चाचा नें मेरीतरफ देखते हुए कहा___"देखो तोँ क्याँ हैं इसमें?"
"जी अभि देखता हूॅ चाचा जी। " मैने कहने केँ संग हि टेबल सें लिफाफा उठा लिया औऱ फिनउसे एक् तरफ सें काटकर खोलने लगा। लिफाफे मे एक् तरफ मेरानाम वपता लिखाहुआ थां तथा दूसरी तरफ भेजने वाले केँ नाम मे "नारायण रस्तोगी" तथा उसकापता लिखाहुआ थां।
लिफाफे केँ अंदरतह कियाहुआ कोई काग़ज थां। मैनेउसे निकाला औऱ फिनउस तह कियेहुए काग़ज कों खोलकर देखा। काग़ज मे पूरेपेज पर्र किसी कि हैण्डराइटिंग सें लिखाहुआ कोई मजमून थां। मजमून कां पहला वाक्य पढ़कर हि मे चौंका। मैने लिफाफे कों उलटकर भेजने वाले कां नाम पुनः पढ़ा। मुझेसमझ न् आया कि यह नारायण रस्तोगी कौन हैं औऱ इसने मेरेनाम ऐसाकोई ख़त क्यूं लिखा हैं? जबकि मेरीसमझ मे इसनाम केँ किसी भि ब्यक्ति सें मेरादूर दूर तक कोई वास्ता हि नहि थां। मुझे हैरान व चौंकते हुएदेख अभय चाचा नें पूछ हि लिया कि क्याँ बात हैं? मैने उन्हें बताया लिफाफा भेजने वाले कों तोँ मे जानता हि नहि हूॅफिन इसने मेरेनाम पऱ यह लिफाफा क्यूं भेजा होँ सकता हें? अभय चाचा नें पूछा कि ख़त मे क्याँ लिखा हैं उसने? उनके पूछने पर्र मैंने ख़त मे लिखे मजमून कों सबको सुनाते हुए पढ़ने लगा। खत मे लिखा मजमून कुछइस प्रकार थां।
मेरे सबसे अच्छे बेटेराज!
सबसे पहले तौ यही कहूॅगी कि तूँ वाकई मे एक् देवता जैसे इंसान कां नेकदिल बेटा हैं औऱ मुझेइस बात कि खुशी भि हैं कि तूँ अच्छे संस्कारों वाला एक् सच्चा इंसान हैं। भगवान करे तूँ इसीतरह नेकदिल बनारहे औऱ सबकेलिए प्रेम व सम्मान रखे। जिस वक़्त तुम् मेरे द्वारा लिखेख़त केँ इस मजमून कों पढ़रहे होगेउस समय मे इस हवेली सें बहोत दूरजा चुकी होऊॅगी। मुझे खोजने कि कोशिश मत करना बेटे क्योंकि अब मेरे अंदर इतनी हिम्मत व साहस नहि रहा कि मे तुम् सबकेबीच सामान्य भाव सें रह सकूॅ। जिंदगी मे जिसके लिए सबकेसंग बुरा किया उसने स्वयं कभी मेरी कद्र नहि कि। मेरी बेटियाॅ मुझे देख्ना भि गवाॅरा नहि करती हें, औऱ करे भि क्यूं? ख़ैर, मुझे उनसेकोई शिकायत नहि हैं बेटे। दिल सें बसयही दुवाव कामना हैं कि वोँ जिंदगी मे सदा सुखी रहें।
