♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Eagerly
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धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,
Super duper update bhai बहोत hi Shandar or lajawab bole to ekdum jhakaas dhamakedar mind blowing & fantastic, Aage ka intezar rahega Keep going We will wait for next update
Behad hi shandaar aur jabardast update bhay. bhut khoob superb. Bade acche say dikhaya hain aapne sari baton ko. Kya flashback aur kya vartman. Mzaaaa aa gya bhay waah. Lajwaab aur Kamal kaa update bhay. aur ab , Aage kaa intjar
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 33 》
अब तक,,,,,,,
उसे समझते देर नं लगी कि यह दिवाकर चौधरी कां गुप्त रूम हैं। वो धड़कते दिल केँ संग कमरे मे दाखिल हौ गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहोत सारा कबाड़ भराहुआ थां यहाॅ। यह सभीदेख कर रितू हैरान रह गई। उसेसमझ मे न् आया कि कोई कबाड़ कों ऐसे गुप्त रूप सें क्यूं रखेगा?? रितू नें हर चीज़ कों बारीकी सें देखा। उसकेपास टाइम नहि थां। क्योंकि उसकी स्वयं कि हालत ख़राब थि। बहुतदेर तक खोजबीन करने केँ बाद भि उसेकोई खास चीज़ नज़र नं आई। इसलिए वो बाहर् आँ गई मखरतभी जैसेउसे कुछयाद आया। वो फिन सें अंदर गई। इसबार उसने तेज़ी सें इधरउधर देखा। जल्द हि उसे एक् तरफ कि दीवार सें सटाहुआ एक् टेबल दिखा। टेबल केँ आसपास तथाऊपर भि बहुत सारा कबाड़ सां पड़ाहुआ थां। लेकिन रितू कि नज़र कबाड़ केँ बीचरखे एक् छोटे सें रिमोट पर्र पड़ी। उसने जल्दी हि उसेउठा लिया। वोँ रिमोट टेलीविज़न केँ रिमोट जैसा हि थां।
रितू नें हराबटन दबाया तौ उसके दाएॅतरफ हल्की सि आवाज़ हुई। रितू नें उसतरफ देखा तौ उछल पड़ी। यह एक् दीवार पऱ बनी गुप्त आलमारी थि जौ आम सूरत मे नज़र नहि आँ रही थि। रितू नें आगेबढ़ कर आलमारी कि तलाशी लेनी शुरुआत कर दि। उसमें उसे बहुत मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे मे हि पड़े एक् गंदे सें बैग मे भर लिया। उसकेबाद उसने रिमोट सें हि उस आलमारी कों बंदकर दिया।
रितूउस बैग कों लेकर वापस बाहर् आँ गई औऱ ड्राइविंग सीट पर्र बैठकर जिप्सी कों फार्महाउस सें मेन मार्ग कि तरफ दौड़ा दिया। इस टाइम उसके चेहरे पर्र पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थि। दिलो दिमाग़ मे भयंकर चक्रवात सां चलरहा थां। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चलीजा रही थि।
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अबआगे,,,,,,,,,,
वर्तमान अबआगे_______
रितू कि पुलिस जिप्सी जिस स्थान रुकी वो एक् बहोत हि कम आबादी वाला एरिया थां। मार्ग केँ दोनोतरफ यदाकदा हि घर-मकान दिखरहे थें। इस टाइम रितूजिस स्थान पर्र आकर रुकी थि वो कोई फार्महाउस थां। जिप्सी कि आवाज़ सें थोड़ी हि देर मे फार्महाउस कां बड़ी सि बाउंड्री पर्र लगा लोहे कां भारीगेट खुला। गेट केँ खुलते हि रितू नें जिप्सी कों आगे बढ़ा दिया, उसके पीछेगेट पुनःबंद हौ गय़ा। जिप्सी कों बड़े सें घर-मकान केँ पास लाकर रितू नें रोंक दिया औऱ फिन उससे नीचेउतर गई।
रितू कि हालत बहोत ख़राब होँ चुकी थि। शरीर मे जान नहि रह गई थि। गेट कों बंद करने केँ बाददो लोग भागते हुए उसकेपास आए।
"अरे क्याँ हुआ बिटिया तुम्हें?" एक् लम्बी मूॅछों वाले ब्यक्ति नें घबराकर कहा___"यह क्याँ हालतबना ली हैं तुमने? किसने कि तुम्हारी यह हालत? मे उसे ज़िन्दा नहि छोंड़ूॅगा बिटिया। "
"काकाइन सबको अंदर तहखाने मे बंदकर दो। " रितू नें उखड़ी हुईँ साॅसों सें कहा__"औऱ ध्यान रखना किसी कों इन लोगों कां पता नं चलसके। यह तुम्हारी जिम्मेदारी हैं काका। "
"वोँ सभी तौ मे कर लूॅगा बिटिया। " काका कि ऑखों मे ऑसू तैरते दिखे___"मगर तुम्हारी हालतठीक नहि हैं। तुम्हें जल्द सें जल्द हास्पिटल लेकर जानां पड़ेगा। मे बड़े ठाकुर साहब कों मोबाइल लगाता हूॅ बिटिया। "
"नहि काका प्लीज़। " रितू नें कहा___"जितना कहा हैं पहले उतनाकरो। मे ठीक हूॅ.बस काकी कों फस्टएड बाक्स केँ संग मेरे कमरे मे भेज दीजिए जल्द। मगर उससे पहले इन्हें तहखाने मे बंद कीजिए। "
"यहसभी कौन हें बेटी?" एक् अन्य व्यक्ति नें पूछा___"इन सबकी हालत भि बहोत खराबलग रही हैं। "
"यहसभी केँ सभी एक् नंबर केँ मुजरिम हें शंभू काका। " रितू नें कहा___"इन लोगों बड़े सें बड़ा संगीन गुनाह किया हैं। "
"फिन तोँ इनकोजान सें मार देना चाहिए बिटिया। " काका नें जिप्सी मे बेहोश पड़े सूरज औऱ उसके दोस्तों कों देखकर कहा।
"इन्हें मौत हि मिलेगी काका। " रितू नें भभकते हुए कहा___"मगर थोडा थोडा करके। "
