♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
बड़े पिताजी केँ दिमाग़ मे स्वयं कां बिजनेस शुरुआत करने कां जैसेभूत सवार हौ गय़ा थां। वोँ रातदिन इसी केँ बारे मे सोचते। एक् रात उन्होंने इस बारे मे अपनी पत्नि प्रतिमा कों भि बताया। बड़ी माँ यहजान कर बड़ाखुश हुईं। उन्होंने बड़े बापू कों इसकेलिए तरीका भि बताया। तरीका यह थां कि बड़े पिताजी कों स्वयं कां बिजनेस शुरुआत करने केँ लिए दादाजी जी सें रुपया माॅगना चाहिए। दादाजी जी केँ पासउस टाइम रुपया हि रुपया होँ गय़ा थां यहअलग बात हैं कि वोँ रुपया मेरे पिता जी कि जी तोड़ मेहनत कां नतीजा थां।
अपनी पत्नि कि यहबात सुनकर बड़े पिताजी कां मन दौड़ने लगा। फिन क्याँ थां दूसरे हि दिन वोँ शहर सें गाॅव दादाजी जी केँ पास पहुंच गए औऱ दादाजी जी सें इस बारे मे बात कि। दादाजी जी उनकीबात सुनकर नाराज़ भि हुए औऱ रुपया देने सें इंकार भि किया। उन्होंने कहा कि तुमने अपनीजॉब सें आज तक हमें कितना पैसाला कर दिया हैं? हमने तुम्हें पढ़ाया लिखाया औऱ इस काबिल बनाया कि आज तुम् शहर मे एक् सरकारी वकीलबन गएतथा अपनी मर्ज़ी सें विवाह भि करली। हमनेकुछ नहि कहा। सोच लिया कि चलो जिंदगी तुम्हारा हैं तुम् जैसा चाहो जीने कां हक़ रखते हौ। मगरयह सभी क्याँ हैं बेटा कि तुम् अपनीजॉब सें संतुष्ट नहि? औऱ स्वयं कां कारोबार शुरुआत करना चाहते हौ जिसके लिए तुम्हें ढेर सारा रुपया चाहिए?
दादाजी जी कि बातों कों सुनकर बड़े पिताजी अवाक् रहगए। उन्हें उम्मीद नहि थि कि दादाजी जी रुपया देने कि स्थान यहसभी सुनाने लगेंगे। कुछदेर बाद बड़े पिताजी नें उन्हें समझाना शुरुआत कर दिया। उन्होंने दादाजी जी कों बताया कि वोँ यह बिजनेस साइड सें शुरुआत कररहे हें औऱ वोँ अपनीजॉब नहि छोंड़ रहे। बड़े बापू नें दादाजी जी कों भविष्य केँ बारे मे आगे बढ़ने कि बहोत सि बातें समझाईं। दादाजी जीमान तौ गए पर्र यह जरूरकहा कि यहसभी पैसा विजय(मेरे पिता जी) कि जी तोड़ मेहनत कां नतीजा हैं। उससे एक् बारबात करना पड़ेगा। दादाजी जी कि इसबात सें बड़े पिताजी क्रोध हौ गए बोले कि आप् घऱ केँ मालिक हें याँ विजय? किसी भि चीज़ कां फैसला करने कां अधिकार सबसे पहले आपका हैं औऱ आपकेबाद मेरा क्योंकि मे इसघऱ कां सबसे बड़ा बेटा हूं। विजय होताकौन हैं कि आपकोयह कहना पड़े कि आपको औऱ मुझे उससेबात करना पड़ेगा?
बड़े बापू कि इन बातों कों सुनकर दादाजी जी भि उनसे क्रोध हौ गए। कहनेलगे कि विजय वोँ इंसान हैं जिसकी मेहनत केँ चलतेआज इसघऱ मे इतना पैसा रुपया आया हैं। वोँ तुम्हारे जैसा ग्रेजुएट होकर सरकरी जॉब वालाभले हि न् बनसका मगर तुमसे कम नहि हैं वो। तुमने अपनीजॉब सें क्याँ दिया हैं कमाकर आज तक ? जबकि विजय नें जिसदिन सें पढ़ाई छोंड़ कर ज़मीनों मे खेती बाड़ी कां काम सम्हाला हैं उसदिन सें इसघऱ मे लक्ष्मी नें अपना डेरा जमाया हैं। उसी कि मेहनत सें यह पैसा रुपया हुआ हैं जिसे तुम् माॅगने आए हौ समझे ?
