♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 40 》
अब तक,,,,,,,,
"ओह दिदी सचमुच। " पवन नें कहा__"यह तौ मे भूल हि गय़ा थां। तोँ आप् उसकी सेफ्टी केँ लिए क्याँ करेंगी दिदी?"
"वोँ तुम् मुझ पर्र छोंड़ दो भइया। " रितू नें कहा___"मेरे रहते मेरे भइया कों कोईछू भि नहि सकेगा। "
रितू केँ चेहरे पर्र एकाएक हि कठोरता आँ गई थि। पलक झपकते हि शेरनी कि भाॅति ज़लज़ला नज़रआने लगा थां उसके चेहरे पर्र। पवन सिंह एक् बार कों तोँ काॅप हि गय़ा थां उसेइस रूप मे देखकर।
रितू केँ मन मे यहीसभी फिल्म कि तरहचल रहा थां। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी हवेली कि तरफ दौड़ी जारही थि। उसेपता थां कि उसका बाप विराज कों खोजने केँ लिए अपने आदमियों कों लगाया हुआ हैं। संभव हैं कि अजय सिंह नें अपने आदमियों कों गाॅव हल्दीपुर औऱ शहर गुनगुन मे भि फैलारखा हौ। रितू केँ मन मे केवल एक् हि विचार थां कि विराज कों किसी भि हालत मे अपने बाप औऱ उसके आदमियों कि नज़र मे नहि आने देना हैं। यह उसकी जिम्मेदारी थि कि विराज पऱ किसीतरह कां कोई संकट नं आँ पाए। क्योंकि वास्तविकता तौ यही थि नं कि विराज कों उसने हि पवन सिंह केँ द्वारा बुलवाया हैं।
रितू कि जिप्सी हवेली केँ गेट सें अंदर दाखिल होतेहुए पोर्च मे जाकर रुकी। जिप्सी सें उतरकर वो अंदर कि तरफबढ़ गई।
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अबआगे,,,,,,,,
पवन सें मोबाइल पर्र बात करने केँ बाद मे थोड़ी देर केँ लिए गहरीसोच मे डूब गय़ा थां। मुझेसमझ नहि आँ रहा थां कि पवन नें आख़िर किसवजह सें मुझे गाॅवआने केँ लिएकहा थां? पूछने पऱ भि उसनेकुछ नहि बताया थां। बहुतदेर तक इस बारे मे सोचने केँ बाद भि जब मुझेकुछ समझ न् आया तौ मैने अपने दिमाग़ सें इसबात कों झटककर बाइक स्टार्ट कि औऱ घऱ कि तरफचल दिया।
रास्ते मे मे यहसोच रहा थां कि गाॅव जाने केँ लिएमाॅ सें केसे अनुमति मिलेगी मुझे? क्योंकि मेरे गाॅव जाने कां सुनकर हि उनकेहोश उड़ जानां हैं औऱ यह भि निश्चित थां कि वोँ मुझे गाॅव जाने कि इजाज़त किसी भि हाल मे नहि देंगी। मगर मेरा गाॅव जानां तोँ अब ज़रूरी होँ गय़ा थां।
घऱ पहुॅच कर मैने बाइक कों गैराज मे लगाया औऱ मुख्य दरवाजे केँ पास आँ गय़ा। डोरबेल पर्र उॅगली सें पुश किया। अंदरबेल कि आवाज़ गई। कुछ हि पलों मे दरवाजा खुला। मेरीमाॅ मेरे सामने दरवाजा खोलकर खड़ी थि। मुझ पऱ नज़र पड़ते हि उनके गुलाबी होंठो पऱ मुस्कान फैल गई।
"आँ गय़ा मेरा बेटा। " माॅ नें मेरेसिर सें लेकर चेहरे तक अपना हाॅथ फेरते हुए कहा__"चल आजा हम् सभी तेरेआने कां हि इन्तज़ार कररहे थें। "
मे केँ संग चलतेहुए ड्राइंग रूम मे पहुॅचा। वहाॅ पऱ रखे सोफों पर्र जगदीश अंकल औऱ अभय चाचा बैठेहुए थें। निधि शायद अपने कमरे मे थि।
"तोँ कैसारहा हमारे राज कां काॅलेज मे पहलादिन?" जगदीश अंकल नें मुस्कुरा कर कहा___"आई होप, बहोत हि बेहतर रहा होगा। "
"आपनेसही कहा अंकल। " मैने एक् सोफे पर्र बैठते हुए कहा___"औऱ आपकोपता हैं आज पहले हि दिन मेरी दोस्ती कुछखास लोगों सें होँ गई हैं। "
"ओहयह तोँ बहोत अच्छी बात हैं बेटे। " अंईल नें कहा___"वैसे मैने सुना हैं कि काॅलेजों मे रैगिंग वगैरा होती हैं। जिसमें सीनियर स्टूडेन्ट्स अपने जूनियर्स कों कईतरह सें परेशान करते हें। सो तुम्हें तौ किसी सीनियर नें परेशान नहि किया न्?"
"नहि अंकलऐसा कुछ नहि थां औऱ थोडा बहोत तौ चलता हैं। " मैनेकहा।
"वैसेराज क्याँ नीलम सें भि तुम्हारी मुलाक़ात हुईँ क्याँ?" अभय चाचा नें पूछा।
"हाॅ चाचा जी। " मैने कहा___"मगर बस हमने एक् दूसरे कों देखा हि हैं। कोईबात चीत नं मैने कि उससे औऱ नां हि उसने। "
"तुम्हें वहाॅ पऱ देखकर हैरान तौ बहोत हुइ होगी वोँ। " चाचा नें कहा___"औऱ अब वोँ अवश्य मोबाइल करके बड़े भाई कों बताएगी कि तुम् भि उसी काॅलेज मे पढ़रहे होँ। उसकेबाद ईश्वर हि जाने कि क्याँ होगा?"
"कुछ नहि होगा भइया साहब। " सहसा जगदीश अंकल नें कहा___"यह मुम्बई हैं मुम्बई। यहाॅ पर्र आपके बड़े भइया साहब कां राज नहि चलेगा। यहाॅअगर उन्होंने राज कों छूने कि भि कोशिश कि तौ समयभर मे उनको नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा। "
जगदीश अंकल कि बातसुन करअभय चाचा कुछ नं बोले। कदाचित वोँ समझगए थें कि जगदीश अंकलसच कहरहे थें। आज केँ समय मे मे कोई मामूली इंसान नहि थां। बल्कि मुम्बई शहर केँ टाॅपधन कुबेरों मे मेरानाम दर्ज़ हौ चुका थां।
ख़ैर, इन सभी बातों केँ बीच मे यहसोच रहा थां कि गाॅव जाने कि बातमाॅ सें केसे कहूॅ? मेरेपास वैसे भि ज़्यादा वक़्त नहि रह गय़ा थां। मे अपनी स्थान सें उठकरमाॅ केँ पास उनके सोफे पऱ बैठ गय़ा। मुझे अपनेपास बैठते देखमाॅ नें प्रेम सें एक् बारफिन मेरेसिर पऱ हाॅथ फेरा। मेरे चेहरे कि तरफकुछ समय देखने केँ बाद कहा___"क्याँ बात हैं राज?कुछ कहना हैं क्याँ तुम्हारी तरफ?"
"वोँ माॅ वोँ.मुझे न्.वोँ मुझे। " मेरी आवाज़ फंस सि रही थि___"मुझे नं आज औऱ इसी वक्त गाॅव जानां होगा। बहोत ज़रूरी हैं। "
"क्याँ?????" माॅ मेरीबात सुनकर उछल हि पड़ी थि, बोलि__"यह तुँ क्याँ कहरहा हैं? नहि हर्गिज़ नहि। तुँ गाॅव नहि जाएगा। तेरेमन मे गाॅव जाने कां ख़याल आया केसे?"
मेरीबात सें माॅ तौ उछली हि थि लेकिन उनकेसंग हि संग जगदीश अंकल औऱ अभय चाचा भि बुरीतरह चौंके थें।
"यह तुम् क्याँ कहरहे होँ राज?" जगदीश अंकल नें हैरानी सें कहा___"तुम्हें गाॅवकिस लिए जानां हैं? आख़िर ऐसा क्याँ ज़रूरी काम आँ गय़ा?"