उसकेबाद रितू केँ कहने पर्र उन दोनो नें उनसब लड़को कों उठाउठा कर अंदर तहखाने मे लेँ जाकरबंद कर दिया। जबकि रितू अंदर अपने कमरे कि तरफबढ़ गई। थोड़ी हि देर मे काकी फर्स्ट एड बाक्स लेकर आँ गई। रितू केँ कहने पर्र काकी नें कमरे कां दरवाजा अंदर सें बंदकर दिया।
रितू नें वर्दी कि शर्ट किसीतरह अपने शरीर सें उतारा। काकी हैरत सें देखेजा रही थि। उसके चेहरे पऱ चिन्ता औऱ दुखसाफ दिखरहे थें।
"यहसभी केसेहुआ बिटिया?" काकी नें आगेबढ़ कर शर्ट उतारने मे रितू कि सहायता करतेहुए कहा___"देखो तौ कितना खूनबह गय़ा हैं, पूरीशरट भींग गई हैं। "
"अरे काकीयह सभी तौ चलता रहता हैं। " रितू नें शरीर सें शर्ट कों अलग करतेहुए कहा__"इस जॉब मे कईतरह केँ मुजरिमों सें पाला पड़ता रहता हैं। "
"अरे तोँ ऐसीजॉब करती हि क्यूं होँ बिटिया?" काकी नें कहा___"भला कां कमी हैं तुम्हें? सभीकुछ तोँ हैं। "
"बातकमी कि नहि हैं काकी। " रितू नें कहा___"बात हैं शौक कि। यहजॉब मे अपनेशौक केँ लिएकर रहीहूॅ। ख़ैरयह सभी छोड़िये औऱ मे जैसा कहूॅ वैसा करते जाइये। "
कहने केँ संग हि रितूबेड पऱ उल्टा होकरलेट गई। इस वक़्त वो ऊपर सें केवल एक् पिंककलर कि ब्रा मे थि। दूध जैसी गोरीपीठ पऱ हरतरफ खून हि खूनदिख रहा थां। ब्रा केँ हुक केँ ऊपरी हिस्से पर्र दाएॅ सें बाएं चाकू कां चीरालगा थां। जौ कि दाहिने कंधे केँ थोडा नीचे सें टेंढ़ा बाएॅतरफ करीबदस इंच कां थां। काकी नें जबउस चीरे कों देखा तोँ उसके जिस्म मे सिहरन सि दौड़ गई।
"हाय दइयायह तोँ बहोत खराबकटा हैं। " काकी नें मुह फाड़ते हुए कहा___"यह सभी केसे होँ गय़ा बिटिया? पूरीपीठ पर्र चीरालगा हैं। "
"यहसभी छोड़ो आप्। " रितू नें गर्दन घुमाकर पीछे काकी कि तरफदेख कर कहा___"आप् उस बाक्स सें रुई लीजिए औऱ उसमे डेटाॅल डालकर मेरीठीठ पर्र फैलेइस खून कों साफ कीजिए। "
"पर्र बिटिया तुम्हें दर्द होगा। " काकी नें चिन्तित भाव सें कहा___"मे यह केसेकर पाऊॅगी?"
"मुझेकुछ नहि होगा काकी। " रितू नें कहा__"बल्कि अगर आप् ऐसा नहि करेंगी तौ अवश्य मुझेकुछ हौ जाएगा। क्याँ आप् चाहती हें कि आपकी बिटिया कों कुछ होँ जाए?"
"नहि नहि बिटिया। " काकी कि ऑखों मे ऑसू आँ गए___"यह क्याँ कहरही होँ तुम्? तुम्हें कभीकुछ न् होँ बिटिया। मेरी सारीउमर भि तुम्हें लगजाए। रुको मे करतीहूॅ। "
रितू काकी कि बातों सें मुस्कुरा कररह गई औऱ अपनी गर्दन वापस सीधाकर तकिये मे रख लिया। काकी नें बाक्स सें रुई निकाला औऱ उसमे डेटाॅल डालकर रितू कि पीठ पऱ डरते डरते हाॅथ बढ़ाया। वो बहोत हि धीरे-धीरे धीरे-धीरे रितू कि पीठ पर्र फैलेखून कों साफकर रही थि। कदाचित वो नहि चाहती थि कि रितू कों ज़रा भि दर्द होँ।
"आप् डर क्यूं रही हें काकी?" सहसा रितू नें कहा___"अच्छे सें हाॅथ गड़ाकर साफ कीजिये न्। मुझे बिलकुल भि दर्द नहि होगा। आप् फिक्र मत कीजिए। "
रितू केँ कहने पर्र काकी पहले कि अपेक्षा अब थोडा ठीक सें साफकर रही थि। मगर बड़े एहतियात सें हि। कुछ टाइमबाद हि काकी नें रितू कि पीठ कों साफकर दिया। लेकिन चीरा वाला हिस्सा उसनेसाफ नहि किया। रितू नें उससेकहा कि वोँ चीरे वाले हिस्से कों भि अच्छी तरहसाफ करें। क्योंकि जब तक वोँ अच्छी तरहसाफ नहि होगातब तक उस पऱ दवा नहि लगाईजा सकती। काकी नें बड़ी सावधानी सें उसे भि साफ किया। फिन रितू केँ बताने पर्र उसने बाक्स सें निकाल कर एक् मल्हम चीरे पर्र लगाया औऱ फिन उसकी पट्टी कि। चीरे वालेजगह सें जितना खून बहना थां वो बह चुका थां लेकिन बहोत हि हल्का हल्का अभि भि रिसरहा थां। हलाॅकि अब पट्टी हौ चुकी थि इसलिए रितू कों आराममिल रहा थां। उसने दर्द कि एक् टेबलेट खाली थि।
"अब तुम् आरामकरो बिटिया। " काकी नें कहा___"तब तक मे तुम्हारे लिए गरमा गर्म खानां बना देतीहूॅ।
"नहि काकी। " रितू नें कहा___"आप् खानां बनाने कां कस्ट नं करें। बस एक् कप बहुत पिला दीजिए। "
"ठीक हैं जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। " काकी नें कहा औऱ रितू केँ ऊपर एक् चद्दर डालकर कमरे सें बाहर् निकल गई। जबकि रितू नें अपनी आॅखें बंदकर ली। कुछ देर ऑखेंबंद कर जाने वो क्याँ सोचती रहीफिन उसने अपनी ऑखें खोली औऱ बेड केँ बगल सें हि एक् छोटे सें स्टूल पर्र रखे लैण्डलाइन मोबाइल कि तरफ अपनाहाथ बढ़ाया।
रिसीवर कान सें लगाकर उसनेकोई नंबर डायल किया। कुछ हि समय मे उधरबेल जाने कि आवाज़ सुनाई देनेलगी।
"हैलो कमिश्नर जगमोहन देसाई हेयर। "उधर सें कहा गय़ा।
"जय हिन्द सर मे इंस्पेक्टर रितूबोल रहीहूॅ। " रितू नें उधर कि आवाज़ सुनने केँ बादकहा।
"ओहयस ऑफिसर। " उधर सें कमिश्नर नें कहा___"क्याँ रिपोर्ट हैं?"
