आख़िरी तोहफ़ा - Videshi Reshmi Saadi - Full Story Part 1
आख़िरी तोहफ़ा
सारेशहर मे मात्र एक् ऐसी दुकान थि, जहॉँ विलायती रेशमी साड़ी मिल सकतीथीं। औऱ सब दुकानदारों नें विलायती कपड़े पर्र कांग्रेस कि मुहर लगवायी थि। मगर अमरनाथ कि प्रेमिका कि फ़रमाइश थि, उसको पूरा करना जरुरी थां। वो कईदिन तक शहर कि दुकानोंका चक्कर लगाते रहे, दुगुना दाम देने पऱ रेडी थें, मगर कहीं सफल-मनोरथ नं हुए औऱ उसके तक़ाजे बराबर बढ़ते जाते थें। होली आँ रही थि। आख़िर वो होली केँ दिन कौन-सि साड़ी पहनेगी। उसके सामने अपनी मजबूरी कों जाहिर करना अमरनाथ केँ पुरुषोचित अभिमान केँ लिए कठिन थां। उसके इशारे सें वो आसमान केँ तारे तोड़ लाने केँ लिए भि तत्पर होँ जाते। आख़िर जब कहीं मक़सद पूरा नं हुआ, तौ उन्होंने उसीखास दुकान पर्र जाने कां इरादा कर लिया। उन्हें ये मालूम थां कि दुकान पर्र धरना दियाजा रहा हैं। सुभह सें साम तक स्वयंसेवक तैनात रहते हें औऱ तमाशाइयों कि भि हरदम खासी भीड़ रहती हैं। इसलिये उस दुकान मे जाने केँ लिए एक् विशेष प्रकार केँ नैतिक साहस कि जरुरत थि औऱ ये साहस अमरनाथ मे जरुरत सें कम थां। पड़े-लिखे व्यक्ति थें, राष्ट्रीय भावनाओं सें भि अपरिचित नं थें, यथाशक्ति स्वदेशी चीजें हि इस्तेमाल करते थें। मगरइस मामले मे बहोत कट्टर नं थें। स्वदेशी मिलजाय तौ बेहतर वर्ना विदेशी हि सही-इस उसूल केँ मानने वाले थें। औऱ खासकर जब उसकी फरमाइश थि तब तौ कोई बचाव कि सूरत हि नं थि। अपनी जरुरतों कों तौ वो शायदकुछ दिनों केँ लिएटाल भि देते, मगर उसकी फरमाइश तोँ मौत कि तरहअटल हैं। उससे मुक्ति कहां ! तयकर लिया कि आज साड़ी जरुर लायेंगे। कोई क्यूं रोके? किसी कों रोकने कां क्याँ अधिकर हें? माना स्वदेशी कां इस्तेमाल अच्छी बात हैं मगर किसी कों जबर्दस्ती करने कां क्याँ हक़ हैं? अच्छी आजादी कि लड़ाई हैं जिसमें आदमी कि आजादी कां इतना बेदर्दी सें खून होँ !
योंदिल कों मजबूत करके वो साम कों दुकान पऱ पहुँचे। देखा तौ पॉँच वालण्टियर पिकेटिंग कररहे हें औऱ दुकान केँ सामने मार्ग पर्र हज़ारों तमाशाई खड़े हें। सोचने लगे, दुकान मे केसे जाएं। कई बार कलेजा मज़बूत किया औऱ चलेमगर बरामदे तक जाते-जाते हिम्मत नें जवाबदे दिया।
संयोग सें एक् जान-पहचान केँ पण्डितजी मिलगये। उनसे पूछा—क्यूं भइया, ये धरनाकब तक रहेगा? साम तोँ हौ गई,।
पण्डितजी नें कहा—इन सिरफिरों कों सुभह औऱ साम सें क्याँ मतलब, जब तक दुकान बन्द नं होँ जाएगी, यहां सें नं टलेंगे। कहिए, कुछ खरीदने कों इरादा हैं? आप् तोँ रेशमी कपड़ा नहि खरीदते?
