कच्ची उम्र की लज़्ज़त - Chudai Ki Kahani - Episode 1
कच्ची उम्र कि लज़्ज़त
मेरानाम राज हैं, मे 42 साल कां तंदरुस्त, 5’11” रंग गेहुंआ, स्लिम बॉडी कां व्यक्ति हूं। मेरी पत्नि डॉली 39 साल कि, स्वस्थ, 5’5″ रंग गोरा औऱ फिगर 36-26-38 हैं।
पंजाब केँ एक् बड़ेशहर मे मेरा अपना एक् छोटा सां सॉफ़्टवेयर एंड हार्डवेयर पार्ट्स सप्लाई कां बिज़नेस हैं जिससे मुझेसभी ख़र्चे औऱ टैक्स इत्यादि निकाल केँ लगभगदस सें बारहलाख रुपये सलाना कि कमाई हौ जाती हैं। एक् अपना दफ़्तर हैं, गोदाम हैं, वर्कशॉप हैं, 9-10 लोगों कां स्टाफ़ हैं, अपनाघऱ हैं, गाड़ी हैं।
हमारे दो बच्चे हें, एक् बेटी 15 साल कि औऱ एक् बेटा 12 साल कां। हमारी 16 साल कि शादीशुदा जीवन मे हमारी सैक्स लाइफ बहोत हि बढ़िया हैं। पलंग मे डॉली औऱ मे नएनए तज़ुर्बे करते हि रहते हें, कभी-कभी कोई तज़ुर्बा बैक-फ़ायर भि कर जाता हैं पऱ ओवरआल सभी मस्त हैं।
ये घटनाआज सें 3 साल पहले कि हैं, जब मेरी मम्मी जोँ मेरेसंग हि रहती थि, कि अचानक मृत्यु होँ गई। पिता जीआठसाल पहले हि चलबसे थें लिहाज़ा डॉली, मेरी पत्नि अचानक सें घऱ मे बिल्कुल अकेली होँ गई।
मे तोँ सुभह कां निकला साम कों घऱआता थां, पीछे दोनों बच्चे विद्यालय चले जाते थें औऱ डॉली सारादिन घऱ मे अकेली रहती थि, अगर बाजार भि जानां होँ तोँ घऱ तालालगा केँ जाओ।
उन दिनों शहर मे चोरियां बहोत होती थि औऱ घऱ केँ मेनगेट पऱ लगा ताला तोँ जैसे चोरों कों स्वयं आवाज़ मारकर बुलाता हैं।
एक् दिन डॉली किसीकाम सें बाजार गई पर्र रास्ते मे कुछ भूलायाद आने पऱ आधे रास्ते सें हि घऱ वापिस लौटी तोँ देखा कि चोरों नें मेनगेट कां ताला तोड़रखा थां पर्र इससे पहले कि चोर अपनी किसी कारगुजारी कों अंजाम देते, डॉलीघऱ लौटआई औऱ चोरों कों फ़ौरन वहा सें दौड़ना पड़ा।
पर्र इस काण्ड केँ बाद डॉली बहोत डरी-डरी सि रहनेलगी जिस कां सीधाअसर हमारे घऱ-परिवार पऱ औऱ हमारी सेक्स-लाइफ़ पर्र पड़ने लगा।
अपनी सेक्स लाइफ बिगड़ते देख मुझे बहोत कोफ़्त होती… पर्र क्याँ करता?
अब मुझेइस समस्या कां कोई समाधान सोचना थां औऱ बहोत जल्द हि सोचना थां पऱ कुछसूझ नहि रहा थां औऱ फिन एक् दिन जैसे भगवान् नें स्वयं इस समस्या कां समाधान भेज दिया।
मेरी बड़ी साली साहिबा जिनकी विवाह मेरेशहर सें 25-30 किलोमीटर दूर एक् कस्बे मे एक् खाते पीते आढ़ती परिवार मे हुईँ थि, कि बेटी रिंकी नें B.Com पासकर ली थि मगर समस्या ये थि कि क़स्बे मे कोई अच्छा कॉलेज नहि थां जहां मास्टर्स कि जासके औऱ मेरेशहर मे कई अच्छे कॉलेजों समेत यूनिवर्सिटी भि थि।
लिहाज़ा रिंकी नें मेरेशहर मे एक् नामी गिरामी कॉलेज मे M.Com मे ऐडमिशन लेँ लिया थां मगर भाग्य सें रिंकी कों हॉस्टल मे स्थान नहि मिलपाई थि सो मेरी साली साहिबा थोड़ी परेशान सि थि कि एक् दिन मे औऱ डॉली उनकेघऱ उनसे मिलने जा पहुंचे।
बातों बातों मे इसबात कां ज़िक्र भि आया तोँ मेरी पत्नि नें रिंकी कों अपनेघऱ रहने केँ लिएकह दिया। मैंने भि सोचा कि चलोठीक हि हैं, कम सें कम डॉली एक् नार्मल स्त्री सां जिंदगी तोँ जियेगी।
मेरी विवाह केँ वक्त रिंकी सात-आठ साल कि पतली सि, मरगिल्ली सि लड़की थि जौ हर वक्त याँ तोँ रोती रहती थि याँ रोने कों सजधजकर रहती थि। बहोत दफा तौ वोँ घऱआये मेहमानों केँ सामने हि नहि आती थि औऱ हम् पऱ तोँ साहब ! हरसमय अपनी पत्नि कां नशा सवार रहता थां, मैंने भि रिंकी पऱ पहलेकभी ध्यान नहि दिया थां।
लब्बोलुआब यह कि ये फाइनल हौ गय़ा कि रिंकी हमारे घऱरहकर हि M.Com करेगी। फैसला यहहुआ कि माँ वालारूम रिंकी कों दे दियाजाए ताकि वोँ अपनी पढ़ाई बे रोक-टोक करसके।
इसबात सें डॉली इतनीखुश हुईँ कि उसरात बैड मे डॉली नें कहर बरपा दिया। ऐसा बहोत दिनों बादहुआ थां लिहाज़ा मे भि खुश थां।
एक् हफ्ते बाद रिंकी हमारे घऱ आँ गई।
उसरात डाइनिंग टेबल पर्र मैंने पहलीबार रिंकी कों गौर सें देखा। डेढ़ पसली कि मरघिल्ली सि, रोंदू सि लड़की, माशा-अल्लाह ! जवान होँ गई थि, लगभग 5′-4″ हाइट, कमान सां कसाहुआ पतलामगर स्वस्थ जिस्म, रंग गेहुँआ, लंबेबाल, सुतवाँ नाक, पतले गुलाबी मगर भरे-भरे होंठ, तीखे नैननक्श औऱ काले कजरारे नयन!
फ़िगर अंदाजन 34-26-34 थां।
यूं मे कोई सैक्स-मैनियॉक नहि पऱ ईमानदारी सें कहूँ तौ उस वक्तमन हि मन मे रिंकी केँ नंगे शरीर कि कल्पना करनेलगा थां।
खैरजी ! डिनरहुआ। सभी लिविंग रूम मे आँ बैठे, बच्चे TV देखने लगे, रिंकी औऱ डॉली दोनों बातें करनेलगी औऱ मे इजी चेयर पर्र बैठा पुस्तक पढ़ने लगा पर्र मेरेकान तौ उन दोनों कि बातों पर्र हि लगेहुए थें।
मैंने नोटिस किया कि बोल तौ केवल डॉली हि रही थि औऱ रिंकी तोँ बस हाँ-हूं कररही थि।
खैर, धीरे-धीरे धीरे-धीरे रिंकी हमारे परिवार कां अंग होतीचली गई, दोनों बच्चों कों रिंकी पढ़ा देती थि। रात कां डिनर पकाना भि रिंकी कि जिम्मेवारी होँ गई थि मगरअब भि रिंकी मेरे सामने कम हि आती थि, आती भि थि तोँ मुझ सें बहोत कम बोलती थि, बसहां जी… नहि जी…ठीक हैं जी!
