Romance कुमकुम completee - Yuvaraj Ki Kahani – New Episode
'श्री सम्राट.। ' द्वारपाल नें पुकारा। '.। ' द्रविड़राज मौनरहे, मानो उन्होंने कुछ सुना हि नहि। 'श्री सम्राट.!' द्वारपाल नें पुन: पुकारा, नतमस्तक होकर।
वास्तव मे वो एक् आवश्यक मेसेज लेकर द्रविड़राज केँ प्रकोष्ठ मे करीब-करीब आधी घड़ी मे खड़ा थां।
द्वारपाल कि दूसरी पुकार पऱ सम्राट नें प्रकोष्ठ केँ दरवाज़ा कि ओर देखा। द्वारपाल नें नतमस्तक होकर सम्राट कां सम्मान प्रदर्शन किया। "द्वारदेश पर्र युद्ध शिविर सें श्रीयुवराज कां मेसेज लेकर एक् सैनिक उपस्थित हैं औऱ करीबआधी घड़ी सें श्रीसम्राट कि आज्ञा कि इंतजार कररहा हैं.। ' उसनेकहा। '
आधी घड़ी सें.?' द्रविड़राज चौंककर बोले-'औऱ तुम् अब मुझे सूचित कररहे हौ। '
'मे सम्राट कि सेवा मे बहोत देर सें खड़ा हूं, परन्तु श्री सम्राट विचारों मे इतने तल्लीन थें कि व्यवधान उपस्थित करना मैंने उचित नहि समझा.। '
'उसे जल्दी उपस्थित करो। ' सम्राट नें उतावली भरे स्वर मे आज्ञा दि। सैनिक आया। उसने सम्राट कों सम्मान प्रदर्शन किया। 'तुम् युद्ध शिविर सें आँ रहे हौ न्.? बोलो, वहां कां क्याँ समाचार हैं?' द्रविडराज नें पूछा।
'श्री सम्राट केँ अतुलित प्रताप सें सभी कुशल हैं। '
'युवराज तोँ सकुशल हें। ' 'खुद महामाया कां वरदहस्त उनकी रक्षा कररहा हैं, श्रीसम्राट। '
'श्रीयुवराज पर्र किसी अनिष्ट कि आशंका तोँ नहि.?'
'नहि श्रीसम्राट। '
'युद्ध कां क्याँ समाचार हैं?'
'अब तक तोँ सब युद्धों मे हमारी विजय हुई हैं, श्रीयुवराज कि संचालन प्रतिभा अद्भुत हैं। शत्रु भि आश्चर्यचकित हौ उठे हें श्रीयुवराज कां प्रबल प्रताप देखकर। '
अब तक सम्राट केँ निरंतर प्रश्नों केँ आगे, सैनिक कों नं तोँ युवराज कां पत्र देने कां औऱ न् रत्नहार हि उनके सम्मुख उपस्थित करने कां अवसर मिला थां।
जब द्रविड़राज सभीतरह केँ सवाल पूछकर अपने कों आश्वस्त कर चुके तोँ सैनिक नें उनके सामने युवराज कां पत्र औऱ रत्नहार रख दिया।
'ये क्याँ.?' रत्नहार देखते हि द्रविड़राज इस प्रकार चौंकउठे जैसे उनके जिस्म मे प्रखर विद्युत रेखा प्रवेश कर गई हौ।
उन्होंने भयभीत नेत्रों सें उस रत्नहार कि ओर देखा। पुन: कम्पित करों द्वारा उठाकर उसे मस्तक सें लगाया।
'निश्चय हि येवही पवित्र रत्नहार हैं.द्रविड़कुल कां उज्जवलतम दीपकये कहां मिला?ये विलुप्त रलहार केसे प्राप्त हुआ तुम्हें ?' द्रविड़राज नें उत्सुक नेत्रों सें शीघ्रतापूर्वक युवराज नारिकेल कां पत्र पढ़ा।
औऱ उनके हृदय मे ध्वंसक संघर्ष मच गय़ा। बहोत वर्षों पूर्व कि घटना उनके नेत्रों केँ सम्मुख तीव्र गति सें चित्रित होनेलगी। वे बारम्बार युवराज कां पत्र पढ़ने एवंउस पवित्र रत्नहार कों मस्तक सें लगाने लगे। उन्हें तीव्रोन्माद-सां होँ गय़ा। 'ये पवित्र रत्नाहार शत्रु सेना केँ संचालक केँ पास सें मिला हैं.?' पूछा उन्होंने।
'जीहां, किरातों कां नायक आजकल आर्य सेना कां संचालक हैं.। ' सैनिक नें उत्तर दिया।
'किरातों कां नायक.!' बोले द्रविड़राज—'क्याँ अवस्था होगी उसकी?'
