♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
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धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,, आपका सुझाव यकीनन बहोत अच्छा हैं भइया,इस पऱ अवश्य विचार करूॅगा,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
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♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 32 》
अब तक,,,,,,,,,
पेड़ केँ नीचे बैठी प्रतिमा हवशव वासना केँ हाथों अंधी होकर जाने क्याँ क्याँ बड़बड़ाए जारही थि। कुछ हि देर मे विजय सिंह आँ गय़ा औऱ उसने धुलेहुए आमों कों एक् बाॅस कि टोकरी मे रखकर लाया थां। उसने प्रतिमा कि तरफ देखा तोँ चौंक पड़ा।
"आपको क्याँ हुआ भाभी?" विजय नें हैरानी सें कहा___"आपका चेहरा इतनालाल सुर्ख क्यूं होँ रखा हैं? कहीं आपकोलू तोँ नहि लग गई। हे ईश्वर आपकी तबीयत तोँ ठीक हैं न् भाभी। "
"मे एकदमठीक हूॅ विजय। " विजय कों अपनेलिए फिक्र करतेदेख प्रतिमा कों समयभर केँ लिए अपनीसोच पर्र ग्लानी हुई उसकेबाद उसने कहा___"औऱ मेरेलिए तुम्हारी यह फिक्र देखकर मुझे बेहद खुशी भि हुईँ। मे जानती हूॅ तुम् सभी हमें अपना समझते होँ तथा हमारे लिए तुम्हारे अंदरकोई मैल नहि हैं। एक् हम् थें कि अपनो सें हि बेगाने बनगए थें। मुझे क्षमा करदो विजय।। " कहने केँ संग हि प्रतिमा कि आॅखों मे आॅसू आँ गए औऱ वो एक् झटके सें उठकर विजय सें लिपट गई।
विजय उसकीइस हरकत सें हैरान रह गय़ा थां। लेकिन प्रतिमा कि सिसकियों कां सुनकर वो यही समझा कि यहसभी उसने भावना मे बहकर किया हैं। मगरभला वो क्याँ जानता थां कि महिला उसबला कां नाम हैं जिसका रहस्य देवता तोँ क्याँ ईश्वर भि नहि समझ सकते।
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अबआगे,,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अबआगे_______
उसदिन केँ बाद सें तोँ जैसे प्रतिमा कां ये रोज़ कां काम हौ गय़ा थां। वो हर रोज़ विजय सिंह केँ लिए खाने कां टिफिन औऱ दूध लेकर खेतों पर्र जाती औऱ वहाॅ पऱ विजय कों अपना अधनंगा बदन दिखाकर उसे अपने रूपजाल मे फाॅसने कि कोशिश करती। लेकिन विजय सिंह उसकेजाल मे फॅस नहि रहा थां। यहबात प्रतिमा कों भि समझ मे आँ गई थि कि विजय सिंह उसकेजाल मे फॅसने वाला नहि हैं। उधर गौरी कि तबीयत अबठीक हौ चुकी थि इसलिए खाने कां टिफिन वो स्वयं हि लेकर जानेलगी थि। प्रतिमा अपनामन मसोसकर रह गई थि। अजय सिंह स्वयं भि परेशान थां इसबात सें कि विजय सिंह केसे उसकेजाल मे फॅसे?
अजय सिंहयह भि जानता थां कि उसके भइया केँ जैसी हि उसकी मॅझली बहू यानी गौरी थि। वो भि उसकेजाल मे फॅसने वाली नहि थि। ऐसे हि दिन गुज़र रहे थें। गौरी कि तबीयत सही होने केँ बाद प्रतिमा कों फिन खेतों मे जाने कां कोई अच्छा सां अवसर हि नहि मिल पाता थां। इधर गौरी भि अपने पति विजय सिंह कों खानां लेकर हवेली सें खेतों पर्र चली जाती औऱ फिन वो वहीं रहती। साम कों हि वो वापस हवेली मे आती थि। इसलिए अजय सिंह भि कोई मौका नहि मिल पाता थां उसे फॅसाने केँ लिए।
पिछले एक् महीने सें प्रतिमा विजय सिंह कों अपनेरूप जाल मे फसाने कि कोशिश कररही थि। शुरुआत शुरुआत मे तौ उसने अपनेमन कि बातों कों उससे उजागर नहि किया थां। बल्कि हरदिन वो विजय सिंह सें ऐसी बाते करती जैसे वो उसकी कितनी फिक्र करती हैं। भोला भाला विजय सिंहयही समझता कि उसकी भाभी कितनी अच्छी हैं जौ उसकी फिक्र करती हैं औऱ हर रोज़ वक़्त पर्र उसकेलिए इतनी भीषणधूप व गर्मी मे खानां लेकरआती हैं। इनबीस दिनों मे विजय सिंह भि कुछहद तक सहजफील करनेलगा थां अपनी भाभी सें। प्रतिमा उससेखूब हॅसती बोलती औऱ बातबात पऱ उसकेगले लग जाती। विजय सिंह कों उसकाइस तरह अपनेगले लग जानां अच्छा तोँ नहि लगता थां लेकिन यहसोच कर वो चुपरह जाता कि प्रतिमा शहर वाली स्त्री हैं औऱ इसतरह अपनो केँ गलेलग जानां शायद उसकेलिए आमबात हैं। ऐसे हि एक् दिन बातों बातों मे प्रतिमा नें विजय सिंह सें कहा__"हम् दोनो देवरु भाभी इतने दिनों सें खुशी खुशी हॅसते बोलते रहे औऱ फिन एक् दिन मे चली जाऊॅगी शहर। वहाॅ मुझेयह सभी बहोत याद आएगा। मुझे तुम्हारे संग यहाॅइस तरह हॅसना बोल्ना औऱ मज़ाक करना बहोत अच्छा लगरहा हैं। रात मे भि मे तुम्हारे बारे मे हि सोचती रहतीहूॅ। ऐसालगा करता हैं विजय कि कितनी जल्द सुभह हौ औऱ फिन कितनी जल्द मे दोपहर मे तुम्हारे लिए खानां लेकर जाऊॅ?हाय रामयह क्याँ हौ गय़ा हैं मुझे? क्यूं मे तुम्हारी तरफइस तरह खिंची चलीआती हूॅ विजय? क्याँ तुमने मुझ पऱ कोई चमत्कार कर दिया हैं?"
प्रतिमा कि यह बातें सुनकर विजय सिंह कों ज़बरदस्त झटकालगा। उसकीतरफ देखते हुएइस तरह खड़ारह गय़ा थां जैसे किसी नें उसे पत्थर बन जाने कां श्राप दे दिया होँ। मनो मस्तिष्क मे धमाके सें होँ रहे थें उसके। जबकि उसकी हालत सें बेख़बर प्रतिमा कहेजा रही थि___"इनचंद दिनों मे यह कैसा नाताबन गय़ा हैं हमारे बीच? तुम्हारा तोँ पता नहि विजयमगर मुझे अपने अंदर कां समझ आँ रहा हैं। मुझे लगता हैं कि मुझे तुमसे प्यार होँ गय़ा हैं। हे ईश्वर! कोई औऱ सुने तोँ क्याँ कहे? प्लीज़ विजय मुझे ग़लतमत समझना। ऐसा होँ जाता हैं कि कोई हमें अच्छा लगने लगता हैं औऱ उससे प्रेम हौ जाता हैं। शपथ सें विजय मुझे इसकापता हि नहि चला। "
विजय सिंह केँ दिलो दिमाग़ होने वाले धमाके अब औऱ भि तेज़ हौ गए थें। प्रतिमा कां एक् एक् शब्द पिघले हुए शीशे कि तरह उसके हृदय पऱ पड़रहा थां। उसकी हालत देखने लायक हौ गई थि। चेहरे पर्र बारह क्याँ पूरे केँ पूरे चौबीस बजेहुए थें। पसीने सें तर चेहरा जिसमें हल्दी सि पुती हुईँ थि।
सहसा प्रतिमा नें उसे ध्यान सें देखा तौ बुरीतरह चौंकी। उसे पहले तोँ समझ न् आया कि विजय सिंह कि यह अचानक हि क्याँ होँ गय़ा हैं फिन जल्दी हि जैसे उसके दिमाग़ कि बत्ती जलउठी। उसे समझते देर न् लगी कि उसकीइस हालत कां कारण क्याँ हैं? एक् ऐसा इंसान जिसे रिश्तों कि क़दरव उसकीमान मर्यादाओं कां बखूबी ख़याल हौ तथा जौ कभी भि किसी कीमत पऱ किसी पराई स्त्री केँ बारे मे ग़लत ख़याल तक नं लाता होँ उसकी हालतयह जानकर तौ ख़राब होँ हि जाएगी कि उसकी अपनी भाभी उससे प्यार करती हैं। यहबात उससे केसेपच सकती थि भला? अभि तक जितना कुछ होँ रहा थां वही उससे नहि पचरहा थां तोँ फिन इतनी संगीन बातभला केसेपच जाती?