मे तौ इसीबात मे खुश थां कि मुझे मेरी पत्नि कां ज़्यादा वक़्त मिलरहा थां औऱ मेरी सेक्स लाइफ नार्मल सें भि अच्छी होँ गई थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे वक्त गुजरने लगा।
शुरुआत शुरुआत मे तोँ रिंकी हर शनिवार अपनेघऱ चली जाया करती थि औऱ सोमवार सवेरे सीधे कॉलेज आकरसाम कों घऱआती थि मगर धीरे-धीरे धीरे-धीरे रिंकी कां अपनेघऱ जानां कम होनेलगा। अब रिंकी दो महीने मे एक् बार याँ बड़ीहद दोबार अपनेघऱ जाती थि।
फर्स्ट ईयर केँ फाइनल एग्जाम समाप्त होने केँ बाद रिंकी तीन महीने केँ लिए अपनेघऱ चली गई। लगभग पांच हफ्ते बाद एक् रात, एक् रस्मी सें अभिसार सें असंतुष्ट सां मे डॉली केँ नग्न जिस्म पर्र हाथफेर रहा थां कि डॉली नें मुझ सें कहा-राज… चलो, कल जाकर रिंकी कों लें आयें। रिंकी केँ बिना मेरादिल नहि लगरहा औऱ दोनों बच्चे भि दुःखी हें।
मैंने हामीभर दि।
अगलेदिन हम् दोनों जाकर रिंकी कों लें आये। खुश डॉली नें उसरात अभिसार मे मेरे छक्के छुड़ा दिए, डॉली नें मेरा लिंग चूम-चूमकर मुझे स्खलित किया औऱ बाद मे स्वयं मेरा लिंग पकड़कर, उस पर्र तेल लगाया औऱ अपनेहाथ सें मेरा लिंग अपनी गुदा पऱ रखकर मुझे गुदा मैथुन केँ लिए आमंत्रित किया, रतिक्रिया केँ किसी भि आसन कों उसने ‘नां’ नहि कहा बल्कि दोकदम आगे जाकरकुछ अपनीओर सें औऱ नयाकर दिया।
ख़ैर! जीवन वापिस पटरी आँ गई थि मगरअब एक् फर्क थां, अब रिंकी सारादिन घऱ पर्र हि रहती थि, उसके कॉलेज खुलने मे अभि डेढ़ महीना बाकी थां।
मे दोपहर कों खानां खानेघऱ आता थां, पहलेजब रिंकी कॉलेज गई होती थि तोँ मे अक्सर दोपहर कों हि डॉली कों थाम लिया करता थां, कभी किचन मे, कभी स्टोर मे, कभी लॉबी मे औऱ कभी ड्राइंग रूम मे भि… एक्-आध बार तोँ बाथरूम मे शावर केँ नीचे भि!
रिंकी केँ आने सें दोपहर कि इन तमाम खुराफातों मे लगामलग गई थि। कोफ़्त होती थि कभीकभी पर्र क्याँ कियाजा सकता थां?
फिन भि दांवलगा कर कभी-कभार मे डॉली सें छोटी-मोटी चुहलबाज़ी तौ कर हि लेता थां, जैसेपास सें गुज़रती डॉली केँ नितम्बों कों सहला देना, उसके उरोजों पर्र हल्के सें हाथफेर देना, निप्पल दबा देना, किचन मे सब्ज़ी बनाती डॉली सें सटकर खड़े होकर कढ़ाई मे सब्ज़ी देखने केँ बहाने डॉली केँ कान केँ पास एक् छोटा सां चुम्बन लें लेना याँ उसकी साड़ी केँ पल्लू कि आड़ मे उसकाहाथ पकड़कर अपने लिंग पर्र दबा देना।
मेरेऐसा करने पऱ डॉली दिखावटी क्रोध दिखाती जरूर थि मगर तिरछी आँखों सें मुझे देखते हुये उसके होंठों पर्र स्वीकृति कि एक् मौन सि मुस्कान भि होती थि।
दिन बढ़िया गुज़र रहे थें मगर मे रिंकी मे औऱ उसके मेरे प्रति बर्ताव मे कुछकुछ फर्क महसूस कररहा थां। मे अक्सर नोट करता कि डाइनिंग टेबल पर्र खानां खाते वक्त याँ लिविंग रूम मे टी.वी देखते समय याँ कभीकभी कोई पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मे जबजबसिर उठाकर रिंकी कि ओर देखता तौ उसे मेरीओर हि देखते पाता औऱ जैसे हि मेरी रिंकी कि नज़र सें नज़र मिलती तौ वोँ याँ तौ नज़र नीचीकर लेती याँ कहीं औऱ देखने लगती।
मुझेकुछ वक्त केँ लिए उलझन तौ होती पऱ जल्द हि मेरा ध्यान किसी औऱ बात पर्र चला जाता औऱ बात आई-गई होँ जाती।
बरसात कां मौसम आँ गय़ा थां, बहोत निकम्मी किस्म कि गर्मी पड़रही थि, जिसदिन बरसात होतीउस दिन तोँ मौसमठीक रहता, अगलेदिन जबधूप निकलती तौ उमस केँ मारेजान निकलने लगती, स्थान स्थान खड़ा पानीबास मारने लगता औऱ मक्खी-मच्छर पैदा करने कि ज़िंदा फैक्टरी बन जाता।
एयर कंडीशनड रूम मे हि जीवन सिमटी पड़ी थि।
उसी मौसम मे एक् दिन रिंकी केँ कमरे केँ A.C कि गैसलीक होँ गई। बच्चों कां बैडरूम छोटा थां औऱ उसमें तीसरे बेड कि स्थान नहि थि, ड्राइंग रूम औऱ लिविंग रूम तोँ रात कों सोने केँ किये डिज़ाइन्ड हि नहि थें तोँ एक् हि चारा बचता थां कि जब तक रिंकी केँ कमरे कां A.C रिपेयर हौ कर नहि आता, रिंकी कां बेड हमारे बैडरूम मे हमारे बेड कि बगल मे हि लगाया जाए।
ऐसा हि हुआ औऱ ऐसा होने सें हम् पति-पत्नि कि रात वाली रासलीला पर्र टेम्परेरी बैनलग गय़ा थां!
