अलंकार - Full Story Part 1
अलंकार
दोस्तो यह उपन्यास मुंशी प्यार चन्द कि अनमोल कृति हैं सब जानते हें कि इनकेसब उपन्यास औऱ कहानियाँ कालजयी हें जिन्हे टाइम कि आँधी भि धूमिल नहींकर पाई
उन दिनों नीलनदी केँ तट पऱ बहुतसे तपस्वी रहा करते थें। दोनों हि किनारों पऱ कितनी हि झोंपड़ियां थोड़ीथोड़ी दूर पऱ बनी हुईँ थीं। तपस्वी लोग इन्हीं मे एकान्तवास करते थें औऱ जरूरत पड़ने पऱ एकदूसरे कि मदद करते थें। इन्हीं झोंपड़ियों केँ बीच मे जहांतहां गिरजे बनेहुए थें। परायः सब गिरजाघरों पर्र सलीब कां आकार दिखाई देता थां। धमोर्त्सवों पऱ साधुसन्त दूरदूर सें वहां आँ जाते थें। नदी केँ किनारे जहांतहां मठ भि थें। जहां तपस्वी लोग अकेले छोटीछोटी गुफाओं मे सिद्धि पराप्त करने कां यत्न करते थें।
येसब तपस्वी बड़ेबड़े कठिनवरत धारण करते थें, सिर्फ सूयार्स्त केँ बाद एक् बार सूक्ष्म आहार करते। रोटी औऱ नमक केँ सिवाय औऱ किसी वस्तु कां सेवन नं करते थें। कितने हि तौ समाधियों याँ कन्दराओं मे पड़े रहते थें। सब बरह्मचारी थें, सब मिताहारी थें। वो ऊन कां एक् कुरता औऱ कनटोप पहनते थें; रात कों बहोत देर तक जागते औऱ भजन करने केँ पीछे भूमि पर्र सो जाते थें। अपने पूर्वपुरुष केँ पापों कां परायश्चित करने केँ लिए वो अपनीदेह कों भोगविलास हि सें दूर नहि रखते थें, वरन उसकी इतनी रक्षा भि न् करते थें जौ वर्तमानकाल मे अनिवार्य समझी जाती हैं। उनका विश्वास थां कि देह कों जितना कष्ट दियाजाए, वो जितनी रुग्णावस्था मे होँ, उतनी हि आत्मा पवित्र होती हैं। उनकेलिए को़ औऱ फोड़ों सें उत्तम शृंगार कि कोई वस्तु न् थि।
इस तपोभूमि मे कुछलोग तोँ ध्यान औऱ तप मे जिंदगी कों सफल करते थें, पर्र कुछऐसे लोग भि थें जौ देख कि जटाओं कों बटकर किसानों केँ लिए रस्सियां बनाते याँ फल केँ दिनों मे कृषकों कि मदद करते थें। शहर केँ रहने वाले समझते थें कि ये चोरों औऱ डाकुओं कां गिरोह हैं, येसभी अरब केँ लुटेरों सें मिलकरा काफिलों कों लूट लेते हें। लेकिन येभरम थां। तपस्वी धन कों तुच्छ समझते थें, आत्मोद्घार हि उनके जिंदगी कां एकमात्र उद्देश्य थां। उनकेतेज कि ज्योति आकाश कों भि आलोकित कर देती थि।
स्वर्ग केँ दूत युवकों याँ यात्रियों कां वेश रहकरइन मठों मे आते थें। इसी परकार राक्षस औऱ दैत्य हब्शियों याँ पशुओं कां रूप धरकरइस धमार्श्रम मे तपस्वियों केँ बहकाने केँ लिए विचरा करते थें। जबयह भक्तगण अपनेअपने घड़े लेकर परातःकाल सागर कि ओर पानी भरने जाते थें तोँ उन्हें राक्षसों औऱ दैत्यों केँ पदचिह्न दिखाई देते थें। ये धमार्श्रम वास्तव मे एक् समरक्षेत्र थां जहां नित्य औऱ विशेषतः रात कों स्वर्ग औऱ नरक, धर्म औऱ अधर्म मे भीषण संगराम होता रहता थां। तपस्वी लोग स्वर्गदूतों तथा परमेश्वर कि मदद सें वरत, ध्यान