'प्राय: बीस वर्ष। ' '.। ' सम्राट चौंक पड़े सेनानायक कां ये उत्तर सुनकर। उन्हें उस बीस-वर्षीय नायक कि रण-कौशलता पर्र आश्चर्य हौ रहा थां। वेउस नायक केँ विषय मे सोचने मे ध्यान-मग्न हौ गये थें। पास हि खड़े सैनिक नें उनका ध्यान भंग करतेहुए पूछा 'श्रीसम्राट कि क्याँ आज्ञा हैं.?'
'तुम् जाओ, विश्राम करो.। ' सम्राट नें सैनिक कों आज्ञा दि।
सैनिक अभिवादन करचला गय़ा। द्रविड़राज नें श्वेताम्बर सें अपनाबदन आच्छादित किया, पुन: उस रत्नहार कों यत्नपूर्वक उस श्वेताम्बर कि ओट मे छिपाया, तत्पश्चात् महामाया केँ मंदिर कि ओर महापुजारी केँ दर्शनार्थ चल पड़े।
'श्रीसम्राट आप्.!' महापुजारी कों महान आश्चर्य हुआ, द्रविड़राज कां ऐसे वक़्त मे पदार्पण देखकर। संग हि चिंता हुईँ उनकेमुख पर्र दुश्चिंता कि रेखायें अवलोकन कर।
'पधारिये सम्राट.। ' महापुजरी नें कहा। किन्नरी एवं चक्रवाल, जोँ इस वक्त महापुजारी केँ पास हि उपस्थित थें नें द्रविड़राज कों सम्मान प्रदर्शित किया।
'तुम् लोगजाओ। ' सम्राट नें चक्रवाल एवं किन्नरी कों आज्ञा दि।
उनके स्वर सें हृदय कां उद्वेग स्पष्ट हौ गय़ा थां। चक्रवाल एवं किन्नरी उठकरचले गए।
'श्रीसम्राट कि मुखाकृति मलिन क्यूं हैं?' महापुजारी नें पूछा- क्याँ श्रीयुवराज कि चिंता श्रीसम्राट कों उद्वेलित कररही हैं याँ किसी मानसिक आवेग नें हृदय प्रदेश मे उथल-पुथल उत्पन्न कर दि हैं?'
.' द्रविड़राज निस्तब्ध रहे। सिर्फ एक् बार उन्होंने सिक्त नेत्रों सें महामाया कि स्वर्ण प्रतिमा कि ओर देखाएवं मन हि मन श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।
'श्रीसम्राट नें मेरे प्रश्नों कां कोई भि उत्तर देने कां कष्ट नहि किया.?' महापुजारी नें उन्हें सचेत किया, परन्तु सम्राट नीरव हि रहे।
' चक्रवाल.!' महापुजारी नें पुकारा।
'चक्रवाल कों किस तात्पर्य सें बुलारहे हें आप्?' सम्राट नें पूछा।
'श्रीसम्राट कां हृदय उद्विग्न हैं—ऐसे टाइम मे चक्रवाल कि कला अमूल्य औषधि प्रमाणित होगी.। '
'नहि? आवश्यकता नहि.। ' द्रविड़राज बोले—'एक् चिंताजनक समाचार आपको सुनाने आया हूं। '
'वो क्याँ.?' महापुजारी नें शंकित नेत्रों सें द्रविड़राज केँ गंभीर एवंपीत मुख कि औऱ देखा।
'युद्ध शिविर सें अभि-अभि एक् सैनिक आया हैं। '
'क्याँ समाचार लाया हैं.? युद्ध कि प्रगति संतोषजनक तौ हैं न्.? श्रीयुवराज तौ सकुशल हें?'