"वोँ पवन कां मोबाइल आया थां मुझे काॅलेज सें आते वक़्त। " मैने कहा___"पवन मेरा बचपन कां बहोत हि गहरायार हैं। उसी कां मोबाइल आया थां। उसने मुझे अर्जेटली गाॅव बुलाया हैं। मैने उससेवजह पूछीमगर उसनेबस इयना हि कहा कि तुँ बसआजा। "
मैनेउन सबकोपवन सें हुइ सारीबात बता दि। मेरी बातें सुनने केँ बाद ड्राइंगरूम मे सन्नाटा सां छा गय़ा।
"किसी कां भि मोबाइल हौ औऱ चाहे जितना भि ज़रूरी हौ। " माॅ नें सन्नाटे कों चीरते हुए कहा___"तुँ गाॅव नहि जाएगा बस। मे तुम्हे मौत केँ मुह मे जाने कि हर्गिज़ भि इजाज़त नहि दूॅगी। "
"मगर तुम्हारे यार कों कोईवजह तौ बताना हि चाहिये थां राज। " जगदीश अंकल नें कहा___"भला यह क्याँ बात हुईँ कि मोबाइल घुमा दिया औऱ कह दिया कि तुम्हें यहाॅ आनां हैं बस?"
"कहींऐसा तोँ नहि भइया साहब कि राज कां यारअजय भाई केँ हाथलग गय़ा हौ औऱ यहसभी बातें उसने उनके हि कहने पर्र कि हों?"अभय चाचा नें कुछ सोचते हुए कहा___"यकीनन ऐसा होँ सकता हैं। उन्होंने कहीं सें पताकर लिया होगा कि गाॅव मे राज कां कोईयार हैं जौ अक्सर राज सें मोबाइल पऱ बातें करता रहता हैं। इसलिए उन्होंने उसे पकड़ लिया होगा औऱ डरा धमकाकर मोबाइल करवाया होगा। "
"आपकी बातों मे यकीनन वजन हैं भइया साहब। " जगदीश अंकल नें कहा___"यकीनन ऐसाहुआ होगा। उन्होंने राज केँ साथी कों मजबूर किया होगाइस सबकेलिए। "
"उसनेजब मुझसे मोबाइल पर्र बात कि थि तबऐसा बिलकुल भि नहि लगरहा थां कि वोँ किसी केँ द्वारा मजबूर किया गय़ा हैं। " मैने कहा___"वोँ बिलकुल नार्मली हि बातें कररहा थां। हाॅ थोडा थोडा दुखी औऱ दुःखी सां अवश्य समझ मे आँ रहा थां। "
"यहसभी बातें छोंड़िये आप् लोग। " सहसामाॅ नें कहा___"राज कहीं नहि जाएगा बस। यह मेरा आख़िरी फ़ैसला हैं। "
"मगर बेहन। " जगदीश अंकल नें कहा___"पता तौ चलना हि चाहिए कि बात क्याँ हैं? मानलो कि सचमुच कोईऐसी बात होँ जिससे राज कां वहाॅ पर्र जानां बहोत ज़रूरी हि होँ तब क्याँ? यहसभी संभावनाएॅ हें। हमें सच्चाई जानना ज़रूरी हैं। एक् कामकरो राज तुम् अभि अपने साथी कों मोबाइल लगाओ औऱ उससेबात करो। हम् सभी सुनेंगे कि बात क्याँ हैं। "
मुझे जगदीश अंकल कि बातसही लगीइस लिए मैने मोबाइल निकाल कर जल्दी पवन कों मोबाइल लगाकर स्पीकल ऑनकर दिया। कुछ देर मोबाइल कि रिंग जाने कि आवाज़ आतीरही।
"हाॅ भइयाचल दिया क्याँ वहाॅ सें?" उधर सें पवन कां स्वर उभरा।
"दोस्त मेरीसमझ मे यह नहि आँ रहा कि आख़िर ऐसा क्याँ ज़रूरी काम हैं जिसकी वजह सें तूने मुझे वहाॅ अर्जेंट बुलाया हैं?" मैनेकहा।
"मेरे भइया मे तुम्हें मोबाइल पऱ नहि बता सकता। तुँ बसआजा औऱ स्वयं अपनी ऑखों सें देखसुन लें। " उधर सें पवन अधीरभाव सें कहरहा थां___"मुझे पता हैं भइया कि तेरा यहाॅ पऱ आनां खतरे सें खाली नहि हैं। मे स्वयं भि तुम्हें किसीऐसे खतरे मे डालने कां सोच भि नहि सकता। मगर भइयाबात हि ऐसी हैं कि तुम्हे बुलाना पड़रहा हैं यहाॅ। भइया तुझेही हमारी दोस्ती कि शपथ हैं, तूँ आजा भइया। चाहेदो लम्हा केँ लिए हि आजा लेकनआजा भइया। मे तेरे हाॅथ जोड़ता हूॅ, तुँ आजा मेरे दोस्त। "
"अच्छा यहबता कि तूँ किसी केँ दबाव मे याँ किसी केँ द्वारा मजबूर होँ कर तौ नहि बुलारहा न् मुझे?" मैने बाॅकी सबकीतरफ नज़रें घुमाकर देखते हुएकहा थां।
"यह तुँ क्याँ कहरहा हैं राज?"पवन केँ स्वर मे हैरानी थि, बोला___"भइया तुँ सोच भि केसे सकता हैं कि मे किसी केँ द्वारा मजबूर होकर तुम्हारी तरफ खतरे मे डाल दूॅगा? मे मर जाऊॅगा भइयामगर ऐसाकभी नहि कर सकता। "
"चल ठीक हैं भइया मे आने कि कोशिश करूॅगा। " मैनेकहा।
"कोशिश नहि भइया। "पवन नें कहा__"तेरी अवश्य आनां हैं। कल मे तुम्हें बस स्टैण्ड पर्र हि मिलूॅगा। तेरे बड़े पिताजी केँ व्यक्ति बहुत टाइम सें यहाॅआस पास नहि दिखे हें। शायद उन्हें यकीन होँ गय़ा हैं कि अब तुँ गाॅव नहि आएगा। किसी कों कानोकान खबर नहि होगी तेरेआने कि। तुँ फिक्र मतईर भइया। तुँ बसआजा। "
"चलठीक हैं। " मैनेकहा औऱ मोबाइल काट दिया।
"तुम्हारे मित्र कि बातचीत सें तौ साफपता चलता हैं कि वोँ यहसभी किसी केँ द्वारा मजबूर होकर नहि बल्कि अपनी स्वेच्छा सें कहरहा हैं। " जगदीश अंकल नें कहा___"मगर अब प्रश्न यही हैं कि आख़िर किस अर्जेन्ट काम केँ लिए उसने तुम्हें गाॅवआने केँ लिएकहा होँ सकता हैं? उसनेइस बारे मे कुछ भि नहि बताया। बसयही कहा कि तुम् स्वयं अपनी ऑखों सें देखसुन लो। भला ऐसी क्याँ बात हौ सकती हैं जिसे अपनी ऑखों औऱ कानों सें देखने सुनने कि बात कि उसने?"