"वि विजय। " प्रतिमा नें उसे उसके कंधों सें पकड़कर ज़ोर सें झकझोरा___"यह यह क्याँ हौ क्याँ होँ गय़ा हैं तुम्हें?"
प्रतिमा केँ झकझोरने पर्र विजय सिंह बुरीतरह चौंका। उसकेमनो मस्तिष्क नें तेज़ी सें काम करना शुरुआत कर दिया। अपने नज़दीक प्रतिमा कों अपने दोनो कंधे पकड़े देख वो तेज़ी सें पीछेहट गय़ा। इस टाइम उसके चेहरे पर्र बहोत हि अजीब सें भाव गर्दिश करते नज़रआने लगे थें।
"विजय क्याँ हुआ तुम्हें?" प्रतिमा नें चकितभाव सें कहा___"देखो विजय मुझे ख़लतमत समझना। इसमे मेरीकोई ग़लती नहि हैं। "
"यहयह अच्छा नहि हुआ भाभी। " विजय सिंह नें आहतभाव सें कहा___"आप् ऐसा केसेसोच सकती हें? जबकि आपकोपता हैं कि ऐसा सोचना भि पाप हैं?"
"मे जानती हूॅ विजय। " प्रतिमा नें दुखी होने कि ऐक्टिंग कि, बोलि___"मुझे पता हैं कि ऐसा सोचना भि ग़लत हैं। मगरयह केसेहुआ मुझे नहि पता विजय। शायद इतने दिनों सें एक् संग हॅसने बोलने सें ऐसाहुआ हैं। तुम्हारी मासूमियत, तुम्हारा भोलापन तथा तुम्हारी अच्छाईयाॅ मेरे दिलो दिमाग़ मे उतरती चलीगईं हें। किसी केँ लिएदिल मे भावनाएॅ जाग जानां भला किसके अख्तियार मे होता हैं? यह तोँ दिल कां दखल होता हैं। उसे जौ अच्छा लगता उसकेलिए धड़कने लगता हैं। इसकापता इंसान कों तब चलता हैं जब उसकादिल अंदर सें अपने महबूब केँ लिए बेचैन होने लगता हैं। वही मेरेसंग हुआ हैं विजय। कदाचित तुम् मेरेइस नादान व नासमझ दिल कों भागएइस लिएयह सभी हौ गय़ा। "
"आप् जाइये भाभी यहाॅ सें। " विजय सिंह नें कहा___"इस बात कों यहीं पर्र समाप्त कर दीजिए। अगर आपको अपने अंदर कां पताचल गय़ा हैं तोँ अब आप् वहीं पर्र रुक जाइए। अपने क़दमों कों रोंक लीजिए। मे आपके विनती करताहूॅ भाभी। कृपया आप् जाइये यहाॅ सें। "
"इतनी कठोरता सें मुझे जाने केँ लिएमत बोलो विजय। " प्रतिमा नें मगरमच्छ केँ आॅसू छलका दिये, बोलीं___"तुम् भि समझ सकते होँ इसमें मेराकोई दोष नहि हैं। औऱ अपने क़दमों कों रोंकना इतना आसान नहि होता। यह प्यार बड़ा अजीब होता हैं विजय। यह किसी कि नहि सुनता, स्वयं अपनी भि। "
"मे कुछ सुनना नहि चाहता भाभी। " विजय सिंह नें कहा___"मे केवल इतना जानता हूॅ कि यह ग़लत हैं औऱ मे ग़लत चीज़ों केँ पक्ष मे कभी नहि हौ सकता। आप् भि इस सबको अपने ज़हन सें निकाल दीजिए औऱ हौ सके तोँ कभी भि मेरे सामने मत आइयेगा। "
"ऐसा तुम् केसेकह सकते हौ विजय?" प्रतिमा नें रोने कां नाटक किया__"मैने इतना बड़ा गुनाह तौ नहि किया हैं जिसकी सज़ा तुम् इसतरह देरहे होँ? प्यार तौ हर इंसान सें होता हैं। क्याँ देवरु भाभी केँ बीच प्यार नहि होँ सकता? बिलकुल होँ सकता हैं विजय.प्यार तौ वैसे भि सबसेपाक होता हैं। "
"यहसभी किताबी बातें हें भाभी। " विजय सिंह नें कहा___"आज केँ युग मे प्यार कि परिभाषा कुछ औऱ हि हौ गई हैं। अगर नहि होती तोँ आपको अपने पति केँ अलावा किसी औऱ सें प्यार नहि होता। प्यार तोँ वही हैं जौ किसी एक् सें हि एक् बार होता हैं औऱ फिन ताऊम्र तक वो मात्र उसी कां होकर रहता हैं। किसी दूसरे केँ बारे मे उसकेदिल मे विचार हि नहि उठताकभी। "
"यह सबके सोचने कां नज़रिया हैं विजय कि वोँ प्यार केँ बारे मे कैसी परिभाषा कों मानता हैं औऱ समझता हैं?" प्रतिमा नें कहा___"मेरा तौ मानना यह हैं कि प्यार बारबार होता हैं। दिलभले हि हज़ारों बारटूट कर बिखरजाए मगर वो प्यार करना नहि छोंड़ता। वो प्यार करता हि रहता हैं। "
"सबकी अपनीसोच होती हैं भाभी। " विजय सिंह नें कहा___"लोग अपने मतलब केँ लिए ग़लत कों भि सही ठहरा देते हें औऱ उसे साबित भि कर देते हें। मगर मेरीसोच ऐसी नहि हैं। मेरेदिल मे मेरी पत्नि केँ अलावा कोई दूसरा आँ हि नहि सकता। मे उससे बेइंतहां प्यार करताहूॅ, उसे सें मरतेदम वफ़ा करूॅगा। किसी औऱ सें मुझे वैसा प्यार हौ हि नहि सकता। प्यार मे मात्र दिल कां हि नहि दिमाग़ कां भि दखल होना ज़रूरी हैं। मन मे दृढ़ संकल्पों कां होना भि ज़रूरी हैं। अगरयह सभी हैं तोँ आपको किसी दूसरे प्यार हौ हि नहि सकता। "
"होँ सकता किसी औऱ केँ पास तुम्हारे जैसी ख़्वाहिश शक्ति याँ दृढ़ संकल्प न् हौ। " प्रतिमा नें कहा___"औऱ वो मेरे जैसे हि किसी दूसरे सें भि प्यार कर बैठे। "
"तौ मे यही कहूॅगा कि उसका वोँ प्यार निम्न दृष्टि कां हैं। " विजय सिंह नें कहा___"जौ अपने पहले प्रेमी केँ लिए वफ़ा नहि करसका वो अपने दूसरे प्रेमी केँ संग भि वफ़ा नहि कर सकेगा। क्योंकि संभव हैं कि कभीऐसा भि वक़्त आँ जाए कि उसे किसी तीसरे इंसान सें भि प्यार होँ जाए। तब उसके बारे मे क्याँ कहा जाएगा? सच्चा प्यार औऱ सच्ची वफ़ा तोँ वही हैं भाभी जोँ मात्र अपने पहले प्रेमी सें हि कि जाए। उसी हौ कररहजाए। "
प्रतिमा कों समझ नां आया कि अब वो विजय सें क्याँ कहे?यह बात तौ वो स्वयं भि समझती थि कि विजयठीक हि कहरहा हैं। लेकिन उसे तोँ विजय कों फाॅसना थां इसलिए भला केसे वो हारमान लेती?यह दाॅव बेकार चला गय़ा तोँ कोई दूसरा दाॅवसही।
"तोँ तुम् यह कहना चाहते हौ कि मे तुम्हारे बड़े भाई औऱ अपने पति केँ लिए वफ़ादार नहि हूॅ? प्रतिमा नें कहा___"क्योंकि मुझे उनके अलावा तुमसे प्यार हुआ?"