औऱ तप सें इन पिशाचसेनाओं केँ आघातों कां निवारण करते थें। कभी इन्द्रियजनित वासनाएं उनके मर्मस्थल पर्र ऐसा अंकुश लगाती थीं कि वे पीड़ा सें विकल होकर चीखने लगते थें औऱ उनकी आर्तध्वनि वनपशुओं कि गरज केँ संग मिलकर तारों सें भूषित आकाश तक गूंजने लगती थि। तबवही राक्षस औऱ दैत्य मनोहर वेश धारणकर लेते थें, क्योंकि यद्यपि उनकी सूरत बहोत भयंकर होती हैं पऱ वो कभीकभी सुन्दर रूपधर लिया करते हें जिसमें उनकी पहचान नं हौ सके। तपस्वियों कों अपनी कुटियों मे वासनाओं केँ ऐसे दृश्य देखकर विस्मय होता थां जिन पऱ उस वक्त धुरन्धर विलासियों कां चित्त मुग्ध होँ जाता। मगर सलीब कि शरण मे बैठेहुए तपस्वियों पर्र उनके परलोभनों कां कुछअसर न् होता थां, औऱ ये दुष्टात्माएं सूयोर्दय होते हि अपना यथार्थ रूप धारण करकेभाग जातीथीं। कोई उनसे पूछता तोँ कहते ‘हम् इसलिये रोरहे हें कि तपस्वियों नें हमको मारकर भगा दिया हैं। ’
धमार्श्रम केँ सिद्धपुरुषों कां समस्त देश केँ दुर्जनों औऱ नास्तिकों पऱ आतंकसा छायाहुआ थां। कभीकभी उनकी धर्मपरायणता बड़ा विकराल रूप धारणकर लेती थि। उन्हें धर्मस्मृतियों नें ईश्वरविमुख पराणियों कों दण्ड देने कां अधिकार परदान कर दिया थां औऱ जोँ कोई उनकेकोप कां भागी होता थां उसे संसार कि कोई शक्ति बचा न् सकती थि। नगरों मे, यहां तक कि इस्कन्द्रिया मे भि, इनभषण यन्त्रणाओं कि अद्भुत दन्तकथाएं फैली हुइ थीं। एक् महात्मा नें कई दुष्टों कों अपने सोटे सें मारा, जमीनफट गई, औऱ वो उसमें समागये। अतः दुष्टजन, विशेषकर मदारी, विवाहित पादरी औऱ वेश्याएं, इन तपस्वियों सें थरथर कांपते थें।
इन सिद्धपुरुषों केँ योगबल केँ सामने वनजन्तु भि शीश झुकाते थें। जबकोई योगी मरणासन्न होता तोँ एक् सिंहआकर पंजों सें उसकीकबर खोदता थां इससे योगी कों मालूम होता थां कि ईश्वर उसे बुलारहे हें। वो तुरन्त जाकर अपने सहयोगियों केँ मुख चूमता थां। तबकबर मे आकर समाधिस्थ होँ जाता थां।
अब तक इस तपाश्रम कां परधान एण्तोनी थां। पर्र अब उसकी अवस्था सौ वर्ष कि हौ चुकी थि। इसीलिए वो इसजगह कों त्याग कर अपनेदो शिष्यों केँ संग जिनके नाममकर औऱ अमात्य थें, एक् पहाड़ी मे विश्राम करनेचला गय़ा थां। अबइस आश्रम मे पापनाशी नाम केँ एक् साधू सें बड़ा औऱ कोई महात्मा नं थां। उसके सत्कर्मों कि कीर्ति दूरदूर फैली हुई थि औऱ कई तपस्वी थें जिनके अनुयायियों कि संख्या ज्यादा थि औऱ जोँ अपने आश्रमों केँ शासन मे ज़्यादा कुशल थें। मगर पापनाशी वरत औऱ तप मे सबसेब़ा हुआ थां, यहां तक कि वो तीनतीन दिन अनशनवरत रखता थां रात कों औऱ परातःकाल अपनेबदन कों बाणों सें छेदता थां औऱ वो घण्टों भूमि पऱ मस्तक नवाये पड़ा रहता थां।
