अलंकार – New Episode
कोटा केँ पीछ सहस्त्रों मनुष्यों कां जुलूस चला औऱ जलतट पऱ सैनिकों कि वर्दियां औऱ राज्यकर्मचारियों केँ चुगेही-चुगे दिखाई देनेलगे। इन चुगों मे चौड़ी बैंगनी रंग कि गांठलगी थि, जोँ रोम कि व्यवस्थापकसभा केँ सदस्यों कां सम्मानचिह्न थि। कोटाउस पवित्र स्तम्भ केँ समीपरुक गय़ा औऱ महात्मा पापनाशी कों ध्यान सें देखने लगा। गरमी केँ कारण अपने चुगे केँ दामन सें मुंह पर्र कां पसीना वो पोंछता थां। वो स्वभाव सें विचित्र अनुभवों कां परेमी थां, औऱ अपनी जलयात्राओं मे उसने कितनी हि अद्भुत बातें देखीथीं। वो उन्हें स्मरण रखना चाहता थां। उसकी ख़्वाहिश थि कि अपना वर्तमान इतिहासगरन्थ खत्म करने केँ बाद अपनी समस्त यात्राओं कां वृत्तान्त लिखे औऱ जोजो अनोखी बातें देखी हें उसका उल्लेख करे। ये दृश्य देखकर उसे बहोत दिलचस्पी हुईँ।
उसने खांसकर कहा-’विचित्र बात हैं ! औऱ ये पुरुष मेरा मेहमान थां। मे अपने यात्रावृत्तान्त मे वो ज़रूर लिखूंगा। हां, गतवर्ष इस पुरुष नें मेरे यहां दावत खायी थि, औऱ उसके एक् हि दिनबाद एक् वेश्या कों लेकरभाग गय़ा थां। ’
फिन अपने मन्त्री सें बोला-’पुत्र, मेरे पत्रों पऱ इसका उल्लेख करदो। इसे स्तम्भ कि लम्बाईचौड़ाई भि दर्जकर देना। देख्ना, शिखर पर्र जौ गाय कि मूर्ति बनी हुइ हैं, उसे नं भूलना। ’
तबफिन अपना मुंह पोंछकर बोला-’मुझसे विश्वस्त पराणियों नें कहा हैं कि इस योगी नें सालभर सें एक् क्षण केँ लिए भि नीचेकदम नहि रखा। क्यूं अरिस्टीयस ये सम्भव हैं ! कोई पुरुष पूरेसाल भर तक आकाश मे लटकारह सकता हैं?’
अरिस्टीयस नें उत्तर दिया-किसी अस्वस्थ याँ उन्मत्त पराणी केँ लिए जोँ बात सम्भव हैं। आपको शायदये बात नं मालूम होगी कि कतिपय शरीरिक औऱ मानसिक विकार न् हौ, असम्भव हैं। आपको शायदये बात नं मालूम होगी कि कतिपय शारीरिक औऱ मानसिक विकारों सें इतने अद्भुत शक्ति आँ जाती हैं जोँ तन्दुरुस्त आदमियों मे कभी नहि आँ सकती। क्योंकि यथार्थ मे अच्छा स्वास्थ्य याँ बुरा स्वास्थ्य खुदकोई वस्तु नहि हैं। वो जिस्म केँ अंगपरत्यंग कि भिन्नभिन्न दशाओं कां नाममात्र हैं। रोगों केँ निदान सें मैंने वो बात सिद्ध कि हैं कि वो भि जिंदगी कि आवश्यक अवस्थाएं हें। मे बड़े परेम सें उनकी मीमांसा करता हूं, इसलिये कि उन पऱ विजय पराप्त कर सकूं। उनमें सें कई बीमारियां परशंसनीय हैं औऱ उनमें बहिर्विकार केँ रूप मे अद्भुत आरोग्यवर्द्धक शक्ति छिपी रहती हैं। उदाहरणः कभीकभी शारीरिक विकारों सें बुद्धिशक्तियां परखर होँ जाती हें, बड़ेवेग सें उनका विकास होने लगता हैं। आप् सिरोन कों तौ जानते हें। जबवल बालक थां तोँ वो तुतलाकर बोलता थां औऱ मन्दबुद्धि थां। मगरजब एक् सी़ी पर्र सें गिर जाने केँ कारण उसकी कपालित्र्कया हौ गयीँ, तौ वो उच्चश्रेणी कां वकील निकला, जैसाकि आप् खुददेख रहे हें। इस योगी कां कोई गुप्त अंग ज़रूर हि विकृत हौ गय़ा हैं। इनके अतिरिक्त इस अवस्था मे जिंदगी व्यतीत करना इतनी असाधारण बात नहि हैं, जितनी आप् समझरहे हें। आपको भारतवर्ष केँ योगियों कि याद हैं ? वहां केँ योगीगण इसी भांति बहोत दिनों तक निश्चल रह सकते हें-एकदो वर्ष नहि, बल्कि बीस, तीस, चालीस वर्षों तक। कभीकभी इससे भि ज्यादा। यहां तक कि मैंने तौ सुना हैं कि वो निर्जल; निराहार सौसौ वर्षों तक समाधिस्थ रहते हें। ’