"मे किसी एक् केँ लिए नहि कहरहा भाभी बल्कि हर किसी केँ लिएकह रहाहूॅ। " विजय सिंह नें कहा___"क्योंकि मेरीसोच यही हैं। मे इस जिंदगी मे मात्र एक् कां हि होकर रहना चाहता हूॅ औऱ ईश्वर सें यह प्रार्थना भि करताहूॅ वोँ अगले जन्मों मे भि मुझे मेरी गौरी कां हि रहनेदे। "
"ठीक हैं विजय। " प्रतिमा नें सहसा पहलू बदला___"मे तुमसे यह नहि कहरही कि तुम् गौरी कों छोंड़ कर मुझसे प्यार करो। लेकिन इतना अवश्य चाहती हूॅ कि मुझे स्वयं सें इसतरह दूर रहने कि सज़ा नं दो। मे तुमसे कभीकुछ नहि मागूॅगी बसदिल केँ किसी कोने मे मेरेलिए भि थोड़ी स्थान बनाए रखना। "
"ऐसा कभी नहि हौ सकता भाभी। " विजय सिंह दृढ़ता सें कहा___"क्योंकि यह नाता हि मेरी नज़र मे ग़लत हैं औऱ ग़लत मे कर नहि सकता। हाॅ आप् मेरी भाभी हें औऱ मेरेलिए पूज्यनीय हें इसलिए इस रिश्ते केँ लिए हमेशा मेरे अंदर सम्मान कि भावना रहेगी। देवरु भाभी केँ बीचजिस तरह कां स्नेह होता हैं वोँ भि रहेगा। मगर वोँ नहि जिसकी आप् बातकर रही हें। "
"ऐसा क्यूं कहरहे हौ विजय?" प्रतिमा नें रुआॅसे भाव कि ऐक्टिंग कि___"क्याँ मे इतनी बुरी लगतीहूॅ तुम्हें? क्याँ मे इस काबिल भि नहि कि तुम्हारा प्यार पा सकूॅ?"
"ऐसी बातें आपको करनी हि नहि चाहिए भाभी। " विजय सिंह नें बेचैनी सें पहलू बदला___"आप् मुझसे बड़ी हें हरतरह सें। आपको स्वयं समझना चाहिए कि यह ग़लत हैं। जानते बूझते हुए भि आप् ग़लतराह पऱ चलने कि बातकर रही हें। जबकि आपको करनायह चाहिए कि आप् स्वयं कों समझाएॅ औऱ इससे पहले कि हालात बिगड़ जाएॅ आप् उस माहौल सें जल्द सें जल्द निकल जाइये। "
प्रतिमा कि सारी कोशिशें बेकार रहीं। विजय सिंह कों तौ जैसे उसकीकोई बात नां माननी थि औऱ नाँ हि माना उसने। थक हारकर प्रतिमा वहाॅ सें हवेली लौटआई थि। हवेली मे उसने अपने पति सें आज कि सारी महाभारत बताई। उसकी सारी बातें सुनकर अजय सिंह हैरान रह गय़ा। उसेसमझ नं आया कि उसका भइया आख़िर किस मिट्टी कां बनाहुआ हैं? लेकिन आज कि बातों सें कहीं न् कहींउसे यह उम्मीद अवश्य जगी कि आज नहि तोँ कल विजय सिंह प्रतिमा केँ सामने अपने हथियार डाल हि देगा। अगलेदिन जब प्रतिमा फिन सें विजय केँ लिए टिफिन सजधजकर करने किचेन मे गई तौ गौरी कों उसने किचेन मे टिफिन रेडी करते देखा।
"अब कैसी तबीयत हैं गौरी?" प्रतिमा नें किचेन मे दाखिल होतेहुए पूछा थां।
"अबठीक हूॅ दिदी। " गौरी नें पलटकर देखते हुए कहा___"इस लिए मैने सोचा कि उनकेलिए टिफिन रेडी करके खेतों पऱ चली जाऊॅ। "
"अरे तुम् अभि थोड़े दिन औऱ आरामकरो गौरी। " प्रतिमा नें कहा___"अभि अभि तोँ ठीक हुई होँ। बाहर् बहोत तेज़धूप औऱ गर्मी हैं। ऐसे मे फिन सें बीमार हौ जाओगी तुम्। मे तोँ रोज़ हि विजय कों खानां देआती हूॅ। लाओ मुझे मे देकरआती खानां विजय कों। "
"अरेअब मे बिलकुल ठीकहूॅ दिदी। " गौरी नें कहा___"आप् चिन्ता मत कीजिए। दोचार दिन सें आराम हि तोँ कररही थि मे। "
"अरे तोँ अभि औऱ कुछदिन आरामकर लो गौरी। " प्रतिमा नें कहा___"औऱ वैसे भि मे कुछ दिनों बादचली जाऊॅगी क्योंकि बच्चों केँ विद्यालय खुलने वाले हें। मुझे अच्छा लगता हैं खेतों मे। वहाॅ पऱ आम केँ बाग़ों मे कितनी मस्तहवा लगती हैं। कितना चैन मिलता हैं वहाॅ। मे तौ विजय कों खानां देने केँ बाद वहींचली जातीहूॅ औऱ वहीं पर्र पेड़ों कि घनी छाॅव मे बैठी रहतीहूॅ। यहाॅ सें तौ लाख गुना अच्छा हैं वहाॅ। "
"हाॅ यह तौ आपनेसही कहा दिदी। " गौरी नें मुस्कुरा कर कहा___"वहाॅ कि बात हि अलग हैं। इसीलिए तौ मे दिनभर वहीं उनकेपास हि रहतीहूॅ। "
"तुम् तौ हमेशा हि रहती होँ गौरी। " प्रतिमा नें मुस्कुरा कर कहा__"औऱ वहीं पऱ तुम् दोनोमजा भि करते होँ। हैं नां??"
"क्याँ दिदी आप् भि कैसी बातें करती हें?" गौरी नें शरमाकर कहा___"यह सभी खेतों मे थोड़ी नं अच्छा लगता हैं। "
"ख़ैर छोड़ो। " प्रतिमा नें कहा___"दो चारदिन बचे हें तौ मुझे वहाॅ कि ठंडी छाॅव कां आनन्द लेँ लेनेदो। उसकेबाद तुम् जाती रहना। "
"हाॅ तौ ठीक हैं न् दिदी। " गौरी नें कहा__"हम् दोनो चलते हें औऱ वहाॅ कि ठंडी छाॅव कां मजा लेंगे। "
"तुम् अभि अभि बीमारी सें बाहर् आई हौ गौरी। " प्रतिमा नें कहा___"इस लिए तुम्हें अभि इतनीधूप मे बाहर् नहि निकलना चाहिए। मे तुम्हारे स्वास्थ केँ भले केँ लिए हि कहरही हूॅ औऱ तुम् होँ ज़िद कियेजा रही होँ? अपनी दिदी कां बिलकुल भि कहा नहि मानरही हौ तुम्। याँ फिन तुम्हारी नज़र मे मेरीकोई अहमियत हि नहि हैं। ठीक हैं गौरीकरो जौ तुम्हें अच्छा लगे। "
"अरे नहि दिदी। " गौरी नें जल्द सें कहा___"आपकी अहमियत तौ बहोत अधिक हैं हम् सबकी नज़र मे। मे तौ बसइसलिए कहरही थि कि आप् इतने दिनों सें धूप औऱ गर्मी मे परेशान होँ रही हें। औऱ भला मे केसे आपकीबात टाल सकतीहूॅ दिदी? मुझे तौ बेहदखुश हूॅ कि आप् मेरेहित कि बारे मे सोच रहीं हें। "
"तौ फिनलाओ वोँ टिफिन मुझेदो। " प्रतिमा नें जोँ इमोशनली उसे ब्लैकमेल किया थां उसमें वो सफल हौ गई थि, बोलीं___"मे विजय कों खानां देनेजा रहीहूॅ औऱ तुम् अभि आरामकरो अपने कमरे मे। "
"जीठीक हैं दिदी। " गौरी नें मुस्कुरा कहा औऱ टिफिन प्रतिमा कों पकड़ा दिया। प्रतिमा टिफिन लेकर किचेन सें बाहर् निकल गई। जबकि गौरी खुशी खुशीऊपर अपने कमरे कि तरफबढ़ गई।
प्रतिमा जब खेतों पर्र पहुॅची तौ वहाॅ कां माहौल देखकर उसके सारे अरमानों पऱ पानीफिन गय़ा। दरअसल आज पिछले दिनों केँ विपरीत विजय सिंह खेतों पर्र अकेला नहि थां। बल्कि उसकेसंग कई मजदूर भि खेतों पर्र आज नज़र आँ रहे थें। कदाचित विजय सिंह कों अंदेशा थां कि प्रतिमा आज भि उसकेलिए टिफिन लेकर आएगी औऱ फिन यहाॅ पर्र वो फिन सें अपने प्यार कां बेकार हि राग अलापने लगेगी। इसलिए विजय सिंह नें कुछ मजदूरों कों कल हि बोल दिया थां कि वोँ अपनेलिए लंचघऱ सें हि लेँ आएॅगे औऱ यहीं पऱ खाएॅगे। विजय सिंह केँ कहे अनुसार कई मजदूर आज यहीं पर्र थें।
प्रतिमा यहसभी देखकर अंदर हि अंदरजल भुन गई थि। उसे विजय सिंह सें ऐसी उम्मीद हर्गिज़ नहि थि। वो तोँ उसे निहायत हि शान्त औऱ भोला समझती थि। लेकिन आजउसे भोले भाले विजय नें अपना दिमाग़ चला दिया थां जिसका असरयह हुआ थां कि प्रतिमा अबकुछ नहि कर सकती थि।
प्रतिमा जैसे हि घर-मकान केँ पास पहुॅची तौ एक् मजदूर उसकेपास आया औऱ बड़ेअदब सें बोला___"मालकिन, मॅझले मालिक हमका बोले कि आपसे उनके खाने कां टिफिनवा लेँ आऊॅ। काह हैं नाँ मालकिन आज मॅझले मालिक हम् मजदूरों केँ संग हि खानां खाय चाहत हें। ई हमरेलिए बहुतै सौभाग्य कि बात हैं। दीजिए मालकिन याँ टिफिनवा हम् लें जात हें। "
प्रतिमा भला क्याँ कह सकती थि। वो तोँ अंदर हि अंदरजल कर खाक़ हुई जारही थि। उसनेआए हुए मजदूर कों टिफिन पकड़ाया औऱ पांव पटकते हुए घर-मकान केँ अंदरचली गई औऱ कमरे मे जाकर चारपाई पर्र पसर गई। गुस्से सें उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गय़ा थां।
"यह तुमने अच्छा नहि किया विजय। " प्रतिमा स्वयं सें हि बड़बड़ा रही थि___"तुम् जिस चीज़ कों अपनी समझदारी याँ होशियारी समझरहे होँ वोँ दरअसल मेरा अपमान हैं। तुम् दिखाना चाहते होँ कि तुम्हारी नज़र मे मेरीकोई अहमियत हि नहि हैं। कितना अपने प्यार कां मैने तुमसे कल रोना रोया थां लेकिन तुमने उसे ठुकरा दियायह कहकर कि यह ग़लत हैं। अरेसही ग़लतआज केँ युग मे कौन देखता हैं विजय?चार दिन कां जिंदगी हैं उसेहॅस खुशी औऱ मजा केँ संग जियो। मगर तुम् तौ सच्चे प्यार कां राग अलापे जारहे हौ। क्याँ हैं इस सच्चे प्यार मे? बताओ विजय क्याँ हासिल कर लोगेइस सच्चे प्यार मे? अरे एक् हि स्त्री केँ पल्लू मे बॅधे होँ तुम्। यह कैसा प्यार हैं जिसने तुम्हें बाॅधकर रखाहुआ हैं?"