उसके चौबीस शिष्यों नें अपनीअपनी झोंपड़ी उसकी कुटी केँ आसपास बनाली थीं औऱ योगक्रियाओं मे उसी केँ अनुगामी थें। इन धर्मपुत्रों मे ऐसेऐसे मनुष्य थें जिन्होंने वर्षों डकैतियां डालीथीं, जिनके हाथ रक्त सें रंगेहुए थें, पर्र महात्मा पापनाशी केँ उपदेशों केँ वशीभूत होकरअब वो धार्मिक जिंदगी व्यतीत करते थें औऱ अपने पवित्र आचरणों सें अपने सहवर्गियों कों चकितकर देते थें। एक् शिष्य, जोँ पहले हब्शदेश कि रानी कां बावरची थां, नित्य रोता रहता थां। एक् औऱ शिष्य फलदानाम कां थां जिसने पूरी बाइबिल कंठस्थ करली थि औऱ वाणी मे भि निपुण थां। मगर जोँ शिष्य आत्मशुद्धि मे इन सबसे ब़कर थां वो पॉलनाम कां एक् किसान युवक थां। उसेलोग मूर्ख पॉलकहा करते थें, क्योंकि वो अत्यन्त सरल हृदय थां। लोग उसकी भोलीभाली बातों पर्र हंसा करते थें, मगर भगवान कि उस पऱ विशेष कृपादृष्टि थि। वो आत्मदर्शी औऱ भविष्यवक्ता थां। उसे इलहाम हुआ करता थां।
पापनाशी कां जन्मस्थान इस्कन्द्रिया थां। उसके मातापिता नें उसे भौतिक विद्या कि ऊंची शिक्षा दिलाई थि। उसने कवियों केँ शृंगार कां आस्वादन किया थां औऱ यौवनकाल मे भगवान केँ अनादित्व, बल्कि अस्तित्व पर्र भि दूसरों सें वादविवाद किया करता थां। इसके पश्चात कुछदिन तक उसनेधनी पुरुषों केँ परथानुसार ऐन्द्रिय सुखभोग मे व्यतीत किये, जिसेयाद करकेअब सरम औऱ ग्लानि सें उसको अत्यन्त पीड़ा होती थि। वो अपने सहचरों सें कहा करता‘उन दिनों मुझ पऱ वासना कां भूत सवार थां। ’ इसकाआशय ये कदापि नं थां कि उसने व्यभिचार किया थां; बल्कि मात्र इतना कि उसने मज़ेदार भोजन किया थां औऱ नाटयशालाओं मे तमाशा देखने जाएा करता थां। वास्तव मे बीस वर्ष कि अवस्था तब उसनेउस काल केँ साधारण मनुष्यों कि भांति जिंदगी व्यतीत किया थां। वही भोगलिप्सा अब उसके हृदय मे कांटे केँ समान चुभा करती थि। दैवयोग सें उन्हीं दिनों उसेमकर ऋषि केँ सदुपदेशों कों सुनने कां सौभाग्य पराप्त हुआ। उसकी कायापलट होँ गयीँ,। सत्य उसके रोमरोम मे व्याप्त होँ गय़ा, भाले केँ समान उसके हृदय मे चुभ गय़ा। बपतिस्मा लेने केँ बाद वो सालभर तक औऱ भद्र पुरुषों मे रहा, पुराने संस्कारों सें मुक्त नं हौ सका। मगर एक् दिन वो गिरजाघर मे गय़ा औऱ वहां उपदेशक कों येपद गातेहुए सुना-’यदि तुँ ईश्वरभक्ति कां इच्छुक हैं तौ जा, जौ कुछ तेरेपास होँ उसेबेच डाल औऱ गरीबों कों देदे। ’ वो तुरन्त घऱ गय़ा, अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर गरीबों कों दानकर दि औऱ धमार्श्रम मे परविष्ट हौ गय़ा औऱ दससाल तक संसार सें विरक्त होकर वो अपने पापों कां परायश्चित करतारहा।