पऱ क्याँ करते… मज़बूरी थि।
हमारे बैडरूम मे बेड केँ संग हि लेफ्ट साइड बाथरूम कां द्वार (दरवाज़ा) थां औऱ मेरी पत्नि बिस्तर केँ लेफ्ट साइड सोना मनपसंद करती थि औऱ मे राईट साइड सोता थां, हमारे बेड केँ संग हि राईट साइड रिंकी कां फोल्डिंग बेड लगाया गय़ा थां। रातआती, खानां-वाना खाकर हम् लोग सोने केँ लिए बैडरूम मे आते।
डॉली मेरे बायें औऱ रिंकी मेरे दायें… यह दोनों बातें करने लगती औऱ मे बीच मे हि सो जाता।
दो-एक् दिनबाद एक् रात कों अचानक मेरीआँख खुली तौ पाया कि रिंकी बाईं करवटसो रही थि यानी उसका मुंह मेरीओर थां औऱ उसका दायां हाथ मेरी छाती पऱ थां।
मैंने सिरउठा कर देखा तोँ डॉली कों घनघोर नींद केँ हवाले पाया। मैंने धीरे-धीरे सें रिंकी कां हाथ अपनी छाती सें उठाया औऱ उसहाथ उस कि बगल पऱ रख दिया।
पऱ नींद बहोत देर तक नहि आई, दिल मे बहोत उथल-पुथल सि चलरही थि।
क्याँ रिंकी नें जानबूझ करऐसा किया थां? अगरहाँ तोँ क्यूं? क्याँ रिंकी मेरेसंग… सोचकर झुरझुरी सि उठी औऱ अचानक हि मेरे लिंग मे तनाव आँ गय़ा।
इसी उहपोह मे जानेकब मेरीआँख लग गई।
दिन चढ़ा, सभी कुछ अपनी स्थान पऱ, हर चीज़ नार्मल सि थि पर्र मेरेदिल मे इक अनजान सि फ़ीलिंग थि, रहरहकर रिंकी केँ हाथ कि छुअन मुझे अपनी छाती पर्र फील होँ रही थि औऱ रहरहकर मेरे लिंग मे तनाव आँ रहा थां।
उसदिन मैंने अपनी विवाह केँ बाद पहलीबार बाथरूम मे नहाते वक्त हस्त मैथुन किया।
अगलीरात आई, फिन वही सोने कां अरेन्जमेन्ट, डॉली डबलबेड केँ बाईंओर, मे दाईंओर औऱ रिंकी कां फोल्डिंग बेड हमारे डबलबेड केँ दाईंओर सटाहुआ औऱ मुझ मे औऱ रिंकी मे ज़्यादा सें अधिक डेढ़फुट कां फासला।
आज मे अभि पुस्तक हि पढ़रहा थां कि यह दोनों सोने कि तैयारी करनेलगी। जल्द सोने कां कारण पूछने पऱ रिंकी नें बताया कि आज दोनों बाज़ार गईं थि, थक गई हें।
पन्द्रह बीस मिनटबाद मैंने लाईटबंद कि औऱ स्वयं उल्टा हौ कर सोने कि कोशिश करनेलगा, उल्टा बोले तौ पेट केँ बल! पन्द्रह-बीस मिनट हि बीते होंगे कि रिंकी कां हाथआज़ फिन सें मेरेऊपर आँ पड़ामगर आज़ चूंकि मे उल्टा पड़ा थां सोइसबार उसकाहाथ मेरीपीठ पर्र पड़ा।
तीन चार मिनटबाद रिंकी नें अपनाहाथ मेरीपीठ सें उठा लिया औऱ स्वयं सीधी होकर, मतलबपीठ केँ बललेट कर सोने कां उपक्रम करनेलगी। उसका मेरीओर वालाहाथ मतलब बायां हाथ उसकेसिर केँ पास सिरहाने पऱ हि पड़ा थां। मेरा मुंह रिंकी कि ओर हि थां औऱ मेरा औऱ रिंकी कां फासला ज़्यादा सें ज़्यादा डेढ़फुट कां रहा होगा।
अचानक मैंने अपने बायें हाथ कों रिंकी पर्र रख दिया… मेरादिल पसलियों मे धाड़-धाड़ बज़रहा थां।
कोई हरकत नहि। नां मेरीओर सें… नां रिंकी कि ओर सें…
अचानक रिंकी नें सिर उठाया औऱ मेरीओर ध्यान सें देखने लगी, मींची आँखों मे मे सोने कि एक्टिंग करनेलगा। एक् डेढ़ मिनट मुझे ध्यान सें देखने केँ बादजब उसे यकीन होँ गय़ा कि मे गहरी नींद मे सोरहा थां तौ उसने अपनेहाथ पऱ जोँ मेराहाथ थामे थां, चादरडाल थि औऱ चादर केँ नीचे मेरेहाथ कि उँगलियों कों एककेबाद एक् करके चूमने लगी।
उम्म्ह… आहह-आहह… हय…याह… उत्तेजना केँ मारे मेरा बुराहाल थां, तनाव केँ कारण मेरा लिंग जैसे फटने कि कगार पर्र थां। मे रिंकी केँ हाथ कां स्पंदन महसूस कर सकता थां पर्र मैंने अपनीओर सें कोई हरकत नहि कि।
लगभगआधे घंटेबाद रिंकी नें ऐसा करनाबंद किया।
मैंने सरउठा कर देखा तौ लगा कि रिंकी सो गई थि शायद! मेराहाथ अब भि उसकेहाथ मे जकड़ा हुआ थां। ऐसे हि जानेकब मे सचमुच नींद केँ आगोश मे चला गय़ा।
सुभहउठा तोँ पाया कि डॉली औऱ रिंकी उठकरकब कि जा चुकी थि, तभी डॉली अख़बार लेँ कर आँ गई। दिल मे अनाम सि ख़ुशी लिए मैंने जीवन कां एक् नयादिन शुरुआत किया।
तभी रिंकी भि बैडरूम मे गरमचाय कि ट्रे लेकरआई, नहाई-धोई, सफ़ेद पजामी सूट मे ताज़ा ताज़ा शैम्पू किये बालों सें मनभावन सि खुशबू उड़ाती एकदम ताज़ा दम, सफ़ेद सूट मे सें सफ़ेद ब्रा साफ़ साफ़ उजाग़र हौ रही थि।
जैसे हि मेरी रिंकी कि आँख सें आँख मिली, रिंकी कि नज़रझुक गई औऱ क्षणभर कों हि ग़ुलाबी भरेभरे होंठों पर्र एक् गुप्त सि मुस्कान आकर लुप्त होँ गई।
रात वालीबात यादआते हि मेरे लिंग मे जान सि आनेलगी।
जैसे हि रिंकी बैठने लगी तौ मेरी वाली साइड सें सफ़ेद पजामी मे सें गहरेरंग कि पैंटी साफ़ साफ़ झलकने लगी। एक् क्षण मे हि मेरा लिंगफुल जोश मे फुंफ़कारने लगा औऱ मैंने अपनेसंग बैठी डॉली कां हाथ चादर केँ अंदर हि पकड़कर अपने लिंग पऱ रखकरऊपर सें अपनेहाथ सें दबा लिया।
डॉली चिंहुक उठी, लगी अपनाहाथ छुड़ाने कि कोशिश करने…मगर मे जानेदूं तब नाँ! जैसे हि डॉली नें मुझेदेख कर आँखें तरेरी तोँ रिंकी नें पूछा- क्याँ हुआ मौसी?
‘कुछ नहि…’ कहकर डॉली नें अपनाहाथ छुड़ाने कि कोशिश बंदकर दि औऱ चादर केँ नीचे सें मेरा लिंगजोर सें पकड़ लिया।
मे अपने मुक्त हुएहाथ सें डॉली कि जाँघ जांचने लगा।
सारादिन जैसे हवाओं केँ हिण्डोले पऱ बीता, जोँ मेरे औऱ रिंकी केँ बीचचल रहा थां, उस बारे मे सारादिन मेरे अपने हि अंदर तर्क कुतर्क चलतेरहे।
एक् बात तौ पक्की थि कि रिंकी कि तौ ख़ैर कच्ची उम्र थि पर्र मे जौ कररहा थां वोँ सामाजिक औऱ नैतिक दृष्टि सें गलत थां औऱ मे स्वयं जानता थां कि मे गलतकर रहा थां।
मगर वोँ जैसा कहते हें कि गुनाह कि लज़्ज़त मेरा पीछा नहि छोड़रही थि।
साली कि बेटी कि कच्ची उम्र कि लज़्ज़त मेरा पीछा नहि छोड़रही थि, मैंने सोच लिया थां कि आज सें मे रिंकी वाली साइड सोऊंगा हि
नहि मगर जैसे-जैसे दिनबीत रहा थां, मेरा पक्का इरादा डाँवाडोल होँ रहा थां।
सामआई… मे घऱआया, आते हि रिंकी मेरेलिए पानी कां गिलास लें करआई, ग़िलास पकड़ते वक्त मैंने रिंकी कि आँखों मे देखा,
रिंकी नें शर्मा कर नज़र नीचीकर ली औऱ खाली गिलास लें करचली गई।
आजरात तोँ कुछ होँ कर रहना थां, ऐसीसोच आते हि पतलून केँ अंदर हि मेरा लिंग भयंकर रौद्र रूप मे आँ गय़ा, रात कि इंतज़ार मे
वक्त काटना मुश्किल होँ गय़ा थां।
साम कों बाथरूम मे नहाते टाइम मैंने एक् बारफिन ‘अपनाहाथ जगन्नाथ’ किया।
कच्ची उम्र की लज़्ज़त - Chudai Ki Kahani – New Episode
डिनर करते वक़्त मैंने रहरहकर आती जाती डॉली केँ नितंबों पऱ चुटकी काटी। डिनर टेबल पर्र हि डॉली नें मुझ सें रिंकी केँ कमरे केँ
A.C केँ बारे मे पूछा कि कबठीक हौ केँ आएगा?