दादाजी जी कि गुस्से भरीयह बातें सुनकर बड़े पिताजी चुप हौ गए। उनकेमन मे अचानक हि यह ख़याल आया कि मेरेइस प्रकार केँ ब्योहार सें सभी बिगड़ जाएगा। यह ख़याल आते हि उन्होंने जल्द सें माफी माॅगी दादाजी जी सें औऱ फिन दादाजी जी केँ संग मेरे पिता जी सें मिलने खेतों कि तरफबढ़ गए।
खेतों मे पहुॅच कर दादाजी जी नें मेरे पिता जी कों पास बुलाकर उनसेइस बारे मे बात कि औऱ कहा कि अजय(बड़े बापू) कों स्वयं कां कारोबार शुरुआत करने केँ लिए पैसा चाहिए। इस पर्र पिता जी नें कहा कि वोँ इनसभी चीज़ों केँ बारे मे कुछ नहि जानते आप् जोँ चाहें करें। आप् घऱ केँ सरदार हें हर फैसला आपको हि करना हैं। पिता जी कि बातसुन कर दादाजी जीखुश हौ गए। उन्हें मेरे पिता जी पर्र गर्व भि हुआ। जबकि बड़े पिताजी मन हि मन मेरे पिता कों गालियां देरहे थें।
ख़ैर उसकेबाद बड़े बापू नें स्वयं कां कारोबार शुरुआत कर दिया। जिसके उद्घाटन मे सभीकोई शामिल हुआ। हलाकि उन्होंने मेरे माता पिता कों आने केँ लिए नहि कहा थां फिन भि मेरे माता पिता खुशी खुशी सबकेसंग आँ गए थें। दादाजी जी केँ पूछने पऱ बड़े बापू नें बताया थां कि एक् शेठ कि वर्षों सें बंद पड़ी कपड़ा मील कों उन्होंने सस्ते दामों मे ख़रीद लिया हैं अबइसी कों नए सिरे सें शुरुआत करेंगे। दादाजी जी नें देखा थां उस कपड़ा मील कों, उसकी हालत ख़राब थि। उसेनया बनाने मे बहुत रुपया लग सकता थां।
चूॅकि दादाजी जीदेख चुके थें इसलिए मील कों सही हालत मे लाने केँ लिए जितना रुपया लगता दादाजी जी देतेरहे। लगभगछः महीने बाद कपड़ा मिलसही तरीके चलनेलगी। यहअलग बात थि उसकेलिए ढेर सारा रुपया लगाना पड़ा थां।
इधर मेरे पिता जी कि मेहनत सें बहुत अच्छी फसलों कि पैदावार होतीरही। वोँ खेती बाड़ी केँ विषय मे हर चीज़ कां बारीकी सें अध्ययन करते थें। आज केँ परिवेश केँ अनुसार जिस चीज़ सें अधिक मुनाफा होताउसी कि फसल उगाते। इसका नतीजा यहहुआ कि दोचार सालों मे हि बहोत कुछबदल गय़ा। मेरे पिता जी नें दादाजी जी कि अनुमति सें उस पुराने घऱ कों तुड़वा कर एक् बड़ी सि हवेली मे परिवर्तित कर दिया।
किस्सा जारी रहेगी,,,,,
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हलाॅकि दो मंजिला विसाल हवेली कों बनवाने मे भारी खर्चा लगा। घऱ मे जितना पैसा रुपया थां सभीखतम होँ गय़ा बाॅकि कां काम करवाने केँ लिए औऱ पैसों कि ज़रूरत पड़ गई। दादाजी जी नें बड़े बापू सें बात कि मगर बड़े बापू नें कहा कि उनकेपास पैसा नहि हैं उनका कारोबार मे बहोत नुकसान होँ गय़ा हैं। दादाजी जी कों किसी केँ द्वारा पताचल गय़ा थां कि बड़े पिताजी कां कारोबार अच्छा खासाचल रहा हैं औऱ उनकेपास रुपयों कां कोई अभाव नहि हैं।
बड़े बापू केँ इस प्रकार झूॅठ बोलने औऱ रुपया न् देने सें दादाजी जी बहोत दुखीहुए। मेरे पिता जी नें उन्हें सम्हाला औऱ कहा कि ब्यर्थ हि बड़े भाई सें पैसा माॅगने गए थें। हम् कोई दूसरा उपाय ढूंढ़ लेंगे।