एक् दिन वो अपने नियमों केँ अनुसार उन दिनों कां स्मरण कररहा थां, जब वो ईश्वरविमुख थां औऱ अपने दुष्कर्मों पर्र एकएक करके विचार कररहा थां। सहासयाद आया कि मैंने इस्कन्द्रिया कि एक् नाटयशाला मे थायसनाम कि एक् रूपवती नटी देखी थि। वो रमणी रंगशालाओं मे नृत्य करते वक्त अंगपरत्यंगों कि ऐसी मनोहर छवि दिखाती थि कि दर्शकों केँ हृदय मे वासनाओं कि तरंगें उठने लगतीथीं। वो ऐसा थिरकती थि, ऐसेभाव बताती थि, लालसाओं कां ऐसा नग्न चित्र खीचंती थि कि सजीले युवक औऱ धनी वृद्ध कामातुर होकर उसके गृहद्वार पर्र फूलों कि मालाएं भेंट करने केँ लिएआते। थायस उसका सहर्ष स्वागत करती औऱ उन्हें अपनी अंकस्थली मे आश्रय देती। इस परकार वो मात्र अपनी हि आत्मा कां सर्वनाश नं करती थि, वरन दूसरों कि आत्माओं कां भि खून करती थि।
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पापनाशी खुद उसके मायापाश मे फंसतेफंसते रह गय़ा थां। वो कामतृष्णा सें उन्मत्त होकर एक् बार उसके दरवाज़ा तक चला गय़ा थां। मगर वारांगना केँ चौखट पर्र वो ठिठक गय़ा, कुछ तौ उठती हुई जवानी कि स्वाभाविक कातरता केँ कारण औऱ कुछइस कारण कि उसकीजेब मे रुपये न् थें, क्रूोंकि उसकी माता इसका सदैव ध्यान रखती थि कि वो धन कां अपव्यय न् करसके। परमेश्वर नें इन्हीं दो साधनों द्वारा उसेपाप केँ अग्निकुण्ड मे गिरने सें बचा लिया। लेकिन पापनाशी नें इस असीमदया केँ लए भगवान कों शुक्रिया दिया; क्योंकि उस टाइम उसके ज्ञानचक्षु बन्द थें। वो नं जानता थां कि मे मिथ्या आनन्दभोग कि धुन मे पड़ा हूं। अब अपनी एकान्त कुटी मे उसने पवित्र सलीब केँ सामने मस्तक झुका दिया औऱ योग केँ नियमों केँ अनुसार बहोत देर तक थायस कां स्मरण करतारहा क्योंकि उसने मूर्खता औऱ अन्धकार केँ दिनों मे उसके चित्त कों इन्द्रियसुख-भोग कि इच्छाओं सें आन्दोलित किया थां। कई घण्टे ध्यान मे डूबे रहने केँ बाद थायस कि स्पष्ट औऱ सजीव मूर्ति उसके हृदयनेत्रों केँ आगे आँ खड़ी हुइ। अब भि उसकी रूपशोभा उतनी हि अनुपम थि जितनी उस टाइमजब उसने उसकी कुवासनाओं कों उत्तेजित किया थां। वो बड़ी कोमलता सें गुलाब कि सेज पऱ सिर झुकाये लेटी हुइ थि। उसके कमलनेत्रों मे एक् विचित्र आर्द्रता, एक् विलक्षण ज्योति थि। उसके नथुने फड़करहे थें, अधरकली कि भांति आधे खुलेहुए थें औऱ उसकी बांहें दो जलधाराओं केँ सदृश निर्मल औऱ उज्ज्वल थीं। ये मूर्ति देखकर पापनाशी नें अपनी छाती पीटकर कहा-”ईश्वर तूँ साक्षी हैं कि मे पापों कों कितना घोर औऱ घातकसमझ रहा हूं। ”
धीरेधीरे इस मूर्ति कां मुख विकृत होनेलगा, उसके होंठ केँ दोनों कोने नीचे कों झुककर उसकी अन्तवेर्दना कों परकट करनेलगे। उसकी बड़ीबड़ी आंखें सजल होँ गयीं। उसका वृक्ष उच्छ्वासों सें आन्दोलित होनेलगा मानो तूफान केँ पूर्व हवा सनसना रही होँ! ये कुतूहल देखकर पापनाशी कों मर्मवेदना होनेलगी। भूमि पर्र सिर नवाकर उसनेयों परार्थना कि-’करुणामय ! तूने हमारे अन्तःकरण कों दया सें परिपूरित कर दिया हैं, उसी भांति उसे परभात केँ वक्तखेत हिमकणों सें परिपूरित होते