यूं मैंने कह तोँ दिया कि एक्-आध दिन मे आँ जाएगा पऱ मेरा इरादा तोँ रिंकी केँ कमरे केँ A.C कों कयामत केँ दिन तक नां लाने कां
हौ रहा थां। राम रामकर केँ डिनर निपटाया।
वैसे हम् फ़ैमिली केँ सभीलोग डिनर केँ बाद लिविंग रूमबैठ करकुछ देर गप्पें हांकते हैं मगरउस दिन मे सीधा अपने बैडरूम मे
चला गय़ा।
बाथरूम मे ब्रश करने केँ बाद मैंने अपना अंडरवियर उतारकर वाशिंग-बास्केट मे डाल दिया औऱ पजामा बिना अंडरवियर केँ पहनकर
सीधे अपने पलंग पऱ जाकर A.C कां टेम्प्रेचर 20 डिग्री पऱ सेटकर दिया।
डॉली औऱ रिंकी अभि बैडरूम मे आईं नहि थि, मैंने खाट मे लेटकर आँखें बंदकर ली, बीसेक मिनटबाद दोनों बैडरूम मे आईं औऱ
मुझे सोता पाया।
10-15 मिनट हल्की-फ़ुल्की बाद गप्पें हांकने केँ बाद दोनों सोने कि तैयारी करनेलगी औऱ बैडरूम कि लाइटबंद कर दि गई।
जैसे हि बैडरूम कि लाइटबंद हुइ मैंने तड़ाक सें आँखें खोलली औऱ रिंकी कों देखने लगा। रिंकी तब अपने पलंग पर्र लेटने कि तैयारी
कररही थि औऱ अपनेबाल बाँधरही थि।
मैंने चुपके सें अपनी दाईं बाजु रिंकी केँ पलंग पऱ तकिये सें ज़रा सि नीचेदूर तक फैला दि।
रिंकी चादरऊपर खींचकर जैसे हि अपने पलंग पऱ लेटी, मेरी बाजु उसकी गर्दन केँ नीचे सें उसके परले कंधे तक पहुँच गई। उसने
अपनेहाथ सें अपने दाएं कंधे केँ पास टटोलकर देखा तौ मेरा दायां हाथ उसकेहाथ मे आँ गय़ा।
जैसे हि रिंकी केँ हाथ कि उंगलियां मेरेहाथ सें टच हुइ, मैंने उस कां हाथजोर सें पकड़ लिया।
पहले तोँ रिंकी नें दो-चार लम्हा अपनाहाथ छुड़ाने कि कोशिश कि मगर जल्द हि मेराहाथ कस केँ पकड़ लिया।
मुझे तौ दो जहान् कि खुशियां मिल गई जैसे… मानो सारी कायनात ठहर गई होँ!
मेरादिल मेरे सीने मे धाड़-धाड़ बज़रहा थां औऱ मे अपने हि दिल कि धड़कन बड़ी साफ़-साफ़ सुनरहा थां। पता नहि ऐसेदो मिनट
बीते केँ दो घंटे…कुछ याद नहि।
फिन मैंने रिंकी कि ओर करवटली औऱ अपना बायां हाथ रिंकी केँ बाएं उरोज़ पर्र रख दिया, रिंकी नें मेरा वोँ हाथ फ़ौरन परेझटक दिया
औऱ अपनासर बायें सें दायें हिलाकर जैसे अपना एतराज़ जताया मगर मैंने दोबारा अपनाहाथ उसके बायें उरोज़ पऱ रख दिया।
रिंकी नें दोबारा मेराहाथ अपने उरोज़ पर्र सें उठाना चाहामगर इसबार मेराहाथ नां उठाने कां इरादा पक्का थां, दो एक् मिनट कि
असफ़ल कोशिश करने केँ बाद रिंकी नें अपनाहाथ मेरेहाथ सें उठा लिया औऱ जैसे मुझे मनमानी करने कि इज़ाज़त दे दि।
मे अँधेरे मे रिंकी केँ उरोज़ कि नरमी औऱ गर्मी दोनों कों अपनेहाथ मे महसूस कररहा थां।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे मैंने अपनी उँगलियों कों रिंकी केँ उरोज़ पर्र ज़ुम्बिश देनी शुरुआत कि। रिंकी कां उरोज़ बहोत नर्म सां थां, मे उस पर्र बहोत नरमी सें
उंगलियां चलारहा थां।
अचानक एक् स्थान हल्की सि कुछ सख़्त सि मालूम पड़ी। हल्का सां टटोलने पऱ पता पड़ा कि ये उरोज़ कां निप्पल हैं।
जैसे हि मेराहाथ निप्पल कों लगा, वोँ औऱ अधिक टाईट औऱ बड़ा हौ कर ख़डा हौ गय़ा। मैंने अपनाहाथ रिंकी कि चादर केँ अंदरडाल
कर, रिंकी कि नाईटसूट कां ऊपर वाला एक् बटनखोल कर, ब्रा केँ अंदर सें हौले सें रिंकी केँ उरोज़ पऱ रखा तौ रिंकी केँ पूरे ज़िस्म मे
झुरझुरी कि एक् लहर सि दौड़ गई जिसे मैंने स्पष्टत महसूस किया।
रिंकी कि गरम तेज़ साँसें मे अपनी कलाई पऱ महसूस कररहा थां। रिंकी केँ उरोज़ केँ कठोर निप्पल कां स्पर्श मे अपनी हथेली केँ ठीक
बीचों बीच महसूस करपारहा थां।
धीरे-धीरे सें मैंने अपनी पाँचों उंगलियां उरोज़ केँ संगसंग ऊपर उठानी शुरुआत कि औऱ अंत मे निप्पल उँगलियों केँ बीच मे आँ गय़ा जिसे मैंने
हलके सें दबाया।
रिंकी केँ मुख सें शाश्वत आनन्द कि ‘अहह’ कि हल्की सि आह प्रफुटित हुइ। जल्द हि मैंने अपनाहाथ दूसरे उरोज़ कि ओर सरकाया
दूर वाला उरोज़ थोडा दूरपड़ रहा थां तौ रिंकी बिनाकहे स्वयं हि सरककर मेरीओर ख़िसक आई।
अबठीक थां।
मैंने अपनाहाथ ब्रा केँ ऊपर सें हि परले उरोज़ पर्र ऱखा औऱ उरोज़ कों थोडा सां दबाया। प्रिय केँ मुंह सें बहोत हि हलकी सि ‘सि… सि’
कि सिसकी निकली।
मैंने अपनाहाथ उठाकर धीरे-धीरे सें ब्रा केँ अंदर सरकाया औऱ परले उरोज़ पर्र कोमलता सें हाथधर दिया। परले उरोज़ कां निप्पल अभि
दबादबा सां थां मगर जैसे हि मेरेहाथ नें निप्पल कों छूआ, निप्पल नें सर उठाना शुरुआत कर दिया औऱ एक् सैकिंड मे हि अभिमानी
योद्धा गर्व सें सर ऊंचा उठाये खड़ा होँ गय़ा।
अचानक मुझेलगा कि मेरे परलेहाथ कि हथेली पऱ कुछ नरम-नरम, कुछ गर्म-गर्म सां लगरहा हैं, देखा तौ अपनी चादर केँ अंदर
रिंकी मेराहाथ बहोत शिद्दत सें चूमरही थि, पूरेहाथ पर्र जीभ फ़िरा रही थि।
जल्द हि रिंकी नें मेरेहाथ कि उँगलियाँ एक् एक् कर केँ अपने मुँह मे डालकर चूसनी शुरुआत कर दि। मे रिंकी केँ होंठों कि नरमी औऱ
उस कि जीभ कां नरम स्पर्श अपनी उँगलियों पर्र महसूस करकर केँ रोमांचित होँ रहा थां।
मेरा लिंग 90 डिग्री पऱ चादर औऱ पजामे कां तंबू बनाये फौलाद सां सख्त खड़ा थां, मारे उत्तेज़ना केँ मेरे नलों मे तेज़ दर्द हौ रहा थां।
अबसहन करना मुश्किल थां, मगरइस सें औऱ आगे बढ़ना खतरे सें खाली नहि थां।
अपने हि बैडरूम मे, अपनी हि पत्नि कि कुंवारी भांजी केँ संग शारीरिक संबंध बनाते याँ बनाने कि कोशिश करते, अपनी हि पत्नि केँ
हाथों रंगे-हाथ पकड़े जाने सें अधिक शर्मनाक कुछ औऱ हौ नहि सकता थां।
मे ऐसी बेवकूफी करने वाला हरगिज़ नहि थां।
जीवनरही तोँ आगेऐसे बहोत मौक़े मिलेंगे जब व्यक्ति अपनेदिल कि कर गुज़रे औऱ रिंकी तौ राज़ी थि हि!