कोटा नें कहा-भगवान कि सौगन्ध सें कहता हूं, मुझेये दशा अत्यन्त कुतूहलजनक मालूम हौ रही हैं। ये निराले परकार कां पागलपन हैं। मे इसकी परशंसा नहि कर सकता, क्योंकि मनुष्य कां जन्म चलने औऱ काम करने केँ निमित्त हुआ हैं औऱ उद्योगहीनता सामराज्य केँ परति अक्षम्य अत्याचार हैं। मुझेऐसे किसी धर्म कां ज्ञान नहि हैं जोँ ऐसी आपत्तिजनक त्रि्कयाओं कां आदेश करता हौ। सम्भव हैं, एशियाई सम्परदायों मे इसकी व्यवस्था हौ। जब मे साम (सीरिया) कां सूबेदार थां तौ मैंने ‘हेरा’नगर केँ दरवाज़ा पर्र एक् ऊंचा चबूतरा बनाहुआ देखा। एक् व्यक्ति साल मे दोबार उस पर्र च़ता थां औऱ वहांसात दिनों तक चुपचाप बैठा रहता थां। लोगों कों विश्वास थां कि ये पराणी देवताओं सें बातें करता थां औऱ सामदेश कों धनधान्यपूर्ण रखने केँ लिए उनसे विनय करता थां। मुझेये परथा निरर्थकसी जान पड़ी, लेकिन मैंने उसे उठाने कि चेष्टा नहि कि। क्योंकि मेरा विचार हैं कि राज्यकर्मचारियों कों परजा केँ रीतिरिवाजों मे हस्तक्षेप न् करना चाहिए, बल्कि इनको मयार्दित रखना उनका कर्तव्य हैं। शासकों कि नीति कदापि न् होनी चाहिए कि परजा कों किसी विशेष मत कि ओर खींचें, बल्कि उथको‘उसी मत कि रक्षा करनी चाहिए जोँ परचलित होँ, चाहे वो अच्छा हौ याँ बुरा, क्योंकि देश, काल औऱ जाति कि परिस्थिति केँ अनुसार हि उसका जन्म औऱ विकास हुआ हैं। अगर शासन किसीमत कों दमन करने कि चेष्टा करता हैं, तोँ वो अपने कों विचारों मे त्र्कान्तिकारी औऱ व्यवहारों मे अत्याचारी सिद्ध करता हैं, औऱ परजा उससे घृणाकरे तौ सर्वथा क्षम्य हैं। फिन आप् जनता केँ मिथ्या विचारों कां सुधार क्योंकर कर सकते हें अगर तुम् उनको समझने औऱ उन्हें निरक्षेप भाव सें देखने मे असमर्थ हें ? अरिस्टोयस, मेरा विचार हैं कि इस पक्षियों केँ बसाये हुए मेघनगर कों आकाश मे लटका रहनेदूं। उस पर्र नैसर्गिक शक्तियों कां कोप हि क्याँ कम हैं कि मे भि उसको उजाड़ने मे अगरसर बनूं। उसके उजाड़ने सें मुझे अपयश केँ सिवा औऱ कुछहाथ नं लगेगा। हां, इस आकाश निवासी योगी केँ विचारों औऱ विश्वासों कों लेखबद्ध करना चाहिए।
ये कहकर उसनेफिन खांसा औऱ अपने मन्त्री केँ कन्धे पऱ हाथ रखकर बोला-’पुत्र, नोटकर लो कि ईसाई सम्परदाय केँ कुछ अनुयायियों केँ मतानुसार स्तम्भों केँ शिखर पऱ रहना औऱ वेश्याओं कों लें दौड़ना सराहनीय कार्य हैं। इतना औऱ ब़ादो कि ये परथाएं सृष्टि करने वाले देवताओं कि उपासना केँ परमाण हें। ईसाई धर्म ईश्वरवादी होकर देवताओं केँ परभाव कों अभि तक नहि मिटासका। मगरइस विषय मे हमेंखुद इस योगी हि सें जिज्ञासा करनी चाहिए।
तबफिन उठाकर औऱ धूप सें आंखों कों बचाने केँ लिए हाथों कि आड़ करके उसने उच्चस्वर मे कहा-इधर देखो पापनाशी ! अगर तुम् अभि ये नहि भूले हौ कि तुम् एक् बार मेरे मेहमान रह चुके हौ तौ मेरी बातों कां उत्तर दो। तुम् वहां आकाश पर्र बैठे क्याँ कररहे होँ ? तुम्हारे वहां जाने कां औऱ रहने कां क्याँ उद्देश्य हैं ? क्याँ तुम्हारा विचार हैं कि इस स्तम्भ पऱ च़कर तुम् देश कां कुछ कल्याण कर सकते हौ ?