मेरा जिंदगी पापों सें भरा पड़ा हैं। मैनेऐसे ऐसे कर्म किये हें जिनके बारे मे सोचकर हि अब स्वयं सें घृणा होती हैं। मुझमें अब इतनी हिम्मत नहि हैं कि मे किसी कों अपनामुह भि दिखा सकूॅ। आत्मग्लानी, लज्जा व अपमान कां बोझ इतना ज़्यादा हैं कि इसकेसंग अब एक् समय भि जीना मुश्किल लगरहा हैं। बारबार ज़हन मे यह विचार आता हैं कि खुदखुशी करलूॅ औऱ इस पापी जिंदगी कों समाप्त करदूॅ मगर मे ऐसा भि नहि करना चाहती। क्योंकि जिंदगी कों ख़त्म करने सें भगवान मुझेकभी क्षमा नहि करेगा। मुझेइस सबका प्रयाश्चित करना होगा बेटे, बग़ैर प्रयाश्चित केँ ईश्वर भि मुझे अपनेपास फटकने नहि देगा। इस लिए बहोत सोचसमझ कर मैनेयह फैसला किया हैं कि मे तुम् सबसे कहींदूर चली जाऊॅ औऱ अपने पापों कां प्रयाश्चित करूॅ। तुम् सबकेबीच रहकर मे ठीक सें प्रयाश्चित नहि कर सकती थि।
ज़मीन जायदाद केँ सारे काग़जात मैने अपनी आलमारी मे रख दिये हें बेटा। वकील कों मैनेसभी कुछबता भि दिया हैं औऱ समझा भि दिया हैं। अबइस सारी ज़मीन जायदाद केँ मात्र दो हि हिस्से होंगे। पहला तुम्हारा औऱ दूसरा अभय कां। मैने अपने हिस्से कां सबकुछ तुम्हारे नामकर दिया हैं। कुछ हिस्सा अभय केँ बेटे केँ नाम भि कर दिया हैं। इसे लेने सें इंकार मत करना बेटे, बस यहसमझ लेना कि एक् माॅ नें अपने बेटे कों दिया हैं। मुझेपता हैं कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति वैसा हि आदर सम्मान हैं जैसा कि तुम्हारा अपनीमाॅ केँ प्रति हैं। ख़ैर, इसी आलमारी मे वोँ कागजात भि हें जौ तुम्हारे दादाजी दादीमा सें संबंधित हें। उन्हें तुम् देख लेना औऱ अपने दादाजी दादीमा केँ बारे मे जान लेना।
अंत मे बसयही कहूॅगी बेटे कि सबका ख़याल रखना। अब तुम् हि इस खानदान केँ असली कर्ताधर्ता होँ। मुझे यकीन हैं कि तुम् अपनीसूझ बूझव समझदारी सें परिवार केँ हर सदस्य कों एक् संग रखोगे औऱ उन्हें सदाखुश रखोगे। अपनीमाॅ कां विशेष ख़याल रखना बेटे, उस अभागिन नें बहोत दुखसहे हें। हमारे द्वारा इतनाकुछ करने केँ बाद भि उस देवी नें कभी अपनेमन मे हमारे प्रति बुरा नहि सोचा। मे किसी सें अपने किये कि माफ़ी नहि माग सकती क्योंकि मुझे स्वयं पता हैं कि मेरा अपराध माफ़ केँ योग्य नहि हैं।
मेरी बेटियों सें कहना कि उनकीमाॅ नें कभी भि दिल सें नहि चाहा कि उनकेसंग कभी ग़लत हौ। मे जहाॅ भि रहूॅगी मेरेदिल मे उनकेलिए बेपनाह प्रेम व दुवाएॅ हि रहेंगी। मुझे तलाश करने कि कोशिश मत करना। अब उसघऱ मे मेरे वापसआने कि कोईवजह नहि हैं औऱ मे उस स्थान अब आनां भि नहि चाहती। मैंने अपना मार्ग तथा अपना मुकाम चुन लिया हैं बेटे। इस लिए मुझे मेरेहाल पऱ छोंड़ दो। यही मेरी तुमसे विनती हैं। परमेश्वर तुम्हें सदा सुखीरखे तथाहर दिनहर समयनई खुशीव नई कामयाबी अताकरे।
अच्छा अब अलविदा बेटे।
तुम्हारी बड़ीमाॅ!