"सर एक् फेवर चाहिए आपसे। " रितू नें कहा।
"फेवर???" कमिश्नर चकराया__"कैसा फेवर हम् कुछ समझे नहि। "
"सर सारी डिटेल मे आपको आपसेमिल कर हि बताऊॅगी। " रितू नें कहा___"मोबाइल पर्र बताना उचित नहि हैं। "
"ओकेनो प्राब्लेम। " कमिश्नर नें कहा__"अब बताओ केसे फेवर कि बातकर रही थि तुम्?"
"सर मे चाहती हूॅ कि इसकेस कि सारी जानकारी केवल आप् तक हि रहे। " रितूकह रही थि___"आप् जानते हें कि मैंने विधी केँ रेपकेस कि अभि तक कोई फाइल नहि बनाई हैं। बस आपकोइस बारे मे इन्फार्म किया थां। "
"हाॅयह हम् जानते हें। " कमिश्नर नें कहा__"पऱ तुम् करना क्याँ चाहती होँ यह हम् जानना चाहते हें?"
"कल आपसेमिल कर सारी बातें बताऊॅगी सर। " रितू नें कहा___"इस टाइम मे आपसेबस यह फेवर चाहती हूॅ कि दिवाकर चौधरी केँ बेटे औऱ उसके दोस्तों केँ बारे मे अगर आपकेपास कोईबात आए तौ आप् यही कहिएगा कि पुलिस कां इसबात सें कोई संबंध नहि हैं। "
"क्याँ मतलब??" कमिश्नर बुरीतरह चौंका थां__"आख़िर तुम् क्याँ कररही होँ ऑफिसर? उस टाइम भि तुमने हमसे इमेडिएटली सर्च वारंट केँ लिएकहा थां औऱ हमने उसका जल्दी इंतजाम भि किया। मगर अब तुम् यहसभी बोलरही होँ आख़िर हुआ क्याँ हैं?"
"सर मे आपको सारी बातें मिलकर हि बताऊॅगी। " रितूने कहा___"प्लीज़ सर ट्राई टू अंडरस्टैण्ड। "
"ओके फाइन। " कमिश्नर नें कहा__"हम् कल तुम्हारा वेट करेंगे आफिसर। "
"जय हिन्द सर। " रितू नें कहा औऱ रिसीवर वापस केड्रिल पर्र रख दिया।
रितू नें फिन सें आॅखें बंदकर ली। तभी कमरे मे काकी दाखिल हुइ। उसकेहाथ मे एक् ट्रे थां जिसमें एक् बड़ा सां कपरखा थां। आहटसुन कर रितू नें ऑखेंखोल कर देखा। काकी कों देखते हि वो बड़ी सावधानी सें उठकरबेड पर्र बैठ गई। उसके बैठते हि काकी नें रितू कों बहुत कां कप पकड़ाया।
बहुत पीने केँ बाद रितू कों थोडा बेहतर फीलहुआ औऱ वो बेड सें उतरआई। आलमारी सें उसने एक् ब्लूकलर कां जीन्स कां पैन्ट औऱ एक् रेडकलर कि टी-शर्ट निकाल करउसे पहनातथा ऊपर सें एक् लेदर कि जाॅकेट पहनकर उसने आईने मे स्वयं कों देखा। फिन पुलिस कि वर्दी वाले पैन्ट सें होलेस्टर सहित सर्विस रिवाल्वर निकाल करउसे जीन्स केँ बेल्ट पर्र फॅसाया तथा आलमारी सें एक् रेड एण्ड ब्लैक मिक्स गाॅगल्स निकाल करउसे ऑखों पर्र लगाया औऱ फिन बाहर् निकल गई।
बाहर् उसे काकी दिखी। उसने काकी सें कहा कि वो जारही हैं। काकीउसे यूॅदेख कर हैरान रह गई। उसेसमझ मे नं आया कि यह लड़की तोँ अभि थोड़ी देर पहले गंभीर हालत मे थि औऱ अब एकदम सें टीमटाम होकरचल भि दि।
घर-मकान केँ बाहर् आकर रितू पुलिस जिप्सी कि तरफ बढ़ी। वो यहदेख करखुश होँ गई कि काका नें जिप्सी कों अच्छे सें धोकरसाफ सुथरा कर दिया थां। रितू कों काका कि समझदारी पर्र कायल होना पड़ा। जिप्सी कों स्टार्ट कर रितूमेन गेट कि तरफबढ़ चली।
"काकाउन लोगों कां ध्यान रखना। " रितू नें गेट केँ पास खड़े काका औऱ शंभू काका दोनो कि तरफदेख कर कहा___"आज रात कां खानां उन्हें नहि देना। कल मे दोपहर कों आऊॅगी। "
"ठीक हैं बिटिया। " काका नें कहा__"तुम् बिलकुल भि चिन्ता नं करो। वोँ अब यहाॅ सें कहीं नहि जा पाएॅगे। "
"चलोफिन कल मिलती हूॅ आपसे। " रितू नें कहने केँ संग हि जिप्सी कों गेट केँ बाहर् कि तरफ निकाल दिया औऱ मेनरोड पर्र आते हि जिप्सी हवा सें बातें करनेलगी।
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फ्लैशबैक अबआगे_______
कमरे सें प्रतिमा केँ जाने केँ बाद विजय सिंह वापस अपने पलंग पर्र लेट गय़ा। उसके ज़हन मे यही ख़याल बारबार उभररहा थां कि वो अपनी भाभी कां क्याँ करे? वो स्पष्टरूप सें उससेकह चुकी थि कि वोँ उससे प्यार करती हैं औऱ वो अपनेदिल मे उसकेलिए भि थोड़ी सि स्थान दे। भला ऐसा केसे हौ सकता थां? विजय सिंहइस बारे मे सोचना भि ग़लतव पाप समझता थां। उधर प्रतिमा उसकीकोई बात सुनने याँ मानने कों सजधजकर हि नहि थि। वो प्रतिमा सें बहोत अधिक परेशान हौ गय़ा थां। उसेडर थां कि कहीं किसीदिन यहसभी बातें उसकेमाॅ बाबूजी कों नं पताचल जाएॅ वरना अनर्थ हौ जाएगा। आज वोँ जौ मुझे सबसे अच्छा औऱ अपना सबसे लायक बेटा समझते हें, तौ इस सबकापता चलते हि मेरे बारे मे उनकीसोच बदल जाएगी। वोँ यही समझेंगे कि वासना औऱ हवस केँ लिए मैने हि अपनीमाॅ समान भाभी कों बरगलाया हैं याँ फिन ज़बरदस्ती कि हैं उनसे। कोई मेरीबात कां यकीन नहि करेगा। बड़े भाई कों तौ औऱ भि मौकामिल जाएगा मेरे खिलाफ ज़हर उगलने कां।