बेमन सें मन ममोसकर मे उठा औऱ बाथरूम मे जाकर पेशाब करने केँ लिए पजामा खोला तौ मेरा लिंग झटके सें बाहर् आया।
जैसे हि मैंने लिंग कां मुंह कमोड कि ओर पेशाब करने केँ लिए किया, मेरे पेशाब कि धार कमोड मे नीचे जाने कि बजाए कमोड केँ ऊपर
सामने दीवार कर पड़ी, मे अपने लिंग कों नीचे कि ओर झुकाऊं पर्र मेरा लिंग नीचे कि ओर हौ हि नाँ!
जैसे तैसे पेशाब करके मे वापिस बैडरूम मे आया हि थां कि डॉली नें मुझ सें समय पूछा, मेरी तौ फट केँ हाथ मे आँ गई।
ख़ैरजी!
डॉली कों समयबता कर A.C कां टेम्प्रेचर थोडा बढ़ाकर मे भि सोने कि कोशिश करनेलगा, उधर रिंकी भि चुपचाप चित पड़ी सोने कां
बहाने कररही थि।
बहोत रात बीतने केँ बाद मुझे नींदआई।
अगला सारादिन मैंने मन हि मन चिढ़ते कुढ़ते हुए गुज़ारा। जौ कुछ औऱ जितना कुछ रिंकी केँ संग रातों कों हौ रहा थां, उस सें अधिक
होने कि गुंजाईश बहोत कम थि औऱ ऐसा होना भि बहोत दिनों तक ऐसा होना मुमकिन नहि थां।
आज नहि तौ कल, रिंकी केँ कमरे कां A.C ठीक हौ कर आनां हि थां। ऊपर सें अपने हि बैडरूम मे डॉली केँ किसी भि क्षणउठ जाने कां डर हम् दोनों कों खुलकर खेलने नहि देता थां।
मुझे जल्द हि कुछ करना थां।
किसीदिन रिंकी कों लें कर किसी होटल मे चला जाऊं?
नाँ… नां! ये निहायत हि बकवास आईडिया थां, आधाशहर मुझे जानता थां औऱ रिंकी कों होटल लें कर जाने केँ अपने खतरे थें।
औऱ… घऱ मे? घऱ मे मेरे बच्चे थें, डॉली थि… नहि नहि! ऐसा होना भि मुमकिन नहि थां।
तौ फिन… क्याँ करूँ?कुछ समझ मे नहि आँ रहा थां, लिहाज़ा मे चिड़चिड़ा सां हौ रहा थां।
रात कों डिनर करने केँ बादफिन बाथरूम मे ब्रश करने केँ बाद मे अपना अंडरवियर उतारकर पजामा बिना अंडरवियर केँ पहनकर A.C कां टेम्प्रेचर 20 डिग्री पऱ सेटकर केँ सीधे अपनेबैड पऱ जा पड़ा। आज रिंकी औऱ डॉली दोनों अभि तक बेडरूम मे नहि आई थि।
अपने आप् मे उलझेहुए मेरीकब आँखलग गई, मुझेपता हि नहि चला।
अचानक मेरेकान मे कुछ सुरसुरी सि हुईँ, मैंने नींद मे हि हाथ चलाया तौ मेरेहाथ मे रिंकी कां हाथ आँ गय़ा, रिंकी चुपके सें मुझे जगाने कि कोशिश कररही थि।
मैंने रिंकी कां हाथ अपनी छाती पर्र रखकरऊपर अपनाहाथ रख दिया औऱ रिंकी कि साइड वालाहाथ चादर केँ अंदर सें उसके चेहरे पऱ फेरने लगा।
माथा, गाल, कान, आँखें, नाक, होंठ, ठुड्डी, गर्दन… आरामसे मेराहाथ नीचे कि ओर अग्रसर थां औऱ रिंकी कि साँसें क्रमशः भारी होतीजा रही थि औऱ रिंकी मुझे पिछले रोज़ कि तरह सें रोक भि नहि रही थि, लगता थां कि रिंकी स्वयं ऐसाचाह रही थि।
जैसे हि मेराहाथ गर्दन केँ नीचे सें होताहुआ रिंकी कंधे सें होताहुआ रिंकी कि छातियों तक आया तोँ मे एक् सुखद आश्चर्य सें भरउठा। आज प्रिय नें नाईटसूट केँ नीचे ब्रा नहि पहनी थि, बस एक् पतली बनियान सि पहनी हुईँ थि। मेराहाथ उरोज़ कों छूते हि रिंकी केँ जिस्म मे वही परिचित झुनझुनाहट कि लहरउठी।
आज मे कल जैसी नर्म दिली सें पेश नहि आँ रहा थां, उरोज़ कां निप्पल हाथ मे आते हि फूलकर सख़्त हौ गय़ा थां, मे अंगूठे औऱ एक् उंगली केँ बीच मे निप्पल लेकर हल्के हल्के मसलने लगा।
रिंकी कां दायां हाथ मेरेहाथ केँ ऊपररखा थां, जहां जहांउसे तीव्र आनन्द कि अनुभूति होती, वहीं वहीं उसकाहाथ मेरेहाथ पर्र कस जाता।
मेरामन कररहा थां कि मे रिंकी केँ उरोज़ों कां अपने होंठों सें रसपान करूँमगर उस मे अभि भयंकर ख़तरा थां सो मैंने अपनेमन पऱ काबू पाया औऱ इसीखेल कों आगे बढ़ाने मे लग गय़ा।
मैंने अपना दायां हाथ रिंकी केँ उरोजों सें उठाकर रिंकी केँ बाएंहाथ पऱ (जोँ मेरी छाती पर्र हि पड़ा थां) रख दिया।
रिंकी केँ हाथ कों सहलाते सहलाते मैंने रिंकी कां हाथउठा कर पजामे केँ ऊपर सें हि अपनेगरम, तनेहुए लिंग पऱ रख दिया।
रिंकी कों जैसे 440 वाट कां करंटलगा, उसनेझट सें अपनाहाथ मेरे लिंग सें उठाने कि कोशिश कि मगरउस केँ हाथ केँ ऊपर तौ मेराहाथ थां, केसे जाने देता?