एक् संग हि महापुजारी नें कई सवालकर डाले।
'युद्ध कि प्रगति अनुकूल हैं, युवराज भि सकुशल हें परन्तु अवस्था सोचनीय होतीजा रही हैं। जिन बातों कों मे सतत् प्रयत्न कर भूलने कि चेष्टा करता हूं, दैव दुर्विपाक सें वही बातें पुन:पुन: उपस्थित होकरमन कों अशांत बना देती हें आप् हि बताइये महापुजारी जी कि ऐसी शोचनीय अवस्था मे मे किस प्रकार धैर्य धारण करूंगा.? यद्यपि मे सम्राट हूं औऱ एक् सम्राट कों साधारण मनुष्यों कि अपेक्षा ज्यादा संयतएवं ज्यादा सहनशील होना चाहिये। परन्तु सहनशीलता कि भि कोई सीमा होती हैं, महापुजारी जी। जिन-जिन असहनीय यातनाओं कों मैंने मौन रहकरसहन किया हैं वे क्याँ साधारण हें। '
'श्रीसम्राट कां तात्पर्य क्याँ हैं.?' महापुजारी नें पूछा।
द्रविड़राज कुछबोल नहि पाये। उनका दाहिना हाथ एक् क्षण केँ लिए श्वेत आवरण केँ अंतप्रदेश मे गय़ा औऱ दूसरे हि क्षण उन्होंने महापुजारी केँ हाथों पर्र वो बहुमूल्य रत्नहार निकालकर रख दिया- 'मेरा तात्पर्य बहोत सरल हें, महापुजारी जी.। '
.। ' महापुजारी आश्चर्य एवं महान विस्मय सें चीख उठे—'यही वो रत्नहार हैं.। जिसके कारण राजमहिषी त्रिधारा कों आजन्म निर्वासन दण्ड कां भागी होना पड़ा। यही वो रत्नहार हैं.जिसने श्रीसम्राट कां संहार विनष्टप्राय कर दिया.वही.। '
"जीहाँ वही रत्नहार हैं ये। हमारे कुल कां उज्जवल दीपकआज अकस्मात् हमारे समक्ष पुन: उपस्थित हैं.अब नं जाने क्याँ अघटित घटना घटने वाली हैं.?'
"श्रीसम्राट कों ये केसे प्राप्त हुआ?'
"ये किरात नायक केँ पास सें मिला हैं, जौ वर्तमान युद्ध मे शत्रु सेना कां संचालन कररहा हैं। सुनता हूं, नायक कि अवस्था मात्र बीस वर्ष कि हैं.। ' द्रविड़राज केँ मुख पर्र उद्वेग एवं चिंता स्पष्ट होँ उठी थि।
'सिर्फ बीस वर्ष कि अवस्था मे इतनी बड़ी सेना कां संचालन करना असम्भव-सां प्रतीत होता हैं औऱ किरातों मे इतना शौर्य कहां कि वे युद्ध कां तीव्र गति सें संचालन कर सकें? महापुजारी बोले।
'किरात नहि हौ सकता वो महापुजारी जी। '
'श्रीसम्राट कां मात्र अनुमान केवल हैं याँ विश्वास भि.?'
'नं जाने क्यूं हृदय मे ये विश्वास दृढ़ होताजा रहा हैं, महापुजारी जी कि वो किरात नहि हौ सकता। मेरे अंत:स्थल मे कौतूहल-मिश्रित हाहाकार मूत हौ उठा हैं। उसेसहन करना असह्य हौ गय़ा हें असीम वेदना कां मारवहन करनाअब मेरेलिए दुष्कर हैं। सांत्वना दीजिये महापुजारी जी। ' द्रविड़राज नें अवरुद्ध कंठ सें कहा।
महापुजारी मौनरहे।
एक् क्षण केँ लिए उन्होंने नेत्र बंदकर न् जाने क्याँ सोचा। तब उनकी गंभीर आकृति नें औऱ गंभीरता धारणकर ली।
उनके नेत्रद्वय अरुणिम हौ उठे। द्रविड़राज स्थिर दृष्टि सें महापुजारी कि उद्दीप्त मुखाकृति कि औऱ देखते रहे। 'महामाया जोँ कुछ करती हैं, अच्छा हि करती हैं श्रीसम्राट !' महापुजारी बोले-'प्रत्येक कार्य मे उनकीआगम महिमा अंतर्हित रहती हैं। आपकोयही उचित हैं कि धैर्य स्मरण कर अपनी सारी मानसिक अशांति एवं प्रलयंकार उद्वेग अपने सें दूरभगा दें, इसी मे आपका कल्याण हैं.। '