विजय सिंहयह सभीसोच सोचकर बुरीतरह परेशान व दुखी भि होँ रहा थां। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वो क्याँ करे? वो अब किसी भि सूरत मे प्रतिमा केँ सामने नहि आनां चाहता थां। उसनेतय कर लिया थां कि अब वो देररात मे हि खेतों सें हवेली आया करेगा औऱ अपने कमरे मे हि खानां मॅगवा कर खाया करेगा।
अगलेदिन सें विजय कि दिनचर्या यही होँ गई। वो सुभह जल्द हवेली सें निकल जाता, दोपहर मे गौरी उसकेलिए खानां लें जाती। गौरी उसकेसंग खेतों पर्र दिनढले तक रहतीफिन वो हवेली आँ जाती जबकि विजय सिंहदेर रात कों हि हवेली लौटत। गौरीकई दिन सें गौरकर रही थि कि विजय सिंहकुछ दिनों सें कुछ परेशान सां रहनेलगा हैं। उसने उसकी तकलीफ़ कां पूछा भि लेकिन विजय सिंहहर बारइस बात कों टाल जाता। भला वो क्याँ बताता उसे कि वो किसवजह सें परेशान रहता हैं आजकल?
विजय सिंह कि इस दिनचर्या सें प्रतिमा कों अब उसकेपास जाने कि तौ बात हि दूर बल्कि उसेदेख पाने तक कों नहि मिलता थां। इस सबसे प्रतिमा बेहद परेशान व नाखुश हौ गई थि। अजय सिंह भि परेशान थां इस सबसे। उसकी भि कोईदाल नहि गलरही थि। गौरी केँ चलते प्रतिमा कों खेतों पऱ जाने कां मौका हि नहि मिलता थां। ऐसा नहि थां कि वो जा नहि सकती थि मगर वो चाहती थि कि वो जब भि खेतों पऱ जाए तोँ खेतों पर्र गौरी न् होँ बल्कि वो औऱ विजय सिंहबस हि हों वहाॅ। ताकि वो बड़े धीरे-धीरे विजय पर्र प्यार बाॅण चलाए।
एक् दिन प्रतिमा कों मौकामिल हि गय़ा। दरअसल सुभह सुभहजब गौरी अपने कमरे केँ बाथरूम मे नहारही तोँ फर्स पऱ उसका पांव फिसल गय़ा औऱ वो बड़ा ज़ोर सें गिरी थि। जिससे उसकीकमर मे असह पीड़ा होनेलगी थि। इस सबका परिणाम यहहुआ कि गौरी खेतों पऱ विजय केँ लिए खानां लेकर न् जासकी बल्कि प्रतिमा कों जाने कां सुनहरा मौकामिल गय़ा। प्रतिमा पहले कि भाॅति हि पतली साड़ी औऱ बिना ब्रा कां ब्लाउज पहना औऱ विजय केँ लिए टिफिन लेकर खेतों पर्र चली गई।
प्रतिमा कों पता थां कि यह मौकाउसे बड़े संजोग सें मिला हैं इसलिए वो इस मौके कों खोना नहि चाहती थि। उसनेसोच लिया थां कि आज वो विजय सें अपने प्यार केँ लिएकुछ नं कुछ तौ करेगी हि। उसकेपास वक़्त भि नहि बचा थां। बच्चों केँ विद्यालय कि छुट्टियाॅ दोदिन बाद समाप्त हौ रही थि।
नियति कों जौ मंजूर होता हैं वही होता हैं। यह संजोग थां कि गौरी कां पेर फिसला औऱ उसनेखाट पकड़ लिया जिसके कारण प्रतिमा कों खेतों मे जाने कां अवसरमिल गय़ा औऱ एक् यह भि संजोग हि थां कि आज खेतों पर्र फिनकोई मजदूर नहि थां। सारीरात जुती हुई ज़मीन पर्र पानी लगाया औऱ लगवाया थां उसने। सुभहनौ बजे सारे मजदूर गए थें। आज केँ लिए साराकाम हौ गय़ा थां।
प्रतिमा जब खेतों पऱ पहुॅची तौ हरतरफ सन्नाटा फैलाहुआ पाया। आस पासकोई नं दिखाउसे। वो घर-मकान केँ अंदर नहि गई बल्कि आसपास घूमघूम कर देखा उसनेहर तरफ। नं कोई मजदूर औऱ नाँ हि विजय सिंहउसे कहीं नज़र नं आए। प्रतिमा कों खुशी हुइ कि खेतों पर्र कोई मजदूर नहि हैं औऱ अब वो बेफिक्र होकरकुछ भि कर सकती हैं।
घर-मकान केँ अंदर जाकरजब वो कमरे मे पहुॅची तौ विजय कों बैड पऱ सोयाहुआ पाया। उसकेमुख सें हल्के खर्राटों कि आवाज़ भि आँ रही थि। इससमय उसके जिस्म पऱ नीचे एक् सफेद धोती थि औऱ ऊपर एक् बनियान। वो पक्का किसान थां। पढ़ाई छोंड़ने केँ बाद उसने खेतों पऱ हि अपना सारा वक़्त गुज़ारा थां। यह उसकी कर्मभूमि थि। यहाॅ पर्र उसनेखून पसीना बहाया थां। जिसका परिणाम यह थां कि उसका जिस्म पत्थर कि तरह शख्त थां। छः स्लिम लम्बा थां वो तथा हट्टा कट्टा जिस्म थां। लेकिन चेहरे पर्र हमेशा सादगी विद्यमान रहती थि उसके। उसका ब्यक्तित्व ऐसा थां कि गाॅव कां हरकोई उसे प्यार व सम्मान देता थां।