प्रतिमा।
ख़त केँ इस मजमून कों पढ़कर हम् सबकी साॅसें मानों थम सि गई थि। ख़त पढ़ते वक़्त हि पताचला कि यहख़त तोँ दरअसल बड़ीमाॅ कां हि थां। जिसे उन्होंने फर्ज़ी नामवपते सें भेजा थां मुझे। बहुतदेर तक हम् सभी किसीगहन सोच मे डूबे बैठेरहे।
"बड़ी भाभी केँ इसख़त सें। " सहसाअभय चाचा नें इसगहन सन्नाटे कों चीरते हुए कहा____"यह बात ज़ाहिर होती हैं कि अब हम् चाहकर भि उन्हें तलाश नहि कर सकते। क्योंकि यह तोँ उन्हें भि पता हि होगा कि हम् उन्हें खोजने कि कोशिश करेंगे। इसलिए अब उनकी पूरी कोशिश यही रहेगी कि हम् उन्हें किसी भि सूरत मे खोज नं पाएॅ। कहने कां मतलबयह कि संभव हैं कि उन्होंने स्वयं कों किसीऐसी स्थान छुपा लिया होँ जिस स्थान पऱ हम् मे सें कोई पहुॅच हि न् पाए। "
"सच कहा आपने। " मैने कहा___"ख़त मे लिखी उनकी बातें यही दर्शाती हें। लेकिन प्रश्न यह हैं कि अगर उन्होंने ख़त केँ माध्यम सें ऐसाकहा हैं तौ क्याँ हमेंसच मे उन्हें नहि खोजना चाहिए?"
"हर्गिज़ नहि। " अभय चाचा नें कहा___"कम सें कम हम् मे सें कोई भि ऐसा नहि चाह सकता कि बड़ी भाभी हमसेदूर कहीं अज्ञात स्थान पर्र रहें। बल्कि हम् सभीयही चाहते हें कि सभीकुछ भुलाकर हम् सभी एक् संगनये सिरे सें जिंदगी कि शुरुआत करें। हवेली कों छोंड़ करचले जानां यह उनकी मानसिकता कि बात थि। उन्हें लगता हैं कि उन्होंने हम् सबकेसंग बहोत बुरा किया हैं इसलिए अब उनका हमारे संग रहने कां कोईहक़ नहि हैं। सच तोँ यह हैं कि हवेली छोंड़ करचले जाने कि वजह उनका अपराध बोझ हैं। इसी अपराध बोझ केँ चलते उनकेमन मे ऐसा करने कां विचार आया हैं। "
"बात चाहे जौ भि होँ। " सहसाइस बीचमाॅ नें गंभीर भाव सें कहा___"उनका इसतरह हवेली सें चले जानां बिलकुल भि अच्छी बात नहि हैं। उन्हें तलाशकरो औऱ सम्मान पूर्वक उन्हें वापस यहाॅलाओ। हम् सभी उन्हें वैसा हि आदर सम्मान देंगे जैसा उन्हें मिलना चाहिए। उन्हें वापस यहाॅ पर्र लाना ज़रूरी हैं वरनाकल कों यही गाॅव वाले हमारे बारे मे तरहतरह कि बातें बनाना शुरुआत कर देंगे। वोँ कहेंगे कि अपनाहक़ मिलते हि हमने उन्हें हवेली सें वैसे हि बेदखल कर दिया जैसेकभी उन्होंने हमें किया थां। आख़िर उनमें औऱ हम् मे फर्क़ हि क्याँ रह गय़ा? इसलिए सारेकाम कों दरकिनार करके केवल उन्हें खोजकर यहाॅ वापस लाने कां कां हि कामकरो। "
"आप् फिक्र मत कीजिए भाभी। "अभय चाचा नें कहा___"हम् एड़ी सें चोंटी तक कां ज़ोरलगा देंगे बड़ी भाभी कि तलाश करने मे। हम् उन्हें अवश्य वापस लाएॅगे औऱ उनकाआदर सम्मान भि करेंगे। "