"ये असम्भव हैं महापुजारी जी। ' द्रविड़राज व्यथित हौ उठे—'मेरी दशा तौ देखिये, मे अभागा सम्राट एक् साधारण शख्स सें भि ज्यादा संतप्त हूं। ऐश्वर्यवान होकर हि मैंने दुश्चिन्ता मे अपनाबदन विदग्ध कर डाला हैं। मेरीमदद कीजिये महापुजारी जी। '
'श्रीसम्राट क्याँ चाहते हें?' महापुजारी नें पूछा।
उनके नेत्र सम्राट कि मुखाकृति पर्र स्थिर हौ गये—द्रविड़राज कों ऐसालगा मानोउन दोनों नेत्रों सें दो दाहक ज्वालायें निकलकर उनके अंत:स्थल मे प्रविष्ट हौ गई हों औऱ अपनी समस्त दाहक शक्ति द्वारा उनके हृदय कां रक्त शोषणकर रहीहों।
'मे एक् बार युद्ध मे चलकरउस किरात युवक कों देख्ना चाहता हूं। ' द्रविड़राज नें कहा।
'इस सें लाभ। ' महापुजारी नें पूछा।
'मेरे हृदय कि पुकार हैं ये। '
आपके हृदय मे ममत्व कां रोरमच रहा हैं, श्रीसम्राट। ' महापुजारी कठोर स्वर मे बोले —'सम्राट होकर आप् अपने हृदय पऱ नियन्त्रण नहि रख सकते। '
'मे इस वक्त सम्राट नहि, एक् संतप्त शख्स हूं, महापुजारी जी। मे किसी देवी प्रकोप सें अक्रांत एक् दयनीय प्राणी हूं, मेरी अवस्था पर्र दया कीजिये-अब तक आपकी समस्त आज्ञाओं कां पालन मैंने किया हैं, आज मेरेइस क्षुद्र अनुरोध कां तिरस्कार आप् नं करें। '
'श्री सम्राट.!'
'ज्यादा विलम्ब होने सें सम्भव हैं कोई बहोत बड़ा अनिष्ट हौ जाये। जाने क्यूं मेरा हृदय तीव्र वैग सें प्रकम्पित हौ रहा हैं। '
'चलिए। मे युद्ध शिविर मे चलने कों प्रस्तुत हूं। ' महापुजारी बोले- 'गुप्तमार्ग द्वारा चलने सें हम् लोग तीसरे प्रहर तक युद्ध शिविर मे पहुंच जायेंगे। '
महापुजारी उठे। प्रकोष्ठ सें अपना पीताम्बर लेकर कंधे पर्र रखा औऱ तीव्र वेग सें सम्राट केँ संग बाहर् होँ गये।
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-- 'किन्नरी.!' चक्रवाल नें पुकारा परन्तु कुछ उत्तर न् मिला। चक्रवाल नें प्रकोष्ठ केँ बंद दरवाज़ा पर्र कई थपकी दि, परन्तु भीतर सें कुछ भि उत्तर नं मिला। चक्रवाल कों आश्चर्य हुआएवं भय भि। नं जाने प्रकोष्ठ केँ भीतर किन्नरी क्याँ कररही हैं?
'किन्नरी! निहारिका.!' चक्रवाल नें पुन:कई बार पुकारा, परन्तु उत्तर न् मिला थां, नं मिला।
चक्रवाल कां हृदय आशंका सें भर गय़ा। वो किन्नरी केँ प्रकोष्ठ कि छोटी सि खिड़की केँ नीचेआया। खिड़की केँ कपाटबंद थें, परन्तु हल्का-सां धक्का देते हि खुलगये। उसने प्रकोष्ठ केँ भीतर झांका। देखा, किन्नरी निहारिका अस्त-व्यस्त सि बिस्तर केँ किनारे पड़ी हैं। उसके नेत्र बंद हैं। कपोलों पर्र मुक्ता। सदृश अश्रु-बिन्दु झलकरहे हें।
'निहारिका!' चक्रवाल नें तीव्र स्वर मे पुकारा। निहारिका नि:शब्द रही, सिर्फ उसका जिस्म एक् बार मंथरगति सें प्रकम्पित हुआएवं उसके कालीघटा जैसेकेश, वायु कां स्पर्श पाकर आरक्त कपोलों पर्र लौटने लगे।
'दरवाज़ा खोलो.कब सें खड़ा पुकार रहा हूं मे.। '
'.' अब निहारिका नें धीरे-धीरे सें अपना मस्तक उठाकर खिड़की कि ओर देखा। चक्रवाल कों महान् आश्चर्य हुआ, किन्नरी कि दयनीय दशा देखकर। निहारिका केँ नेत्र रोते-रोते एकदम रक्तवर्ण हौ रहे थें।
'तुम् रोरही हौ.? रोरही होँ तुम्। मे एक् आवश्यक मेसेज लेकरकब सें तुम्हारे दरवाज़ा पर्र खड़ा हूं औऱ तुम् रोरही होँ?'