प्रतिमा सम्मोहित सि देखेजा रही थि उसे। फिन सहसा जैसेउसे होशआया औऱ एकाएक हि उसके दिमाग़ कि बत्ती जलउठी। जाने क्याँ चलनेलगा थां उसकेमन मे जिसेसोच कर वो मस्कुराई। उसने टिफिन कों बड़ी सावधानी सें वहीं पर्र रखे एक् बेन्च पऱ रख दिया औऱ सावधानी सें विजय कि चारपाई केँ पास पहुॅची।
विजय चारपाई पर्र चूॅकि गहरी नींद मे सोयाहुआ थां इसलिए उसेयह पता नहि चला कि उसके कमरे मे कौनआया हैं? प्रतिमा उसके हट्टे कट्टे बदन कों इतने लगभग सें देखकर आहें भरनेलगी। उसने नज़रभर कर विजय कों ऊपर सें नीचे तक देखा। उसके अंदरकाम वासना कि अगन सुलगउठी। कुछदेर यूॅ हि ऑखों मे वासना केँ लाललाल डोरेलिए वो उसे देखती रहीफिन सहसा वो वहीं फर्स पर्र घुटनों केँ बल बैठती चली गई। उसके हृदय कि गति अनायास हि बढ़ गई थि। उसने विजय केँ चेहरे पऱ गौर सें देखा। विजय किसी कुम्भकर्ण कि तरहसो रहा थां। प्रतिमा कों जब यकीन होँ गय़ा कि विजय किसी हल्की आहट पर्र इतना जल्द जगने वाला नहि हैं तोँ उसने उसके चेहरे सें नज़रहटा कर विजय कि धोती यानी लुंगी केँ उस हिस्से पर्र नज़र डाली जहाॅ पर्र विजय कां लिंग उसकी लुंगी केँ अंदर छिपा थां। लिंग कां उभार लुंगी पऱ भि स्पष्ट नज़र आँ रहा थां।
प्रतिमा नें धड़कते दिल केँ संग अपने हाॅथों कों बढ़ाकर विजय कि लुंगी कों उसके छोरों सें पकड़कर आहिस्ता सें इधर औऱ उधर किया। जिससे विजय केँ नीचे वाला हिस्सा नग्न हौ गय़ा। लुंगी केँ अंदर उसनेकुछ नहि पहनरखा थां। प्रतिमा नें देखा गहरी नींद मे उसका घोंड़े जैसा लन्ड भि गहरी नींद मे सोया पड़ा थां। मगरउस हालत मे भि वो लम्बा चौड़ा नज़र आँ रहा थां। उसका लन्ड काला याँ साॅवला बिलकुल नहि थां बल्कि सफ़ेद थां बिलकुल अंग्रेजों केँ लन्ड जैसा सफ़ेद। उसेदेख कर प्रतिमा केँ मुॅह मे पानी आँ गय़ा थां। उसने बड़ी सावधानी सें उसे अपने दाहिने हाॅथ सें पकड़ा। उसकोइधर उधर सें अच्छी तरह देखा। वोँ बिलकुल किसी मासूम सें छोटे बच्चे जैसा खूबसूरत औऱ प्यारा लगाउसे। उसनेउसे मुट्ठी मे पकड़कर ऊपर नीचे किया तौ उसका बड़ा सां सुपाड़ा जोँ हल्का सिंदूरी रंग कां थां चमकने लगा औऱ संग हि उसमें कुछ हलचल सि महसूस हुइ उसे। उसनेयह महसूस करते हि नज़रऊपर कि तरफ करके गहरी नींद मे सोये पड़े विजय कि तरफ देखा। वोँ पहले कि तरह हि गहरी नींद मे सोयाहुआ लगा। प्रतिमा नें सुकून कि साॅसली औऱ फिन सें अपनी नज़रें उसके लन्ड पऱ केंद्रित कर दि। उसके हाॅथ केँ स्पर्श सें तथा लन्ड कों मुट्ठी मे लिएऊपर नीचे करने सें लन्ड कां आकार धीरे-धीरे धीरे-धीरे बढ़ने लगा थां। यहदेख कर प्रतिमा कों अजीब सां नशा भि चढ़ता जारहा थां उसकी साॅसें तेज़ होनेलगी थि। उसने देखा कि कुछ हि पलों मे विजय कां लन्ड किसी घोड़े केँ लन्ड जैसा बड़ा होकर हिनहिनाने लगा थां। प्रतिमा कों लगा कहींऐसा तौ नहि कि विजयजाग रहा होँ औऱ यह देखने कि कोशिश कररहा होँ कि उसकेसंग आगे क्याँ क्याँ होता हैं? मगरउसे यह भि पता थां कि अगर विजयजाग रहा होता तोँ इतनाकुछ होने हि नं पाता क्योंकि वो उच्च विचारों तथामान मर्यादा कां पालन करने वाला इंसान थां। वोँ कभी किसी कों ग़लत नज़र सें नहि देखता थां, ऐसा सोचना भि वोँ पाप समझता थां। उसके बारे मे वोँ जान चुका थां कि वो क्याँ चाहती हैं उससेइस लिए वोँ हवेली मे अबकम हि रहता थां। दिनभर खेत मे हि मजदूरों केँ संग टाइम गुज़ार देता थां औऱ देररात हवेली मे आतातथा खानां पीनाखा कर अपने कमरे मे गौरी केँ संगसो जाता थां। वो उससेदूर हि रहता थां। इसलिए यह सोचना हि ग़लत थां कि इस टाइम वो जागरहा होगा। प्रतिमा नें देखा कि उसका लन्ड उसकी मुट्ठी मे नहि आँ रहा थां तथा गर्म लोहे जैसा प्रतीत हौ रहा थां। अब तक प्रतिमा कि हालतउसे देखकर खराब हौ चुकी थि। उसेलग रहा थां कि जल्द सें उछलकर इसको अपनी बुर केँ अंदर पूरा कां पूरा घुसेड़ लें। लेकिन जल्दबाजी मे साराखेल बिगड़ जाताइस लिए अपने पऱ नियंत्रण रखा उसने औऱ उसके हसीनमगर बिकराल लन्ड कों मुट्ठी मे लिए आहिस्ता आहिस्ता सहलाती रही।