दो एक् समय कि धींगामुश्ती केँ बाद रिंकी नें हारमान ली औऱ मेरे लिंग पर्र सें अपनाहाथ हटाने कि कोशिश छोड़ दि।
मैंने अपनेहाथ सें जोँ रिंकी कां वोँ हाथ थामे थां जिस कि गिरफ़्त मे मेरागरम, फौलाद सां तनाहुआ लिंग थां, कों दोसमय केँ लिए अपने लिंग सें हटाया औऱ अपना पजामा अपनी जांघों सें नीचेकर केँ वापिस अपना लिंग रिंकी कों पकड़ा दिया। रिंकी केँ बदन मे फिन सें वही जानी-पहचानी कंपकंपी कि लहरउठी।
अब केँ रिंकी कां हाथ स्वयं हि लिंग कि चमड़ी कों आगे पीछेकर केँ मेरे लिंग सें खेलने लगा, कभी वोँ शिशनमुंड पर्र उंगलिया फेरती, कभी लिंग कि चमड़ी पीछेकर केँ शिशनमुंड कों अपनी हथेली मे भींचती, कभी मेरे अण्डकोषों कों सहलाती।
ऊपर मेरे हाथों द्वारा रिंकी कि छातियों कां काम-मर्दन जारी थां। धीरे-धीरे धीरे-धीरे मे अपना दायां हाथ रिंकी केँ पेट पऱ लेँ गय़ा, नाईटसूट केँ अप्पर कों पेट सें ऊंचा करके मैंने रिंकी केँ पेट पर्र हल्के सें हाथ फेरा औऱ फिन सें रिंकी केँ जिस्म मे वही जानी पहचानी कंपकंपी कि लहर कों महसूस किया, रिंकी कां हाथ मेरे लिंग पऱ जोरों सें कस गय़ा।
मे धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपनाहाथ रिंकी केँ पेट पऱ घुमाता घुमाता नाभि केँ आसपास लें गय़ा, रिंकी केँ बदन मे रहरहकर कंपन कि लहरें उठरही थि।
जैसे हि मेराहाथ रिंकी केँ नाईटसूट केँ लोअर केँ नाड़े कों टचहुआ, रिंकी नें अपने दाएंहाथ सें मेराहाथ पकड़ लिया औऱ मजबूती सें मेराहाथ ऊपर कों खींचने लगी।
मैंने जैसे-तैसे अपनाहाथ छुड़ाया औऱ फिन सें दोबारा जैसे हि रिंकी केँ नाईटसूट केँ लोअर केँ नाड़े कों छूआ, रिंकी कि फिन वापिस वही प्रतिक्रिया हुइ, उसने मजबूती सें मेराहाथ पकड़कर वापिस ऊपर खींच लिया।
ऐसा लगता थां कि रिंकी मुझे किसी कीमत पऱ अपना लोअर खोलने नहि देगी।
मजबूरी थि… प्रेम थां, लड़ाई नहि जौ जोर जबरदस्ती करते, जोँ करना थां खामोशी सें औऱ आपसीसमझ बूझ सें हि करना थां।
मैंने रिंकी कां हाथउठा कर वापिस अपने लिंग पऱ रख दिया औऱ अब कि बार अपनाहाथ चादर केँ अंदर पऱ उसके नाईटसूट केँ सूती लोअर बाहर् सें हि रिंकी कि बाईं जांघकर रख दिया रिंकी केँ बदन मे कंपन कि लहरउठी औऱ अब मे रिंकी कि जांघ सहलाते सहलाते अपनाहाथ जांघ अंदर कों औऱ ऊपर कि ओर लेँ जानेलगा।
मेरी स्कीम कामकर गई, आनन्द स्वरूप रिंकी केँ मुंह सें हल्की-हल्की हल्की चीख निकलने लगी ‘उम्म्ह… आहह-आहह… हय…याह…’ उसकाहाथ ज़ोर-ज़ोर सें मेरे लिंग पर्र ऊपर-नीचे चलनेलगा।
रिंकी कि बाईं जांघ पऱ स्मूथ चलती मेरी उंगलियों नें अचानक महसूस किया कि उंगलियों औऱ रेशमी जांघ केँ बीच मे कोई मोटा सां कपड़ा आँ गय़ा हौ।
मे समझ गय़ा कि ये रिंकी कि पेंटी थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे मे जाँघों केँ ऊपरी जोड़ कि ओर बढ़ा।
उफ़! एकदमगरम औऱ सीली सि स्थान… मैंने वहां अपनाहाथ रोककर अपनी उंगलियों सें सितार सि बजाई।
फ़ौरन हि रिंकी नें मेरे लिंग कों इतनेजोर सें दबाया कि पूछोमत!
मैंने नाईटसूट केँ सूती लोअर केँ बाहर् सें हि रिंकी कि पेंटी कों साइड सें ऊपर उठाया औऱ नाईटसूट केँ कपडे समेत अपनी चारों उंगलियां रिंकी कि पेंटी केँ अंदरडाल दि। मेरेहाथ केँ नीचे जन्नत थि पऱ मुझेइस जन्नत पर्र कुछ जटाजूट सां कुछ महसूस होता। शायद रिंकी अपने गुप्तांगों केँ बाल नहि काटती थि।
मे कुछदेर अपनी उंगलियों सें सितार बजाने जैसी हरकत करतारहा औऱ इधर रिंकी मेरे लिंग कों मथतीजा रही थि।
अचानक हि मैंने अपना दायां हाथ रिंकी कि योनि सें उठाया औऱ फुर्ती सें रिंकी केँ नाईटसूट केँ लोअर कां नाड़ा खोलकर अपनाहाथ रिंकी कि पेंटी केँ अंदर सें रिंकी कि बालों भरी योनि पऱ रख दिया।
प्रिय नें फ़ौरन अपना दायां हाथ मेरेहाथ पऱ रखा औऱ मेराहाथ अपनी योनि सें उठाने कि कोशिश करनेलगी मगरअब तौ बाज़ी बीत चुकी थि, अब मे केसेहाथ उठाने देता।
मैंने सख्ती सें अपनाहाथ रिंकी कि योनि पर्र टिकाये रखा औऱ संगसंग अपनीबीच वाली उंगली योनि कि दरार पऱ ऊपर सें नीचे, नीचे सें ऊपर फिराता रहा।
कुछ हि देरबाद रिंकी नें मेरेउस हाथ कि पुश्त पऱ जिससे मे उसकी योनि कां जुग़राफ़िया नापरहा थां, एक् हल्की सि चपत मारी औऱ अपनाहाथ उठाकर परे करके जैसे मुझेखुल कर खेलने कि परमीशन दे दि।
रिंकी कि योनि सें बेशुमार काम-रस बहरहा थां, उसकी पूरी पेंटी भीग चुकी थि। मैंने योनि कि दरार पर्र उंगली फेरते फेरते अपनीबीच वाली उंगली सें रिंकी कि योनि केँ भगनासा कों सहलाया, रिंकी नें जल्द सें अपनी दोनों जाँघें जोर सें अंदर कों भींचली।
मैंने वही उंगली रिंकी कि योनि मे जरा नीचे अंदर कों दबाई तौ रिंकी केँ मुंह सें ‘उफ़्फ़’ निकल गय़ा।
रिंकी शतप्रतिशत कंवारी थि, लगता थां कि रिंकी नें कभी हस्तमैथुन भि नहि किया थां।
तभी मुझे अपनी बाईंओर हल्की सि हलचल औऱ कपड़ों कि सरसराहट कां अहसास हुआ, मैंने तत्काल अपनाहाथ रिंकी कि योनि पर्र सें खींचा औऱ रिंकी सें जरा सां उरलीतरफ सरककर गहरी नींद मे सोने केँ जैसी ऐक्टिंग करनेलगा।
मिंची आँखों सें देखा तौ डॉली बाथरूम जाने केँ लिएउठ रही थि।
जैसे हि डॉली बाथरूम मे घुसी मैंने फ़ौरन अपने कपड़े ठीक किये औऱ फुसफुसाती आवाज़ मे रिंकी कों भि अपने कपड़े ठीक करने कों कह दिया।
सभी कुछठीक ठाक करने केँ बाद हम् दोनों ऐसेअलग अलगलेट गए जैसे गहरी नींद मे हों।
बाथरूम सें बाहर् आँ कर डॉली नें AC कां टेम्प्रेचर बढ़ाया औऱ वापिस पलंग पर्र आकर मुझे पीछे सें आलिंगन मे लें लिया।
बाल बालबचे थें हम्!