जाने कितनी हि देर तक प्रतिमा यूॅ हि बड़बड़ाती रही औऱ ऐसे हि सो गई वो। फिनजब उसकीनीद खुली तोँ हड़बड़ा कर चारपाई सें उठी वो। अभि वो उठकर कमरे सें बाहर् हि जाने वाली थि कि तभी विजय किसीकाम सें कमरे मे आँ गय़ा।
कमरे मे अपनी भाभी कों देखकर विजय सिंह हैरान रह गय़ा। उसने तौ सोचा थां कि प्रतिमा उसी वक्त वापसचली गई होगी लेकिन यहाॅ तौ वो अभि भि हैं। प्रतिमा कों देखकर विजय हैरान हुआफिन जल्द बाहर् जाने केँ लिए पलटा।
"रुक जाओ विजय। " प्रतिमा नें सहसा ठंडे स्वर मे कहा___"क्याँ समझते होँ तुम् अपने आपको? क्याँ सोचकर तुमने यहाॅ मजदूरों कों बुलाया हुआ थां बताओ?"
"क कुछ भि तोँ नहि भाभी। " विजय सिंह हड़बड़ा गय़ा थां___"मैंने उन्हें नये फलों कि फसल केँ बुलाया थां। ताकि खेतों कों उनकेलिए रेडी कियाजा सके। "
"झूठ मतकहो विजय। " प्रतिमा नें आवेशमेः कहा___"मुझे अच्छी तरहपता हैं कि तुमने मजदूरों कों यहाॅ दोपहर मे क्यूं बुलाया थां? तुम् समझते थें कि तुम्हें हरदिन कि तरह यहाॅ अकेले देखकर मे फिन सें अपने प्यार कि बातें तुमसे करूॅगी। इसी सबसे बचने केँ लिए तुमने यहसभी किया हैं नां?"
"आप् बेवजह बातें बनारही हें भाभी। " विजय सिंह नें कहा___"जबकि सच्चाई यही हैं कि मैने फलों कि फसल केँ लिए हि मजदूरों कों यहाॅ बुलाया हैं। "
"झूठ, सरासर झूठ हैं यह। " प्रतिमा एक् झटके सें चारपाई सें उठकर विजय केँ पास आँ गई, फिन बोलीं___"जोँ इंसान हमेशा सच बोलता हैं वोँ अगरकभी किसीवजह सें झूठ बोले तोँ उसका वो झूठ जल्दी हि पकड़ मे आँ जाता हैं विजय। मे कोई अनपढ़ गवार नहि हूॅ बल्कि कानून कि पढ़ाई कि हैं मैने। मनोविज्ञान कां बारीकी सें अध्ययन किया हैं मैने। मे समय मे बता सकतीहूॅ कि कौन ब्यक्ति कबझूठ बोलरहा हैं?"
"चलिये मान लिया कि यहीसच हैं। " विजय सिंह नें कहा___"यानी मैने आपसे बचने केँ लिए हि मजदूरों कों यहाॅ बुलाया थां। तब भि क्याँ ग़लत किया मैने? मैने तौ वही किया जौ ऐसी परिस्थिति मे किसी समझदार व्यक्ति कों करना चाहिए। मे वोँ नहि सुनना चाहता औऱ नां हि होने देना चाहता जौ आप् कहना याँ करना चाहती हें। मैनेकल भि आपसेकहा थां कि यह ग़लत हैं औऱ हमेशा यही कहता भि रहूॅगा। मे ख़ैर अनपढ़ हि हूॅमगर आप् तौ पढ़ी लिखी हें न्? आपको तौ रिश्तों केँ बीच केँ संबंधों कां अच्छी तरहपता होगा कि किन रिश्तों केँ बीचकिन रिश्तों कों देश समाजसही ग़लत अथवा जायज़ नाजायज़ ठहराता हैं? अगरपता हैं तौ फिनयह सभी सोचने व करने कां क्याँ मतलब हौ सकता हैं? आपको तोँ पता हैं कि आपकेदिल मे मेरे प्रति क्याँ हैं तोँ क्यूं नहि उसे निकाल देती आप्? क्यूं रिश्तों केँ बीचइस पाप कों थोपना चाहती हें आप्?"
"किसयुग मे तुम् जीरहे होँ विजयकिस युग मे?" प्रतिमा नें कहा___"आज केँ युग केँ अनुसार जीना सीखो। परिवर्तन प्रकृति कां नियम हैं। तुम् भि प्रकृति केँ नियमों केँ अनुसार स्वयं कों बदलो। जौ टाइम केँ संग नहि बदलता उसे टाइम बहोत पीचे छोंड़ देता हैं। "
"अगर परिवर्तन इसी चीज़ केँ लिए होता हैं तोँ क्षमा करना भाभी। " विजय नें कहा__"मुझे आज केँ इसयुग केँ अनुसार स्वयं कों बदलना गवारा नहि हैं। वक़्त मुझे पीछे छोंड़ कर कहाॅचला जाएगा मुझे इसकीकोई चिन्ता नहि हैं। मेरी आत्मा तथा मेरा ज़मीर जिस चीज़ कों स्वीकार नहि कररहा उस चीज़ कों मे किसी भि कीमत पऱ अपना नहि सकता। अब आप् जा सकती हें, क्योंकि इससे ज़्यादा मे इस बारे मे कोईबात नहि करना चाहता। "
इतनाकह कर विजय बाहर् कि तरफ जाने हि लगा थां कि प्रतिमा झट सें उसके पीछे सें चिपक गई औऱ फिन दुखी होने कां नाटक करतेहुए बोलीं___"ऐसे मुझे छोंड़ करमतजाओ विजय। मे स्वयं कों समझाऊॅगी इसकेलिए। शायद मेरेदिल सें तुम्हारा प्यार मिटजाए। मगरतब तक तोँ हम् कम सें कम पहले जैसेहॅस बोल सकते हैं नाँ?"