प्रतिमा कों जाने क्याँ सूझी कि वो धीरे-धीरे सें उठी औऱ अपनेबदन सें साड़ी निकाल कर एक् तरफ फेंक दि। इतनाहीं नहि उसने अपने ब्लाउज केँ हुकखोल करउसे भि अपने शरीर सें निकाल दिया। ब्लाउज केँ हटते हि उसकी खरबूजे जैसी भारी चूचियाॅ उछल पड़ीं। इसकेबाद उसने पेटीकोट कों भि उतार दिया। अब प्रतिमा बिलकुल मादरजाद नंगी थि। उसका चेहरा हवसतथा वासना सें लालपड़ गय़ा थां।
अपने सारे कपड़े उतारने केँ बाद प्रतिमा फिन सें चारपाई केँ पास घुटनों केँ बलबैठ गई। उसकी नज़र लुंगी सें बाहर् उसके हि द्वारा निकाले गए विजय सिंह केँ हलब्बी लन्ड पर्र पड़ी। अपना दाहिना हाॅथ बढ़ाकर उसनेउसे आहिस्ता सें पकड़ा औऱ फिन आहिस्ता आहिस्ता हि सहलाने लगी। प्रतिमा उसको अपनेमुह मे भरकर चूसने केँ लिए पागल हुई जारही थि, जिसका सबूतयह थां कि प्रतिमा अपने एक् हाथ सें कभी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों कों मसलने लगती तोँ कभी अपनी चूॅत कों। उसके अंदर वासना अपनेचरम पऱ पहुॅच चुकी थि। उससे बरदास्त नं हुआ औऱ उसने एक् झटके सें नीचेझुक कर विजय केँ लन्ड कों अपनेमुह मे भर लिया.औऱ जैसे यहीं पऱ उससे बड़ी भारी ग़लती होँ गई। उसनेयह सभी अपनेआपे सें बाहर् होकर किया थां। विजय कां लन्ड जितना बड़ा थां उतना हि मोटा भि थां। प्रतिमा नें जैसे हि उसे झटके सें अपनेमुह मे लिया तोँ उसकेऊपर केँ दाॅत तेज़ी सें लन्ड मे गड़ते चलेगए औऱ विजय केँ मुख सें चीख निकल गई संग हि वो हड़बड़ा कर तेज़ी सें चारपाई पर्र उठकरबैठ गय़ा। अपने लन्ड कों इसतरह प्रतिमा केँ मुख मे देख वो भौचक्का सां रह गय़ा लेकिन फिन जल्दी हि वो उसकेमुह सें अपना लन्ड निकाल करतथा चारपाई सें उतरकर दूर खड़ा हौ गय़ा। उसका चेहरा एक् दम गुस्से औऱ घ्रणा सें भर गय़ा। यहसभी इतना जल्दहुआ कि कुछदेर तक तौ प्रतिमा कों कुछसमझ हि न् आया कि यहसभी क्याँ औऱ केसे होँ गय़ा? होश तोँ तबआया जब विजय कि गुस्से सें भरी आवाज़ उसके कानों सें टकराई।
"यह क्याँ बेहूदगी हैं?" विजय लुंगी कों सही करकेतथा गुस्से सें दहाड़ते हुएकह रहा थां__"अपनी हवस मे तुम् इतनी अंधी हौ चुकी हौ कि तुम्हें यह भि ख़याल नहि रहा कि तुम् किसके संगयह नीचकाम कररही हौ? अपने हि देवर जी सें मुह कालाकर रही होँ तुम्। अरे देवरु तोँ बेटे केँ समान होता हैं यह ख़याल नहि आया तुम्हें?"
प्रतिमा चूॅकि रॅगे हाॅथों ऐसा करतेहुए पकड़ी गई थि उसदिन, इसलिए उसकी ज़ुबान मे जैसे ताला सां लग गय़ा थां। उसदिन विजय कां गुस्से सें भरा वो खतरनाक रूप उसने पहलीबार देखा थां। वो गुस्से मे जाने क्याँ क्याँ कहेजा रहा थां मगर प्रतिमा सिर झुकाए वहीं चारपाई केँ नीचे बैठीरही उसीतरह मादरजात नंगी हालत मे। उसे ख़याल हि नहि रह गय़ा थां कि वो नंगी हि बैठी हैं। जबकि,,,
"आज तुमने यहसभी करके बहोत बड़ापाप किया हैं। " विजयकहे जारहा थां__"औऱ मुझे भि पाप कां भागीदार बना दिया। क्याँ समझता थां मे तुम्हें औऱ तुम् क्याँ निकली? एक् ऐसीनीच औऱ कुलटा महिला जौ अपनीहवस मे अंधी होकर अपने हि देवर जी सें मुह काला करनेलगी। तुम्हारी नीयत कां तोँ पहले सें हि आभास हौ गय़ा थां मुझेइसी लिए तुमसे दूररहा। मगरयह नहि सोचा थां कि तुम् अपनी नीचता औऱ हवस मे इसहद तक भि गिर जाओगी। तुममें औऱ बाज़ार कि रंडियों मे कोई फर्क नहि रह गय़ा अब। चली जाओ यहाॅ सें.औऱ दुबारा मुझे अपनीयह गंदीशकल मत दिखाना वर्ना मे भूल जाऊॅगा कि तुम् मेरे बड़े भइया कि पत्नि होँ। आज सें मेरा औऱ तुम्हारा कोई नाता नहि.अब जा यहाॅ सें कुलटा स्त्री.देखो तौ केसे बेशर्मों कि तरह नंगी बैठी हैं?"