पापनाशी नें कोटा कों सिर्फ परतिमावादी तुच्छ दृष्टि सें देखा औऱ उसेकुछ उत्तर देने योग्य नं समझा। मगर उसका शिष्य लेवियन समीपआकर बोला-’मान्यवर, वो ऋषि समस्त भूमण्डल केँ पापों कों अपनेऊपर लेता औऱ रोगियों कों आरोग्य परदान करता हैं। ’
कोटा-’शपथ खुदा कि, ये तौ बड़ी दिल्लगी कि बात हैं तुम् कहते होँ अरिस्टीयस, ये आकाशवासी महात्मा चिकित्सा करता हैं। ये तौ तुम्हारा परतिवादी निकला। तुम् ऐसे आकाशरोही वैद्य सें क्योंकर पेशपा सकोगे ?’
अरिस्टीयस नें सिर हिलाकर कहा-ये बहोत सम्भव हैं कि वो बाजेबाजे रोगों कि चिकित्सा करने मे मुझसे कुशल होँ। अदाहरणतः मिरगी हि कों लेँ लीजिए। गंवारी बोलचाल मे लोगइसे ‘देवरोग’ कहते हें, यद्यपि सबरोग दैवी हें, क्योंकि उनके सृजन करने वाले तौ देवगण हि हें। मगरइस विशेष रोग कां कारण अंशतः कल्पनाशक्ति मे हैं औऱ आप् ये रोगियों कि कल्पना पऱ जितना परभाव डाल सकता हैं, उतना मे अपने चिकित्सालय मे खरल औऱ दस्ते सें औषधियों घोंटकर कदापि नहि डाल सकता। महाशय, कितनी हि गुप्त शक्तियां हें जोँ शास्त्र औऱ बुद्धि सें कहीं ब़कर परभावोत्पादक हें। ’
कोटा-’वो कौन शक्तियां हें ?’
अरिस्टीयस-’मूर्खता औऱ अज्ञान। ’
कोटा-’मैंने अपनी बड़ीबड़ी यात्राओं मे भि इससे विचित्र दृश्य नहि देखा, औऱ मुझेआशा हैं कि कभीकोई सुयोग्य इतिहासलेखक ‘मोचननगर’ कि उत्पत्ति कां सविस्तार वर्णर करुंगा। मगर हम् जैसी बहुधन्धी मनुष्यों कों किसी वस्तु केँ देखने मे चाहे वो कितनाही कुतूहलजनक क्यूं न् होँ, अपना बहोत वक्त न् गंवाना चाहिए। चलिए, अब नहरों कां निरीक्षण करें। अच्छा पापनाशी, नमस्ते। फिनकभी आऊंगा। मगरअगर तुम् फिनकभी पृथ्वी पऱ उतरो औऱ इस्कन्द्रिया आने कां संयोग होँ तौ मुझे नं भूलना। मेरे दरवाज़ा तुम्हारे स्वागत केँ लिए नित्य खुले हें। मेरे यहांआकर ज़रूर भोजन करना। ’
हजारों मनुष्यों नें कोटा केँ ये शब्द सुने। एक् नें दूसरे सें कहा-ईसाइयों मे औऱ भि नमक मिर्च लगाया। जनता किसी कि परशंसा बड़े अधिकारियों केँ मुंह सें सुनती हैं तौ उसकी दृष्टि मे उस परशंसित मनुष्य कां आदरसम्मान सतगुण ज़्यादा हौ जाता हैं। पापनाशी कि ओर भि ख्याति होनेलगी। सरलहृदय मतानुरागियों नें इन शब्दों कों औऱ भि परिमार्जित औऱ अतिशयोक्तिपूर्ण रूपदे दिया। किंवदन्तियां होने लगीं कि महात्मा पापनाशी नें स्तम्भ केँ शिखर पर्र बैठेबैठे, जलसेना केँ अध्यक्ष कों ईसाई धर्म कां अनुगामी बना