♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
HAPPY HOLI bhay
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो केसे हें आप् सभी?????
होली कां रंग औऱ भाॅग कां नशा उतरा कि नहि?????
दोस्तो, अभि तौ मे अपने पूरे परिवार केँ संग हि घऱ मे हूॅ। यहाॅ सें दोतीन दिनबाद निकलूॅगा। उसकेबाद हि आपको अच्छा सां एपसोड दे पाऊॅगा। आजघऱ सें दूर यहाॅ मार्केट आया थां तौ जियो कां नेटवर्क मिला तौ सोचा आप् लोगों सें थोड़ी गुफ्तगू हौ जाए। अभि तोँ घऱ मे बड़ामजा आँ रहा हैं दोस्तो, सभी एक् संग हें कुछ रिश्तेदार भि आएहुए हें।
दोस्तो, थोडा औऱ इन्तज़ार कर लीजिए। 25 याँ 26 कों पहुॅच जाऊॅगा मे अपनी कर्मभूमि पऱ। उसकेबाद मे आपको एपसोड देने लगूॅगा।
Bhang utar gyi bhaii.. achchi rhi holi. Hn.kaafi arse baad relatives orr apno ke bich acha lgta hain. Okk bhaii.take ur waqt.enjoy with family.. We'll wait till..
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 34 》
अब तक,,,,,,,,,,
विजय सिंह केँ कि ऑखों केँ सामने बारबार वही मंज़र घूमरहा थां। उसेऐसा महसूस होँ रहा थां जैसे अभि भि उसका लन्ड प्रतिमा केँ मुह मे हौ। इस मंज़र कों देखते हि उसके शरीर कों झटका सां लगता औऱ वो ख़यालों कि दुनियाॅ सें बाहर् आँ जाता। उसकामन आज बहोत अधिक दुखी हौ गय़ा थां। उसे यकीन नहि आँ रहा थां कि उसकीसगी भाभी उसकेसंग ऐसा घटिया कामकर सकती हैं। विजय सिंह केँ मन मे प्रश्न उभरता कि क्याँ यहीं प्यार थां उसका?
विजय सिंहयह तोँ समझ गय़ा थां कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली महिला थि। शहर वाली थि इसलिए शहरों जैसा हि रहनसहन थां उसका। कुछ दिन सें उसकी हरकतें ऐसी थि जिससे साफपता चलता थां कि वो विजय सें वास्तव मे कैसा प्यार करती हैं। लेकिन विजय सिंह कों उससेइस हद तक गिर जाने कि उम्मीद नहि थि। विजय सिंह कों सोचसोच कर हि उस पऱ घिन आँ रही थि कि कितना घटिया कामकर रही थि वो।
उसदिन विजय सिंह सारादिन दुःखी व दुखीरहा। उसकादिल कररहा थां कि वो कहीं बहोत दूरचला जाए। किसी कों अपनामुह न् दिखाए लेकिन हरबार गौरी औऱ बच्चों कां ख़याल आँ जाता औऱ फिन जैसे उसके पैरों पऱ ज़ंजीरें पड़ जातीं। किसी नें सच हि कहा हैं कि पत्नि बच्चे किसी भि इंसान कि सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हें। जब आप् उनके बारे मे दिल सें सोचते हें तोँ बसयही लगता हैं कि चाहेकुछ भि होँ जाए पऱ इन पर्र किसीतरह कि कोई पराशानी न् हौ।
विजय सिंह हमेशा कि तरह हि देर सें हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों कि अपेक्षा आज उसकामन किसी भि चीज़ मे नहि लगरहा थां। उसने स्वयं कों सामान्य रखने बड़ी कीशिश कररहा थां वोँ। अपने कमरे मे जाकरवह फ्रेश हुआ औऱ बेड पर्र आकरबैठ गय़ा।
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अबआगे,,,,,,,,,,,
वर्तमान अबआगे________
इंस्पेक्टर रितूउस हास्पिटल मे पहुॅची जहाॅ पऱ रेप पीड़िता विधी कों एडमिट किया गय़ा थां। विधी कि हालत पहले सें बहुतठीक थि। रितू केँ पहुॅचने केँ पहले हि विधी केँ परिवार वाले उससेमिल करगए थें। इससमय विधी केँ पास उसकीमाॅ गायत्री थि। गायत्री अपनी बेटी कि इस हालत सें बेहद दुखी थि।
रितूजब उस कमरे मे पहुॅची तोँ उसने विधी केँ पास हि एक् कुर्सी पऱ गायत्री कों बैठै पाया। रितू नें औपचारिक तौर पर्र उससे नमस्कार किया औऱ उसे अपने बारे मे बताया। रितू केँ बारे मे जानकर गायत्री पहले तोँ चौंकी फिन सहसा उसके चेहरे पऱ अजीब सें भाव आँ गए।