मुझे बहोत देरबाद नींदआई।
अगलेदिन शनिवार थां औऱ शनिवार केँ बाद इतवार कि छुट्टी थि।
साम कों करीब 4 बज़े A.C वाले कां फ़ोनआया कि A.C ठीक होँ गय़ा थां औऱ वोँ पूछरहा थां कि कब अपने व्यक्ति मेरेघऱ भेजे ताकि A.C वापिस फ़िट कियाजा सके।
मैंने उसे इतवार साम कों आकर A.C स्लिम करने कों बोला।
अब मेरेपास सिर्फ एक् हि रात थि जिसमें मैंने कुछकर गुज़रना थां औऱ मे रात कों सबकुछ कर गुज़रने कों दृढ़प्रतिज्ञ थां। साम कों मैंने अपने परिचित कैमिस्ट सें गहरी नींदआने कि गोलियों कि एक् स्ट्रिप ली औऱ आईसक्रीम कि दूकान सें एक् ब्रिक बटरस्काच आईसक्रीम लें करघऱआया।
डॉली कों बटरस्काच आईसक्रीम बहोत मनपसंद थि।
चार गोलियां पीसकर मे पुड़ी मे अपनेपास रखली।
कच्ची उम्र की लज़्ज़त - Chudai Ki Kahani – New Episode
अगलीरात डिनर केँ वक्त डिनर टेबल पऱ रिंकी डिनर सर्वकर रही थि, आमतौर पऱ डॉली डिनर सर्व करती थि मगरउस दिन रिंकी डिनर सर्वकर रही थि, आते-जाते बहाने बहाने सें मुझे यहां वहांछू रही थि।
डिनरहुआ, आईस क्रीम मैंने स्वयं सबको सर्व कि। बच्चों कि औऱ डॉली वाली प्लेट मे मैंने वोँ पीसी हुईं नींद कि गोलियां मिला दि। सभी नें आईसक्रीम खाई औऱ लगभग 9:30 बजे मे एक् दोहरी मनस्थिति मे अपने बैडरूम मे आँ गय़ा।
नींद कि गोलियों कां असर डॉली पऱ एक् सें डेढ़ घंटेबाद होना थां।
ब्रश करने केँ बाद मैंने हस्तमैथुन किया औऱ अपना अंडरवियर पहने बिना हि पजामा पहन लिया औऱ एक् नावेल लेकर वापिस अपने पलंग पर्र आँ जमा। मे अपनेखाट पर्र दो तकियों केँ संगपीठ टिकाकर, पेट तक चादर लेँ करओढ़ कर औऱ घुटने मोड़कर नॉवल पढ़ने लगा।
सभी काम निपटा कर, लगभगसवा दसबजे रिंकी औऱ डॉली दोनों बैडरूम मे आईं। तब तक बैडरूम मे चलते A.C कि बड़ी सुखद सि ठंडक फ़ैल चुकी थि।
आते डॉली बोलि- आज तोँ मे बहोत थक सि गई हूं, बहोत नींद आँ रही हैं!
‘मुझे भि!’ रिंकी नें भि हामीभरी।
‘तौ सोजाओ, किसने रोका हैं। ’ मैंने कहा।
‘औऱ आप्?’ डॉली नें पूछा।
‘मे थोडा पढ़कर सोऊंगा, मुझे अभि नींद नहि आँ रही हैं। ’ मैंने कहा।
‘ठीक हैं… पऱ आप् ट्यूब लाइटबंद करके टेबललैम्प जला लें!’ डॉली नें मुझ सें कहा।
मैंने सिरहाने फिक्स टेबल-लैम्प जलाकर ट्यूब लाइटबंद कर दि।
अब स्थिति यूं थि कि मेरेसर केँ ऊपर थोडा बाएंतरफ टेबल-लैम्प जलरहा थां औऱ रिंकी मेरे दाईंतरफ क़दरतन अंधेरे मे थि औऱ मेरे दाईंओर सें, मतलब डॉली कि ओर सें रिंकी कों साफ़ साफ़देख पाना मुश्किल थां क्योंकि बीच मे मे थां औऱ रिंकी मेरी परछाई मे थि।
बीस-पच्चीस मिनट बिना किसी हरकत केँ बीते। वैसे तोँ मेरी नज़र नॉवेल केँ पन्नों पर्र थि मगरमन रिंकी कि ओर थां।
कनखियों सें रिंकी कि ओर देखा तोँ पाया कि रिंकी बाईं करवट लेटी हुइ मेरीओर हि देखरही थि।
फिन रिंकी नें आँखों हि आँखों मे मुझे लाइटबंद करने कां इशारा कियामगर मैंने उसे अभि रुक जाने कां इशारा किया। जबाब मे रिंकी नें मुझे ठेंगा दिखाकर मुंह बिचकाया, ऊपर चादर लेँ कर उलटीतरफ करवटली औऱ मेरीतरफ पीठकर केँ लेट गई।
मुझे हंसी आँ गई औऱ मैंने हाथ बढ़ाकर रिंकी कां कंधाछूआ तौ उसने मेराहाथ झटक दिया। मैंने दोबारा वहीहाथ उस कि कमर पर्र रखा तोँ रिंकी नें दुबारा मेराहाथ अपनीकमर सें झटक दिया।
लड़की सचमुच रूठ गई थि।
अब केँ मैंने अपनाहाथ हौले सें रिंकी केँ ऊपर वाले नितम्ब पर्र रख दिया, इस बार रिंकी नें मेराहाथ नहि झटका। मे आहिस्ता कोमलता सें रिंकी कां पूरा नितम्ब सहलाने लगा।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि आज रिंकी नें लोअर केँ नीचे पैंटी नहि पहनरखी थि। वहीहाथ रिंकी कि पीठ पऱ फिराने सें पताचला कि ब्रा भि नदारद थि। इनसभी कां सामूहिक मतलब तोँ यह थां कि मेरी प्रेयसी अभिसार केँ लिएआज पूरीतरह सें सजधजकर थि।
ऐसा सोचते हि मेरा लिंग अपनी पूरी भयंकरता केँ संग मेरे पजामे मे फुंफ़कारने लगा।
अपनावही हाथ रिंकी केँ कंधे तक लाकर मैंने रिंकी कां कंधा हलके सें अपनीओर खींचा तोँ रिंकी सीधी होँ करलेट गई औऱ आँख केँ इशारे सें मुझे टेबल-लैम्प बुझाने कों कहा।
मैंने पहले डॉली कि ओरघूम कर देखा, अपना चेहरा परलीतरफ घुमाकर हल्क़े सें कंबल मे चित लेटी डॉली गहरी निद्रा मे थि। मैंने हाथ बढ़ाकर टेबल लैम्प बंद किया औऱ अंधेरा होते हि झुककर रिंकी केँ होंठों पऱ होंठरख दिए।
रिंकी नें फ़ौरन अपनी बाजुएं मेरेगले मे डाल दि औऱ बड़ी शिद्दत सें मेरे होंठ चूसने लगी।
थोड़ी देरबाद मे सीधाहुआ औऱ फ़ौरन दोबारा रिंकी कि ओरझुक कर मैंने रिंकी केँ माथे पर्र, आँखों पर्र, गालों पर्र, नाक पऱ, गर्दन पर्र, गर्दन केँ नीचे, सैंकड़ों चुम्बन जड़दिए।
रिंकी केँ दाएंकान कि लौ चुभलाते वक्त मे रिंकी केँ मुंह सें, खुशी केँ मारे निकलने वाली ‘सि…सि…सीई… सीई…सीई… ई…ई…ई’ कि सिसकारियाँ साफ़ साफ़सुन रहा थां।
मैंने रिंकी केँ नाईटसूट केँ ऊपर केँ दोबटन खोलदिए औऱ अपनाहाथ अंदर सरकाया। रुई केँ समाननरम औऱ कोमलदो गोलों नें जिन केँ सिरों पर्र अलगअलग दो निप्पलों केँ ताज़सजे थें, मेरेहाथ कि उँगलियों कां खड़े होकर स्वागत किया।
क्याँ भावनात्मक क्षण थें!