"यह तोँ वहाॅ जाकर हि पता चलेगा अंकल। " मैने कहा___"मेरा यहयार ऐसा हैं कि मेरे बारे मे कभी भि अहित नहि सोच सकता। यही वोँ मित्र हैं जिसने अब तक मुझे हवेली मे रहने वाले लोगों कि लम्हा लम्हा कि ख़बर दि। चाचा जीजब आप् यहाॅ आँ रहे थें तब भि इसी नें मोबाइल करके मुझे बताया थां कि आप् यहाॅ आँ रहे हें। हवेली मे कुछबात हौ गई थि जिसकी वजह सें हवेली मे उस वक़्त तनाव होँ गय़ा थां। "
"कोई भि वजह होँ तुँ गाॅव नहि जाएगा मेरे बच्चे। " माॅ कि ऑखों मे ऑसू आँ गए__"मे तुम्हें नहि जाने दूॅगी। तूँ यहीं मेरी नज़रों केँ सामने हि रहेगा। "
"आपकी इजाज़त केँ बिना तौ मे वैसे भि कहीं नहि जाऊॅगा माॅ। " मैनेमाॅ कि ऑखों सें ऑसू पोंछते हुए कहा___"मगर यह तौ आपको भि पता हैं न् कि जौ खेल शुरुआत होँ चुका हैं उसको अंजाम तक लेँ जानां मेरा संकल्प हैं औऱ फर्ज़ भि। आपका बेटा नं पहले कायर औऱ बुजदिल थां औऱ नाँ हि अब हैं। उन्होंने धोखे सें हम् पऱ वार किया थां जबकि मे सामने सें उनके सीने पऱ वार करूॅगा। "
"ऐसा हि होगाराज बेटे। "अभय चाचा नें कहा___"मुझे सारी सच्चाई कां भाभी सें पताचल चुका हैं। इसलिए अबइस लड़ाई मे मे भि तुम्हारे संगहूॅ। बस चिंता एक् हि बात कि हैं कि तेरी चाची औऱ तेरे भइया बेहनभले हि तेरे मामाजी जी केँ यहाॅ हें मगर वोँ सुरक्षित नहि हें वहाॅ। काश! मुझेपता होता तौ उन्हें भि अपनेसंग हि लें आता यहाॅ। "
"अभि भि कुछ नहि बिगड़ा हैं भइया साहब। " जगदीश अंकल नें कहा___"करूणा बेहन औऱ उसके बच्चों कों सुरक्षित यहाॅ बुलाया जा सकता हैं। "
"वोँ केसे भइया साहब?" चाचा जी केँ माथे पर्र बल पड़ता चला गय़ा।
"गौरी बेहन। " जगदीश अंकल नें माॅ कि तरफ देखते हुए कहा___"तुम् राज कि ज़रा भि फिक्र मतकरो। राज यहाॅ सें गाॅव अवश्य जाएगा मगर अकेला नहि। मे राज केँ संग एक् ऐसे व्यक्ति कों भेजूॅगा जौ हर लम्हा राज केँ संग उसका सुरक्षा कवचबन कर रहेगा। अभय भइया साहब अपने ससुराल मे मोबाइल कर देंगे, औऱ समझा देंगे कि केसेउन लोगों कों वहाॅ सें यहाॅ आनां हैं। "
"भाई आप् भि??" माॅ नें फिक्रमंदी सें कहा___"आप् भि इसे भेजने कि हि बातकर रहे हें?"
"मेरी बेहन मैनेकहा न् तुम् राज कि बिलकुल भि चिंता नं करो। " जगदीश अंकल नें कहा___"राज अगर तुम्हारा बेटा हैं औऱ तुम्हारे प्राण उस पर्र बसते हें तौ यहसमझ लो कि मेरे प्राण भि राज पर्र हि बसते हें। मे राज केँ ऊपरलेश सिर्फ कां भि खतरा नहि चाह सकता। मगर मे यह भि जानता हूॅ कि राज केँ सामने प्रेम औऱ ममता कि दीवार खड़ी करकेउसे उसके कर्तब्य पथ पर्र जाने सें रोंकना भि उचित नहि हैं। खतरा तौ इंसान केँ जिंदगी कां एक् हिस्सा हैं बेहन। इंसान कां हरदिन एक् नया जन्म होता हैं औऱ हरदिन एक् मृत्यु होती हैं। सुभह कि पहली किरण केँ संग हि इंसान केँ नये जिंदगी कि शुरूआत होँ जाती हैं औऱ फिनजब इंसान रात मे सो जाता हैं तौ वो एक् तरह सें मृत समान हि होँ जाता हैं। ख़ैर, मे यहकहरहा हूॅ कि तुम् अपनेइस भइया पर्र यकीनरखो। मे राज पऱ किसी भि तरह कां संकट नहि आने दूॅगा। "
जगदीश अंकल कि बातसुन करमाॅ कुछ नं बोलि। बस ऑखों मे नीरभरे देखती रही उन्हें।
"राज तुम् जाने कि तैयारी करो। " जगदीश अंकल नें कहा___"तब तक मे भि उस व्यक्ति कों मोबाइल कर केँ बुला लेताहूॅ औऱ तुम् दोनो केँ लिए ट्रेन कि टिकट कां भि इंतजाम कर देताहूॅ। "
जगदीश अंकल कि बातसुन कर मैनेमाॅ कि तरफ देखा। माॅ नें अपनेसिर कों हल्का सां हिलाकर मुझे जाने कि इजाज़त दे दि। मे जल्दी हि उठकर अपने कमरे कि तरफ तेज़ी सें बढ़ गय़ा। करीब-करीब पन्द्रह मिनटबाद मे रेडी होकरतथा एक् छोटे सें पिट्ठू बैग मे कुछ कपड़े वकुछ ज़रूरी चीज़ें डालकर कमरे सें बाहर् आँ गय़ा।
कमरे सें बाहर् आकर मुझे निधि कां ख़याल आया। मे उसके कमरे कि तरफबढ़ गय़ा। दरवाजे कों बाहर् सें नाॅककर उसे आवाज़ दि मगर अंदर सें कोई प्रतिक्रिया नं हुईँ। मैंने दरवाजे कों अंदर कि तरफ धकेला तोँ वोँ खुलता चला गय़ा। कमरे केँ अंदर दाखिल होकर मैने देखा कि निधिबेड पर्र करवॅट लिएसो रही थि। सोतेहुए वोँ बिलकुल मासूम सि बच्ची लगरही थि। मुझेउस पर्र बड़ा प्रेम आया। मैनेझुक कर उसके माथे पर्र हल्के सें चूॅमा औऱ फिन झुकेहुए हि कहा___"अपना ख़याल रखना गुड़िया। मे गाॅवजा रहाहूॅ अभि। जल्द हि वापस आऊॅगा। "
इतनाकह कर मैंने एक् बारफिन सें उसके माथे कों चूमाफिन पलटकर कमरे सें बाहर् आँ गय़ा। इसबात सें अंजान कि मेरे बाहर् आते हि निधि नें अपनी ऑखेंखोल दि थि। उन समंदर सि गहरी ऑखों मे ऑसूतैर रहे थें।
ड्राइंगरूम मे जब मे पहुॅचा तौ देखा एक् अंजान ब्यक्ति एक् तरफ सोफे पऱ बैठा थां। दिखने मे हट्टा कट्टा थां। ऊम्रयही कोईतीस याँ पैंतीस केँ बीचरही होगी उसकी। चेहरे पर्र पत्थर जैसी कठोरता विद्यमान थि। जबड़े कसेहुए लगरहे थें।
"राज बेटा इनसे मिलो। " मुझे देखते हि जगदीश अंकल नें उस ब्यक्ति कि तरफ इशारा करतेहुए कहा___"यह हें आदित्य चोपड़ा। यह बहुत अच्छे मार्शल आर्टिस्ट हें। यह सबको सिक्योरिटी प्रोवाइड करते हें। मैने इन्हें सबकुछ समझा दिया हैं। अब सें यहहर लम्हा तुम्हारे संग तुम्हारा सायाबन कर रहेंगे। "
"ओह हैलो। " मैने कहने केँ संग हि उसकीतरफ हैण्ड शेक करने केँ लिएहाथ बढ़ाया। उसने भि हैलो करतेहुए मुझसे हाथ मिलाया। उसके हाॅथ मिलाने सें हि मुझे महसूस हौ गय़ा कि यह व्यक्ति बहुतठोस व मजबूत हैं।
ख़ैर सबसे आशीर्वाद लेकर मे बाहर् कि तरफचल दिया। मेरेसंग हि बाॅकी सभी भि बाहर् आँ गए। वाहन कि तरफ जाने सें पहलेमाॅ नें मुझे अपने सीने सें लगाकर प्रेम दिया। आदित्य नें वाहन कि ड्राइविंग शीट सम्हाली। जबकि मे औऱ जगदीश अंकल वाहन कि पिछली शीट पऱ बैठगए। उसकेबाद वाहन रेलवे स्टेशन कि तरफ तेज़ी सें बढ़चली। जगदीश अंकल मेरेसंग इसलिए थें ताकि वापसी मे वोँ स्टेशन सें गाड़ी वापसला सकें।
रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैने जगदीश अंकल कों वापसघऱ जाने कां कह दिया। उन्होंने मुझेकुछ हिदायतें दि औऱ शुभकामनाएॅ भि। उनके जाने केँ बाद मे औऱ आदित्य प्लेटफार्म कि तरफबढ़ गए। प्लेटफार्म मे जब हम् पहुॅचे तोँ ट्रेन जाने हि वाली थि। इसलिए हम् दोनोएसी फर्स्ट क्लास कि तरफ दौड़चले। कुछ हि देर मे हम् दोनो अपनी अपनी शीटों पर्र आँ गए थें।
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काॅलेज मे हुइ घटना सें नीलम मानसिक रूप सें बहुत दुखी हौ गई थि औऱ जिसतरह सें विराज नें वहाॅ पर्र आकर उसकी इज्ज़त कों तारतार होने सें बचाया थां वोँ उसकेलिए निहायत हि अविश्वसनीय थां। उसने तौ कल्पना भि नं कि थि कि उसके चाचा कां लड़का यानी कि उसका भइया जौ उमर मे उससे केवलदस दिन बड़ा थां वोँ यहाॅ पर्र आएगा औऱ इसतरह सें उसकी इज्ज़त कों मिट्टी मे मिल जाने सें बचाएगा।
उसने तौ माॅमडैड केँ मुख सें अक्सर यही सुना थां कि विराज मुम्बई मे किसी होटेल याँ ढाबे मे कप प्लेट धोता होगा। मगर मुम्बई केँ इतने बड़े काॅलेज मे जहाॅ पर्र एडमीशन लेने केँ लिएहाई पर्शेन्टेज मार्क्स कां होना औऱ अच्छे खासे पैसे कां होना अनिवार्य थां उस काॅलेज मे विराज कों एक् स्टूडेंट केँ रूप मे देखकर नीलम केँ आश्चर्य कि कोई सीमा न् रही थि।
विराज कों अपनेइस काॅलेज मे देखकर नीलम कों यह तोँ समझ मे आँ गय़ा थां कि उसके माॅमडैड विराज केँ बारे मे जोँ सोच औऱ विचार रखेहुए हें वोँ सिरे सें हि ग़लत हैं। आज काॅलेज मे हुईँ घटना केँ बाद नीलम जैसे पत्थर कि मूर्ति मे परिवर्तित हौ गई थि। उसने देखा थां कि केसे विराज नें उन लड़कों कों दो मिनट मे धूल चटाया थां उसकेबाद उसने उसका दुपट्टा उसे लौटाया थां। लेकिन जब उसने देखा कि जिसे वो दुपट्टा देरहा थां वोँ उसी कि चचेरी बेहन थि तोँ उसने जल्दी उससेमुह फेर लिया थां औऱ उसकेपास सें चला गय़ा थां।
नीलम कों तोँ बहुतदेर तक कुछसमझ न् आया थां कि वो क्याँ करे? वोँ तौ बुतबन गई थि। अपने भइया केँ सामने उसकी स्थित दो कौड़ी कि न् रह गई थि। उस भइया केँ सामने जिसे उसके माॅमडैड दो कौड़ी कां भि नहि समझते थें औऱ वोँ स्वयं भि कभीउसे अपने भइया कां दर्जा नहि देती थि।
बहुतदेर बादजब नीलम कि तंद्रा टूटी तोँ वो बदहवास सि होकर कंटीन कि तरफ खिंची चली गई थि। मगर कंटीन मे जोँ नज़ारा उसे देखने कों मिला उसनेउसे औऱ भि ज़्यादा हैरान कर दिया। जिस विराज कों वोँ आज तक एक् सीधा सादा औऱ दो कौड़ी कां भि नहि समझती थि वोँ आज इतना खतरनाक दिखरहा थां कि आशू राना केँ हट्टे कट्टे भइया कों अधमरा कर दिया थां। उसकी ऑखों केँ सामने उसने भूषण कों पहले तोँ अधमरा किया औऱ फिनउसे स्वयं हि आशू केँ संग हास्पिटल भि लेँ गय़ा।
काॅलेज मे पहलेदिन हि इसतरह कि घटना सें सनसनी सि फैल गई थि। वोँ स्वयं भि मानसिक रूप सें ब्यथित थि इसलिए वो काॅलेज सें सीधा अपनी बड़ी मौसी पूनम केँ घऱचली गई थि। इस टाइम वो अपने कमरे मे बेड पर्र पड़ी हुइ थि। उसकी ऑखेंऊपर छत पऱ घूमरहे पंखे कों अपलक देखेजा रही थि।
नीलम कि ऑखों केँ सामने बारबार वही मंज़र आँ रहा थां। उसे अभि भि यकीन नहि होँ रहा थां कि वोँ विराज हि थां। उसेऐसा लगरहा थां जैसे उसने खुली ऑखों सें कोई सपने देखा थां। मगर हकीक़त उसे अच्छी तरहपता थि। काॅलेज सें जल्द आँ जाने पर्र उसकी मौसी नें पूछा थां कि इतना जल्द काॅलेज सें केसे आँ गई वो? मगर उसनेगोल मोल जवाबदे दिया थां औऱ सीधा अपने कमरे मे बेड पर्र लेट गई थि।
वो विराज सें नफ़रत तोँ नहि करती थि लेकिन हाॅउसे वो अपना भइया भि नहि मानती थि औऱ नां हि उसकी नज़र मे उसकीकोई अहमियत थि। उसके माॅमडैड बचपन सें हि यह हिदायत देते थें कि विराज, निधि औऱ उसकेमाॅ बाप अच्छे लोग नहि हें। इनसे न् कभीबात करना औऱ नाँ हि कभी इनकेपास जानां। यह हमारे कुछ नहि लगते हें। बचपन सें एक् हि पाठ पढ़ाया गय़ा थां इन्हें। टाइम केँ संगसंग उसीतरह कि सोच भि बन गई थि इनकी। हालात ऐसे बनाएगए थें कि इन लोगों नें कभीयह सोचा हि नहि कि हम् जिनके बारे मे ऐसी धारणा बनाए बैठे हें वोँ वास्तव मे वैसे हें भि याँ नहि? वक़्त गुज़रा औऱ फिन वोँ सभी हादसे हुए जिनसे इनकीसोच मे औऱ भि ज़्यादा वोँ सभी बातें बैठगईं।
मगरआज केँ हादसे नें नीलम केँ अस्तित्व कों हिलाकर रख दिया थां। उसेउस सोच औऱ धारणा केँ महासागर सें बाहर् निकाल दियाजिस महासागर मे आज तक वोँ डूबी हुई गोतेलगा रही थि। कहते हें कि वक्त हमेशा एक् जैसा नहि रहता। टाइम बदलता रहता हैं औऱ बदलते हुए टाइम केँ संग हि संग इंसान कि सोच भि बदलती रहती हैं। कुछलोग ऐसे होते हें जोँ एक् हि बात कों गाॅठ बाॅधकर जिंदगी भर ढोते रहते हें। उन्हें किसी कि बातसही नहि लगती। वोँ हमेशा अपनी हि सोच कों यथार्थ औऱ हकीक़त मानकर जीते हें। उन्हें अपनीसोच औऱ धारणा केँ ग़लत होने कां तबपता चलता हैं जब वक़्त स्वयं उन्हें आईना दिखाता हैं याँ एहसास कराता हैं।
नीलम केँ पासआज वही वक़्त आईना दिखाने आया थां औऱ आईना दिखाकर उसनेउसे एहसास करा दिया थां कि अब तक वोँ कितना ग़लत थि जौ अपने माता पिता केँ द्वारा मिलीसीख औऱ निर्देशों पर्र चलरही थि। समय नें आकरउसे आईना दिखाया, एहसास कराया औऱ उससे एक् प्रश्न भि कर गय़ा कि 'अगरयह इतना हि बुरा होता तौ आज किसी काॅलेज मे किसी लड़की कि इज्ज़त बचाने केँ लिए इतनी भीड़ मे सें अकेला नहि आता। यह तोँ उसेबाद मे पताचला कि वोँ लड़कीकोई औऱ नहि बल्कि उसकी बेहन हि थि। अपनीजान कों खतरे मे डालकर आज केँ युग मे कौन किसी केँ लिएऐसा करता हैं? यह तौ वहीकर सकता हैं जौ सच्चा होता हैं औऱ जोँ किसी बेकसूर व मजलूम पर्र अत्याचार होते नहि देख सकता। बल्कि अत्याचार करने वाले सें भिड़ जाता हैं फिन चाहेभले हि स्वयं उसकीजान हि क्यूं नं चलीजाए।