"मेरी बेटी केँ संग जोँ कुछहुआ हैं वोँ तोँ वापस नहि लौट सकता बेटी। " गायत्री नें अधीरता सें कहा___"ऊपर सें इस सबकाकेस बन जाने सें हमारी समाज मे बदनामी हि होगी। इस लिए मे चाहती हूॅ कि तुम् यहकेस वेस कां चक्कर बंदकर दो। मे जानती हूॅ कि इसकेस मे आगे क्याँ क्याँ होगा? वोँ सभी बड़ेलोग हें बेटी। वोँ बड़े सें बड़ा वकील अपनीतरफ सें खड़ा करेंगे औऱ बड़ी आसानी सें केसजीत जाएॅगे। वोँ कुछ भि कर सकते हें, वोँ तोँ जज कों भि खरीद सकते हें। अदालत केँ कटघरे मे खड़ी मेरीफूल जैसी बेटी सें उनका वकीलऐसे ऐसे प्रश्न करेगा जिसका जवाब देना इसकेबस कां नहि होगा। वोँ सबके सामने मेरी बेटी कि इज्ज़त कि धज्जियाॅ उड़ाएंगे। यहकेस मेरी बेटी केँ संग हि एक् मज़ाक सां बनकररह जाएगा। इसलिए मे तुमसे विनती करतीहूॅ बेटी कि यहकेस वेस वाला चक्कर छोड़दो। हमेंकोई केसवेस नहि करना। "
"आप् जिस चीज़ कि कल्पना कररही हें आॅटीजी। " रितू नें विनम्रता सें कहा__"मे उस सबके बारे मे पहले हि सोच चुकीहूॅ। मे जानती हूॅ कि आप् जौ कहरही हें वोँ सोलहआने सच हैं। यकीनन ऐसा हि होगामगर, आप् चिन्ता मत कीजिए आॅटी। विधीअगर आपकी बेटी हैं तोँ यह मेरी भि मित्र हैं अब। इसकेसंग जोँ कुछ भि उन लोगों नें घिनौना कर्म किया हैं उसकी उन्हें ऐसी सज़ा मिलेगी कि हर जन्म मे उन्हें यह सज़ायाद रहेगी औऱ वोँ अपने किसी भि जन्म मे किसी कि बेहन बेटियों केँ संगऐसा करने कां सोचेंगे भि नहि। "
"बात तौ वही हुइ बेटी। " गायत्री नें कहा__"तुम् उन्हें कानूनन इसकी सज़ा दिलवाओगी जबकि मे जानती हूॅ कि उन लोगों केँ बाप लोगों केँ हाॅथ तुम्हारे कानून सें भि अधिक लम्बे हें। तुम् उनकाकुछ नहि बिगाड़ पाओगी बेटी। उल्टा होगायह कि इस सबके चक्कर मे स्वयं तुम्हारी हि जान कां खतरा पैदा होँ जाएगा। "
"मुझे अपनीजान कि कोई परवाह नहि हैं आॅटी। " रितू नें सहसा मुस्कुराकर कहा__"औऱ मेरीजान इतनी सस्ती भि नहि हैं जौ यूॅ हि किसीऐरे गैरे केँ हाॅथों शिकार हौ जाएगी। खैर, मै यह कहना चाहती हूॅ कि उन लोगों कों कानूनन सज़ा दिलवाने कां फैसला मैनेबदल दिया हैं। "
"क्याँ मतलब??" गायत्री केँ संगसंग बेड पऱ लेटी विधी भि चौंक पड़ी थि।
"यह तोँ मुझे भि पता हैं ऑटी कि वोँ लोग कितने बड़ेखेत कि पैदाइस हें। " रितू नें अजीबभाव सें कहा___"कहने कां मतलबयह कि कानूनी तौर पर्र यकीनन मे उन्हें वैसी सज़ा नहि दिला सकती जैसी सज़ा केँ वोँ लोग हक़दार हें। इसलिए अब सज़ाअलग तरीके सें दि जाएगी उन्हें। बिलकुल वैसी हि सज़ा जैसी सज़ाऐसे नीच लोगों कों देनी चाहिये। "
"तुम् क्याँ कहरही होँ बेटी मुझेकुछ समझ मे नहि आँ रहा। " गायत्री कां दिमाग़ मानोजाम सां होँ गय़ा थां।
"यहसभी छोंड़िये ऑटी। " रितू नें कहा__"मे बस आपसेयह कहना चाहती हूॅ कि अगर आपसेकोई इस बारे मे कुछ भि पूछे तौ आप् यही कहियेगा कि हमनेकोई केस वगैरा नहि किया हैं। यहमत कहियेगा कि मे आपसे याँ विधी सें मिली थि। यहीबात आप् विधी केँ डैड कों भि बता दीजिएगा। मेरीतरफ सें उनसे कहना कि दिल पऱ कोईबोझ याँ मलाल रखने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। बहोत जल्दकुछ ऐसा उन्हें सुनने कों मिलेगा जिससे उनकी आत्मा कों असीम तृप्ति कां एहसास होगा। "
"तुम् क्याँ करने वाली हौ बेटी?" गायत्री कां दिल अनायास हि ज़ोर ज़ोर सें धड़कने लगा थां, बोलीं___"देखो कुछ भि ऐसा वैसा न् करना जिससे पुनः मेरी बेटी पऱ कोई संकट आँ जाए। "
"आप् बेफिक्र रहिएऑटी। " रितू नें गायत्री कां हाथ पकड़कर उसे हल्का सां दबाते हुए कहा___"मे विधी पर्र अब किसी भि तरह कां कोई संकट नहि आने दूॅगी। मुझे भि उसकी फिक्र हैं। "
गायत्री कुछबोल न् सकीबस अजीबभाव सें रितू कों देखती रही। बेड पऱ लेटी विधी कां भि वहीहाल थां। तभी कमरे मे एक् नर्सआई। उसने रितू सें कहा कि डाक्टर साहबउसे अपने केबिन मे बुलारहे हें। रितू नर्स कि बात सुनकर गायत्री सें यहकहकर बाहर् निकल गई कि वो डाक्टर सें मिलकर आती हैं अभि। कुछ हि देर मे रितू डाक्टर केँ केबिन मे उसके सामने टेबल केँ इसपार रखी कुर्सी पर्र बैठी थि।
"कहिए डाक्टर साहब। " रितू नें कहा__"किस लिए आपने बुलाया हैं मुझे?"