"क्याँ करूं चक्रवाल। सभीकुछ तौ खो चुकी हूं उस देवता कि मधुर स्मृति मे, यह अश्रुकण हि तोँ शेष हें जौ मेरे सुख-दुख केँ दोस्त हें। इन्हें केसेखो सकती हूं.?'
किन्नरी नें शिथिल पैरों सें आगे बढ़कर दरवाज़ा खोला। चक्रवाल भीतर प्रविष्ट हुआ।
"युद्ध-शिविर सें कोई भयानक समाचार आया हैं.। ' चक्रवाल नें कहा।
'कैसा भयानक समाचार?'
'पता नहि, परन्तु सेना हैं कि युद्धक्षेत्र सें एक् सैनिक आया थां। देखा नहि, जब हम् औऱ तुम् महापुजारीजी केँ पास बैठे थें, तोँ श्रीसम्राट नें कैसी उदीप्त भंगिमा धारण कियेहुए पदार्पण किया थां.याद हैं?'
'ओह महामाया.! क्याँ होने वाला हैं.?' किन्नरी बोलीं— 'मे मरण नृत्य करना चाहती हूं चक्रवाल। मुझेकुछ ऐसी विश्वास हौ रहा हैं कि श्रीयुवराज कदाचित् अब.। '
'कैसी बातें करती होँ.। ' चक्रवाल नें मधुर झिकी दि— 'महापुजारी जीएवं श्रीसम्राट मे बहोत काल तक वार्तालाप हुआ हैं औऱ दोनों गुप्तमार्ग द्वारा युद्ध शिविर कि ओरगये हें। '
'युद्ध-शिविर कि ओर.?'सिहर उठी निहारिका—'ज़रूर चिन्तनीय समाचार रहा होगा। मुझे लें चलो, चक्रवाल। मे भि युद्ध-शिविर कि ओर चलना चाहती हूं। ' चलो विलम्ब नं करो.उन पर्र जाने क्याँ बीतरही होगी.?'
'गुप्त रास्ता द्वारा श्रीसम्राट एवं महापुजारी जी नें प्रस्थान किया हैं—हम् लोग केसे चलेंगे। '
'कोई द्रुतगामी रथ कि व्यवस्था करो, चक्रवाल। मेरी अवस्था पर्र दयाकरो। '
'मे अभि व्यवस्था करता हूं। ' तीव्र गति सें चक्रवाल किन्नरी केँ प्रकोष्ठ सें बाहर् हौ गय़ा।
करीब-करीब घड़ीभर पश्चात् घनघोर बनस्थली कों भेदन करताहुआ एक् दुतगामी रथ वायुवेग सें दौड़ा जारहा थां।
चालक केँ जगह पऱ खुद चक्रवाल विराजमान थां एवंरथ केँ अंतप्रदेश मे आसीन थि सौंदर्यराशि किन्नरी निहारिका।
चक्रवाल कां मधुर स्वर वातावरण कों सरलबना रहा थां जौ केलि कुंज मे तुमको, कंकड़ी उन्होंने मारी। क्याँ कसकरही हैं वो अब भि, तेरेउर मे सुकुमारी.|
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चौदह
पर्णिक कि माता अपने झोंपड़े मे किसी आवश्यक कार्य मे व्यस्त थि। उसी वक्त झोंपड़े केँ दरवाज़ा सें किसी नें पुकारा—'माताजी!'