लिया। उसके उपदेशों मे ये जादू हैं कि सुनते हि बड़ेबड़े नास्तिक भि मस्तक झुका देते हें। कोटा केँ अन्तिम शब्दों मे भक्तों कों गुप्त आशय छिपाहुआ परतीत हुआ। जिस स्वागत कि उस उच्च अधिकारी नें सूचना दि थि वो साधारण स्वागत नहि थां। वो वास्तव मे एक् आध्यात्मिक भोज, एक् स्वगीर्य सम्मेलन, एक् पारलौकिक संयोग कां निमंत्रण थां। उस सम्भाषण कि कथा कां बड़ा अद्भुत औऱ अलंकृत विस्तार किया गय़ा। औऱ जिनजिन महानुभावों नें ये रचना कि उन्होंने खुद पहलेउस पऱ विश्वास किया। कहा जाता थां कि जब कोटा नें विशद तर्कवितर्क केँ पश्चात सत्य कों अंगीकार किया औऱ परभु मसीह कि शरण मे आया तोँ एक् स्वर्गदूत आकाश सें उसके मुंह कां पसीना पोंछने आया। ये भि कहा जाता थां कि कोटा केँ संग उसके वैद्य औऱ मन्त्री नें भि ईसाई धर्म स्वीकार किया। मुख्य ईसाई संस्थाओं केँ अधिष्ठाताओें नें ये अलौकिक समाचार सुना तौ ऐतिहासिक घटनाओं मे उसका उल्लेख किया। इतने ख्यातिलाभ केँ बादये कहना किंचित केवल भि अतिशयोक्ति न् थि कि सारा संसार पापनाशी केँ दर्शनों केँ लिए उत्कंठित होँ गय़ा। पराच्य औऱ पाश्चात्य दोनों हि देशों केँ ईसाइयों कि विस्मित आंखें उनकीओर उठने लगीं। इटली केँ परधान नगरों नें उसकेनाम अभिनन्दनपत्र भेजे औऱ रोम केँ कैंसर कॉन्स्टैनटाइन नें, जौ ईसाई धर्म कां पक्षपाती थां उनकेपास एक् पत्र भेजा। ईसाईदूत इस पत्र कों बड़े आदरसम्मान केँ संग पापनाशी केँ पास लाये। मगर एक् रात कों जब वो नवजात नगरहिम कि चादरओ़े सोरहा थां, पापनाशी केँ कानों मे ये शब्द सुनाई दिये-पापनाशी, तुँ अपने कर्मों सें परसिद्ध औऱ अपने शब्दों सें शक्तिशाली होँ गय़ा हैं। भगवान नें अपनी कीर्ति कों उज्ज्वल करने केँ लिए तुम्हे इस सवोर्च्च पद पर्र पहुंचाया हैं। उसने तुम्हें अलौकिक लीलाएं दिखाने, रोगियों कों आरोग्य परदान करने, नास्तिकों कों सन्मार्ग पऱ लाने, पापियों कां उद्घार करने, एरियन केँ मतानुयायियों केँ मुख मे कालिमा लगाने औऱ ईसाईजगत मे शान्ति औऱ सुखसामराज्य स्थापित करने केँ लिए नियुक्त किया हैं। ’
पापनाशी नें उत्तर दिया-’परमेश्वर कि जैसी आज्ञा। ’