अमरनाथ नें विवशता कि मुद्रा बनाकर कहा—मे तौ नहि खरीदता। मगर औरतों कि फ़रमाइश कों केसे टालूँ।
पण्डितजी नें मुस्कराकर कहा—वाउ, इससे अधिक आसान तोँ कोईबात नहि। औरतों कों भि चकमा नहि दे सकते?सौ हीले-हजार बहाने हें।
अमरनाथ—आप् हि कोई हीला सोचिए।
पण्डितजी—सोचना क्याँ हैं, यहॉँ दिन-रात यही किया करते हें। सौ-पचास हीले हमेशा जेबों मे पड़े रहते हें। स्त्री नें कहा, हार बनवादो। कहा, आज हि लो। दो-चार रोज़ केँ बादकहा, सुनार माल लेकर चम्पत होँ गय़ा। ये तोँ रोज कां धन्धा हैं भइया। औरतों कां काम फ़रमाइश करना हैं, मर्दो कां कामउसे हुस्न सें टालना हैं।
अमरनाथ—आप् तौ इसकला केँ पण्डित मालूम होते हें !
पण्डितजी—क्याँ करें भइया, आबरु तौ बचानी हि पड़ती हैं। सूखा जवाबदें तौ शर्मिदगी अलग हौ, बिगड़ें वो अगल सें, समझें, हमारी परवाह हि नहि करते। आबरु कां मामला हें। आप् एक् काम कीजिए। ये तौ आपनेकहा हि होगा कि आजकल पिकेटिंग हैं?
अमरनाथ—हां, ये तौ एक्सक्यूज़ कर चुका भइया, मगर वो सुनती हि नहि, कहती हैं, क्याँ विलायती कपड़े दुनिया सें उठगये, मुझसे चले होँ उड़ने!
आख़िरी तोहफ़ा - Videshi Reshmi Saadi – New Episode
पण्डितजी—तौ मालूम होता हैं, कोईधुन कि पक्की स्त्री हैं। अच्छा तौ मे एक् तरकीब बताऊँ। एक् खाली कार्ड कां बक्स लें लो, उसमें पुराने कपड़े जलाकर भरलो। जाकरकह देना, मे कपड़े लियेआता थां, वालण्टियरों नें छीनकर जला दिये। क्यूं, कैसी रेहगी?
अमरनाथ—कुछ जंचती नहि। अजी, बीस एतराज़ करेंगी, कहीं पर्दाफ़ाश हौ जाय तौ मुफ्त कि शर्मिदगी उठानी पड़े। पण्डितजी—तोँ मालूम हौ गय़ा, आप् बोदे व्यक्ति हें औऱ हें भि आप् कुछऐसे हि। यहॉँ तौ कुछइस शान सें हीले करते हें कि सच्चाई कि भि उसकेआगे धुल हौ जाय। जिन्दगी यही बहाने करते गुजरी औऱ कभी पकड़े न् गये। एक् तरकीब औऱ हैं। इसी नमूने कां देशीमाल लें जाइए औऱ कह दीजिए कि विलायती हैं।
अमरनाथ—देशी औऱ विलायती कि पहचान उन्हें मुझसे औऱ आपसे कहीं अधिक हें। विलायती पऱ तौ जल्द विालयती कां यक़ीन आयेगा नहि, देशी कि तोँ बात हि क्याँ हैं !
एक् खद्दरपोश महाशय पास हि खड़ेये बातचीत सुनरहे थें, बोलउठे— ए साहब, सीधी-सि तौ बात हैं, जाकर साफ़कह दीजिए कि मे विदेशी कपड़े नं लाऊंगा। अगरजिद करे तौ दिन-भर खानां न् खाइये, आप् सीधे रास्ते पर्र आँ जायेगी।
अमरनाथ नें उनकीतरफ कुछऐसी निगाहों सें देखा जौ कहरही थीं, आप् इस कूचे कों नहि जानते औऱ बोले—ये आप् हि कर सकते हें, मे नहि कर सकता।
खद्दरपोश—कर तौ आप् भि सकते हें मगर करना नहि चाहते। यहां तौ उन लोगों मे सें हें कि अगर विदेशी दुआ सें मुक्ति भि मिलती होँ तौ उसे ठुकरा दें।
अमरनाथ—तोँ शायद आप् घऱ मे पिकेटिंग करते होंगे?