"ठीक हैं फिन। "माॅ नें कहने केँ संग हि मेरीतरफ देखा___"बेटा तुँ तब तक यहीं रहेगा जब तक कि तुम्हारी बड़ीमाॅ वापसइस हवेली पर्र नहि आँ जातीं। मे जानती हूॅ कि तुम् दोनो कि पढ़ाई कां नुकसान होगा लेकिन इसके बावजूद तुझेही अभय केँ संगमिल कर अपनी बड़ीमाॅ कि तलाश करना हैं। "
"ठीक हैं माॅ। " मैने कहा___"जैसा आप् कहेंगी वैसा हि होगा। मे जगदीश अंकल कों मोबाइल करकेबता दूॅगा कि मे औऱ गुड़िया अभि वहाॅ नहि आँ सकते। "
"पऱ मुझे अपनी पढ़ाई कां नुकसान नहि करना हैं माॅ। " सहसातभी गुड़िया(निधी) कह उठी___"बड़ी माॅ कों तलाश करने कां काम मुझे तौ करना नहि हैं। अतः मेरा यहाॅ रुकने कां कोई मतलब नहि हैं। पवन भाई कों भि कंपनी मे काम करने केँ लिए जानां हि हैं मुम्बई। मैनेआशा दिदी सें बात कि हैं वोँ मेरेसंग मुम्बई जाने कों रेडी हें। इसलिए मे कल हि यहाॅ सें जारही हूॅ। "
गुड़िया कि इसबात सें हम् सभी एकदम सें उसकीतरफ हैरानी सें देखने लगे थें। किसी औऱ कां तौ मुझे नहि पता लेकिन उसकीइस बात सें मे अवश्य स्तब्ध रह गय़ा थां औऱ फिन एकाएक हि मेरेदिल मे बड़ा तेज़ दर्दहुआ। अंदर एक् हूक सि उठी जिसने पलक झपकते हि मेरी ऑखों मे ऑसुओं कों तैरा दिया। मे स्वयं कों औऱ अपने अंदर अचानक हि उत्पन्न होँ चुके भीषण जज़्बातों कों बड़ी मुश्किल सें सम्हाला। अपने ऑसुओं कों ऑखों मे हि जज़्ब कर लिया मैने।
"यह तुँ क्याँ कहरही हैं गुड़िया?" तभीमाॅ कि कठोर आवाज़ गूॅजी___"तूने मुझे बताए बिना हि यह फैंसला लें लिया कि तुम्हारी तरफ मुम्बई जानां हैं। मुझे तुझसे ऐसी उम्मीद नहि थि। "
"मे आपकोइस बारे मे बताने हि वाली थि माॅ। " निधी नें नज़रें चुराते हुए लेकिन मासूम भाव सें कहा___"औऱ वैसे भि इसमे इतना सोचने कि क्याँ बात हैं? बड़ीमाॅ कि खोज करने मुझे तौ जानां नहि हैं, बल्कि यहकाम तोँ चाचा जी लोगों कां हि हैं। दूसरी बातअब मेरे यहाॅ रहने कां फायदा भि क्याँ हैं, बल्कि नुकसान हि हैं। आज एक् महीना होने कों हैं विद्यालय सें छुट्टी लिएहुए। इसलिए अब मे नहि चाहती कि मेरी पढ़ाई कां औऱ भि ज़्यादा नुकसान हौ। "
"बात तोँ तुम्हारी सही हैं गुड़िया। " अभय चाचा नें कहने केँ संग हि माॅ(गौरी) कि तरफ देखा___"भाभी अब जोँ होना थां वोँ तौ होँ हि चुका हैं। आज महीना होने कों आयाउस सबको गुज़रे हुए। धीरे-धीरे धीरे-धीरे आगे भि सभीकुछ ठीक हि हौ जाएगा। रहीबात बड़ी भाभी कों खोजने कि तोँ वोँ मे राज औऱ आदित्य करेंगे हि। गुड़िया केँ यहाॅ रुकने सें उसकी पढ़ाई कां नुकसान हि हैं। इसलिए यहअगर जारही हैं तौ इसे आप् जाने दीजिए। आप् तौ जानती हि हें कि मुम्बई मे भि जगदीश भइया साहब अकेले हि हें। वोँ आप् लोगों केँ न् रहने सें वहाॅ पर्र बिलकुल भि अच्छा महसूस नहि कररहे होंगे। इसलिए गुड़िया पवन औऱ आशाजब उनकेपास पहुॅच जाएॅगे तौ उनका भि मन लगेगा वहाॅ। "