फिन आवाज़ आयी थि-’पापनाशी, उठजा, औऱ विधमीर कॉन्सटेन्स कों उसके राज्यपरासाद मे सन्मार्ग पऱ ला, जोँ अपने पूज्य बन्धु कॉन्सटेनटाइन कां अनुकरण नं करके एरियस औऱ माक्र्स केँ मिथ्यावाद मे फंसाहुआ हैं। जा, विलम्ब न् कर। अष्टधातु केँ फाटक तेरे पहंुचते हि आपही-आप् खुल जायेंगे, औऱ तेरी पादुकाओं कि ध्वनि; कैसरों केँ सिंहासन केँ सम्मुख सजेभवन कि स्वर्णभूमि पऱ परतिध्वनित होगी औऱ तेरी परतिभामय वाणी कॉन्स्टैनटाइन केँ पुत्र केँ हृदय कों परास्त कर देगी। संयुक्त औऱ अखण्ड ईसाई सामराज्य पर्र राज्य करेगा औऱ जिस परकार जीवदेह पर्र शासन करता हैं, उसी परकार ईसाई धर्म सामराज्य पऱ शासन करेगा। धनी, रईस, राजयाधिकारी, राज्यसभा केँ सभासद सब तेरे अधीन होँ जायेंगे। तूँ जनता कों लोभ सें मुक्त करेगा औऱ असभ्य जातियों केँ आत्र्कमणों कां निवारण करेगा। वृद्ध कोटा जौ इस वक़्त नौकाविभाग कां परधान हैं। तुम को शासन कां कर्णधार बनाहुआ देखकर तेरेचरण धोयेगा। तेरे शरीरान्त होने पर्र तेरी मृतदेह इस्कन्द्रिया जायेगी औऱ वहां कां परधान मठधारी उसे एक् ऋषि कां स्मारकचिह्न समझकर उसका चुम्बन करेगा ! जा !’
पापनाशी नें उत्तर दिया-’भगवान कि जैसी आज्ञा !’
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ये कहकर उसने उठकर खड़े होने कि चेष्टा कि, लेकिन उस आवाज़ नें उसकी ख़्वाहिश कों ताड़कर कहा-’सबसे महत्व कि बातये हैं कि तुँ सी़ी द्वारा मतउतर ! ये तोँ साधारण मनुष्यों कीसीबात होगी। भगवान नें तुम्हें अद्भुत शक्ति परदान कि हैं। तुझ जैसे परतिभाशाली महात्मा कों वायु मे उड़ना चाहिए। नीचेकूद पड़, स्वर्ग केँ दूत तुझेही संभालने केँ लिए खड़े हें, तुरन्त कूदपड़। ’
पापनाशी न् उत्तर दिया-’भगवान कि इस संसार मे उसी भांति विषय हौ जैसे स्वर्ग मे हैं!’
अपनी विशाल बांहें फैलाकर, मानो कि बृहदाकर पक्षी नें अपने छिदरे पंख फैलाये हों, वो नीचे कूदने वाला हि थां कि सहसा एक् डरावनी, उपहाससूचक हास्यध्वनि उसके कानों मे आयी। भीत होकर उसने पूछा-ये कौनहंस रहा हैं। ’
उस आवाज़ नें उत्तर दिया-’चौंकते क्यूं होँ ? अभि तोँ तुम्हारी मित्रता कां आरम्भ हुआ हैं। एक् दिनऐसा आयेगा जब मुझसे तुम्हारा परिचय घनिष्ठ हौ जायेगा। मित्रवर, मैंने हि तेरीइस स्तम्भ पर्र च़ने कि परेरणा कि थि औऱ जिस निरापदभाव सें तुमने मेरी आज्ञा शिरोधार्य कि उससे मे बहोत परसन्न हूं। पापनाशी, मे तुमसे बहोत खुश हूं। ’
पापनाशी नें भयभीत होकर कहा-’परभु, परभु ! मे तुम्हे अब पहचान गय़ा, खूब पहचान गय़ा। तूँ हि वो पराणी हैं जोँ परभु मसीह कों मन्दिर केँ कलश पऱ लें गय़ा थां औऱ भूमंडल केँ समस्त सामराज्यों कां दिग्दर्शन कराया थां। ’
‘तूँ शैतान हैं ! भगवान्, तुम् मुझसे क्यूं पराङ्मुख हौ ?’