छोटे चाचा विद्यालय मे सरकारी शिक्षक थें। उनकी इतनी सैलरी नहि थि कि वोँ कुछ सहायता कर सकते। मेरे पिता जी कों किसी नें बताया कि बैंक सें लोंन मे पैसा लेँ लोबाद मे ब्याज केँ संग लौटा देना।
उस व्यक्ति कि इसबात सें मेरे पिता जीखुश होँ गए। उन्होंने इस बारे मे दादाजी जी सें बात कि। दादाजी जी कहनेलगे कि कर्ज़ चाहे जैसा भि होँ वो बहोत ख़राब होता हैं औऱ फिन इतनी बड़ीरकम ब्याज केँ संग चुकाना कोई गुड्डा गुड्डी कां खेल नहि हैं। दादाजी जी नें कहा कि घऱ कां बाकी कां बचाहुआ कार्य बाद मे कर लेंगे जबफसल सें मुनाफ़ा होगा। मगर मेरे पिता जी नें कहा कि हवेली कां काम अधूरा नहि रहने दूंगा, वोँ हवेली कों पूरीतरह रेडी करके हि मानेंगे। इसकेलिए अगर कर्ज़ा होता हैं तौ होतारहे वोँ ज़मीनों मे दोगुनी मेहनत करेंगे औऱ बैंक कां कर्ज़ चुका देंगे।
दादाजी जीमना करतेरह गएमगर पिता जी न् माने। सारी काग़ज़ी कार्यवाही पूरी होते हि पिता जी कों बैंक सें लोंन केँ रूप मे पैसामिल गय़ा। हवेली कां बचाहुआ कार्य फिन सें शुरुआत हौ गय़ा। मेरे पिता जी पऱ जैसेकोई जुनून सां सवार थां। वोँ जी तोड़ मेहनत करनेलगे थें। जाने कहां कहां सें उन्हें जानकारी हासिल हौ जाती कि फलाफसल सें आजकल बड़ा मुनाफ़ा हौ रहा हैं। बसफिन क्याँ थां वोँ भि वहीफसल खेतों मे उगाते।
इधरदो महीने केँ अन्दर हवेली पूरीतरह सें रेडी होँ गई थि। देखने वालों कि आंखें खुली कि खुलीरह गईं। हवेली कों जौ भि देखता दिलखोल कर तारीफ़ करता। दादाजी जी कां सिरशान सें उठ गय़ा थां तथा उनका सीना अपनेइस किसान बेटे कि मेहनत सें निकले इसफल कों देखकर खुशी सें फूलकर गुब्बारा हुआजा रहा थां।
हवेली केँ सजधजकर होने केँ बाद दादाजी जी कि अनुमति सें पिता जी नें एक् बड़े सें भण्डारे कां आयोजन किया जिसमें सम्पूर्ण गाॅव वासियों कों भोज कां न्यौता दिया गय़ा। शहर सें बड़े बापू औऱ बड़ीमाॅ भि आईंथीं।
बड़े बापू नें जब हवेली कों देखा तौ देखते रहगए। उन्होंने स्वप्न मे भि उम्मीद न् कि थि कि उनकाघऱ कभीइस प्रकार कि हवेली मे परिवर्तित हौ जाएगा। लेकिन प्रत्यक्ष मे वे हवेली कों देखदेख कर कहीं न् कहींकोई कमी याँ फिन ग़लती निकाल हि रहे थें। बड़ीमाॅ कां हाल भि वैसा हि थां।
हवेली कों इस प्रकार सें बनाया गय़ा थां कि भविष्य मे किसी भि भइया केँ बीच किसी प्रकार कां कोई विवाद नं खड़ा हौ सके। हवेली कां क्षेत्रफल बहुत बड़ा थां। भविष्य मे अगरकभी तीनो भाईयों कां बॅटवारा होँ तोँ सबको एक् जैसे हि आकार औऱ डिजाइन कां हिस्सा समानरूप सें मिले। हवेली बहुत चौड़ी तथादो मंजिला थि। तीनो भाईयों केँ हिस्से मे बराबर औऱ समानरूप सें आनी थि। हवेली केँ सामने बहोत बड़ा लाॅन थां। कहने कां मतलबयह कि हवेली ऐसी थि जैसेतीन अलगअलग दो मंजिला इमारतों कों एक् संग जोड़ दिया गय़ा हौ।
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भाग। 02
अब तक.