अभय चाचा कि इसबात सें माॅ नें जल्दी कुछ नहि कहा। लेकिन वोँ अजीबभाव सें निधी कों देखती अवश्य रहीं। ऐसी हि कुछ औऱ बातों केँ बादयही फैंसला हुआ कि निधीकल पवनवआशा केँ संग मुम्बई चली जाएगी। इसबीच प्रश्न यह भि उठा कि पवनवआशा केँ चले जाने सें रुक्मिणी यहाॅ पऱ अकेली केसे रहेंगी? इस प्रश्न कां हलयह निकाला गय़ा कि पवन औऱ आशा केँ जाने केँ बाद रुक्मिणी यहाॅ हवेली मे हमारे संग हि रहेंगी।
नास्ता पानी करने केँ बाद मे, आदित्य वअभय चाचा बड़ीमाॅ कि तलाश मे हवेली सें निकल पड़े। अभय चाचा कां स्वास्थ पहले सें बेहतर थां। हलाॅकि मैंने उन्हें अभि चलना फिरने सें मना किया थां लेकिन वोँ नहि मानरहे थें। इसलिए हमने भि ज़्यादा फिनकुछ नहि कहा। दूसरे दिन निधीपवन वआशा केँ संग मुम्बई केँ लिए निकल गई। गुनगुन रेलवे स्टेशन उनको छोंड़ने केँ लिए मे औऱ आदित्य गए थें। इसबीच मेरा दिलो दिमाग़ बेहद दुखीव दुःखी थां। गुड़िया केँ व्यवहार नें मुझे इतनी पीड़ा पहुॅचाई थि कि इतनी पीड़ा अब तक किसी भि चीज़ सें न् हुइ थि मुझे। मगर बिनाकोई शिकवा किये मे ख़ामोशी सें यहसभी सहरहा थां। मे इसबात सें चकित थां कि मेरी सबसे प्यारी बेहन जौ मेरीजान थि उसनेदो महीने सें मेरीतरफ देखा तक नहि थां बात करने कि तोँ बात हि दूर थि।
ट्रेन मे तीनो कों बेठाकर मे औऱ आदित्य वापस हल्दीपुर लौटआए। मेरामन बेहद दुखी थां। आदित्य नें मुझसे पूछा भि कि क्याँ बात हैं मगर मैनेउसे ज़्यादा कुछ नहि बताया बसयही कहा कि बड़ीमाॅ औऱ गुड़िया केँ जाने कि वजह सें कुछ अच्छा नहि लगरहा हैं। एक् हप्ते पहले आदित्य बड़ाखुश थां जब रितू दिदी नें उसकी कलाई पर्र राखी बाॅधी थि। उसके दोनो हाॅथों मे ढेर सारी राखियाॅ बाॅधी थि दिदी नें। जिसेदेख कर आदित्य स्वयं कों रोने सें रोंक नहि पाया थां। उसकेइस तरह रोने पर्र माॅआदि सभीलोग पहले तौ चौंके फिनजब रितू दिदी नें सबको आदित्य कि बेहन इंतजार कि किस्सा बताई तोँ सभी दुखी होँ गए थें। सबने आदित्य कों इसबात केँ लिए सांत्वना दि। माॅ नें तौ यह तक कह दिया कि आज सें वोँ मेरा बड़ा बेटा हैं औऱ इसघऱ कां सदस्य हैं। आदित्य यहसुन कर खुशी सें रो पड़ा थां। मेरीसब बहनों नें राखी बाॅधी थि। गुड़िया नें भि मुझे राखी बाॅधा थां लेकिन उसका व्यवहार वही थां। उसकेइस रूखे व्यवहार सें सभी चकित भि थें। माॅ नें तौ पूछ भि लिया थां कि यहसभी क्याँ हैं मगर उसने बड़ी सफाई सें बात कों टाल दिया थां।