"देखो बेटा। " डाक्टर नें गंभीरता सें कहा__"तुम् मेरी बेटी केँ समान होँ। मे तुमको तुम्हारे बचपन सें जानता हूॅ। ठाकुर साहब सें मेरे बहोत अच्छे संबंध हें आज भि। मुझेयह जानकर बेहद खुशी हुइ हैं कि तुम् आज पुलिस आफिसर बन गई होँ। मगर, इस केस मे जिन लोखों पर्र तुमने हाॅथ डालने कां सोचा हैं याँ सोचकर अपनाकदम बढ़ा लिया हैं वोँ निहायत हि बहोत खतरनाक लोग हें। इसलिए मे चाहता हूॅ कि तुम् इसकेस कों यहीं पर्र छोंड़ दो। क्योंकि मे नहि चाहता कि तुम् पर्र कोईऑच आए। तुम् हमारे ठाकुर साहब कि बेटी होँ। "
"मे आपके जज़्बातों कि कद्र करतीहूॅ डाक्टर अंकल। " रितू नें कहा___"मगर आप् बेफिक्र रहिए मैने विधी केँ केस कि कोई फाइल बनाई हि नहि हैं अब तक। क्योंकि मुझे भि पता हैं कि जिनके खिलाफ केस बनाना हैं वोँ केसेलोग हें। इसलिए आप् बेफिक्र रहिए। "
"यह तौ अच्छी बात हैं बेटी। " डाक्टर नें खुश होकर कहा__"मगर तुम् यहाॅ पर्र फिनआई किसलिए हौ? अगरकेस नहि बनाया हैं तौ तुम्हारे यहाॅ पर्र आने कां क्याँ मतलब हैं? जबकि होना तौ यह चाहिये कि तुम्हें इस सबसेदूर हि रहना चाहिए थां। "
"इंसानियत नाम कि कोई चीज़ भि होती हैं डाक्टर अंकल। " रितू नें कहा___"इसी लिएआई हूॅ यहाॅ। वरनायूॅ फारमल ड्रेस मे न् आती बल्कि पुलिस कि वर्दी मे आती। "
"चलो ठीक हैं। " डाक्टर नें कहा__"पऱ ड्रेस बदल देने सें तुम्हारा काम तौ नहि बदल जाएगा नं। आख़िर हररूप मे तौ तुम् पुलिस वाली हि कहलाओगी। अबअगर आरोपी केँ केँ आकाओं कों पताचल जाए कि तुम् यहाॅ हौ तौ वोँ तोँ यही समझेंगे कि तुम् केस केँ सिलसिले मे हि यहाॅआई होँ। "
"देखिए अंकल। " रितू नें कहा___"फारमेलिटी तौ करनी हि पड़ती हैं। वरना पुलिस कि जॉब केँ संग इंसाफ नहि होँ पाएगा। औऱ इसी फाॅरमेलिटी केँ तहत अभि मुझे दिवाकर चौधरी सें भि मिलने जानां हैं। मुझेपता हैं कि वोँ पुलिस कों बहोत तुच्छ हि समझेगा। इसलिए उससेमिल कर मे भि फौरीतौर पऱ यही कहूॅगी कि फाॅरमेलिटी तौ करनी हि पड़ती हैं नं सर। बाॅकी आप् इसबात सें बेफिक्र रहें कि आपके बेटे औऱ उसके दोस्तों कां कोईकेस बनेगा। औऱ केस भि तोँ तभी बनेगा न् जब पीड़िता याँ उसके घरवाले चाहेंगे। अगर वोँ लोग हि केस नहि करना चाहेंगे तौ भला केसेकोई केसबन जाएगा? मेरीइन सभी बातों सें वोँ खुश हौ जाएगा अंकल। वोँ यही समझेगा कि उसके रुतबे औऱ डर सें पीड़िता याँ उसकेघऱ वालों नें उसके खिलाफ़ केस करने कि हिम्मत हि नहि करसके। "
"ओहआई सि। " डाक्टर नें कहा___"मगर मुझेऐसा क्यूं लगता हैं कि असल चक्कर कुछ औऱ हि हैं जिसे तुम् चलाने वाली होँ याँ फिन चलाना शुरुआत भि कर दिया हैं। "
"यहसभी छोड़िये आप् यह बताइये कि आपने औऱ किसलिए बुलाया थां मुझे?" रितू नें पहलूबदल दिया।
"पुलिस कि जॉब मे आते हि बहुत शार्प दिमाग़ हौ जाता हैं न्?" डाक्टर मुस्कुराया फिन सहसा गंभीर होकर बोला___"बात ज़रा सीरियस हैं बेटी। "
"क्याँ मतलब?" रितू चौंकी।
"विधी कि रिपोर्ट आँ चुकी हैं। " डाक्टर नें कहा___"औऱ रिपोर्ट ऐसी हैं जिसके बारे मे जानकर शायद तुम्हें यकीन नं आए। "
"ऐसी क्याँ बात हैं रिपोर्ट मे?" रितू कि पेशानी पऱ बल पड़े___"ज़रा बताइये तोँ सही। "
"विधी कों ब्लड कैंसर हैं बेटी। " डाक्टर नें जैसे धमाका किया___"वोँ भि लास्ट स्टेज मे हैं। "
"क्याऽऽऽ????" रितू बुरीतरह उछल पड़ी___"यह आप् क्याँ कहरहे हें अंकल?"
"यही सच हैं बेटी। " डाक्टर नें कहा___"वोँ बसकुछ हि दिनों कि मेहमान हैं। मुझेसमझ नहि आँ रहा कि यहबात मे उसके पैरेन्ट्स कों केसे बताऊॅ? एक् तोँ वैसे भि वोँ अपनी बेटी कि इस हालत सें बेहद दुखी हें दूसरे अगर उन्हें यहपता चल गय़ा कि उनकी बेटी कों कैंसर हैं औऱ वोँ बसकुछ हि दिनों कि मेहमान हैं तौ जानेउन पर्र इसका क्याँ असर होँ?"
रितू केँ दिलो दिमाग़ मे अभि भि धमाके हौ रहे थें। अनायास हि उसकी ऑखेंनम हौ गई थि। हलाॅकि विधी सें उसकाकोई नाता नहि थां। उसने तोँ बसउसे मित्र कह दिया थां ताकि वो आसानी सें कुछबता सके। बाद मे उसेयह भि पताचल गय़ा कि यहवही विधी हैं जिससे विराज प्रेम करता थां। मगरफिन वोँ दोनोअलग हौ गए थें। रितू केँ मन मे एकाएक हि हज़ारों प्रश्न उभरकर ताण्डव करनेलगे थें।
"इसकेसंग हि विधी जोँ दो महीने कि प्रेग्नेन्ट हैं तोँ उसकेपेट मे पनपरहे शिशु कां भि पतन होँ जाएगा। " डाक्टर नें कहा___"यानी एक् संगदो लोगों कि जानचली जाएगी। "
"यह तोँ सचमुच बहोत बड़ीबात हैं डाक्टर अंकल। " रितू गंभीरता सें बोलि___"पर्र सोचने वालीबात हैं कि इतनीकम उमर मे उसे ब्लड कैंसर होँ गय़ा। "
"आजकलऐसा ऐसा सुनने कों मिलता बेटा जिसकी आम इंसान तोँ क्याँ हम् डाक्टर लोग भि कल्पना नहि कर सकते। " डाक्टर नें कहा___"ख़ैर, मैंने यही बताने केँ लिए तुम्हें बुलाया थां। अभि मुझे मिस्टर चौहान कों भि इसबात कि सूचना देनी होगी। वोँ बेचारे तोँ सुनकर हि गहरे सदमे मे आँ जाएॅगे। "
"आप् सहीकह रहे हें। " रितू नें कहा___"वैसे क्याँ यह कैंसर वालीबात विधी कों पता हैं??"