बड़े बापू नें जब हवेली कों देखा तोँ देखते रहगए। उन्होंने स्वप्न मे भि उम्मीद नं कि थि कि उनकाघऱ कभीइस प्रकार कि हवेली मे परिवर्तित हौ जाएगा। लेकिन प्रत्यक्ष मे वे हवेली कों देखदेख कर कहीं नं कहींकोई कमी याँ फिन ग़लती निकाल हि रहे थें। बड़ीमाॅ कां हाल भि वैसा हि थां।
हवेली कों इस प्रकार सें बनाया गय़ा थां कि भविष्य मे किसी भि भइया केँ बीच किसी प्रकार कां कोई विवाद न् खड़ा होँ सके। हवेली कां क्षेत्रफल बहुत बड़ा थां। भविष्य मे अगरकभी तीनो भाईयों कां बॅटवारा हौ तोँ सबको एक् जैसे हि आकार औऱ डिजाइन कां हिस्सा समानरूप सें मिले। हवेली बहुत चौड़ी तथादो मंजिला थि। तीनो भाईयों केँ हिस्से मे बराबर औऱ समानरूप सें आनी थि। हवेली केँ सामने बहोत बड़ा लाॅन थां। कहने कां मतलबयह कि हवेली ऐसी थि जैसेतीन अलगअलग दो मंजिला इमारतों कों एक् संग जोड़ दिया गय़ा होँ।
अबआगे.
इसीतरह सबकेसंग हॅसी खुशी टाइम गुज़रता रहा। बड़े बापू औऱ बड़ीमाॅ कां ब्यौहार दिन प्रतिदिन बदलता जारहा थां। उनकारहन सहनसभी कुछबदल गय़ा थां। इसबीच उनको एक् बेटी भि हुई जिसका नाम रितुरखा गय़ा, रितु सिंह बघेल। बड़े पिताजी औऱ बड़ीमाॅ अपनी बच्ची कों लेकरशहर सें घऱआईं औऱ दादाजी दादीमा जी सें आशीर्वाद लिया। उन्होंने एक् बढ़िया सि गाड़ी भि ख़रीद ली थि, उसी वाहन सें वोँ दोनों आए थें।
दादाजी जी बड़े बापू औऱ बड़ीमाॅ केँ इस बदलते रवैये सें अंजान नहि थें लेकिन बोलते कुछ नहि थें। वोँ समझगए थें कि बेटा कारोबारी व्यक्ति होँ गय़ा हैं औऱ उसेअब रुपये पैसे कां घमण्ड होनेलगा हैं। दादाजी जीयह भि महसूस कररहे थें कि उनके बड़े बेटे औऱ बड़ीबहू कां मेरे पिता केँ प्रति कोईखास बोलचाल नहि हैं। जबकि छोटे चाचा जी सें उनका संबंध अच्छा थां। इसका कारण शायदये थां कि छोटे चाचा भले हि किसी सें ज़्यादा मतलब नहि रखते थें मगर स्वभाव सें बहोत गुस्से वाले थें। वोँ अन्याय बरदास्त नहि करते थें बल्कि वोँ इसके खिलाफ़ लड़ पड़ते थें।
अपने अच्छे खासेचल रहे कारोबार केँ पैसों सें बड़े बापू नें शहर मे एक् बढ़िया सां घऱ भि बनवा लिया थां जिसके बारे मे बहोत बाद मे सबकोपता चला थां। दादाजी जी बड़े पिताजी सें नाराज़ भि हुए थें इसकेलिए। पऱ बड़े पिताजी नें उनको अपनी लच्छेदार बातों द्वारा समझा भि लिया थां। उन्होंने दादाजी जी कों कहा कि यहघऱ बच्चों केँ लिए हैं जब वोँ सभी बड़े होंगे तोँ शहर मे इसीघऱ मे रहकर यहाॅ अपनी पढ़ाई करेंगे।