खद्दरपोश—पहले घऱ मे करकेतब बाहर् करते हें भइया साहब।
खद्दरपोश साहबचले गये तोँ पण्डितजी बोले—ये महाशय तोँ तीसमारखां सें भि तेज़ निकल। अच्छा तोँ एक् काम कीजिए। इस दुकान केँ पिंछवाड़े एक् दूसरा द्वार (दरवाज़ा) हैं, ज़रा अंधेरा होँ जाय तोँ उधरचले जाइएगा, दायें-बायें किसी कि तरफ़ नं देखिएगा।
अमरनाथ नें पण्डितजी कों शुक्रिया दिया औऱ जब अंधेरा हौ गय़ा तोँ दुकान केँ पिछवाड़े कि तरफजा पहुँचे। डररहे थें, कहीं यहां भि घेरा न् पड़ा होँ। मगर मैदान खाली थां। लपककर अन्दर गये, एक् ऊंचे दामों कि साड़ी ख़रीदी औऱ बाहर् निकले तौ एक् देवीजी केसरिया साड़ी पहने खड़ीथीं। उनको देखकर इनकीरुह फ़ना होँ गई,, दरवाजे सें बाहर् पैर रखने कि हिम्मत नीं हुई। एक् तरफ़ देखकर तेजी सें निकल पड़े औऱ कोईसौ कदम भागते हुएचले गये। कम्र कां लिखा, सामने सें एक् बुढ़िया लाठी टेकती चली आँ रही थि। आप् उससेलड़ गये। बुढ़िया गिर पड़ी औऱ लगी कोसने—अरे अभागे, ये जवानी बहोत दिन नं रहेगी, आंखों मे चर्बी छा गई, हैं, धक्के देता चलता हैं ! अमरनाथ उसकी खुशामद करने लगे—माफ करो, मुझेरात कों कुछकम दिखाई पड़ता हैं। ऐनकघऱ भूलआया। बुढ़िया कां मिज़ाज ठण्डा हुआ, आगे बढ़ी औऱ आप् भि चले। एकाएक कानों मे आवाज़ आयी, ‘बाबू साहब, जरा ठहरियेगा’ औऱ वही केसरिया कपड़ोवाली देवीजी आती हुई दिखायी दीं।
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अमरनाथ केँ पैरबंध गये। इस तरह कलेजा मजबूत करके खड़े होँ गये जैसेकोई स्कूली लड़का मास्टर कि बेंत केँ सामने खड़ा होता हैं।
देवीजी नें पासआकर कहा—आप् तौ ऐसे भागे कि मे जैसे आपकोकाट खाऊँगी। आप् जब पढ़े-लिखे व्यक्ति होकर अपना धर्म नहि समझते तोँ दुख होता हैं। देश कि क्याँ हालत हैं, लोगों कों खद्दर नहि मिलता, आप् रेशमी साड़ियां खरीदरहे हें !
अमरनाथ नें लज्जित होकर कहा—मे सच कहता हूं देवीजी, मैंने अपनेलिए नहि खरीदी, एक् साहब कि फ़रमाइश थीं देवीजी नें झोली सें एक् चूड़ी लिकालकर उनकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा—ऐसे हीले रोज़ हि सुना करती हूं। याँ तौ आप् उसे वापसकर दीजिए याँ लाइएहाथ मे चूड़ी पहनादूँ।
अमरनाथ—शौक सें पहना दीजिए। मे उसे बड़े गर्व सें पह
नूँगा। चूड़ी उस बलिदान कां चिह्न हैं जौ देवियों केँ जिंदगी कि विशेषता हैं। चूड़ियां उन देवियों केँ हाथ मे थीं जिनके नाम सुनकर आज भि हम् आदर सें सिर झुकाते हें। मे तोँ उसे लज्जा कि बात नहि समझता। आप् अगर औऱ कोईचीज पहनाना चाहें तोँ वो भि शौक़ सें पहना दीजिए। नारी पूजा कि वस्तु हैं, उपेक्षा कि नहि। अगरऔरत, जौ क़ौम कों पैदा करती हें, चूड़ी पहनना अपनेलिए गौरव कि बात समझती हैं तोँ मर्दो केँ लिए चूड़ी पहनाना क्यूं लज्जा कि बात हौ?