"पता नहि। " डाक्टर नें कहा___"हौ भि सकता हैं औऱ नहि भि। "
"अच्छा मे चलतीहूॅ अंकल। " रितू नें कुर्सी सें उठतेहुए कहा___"मुझे विधी सें अकेले मे कुछ बातें करनी हैं। "
"ओके बेटा। " डाक्टर नें कहा।
रितू भारीमन सें डाक्टर केँ केबिन सें बाहर् निकल गई। उसेयह बातहजम हि नहि हौ रही थि कि विधी कों लास्ट स्टेज कां कैंसर हैं। उसे विधी केँ लिएइस सबसे बड़ादुख सां होँ रहा थां। उसकेमन मे कईतरह कि बातें चलरही थि। जिनके बारे मे उसे विधी हि बता सकती थि। इसलिए वो तेज़ी सें उस कमरे कि तरफबढ़ गई।
विधी केँ कमरे मे पहुॅच कर रितू नें गायत्री सें बड़े हि विनम्र भाव सें कहा कि उसे विधी सें अकेले मे कुछ बातें करनी हैं। इसलिए अगर आपको ऐतराज़ नं होँ तोँ आप् बाहर् थोड़ी देर केँ लिएचले जाइये। गायत्री उसकीयह बातसुन करकुछ समय तौ उसे देखती रहीफिन कुर्सी सें उठकर कमरे सें बाहर् चली गई। रितू नें दरवाजे कि कुंडी लगा दि औऱ फिन आँ कर वो गायत्री वाली कुर्सी पर्र हि विधी केँ बेड केँ पास हि बैठ गई। विधीउसे बड़े ग़ौर सें देखरही थि। रितू भि उसके चेहरे कि तरफ देखने लगी।
"तौ डाक्टर नें आपकोबता दिया कि मुझे लास्ट स्टेज कां कैंसर हैं?" विधी नें फीकी सि मुस्कान केँ संगकहा थां।
"तुम्हें केसेपता कि डाक्टर नें मुझेकिस लिए बुलाया थां?" रितूमन हि मन बुरीतरह चौंकी थि उसकीबात सें।
"बड़ी सीधी सि बात हैं। " विधी नें कहा__"जब कोई ब्यक्ति मरीज़ बनकर हास्पिटल मे आता हैं तोँ उसकीहर तरह कि जाॅच होती हैं। उसकेबाद यहजान जानां कौन सि बड़ीबात हैं कि मुझेअसल मे क्याँ हैं? यह तौ मे जानती थि कि यहाॅ पऱ मेरी जाॅच हुई होगी औऱ जब उसकी रिपोर्ट आएगी तोँ डाक्टर कों पताचल हि जाएगा कि मुझे लास्ट स्टेज कां कैंसर हैं। इसलिए जब नर्स आपको बुलाने आई तौ मुझे अंदाज़ा हौ गय़ा कि डाक्टर यकीनन आपकोउस रिपोर्ट केँ बारे मे हि बताएगा। इस कमरे मे आते टाइम आपके चेहरे पर्र जौ भाव थें वोँ दर्शा रहे थें कि आप् अंदर सें कितनी गंभीर हें मेरे बारे मे जानकर। इसलिए आपसेकहा ऐसा। "
"यकीनन काबिले तारीफ़ दिमाग़ हैं। " रितू नें कहा___"थोड़े सें सबूतों पऱ केसे कड़ियों कों जोड़ना हैं यह तुमने दिखा दिया। पुलिस विभाग मे होती तौ जटिल सें जटिलकेस बड़ी आसानी सें सुलझा लेती तुम्। "
"आपने तोँ बेवजह हि तारीफ़ कर दि। " विधी नें कहा___"जबकि ऐसाकुछ भि नहि हैं। "
"तौ इसलिए हि तुमने मेरे भइया विराज सें बेवफाई कि थि?" रितू केँ मन मे सबसे अधिकयही प्रश्न उछलरहा थां___"तुमको पहले सें पता थां कि तुम्हें कैंसर हैं इसलिए तुमने यह मार्ग अपनाया। हैं नं?"
"वि विरा.ज??" विधी कां चेहरा फक्कपड़ गय़ा। लाख कोशिशों केँ बाद भि उसकी ज़ुबान लड़खड़ा गई____"ककौन वि.रा.ज? आप् किसकी बातकर रही हें?"
"अबभला झूॅठ बोलने कि क्याँ ज़रूरत हैं विधी। " रितू नें कहा___"मुझे बहोत अच्छी तरहपता हैं कि तुम् मेरे भइया विराज सें आज भि बेपनाह इश्क करती होँ। बेवफाई तौ तुमने जानबूझ कर कि उससे। ताकि वोँ तुम्हारी उस ज़िंदगी सें चलाजाए जौ बसकुछ हि वक्त कि मेहमान थि। उसे अपने सें दूर करने कां यही तरीका अपनाया तुमने। जब मेरेडैड नें उसे औऱ उसके परिवार कों हवेली सें निकाल दियातब तुम्हें भि मौकामिल गय़ा औऱ तुमने उसी मौके मे उससेऐसी बातें कही कि उसे तुमसे नफरत होँ जाए। "
"तोँ औऱ क्याँ करती मे?" विधी केँ अंदर कां बाॅध मानो ज्वारभाॅटा बनकरफूट पड़ा। वो फूटफूट कररो पड़ी। रोतेहुए हि उसने कहा___"मे उसकी ज़िंदगी मे चंद महीनों कि मेहमान थि। वोँ मुझे इतना चाहता थां कि वो मेरे बिना जिंदगी कि कल्पना भि नहि करता थां। प्रेम तोँ मे भि उससे उतना हि करती थि औऱ आज भि करतीहूॅ मगर, उस प्रेम सें क्याँ हौ सकता थां भला? हम् हमेशा संग तौ नहि रह सकते थें नं। मेरीमौत पऱ वो टूट जाता। मैने सोचा कि उसके अंदर सें अपने प्रति चाहत निकाल दूॅ किसीतरह ताकि वोँ किसी औऱ केँ संग अपने जिंदगी मे आगे बढ़ने कां सोचसके। मुझे जोँ सहीलगा वोँ मैने किया। मैने अपने आपको पत्थर बना लिया औऱ उससेउस तरह कि दोटूक बातें कि। उसके अंदर अपने प्रति नफरत पैदा करने केँ लिए मैने सूरजनाम केँ लड़के सें दोस्ती भि करली। मे जानती थि कि सूरज कैसा लड़का हैं मगरअब मेरेपास जिंदगी हि कहाॅबचा थां औऱ नां हि मुझमें जीने कि चाहरह गई थि। मुझेयह भि पता हैं कि मेरेपेट मे सूरज कां हि पाप हैं मगर मुझे इसकीकोई परवाह नहि हैं क्योंकि इसपाप कां भि मेरेसंग हि अंत हौ जाएगा। सूरज नें मेरेबदन कों भोगामगर मेरेदिल मे मेरेमन मे तौ हर जन्म मे मात्र विराज हि रहेगा। "
"यहसभी तोँ ठीक हैं। " रितू नें कहा___"मगर क्याँ तुमने यह नहि सोचा कि तुम्हारे ऐसा करने सें विराज किसहद तक टूटकर बिखर जाएगा? तुमने तोँ यहसोच कर उससे बेवफाई कि कि वो किसी औऱ केँ संग जिंदगी मे आगेबढ़ जाएगा, मगरयह क्यूं नहि सोचा कि अगर उसनेऐसा नहि किया तोँ???"