"अबयह संभव नहि हैं भाभी। " विजय नें जल्दी हि स्वयं कों उससेअलग करके कहा__"अब हालात बदल चुके हें। आप् मुझे किसीबात केँ लिए मुजबूर मत कीजिए। मे नहि चाहता कि यहबात हमारे बीच सें निकलकर घऱ वालों तक पहुॅच जाए। "
विजय सिंह केँ आखिरी वाक्यों मे धमकीसाफ तौर पर्र महसूस कि जा सकती थि। प्रतिमा जैसी शातिर महिला कों समझते देर नं लगी कि अब इससेआगे कुछ भि करना उसकेहित मे नहि होगा। इस लिए वो बिनाकुछ बोले कमरे सें टिफिन उठाकर हवेली केँ लिए निकल गई।
गर्मी मे बच्चों केँ विद्यालय कि छुट्टियाॅ ख़त्म होने मे कुछ हि दिनशेष रहगए थें। विजय सिंहसाम कों हवेली आँ जाता थां। एक् दिनऐसे हि प्रतिमा विजय केँ कमरे मे पहुॅच गई। उस टाइम गौरी किचेन मे करुणा केँ संग खानां बनारही थि। जबकि नैनासब बच्चों कों अजय सिंह वाले हिस्से मे ऊपर अपने कमरें मे पढ़ारही थि। माॅजी हमेशा कि तरह अपने कमरे मे थि औऱ बाबूजी गाॅवतरफ कहींगए हुए थें। अभय सिंह भि हवेली मे नहि थां।
अपने कमरे मे विजय सिंह लुंगी बनियान पहनेहुए ऑखबंद किये लेटा थां। तभी उसने किसी कि आहट सें अपने ऑखें खोली। नज़र प्रतिमा पर्र पड़ी तौ वो बुरीतरह चौंका। एक् झटके सें वो बेड पर्र उठकरबैठ गय़ा। यह पहलीबार थां कि उसके कमरे मे प्रतिमा आई थि वोँ भि इसतरह जबकि कमरे मे वो अकेला हि थां। उसेसमझ नं आया कि प्रतिमा यहाॅकिस लिएआई हैं? उसकेदिल कि धड़कन रेल केँ इंजन कि तरह दौड़रही थि। उसेडर थां कि कहीं उसकी पत्नि गौरी नं आँ जाए। हलाॅकि इसमें इतना डरने याँ घबराने कि बात नहि लेकिन उनकेबीच हालात ऐसे थें कि हरबात सें डरलगरहा थां उसे।
"क्याँ कररहे हौ विजय?" प्रतिमा नें मुस्कुरा कर कहा___"मैने सोचा एक् बार तुम्हारा दीदार करलूॅ तौ दिल कों चैनमिल जाए थोडा। कईदिन सें देखा नहि थां तुम्हें तौ दिल बड़ा बेचैन थां। अब तौ तुम्हारे लिए गौरी हि टिफिन लेकर जाती हैं। पता नहि क्यूं तुम् मुझसे कटेकटे सें रहते होँ। अपनी एक् झलक भि देखने नहि देते मुझे। सच कहतीहूॅ विजय, तुमको तोँ ज़रा भि मेरी चिन्ता नहि हैं। "
"ऐसी बातें करतेहुए आपको लज्जा नहि आती भाभी?" विजय सिंह कों जाने क्यूं आज पहलीबार उस पऱ क्रोध आया थां, उसी गुस्से वाले लहजे मे बोला___"अपनी ऊम्र कां कुछ तोँ लिहाज कीजिए। तीनतीन बच्चों कि माॅ हें आप् औऱ इसकेबाद भि मन मे ऐसी फालतू बातें लिए फिरती हें आप्। "
"इश्क़ कि न् कोईजात होती हैं विजय औऱ नाँ हि कोई ऊम्र होती हैं। " प्रतिमा नें दार्शनिकों वाले अंदाज़ मे कहा___"इश्क़ तोँ कभी भि किसी सें भि किसी भि ऊम्र मे होँ सकता हैं। मुझे एक् बारफिन सें इस ऊम्र मे तुमसे होँ गय़ा तोँ क्याँ करूॅ मे? यह तोँ मेरेदिल कि ख़ता हैं विजय, इसमें मेराकोई कसूर नहि हैं। "
"देखिये भाभी। " विजय नें कहा___"मे आपकी बहोत इज़्ज़त करताहूॅ। औऱ मे चाहता हूॅ कि मेरेदिल मे आपकेलिए यह इज़्ज़त ऐसी हि बनीरहे। इसलिए बेहतर होगा कि आप् स्वयं भि अपनेमान सम्मान कि बात सोचें। अब आप् जाइये यहाॅ सें। "
"इतने कठोर तौ नहि थें विजय तुम्?" प्रतिमा नें दुःखी भाव सें कहा__"हमारे बीच कितना हॅसी मज़ाक होता थां पहले। कितना खुश रहते थें नं हम् दोनो वहाॅ खेतों पर्र? वोँ भि तौ एक् प्यार हि थां विजय। अगर नहि होता तोँ क्याँ हमारे बीच वैसा हॅसना बोल्ना होता?"
"वोँ सभी देवरु भाभी केँ पाक रिश्तों कां प्यार थां भाभी। " विजय नें कहा___"जबकि आज कां आपकायह प्यार उसपाक प्यार सें बहोत जुदा हैं। "
"केसे जुदा हैं विजय?" प्रतिमा नें कहा__"वैसा हि तोँ हैं आज भि। तुम्हें ऐसा क्यूं लगता हैं कि वोँ प्यार इस प्यार सें बहोत जुदा हैं?"
"मे इस बारे मे कोईबात नहि करना चाहता भाभी। " विजय नें बेचैनी सें कहा__"औऱ अब आप् जाइये यहाॅ सें। मे आपके पांव पड़ता हूॅ, कृपया जाइये यहाॅ सें। "
प्रतिमा देखती रह गई विजय सिंह कों। उस विजय सिंह कों जिसके इरादे तथा जिसके संकल्प किसी फौलाद सें भि अधिकठोस व मजबूत थें। कुछदेर एकटक विजय कों देखने केँ बाद प्रतिमा वहाॅ सें अंदर हि अंदर जलती भुनती चलीआई।
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वर्तमान______
हल्दीपुर पुलिस स्टेशन!!
रितू अपनी पुलिस जिप्सी सें नीचे उतरी औऱ थाने केँ अंदर लम्बे लम्बे कदमों केँ संगबढ़ गई। आसपास मौजूद पुलिस केँ सिपाहियों नें उसे सैल्यूट किया जिसका जबाव वो अपनी गर्दन कों हल्का सां खम करतेहुए देरही थि। कुछ हि लम्हा मे वो अपने केबिन मे पहुॅची औऱ टेबल केँ उसपार रखी कुर्सी पऱ बैठ गई। तभी उसके केबिन मे हवलदार रामदीन दाखिल हुआ।
"बोलो रामदीन क्याँ रिपोर्ट हैं लोकेशन कि?" रितू नें पूछा उससे।
"मैडम पक्की ख़बर हैं। " रामदीन नें कहा__"उस नेता कां वोँ हरामी कपूत अपने फार्महाउस पर्र अपनेकुछ लफंगे दोस्तों केँ संगऐश फरमारहा हैं। "
"ख़बर पक्की हैं नाँ?" रितू नें गहरी नज़र सें रामदीन कि तरफ देखा।
"सौ टका पक्की हैं मैडम। " रामदीन नें खींसें निपोरते हुए कहा__"अपनी बेवफा पत्नि कि शपथ। "
"बेवफ़ा पत्नि???" रितू नें हैरानी सें रामदीन कि तरफ देखा___"यह क्याँ बोलरहे होँ तुम् रामदीन?"
"अब बेवफा कों बेवफा न् बोलूॅ तोँ औऱ क्याँ बोलूॅ मैडम?" रामदीन नें सहसा दुखीभाव सें कहा___"मेरा एक् पड़ोसी हैं.नाम हैं चालूराम। जैसानाम वैसा हि हैं वोँ मैडम। चालूराम बड़ी चालाकी सें मेरी पत्नि कों फॅसा लेता हैं औऱ फिन उसकेसंग चालू हौ जाता हैं। इतना हि नहि मेरी पत्नि भि उसकेसंग चालू हौ जाती हैं। इन दोनो केँ चालूपन नें मेरा जीना हरामकर रखा हैं मैडम। "
"ओफ्फो रामदीन। " रितू कां दिमाग़ मानो चकरा सां गय़ा___"यह क्याँ बकवास कररहे होँ तुम्? कौन चालूराम औऱ कैसा चालूपन?"
"जाने दीजिए मैडम। " रामदीन नें गहरी साॅस ली___"मेरी तौ बड़ी दुखभरी दास्तां हैं। "
"अच्छा छोड़ो यहसभी। " रितू नें कहा___"दो चार हवलदार कों लोहाथ मे औऱ मेरेसंग चलो जल्द। "
"जी मैडम। " रामदीन नें नाटकीय अंदाज़ मे सैल्यूट बजाया औऱ केबिन सें बाहर् निकल गय़ा। उसके पीछे रितू भि बाहर् आँ गई।
बाहर् चलतेहुए रितू नें पाॅकेट सें फोन मोबाइल निकाला औऱ उसमें कोई नंबर डायलकर उसेकान सें लगा लिया।
"जय हिन्द सर। " रितू नें कहा___"मुझे इमेडिएटली एक् सर्च वारंट चाहिए। "
"."
"आप् फिक्र मत कीजिए सर। " रितूकह रही थि____"मेसभी सम्हाल लूॅगी। आप् बसदो मिनट केँ अंदर मुझे वारंट कां काग़ज फैक्स कर दीजिए। "
"."