मेरादिल करे कि दोनों कबूतरों कों अपने सीने सें लगाकर चुम्बनों सें भरदूं, निप्पलों कों इतना चूसूं… इतना चूसूं कि रिंकी केँ मुंह सें आहें निकल जाएँ।
यूं तौ रिंकी केँ मुंह सें आहें तोँ मेरे उसके उरोजों कों छूने सें पहले हि निकलना शुरुआत हौ गई थि।
उधर रिंकी कां बायां हाथ मेरे पाजामे केँ ऊपर सें हि मेरा लिंग ढूंढरहा थां। रिंकी नें मेरे पजामे कां कपड़ा खींचकर मुझे मेरे लिंग कों पजामे कि कैद सें छुड़ाने कां इशारा किया, मैंने तत्क्षण अपना पजामा अपनी जाँघों तक नीचे खींच लिया।
रिंकी नें बेसब्री सें मेरे तपते, कड़े-खड़े लिंग कों अपनेहाथ मे लिया औऱ उसके शिश्नमुण्ड पऱ अपनी उंगलियां फेरने लगी।
मेरे लिंग सें उत्तेजनावश बहोत प्री-कम निकलरहा थां औऱ उससे रिंकी कां साराहाथ सन गय़ा।
अचानक रिंकी नें वहीहाथ अपने मुंह कि ओर किया औऱ अपनेहाथ कि मेरे प्री-कम सें सनी उंगलियां अपने मुंह मे डालकर चूसने लगी।
मैंने तभी रिंकी केँ नाईटसूट केँ बाकीबटन भि खोलदिए औऱ उसकीइनर उठाकर दोनों उरोज़ नग्नकर केँ अपनीजीभ सें यहां-वहां चाटने लगा।
इससे रिंकी बैड पर्र मछली कि तरह तड़फने लगी, रिंकी जोरजोर सें मेरा लिंग हिलादबा रही थि औऱ मे रिंकी केँ उरोजों कां, निप्पलों कां स्वाद चेककर रहा थां।
रिंकी पऱ झुके झुके मैंने अपना बायाँ हाथ रिंकी केँ पेट कि ओर बढ़ाया, नाभि पर्र एक्-आध मिनटहाथ कि उंगलियां गोलगोल घुमाने केँ बाद अपनाहाथ नीचे कि ओर बढ़ाकर हौले सें रिंकी केँ नाईटसूट कां नाड़ा खोल दिया।
सरप्राइज ! आज रिंकी नें मुझेऐसा करने सें नहि रोका।
मैंने जैसे हि अपनाहाथ औऱ नीचे करके रिंकी कि पेंटी विहीन योनि पर्र रखा, एक् औऱ आश्चर्य मेरा इंतजार कररहा थां, आज रिंकी कि योनि एकदम साफ़-सुथरी औऱ चिकनी थि, योनि पर्र बालों कां दूरदूर तक कोई निशान नहि थां, लगता थां कि रिंकी नें साम कों हि योनि केँ बाल साफ़ किये थें।
छोटी सि योनि अधिक सें ज़्यादा साढ़े चार सें पांच इन्च कि जिस पऱ ढाईइंच सें तीनइंच कि दरार थि, दरार केँ ऊपर वाले सिरे पऱ छोटेमटर केँ साइज़ कां भगनासा औऱ रिंकी कि योनिरस सें इतनी सराबोर कि दरार मे सें रस बह-बह जांघों कि अंदर वाली साइडों कों भिगोरहा थां।
मैंने अपनेहाथ कि बीच वाली उंगली दरार पऱ ऊपर सें नीचे औऱ फिन नीचे सें ऊपर फेरनी शुरुआत कि, रिंकी केँ जिस्म मे रहरहकर काम तरंगें उठरही थि जोँ मे स्पष्टत: महसूस कररहा थां।
इधर रिंकी मेरे लिंग कां भुरता बनाने पऱ तुली हुइ थि, जोरजोर सें लिंगदबा रही थि, चुटकियां काटरही थि औऱ लिंग केँ शिश्नमुण्ड कों अपनी उँगलियों मे दबादबा कररस निकालने कि कोशिश कररही थि औऱ बदले मे मे रिंकी केँ दोनों उरोज़ चूमरहा थां, यहा-वहा चाटरहा थां, निप्पल्स चूसरहा थां।
निःसंदेह, हम् दोनों जन्नत मे थें।
रिंकी कि योनि पऱ अपनी उंगलियां चलाते-चलाते मैंने अपनेहाथ कि बीच वाली उ। गली दरार मे घुसा दि औऱ अंगूठे औऱ पहली उ। बगली सें प्रिय कां भगनासा हल्का हल्का मींजने लगा।
इस पऱ रिंकी नें उत्तेज़नावश अपनी दोनों टाँगें औऱ चौड़ी कर दि ताकि मेरीबीच वाली उंगली थोड़ी औऱ योनि मे प्रवेश पासके।
मुझेपता थां कि रिंकी पूर्णतः कँवारी थि औऱ मेरेपास ज़्यादा समय नहि थां, बसइकवही रात थि औऱ जीवन मे दोबारा ऐसीरात आनी मुश्किल थि। मैंने रिंकी कि योनि मे धँसी अपनी उंगली कों योनि केँ अंदर हि गोलगोल घुमाना शुरुआत कर दिया।
इस कां नतीजा फ़ौरन सामने आया, रिंकी बारबार रिदम मे अपने नितम्ब खाट सें ऐसेऊपर उठाने लगी जैसे चाहती होँ कि मेरी पूरी उंगली उसकी योनि केँ अंदरचली जाए।
रिंकी कि योनि सें बेशुमार रसबहरहा थां। मेरे लिंग पऱ उस कि पकड़ औऱ मज़बूत हौ गई थि। मे अपनी उंगली कों हरगोल घेरे केँ बाद थोडा औऱ अंदर कि ओर धँसा देता थां।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे गोलगोल घूमती मेरी लगभग पूरी उंगली रिंकी कि योनि मे उतर गई।
अब मैंने अपनी उंगली कों बाहर् निकाला औऱ बीच वाली औऱ तर्जनी उंगली कों भि योनि मे गोलगोल घुमाते घुमाते डालना शुरुआत कर दिया।
रस सें सरोबार रिंकी कि योनि मे मेरी दोनों उंगलियां प्रविष्ट हौ गई।
अबठीक थां, अपनी प्रेयसी कों प्यार-जिंदगी केँ औऱ इस सृष्टि केँ एक् अनुपम औऱ गृहतम रहस्य सें परिचित करवाने कां वक्त आँ गय़ा थां।
मैंने वक्त देखा, सवा बारहबज रहे थें, मतलब कि नींद कि गोलियों कां चमत्कार पूरीतरह डॉली पऱ चल चुका थां औऱ अब मेरेलिए ‘वन्सइन आँ लाइफसमय’ जैसा मौका थां।
मे बैड सें उठ खड़ाहुआ औऱ पहले अपना पजामा संभाला। परलीतरफ जाकर, इससे पहले रिंकी कुछसमझ पाती, रिंकी कों अपनीगोद मे उठाकर औऱ अपने सें लिपटा कर बाहर् ड्राइंग रूम मे आँ गय़ा।
कच्ची उम्र की लज़्ज़त - Chudai Ki Kahani - Next part mein bada twist
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