नीलम कि ऑखों केँ सामने बचपन सें लेकरअब तक कि सारी यादें किसी फिल्म कि तरह चलनेलगी। उसेयाद आया कि एक् बार हवेली मे उससे एक् कीमती मूर्ति गिरकर टूट गई थि, उससमय नीलम औऱ शिवा हि थें। आवाज़ सुनकर विराज भि आँ गय़ा थां। वोँ मूर्ति केँ टुकड़ों कों पास सें जाकर देखने लगा थां। उसी वक़्त विजय चाचा औऱ नैना फूफी भि आँ गई थि। विजय चाचा नें मूर्ति कों टूटकर बिखरी हुई देखकर पूछा थां कि यह किसने तोड़ा तोँ शिवा जोँ कि छोटा हि थां उससमय उसने भोलेपन मे डर कि वजह सें जल्दी नीलम कि तरफ उॅगली कर दिया थां। मगरतभी विराज नें कहा थां कि उससे हि गिरकर टूट गई थि वोँ मूर्ति। उसकीबात सुनकर विजय चाचा नें विराज कि बहुत अधिक पिटाई कर दि थि। विराज पिटता रहामगर मुख सें यह न् बताया थां कि मूर्ति असल मे नीलम सें टूटी थि।
ज़ोरदार पिटाई केँ चलते विराज कि हालत ख़राब हौ गई थि, जबकि वोँ औऱ उसके भइया बेहन उसकेपिट जाने पऱ बहोत खुश थें। एक् बारअजय सिंह कि जेब सें शिवा नें पैसे चुरालिए थें औऱ चुराकर शिवा नें कमरे मे सोरहे विराज कि शर्ट कि जेब मे वोँ रुपया डाल दिया थां। यहसभी मात्र इसलिए मिलीभगत द्वारा किया गय़ा थां ताकि विराज कि फिन सें पिटाई होँ औऱ वहीहुआ भि। शिवा नीलम कों लेकर अपने बाप केँ पास गय़ा औऱ उससे बोला कि डैड विराज नें आपकीजेब सें रुपया चुराया हैं जिसे उसने अपनी ऑखों सें देखा हैं। बसफिन क्याँ थां अजय सिंह कों तोँ एक्सक्यूज़ चाहिए होता थां विजय सिंह औऱ उसके बच्चों कों उल्टा सीधा बोलने केँ लिए। तलाशी मे वोँ रुपया विराज कि शर्ट कि जेब मे मिल हि गय़ा। उसकेबाद विजय सिंह नें सोतेहुए विराज कि पिटाई शुरुआत कर दि। बेचारे कों समझ हि नं आया थां कि वोँ किसबात पऱ मारखा रहा थां। जबकि उसकी पिटाई सें नीलम शिवा औऱ रितूयह तीनों बड़ाखुश होँ रहे थें।
ऐसी बहोत सि बातें थि जौ इस वक़्त नीलम कि ऑखों केँ सामने घूमरही थि। विराज मे एक् खासियत यह थि कि वोँ अपनी सफाई मे कभीकुछ नहि बोलता थां। मार खाने केँ बाद औऱ इतना अधिक जलील होने केँ बाद भि वो इन लोगों केँ संग खेलने केँ लिए आँ जाता थां। यहअलग बात थि कि यहलोग उसे दुत्कार करभगा देते थें।
नीलम कों पता हि नहि चला कि कब उसकी ऑखों मे ऑसूभर आए थें। पता तौ तबचला जब वोँ ऑसू दोनो ऑखों कि कोरों सें बहतेहुए कानों गिरे। एक् हूक सि उठी दिलो दिमाग़ मे उसके। मनो मस्तिष्क झनझना कररह गय़ा। भावनाओ औऱ जज़्बातों कां एकाएक हि तीब्र तूफान उठ खड़ाहुआ। हृदय कां जब परिवर्तन होता हैं तौ एक् नयेयुग कां प्रारंभ हौ जाता हैं। परिवर्तन अगर नफ़रत केँ लिए होता हैं तोँ बहोत जल्द एक् बड़े अनिष्ट कि नियति बन जाती हैं औऱ अगर प्यार केँ लिए होता हैं तोँ एक् नया संसार बनने लगता हैं।
"मुझे क्षमा करदे भइया। " भावना याँ जज़्बात जब प्रबल हौ जाते हें तोँ कोई धैर्य कोई संयम नहि हौ सकता। बल्कि हरदरो दीवार कों तोड़ते हुए हृदय मे ताण्डव करतेहुए जज़्बात ऑखों केँ रास्ते सें ऑसूबन कर बहनेलग जाते हें_____"क्षमा करदे मुझे। कितना ग़लत सोचती थि आज तक मे तेरे बारे मे। मगर तुँ तोँ पहले भि हीरा थां भइया औऱ आज भि हीरा हैं। बचपन सें लेकरआज तक हमेशा तुम को जलील किया अपमानित किया औऱ न् जाने केसे केसे इल्ज़ाम लगाकर तुम को तेरे हि पिता जी सें पिटवाया। कोई इतना बुरा केसे होँ सकता हैं भइया? औऱ तूँ इतना अच्छा केसे हौ सकता हैं? आजजिस तरह सें तूने मुझे अनदेखा कर केँ अजनबीपन दिखाया उसने मुझे समझा दिया हैं भइया कि मेरी औकात तेरे सामने कुछ भि नहि हैं। "
नीलम स्वयं सें हि बड़बड़ाये जारही थि औऱ ऑसू बहाएजा रही थि। अभि वो रो हि रही थि कि सहसा किसी नें उसके कंधे पऱ हाॅथरखा। वो बुरीतरह उछल पड़ी। पलट कर देखा तौ बगल सें हि उसकी मौसी कि दूसरी बेटी सोनम उसकीतरफ झुकी हुइ खड़ी थि।
दोस्तो यहाॅ पर्र मे नीलम कि मौसी औऱ उसके परिवार कां संक्षिप्त परिचय देना चाहूॅगा,,,,,,,,,
●पूनम सिंह, यह नीलम कि माॅ यानी प्रतिमा कि बड़ी बेहन हैं। इस नातेयह नीलम कि मौसी लगती हैं। ऊम्र पचास केँ आसपास। प्रतिमा कि तरह हि दिखने मे बेहद हसीन हैं।
●महेश सिंह, यह नीलम केँ मौसा औऱ पूनम केँ पति हें। ऊम्र पचपन केँ आसपास। पेशे सें डाॅक्टर हें।
● अंजली सिंह, यह नीलम कि मौसी कि बड़ी बेटी हैं। ऊम्र पच्चीस केँ आसपास। दिखने मे बहोत हि हसीन हैं। पेशे सें यह भि डाॅक्टर हैं। अभि विवाह नहि हुई हैं इसकी।
●सोनम सिंह, यह नीलम केँ मौसी कि दूसरी बेटी हैं। ऊम्र बाईससाल हैं। अपनी बेहन कि हि तरह हसीन हैं। यह काॅलेज मे साइंस सें एमएस सि कररही हैं।
● विकास सिंह, यह नीलम कि मौसी कां इकलौता व सबसे छोटा बेटा हैं। ऊम्र उन्नीस केँ आसपास। अपने बाप महेश कि तरह हि यह भि डाॅक्टर बनना चाहता हैं।
दोस्तो यह थां नीलम कि मौसी कां संक्षिप्त परिचय। अबकथा कि तरफ चलते हें,,,,,,,
"दिदी आप्। " सोनम पर्र नज़र पड़ते हि नीलम करीब हड़बड़ा गई थि।
"हूॅ तौ मे हि। " सोनम नें मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुँ चाहे तोँ कुछ औऱ भि समझ सकती हैं। ख़ैर, यह बता कि कौन हैं वोँ?"
"क क्याँ मतलब??" नीलम बुरीतरह चौंकी थि।
"मतलब कि वोँ कौन हैं जिसकी याद मे तुँ ऑसूबहा रही हैं?" सोनम कहने केँ संग हि बेड पऱ बैठ गई____"तुँ मुझेबता सकती हैं नीलम। मे तेरी बड़ी बेहन सें कहीं अधिक तेरीयार कि तरहहूॅ। अबचलबता कि कौन हैं वोँ जिसने मेरी प्यारी सि यार कि ऑखों कों रुलाया हैं?"