हें। मे तुम्हारी तरफ नमस्ते करता हूं! तुँ धन्य हैं। मुझे शक्ति दे कि तेरे जीवों कों तेरीदया कि ज्योति समझाकर परेम करुं, क्योंकि संसार मे सभीकुछ अनित्य हैं, एक् तुँ हि नित्य, अमर हैं। यदिइस अभागिनी औरत केँ परति मुझे चिन्ता हैं तोँ इसका कारण हैं कि वो तेरी हि रचना हैं। स्वर्ग केँ दूत भि उस पर्र दयाभाव रखते हें। भगवान्, क्याँ ये तेरी हि ज्योति कां परकाश नहि हैं ? उसे इतनी शक्ति दे कि वो इस कुमारी कों त्याग दे। तुँ दयासागर हैं, उसकेपाप महाघोर, घृणित हें औऱ उनके कल्पनामात्र हि सें मुझे रोमांच हौ जाता हैं। मगर वो जितनी पापिष्ठा हैं, उतना हि मेरा चित्त उसकेलिए व्यथित होँ रहा हैं। मे ये विचार करके व्यगर होँ जाता हूं कि नरक केँ दूत अन्तकाल तक उसे जलाते रहेंगे। ’
वो यही परार्थना कररहा थां कि उसने अपने पैरों केँ पास एक् गीदड़ कों पड़ेहुए देखा। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसकी कुटी कां दरवाज़ा बन्द थां। ऐसाजान पड़ता थां कि वो पशु उसके मनोगत विचारों कों भांपरहा हैं वो कुत्ते कि भांति पूंछ हिलारहा थां। पापनाशी नें तुरन्त सलीब कां आकार बनाया औऱ पशु लुप्त हौ गय़ा। उसेतब ज्ञात हुआ कि आज पहलीबार राक्षस नें मेरी कुटी मे परवेश किया। उसने चित्तशान्ति केँ लिए छोटीसी परार्थना कि औऱ फिन थायस कां ध्यान करनेलगा।
उसने अपनेमन मे निश्चय किया ? ‘हरीच्छा सें मे ज़रूर उसका उद्घार करुंगा। ’ तब उसने विश्राम किया।
दूसरे दिनऊषा केँ संग उसकी निद्रा भि खुली। उसने तुरन्त ईशवंदना कि औऱ पालमसनत सें मिलने गय़ा जिनका आश्रम वहां सें कुछदूर थां। उसने सन्त महात्मा कों अपने स्वभाव केँ अनुसार परफुल्लचित्त सें भूमि खोदते पाया। पालम बहोत वृद्ध थें। उन्होंने एक् छोटीसी फुलवाड़ी लगारखी थि। वनजन्तु आकर उनके हाथों कों चाटते थें औऱ पिशाचादि कभी उन्हें कष्ट नं देते थें।
उन्होंने पापनाशी कों देखकर नमसकार किया।
पापनाशी नें उत्तर देतेहुए कहा-’ईश्वर तुम्हें शान्ति दे। ’
पालम-’तुम्हें भि ईश्वर शान्ति दे। ’ये कहकर उन्होंने माथे कां पसीना अपने कुरते कि अस्तीन सें पौंछा।
पापनाशी-बन्धुवर, जहां ईश्वर कि चचार होती हैं वहां ईश्वर ज़रूर वर्तमान रहते हें। हमारा धर्म हैं कि अपने सम्भाषणों मे भि भगवान कि स्तुति हि किया करें। मे इस वक्त परमेश्वर कि कीर्ति परसारित करने केँ लिए एक् परस्ताव लेकर आपकी सेवा मे उपस्थिति हुआ हूं।