"डोन्ट वरीसर। " रितू नें कहा___"आई विल हैण्डल इट। "
"."
"जय हिन्द सर। " रितू नें कहा औऱ काल डिस्कनेक्ट करकेफोन पुनः पाॅकेट मे डाल लिया।
ठीकदो मिनटबाद हि फैक्स मशीन सें एक् कागज़ निकला। रितू केँ इशारे पर्र वहीं खड़े रामदीन नें उस कागज़ कों फैक्स मशीन सें लेकर रितू कों पकड़ा दिया। रितू नें ध्यान सें कागज़ मे लिखे मजमून कों देखा औऱ फिनउसे फोल्ड करके पाॅकेट मे डाल लिया।
"रामदीन सबको लेकर मेरेसंग चलो। " रितू नें कहा थाने केँ बाहर् खड़ी जिप्सी केँ पास आँ गई। ड्राईविंग सीट पर्र स्वयं बैठी वो। चार हवलदारों केँ बैठते हि उसने जिप्सी कों स्टार्ट करमेन रोड कि तरफ दौड़ा दिया।
करीब-करीब आधे घंटेबाद वो हल्दीपुर कि आबादी सें बाहर् दूरबने एक् फार्महाउस केँ पास पहुॅची। यहाॅ पऱ रोड केँ दोनो साइडकई सारे फार्महाउस बनेहुए थें। लेकिन रितू कि जिप्सी जिस फार्महाउस केँ गेट केँ पास रुकीउस पऱ चौधरी फार्महाउस लिखाहुआ थां तथानाम केँ नीचे फार्महाउस कां नंबर पड़ा थां।
फार्महाउस केँ गेट पर्र दो बंदूखधारी गार्ड तैनात थें। पुलिस जिप्सी कों देखते हि वोँ दोनो चौंके संग हि दोनो केँ चेहरे सफेद फक्क भि पड़गए। रितू जिप्सी सें उतरकर जल्दी उन दोनो केँ लगभग पहुॅची। तब तक चारो हवलदार भि आँ चौके थें।
एकाएक हि जैसे बिजली सि चमकी। पलक झपकते हि दोनो बंदूखधारियों केँ कंठ सें घुटी घुटी सि चीख निकली औऱ वोँ लहराकर वहीं ज़मीन पऱ गिर पड़े। वोँ दोनो बेहोश होँ चुके थें। यहसभी इतनी तेज़ी सें हुआ थां कि कोईकुछ समझ भि न् पाया थां कि यहसभी कब औऱ केसे हौ गय़ा। हुआयूॅ थां कि रितू उनकेपास पहुॅची औऱ बिनाकोई बात किये बिजली कि सि तेज़ी सें उसने अपने दोनो हाॅथों कों कराटे कि शक्ल देकर दोनो बंदूखधारियों कि कनपटी पऱ बिजली कि स्पीड सें प्रहार किया थां। वोँ दोनोकुछ समझ हि नहि पाए थें औऱ नां हि उन्हें इस सबकीकोई उम्मीद थि।
"इन दोनो कि बंदूखों कों अपने कब्जे मे लेँ लो। " रितू नें आदेश दिया___"औऱ उसकेबाद इन दोनो कों उठाकर जिप्सी मे डालदो। "
रितू केँ आदेश कां जल्दी हि पालनहुआ। चारो हवलदार अभि तक हैरान थें कि उनकी मैडम नें पलक झपकते हि दोदो बंदूखधारियों कों अचेतकर दिया। बेचारे क्याँ जानते थें कि बला कि हसीनयह लड़की कितनी खतरनाक भि हैं।
सभीकुछ होने केँ बाद चारो हवलदार तेज़ी सें गेट केँ अंदर कि तरफ दौड़े क्योंकि रितूतब तक गेट केँ अंदरजा चुकी थि। फार्महाउस बहुत बड़ा थां औऱ बहुत सुंदर भि। हरतरफ रंग बिरंगे फूलों कि क्यारियाॅ लगी हुई थि तथा एक् सें बढ़ एक् देशी विदेशी पेड़ पौधेलगे हुए थें। लम्बे चौड़े लान मे विदेशी घासलगी हुईँ थि। कुल मिलाकर यहकह सकते हें कि चौधरी नें अपनी काली कमाई कां अच्छा खासा उपयोग कियाहुआ थां।
गेट सें लेकर फार्महाउस कि इमारत केँ मुख्य दरवाज़ा तक करीबआठ फुट चौड़ी सफेद मारबल कि मार्ग बनी हुईँ थि तथा इमारत केँ पास सें हि करीब-करीब बीसफुट कि हि चौड़ाई पर्र भि इमारत केँ चारोतरफ मारबल लगाहुआ थां। बाॅकी हर स्थान लान मे हरीघास, पेड़ पौधेव फूलों कि क्यारियाॅ थि।
मुख्य दरवाज़ा केँ बगल सें जोँ कि पोर्च कां हि एक् हिस्सा थां वहाॅ पर्र दो कारें खड़ी थि इस वक़्त। एक् ब्लैक कलर कि इनोवा थि तथा दूसरी स्विफ्ट डिजायर थि। मुख्य दरवाज़ा बंद थां। रितू कों कहीं पऱ बेललगी हुईँ नं दिखी। इस लिए उसने दरवाजे पऱ हाथ सें हि दस्तक दि। लेकिन अंदर सें कोई दरवाजा खोलने नहि आया। रितू नें कईबार दस्तक दि। परंतु परिणाम वही। ऐसा तोँ होँ हि नहि सकता थां कि अंदरकोई हैं हि नहि क्योंकि बाहर् खड़ीदो कारें इसबात कां सबूत थि कि इनसेकोई आया हैं जोँ इस टाइम इमारत केँ अंदर हैं।
जब रितू कि दस्तक कां कोई पराणाम सामने नहि आया तौ उसने इमारत सें थोडा दूरआकर इमारत कि तरफ ध्यान सें देखा। इमारत दो मंजिला थि। मुख्य दरवाज़ा केँ कुछ हि फासले पर्र दोनो साइडकाच कि बड़ी सि लेकिन ब्लैक कलर कि खिड़कियाॅ थि। जिनके ऊपर साइड बरसात केँ मौसम मे पानी कि बौछार सें बचने केँ लिएरैक बनाया गय़ा थां। मुख्य दरवाज़ा पर्र एक् लम्बा चौड़ा पोर्च थां जोँ दोनोतरफ कि उनकान कि खिड़कियों तक थां। पोर्च केँ ऊपर कां भाग खाली थां उसकेबाद स्टील कि रेलिंग लगी हुईँ थि।
अभि रितूयह सभीदेख हि रही थि कि मुख्य दरवाज़ा खुलने कि आहट हुईँ। रितू नें बड़ी तेज़ी सें चारो हवलदारों कों इमारत केँ बगल साईड कि दीवार केँ पीछेछुप जाने कां इशारा किया जबकि स्वयं मुख्य दरवाज़ा केँ पास पहुॅच गई।
तभी दरवाजा खुला औऱ सबसे पहले रोहित मेहरा बाहर् निकला। उसके चेहरे पऱ अजीब सें भाव थें, वो पीछे कि तरफ हि देखकर हॅसते हुए बाहर् आँ रहा थां। उसके पीछे अलोक वर्मा व किशन श्रीवास्तव थां औऱ अंत मे सूरज चौधरी थां। इसका बाप दिवाकर चौधरी शहर कां एमएलए थां।
"भइया तुम् सभी यहीं रुको मे अपनी वालीउस राॅड कों भि लेकरआता हूॅ। " रोहित मेहरा नें कहा___"साली कां मोबाइल स्विच ऑफबता रहा हैं। अब तोँ उसे लेने हि जानां पड़ेगा। आज तोँ इसकी अच्छे सें बजाएॅगे हम् सभी। "
"ठीक हैं जल्द आनां। " अलोक नें कहा___"तब तक हम् इनकेहोश मे लाने कां प्रयास करते हें। औऱ हाॅसुन.। " आगे बोलते बोलते वो रुक गय़ा क्योंकि दरवाजे केँ पार खड़ी पुलिस कि वर्दी पहने रितू पर्र उसकी नज़रपड़ गई।
"क्याँ हुआबे बोलते बोलते रुक क्यूं गय़ा तुँ?" रोहित मेहरा हॅसा___"कोई भूतदेख लिया क्याँ?"