वो थरथर कांपता हुआ भूमि पऱ गिर पड़ा औऱ सोचने लगा-
मुझे पहले इसका ज्ञान क्यूं नं हुआ ? मे उन नेत्रहीन, वधिर औऱ अपंग मनुष्यों सें भि अभागा हूं जोँ नित्य शरणआते हें। मेरी अन्तर्दृष्टि सर्वथा ज्योतिहीन होँ गई, हैं, मुझे दैवी घटनाओं कां अब लेशमात्र भि ज्ञान नहि होता औऱ अब मे उन भरष्टबुद्धि पागलों कि भांति हूं जोँ मिट्टी फांकते हें औऱ मुर्दों कि लाशें घसीटते हें। मे अबनरक केँ अमंगल औऱ स्वर्ग केँ मधुर शब्दों मे भेद करने केँ योग्य नहि रहा। मुझसे अबउस नवजात शिशु कां नैसर्गिक ज्ञान भि नहि रहा जौ माता केँ स्तनों केँ मुंह सें निकल जाने पऱ रोता हैं, उस कुत्ते कासा भि, जौ अपने स्वामी केँ पद चिह्नों कि गन्ध पहचानता हैं, उस पौधे (सूर्यमुखी) कासा भि जोँ सूर्य कि ओर अपनामुख फेरता रहता हैं। मे परेतों औऱ पिशाचों केँ परिहास कां केन्द्र हूं। येसभी मुझ पर्र तालियां बजारहे हें, जोँ अब ज्ञात हुआ, कि शैतान हि मुझे यहां घसीटकर लाया। जब उसने मुझेइस स्तम्भ पऱ च़ाया तौ वासना औऱ अहंकार दोनों हि मेरेसंग च़आये ! मे मात्र अपनी इच्छाओं केँ विस्तार हि सें शंकायमान नहि होता। एटोनी भि अपनी पर्वतगुफा मे ऐसे हि परलोभनों सें पीड़ित हैं। मे चाहता हूं कि इन समस्त पिशाचों कि तलवार मेरीदेह कों छेद स्वर्गदूतों केँ सम्मुख मेरी धज्जियां उड़ा दि जायें। अब मे अपनी यातनाओं सें परेम करनासीख गय़ा हूं। मगर परमेश्वर मुझसे नहि बोलता, उसका एक् शब्द भि मेरे कानों मे नहि आता। उसकाये निर्दय मौन, ये कठोर निस्तब्धता आश्चर्यजनक हैं। उसने मुझे त्याग दिया हैं-मुझे, जिसका उसके सिवा औऱ कोई अवलम्ब न् थां। वो मुझेइस आफत मे अकेला निस्सहाय छोड़े हुए हैं। वो मुझसे दूर भागता हैं, घृणा करता हैं। मगर मे उसका पीछा नहि छोड़ सकता। यहां मेरेपेर जलरहे हें, मे दौड़कर उसकेपास पहुंचूंगा।
ये कहते हि उसने वो सी़ीथाम ली जौ स्तम्भ केँ सहारे खड़ी थि, उस पऱ पांवरखे औऱ एक् डण्डा नीचे उतरा कि उसकामुख गोरूपी कलश केँ सम्मुख आँ गय़ा। उसे देखकर गोमूर्ति विचित्र रूप सें मुस्कराई। उसेअब इसमें कोई सन्देह न् थां कि जिसजगह कों उसने शांतिलाभ औऱ सत्कीर्ति केँ लिए मनपसंद किया थां, वो उसके सर्वनाश औऱ पतन कां सिद्ध हुआ। वो बड़ेवेग सें उतरकर जमीन पर्र आँ पहुँचा। उसके पैरों कों अब खड़े होने कां भि अभ्यास न् थां, वे डगमगाते थें। मगर अपनेऊपर इस पैशाचिक स्तंभ कि परछाईं पड़ते देखकर वो जबरदस्ती दौड़ा, मानो कोइर कैदीभाग जाता हौ। संसार निद्रा मे मग्न थां। वो सबसे छिपाहुआ उसचौक सें होकर निकला जिसके चारों ओर शराब कि दुकानें, सराएं, धर्मशालाएं बनी हुईँ थीं औऱ एक् गली मे घुस गय़ा, जौ लाइबिया कि पहाड़ियों कि ओर जाती थि। विचित्र बातये थि कि एक् कुत्ता भि भूंकता हुआ उसका पीछाकर रहा थां औऱ जब एक् मरुभूमि केँ किनारे तक उसे दौड़ा नं लें गय़ा, उसका पीछा नं छोड़ा। पापनाशी ऐसे देहातों मे पहुँचा जहां सड़कें याँ पगडंडियां नं थीं, सिर्फ वनजन्तुओं केँ पैरों केँ निशान थें। इस निर्जन परदेश मे वो एक् दिन औऱ रात लगातार अकेला भागता चला गय़ा।