पालम-’बन्धु पापनाशी, ईश्वर तुम्हारे परस्ताव कों मेरे काहू केँ बेलों कि भांति सफलकरे। वो नित्य परभात कों मेरी वाटिका पऱ ओसबिन्दुओं केँ संग अपनीदया कि वर्षा करता हैं औऱ उसके परदान किएहुए खोरों औऱ खरबूजों कां आस्वादन करके मे उसके असीम वात्सल्य कि जयजयकार मानता हूं। उससेयही याचना करनी चाहिए कि हमें अपनी शान्ति कि छाया मे रखे क्योंकि मन कों उद्विग्न करने वाले भीषण दुरावेगों सें ज्यादा भयंकर औऱ कोई वस्तु नहि हैं। जबये मनोवेग जागृत हौ जाते हें तोँ हमारी दशा मतवालों कीसी होँ जाती हैं, हमारे पेर लड़खड़ाने लगते हें औऱ ऐसाजान पड़ता हैं कि अब औंधे मुंह गिरे ! कभीकभी इन मनोवेगों केँ वशीभूत होकर हम् घातक सुखभोग मे मग्न होँ जाते हें। मगर कभीकभी ऐसा भि होता हैं कि आत्मवेदना औऱ इन्द्रियों कि अशांति हमें नैराश्यनद मे डुबा देती हें, जौ सुखभोग सें कहीं सर्वनाशक हैं। बन्धुवर, मे एक् महान पापी पराणी हूं, मगर मुझे अपने दीर्घ जीवनकाल मे ये अनुभव हुआ हैं कि योगी केँ लिएइस मलिनता सें बड़ा औऱ कोई शत्रु नहि हैं। इससे मेरा अभिपराय उस असाध्य उदासीनता औऱ क्षोभ सें हैं जोँ कुहरे कि भांति आत्मा पऱ परदा डाले रहती हैं औऱ भगवान कि ज्योति कों आत्मा तक नहि पहुंचने देती। मुक्तिमार्ग मे इससे बड़ी औऱ कोई बाधा नहि हैं, औऱ असुरराज कि सबसे बड़ीजीत यही हैं कि वो एक् साधु पुरुष केँ हृदय मे क्षुब्ध औऱ मलिन विचार अंकुरित करदे। यदि वो हमारे ऊपर मनोहर परलोभनों हि सें आक्रमण करता तोँ बहोत भय कि बात नं थि। पऱ शोक ! वो हमें क्षुब्ध करके बाजीमार लें जाता हैं। पिता एण्तोनी कों कभी किसी नें दुःखी याँ उदास नहि देखा। उनका मुखड़ा नित्य फूल केँ समान खिला रहता थां। उनके मधुर मुसकान हि सें भक्तों केँ चित्त कों शान्ति मिलती थि। अपने शिष्यों मे कितने परसन्न मुसकान चित्त रहते थें। उनकी मुखकान्ति कभी मनोमालिन्य सें धुंधली नहि हुईँ। मगरहां, तुम् किसी परस्ताव कि चचारकर रहे थें ?’
पापनाशी-बन्धु पालम, मेरे परस्ताव कां उद्देश्य मात्र परमेश्वर केँ माहात्म्य कों उज्ज्वल करना हैं। मुझे अपने सद्परामर्श सें अनुगृहीत कीजिए, क्योंकि आप् सर्वज्ञ हैं औऱ पाप कि वायु नें कभी आपको स्पर्श नहि किया।
पालम-बन्धु पापनाशी, मे इस योग्य भि नहि हूं कि तुम्हारे चरणों कि रज भि माथे पऱ लगाऊं औऱ मेरे पापों कि गणना मरुस्थल केँ बालुकणों सें भि ज़्यादा हैं। मगर मे वृद्ध हूं औऱ मुझे जौ अनुभव हैं, उससे तुम्हारी सहर्ष सेवा करुंगा। ’
पापनाशी-’तोँ फिन आपसे स्पष्ट कह देने मे कोई संकोच नहि हैं कि मे इस्कन्द्रियः मे रहने वाली थायसनाम कि एक् पवित्र महिला कि अधोगति सें बहोत उदास हूं। वो समस्त नगर केँ लिए कलंक हैं औऱ अपनेसंग कितनी हि आत्माओं कां सर्वनाश कररही हैं।
पालम-’बन्धु पापनाशी, येऐसी व्यवस्था हैं जिस पऱ हम् जितने आंसू बहायें कम हें। भद्रश्रेणी मे कितनी हि रमणियों कां जिंदगी ऐसा हि पापमय हैं। मगरइस दुरवस्था केँ लिए तुमने कोई निवारणविधि सोची हैं ?’
पापनाशी-बन्धु पालम, मे इस्कन्द्रिया जाऊंगा, इस वेश्या कि तलाश करुंगा औऱ परमेश्वर कि मदद सें उसका उद्घार करुंगा। यही मेरा संकल्प हैं। आप् इसे उचित समझते हें ?’