पर्णिक कि माता हर्ष-विह्वल हौ दौड़ पड़ी, कुटिया केँ दरवाज़ा कि ओर। उसे लगा, जैसेखुद पर्णिक युद्धक्षेत्र सें लौटआकर स्नेहमयी वाणी मे उसे पुकार रहा हौ, परन्तु दरवाज़ा पऱ दुमुख कों खड़ा देखकर उसका हृदय धड़कउठा। पर्णिक कां भेजाहुआ दुर्मुर्ख अभि-अभि हि वहां पहुँचा थां। 'दुर्मुख तुम्.!' पर्णिक कि माता आश्चर्य सें बोलि—'युद्ध क्षेत्र सें आँ रहे होँ नं? पर्णिक सकुशल तौ हैं.?' ___
'हां माताजी। ' दुर्मख नें उत्तर दिया-'पर्णिक सकुशल हैं.युद्ध कि प्रगति इधरकुछ हि दिनों सें बड़ी भयंकरता धारण करतीजा रही हैं। यदि युद्ध इसी प्रकार भयावह गति सें चलतारहा तोँ हमारी पराजय निश्चित हैं। '
-
'आर्य सम्राट कि सेना ज़्यादा बलशाली हैं क्याँ.?'
'आर्य सम्राट कि सेना। ' चौंक पड़ा दुर्मुख।
एक् लम्हा तक चुप रहकर उसने नं जाने क्याँ सोचा। जल्दी हि उसे ध्यान हौ आया कि अभि तक पर्णिक कि माता यहीसमझ रही हैं कि पर्णिक कि किरात सेना स्वदेश केँ रक्षार्थ, आर्य सम्माट सें युद्ध कररही हैं।
अभि तक इसबात कां तनिक भि आभास नहि होने दिया थां उसने कि उसका पुत्र इस टाइम आर्य सम्राट कि मददकर रहा हैं 'नहि माताजी। हम् लोग आर्य सम्राट सें युद्ध नहि कररहे हें.। ' दुर्मुख नें कहा।
'आर्य सम्राट सें युद्ध नहि कररहे हौ.?' आश्चर्यचकित हौ उठी पर्णिक कि माता—'तब किससे युद्ध कररहे हौ तुम् लोग?'
'द्रविड़राज कि सेना सें। ' दुर्मुख बोला।
'तोँ आर्य सम्राट कि मददकर रहे हौ तुम् लोग?' प्यास उठी बह—'जोँ उतनीदर सें तुम्हारे देश कों नष्ट करनेआया हैं, उसी कि मददकर रहे हौ तुम् लोग दुर्मुख.! अपने पुराना गौरव कि निर्मूल कर विदेशी सत्ता कि जड़ें स्थापित करना चाहते होँ तुम् लोग। क्याँ पार्णिक कि सम्मति सें येसभी कार्य हुआ हैं.?'
'जीहां माताजी। उनकी पूर्ण सम्मति सें। ' पर्णिक कि माता कां उग्ररूप देखकर दुर्मुख भयभीत होँ गय़ा थां।
'पर्णिक इतना निकृष्ट केसे होँ गय़ा? मेरी शिक्षा कों उसने एकदम विस्मृत केसेकर दिया। '
'माताजी! पहले पर्णिक आर्य सम्राट कि मदद करने कों सहमत नहि थें, परन्तु खुद आर्य सम्राट नें उनकेपास आकरमदद कि याचना कि.। '
'मदद कि याचना कि औऱ पर्णिक नें उन्हें मदद देना स्वीकार कर लिया, क्यूं?'
'नहि, उन्होंने फिन अस्वीकार कर दिया थां। परन्तु जब आर्य सम्राट आपका अपमान करने लगे—'क्याँ तुम्हारी माता नें तुम्हें यही सिखाया हैं कि अपने चरणों मे आयेहुए भिक्षुक कों ठोकर मारकर लौटादो तोँ वे चिंता मे पड़गये.। '
'.। ' चौंक पड़ी पर्णिक कि माता अपनी शिक्षा कां विपरीत परिणाम सुनकर।
'इसी प्रकार आर्य सम्राट नें अन्य बहोत-सि बातें कहकर आपका अनादर किया। जिसे सुनकर पर्णिक कों बहोत गुस्स आया। उन्होंने आर्य सम्राट कों द्वन्द्व युद्ध मे पराजित कर आपके अपमान कां प्रतिशोध लिया, तत्पश्चात् आपके सम्मान कि रक्षार्थ उन्होंने आर्य सम्राट कों मदद देना स्वीकार कर लिया।
'मेरे सम्मान कि रक्षार्थ.' पुलकित हौ उठीवे, परन्तु दूसरे हि क्षण उनकी मुखाकृति परिवर्तित होँ गई—'मेरे सम्मान कि रक्षार्थ उसने एक् विदेशी कि मदद करना स्वीकार कर लिया? मेरे सम्मान कि रक्षार्थ उसने अनहोनी कों होनीकर दिखाया, परन्तु उसने अपनी जन्मभूमि केँ सम्मान कि रक्षार्थ क्याँ किया.?''