"ऐसा हि समझ लेँ। " अलोक नें ऑखों सें बाहर् कि तरफ इशारा किया।
उसके इशारे सें सबने देखा बाहर् कि तरफ औऱ पुलिस इंस्पेक्टर रितू पऱ नज़र पड़ते हि उन सबकी नानीमा मर गई। शराब औऱ शबाब कां सारानशा हिरन हौ गय़ा उनका। लेकिन यहकुछ देर केँ लिए हि थां अगलेसमय वोँ सभी मुस्कुराने लगे।
"लें भइया तूँ अपनी वाली कों लेनेजा रहा थां यहाॅ तौ एक् ज़बरदस्त माल स्वयं हि पुलिस कि वर्दी मे चलकर आँ गय़ा। " किशन नें हॅसते हुए कहा___"अब तुम्हे कहीं जाने कि ज़रूरत नहि हैं। हम् सभी इसकेसंग हि अबमजा करेंगे। "
"सहीकह रहा हैं दोस्त। " रोहित मेहरा नें रितू कों ऊपर सें नीचे तक देखते हुए कहा__"क्याँ फाड़ू फिगर हैं इसका। शपथ सें मजा आँ जाएगा आज तौ। "
"तौ फिनदेर किसबात कि भइया?" अलोक नें कहा___"उठा लेँ चलइसे अंदर। "
"ओये एक् मिनट। " किशन नें कहा___"मत भूलो कि यह पुलिस वाली हैं। इससमय अकेली दिखरही हैं मगर संभव हैं इसकेसंग कोई औऱ भि पुलिस वालेहों। ऐसे मे बड़ी प्रोब्लेम होँ जाएगी। "
"अबे साले तूँ कब अपने वकील बाप कि तरह सोचना बंद करेगा?" अलोक घुड़का___"यह हमारा बाल भि बाॅका नहि कर सकती। अब चलउठा इसे औऱ लेँ चल अंदर। "
रितू चुपचाप खड़ीइन सबकी बातें सुनरही थि। यहअलग बात थि कि अंदर हि अंदर वो गुस्से भभकरही थि। इधर सबसेआगे रोहित मेहरा हि थां सोवही बढ़ा पहले। उसकेबाद सब दरवाजे केँ बाहर् आँ गए।
वोँ चारो रितू केँ चारोतरफ फैलगए औऱ उसके चारोतरफ गोलगोल चक्कर लगाने लगे।
"भइयाहर तरफ सें पटाखा हैं यह तौ। " अलोक नें कहा___"सूरज भइया पहलेकौन इसकी लें.आहहहहहह। "
अलोक केँ हलक सें दर्दभरी चीख गूॅज गई थि। रितु नें बिजली कि सि फुर्ती सें पलटकर बैककिक अलोक केँ सीने पर्र जड़ा थां। किक पड़ते हि वो चीखते हुएतथा हवा मे झूलते हुए पोर्च सें बाहर् जाकर गिरा थां। रितूके सब्र कां बाॅध जैसेटूट गय़ा थां। वो इतने पर्र हि नहि रुकी बल्कि पलक झपकते हि बाॅकी तीनों भि पोर्च केँ अलगअलग हिस्सों पऱ पड़े कराहरहे थें।
"तुम् जैसे हिजड़ों कि औलादों कों सुधारने केँ लिए मे आँ गई हूॅ। " रितू नें भभकते हुए कहा___"तुम् चारों कि ऐसी हालत करूॅगी कि दोबारा जन्म लेने सें इंकार कर दोगे। "
"भइयायह क्याँ थां?" किशन नें उठतेहुए कहा__"यह तोँ लगता हैं करेंट मारती हैं। हमेंइसे अलग तरीके सें काबू मे करना होगा। "
"सही कहरहा हैं तूँ। " अलोक नें कहा__"अब तोँ शिकार करने मे मजा आएगा भइयालोग। "
"आँ जाओ तुम् चारो एक् संग। " रितू नें कहा___"मैंने तुम् चारों कां हुलिया नं बिगाड़ दिया तोँ मेरा भि नाम रितूसिह बघेल नहि। "
"चलोदेख लेते हें डियर। " सूरज नें पोजीशन मे आतेहुए कहा___"कि तुममें कोईबात हैं याँ हममें। "
चारों नें रितू कों फिन सें घेर लिया। लेकिन इसबार वोँ पूरीतरह सतर्क थें। उनकी पोजीशन सें हि लगरहा थां कि वोँ चारो जूड़ो कराटे जानते थें। रितू स्वयं भि पूरीतरह सतर्क थि।
चारोउसे घेरेहुए थें तथा उनके चेहरों पऱ कमीनेपन कि मुस्कान थि। चारो नें ऑखों हि ऑखों मे कोई इशारा किया औऱ अगले हि लम्हा चारो एक् संग रितू कि तरफ झपटे लेकिन यह क्याँ??? वोँ जैसे हि एक् संग चारोतरफ सें रितू पर्र झपटे वैसे हि रितू नें ऊपर कि तरफ जम्प मारी औऱ हवा मे हि कलाबाज़ी खातेहुए उन चारों केँ घरे सें बाहर् आँ गई। उसके बाहर् आते हि चारोआपस मे हि बुरीतरह टकरागए। उधर रितू नें मानों उन्हें सम्हलने कां मौका हि नहि दिया बल्कि बिजली कि सि स्पीड सें उसनेलात घूसों औऱ कराटों कि बरसात कर दि उन पर्र। वातावरण मे चारों कि चीखें गूॅजने लगी। कुछ दूरी पऱ खड़े वोँ चारो पुलिस हवलदार भि यह हैरतअंगेज कारनामा देखरहे थें।
ऐसा नहि थां कि चारो लड़के कुछकर नहि रहे थें लेकिन उनकाहर वार खालीजा रहा थां जबकि रितू तौ मानो रणचंडी बनी हुईँ थि। जूड़ो कराटे व मार्शल आर्ट केँ हैरतअंगेज दाॅव आजमाए थें उसने। परिणाम यहहुआ कि थोड़ी हि देर मे उन चारो कि हालत ख़राब हौ गई। ज़मीन मे पड़े वोँ बुरीतरह कराहरहे थें।
"क्यूं सारी हेकड़ी निकल गई क्याँ?" रितू नें अलोक केँ पेट मे पुलिसिये बूट कि तेज़ ठोकर मारते हुए कहा___"उठ सुअर कि औलाद। दिखा नं अपनी मर्दानगी। साला एक् समय मे हि पेशाब निकल गय़ा तेरा। "
रितूसच कहरही थि, अलोक कि पैन्ट गीली होँ गई थि। बूट कि ठोकर लगते हि वो हलाल होते बकरे कि तरह चिल्लाया थां। संग हि अपने दोनो हाॅथ जोड़कर बोला___"मुझे क्षमा करदो प्लीज़। आज केँ बाद मे ऐसा वैसाकुछ नहि कहूॅगा। "
"कहेगा तोँ तबजब कहने लायक तुँ बचेगा भड़वे कि औलाद। " रितू नें एक् औऱ ठोकर उसकेपेट मे जमा दि। वो फिन सें चिल्ला उठा थां। तभी रितू केँ हलक सें चीख निकल गई। दरअसल उसका सारा ध्यान अलोक कि तरफ थां इसलिए वो देख हि नहि पाई कि पीछे सें किशन नें उसकीपीठ पऱ चाकू कां वारकर दिया थां। पुलिस कि वर्दी कों चीरता हुआ चाकू उसकीपीठ कों भि चीर दिया थां। पलक झपकते हि उसकी वर्दी उसकेखून सें नहाने लगाने थि।
"साली हमसे पंगा लें रही हैं तूँ। " किशन नें गुर्राते हुए कहा___"अब देख तेरी क्याँ हालत बनाते हें हम्?"