विजय कि बातों सें हि प्रतिमा कों ख़याल आया कि वो तोँ अभि नंगी हि बैठी हुई हैं तब सें। उसने सीघ्रता सें अपनी नग्नता कों ढॅकने केँ लिए अपने कपड़ों कि तरफ नज़रें घुमाई। पास मे हि उसके कपड़े पड़े थें। उसने जल्द सें अपनी साड़ी ब्लाउज पेटीकोट कों समेटा लेकिन फिन उसकेमन मे जाने क्याँ आया कि वो वहीं पऱ रुक गई।
विजय कि बातों नें प्रतिमा केँ अंदर मानो ज़हर सां घोल दिया थां। जौ हमेशा उसे इज्ज़त औऱ सम्मान देता थां आजवही उसे आप् कि स्थान तुम् औऱ तुम् केँ बाद तूँ कहतेहुए उसकी इज्ज़त कि धज्जियाॅ उड़ाए जारहा थां। उसे बाजार कि रंडी तक कहरहा थां। प्रतिमा केँ दिल मे आग सि धधकने लगी थि। उसेयह डर नहि थां कि विजययह सभी किसी सें बता देगा तोँ उसका क्याँ होगा। बल्कि अब तौ सभीकुछ खुल हि गय़ा थां इसलिए उसने भि अब पीछे हटने कां ख़याल छोंड़ दिया थां।
उसनेउसी हालत मे खिसककर विजय केँ पेर पकड़लिए औऱ फिन बोलीं__"तुम्हारे लिए मे कुछ भि बनने कों सजधजकर हूॅ विजय। मुझेइस तरहअब मत दुत्कारो। मे तुम्हारी शरण मे हूॅ, मुझे अपनालो विजय। मुझे अपनी दासीबना लो, मे वही करूॅगी जौ तुम् कहोगे। मगरइस तरह मुझेमत दुत्कारो.देख लो मैंने यहसभी तुम्हारा प्यार पाने केँ लिए किया हैं। माना कि मैंने ग़लत तरीके सें तुम्हारे प्यार कों पाने कि कोशिश कि मगर मे क्याँ करती विजय? मुझे औऱ कुछसूझ हि नहि रहा थां। पहले भि मैंने तुम्हें यहसभी जताने कि कोशिश कि थि मगर तुमने समझा हि नहि इसलिए मैंने वही किया जोँ मुझेसमझ मे आया। अब तोँ सभीकुछ जाहिर हि हौ गय़ा हैं, अब तोँ मुझे अपनालो विजय.मुझे तुम्हारा प्रेम चाहिए। "
"बंदकरो अपनीयह बकवास। " विजय नें अपने पैरों कों उसके चंगुल सें एक् झटके मे छुड़ा करतथा दहाड़ते हुए कहा__"तुझ जैसी गिरी हुई महिला केँ मे मुह नहि लगना चाहता। मुझे हैरत हैं कि बड़े भाई नें तुझ जैसीनीच औऱ हवस कि अंधी स्त्री सें विवाह केसे कि? अवश्य तूने हि मेरे भइया कों अपनेजाल मे फसाया होगा। "
"जोँ मर्ज़ी कहलो विजय। " प्रतिमा नें सहसा आखों मे आॅसू लातेहुए कहा__"मगर मुझे अपने सें दूर नं करो। दिन रात तुम्हारी सेवा करूॅगी। मे तुम्हें उस गौरी सें भि ज़्यादा प्रेम करूॅगी विजय। "
"ख़ामोशशशश। " विजयइस तरह दहाड़ा थां कि कमरे कि दीवारें तक हिल गईं__"अपनी गंदी ज़ुबान सें मेरी गौरी कां नाम भि मत लेना वर्ना हलक सें ज़ुबान घसीटकर हाॅथ मे दे दूॅगा। तुँ हैं क्याँ बदजात महिला.तेरी औकातआज पताचल गई हैं मुझे। तेरे जैसी रंडियाॅ कौड़ी केँ भाव मे ऐरों गैरों कों अपना शरीर बेंचती हें गली चौराहे मे। औऱ तुँ गौरी कि बात करती हैं.अरे वोँ देवी हैं देवी.जिसकी मे इबादत करताहूॅ। तुँ उसके पैरों कि धूल भि नहि हैं समझी??अब जा यहाॅ सें वर्ना धक्के मारकर इसी हालत मे तुझेही यहाॅ सें बाहर् फेंक दूॅगा। "
प्रतिमा समझ चुकी थि कि उसकी किसी भि बात कां विजय पऱ अबकोई प्रभाव पड़ने वाला नहि थां। उल्टा उसकी बातों नें उसे औऱ उसके अंतर्मन कों बुरीतरह शोलों केँ हवाले कर दिया थां। उसनेजिस तरीके सें उसे दुत्कार कर उसका अपमान किया थां उससे प्रतिमा केँ अंदर भीषणआग लग चुकी थि औऱ उसनेमन हि मन एक् फैंसला कर लिया थां उसके औऱ उसके परिवार केँ लिए।
"ठीक हैं विजय सिंह। "फिन उसने अपने कपड़े समेटते हुए ठण्डे स्वर मे कहा थां__"मे तोँ जारही हूं यहाॅ सें मगरजिस तरह सें तुमने मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया हैं उसका परिणाम तुम्हारे लिएकतई अच्छा नहि होगा। परमेश्वर देखेगा कि एक् महिला जबइसतरह अपमानित होकर रुष्ट होती हैं तोँ भविष्य मे उसका क्याँ परिणाम निकलता हैं??"