"ऐसाकुछ नहि हैं दिदी। " नीलम नें कहा__"यह ऑसू तौ पश्चाताप केँ हें। आज तक जिसे अजनबी समझकर उसे जलील औऱ दुत्कारती रही थि उसी नें आज मेरी इज्ज़त बचाई दिदी। "
"क्याँ???" सोनमउछल पड़ी___"यह तुँ क्याँ कहरही हैं नीलम? क्याँ हुआ थां आज काॅलेज मे तेरेसंग? सचसचबता मुझे। "
नीलम नें उसेसभी कुछबता दिया कि केसेआशू रानानाम कां लड़का अपनेकुछ दोस्तों केँ संग उसकी रैगिंग कररहा थां। उसनेउसे कहा थां कि वोँ उसकेसंग संग उसके दोस्तों केँ होठों कों भि चूमे। उसकीइस बात पऱ उसनेआशू राना कों थप्पड़ मार दिया थां। जिससे आशू राना नें सबके सामने उसकी इज्ज़त लूटने कि कोशिश कि। तभीउस भीड़ सें निकलकर कोईआया औऱ उसनेआशू राना केँ संगसंग उसकेसब दोस्तों कि खूब पिटाई कर उसकी इज्ज़त कों लटने सें बचाया थां। नीलम नें सारीबात सोनम कों बता दि। नीलम कि सारी बातें सुनकर सोनम हैरान रह गई थि।
"तौ वोँ लड़का तेरा चचेरा भइया हैं?" सोनम नें कहा___"जिसे आज तक तूँ भइया नहि मानती थि। बातकुछ समझ मे नहि आई नीलम। भला ऐसा तूँ केसेकर सकती हैं?"
"वही तौ दिदी। " नीलम कि ऑखेंछलक पड़ीं___"अपने फरिश्ता जैसे भइया केँ संग मैनेआज तक वोँ सभी केसे किया?आज कि उस घटना नें मुझे एहसास करा दिया दिदी कि कितनी बुरीहूॅ मे। जिसकी ऑखों मे अपनेलिए हमेशा प्रेम औऱ सम्मान देखा थां आजउसी ऑखों मे अपनेलिए हिकारत केँ भाव देखा हैं मैने। वोँ ऐसेमुह फेरकर चला गय़ा थां जैसे उससे मेराकोई दूरदूर रिश्ता नहि हैं। उस वक़्त मुझे पहलीबार लगा दिदी कि मे उसकी नज़र मे क्याँ रह गई हूॅ। सच हि तौ हैं, आख़िर उसकी नज़र मे मेरीकोई औकात हौ भि केसे सकती हैं? मैने औऱ मेरेमाॅ बाप नें हमेशा उसे औऱ उसकेमाॅ बाप कों तुच्छ समझा थां। "
"यह तुँ क्याँ कहरही हैं नीलम?" सोनम बुरीतरह हैरान थि, बोलीं___"यह तूँ कैसी बातें कररही हैं? आख़िर बात क्याँ हैं?"
"सारी बातें तौ मुझे भि नहि पता दिदी मगर इतनासमझ गई हूॅ कि बचपन सें मेरे माॅमडैड नें जिनके बारे मे ऐसा करने कि सीख दि थि वोँ ग़लत थां। " नीलम नें कहा___"किसी केँ बारे मे स्वयं भि तोँ जाॅचा परखा जाता हैं नं? ऐसा तोँ नहि होना चाहिए नं कि हमें किसी नें जोँ कुछबता दियाउसे हि सचमान लें औऱ फिन सारी ऊम्रउसी कों लिए बैठे रहें। कीचड़ अगर इतना हि गंदा होता तोँ उसमें कमल जैसाफूल कभी नहि खिलता। गंदगी तौ वहाॅ भि होती हैं दिदी जिस स्थान कों लोग पाक़ समझते हें। "
"मेरी तोँ कुछसमझ मे नहि आँ रहा नीलम कि तुँ यहसभी क्याँ कहेजा रही हैं?" सोनम नें उलझनपूर्ण भाव सें कहा थां।
"बताऊॅगी दिदी। " नीलम नें कहा___"सभी कुछ बताऊॅगी आपको। मगर इस टाइम नहि। इस वक़्त मुझे अकेला छोंड़ दीजिए। मुझे अकेला छोंड़ दीजिए दिदी। "
कहने केँ संग हि नीलमफूट फूटकर रोनेलगी थि। सोनम नें उसे खींचकर अपने सें छुपका लिया थां।
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उथर हवेली मे।
रितूजब हवेली पहुॅची तौ साम हौ चुकी थि। अजय सिंह हवेली मे नहि थां बल्कि फैक्टरी मे थां। फैक्टरी कां काम करीब पूरा हि होँ गय़ा थां। बसकुछ हि दिनों मे फैक्टरी चालू होँ जानी थि। रितू अंदरआते हि अपने कमरे कि तरफबढ़ गई। किचेन मे प्रतिमा औऱ नैना डिनर रेडीकर रही थि।
कमरे मे पहुॅच कर रितू नें अपने कपड़े बदले औऱ फिन बाथरूम कि तरफबढ़ गई। बीस मिनटबाद जब वो बाथरूम सें बाहर् आई तौ उसकी नज़रबेड पऱ पड़ेआई मोबाइल पऱ पड़ी। आई मोबाइल पऱ किसी कां काॅल आँ रहा थां। मोबाइल साइलेन्ट मोड पऱ थां।
रितू टाॅवेल कों अपने संगमरमरी शरीर पऱ लपेटकर तेज़ी सें बेड केँ पास पहुॅची औऱ मोबाइल कों उठाकर स्क्रीन पऱ फ्लैश कररहा नंबर कों देखा। नंबर कों देखकर उसके होठों पऱ हल्की सि मुस्कान उभआई।
"हैलो। "फिन उसने काॅल रिसीव करते हि कहा।
"।। " उधर सें कुछकहा गय़ा।
"क्याँ सचकहरहे होँ तुम्?" रितू केँ चेहरे पऱ खुशी केँ भावउभर आए थें।
".। " उधर सें फिनकुछ कहा गय़ा।
"ठीक हैं भइया। " रितू नें धीमे स्वर मे कहा___"तुम् उसे रिसीव कर लेना औऱ अपनेसंग हि पहलेघऱ लेँ जानां। उसकेबाद मे तुम्हें मोबाइल करूॅगी औऱ बताऊॅगी कि अब तुम् उसे अपनेसंग वहाॅ पऱ लें आओ। "
".। " उधर सें फिनकुछ कहा गय़ा।
"डोन्ट वरी भइया। " रितू नें कहा___"मे सभीदेख लूॅगी। चलोअब रखतीहूॅ मोबाइल। "
रितू नें कहा औऱ मोबाइल कटकर दिया। फिन मन हि मन कहा___"आजा मेरे भइया। तेरी विधी तुझेही बस एक् बार देखने केँ लिए हि ज़िदा हैं। अपने आपको सम्हालना मेरे भइया। मे जानती हूॅ कि वोँ लम्हाॅ तेरेलिए बेहद दर्दनाक होगा। मगर स्वयं कों सम्हालना भइया। काश! यहसभी नं हुआ होता। हे ईश्वर यह तूने मेरे भइया केँ संग क्याँ कर दिया हैं। कितना दुख दर्द देगा तुँ उसे? नहि नहि, मे अपने भइया कों कोईदुख दर्द सहने नहि दूॅगी। उसको अपने सीने सें लगाकर खूब प्रेम दूॅगी मे। अब तक तौ मैनेउसे नफ़रत हि दि थि मगरअब बेइंतेहां प्रेम दूॅगी उसे। हाॅ हाॅखूब प्रेम दूॅगी उसे। "
ऑखों सें छलकआए ऑसुओं कों पोंछा रितू नें औऱ फिन आलमारी कि तरफबढ़ गई। आलमारी सें रात मे पहनने वाले कपड़े निकाल कर उसने उन्हें पहना औऱ फिन कमरे सें बाहर् आँ गई।
रात मे सबने एक् संग डिनर किया। रितू नें देखा कि उसका भइया शिवा भि आँ गय़ा थां। वो उससे बड़े प्रेम व चापलूसी केँ सें अंदाज़ मे मिला थां। रितू कों उसे औऱ उसकेइस अंदाज़ पऱ आज पहलीबार नफ़रत सि हुइ थि। हलाॅकि वोँ जैसा भि थां उसकासगा भइया हि थां। अजय सिंह भि फैक्ट्री सें आँ गय़ा थां। सबने डिनर किया औऱ इसीबीच थोड़ी बहोत बातें भि हुईं। उसकेबाद सभी अपने अपनेरूम मे सोने केँ लिएचले गए।