बड़ी हैरानी कि बात थि कि कुछ हि दूरी पर्र खड़े चारो हवलदार तमाशा देखरहे थें। उनकी हालतऐसी थि जैसे जूड़ी केँ मरीज़ हों। हाॅथों मे पुलिस कि लाठीलिए वोँ चारोडरे सहमें सें खड़े थें। औऱ उससमय तौ उनकी हालत औऱ भि खराब होँ गई जब किशन नें पीछे सें रितू कि पीठ पऱ चाकू सें वार किया थां। चाकू कां वार चीरा सां लगाते हुए निकल गय़ा थां, अगर किशनउसे पीठ पऱ हि पेवस्त कर देता तोँ मामला बेहद हि गंभीर होँ जाता।
"रुक क्यूं गय़ा किशन?" सूरज नें उठतेहुए कहा___"चीर कररखदे इस साली कि वर्दी कों। यहीं पर्र इसे नंगा करेंगे हम् औऱ यहीं पर्र इसकी इज्जत लूटेंगे। "
"सूरजसही कहरहा हैं किशन। " रोहित भि उठ चुका थां___"इसे सम्हलने कां मौकामत दे औऱ चाकू सें चीरदे इसकी वर्दी कों। "
किशन नें फिन सें अपना दाहिना हाथहवा मे उठाया रितू पर्र वार करने केँ लिए। उधर रितू कि पीठ मे तेज़ी सें पीड़ा उठरही थि। खून बुरीतरह रिसरहा थां। जैसे हि किशन नें उस पऱ वार किया उसने एक् हाथ सें उसकेवार कों रोंका औऱ दूसरे हाॅथ सें एक् ज़बरदस्त मुक्का उसकी नाॅक मे जड़ दिया। किशन केँ नाॅक कि हड्डी टूटने कि आवाज़ आईसंग हि उसकी भयंकर चीख वातावरण मे फैल गई। उसकीनाक सें भल्ल भल्ल करकेखून बहनेलगा थां। चाकू उसके हाॅथ सें छूट गय़ा औऱ वो ज़मीन पऱ धड़ाम सें गिरा। उधर किशन कि यह हालतदेख कर बाॅकी तीनो हरकत मे आँ गए। रितू नें तेज़ी सें झुककर ज़मीन सें चाकू उठाया औऱ जैसे हि वोँ तीनो उसकेपास आए उसने चाकू वाला हाॅथ तेज़ी सें चला दियाउन पर्र। सबकी चीखें निकल गई।
हालात बदल चुके थें। रितू जानती थि कि उसकी हालत स्वयं भि अच्छी नहि हैं औऱ अगर वो कमज़ोर पड़ गई तौ यह चारो किसी कुत्ते कि तरहनोच करखा जाएॅगे। इसलिए उसने अपने दर्द कि परवाह न् करतेहुए एक् बार सें उन पर्र टूट पड़ी औऱ तब तक उन्हें लात घूॅसों पऱ रखाजब तक कि वोँ चारो अधमरे नं होँ गए।
रितू बुरीतरह हाॅफरही थि। उसकी वर्दी पीक कि तरफ सें खून मे नहा चुकी थि। उसे कमज़ोरी कां एहसास होनेलगा थां। उसने दूर खड़े अपने हवलदारों कि तरफ देखा जौ किसी पुतलों कि तरह खड़े थें। रितू कों उन्हें देखकर बेहद गुस्स आया। वो तेज़ी सें उनकेपास पहुॅची औऱ फिनदे दनादन थप्पड़ों कि बरसात कर दि नं पऱ। उन चारों केँ हलक सें चीखें निकल गई।
"मे तुमको यहाॅ पऱ क्याँ तमाशा देखने केँ लिए लेकरआई थि नामर्दो?" रितू किसी शेरनी कि भाॅती गरजी थि, बोलि___"तुम् चारो यहाॅ पर्र खड़ेबस तमाशा देखरहे थें। तुम् दोनो कों पुलिस मे रहने कां कोईहक़ नहि हैं। आज औऱ अभि सें तुम् चारो कों ढिसमिस किया जाता हैं। अबदफा होँ जाओ यहाॅ सें औऱ कभी अपनीशकल मत दिखाना। "
रितू कि गुस्से भरीयह फातें सुनकर चारो कि हालत खराब होँ गई। वोँ चारो रितू केँ पैरों पर्र गिरकर माफ़ी मागने लगे। लेकिन रितू कों उन पर्र इतना अधिक क्रोध आयाहुआ थां कि उसने अपने पैरों पऱ गिरेउन चारों कों लात कि ठोकरों पऱ रख दिया।
"हट जाओ मेरे सामने सें। " रितू नें गुर्राते हुए कहा___"तुम् जैसे निकम्मों औऱ नामर्दों कि मेरे पुलिस थाने मे कोई स्थान नहि हैं। अबदफा होँ जाओ वरना तुम् चारो कों गोलीमार दूॅगी। "
रितू कां रौद्र रूपदेख कर वोँ चारो बुरीतरह ठरगए औऱ फिन वहाॅ सें नौदो ग्यारह हौ गए। उनके जाते हि रितू नें उन चारो लड़कों कों एक् एक् करके किसीतरह अपनी पुलिस जिप्सी पऱ पटका औऱ फिन वो वापसउस स्थान आई जहाॅ पर्र अभि कुछदेर पहलेयह संग्राम हुआ थां। उसने देखा कि पोर्च केँ फर्स पऱ कई स्थान खून फैलाहुआ थां। उसनेइधर उधर दृष्टि घुमाकर देखा लेकिन उसेऐसा कुछ भि नं दिखा जोँ उसकेकाम कां होँ। वो मुख्य दरवाज़ा सें अंदर कि तरफचली गई। अंदर सामने हि एक् रूम दिखाउसे। वो उस कमरे कि तरफबढ़ गई। कमरे कां दरवाजा हल्का खुलाहुआ थां। रितू नें अपने पैरों सें दरवाजे कों अंदर कि तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गय़ा।
अंदर दाखिल होकर उसने देखा कि रूम बहुत बड़ा थां तथा बहुत शानदार तरीके सें सजाहुआ थां। एक् कोने मे बड़ा सां बेड थां जिसमें तीन लड़कियाॅ मादरजाद नंगी पड़ी हुई थि। ऐसा लगता थां जैसे गहरीनीद मे हों। रितू नें नफ़रत सें उन्हें देखा औऱ फिन कमरे मे उसने अपनी नज़रें दौड़ाईं। बगल कि दीवार पऱ एक् तस्वीर टॅगी हुइ थि। तस्वीर कोईखास नहि थि बस साधारण हि थि। रितू केँ मन मे प्रश्न उभरा कि इतने अलीशान फार्महाउस पर्र इतनी मामूली तस्वीर केसेरखी जा सकती हैं?
रितू नें आगेबढ़ कर तस्वीर कों ध्यान सें देखा। तस्वीर सच मे कोईखास नहि थि। रितू कों जाने क्याँ सूझा कि उसने हाॅथ बढ़ाकर दीवार सें तस्वीर कों निकाल लिया। तस्वीर केँ निकलते हि दीवार पर्र एक् स्विच नज़रआया। रितूयह देखकर चकरा गई। भला दीवार पऱ लगे स्विच केँ ऊपर तस्वीर कों इसतरह क्यूं लगाया गय़ा होगा? क्याँ स्विच कों तस्वीर द्वारा छुपाने केँ लिए??? रितू कों अपनायह विचार कहीं सें भि ग़लत नहि लगा। उसने तस्वीर कों एक् हाॅथ सें पकड़कर दूसरे हाॅथ कों दीवार पऱ लगे स्विच बटन कों ऊपर कि तरफपुश किया। बटन कों ऊपर कि तरफपुश करते हि कमरे मे अजीब सि घरघराहट कि आवाज़ हुईँ। रितूयह देखकर बुरीतरह चौंकी कि उसके सामने हि दीवार पऱ एक् दरवाजा नज़रआने लगा थां।
उसे समझते देर न् लगी कि यह दिवाकर चौधरी कां गुप्त रूम हैं। वो धड़कते दिल केँ संग कमरे मे दाखिल हौ गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहोत सारा कबाड़ भराहुआ थां यहाॅ। यह सभीदेख कर रितू हैरान रह गई। उसेसमझ मे नं आया कि कोई कबाड़ कों ऐसे गुप्त रूप सें क्यूं रखेगा?? रितू नें हर चीज़ कों बारीकी सें देखा। उसकेपास वक़्त नहि थां। क्योंकि उसकी स्वयं कि हालत ख़राब थि। बहुतदेर तक खोजबीन करने केँ बाद भि उसेकोई खास चीज़ नज़र न् आई। इसलिए वो बाहर् आँ गई मखरतभी जैसेउसे कुछयाद आया। वो फिन सें अंदर गई। इसबार उसने तेज़ी सें इधरउधर देखा। जल्द हि उसे एक् तरफ कि दीवार सें सटाहुआ एक् टेबल दिखा। टेबल केँ आसपास तथाऊपर भि बहुत सारा कबाड़ सां पड़ाहुआ थां। लेकिन रितू कि नज़र कबाड़ केँ बीचरखे एक् छोटे सें रिमोट पर्र पड़ी। उसने जल्दी हि उसेउठा लिया। वोँ रिमोट टेलीविज़न केँ रिमोट जैसा हि थां।
रितू नें हराबटन दबाया तोँ उसके दाएॅतरफ हल्की सि आवाज़ हुईँ। रितू नें उसतरफ देखा तौ उछल पड़ी। यह एक् दीवार पऱ बनी गुप्त आलमारी थि जोँ आम सूरत मे नज़र नहि आँ रही थि। रितू नें आगेबढ़ कर आलमारी कि तलाशी लेनी शुरुआत कर दि। उसमें उसे बहुत मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे मे हि पड़े एक् गंदे सें बैग मे भर लिया। उसकेबाद उसने रिमोट सें हि उस आलमारी कों बंदकर दिया।
रितूउस बैग कों लेकर वापस बाहर् आँ गई औऱ ड्राइविंग सीट पऱ बैठकर जिप्सी कों फार्महाउस सें मेन मार्ग कि तरफ दौड़ा दिया। इस वक़्त उसके चेहरे पर्र पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थि। दिलो दिमाग़ मे भयंकर चक्रवात सां चलरहा थां। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चलीजा रही थि।
भाग हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,,,,,,,
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