देवीजी कों उनकीइस निर्लज्जता पर्र आश्चर्य हुआमगर वो इतनी आसानी सें अमरनाथ कों छोड़नेवाली नं थीं। बोलीं—आप् बातों केँ शेर मालूम होते हें। अगर आप् हृदय सें औरत कों पूजा कि वस्तु मानते हें, तोँ मेरीये विनती क्यूं नहि मान जाते?
अमरनाथ-इसलिये कि ये साड़ी भि एक् महिला कि फरमाइश हैं।
देवी-अच्छा चलिए, मे आपकेसंग चलूँगी, जरा देखूँ आपकी देवीजी किस स्वभाव कि महिला हें।
अमरनाथ कां दिलबैठ गय़ा। बेचारा अभि तक बिना-ब्याहा थां, इसलिये नहि कि उसकी विवाह न् होती थि बल्कि इसलिये कि विवाह कों वो एक् आजीवन कारावास समझता थां। मगर वो व्यक्ति रसिक स्वभाव केँ थें। विवाह सें अलग रहकर भि विवाह केँ मजों सें अपिरचित नं थें। किसीऐसे प्राणी कि जरूरत उनकेलिए अनिवार्य थि जिस पऱ वो अपने प्यार कों समर्पित कर सकें, जिसकी तरावट सें वो अपनी रूखी-सूखी जिन्दगी कों तरो-ताज़ा कर सकें, जिसके प्यार कि छाया मे वो जरादेर केँ लिए ठण्डक पा सकें, जिसके दिल मे वो अपनी उमड़ी हुइ जवानी कि भावनाओं कों बिखेरकर उनका उगनादेख सकें। उनकी नज़र नें मालती कों चुना थां जिसकी शहर मे घूम थि। इधर डेढ़-दो साल सें वो इसी खलिहान केँ दाने चुना करते थें। देवीजी केँ आग्रह नें उन्हें थोड़ी देर केँ लिए उलझन मे डाल दिया थां। ऐसी शर्मिंदगी उन्हें जिन्दगी मे कभी नं हुईँ थि। बोले-आज तोँ वो एक् न्योते मे गई हें, घऱ मे न् होंगी। देवीजी नें अविश्वास सें हंसकर कहा-तौ मे समझये आपकी देवीजी कां कुसूर नहि, आपका कुसूर हैं। अमरनाथ नें लज्जित होकर कहा-मे आपसेसच कहता हूं, आज वो घऱ पऱ नहि।
देवी नें कहा-कल आँ जाएंगी?
अमरनाथ बोले-हां, कल आँ जाएंगी।
देवी-तौ आप् ये साड़ी मुझेदे दीजिए औऱ कल यहीं आँ जाइएगा, मे आपकेसंग चलूँगी। मेरेसंग दो-चार बहनें भि होंगी।
२
अमरनाथ नें बिना किसी आपत्ति केँ वो साड़ी देवीजी कों दे दि औऱ बोले-बहोत अच्छा, मे कल आँ जाऊँगा। मगर क्याँ आपकोमुझ पर्र विश्वास नहि हैं जौ साड़ी कि जमानत जरूरी हैं?
देवीजी नें मुस्कराकर कहा-सच्ची बात तोँ यही हैं कि मुझे आप् पऱ विश्वास नहि।
अमरनाथ नें स्वाभिमानपूर्वक कहा- अच्छी बात हैं, आप् इसे लें जाएं।
आख़िरी तोहफ़ा - Videshi Reshmi Saadi - Kahani ab aur interesting hogi
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