हवेली आँ कर मे अपने कमरे मे चला गय़ा थां। जबकि आदित्य अभय चाचा केँ पास हि बैठ गय़ा थां। सारादिन मेरामन दुखीव दुःखी रहा। जब किसीतरह भि चैन न् मिला तौ उठकर रितू दिदी केँ पासचला गय़ा। मुझे अपनेपास आयादेख कर रितू दिदी मुस्कुरा उठीं। उनको भि पताचल गय़ा थां गुड़िया वापस मुम्बई चली गई हैं। मेरे चेहरे केँ भावदेख कर हि वोँ समझगईं कि मे गड़िया केँ जाने कि वजह सें दुःखी हूॅ।
मुझेयूॅ मायूस व दुःखी देखकर उन्होंने मुस्कुरा कर अपनी बाहें फैला दि। मे उनकी फैली हुइ बाहों केँ दरमियां हल्के सें अपनासिर रख दिया। मेरेसिर रखते हि उन्होंने बड़े स्नेह भाव सें मेरेसिर पर्र हाॅथ फेरना शुरुआत कर दिया। अभि मे रितू दिदी कि बाहों केँ बीच छुपका हि थां कि तभी नैना फूफी भि आँ गईं औऱ बेड पऱ मेरेपास हि बैठगईं।
"क्याँ बात हैं मेरा बेटा दुःखी हैं?" नैना फूफी नें मेरेसिर केँ बालों पऱ उॅगलियाॅ फेरते हुए कहा____"पर्र यूॅ दुःखी रहने सें क्याँ होगाराज? अगरकोई बात हैं तोँ उसेआपस मे सलझा लेना होता हैं। "
"सुलझाने केँ लिए मौका भि तौ देना चाहिए न् फूफी। " मैंने दिदी कि बाहों सें उठतेहुए कहा___"स्वयं हि किसीबात कां फैंसला लेँ लेना कहाॅ कि समझदारी हैं? उसे ज़रा भि एहसास नहि हैं उसकेइस रवैये सें मुझ पऱ आजदो महीने सें क्याँ गुज़र रही हैं। "
"यहहाल तोँ उसका भि होगाराज। " रितू दिदी नें कहा___"वोँ तेरी लाडली हैं। ज़िद्दी भि हैं, इसलिए वोँ चाहती होगी कि पहल तूँ करे। "
"किस बात कि पहल दिदी?" मैने अजीबभाव सें उनकीतरफ देखा।
"मुझे लगता हैं कि यहबात तुँ स्वयं समझता हैं। " रितू दिदी नें एकटक मेरीतरफ देखते हुए कहा___"इस लिए पूछने कां तोँ कोई मतलब हि नहि हैं। "
मे उनकीइस बात सें उनकीतरफ ख़ामोशी सें देखता रहा। नैना फूफी कों समझ नं आया कि किस बारे मे रितू दिदी नें ऐसाकहा थां। इधर मे स्वयं भि हैरान थां कि आख़िर रितू दिदी केँ यह कहने कां क्याँ मतलब थां? मैने रितू दिदी कि तरफ देखा तौ उनके होठों पऱ फीकी सि मुस्कान उभरआई थि। फिन जाने क्याँ सोचकर उनकेमुख सें निकलता चला गय़ा।
कौन समझाए हमें केँ आख़िर यहबला क्याँ हैं।
दर्द मे भि मुस्कुराऊॅ मे, तोँ फिन सज़ा क्याँ हैं।।
हम् जिसबात कों लबों सें कह नहि सकते,
कोई उसबात कों नं समझे, इससे बुरा क्याँ हैं।।
रातदिन कुछ भि अच्छा नहि लगता हमको,
इलाही ख़ैर होँ, खुदा जानेयह माज़रा क्याँ हैं।।
समंदर मे डूबकर भि हमारी तिश्नगी न् जाए,
इस दुनियाॅ मे इससेबढ़ कर बद्दुवा क्याँ हैं।।
अपनी तौ बस एक् हि आरज़ू हैं केँ किसी रोज़,
वोँ स्वयं आँ करकहे केँ बता तेरी रज़ा क्याँ हैं।।
रितू दिदी केँ मुख सें निकली इस अजीबो ग़रीब सि ग़ज़ल कों सुनकर मे औऱ नैना फूफी हैरान रहगए। दिलो दिमाग़ मे इक हलचल सि तौ हुईँ लेकिन समझ मे न् आया कि रितू दिदी नें इस ग़ज़ल केँ माध्यम सें क्याँ कहना चाहा थां?