पालम-’पिरय बन्धु, मे एक् अधम पराणी हूं लेकिन हमारे पूज्य गुरु एण्तोनी कां कथन थां कि मनुष्य कों अपनाजगह छोड़कर कहीं औऱ जाने केँ लिए उतावली न् करनीचाहिए। ’
पापनाशी-’पूज्य बन्धु, क्याँ आपको मेरा परस्ताव पसंद नहि हैं ?’
पालम-’पिरय पापनाशी, भगवान न् करे कि मे अपने बन्धु केँ विशुद्ध भावों पऱ शंका करुं, मगर हमारे श्रद्धेय गुरु एण्तोनी कां ये भि कथन थां कि जैसे मछलियां सूखी भूमि पर्र मर जाती हें, वहीदशा उन साधुओं कि होती हैं जोँ अपनी कुटी छोड़कर संसार केँ पराणियों सें मिलतेजुलते हें। वहां भलाई कि कोईआशा नहि। ’
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ये कहकरसंत पालम नें फिन कुदाल हाथ मे ली औऱ धरती गोड़ने लगे। वो फल सें लदेहुए एक् अंजीर केँ वृक्ष कि जड़ों पऱ मिट्टी च़ारहे थें। वो कुदाल चला हि रहे थें कि झाड़ियों मे सनसनाहट हुईँ औऱ एक् हिरनबाग केँ बाड़े केँ ऊपर सें कूदकर अन्दर आँ गय़ा। वो सहमाहुआ थां, उसकी कोमल टांगें कांपरही थीं। वो सन्त पालम केँ पासआया औऱ अपना मस्तक उनकी छाती पऱ रख दिया।
पालम नें कहा-’परमेश्वर कों धन्य हैं जिसने इस सुन्दर वनजन्तु कि सृष्टि कि। ’
इसके पश्चात पालम सन्त अपने झोंपड़े मे चलेगये। हिरन भि उनके पीछेपीछे चला। सन्त नें तब ज्वार कि रोटी निकाली औऱ हिरन कों अपने हाथों सें खिलायी।
पापनाशी कुछदेर तक विचार मे मग्न खड़ारहा। उसकी आंखें अपने पैरों केँ पास पड़ेहुए पत्थरों पऱ जमी हुई थीं। तब वो पालम सन्त कि बातों पर्र विचार करताहुआ धीरेधीरे अपनी कुटी कि ओरचला। उसकेमन मे इस वक़्त भीषण संगराम होँ रहा थां।
उसने सोचा-सन्त पालम कि सलाह अच्छी मालूम होती हैं। वो दूरदर्शी पुरुष हें। उन्हें मेरे परस्ताव केँ औचित्य पऱ संदेह हैं, तथापि थायस कों घात पिशाचों केँ हाथों मे छोड़ देनाघोर निर्दयता होगी। परमेश्वर मुझे परकाश औऱ बुद्धि दे।
चलतेचलते उसने एक् तीतर कों जाल मे फंसेहुए देखा जौ किसी शिकारी नें बिछारखा थां। ये तीतरी मालूम होती थि, क्योंकि उसने एक् क्षण मे नर कों जाल केँ पास उड़कर औऱ जाल केँ फन्दे कों चोंच सें काटते देखा, यहां तक कि जाल मे तीतरी केँ निकलने भर कां छिद्र होँ गय़ा। योगी नें घटना कों विचारपूर्ण नेत्रों सें देखा औऱ अपनी ज्ञानशक्ति सें सहज मे इसका आध्यात्मिक आशयसमझ लिया। तीतरी केँ रूप मे थामस थि, जोँ पापजाल मे फंसी हुइ थि, औऱ जैसे तीतर नें रस्सी कां जाल काटकर उसे मुक्त कर दिया थां, वो भि अपने योगबल औऱ सदुपदेश सें उन अदृश्य बंधनों कों काट सकता थां जिनमें थामस फंसी हुइ थि। उसे निश्चय हौ गय़ा कि परमेश्वर नें इस रीति सें मुझे परामर्श दिया हैं। उसने परमेश्वर कों शुक्रिया दिया। उसका पूर्व संकल्प दृ़ होँ गय़ा; मगरफिन जौ देखा, नर कि टांगउसी जाल मे फंसी हुई थि जिसे काटकर उसने मादा कों निवृत्त किया थां तौ वो फिनभरम मे पड़ गय़ा।