वक़्त गुज़रता रहा, औऱ वक्त केँ संग बहोत कुछ बदलता भि रहा। रितु दिदी केँ पैदा होने केँ चारसाल बाद बड़े बापू कों एक् औऱ बेटी हुइ जबकि उसी टाइम मे अपने माता पिता द्वारा पैदाहुआ। मेरे पैदा होने केँ एक् दिनबाद हि बड़े पिताजी कों दूसरी बेटी यानी नीलम पैदा हुइ थि। उस टाइम पूरे खानदान मे मे अकेला हि लड़का थां। मेरे पैदा होने पऱ दादाजी जी नें बहोत बड़ा उत्सव किया थां तथा पूरे गाॅव वालों कों भोज करवाया थां। हलाॅकि मेरे माता पिता यहसभी बिल्कुल नहि चाहते थें क्यूं कि इससे बड़े पिताजी औऱ बड़ीमाॅ केँ दिलओ दिमाग़ मे ग़लत धारणा पैदा हौ जानी थि। लेकिद दादाजी जी नहि माने बल्कि इनसभी बातों कि परवाह किए बग़ैर वोँ यहसभी करतेगए। इसका परिणाम वहीहुआ जिसका मेरे माता पिता जी कों अंदेशा थां। मेरे पैदा होने कि खुशी मे दादाजी जी द्वारा कियेगए इस उत्सव सें बड़े पिताजी औऱ बड़ीमाॅ बहोत नाराज़ हुईं। उन्होंने कहा कि जब उनको बच्चियां पैदा हुईँ तबयह जश्न क्यूं नहि किया गय़ा? जिसके जवाब मे दादाजी जी नें नाराज़ होँ करकहा कि तुम् लोग हमें अपना मानते हि कहाॅ होँ? सभीकुछ अपनी मर्ज़ी सें हि कर लेते होँ। कभी किसी चीज़ केँ लिए हमारी मर्ज़ी हमारी पसन्द याँ हमारी सहमति केँ बारे मे सोचा तुम् लोगों नें? तुम् लोगों नें अपनी मर्ज़ी सें शहर मे घऱबना लिया औऱ किसी कों बताया भि नहि, अपनी मर्ज़ी याँ मनपसंद सें वाहन खरीदली औऱ किसी कों बताया तक नहि। इनसभी बातों कां कोई जवाब हैं तुम् लोगों केँ पास? क्याँ सोचते हौ तुम् लोग कि तुम्हारी यह चीज़ें कहीं हम् लोग माॅग न् लें? याँ फिन तुमने यहसोच लिया हैं कि जोँ तुमने बनाया हैं उसमे किसी कां कोईहक़ नहि हैं?
दादाजी जी कि गुस्से सें भरीयह सभी बातें सुनकर बड़े पिताजी औऱ बड़ीमाॅ चुपरह गए। उनकेमुख सें कोई लफ्ज़ नहि निकला। जबकि दादाजी जी कहतेरहे, तुम् लोगों नें स्वयं हि हम् लोगों सें स्वयं कों अलगकर लिया हैं। आज तुम्हारे पास पैसा रुपया आँ गय़ा तौ स्वयं कों तोप समझने लगे होँ। मगरयह भूलगए कि जिस रुपये पैसे केँ नशे मे तुमने हम् लोगों कों स्वयं सें अलगकर लिया हैं उस रुपये पैसे कि बुनियाद हमारे हि खून पसीने कि कमाई केँ पैसों सें सजधजकर कि हैं तुमने। अब चाहे जितना आसमान मे उड़लो मगरयाद रखनायह बात।
किस्सा जारी रहेगी,,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Aage kya hua? Next part padhiye
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