उससमय रात केँ बारहबजे केँ आसपास कां वक़्त थां। हवेली मे हरतरफ सन्नाटा छायाहुआ थां। हवेली केँ अंदर अॅधेरा तौ थां मगर पूरीतरह नहि क्योंकि खिड़कियों सें चाॅद कि रोशनी औऱ अंदरलगे नाइट बल्ब कि धीमी रोशनी थि। विराज केँ आने कि खुशी मे रितू कों नींद नहि आँ रही थि। उसकेमन मे तरहतरह केँ ख़याल बनरहे थें। कभी उसका चेहरा खुशी सें चमकने लगता तोँ कभी एकदम सें दुःखी सां होँ जाता। बेड पर्र इधर सें उधर करवॅट बदलते हुएसमय समय गुज़रता जारहा थां। मगरउसे ऐसा प्रतीत होँ रहा जैसेरात कां यह वक़्त तोँ जैसे एक् स्थान ठहर हि गय़ा थां। रितू कों लगरहा थां कि यहरात कितना जल्द गुज़र जाए औऱ सुभह हौ जाए। ऐसे हि बारहबज गए थें।
उसे प्यास लगी तौ वो बेड सें उठकर दरवाजे कि तरफ बढ़ी। दरवाजे कों खोलकर वो बाहर् आँ गई। गैलरी सें चलतेहुए उसे नैना फूफी कां रूम दिखा। उसकेबाद नीचे जाने केँ लिए सीड़ियाॅ। सीढ़ियों सें उतरते हुए वो किचेन कि तरफबढ़ गई। किचेन मे रखे फ्रिज़ कों खोलकर उसने ठंडे पानी कां एक् बाॅटल निकाला औऱ उसका ढक्कन खोलकर उसेमुख सें लगा लिया।
पानी पीकर वो वापस किचेन सें बाहर् आँ गई। बाएॅ साइड पर्र ड्राइंगरूम थां। उसने सोचा कि नींद तोँ आँ नहि रहीइस लिए थोड़ी देर ड्राइंगरूम मे हि बैठ जातीहूॅ, मगरफिन जाने क्याँ सोचकर उसने अपनायह इरादा बदल दिया। वो वापस दाहिने साइड सीढ़ियों कि तरफ बढ़ी हि थि कि सहसारुक गई। सीढ़ियों कि तरफ सें बाएं साइड पर्र पार्टीशन कि दीवार पऱ लगे दरवाजे कि तरफ देखा उसने। दरवाजा पूरीतरह तोँ नहि मगर खुलाहुआ स्पष्ट नज़रआया उसे।
पार्टीशन कि दीवार पर्र लगे दरवाजे कों इसतरह खुलादेख कर रितू केँ पुलिसिया मन मे प्रश्न उभरा कि आजयह दरवाजा इस वक़्त खुला क्यूं हैं? आमतौर पर्र वो बंद हि रहता थां। उसतरफ कां हिस्सा विजय चाचा कां थां। पुलिसिया दिमाग़ मे जबकोई प्रश्न उभरता हैं तोँ वो उस प्रश्न कां जवाब जल्दी हि खोजने लग जाता हैं।
रिते सीढ़ियों कि तरफ सें पलटकर पार्टीशन केँ उस खुलेहुए दरवाजे कि तरफबढ़ चली। कुछ हि लम्हा मे वो दरवाजे केँ पास पहुॅच गई। कुछ लम्हा दरवाजे केँ पास खड़े होकर उसनेउस स्थान कां मुआयना कियाफिन अपना हाॅथ बढ़ाकर उसने दरवाजे कां दाहिने साइड वाला पल्ला पकड़कर आगे कि तरफपुश किया। दरवाजे कां वोँ पल्ला बेआवाज़ खुलता चला गय़ा। अब एक् पल्ले मे हि इतना स्पेस बन गय़ा थां कि एक् व्यक्ति आहिस्ता इधर सें उसतरफ जा सकता थां। रितू नें वही किया। वोँ उस स्पेस सें उसतरफ दाखिल होँ गई।
उसतरफ जाकर उसने बारीकी सें हरतरफ कां मुआयना किया औऱ फिनआगे कि तरफबढ़ गई। मेरे पाठकों कों पता हैं कि यह हवेली किसतरह बनाई गई थि। दो मंजिला इमारत केँ अलगअलग तीन हिस्सों कों आपस मे जोड़ दिया गय़ा थां। तीनों हिस्सों मे एक् जैसा हि डिजाइन थां।
आगे बढ़ते हुए रितू ड्राइंगरूम कि तरफ आँ गई। यहाॅ पऱ भि नाइट बल्ब कां प्रकाश थां। यहाॅ पर्र भि सन्नाटा फैलाहुआ थां। ड्राइंगरूम मे आकर रितू खड़ी हौ गई। उसेसमझ नहि आँ रहा थां यहाॅ पर्र कौनआया होगाइस वक़्त औऱ किसलिए? जबकि इसतरफ आने कां कोई प्रश्न हि नहि थां। ड्राइंगरूम केँ उसतरफ ऊपर जाने केँ लिए वैसी हि सीढ़ियाॅ बनी हुईँ थि जैसीइस तरफबनी हुईँ थि। ड्राइंगरूम केँ केँ पीछे साइड एक् तरफ किचेन थां औऱ एक् साइड कि तरफ वोँ रूम थां जिसमें दादाजी दादीमा रहते थें। रितू कि निगाह जब किचेन सें होतेहुए जब दूसरी साइड दादाजी दादीमा केँ कमरे कि तरफ गई तौ वो चौंक गई।
दादाजी दादीमा केँ कमरे मे इस टाइम बल्ब कि पर्याप्त रोशनी होँ रखी थि जोकिऊपर छत केँ पास हि बने रोशनदान सें समझ मे आँ रही थि। कमरे केँ दरवाजा बंद थां। रितूयह देखकर हैरान थि कि इतनीरात कों वहाॅउस कमरे केँ अंदरकौन हौ सकता हैं? जबकि उसे जहाॅ तक पता थां इसतरफ केँ हिस्से पऱ कोई नहि आता थां। विजय सिंह केँ पत्नि बच्चों कों हवेली सें निकालने केँ बादयह हिस्सा पूरीतरह बंद हि रहता थां। फिनआज इससमय यहाॅ पऱ कौन हौ सकता हैं? यह प्रश्न ऐसा थां जौ रितू केँ मस्तिष्क मे कत्थक सां करनेलगा थां।
अपनेमन उठेइस प्रश्न औऱ स्वयं कि उत्सुकता कों मिटाने केँ लिए रितूउस कमरे कि तरफ बहोत हि संतुलित कदमों सें बढ़ गई। कुछ हि पलों मे वो उस कमरे केँ दरवाजे केँ पास पहुॅच गई। उसकादिल अनायास हि ज़ोरों सें धड़कने लगा थां। तभी उसके कानों मे कमरे केँ अंदर मौजूद ब्यक्ति कि आवाज़ पड़ी। उस आवाज़ कों सुनकर रितू बुरीतरह चौंकी। यह आवाज़ उसकी अपनीमाॅ प्रतिमा कि थि। रितू नें दरवाजे सें अपनेकान लगा दिये।
"आहहहहह ऐसे हि मेरे बेटे। " अंदर सें प्रतिमा कि मादकता सें भरी हुइ आवाज़ उभरी____"ऐसे हि आहहहह हचकहचक केँ चोद मुझे। आज बहोत दिनों बाददो दो लन्ड कां मजा मिला हैं मुझे। ओहे भड़वे हरामी साले नीचे सें पेल नं मेरी गाॅड मे अपना लौड़ा। आहहहहह अरे बड़ामजा आँ रहा हैं रे। "
"यहलो माॅमआज डैड केँ संगसंग अपनेइस बेटे कां भि लन्ड लो अपनी बुर मे। " शिवा कि आवाज़ आई___"आज मेरी वर्षों कि वोँ ख्वाहिश पूरी होँ रही हैं। थैंक्स डैड जोँ आपने मुझेशहर सें बुला लिया औऱ आज मुझे अपनी माॅम कों चोदने कां सौभाग्य दिया। "
"थैंक्स कि कोईबात नहि हैं बेटे। "अजय सिंह कि आवाज़ उभरी___"यह तोँ तेरे माॅम कि हि ख़्वाहिश थि कि तूँ भि इसे रगड़कर चोदे। "
"अब बातें मतकरो तुम् दोनो। " प्रतिमा कि आवाज़ आई___"मुझे रगड़ रगड़कर चोदना शुरुआत करो वरना तुम् दोनो केँ लन्ड कों काटकर फैंक दूॅगी। "
"ओके माॅम। " शिवा नें कहा___"तौ फिनयह लो। "
"आहहहहहह शशशशशश हायराम ऐसे हि चोदो मुझे। " प्रतिमा कि आहें औऱ सिसकारियाॅ गूजने लगी अंदर___"पूरी रात मुझेआगे पीछे सें चोदो। फाड़कर रखदो मेरी बुर औऱ गाॅड कों। हायराम रे कितना मजा आँ रहा हैं। काश! एक् औऱ लन्ड होता तोँ उसे अपनेमुह मे भर लेती मे। "