"मैने बहोत कुछ सोचा थां रितू दिदी। " विधी नें फीकी सि मुस्कान केँ संग कहा___"यह दिल बड़ा हि अजीब होता हैं। कोई हज़ारों बार चाहे इसकेसंग खिलौने कि तरहखेल करइसे टुकड़ों मे बिखेर देफिन भि यह मुहब्बत करनाबंद नहि करता। इसके अंदरहर रूप मे मुहब्बत विद्यमान रहती हैं फिन चाहे वोँ नफरत केँ रूप मे हि क्यूं नं होँ। नफरत सें पत्थर बनजाओ फिन भि मुहब्बत सें पिघल जाओगे। विराज वोँ कोहिनूर हैं जिसेहर लड़की मुहब्बत करना चाहेगी औऱ करती भि थि। मुहब्बत एक् एहसास हैं दिदी, पत्थर भि इस एहसास सें पिघल जाते हें। आपकोफिन सें कब किसी सें इश्क हौ जाएयह आपको भि पता नहि चलेगा। इश्क करने वाला पत्थर दिल मे भि मुहब्बत कां एहसास जगा देता हैं। बसयही सोचकर मैनेयह सभी किया थां। मुझेपता थां उसके जिंदगी मे कोई नं कोईऐसी लड़की अवश्य आँ जाएगी जोँ अपनी इश्क सें उसकी नफरत कों मिटा देगी औऱ फिन सें उसके टूटेहुए दिल कों जोड़कर उसे इश्क करना सिखा देगी। "
"क्याँ पताऐसा हुआ भि हैं कि नहि?" रितू नें कहा___"क्याँ तुमने कभीपता करने कि कोशिश कि कि विराज किसहाल मे हैं?"
"कोशिश करने कां प्रश्न हि कहाॅरह गय़ा दिदी?" विधी नें कहा___"मैंने तोँ यहसभी किया हि उससेदूर होने केँ लिए थां। दुबारा उसकेपास जाने कां याँ यहपता करने कां कि वोँ किसहाल मे हैं यह प्रश्न हि नहि थां। क्योंकि मैने बड़ी मुश्किल सें वोँ सभी किया थां, मुझमें इतनी हिम्मत नहि थि कि मे अपने महबूब केँ दुःखी चेहरे कों दुबारा देख पाती। "
"ख़ैर, यह बताओ कि जब तुमको पताचल गय़ा थां कि तुमको कैंसर हैं तौ तुमने अपने माता पिता कों क्यूं नहि बताया?" रितू नें पहलू बदलते हुए पूछा___"अगर बता देती तौ संभव थां कि तुम्हारा इलाज होता औऱ तुम् ठीक हौ जाती?"
"ऐसा कुछ नं होता दिदी। " विधी नें कहा__"क्योंकि मेरे पिता उस हालत मे हि नहि थें कि वोँ मेरा कैंसर कां इलाज करवा पाते। आप् तौ बसयही जानती हें कि वोँ बड़े व्यक्ति हें मगरयह नहि जानती हें कि उस बड़े व्यक्ति केँ संग उसके बड़े भाईयों नें कितना बड़ा अत्याचार किया हैं? दादाजी जी केँ मरते वक़्त बड़े ताऊ नें धोखे सें सारी प्रापर्टी पर्र उनके हस्ताक्षर करवा लिया। उसकेबाद दादाजी जी कि तेरवीं होने केँ बाद हि अगलेदिन ताऊ औऱ उनके दोगले भइया नें मेरे माता पिता कों सारी प्रापर्टी सें बेदखल कर दिया। अब आप् हि बताइये कि केसे मेरे पिताजी मेरा इलाज करवा सकते थें?"
रितू कों समझ हि न् आया कि वो क्याँ बोले? विधी कि स्टोरी हि ऐसी थि कि वो बेचारी हरतरह सें मजबूर थि। उसकेठीक होने कां कहींकोई चाॅस हि नहि थां।
"अगर मे अपने कैंसर कि बात पिताजी सें बताती तौ वोँ बेचारे बेवजह हि परेशान हौ जाते। " विधीकह रही थि___"जिसकी कंपनी मे लोगकाम करते थें औऱ जौ स्वयं कभी किसी कां मालिक हुआ करता थां वोँ आज स्वयं किसी दूसरे कि कंपनी मे बीस हजार कि जॉब करता हैं। बीस हज़ार मे अपनेतीन बच्चों औऱ स्वयं दोनो प्राणियों कां खर्चा चला लेना सोचिये कितना मुश्किल होगा?ऐसे मे वोँ केसे मेरा इलाज करवा पाते? इससे अच्छा तोँ यही थां दिदी कि मे मर हि जाऊॅ। दो चारदिन मेरेलिए रो लेंगे उसकेबाद फिन सें उनका जिंदगी आगेचल पड़ेगा। "
"इतनी छोटी सि उमर मे इतनी बड़ीसोच औऱ इतना बड़ा त्याग किया तुमने। " रितू कि ऑखों मे ऑसू आँ गए___"यहसभी केसेकर लिया तुमने?"