वो सारीरात करवटें बदलता रहा। उषाकाल केँ वक्त उसने एक् स्वप्न देखा, थायस कि मूर्ति फिन उसके सम्मुख उपस्थित हुईँ। उसके मुखचन्द्र पऱ कलुषित विलास कि आभा नं थि, न् वो अपने स्वभाव केँ अनुसार रत्नजटिल वस्त्र पहनेहुए थि। उसका जिस्म एक् लम्बीचौड़ी चादर सें कां हुआ थां, जिससे उसका मुंह भि छिप गय़ा थां सिर्फ दो आंखें दिखाई देरही थीं, जिनमें सें गा़े आंसूबह रहे थें।
ये स्वप्नदृश्देखकर पापनाशी शोक सें विह्वल हौ रोनेलगा औऱ ये विश्वास करके कि ये दैवी आदेश हैं, उसका विकल्प शान्त होँ गय़ा। वो तुरन्त उठ बैठा, जरीबहाथ मे ली जौ ईसाई धर्म कां एक् चिह्न थां। कुटी केँ बाहर् निकला, सावधानी सें द्वारबन्द किया, जिसमें वनजन्तु औऱ पक्षी अन्दर जाकर ईश्वरगरन्थ कों गन्दा नं करदें जौ उसके सिरहाने रखाहुआ थां। तब उसने अपने परधान शिष्य फलदा कों बुलाया औऱ उसेशेष तेईस शिष्यों केँ निरीक्षण मे छोड़कर, मात्र एक् ीलााला चोगा पहनेहुए नीलनदी कि ओर परस्थान किया। उसका विचार थां कि लाइबिया होताहुआ मकदूनिया नरेश (सिकन्दर) केँ बसाये हुएनगर मे पहुंच जाऊं। वो भूख, प्यास औऱ थकन कि कुछ परवाह नं करतेहुए परातःकाल सें सूयार्स्त तक चलतारहा। जब वो नदी केँ समीपआया तौ सूर्य क्षितिज कि गोद मे आश्रय लें चुका थां औऱ नदी कां रक्तजल कंचन औऱ अग्नि केँ पहाड़ों केँ बीच मे लहरें माररहा थां।
वो नदी केँ तटवर्ती रास्ता सें होताहुआ चला। जब भूख लगती किसी कुटिया केँ दरवाज़ा पर्र खड़ा होकर भगवान केँ नाम पर्र कुछ मांग लेता। तिरस्कारों, उपेक्षाओं औऱ कटुवचनों कों परसन्नता सें शिरोधार्य करता थां। साधु कों किसी सें अमर्ष नहि होता। उसे नं डाकुओं कां भय थां, नं वन केँ जन्तुओं कां, मगरजब किसी देहात याँ नगर केँ समीप पहुंचता तौ कतराकर निकल जाता। वो डरता थां कि कहीं बालवृन्द उसे आंखमिचौली खेलते हुए नं मिल जाएें अथवा किसी कुएं पऱ पानी भरने वाली रमणियों सें सामना न् हौ जाए जौ घड़ों कों उतारकर उससे हासपरिहास कर बैठें। योगी केँ लिएये सब शंका कि बातें हें, नं जानेकब भूतपिशाच उसके कार्य मे विघ्न डालदें। उसे धर्मगरन्थों मे ये पॄकर भि शंका होती हैं कि ईश्वर नगरों कि यात्रा करते थें औऱ अपने शिष्यों केँ संग भोजन करते थें। योगियों कि आश्रमवाटिका केँ पुष्प जितने सुन्दर हें, उतने हि कोमल भि होते हें, यहां तक कि सांसारिक बर्ताव कां एक् झोंका भि उन्हें झुलसा सकता हैं, उनकी मनोरम शोभा कों नष्टकर सकता हैं। इन्हीं कारणों सें पापनाशी नगरों औऱ बस्तियों सें अलगअलग रहता थां कि अपने स्वजातीय भाईयों कों देखकर उसका चित्त उनकीओर आकर्षित न् हौ जाए।
अलंकार - Next part mein bada twist
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