प्रतिमा कि बात कां विजय सिंह नें कोई जवाब नहि दिया बल्कि गुस्से सें उबलती हुइ ऑखों सें उसेदेख गर वहीं मानो हिकारत सें थूॅका औऱ फिन बाहर् निकल गय़ा। जबकि बुरीतरह ज़लील व अपमानित प्रतिमा नें अपने कपड़े पहने औऱ हवेली जाने केँ लिए कमरे सें बाहर् निकल गई। उसके अंदर प्रतिशोध कि ज्वाला धधक हुई उठी थि।
हवेली पहुॅच कर प्रतिमा नें अपने पति अजय सिंह सें आज विजय सिंह सें हुए कारनामे कां सारा व्रत्तान्त मिर्च मशाला लगाकर सुनाया। उसकी सारी बातें सुनकर अजय सिंह सन्नरह गय़ा थां। उसे यकीन नहि हौ रहा थां कि आज इतना बड़ा काण्ड हौ गय़ा हैं।
"मुझेउस हरामज़ादे सें अपने अपमान कां प्रतिशोध लेना हैं अजय। " प्रतिमा नें किसी ज़हरीली नागिन कि भाॅति फुंकारते हुए कहा___"जब तक मे उससे अपमान कां बदला नहि लूॅगी तब तक मेरी आत्मा कों शान्ति नहि मिलेगी। "
"अवश्य डियर। "अजय सिंह नें सहसा कठोरता सें कहा___"तुम्हारे इस अपमान कां बदला अवश्य उससे लिया जाएगा। आज केँ इस हादसे सें यह तौ साबित होँ हि गय़ा कि वोँ मजदूर हमारे झाॅसे मे आने वाला नहि हैं। सोचा थां कि सभीमिल बाॅटकर खाएॅगे औऱ मजा करेंगे मगर नहि उस मजदूर कों तौ कलियुग कां हरिश्चन्द्र बनना हैं। इसलिए ऐसे इंसान कां जीवित रहना हमारे लिए अच्छी बात नहि हैं। उसके रहते हम् अपनी हसरतों कों पूरा नहि कर पाएॅगे प्रतिमा। वोँ मजदूर हमारे रास्ते कां सबसे बड़ा काॅटा हैं। इस काॅटे कों अबजड़ सें उखाड़ कर फेंकना हि पड़ेगा। "
"जौ भि करना होँ जल्दकरो अजय। " प्रतिमा नें कहा___"मे उस कमीने कि अबशकल भि नहि देख्ना चाहती कभी। साला कुत्ता मुझे दुत्कारता हैं। कहता थां कि मे उसकी गौरी कि पैरों कि धूल भि नहि हूॅ। मुझे रंडी बोलता हैं। मे दिखाऊॅगी उसे कि मेरे सामने उसकी वोँ राॅड गौरीकुछ भि नहि हैं। उसे सबके नीचे नं लेटाया तोँ मेरा भि नाम प्रतिमा सिंह बघेल नहि। उसे कोठे कि नहि बल्कि बीच चौराहे कि रंडी बनाऊॅगी मे। "
"शान्त हौ जाओ प्रतिमा। " अजय सिंह नें उसे स्वयं सें लगा लिया___"सभी कुछ वैसा हि होगा जैसा तुम् चाहती होँ। मगर ज़रा तसल्ली सें औऱ सोचसमझ कर बनाएगए प्लान केँ अनुसार। ताकि किसी कों किसीबात कां कोईशक न् हौ पाए। "
"ठीक हैं अजय। " प्रतिमा नें कहा___"मगर मे अधिक दिनों तक उसे जीवित नहि देख्ना चाहती। तुम् जल्द हि कुछकरो। "
"फिक्र मतकरो मेरीजान। " अजय नें कुछ सोचते हुए कहा___"आज सें औऱ अभि सें प्लान बी शुरुआत। अबचलो क्रोध थूॅको औऱ मेरेसंग प्रेम कि वादियों मे खोजाओ। "
यह दोनो तौ अपने प्रेम औऱ वासना मे खोगए थें मगरउधर खेतों मे विजय सिंहबोर बेल केँ पासबने एक् बड़े सें गड्ढे मे थां। उस गड्ढे मे हमेशा बोर कां पानीभरा रहता थां। विजय सिंहउसी पानी सें भरे गड्ढे मे थां। उसकेऊपर बोर कां पानीगिर रहा थां। वो एकदम किसी पुतले कि भाॅति खड़ा थां। उसका ज़हन उसकेपास नहि थां। बोर कां पानी निरंतर उसकेसिर पर्र गिररहा थां।
विजय सिंह केँ कि ऑखों केँ सामने बारबार वही मंज़र घूमरहा थां। उसेऐसा महसूस हौ रहा थां जैसे अभि भि उसका लन्ड प्रतिमा केँ मुह मे होँ। इस मंज़र कों देखते हि उसके शरीर कों झटका सां लगता औऱ वो ख़यालों कि दुनियाॅ सें बाहर् आँ जाता। उसकामन आज बहोत ज़्यादा दुखी होँ गय़ा थां। उसे यकीन नहि आँ रहा थां कि उसकीसगी भाभी उसकेसंग ऐसा घटिया कामकर सकती हैं। विजय सिंह केँ मन मे प्रश्न उभरता कि क्याँ यहीं प्यार थां उसका?
विजय सिंहयह तोँ समझ गय़ा थां कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली महिला थि। शहर वाली थि इसलिए शहरों जैसा हि रहनसहन थां उसका। कुछ दिन सें उसकी हरकतें ऐसी थि जिससे साफपता चलता थां कि वो विजय सें वास्तव मे कैसा प्यार करती हैं। लेकिन विजय सिंह कों उससेइस हद तक गिर जाने कि उम्मीद नहि थि। विजय सिंह कों सोचसोच कर हि उस पर्र घिन आँ रही थि कि कितना घटिया कामकर रही थि वो।
उसदिन विजय सिंह सारादिन दुःखी व दुखीरहा। उसकादिल कररहा थां कि वो कहीं बहोत दूरचला जाए। किसी कों अपनामुह न् दिखाए लेकिन हरबार गौरी औऱ बच्चों कां ख़याल आँ जाता औऱ फिन जैसे उसके पैरों पर्र ज़ंजीरें पड़ जातीं। किसी नें सच हि कहा हैं कि पत्नि बच्चे किसी भि इंसान कि सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हें। जब आप् उनके बारे मे दिल सें सोचते हें तोँ बसयही लगता हैं कि चाहेकुछ भि हौ जाए पऱ इन पऱ किसीतरह कि कोई पराशानी न् होँ।
विजय सिंह हमेशा कि तरह हि देर सें हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों कि अपेक्षा आज उसकामन किसी भि चीज़ मे नहि लगरहा थां। उसने स्वयं कों सामान्य रखने बड़ी कीशिश कररहा थां वोँ। अपने कमरे मे जाकरवह फ्रेश हुआ औऱ बेड पऱ आकरबैठ गय़ा।
भाग हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Super duper update bhay बहुत hi Shandar aur lajawab bole too ekdum jhakaas dhamakedar mind blowing & fantastic,
Aage kaa intezar rahega
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♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Aage kya hua? Next part padhiye
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