रात मे खानां पीना करके हम् सभीसो गए। दूसरे दिन नास्ता पानी करने केँ बाद मे औऱ आदित्य अभय चाचा केँ संगफिन सें बड़ीमाॅ कि खोज मे निकलगए। ऐसे हि हरदिन होतारहा। लेकिन कहीं भि बड़ीमाॅ केँ बारे मे कोईपता न् चलसका। हम् सभीइस बात सें बेहद चिंतित व परेशान थें औऱ सबसे ज़्यादा हैरान भि थें कि बड़ीमाॅ नें आख़िर ऐसीकौन सि स्थान पऱ स्वयं कों छुपा लिया थां जहाॅ पऱ हम् पहुॅच नहि पारहे थें। उनकी तलाश मे ऐसे हि एक् महीना गुज़र गय़ा। इसबीच हमनेसब नात रिश्तेदारों कों भि बता दिया थां उनके बारे मे। बड़ीमाॅ केँ पिता जी यानी जगमोहन सिंह भि अपनी बेटी केँ बारे मे सभीकुछ जानकर बेहद दुखीहुए थें। लेकिन होनी तोँ हौ चुकी थि। वोँ स्वयं भि अपनी बेटी केँ लापता हौ जाने पऱ दुखी थें।
एक् दिनअभय चाचा केँ कहने पऱ मैने रितू दिदी कि मौजूदगी मे बड़ीमाॅ केँ कमरे मे रखी आलमारी कों खोला औऱ उसमें सें सारे काग़जात निकाले। उन काग़जातों मे ज़मीन औऱ जायदाद केँ दो हिस्से थें। तीसरा हिस्सा यानी कि अजय सिंह केँ हिस्से कि ज़मीन व जायदाद तथा दौलत मे सें करीब-करीब पछत्तर पर्शैन्ट हिस्सा मेरेनाम कर दिया गय़ा थां जबकि बाॅकी कां पच्चीस पर्शेन्ट अभय चाचा केँ बेटे शगुन केँ नाम पऱ थां। उसी आलमारी मे कुछ औऱ भि काग़जात थें जौ दादाजी दादीमा केँ बारे मे थें। उनमें यह जानकारी थि कि दादाजी दादीमा कों कहाॅ पऱ रखा गय़ा हैं?