अन्त मे जब वो भूख, प्यास औऱ थकान सें इतना बेदम हौ गय़ा कि पैर लड़खड़ाने लगे, ऐसा जान पड़ने लगा कि अब जीता नं बचूंगा तोँ वो एक् नगर मे पहुँचा जोँ दायेंबायें इतनीदूर तक फैलाहुआ थां कि उसकी सीमाएं नीले क्षितिज मे विलीन होँ जातीथीं। चारों ओर निस्तब्धता छायी हुई थि, किसी पराणी कां नाम न् थां। मकानों कि कमी न् थि, पऱ वो दूरदूर पर्र बनेहुए थें, औऱ उन मिस्त्री मीनारों कि भांति दीखते थें जौ बीच मे काट लियेगये हों। सबों कि बनावट एकसी थि, मानो एक् हि इमारत कि बहुतसी नकलें कि गई, हों। वास्तव मे येसभी कबरें थीं। उनके दरवाज़ा खुलेओर टूटेहुए थें, औऱ उनके अन्दर भेड़ियों औऱ लकड़बग्घों कि चमकती हुई आंखें नजरआती थीं, जिन्होंने वहां बच्चे दिये थें। मुर्दे कबरों केँ सामने बाहर् पड़ेहुए थें जिन्हें डाकुओं नें नोचखसोट लिया थां औऱ जंगली जानवरों नें जगहजगह चबा डाला थां। इस मृतपुरी मे बहोत देश तक चलने केँ बाद पापनाशी एक् कबर केँ सामने थककरगिर पड़ा, जौ छुहारे केँ वृक्षों सें ंकेहुए एक् सोते केँ समीप थि। येकबर खूबसजी हुइ थि, उसकेऊपर बेलबूटे बनेहुए थें, लेकिन कोई दरवाज़ा नं थां। पापनाशी नें एक् छिद्र मे सें झांका तौ अन्दर एक् सुन्दर, रंगाहआ तहखाना दिखाई पड़ा जिसमें सांपों केँ छोटेछोटे बच्चे इधरउधर रेंगरहे थें। उसेअब भि यही शंका होँ रही थि कि परमेश्वर नें मेराहाथ छोड़ दिया हैं औऱ मेराकोई अवलम्ब नहि हैं।
उसने एक् दिन दीर्घ नि:श्वास लेकर कहा-’इसी जगह मे मेरा निवास होगा, यही कबरअब मेरे परायश्चित औऱ आत्मदमन कां आश्रयस्था न् होगी। ’
उसकेपेर तौ उठ नं सकते थें, लेटेलेटे खिसकता हुआ वो अन्दर चला गय़ा, सांपों कों अपने पैरों सें भगा दिया औऱ निरन्तर अठारह घण्टों तक पक्की भूमि पऱ सिररखे हुए औंधे मुंह पड़ारहा। इसके पश्चात वो उस जलस्त्रोत पऱ गय़ा औऱ चिल्लू सें पेटभर पानी पिया। तब उसने थोड़े छुहारे तोड़े औऱ कईकमल कि बेलें निकाकर कमल गट्टे जमा किये। यही उसका भोजन थां। क्षुआ औऱ तृषा शान्त होने पर्र उसेऐसा अनुमान हुआ कि यहां वो सब विघ्नबाधाओं सें मुक्त होकर कालक्षेप कर सकता हैं। अतएव उसनेइसे अपने जिंदगी कां नियमबना लिया। परातःकाल सें संध्या तक वो एक् क्षण केँ लिए भि सिरऊपर नं उठाता थां।
एक् दिनजब वो इस भांति औंधे मुंह पड़ाहुआ थां तौ उसके कानों मे किसी केँ बोलने कि आवाज़ आयी-ष्पााणाचित्रों कों देख, तुम्हारी तरफ ज्ञान पराप्त होगा।