रितू नें झपटकर उसे अपने सीने सें छुपका लिया। विधी कों उसकेगले लगते हि असीमसुख मिला। भावना मे बह गई वो। वर्षों सें अपने अंदरकैद वेदना कों वो रोंक नं पाई बाहर् निकलने सें। वो हिचकियाॅ लें लेकर रोनेलगी थि।
"मेरी आपसे एक् विनती हैं दिदी। " फिन विधी नें अलग होकरतथा ऑसूभरी ऑखों सें कहा।
"विनती क्यूं करती हैं पागल?" रितू कां गलाभर आया___"तूँ बसबोल। क्याँ कहना हैं तुझेही?"
"मु मुझे एक् बार। " विधी कि रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ मे कहा___"मुझे बसए एक् बार वि.विरा.ज सें मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब सें मिलवा दीजिए दिदी। मे उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये कि माफ़ी माॅगनी हैं। मे उसे बताना चाहती हूॅ कि मे बेवफा नहि हूॅ। मे तौ आज भि उससेटूट टूटकर प्रेम करतीहूॅ। उसे बुलवा दीजिए दिदी। मेरीइछा हैं कि मेराअगर दम निकले तौ उसकी हि बाहों मे निकले। मेरे महबूब कि बाॅहों मे दिदी। आप् बुलवाएॅगी नं दिदी? मुझे एक् बार देख्ना हैं उसे। अपनी ऑखों मे उसकी तस्वीर बसाकर मरना चाहती हूॅ मे। अपने महबूब कि हसीनव मासूम सि तस्वीर। "
"बसकररे। " रितू कां हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहि हैं कि मे तेरीऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मे तुझसे वादा करतीहूॅ कि तेरे महबूब कों मे तेरेपास अवश्य लाऊॅगी। मे धरती आसमान एक् कर दूॅगी विधि औऱ उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मे अभि सें उसकापता लगाती हूॅ। तुँ बस मेरेआने कां इंतजार करना। "
रितू नें कर्सी सें उठकरबेड पऱ लेटी विधी केँ माॅथे कों झुककर चूॅमा औऱ अपनेऑसू पोंछते हुए बाहर् निकल गई।
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फ्लैशबैक अबआगे_______
विजय सिंह खानां पीनाखा कर अपने कमरे मे लेटाहुआ थां। उसके दिलो दिमाग़ सें आज कि घटनाहट हि नहि रही थि। उसे यकीन हि नहि होँ रहा थां कि उसकीमाॅ समान भाभी उसकेसंग इतनी गिरी हुई तथा नीचतापूर्ण हरकतकर सकती हैं। उसकी ऑखों केँ सामने वोँ दृश्य बारबार आँ रहा थां जब प्रतिमा नें उसके लन्ड कों अपनेमुह मे लियाहुआ थां। विजय सिंह अपनी ऑखों केँ सामने इस दृश्य केँ चकराते हि बहोत अजीब सां महसूस करनेलग जाता थां। उसकेमन मे अपनी भाभी केँ प्रति तीब्र घृणा औऱ नफ़रत भरतीजा रही थि।
उधरअजय सिंह औऱ प्रतिमा कों यहडर भि सतारहा थां कि विजय सिंहआज कि इस घटना कां ज़िक्र कहीं किसी सें कर न् बैठे। हलाॅकि उसकी फितरत केँ हिसाब सें उन दोनो कों यहीलग रहा थां कि वोँ इस बारे मे किसी सें कुछ कहेगा नहि। पर्र कहते हें न् कि अपराध कां बोधअगर खुद कों होँ तौ उसका दिमाग़ एक् स्थान स्थिर नहि रह सकता। वही हाल प्रतिमा वअजय सिंह कां थां। दोनो नें फैसला कर लिया थां कि कल हि अपने बच्चों कों लेकरशहर चले जाएॅगे। जबयह घटना पुरानी हौ जाएगी तौ फिनउस हिसाब सें देखा जाएगा।
रात कों सारे कामों सें फुरसत होँ कर गौरीऊपर अपने कमरे मे पहुॅची। बच्चे क्योंकि अब बड़े होँ गए थें इसलिए वोँ सभीअब अलगरूम मे सोते थें। निधि हमेशा कि तरह अपने भाई विराज केँ संग हि सोती थि।
गौरीजब कमरे मे पहुॅची तोँ विजय सिंह कों बेड पर्र पड़ेहुए किसी गहरीसोच मे डूबाहुआ पाया। वोँ खद भि पिछले बहुत दिनों सें महसूस कररही थि कि विजय सिंह बहुत दुःखी व परेशान सां रहनेलगा हैं। उसके द्वारा पूछने पऱ भि उसनेकुछ नं बताया थां।
"पिछले कुछ दिनो कि अपेक्षा आजकुछ ज़्यादा हि परेशान नज़र आँ रहे हें आप्। " गौरी नें बेड केँ किनारे पर्र बैठते हुए लेकिन विजय केँ चेहरे पर्र देखते हुए कहा___"मे जब भि आपसेइस तकलीफ़ कि वजह पूछती हूॅ तौ आप् टाल जाते हें विजयजी। क्याँ आप् पर्र मेरा इतना भि हक़ नहि कि मे आपकेमन कि बातें जान सकूॅ?"
"ऐसा क्यूं कहती हौ गौरी?" विजय नें चौंककर कहा थां___"तुम्हारा तोँ मुझ पऱ साराहक़ हैं। मेरेदिल मे औऱ मेरेमन मे भि। मगर, कुछ बातें ऐसी भि होती हें जिन्हें अगर ज़ुबान सें बाहर् निकाल दि जाएॅ तोँ कयामत आँ जाती हैं। तुम्हारे पूछने पर्र हरबार मे टाल देताहूॅ, यकीन मानो मुझे तुम्हारी बातों कां जवाब नं दे पाने पऱ बेहददुख होता हैं। पर्र मे क्याँ करूॅ गौरी? मे चाहकर भि वोँ सभी तुम्हें बता नहि सकता। "
"अगर आप् बताना नहि चाहते हें विजयजी तौ कोईबात नहि। " गौरी नें गंभीरता सें कहा___"मे तौ बसइसलिए जानना चाहती थि कि मे आपकोइस तरह दुःखी औऱ परेशान नहि देख सकती। हर समय सोचती रहतीहूॅ कि आख़िर ऐसा क्याँ होँ गय़ा हैं जिसकी वजह सें आपके चेहरे कां वोँ नूरखो गय़ा हैं जौ इसके पहले दमकता थां। "
"वक्त हमेशा एक् जैसा नहि रहता। " विजय नें गहरी साॅस ली___"यह तौ बदलता हि रहता हैं औऱ बदलते हुएइस टाइम केँ संग हि इंसान सें जुड़ी हर चीज़ भि बदलने लगती हैं। "
"आपनेकहा कि कुछ बातें ऐसी होती हें जिन्हें अगर ज़ुबान सें बाहर् निकाल दि जाएॅ तौ कयामत आँ जाती हैं। " गौरी नें कुछ सोचते हुए कहा___"मेरे मन मे यह जानने कि तीब्र उत्सुकता जाग गई हैं कि ऐसीभला कौन सि बातें हें जिनके बाहर् आँ जाने सें कयामत आँ सकती हैं? मे तोँ आपकी धर्म पत्नि हूॅ, हमारे बीचआज तक किसी कां कोई राज़ राज़ नहि रहाफिन क्याँ बात हैं कि आजकोई बात मेरे सामने राज़ हि रखरहे हें?"