सारे काग़जातों कों देखकर मैने रितू दिदी सें तथाअभय चाचा सें बात कि। मैने उनसेकहा कि मुझे उनके हिस्से कां कुछ भि नहि चाहिए बल्कि उनके हिस्से कां सभीकुछ रितू दिदी व नीलम केँ नामकर दियाजाए। मेरीइस बात सें अभय चाचा भि सहमत थें। जबकि रितू दिदी नें साफकह दिया कि उन्हें कुछ नहि चाहिए। मगर मे ज़मीन जायदाद पर्र कोईऐसी बात नहि बनाना चाहता थां जिससे भविष्य मे किसीतरह कां विवाद होने कां चान्स बनजाए।
एक् दिन हम् सभी दादाजी दादीमा सें मिलने शिमला गए। शिमला मे हि किसी प्राइवेट स्थान पर्र उन्हें रखा थां बड़े पिताजी नें। शिमला मे हम् सभी दादाजी दादीमा सें मिले। वोँ दोनो अभि भि कोमा मे हि थें। उन्हें इसहाल मे देखकर हम् सभी बेहद दुखी होँ गए थें। डाक्टर नें बताया कि पिछले महीने उनकी बाॅडी पऱ कुछ मूवमेंट महसूस कि गई थि। लेकिन उसकेबाद फिन सें वैसी हि हालत होँ गई थि। डाक्टर नें कहा कि तीन सालों मे यह पहलीबार थां जब पिछले महीने ऐसा महसूस हुआ थां। उम्मीद हैं कि शायद उनके शरीर मे फिनकभी कोई मूवमेन्ट हौ।
हमने डाक्टर सें दादाजी दादीमा कों संग लेँ जाने केँ लिएकहा तोँ डाक्टर नें हमसेकहा कि घऱ लेँ जाने कां कोई फायदा नहि हैं, बल्कि वोँ अगर यहीं पऱ रहेंगे तोँ अधिक बेहतर होगा। क्योंकि यहाॅ पऱ उनकीदेख भाल केँ लिएतथा किसी भि तरह कि मूवमेन्ट कां पता चलते हि डाक्टर उसबात कों बेहतर तरीके सें सम्हालेंगे।
डाक्टर कि बातसुन करमाॅ नें कहा कि वोँ माॅ बाबूजी कों संग हि लेँ जाएॅगी। वोँ स्वयं उनकी बेहतर तरीके सें देखभाल करेंगी। उन्होंने डाक्टर सें यहकहा कि वोँ किसी क़ाबिल नर्स कों हमारे संग हि रहने केँ लिएभेज दें। बहुत समझाने बुझाने औऱ बहस केँ बादयही फैंसला हुआ कि हम् दादाजी दादीमा कों अपनेसंग हि लें जाएॅगे। डाक्टर अब क्याँ कर सकता थां? इसलिए उसने हमारे संग एक् क़ाबिल नर्स कों भेज दिया। साम होने सें पहले हि हम् दादाजी दादीमा कों लेकर हल्दीपुर आँ गए थें।
बड़ीमाॅ कि तलाश ज़ारी थि। लेकिन अबइस तलाश मे फर्क़ यह थां कि हमने अपने आदमियों कों चारोतरफ उनकी तलाश मे लगा दिया थां। पुलिस स्वयं भि उनकी तलाश मे लगी हुई थि। अभय चाचा केँ कहने पर्र मे भि अब अपनी पढ़ाई कों आगे ज़ारी रखने केँ लिए मुम्बई जाने कों रेडी हौ गय़ा थां। मे तोँ अपनीतरफ सें यही कोशिश कररहा थां कि यह जौ एक् नया संसार बनाया थां उसमेहर कोई सुखीरहे, मगरआने वाला टाइमइस नये संसार केँ लिए क्याँ क्याँ नई सौगात लाएगा इसके बारे मे ऊपर बैठे भगवान केँ सिवा किसी कों कुछपता नहि थां।
~~~~~~~~~~खत्म~~~~~~~~~~~~~
दोस्तो, आप् सबके सामने इस स्टोरी कां आख़िरी एपसोड हाज़िर हैं। उम्मीद करताहूॅ कि आप् सबको मनपसंद आएगा।
हमेशा कि तरह आप् सबकी प्रतिक्रिया कां इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,पेज नंबर 535 पर्र,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया औऱ शानदार रिव्यू केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,पेज नंबर 535 पर्र,
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