ये सुनते हि उसनेसिर उठाया औऱ तहखाने कि दीवारों पर्र दृष्टिपात किया तोँ उसे चारों ओर सामाजिक दृश्य अंकित दिखाई दिये। जिंदगी कि साधारण घटनाएं जीतीजागती मूर्तियों द्वारा परकट कि गई, थीं। ये बड़े पराचीन वक़्त कि चित्रकारी थि औऱ इतनी उत्तम कि जान पड़ता मूर्तियां अब केहना हि चाहती हें। चित्रकार नें उनमें जानडाल दि थि। कहींकोई नानबाई रोटियां बनारहा थां औऱ गोलों कों कुप्पी कि तरह फुलाकर आग फूंकता थां, कोई बतखों केँ पर्र नोंचरहा थां ओैरकोई पतीलियों मे मांसपका रहा थां। जरा औऱ हटकर एक् शिकारी कन्धों पर्र हिरन लिये जाता थां जिसकी देह मे बाण चुभे दिखाई देते थें। एक् जगह पऱ किसान खेती कां कामकाज करते थें। कोई बोता थां, कोई काटता थां, कोई अनाज बखारों सें भररहा थां। दूसरे जगह पर्र कई स्त्रियां वीणा, बांसुरी औऱ तम्बूरों पऱ नाचरही थीं। एक् सुन्दर युवती सितार बजारही थि। उसके केशों मे कमल कां पुष्प शोभादे रहा थां। केश बड़ी सुन्दरता सें गुंथे हुए थें। उसके स्वच्छ महीन कपड़ों सें उसके निर्मल अंगों कि आभा झलकती थि। उसकेमुख औऱ वक्षस्थल कि शोभा अद्वितीय थि। उसकामुख एक् ओर कों फिराहुआ थां, पर्र कमलनेत्र सीधे हि ताकरहे थें। सवारंग अनुपम, अद्वितीय, मुग्धकर थां। पापनाशी नें उसे देखते हि आंखें नीचीकर लीं औऱ उस आवाज़ कों उत्तर दिया-’तूँ मुझेइन तस्वीरों कां अवलोकन करने कां आदेश क्यूं देता हैं। इसमें तेरी क्याँ ख़्वाहिश हैं ? ये सत्य हैं कि इन चित्रों मे परतिमावादी पुरुष केँ सांसारिक जिंदगी कां अंकन किया गय़ा हैं जोँ यहां मेरे पैरों केँ नीचे* एक् कुएं कि तह मे, काले पत्थर केँ सन्दूक मे बन्द, गड़ाहुआ हैं। उनसे एक् मरेहुए पराणी कि यादआती हैं, औऱ यद्यपि उनकेरूप बहोत चमकीले हें, पऱ यथार्थ मे वो मात्र छाया नहि, छाया कि छाया हैं, क्योंकि मानवजीवन खुद छायामात्र हैं। मृतदेह कां इतना महत्व इतना गर्व !’
उस आवाज़ नें उत्तर दिया-’अब वो मर गय़ा हैं मगर एक् दिन जीवित थां। मगर तूँ एक् दिनमर जायेगा औऱ तेराकोई निशान न् होगा। तूँ ऐसामिट जायेगा मानोकभी तेरा जन्म हि नहि हुआ थां। ’
उसदिन सें पापनाशी कां चित्त आठोंपहर चंचल रहनेलगा। एक् समय केँ लिएउसे शान्ति नं मिलती। उस आवाज़ कि अविश्रान्त ध्वनि उसके कानों मे आया करती। सितार बजाने वाली युवती अपनी लम्बी पलकों केँ नीचेसक उसकीओर टकटकी लगाये रहती। आखिर एक् दिन वो भि बोलि-’पापनाशी, इधरदेख ! मे कितनी मायाविनी औऱ रूपवती हूं ! मुझे प्रेम क्यूं नहि करता ? मेरे परेमालिंगन मे उस परेमदाह कों शान्त करदे जौ तुम्हें विकलकर रहा हैं। मुझसे तुँ व्यर्थ आशंकित हैं। तूँ मुझसे बच नहि सकता, मेरे परेमपाशों सें भाग नहि सकता ! मे नारी सौन्दर्य हूं। हतबुद्धि ! मूर्ख ! तूँ मुझसे कहां भाग जाने कां विचार करता हैं ? तुम्हें कहां शरण मिलेगी ? तुम को सुन्दर पुष्पों कि शोभा मे, खजूर केँ वृक्षों केँ फूलों मे, उसकी फलों सें लदी हुईँ डालियों मे, कबूतरों केँ पर्र मे, मृगाओं कि छलांगों मे, जलपरपातों केँ मधुर कलरव मे, चांद कि मन्द ज्योत्स्ना मे, तितलियों केँ मनोहर रंगों मे, औऱ यदि अपनी आंखें बंदकर लेगा, तोँ अपने
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