"मे जानता हूॅ गौरी कि जब तक तुम् उसबात कों जान नहि लोगीतब तक तुम्हारे मन कों शान्ति नहि मिलेगी। " विजय सिंह नें गंभीरता सें कहा___"इस लिए मे तुम्हें वोँ सभीबता हि देताहूॅ मगर उससे पहले तुम्हें मुझे एक् वचन देना होगा। "
"वचन??" गौरी केँ माॅथे पऱ बल पड़ा___"कैसा वचन चाहते हें आप् मुझसे?"
"यही कि जोँ कुछ मे तुम्हें बताने वालाहूॅ उसबात कों कभी किसी सें कहोगी नहि। " विजय सिंह नें कहा___"वोँ सारीबात हम् दोनो केँ बीच हि रहेगी। यहीवचन चाहिए तुमसे। "
"ठीक हैं विजयजी। " गौरी नें कहा__"मे आपकोवचन देतीहूॅ कि आपके द्वारा कही गई किसी भि बात कां ज़िक्र मे कभी किसी सें नहि करूॅगी। "
गौरी केँ वचन देने पऱ विजय सिंहकुछ समय तक उसे देखता रहाफिन एक् लम्बी व गहरी साॅस लेकर उसने वोँ सभीकुछ गौरी कों बताना शुरुआत कर दिया। उसने गौरी सें कुछ भि नहि छुपाया। शुरुआत सें लेकरआज तक कि सारीराम किस्सा उसने गौरी कों विस्तार सें बता दि। उसकेमुख सें यहसभी बातें सुनकर गौरी कि हालत किसी निर्जीव पुतले कि मानिन्द होँ गई। उसके चेहरे पर्र ऐसेभाव थें जैसेउसे इन सारी बातों पऱ ज़रा सां भि यकीन नं हौ रहा हौ।
"आज कि इस घटना नें तौ मुझे अंदर सें बुरीतरह हिलाकर रख दिया हैं गौरी। " विजय सिंह नें कहा___"समझ मे नहि आँ रहा कि क्याँ करूॅ मे? मे सोच भि नहि सकता थां कि वोँ कुलटा स्त्री मेरेसंग इतनीनीच औऱ घटिया हरकत भि कर सकती थि। "
"यहसभी मेरीवजह सें हुआ हैं विजयजी। " गौरी नें नम ऑखों सें कहा___"अगर मे बीमार नाँ होती तौ कभी भि वोँ स्त्री खेतों मे आपको खाने कां टिफिन देने नं जा पाती। आज तोँ मे स्वयं हि आपको खानां लेकरआने वाली थि मगर उसने हि मुझे जाने नहि दिया। कहनेलगी कि अभि मुझे औऱ आराम करना चाहिये। भला मे क्याँ जानती थि कि उसकेमन मे क्याँ खिचड़ी पकरही थि?"
"इसका चरित्र तौ निहायत हि घटिया हैं गौरी। " विजय सिंह नें कहा__"यह बहोत शातिर महिला हैं। इसी नें मेरे भइया कों अपनेरूप जाल मे फॅसाया रहा होगा। मेरे भाई तौ ऐसे नहि हें। वोँ बस इसकी बातों मे हि आँ जाते हें। "
"आपके बड़े भइया कां चरित्र भि कुछठीक नहि हैं विजयजी। " गौरी नें कहा___"होँ सकता हैं कि आपको मेरीइस बात सें बुरालगे मगर सच्चाई तौ यही हैं कि आपके बड़े भइया साहब स्वयं भि आपकी भाभी कि तरह हि चरित्रहीन हें। "
"यह क्याँ कहरही होँ तुम् गौरी?" विजय सिंह नें हैरतअंगेज लहजे मे कहा___"बड़े भाई केँ बारे मे तुम् ऐसा केसेकह सकती होँ?"
"मैनेआज तक आपसे उनके बारे मे यहीसोच कर नहि बताया थां कि आपको बुरा लगेगा। " गौरी नें कहा___"पऱ आजजब आपने अपनी भाभी केँ चरित्र कां वर्णन किया तोँ मैंने भि आपको आपके भइया केँ चरित्र केँ बारे मे बताने कां सोच लिया। "
"आख़िर ऐसा क्याँ किया हैं बड़े भाई नें तुम्हारे संग?" विजय सिंह कां लहजा एकाएक हि कठोर होँ गय़ा, बोला__"मुझे सबकुछ साफसाफ बताओ गौरी। "
गौरी नें विजय सिंह कों शुरुआत सें लेकरअब तक कि बातबता दि। सुनकर विजय सिंहठगा सां बैठारह गय़ा बेड पर्र। ऑखों मे आश्चर्य केँ संगसंग दुख केँ भाव भि नुमायां हौ गए थें।
"पहले मुझेलगा करता थां कि यहसभी शायद मेरावहम हैं। " गौरीधीर गंभीर भाव सें कहरही थि___"पऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे मुझेसमझ आँ गय़ा कि यहवहम नहि बल्कि सच्चाई हैं। जेठ जी कि नीयत मे हि खोट हैं। वोँ अपने छोटे भइया कि पत्नि पर्र ग़लत नीयत सें हाॅथ डालना चाहते हें। "
"यहसभी तुमने मुझे पहले क्यूं नहि बताया गौरी?" विजय सिंह नें कहा___"ईश्वर जानता हैं कि मैंने कभीभूल सें भि अपने बड़े भइयाव भाभी कां कभी बुरा नहि सोचा। बल्कि हमेशा उन्हें राम औऱ सीतासमझ कर उनकामान सम्मान किया हैं। मगर मुझे क्याँ पता हैं कि यह दोनोराम व सीता जैसेकभी थें हि नहि। मे कल हि बाबूजी सें इस बारे मे बात करूॅगा। यहकोई मामूली बात नहि हैं जिसे चुपचाप सहन करते रहें। हमारे आदर सम्मान देने कों वोँ लोग हमारी कमज़ोरी समझते हें। मगरअब ऐसा नहि होगा। माॅ बाबूजी कों इसबात कां पता तौ चलना हि चाहिए कि उनका बड़ा बेटा औऱ बड़ीबहू कैसीसोच रखते हें?"