आवेश मे रो पड़ी वे—'एक् क्षुद्र जननी केँ लिए उसने इतना किया तौ क्याँ जननी जन्मभूमि केँ लिए आत्मोत्सर्ग करना उसने आवश्यक नहि समझा? जन्मभूमि केँ सम्मान सें ज्यादा उसने मेरे अपमान कों महत्त्व दिया?ओह दुर्मुख! क्याँ किया तुम् लोगों नें? क्याँ यही हैं तुम् लोगों कां स्वदेशाभिमान.?'
'आजकई दिनों सें हमारी पराजय होँ रही हैं। आर्य सम्राट कि असंख्य सेना कों शत्रु कि एक् सीमित सेना शिथिल करतीजा रही हैं। खुद पर्णिक जौ कि आजकल आर्य सेना केँ प्रमुख संचालक हें अत्यधिक आश्चर्यचकित होँ उठे हें.? कल युद्ध मे एक् अघटित घटनाघट गई, जिसके लिए मुझे यहां तक आनां पड़ा.। '
'कौन सि घटना?'
'कल मध्यान्ह मे जबकि युद्ध भयानक गति पऱ थां, पर्णिक केँ गले सें आपका दियाहुआ रत्नहार कहींगिर गय़ा.। '
'गिर गय़ा?' आश्चर्य एवं उद्वेग सें चीत्कार करउठी वे—'कहां गिर गय़ा?'
'रणक्षेत्र मे। '
'आजकल आर्य सेना किससे युद्ध कररही हैं.?' पर्णिक कि माता नें पुन:पूछ।
'द्रविड़राज सें?'
'द्रविड़राज सें.? द्रविड़राज सें युद्ध हौ रहा हैं? औऱ पर्णिक उनके विरुद्ध आर्य सेना कां संचालन कररहा हैं? धड़ाम सें गिर पड़ी भूमि पऱ।
उनके नेत्रों केँ समक्ष अंधकार छा गय़ा। उनके अन्त:स्थल मे हाहाकार पूर्ण कोलाहल उठ खड़ाहुआ।
'महामाया! येसभी क्याँ होँ रहा हैं। आजबीस वर्षों केँ पश्चात् अब कौन-सां प्रलयंकारी दृश्य देखने कों मिलेगा.?
' उन्हें स्नेहपूर्वक उठाते हुए सांत्वनापूर्ण स्वर मे दुर्मुख बोला
—'क्याँ हैं माताजी.आप् इतनी उद्विग्न क्यूं हौ गई?' __
'प्रलय कां आह्वान करअबपूछ हरे होँ मेरी उद्विग्नता कां कारण? मेरे हृदय केँ शत्-शत् खंड करकेअब चाहते हौ सांत्वना देना?'
'माताजी! यदिकोई अक्षम्य अपराध हुआ हैं तोँ उसकेलिए समुदाय कि ओर सें क्षमाप्रार्थी हूं। कल जोँ आपकी आज्ञा होगी, उसके अनुसार कार्य करने कों हम् प्रस्तुत हैं। '
'आज्ञा?' एक् क्षण तक कुछ सोचा पर्णिक कि माता नें—'मे इसी क्षण युद्धक्षेत्र कों प्रस्थान करना चाहती हूं.ये क्याँ? मेरी दक्षिण भुजा फड़कने कां कारण? दुर्मुख! कोई प्रलयंकारी अनिष्ट सन्निकट हैं। तुम् एक् द्रुतगामी अश्व अभि लाओ। मे इसी वक्त युद्ध-क्षेत्र कों प्रस्थान करूंगी, नहि तौ अनर्थ हौ जायेगा, प्रलय होँ जायेगा। '
दुर्मुख दौड़ गय़ा औऱ कुछ हि देर मे एक् अश्वलिए हुए आँ उपस्थित हुआ। एक् अश्व पऱ दुर्मुख औऱ दूसरे पऱ पर्णिक कि माता सवार होँ रणक्षेत्र कि औऱ चल पड़े।
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