दरवाजे पर्र कान लगाए खड़ी रितू केँ पैरों तलेदूर दूर तक ज़मीन कां नामो निशान न् थां। दिलो दिमाग़ मे जैसे सारा आसमान भरभरा करगिर पड़ा थां। मनो मस्तिष्क सुन्न सां पड़ता चला गय़ा। उसेलगा कि उसके पैरों मे कोईजान हि नं बची हौ। उसे चक्कर सां आनेलगा थां। बड़ी मुश्किल सें उसने स्वयं कों सम्हाला। ऑखों नें ऑसुओं कि बाढ़ सि कर दि। कमरे केँ अंदर इतना बड़ापाप होँ रहा थां। एक् माॅ अपने हि बेटे सें नाजायज संबंध बनारही थि वोँ भि अपने पति कि सहमति सें। रितू कों यकीन नहि हौ रहा थां कि यह उसकेमाॅ बाप औऱ भइया थें।
अंदर सें आती मादक सिसकारियों कि आवाज़ें उसके कानों कों छलनी करतीजा रहीथीं। हवस औऱ वासना कां इतना भयावह चेहरा उसनेआज अपने हि पैदा करने वालों केँ द्वारा देखा थां। सहसा उसकेमन मे यह विचार उठा कि नहि नहि यह मेरे माॅमडैड औऱ भइया नहि हौ सकते बल्कि यहकोई औऱ हि हें। कोई छलावा हैं याँ फिनकोई सपने हैं।
समयभर मे पगलाई सि रितू नें अपनेहाथ सें बहोत हि धीमे औऱ संतुलित अंदाज़ सें दरवाजे कों अंदर कि तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ कुलता चला गय़ा। दरवाजे पऱ बस थोड़ी सि हि झिरी बनाकर रितू नें अंदर कि तरफ देखा। मगर उस झिरी मे उसेकुछ नज़र नं आया बल्कि यह अवश्य हुआ कि अंदर सें आती हुई आवाजें ज़रा तेज़ हौ गई थि।
रितू नें दरवाजे कों थोडा औऱ अंदर कि तरफ धकेला। अपनेसिर कों दरवाजे केँ अंदर कि तरफ लें जाकर उसने अंदर आवाज़ कि दिशा मे देखा तौ उसकेहोश उड़गए। आश्चर्य औऱ अविश्वास सें उसकी ऑखेंफटी कि फटीरह गई थि। अंदरबेड पऱ उसके माॅमडैड व भइया पूरीतरह नंगी हालत मे थें। सबसे नीचे उसकेडैड थें फिन उसकी माॅम उनकेऊपर पीठ केँ बल लेटी हुई थि। उसकी दोनो टाॅगें शिवा केँ दोनो हाॅथों केँ सहारे ऊपरउठी हुई थि। शिवा उसकेऊपर थां जोँ कि माॅम कि दोनो टाॅगों कों पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगारहा थां। नीचे सें उसकेडैड अपने दोनो हाथों सें प्रतिमा कि कमर कों थामे धक्का लगेरहे थें। यह हैरतअंगेज नज़ारा देखकर रितू पत्थर बन गई थि। होशतब आयाजब उसकी माॅम कि ज़ोरदार अहह कि आवाज़ उसके कानों मे पड़ी। रितू नें जल्दी हि अपनासिर अंदर सें बाहर् कर लिया। दरवाजे कों उसीतरह बंदकर वो पलटी औऱ ऑसुओं सें तर चेहरा लिए वो दरवाजे सें हट गई।
कुछ हि देर मे वो अपने कमरे मे पहुॅच गई। वो यहाॅ तक केसेआई थि यहवही जानती थि। उसके पांव इतने भारी हौ गए थें कि उससे उठाए नहि जारहे थें। बेड पर्र औंधेमुह गिरकर वो ज़ार ज़ार रोयेजा रही थि। उसेलग रहा थां कि वोँ क्याँ कर डाले। उसके दिलो दिमाग़ मे अपने माता पिता औऱ भइया केँ लिए नफ़रत व घृणाभर गई थि। वो एक् बहादुर लड़की थि। उसने अपने आपको सम्हाला औऱ जल्दी बेड सें उठ बैठी। चेहरा पत्थर कि तरह कठोर होँ गय़ा उसका। बेड सें उतरकर वो आलमारी कि तरफ बढ़ी। आलमारी खोलकर उसने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला। लाॅकखोल कर उसने चैम्बर कों देखा तोँ खाली थां। उसने जल्दी हि अंदर लाॅकर सें गोलियाॅ निकाली औऱ उसमें पूरीछहो गोलियाॅ भर दि। उसकेबाद वो चेहरे पऱ ज़लज़ला लिए दरवाजे कि तरफ बढ़ी हि थि कि किसी कि आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी।
दोस्तो टाइम निकाल कर इतना हि एपसोड सजधजकर कर पायाहूॅ। परिवार मे मेरी बेहन कि विवाह हैं इसलिए उसमें उलझाहुआ हूॅ। आशा करताहूॅ कि आप् मेरी मजबूरियों कों समझेंगे।
इस सबसे फुर्सत होकरजब वापस लौटूॅगा तोँ दोनो कहानियों केँ भाग कान्टीन्यू करूॅगा। तब तक केँ लिए मुझे माफ़ करें दोस्तो। अपना प्रेम औऱ सहयोग बनाए रखियेगा।
धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,
धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,पेज नंबर 201 पऱ,
धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,पेज नंबर 201 पर्र,
धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,पेज नंबर 201 पऱ,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Awesome update bhay,
behad hi shandaar, lajawab और amazing update h bhay,
raj mumbai से apne gaon के liye nikal chuka h, gauri too use aane hi nahii de rahi thi लेकिन jagadish uncle के samjhane पर की उसके sath एक bodyguard bi jayega unhone use aane दिया h,
udhar nilam ko अब apni galti के liye pashchatap hu raha h, viraj के samne vo अपना astitva bohot hi छोटा mahsus krr rahi h,
yeh shabdo के kese bhanvar की srijan aapne की h bhay, itna chamatkari update h me shabdo mai bayan नहीं krr sakta,
udhar ritu ko एक नया jhatka laga h jisne उसके astitva ko hi jhakjhor krr रख दिया h,
उसकी mummy kaa apne hi bete के sath najayaj sambandh h, और un tino ko hi एक sath usne kamre mai dekh लिया h,
अब yeh kiski awaj h jisne ritu ko gun के sath जाते hue dekh krr rok लिया h,
dekhte h अब aage क्या hotha h,
Waiting for next update bhay
धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,पेज नंबर 201 पऱ,
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Superbly fantastic update.
All the three events, whether it iss the remorse of Neelam aur Viraj's decision making process for going too his village aur the carnal act of the villainous trio, all were detailed and described in a classic manner। The suspense created has also been nice.
Keep it up।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
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