"नहि विजयजी। " गौरी बुरीतरह घबरा गई थि, बोलीं___"ईश्वर केँ लिए शान्त होँ जाइये। आप् यहसभी माॅ बाबूजी सें बिलकुल भि नहि बताएॅगे। बड़ी मुश्किल सें तोँ उन्हें ऐसादिन देखने कों मिला हैं जब उनके बड़े बेटे औऱ बहू खुशी खुशी हम् सबसेमिल जुलरहे हें। इसलिए आप् यहसभी उनसे बताकर उन्हें फिन सें दुखी नहि करेंगे। "
"क्यूं न् बताऊॅ गौरी?" विजय सिंह नें आवेश मे कहा___"यह ऐसीबात नहि हैं जौ अगलेदिन समाप्त हौ जाएगी बल्कि ऐसी हैं कि यहआगे चलती हि रहेगी। जब किसी कां मनइन बुरी चीज़ों सें भर जाता हैं तोँ वोँ ब्यक्ति किसी केँ लिएफिन अच्छा नहि सोच सकता। अभि तौ यह शुरूआत हैं गौरी। जब आजयहहाल हैं तोँ सोचोआगे केसे हालात होंगे?"
"सभीठीक हौ जाएगा विजयजी। " गौरी नें समझाने वालेभाव सें कहा___"आप् बस उनसेदूर रहियेगा। माॅ बाबूजी सें आप् इस सबका ज़िक्र नहि करेंगे। "
"ज़िक्र तोँ होगा गौरी। " विजय सिंह नें निर्णायक भाव सें कहा___"अब तौ रात बहुत होँ गई हैं वरना अभि इसबात कां ज़िक्र होता। मगर सुभह सबसे पहलेइसी बात कां ज़िक्र होगा। "
"आप् ऐसाकुछ भि नहि करेंगे। " गौरी नें कहा___"आपको हमारे राज कि शपथ हैं विजयजी आप् माॅ बाबूजी सें उनके बारे मे कुछ भि नहि कहेंगे। "
"मेरे बेटे कि शपथ देकर तुमने यहठीक नहि किया गौरी। " विजय सिंह असहाय भाव सें कहा थां।
"मुझेमाफ कर दीजिए विजयजी। " गौरी नें नम ऑखों सें कहा___"पऱ आपको भि तौ सोचना चाहिए थां न्। सोचना चाहिये थां कि इस सबसेमाॅ बाबूजी पऱ क्याँ गुज़रेगी जब उन्हें यहपता चलेगा कि उनका बड़ा बेटा औऱ बड़ीबहू क्याँ करतूत कररहे हें?"
विजय सिंहकुछ नं बोला बल्कि बेड पर्र एक् तरफ करवॅट लेकरलेट गय़ा। गौरी कों समझते देर नं लगी कि विजय सिंह उससे नाराज़ हौ गय़ा हैं। आज जिंदगी मे पहलीबार ऐसाहुआ थां कि विजय सिंह गौरी सें नाराज़ होँ गय़ा थां।
कुछदेर गौरीउसे एकटक देखती रहीफिन वो भि उसकेबगल मे लेट गई। ऑखों मे ऑसू थें औऱ मन मे बस एक् हि बात कि मुझेमाफ कर दीजिए विजयजी।
सुभहजब गौरी कि नीद खुली तौ बगल मे विजय सिंह कों नं पाया उसने। वो समझ गई कि हरदिन कि तरह विजय सिंह खेतों पऱ चलेगए हें। मगर जल्दी हि उसेरात कि बायों कां ख़याल आया। वो एकदम सें हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुइ कि विजय सिंह कहीं अपनीशपथ तोड़कर माॅ बाबूजी सें वोँ सभी बताने तौ नहि चलेगए? यहसोच कर गौरीझट सें बेड सें उठी। अपनी सारी कों दुरुस्त करके वो बिना हाॅथ मुॅहधोए हि कमरे सें बाहर् निकल गई।
नीचेआकर देखा तोँ सभीकुछ सामान्य थां। उसे कहीं पऱ भि कुछ महसूस नं हुआ कि जैसेकुछ बात हुईँ होँ। यहदेख कर उसने राहत कि साॅसली। मन मे खुशी केँ भाव भि जागृत हौ गए, यहसोच कर कि विजयजी नें बेटे कि शपथ नहि तोड़ी।
हवेली केँ मुख्य दरवाज़ा कि तरफ जाकर उसने बाहर् लान मे देखा तौ चौंक पड़ी। बाहर् अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सभी गाड़ी मे बैठरहे थें। ऐसालग रहा थां जैसे वोँ लोगशहर जारहे हों। गौरी कों समझते देर नं लगी कि वोँ लोग इतना जल्द क्यूं यहाॅ सें शहरजा रहे हें। हरबार तोँ ऐसा होता थां कि जब भि उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थें तब वो उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थि। मगरआज उसनेऐसा नहि किया। बल्कि दरवाजे सें जल्दी हि पलट गई वो, ताकि किसी कि नज़र नं पड़ेउस पऱ। जेठ जेठानी केँ लिए उसकेमन मे नफरतव घृणा सि भर गई थि अचानक। वो पलटी औऱ वापस अपने कमरे कि तरफबढ़ गई।
भाग हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
भागदे दिया हैं भइया,,,,,,, भइया यहाॅआते हि थोडा रिलैक्स करनेलगा थां। अब शुरुआत कर दिया हैं लिखना।
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