खेल ससुरजी बहु कां | incest indian sex story – New Episode
"मुझे नामर्द कहती हैं। यह लें!", थोड़ी देर मे लन्ड खड़ा हौ गय़ा औऱ उसनेउसे मलिका कि बुर मे पेल दिया औऱ ज़ोरदार धक्के मारने लगा। उसने अपने दाँत उसकी बड़ी, गोल धइले मे गढ़ादिए। मलिका कों औऱ क्याँ चाहिए थां!
मलिका पागलों कि तरह हँसने लगी औऱ अपनी टांगे उसकीकमर पे लपेट दि औऱ नीचे सें अपनीकमर हिलाने लगी औऱ फिन जब्बार केँ कंधे पे इतनी ज़ोर सें काटा कि उसकेखून निकलआया।
यहा सें आगे.
मेनका अपने मायके सें वापस राजपुरा आँ गयीँ, थि। सवेरे उठकर वोँ नीचे किचन मे खानसमे सें बात करने पहुचि।
"नमस्ते, कुँवरनी जी। "
"नमस्ते, खानसमा साहेब। आज कां मेनू डिसाइड कर लें। "
"कुँवरनी जी, नाश्ते कां हुक्म तोँ राजासाहेब नें कलरात आपके वापसआने केँ पहले हि दे दिया थां। आप् दिन केँ बाकी खाने कां मेनू केँ बारे मे हमे हुक्म करदें। "
मेनका नें बाकी मेनू डिसाइड कर केँ जब नाश्ते कां मेनू देखा तोँ उसे प्लीजेंट सरप्राइज़ हुआ। उसके ससुरजी नें मात्र उसकी मनपसंद कि चीज़ें बनाने कां हुक्म दिया थां। तभी उसके दिमाग़ मे एक् ख़याल आया।
"खानसमा साहब, हमे पापा कि मनपसंद-नापसंद केँ बारे मे दिटेइल सें बताएँ औऱ संग-संग यह भि कि मेडिकल रीज़न्स कि वजह सें तोँ उन्हे कोई परहेज़ तोँ नहीं करना पड़ता!"
थोड़ी देरबाद मेनू रिवाइज़ किया गय़ा। फनलवर रचित।
नाश्ते केँ बाद दोनो बाप-बेटे ऑफीसचले गये औऱ मेनका महल कां सारा सिस्टम समझने लगी। हर काम केँ लिए नौकर-नौकरानी थें। उन्हे पता भि थां कि उन्हे क्याँ करना हैं। साम तक मेनका नें पूरा सिस्टम समझ लिया औऱ पूरे स्टाफ कों कुछनयी बातें भि समझा दि।
रात केँ खाने पे राजासाहब खुशी सें उछल पड़े। मात्र उनके मनपसंद कि चीज़ें थि टेबल पर्र।
"खानसमा साहब, आज आप् हम् पऱ इतने मेहेरबान केसे होँ गये, भइया?"
"महाराज। यहसभी हमने कुँवरनीसाहिबा केँ कहने पे बनाया हैं। "
"दुल्हन, आपको हुमारी पसन्द केँ बारे मे केसेपता चला?"
"जैसे आपको हुमारी मनपसंद केँ बारे मे पताचला। ", मेनका नें जवाब दिया औऱ दोनोहंस पड़े।
साम केँ 7 बजे थें, अंधेरा गहरारहा थां जब राजपुरा सें निकलकर वोँ ग्रेकलर कि लेन्द्कृज़ नें 5 मिनट केँ बाद हाइवे छोड़ दियाओर एक् पतली मार्ग पे चलनेलगी औऱ एक5 मिनटबाद कुछ झोपड़ियों केँ पास पहुचकर रुक गई,। ड्राइवरसाइड कां शीशा 4 इंच नीचेहुआ औऱ एक् 50 कां नोट बाहर् निकला जिसेउस आदिवासी नें लपक केँ पकड़ लिया जौ कारदेख कर भागता हुआआया थां। बदले मे उसने एक् छोटी बॉटल व्हीकल केँ अंदरदे दि।
उसकेबाद वोँ ग्रेकलर कि, गहरे काले शीशों वाली लेन्द्कृज़र वापस लौटने लगी। हाइवे सें थोडा पहले गाड़ी रुक गई,। अंदर बैठे विश्वजीत नें बॉटलखोल केँ अपने मुँह सें लगाली। सस्ती शराबजब हलक सें नीचे उतरी तोँ उसेजलन महसूस हुई पर्र इसीजलन मे उसेचैन मिलता थां।
राजा यशवीर कां बेटा, भावी राजा, अखुट दौलत कां मलिक जौ चाहे, दुनिया कि महँगी सें महँगी शराबपी सकता थां आदिवासियों द्वारा घऱ मे बनाई हुई 50 रुपये कि शराब मे सुकून पाता थां। वाकाई इंसान ईश्वर कि सबसे अजीबो-ग़रीब ईजाद हैं।
विश्वा कों वोँ दिनयाद आयाजब वोँ अपने बड़े भइया केँ संग घूमते हुएयहा आया थां औऱ उन्होने इन आदिवासियों सें जंगली खरगोश पकड़ना सीखा थां। अपने गुज़रे हुए भइया कि यादआते हि उसकी आँखो मे पानी आँ गय़ा। फनलवर कि रचना।
"क्यूचले गये तुम् भइया? क्यू? तुम् गये औऱ मे यहा अकेला रह गय़ा इन झंझटों केँ बीच मे। तुम् जानते थें मुझेयह बिज़नेस औऱ राजाओं कि तरह रहना कितना नापसंद थां। फिन भि मुझेछोड़ करचले गये। ", विश्वा बुदबुडाया औऱ एक् घूँट औऱ भरी।
"मर्यादा, शान.डिग्निटी! बसयही रह गय़ा हैं मेरी लाइफ मे। चलो तोँ ख्याल रहे कि हम् किस ख़ानदान केँ हें, बातकरो तोँ ध्यान रहे कि हुमारी मर्यादा क्याँ हैं.यहा तक कि विवाह भि करो तोँ.हुन्ह। "
विश्वा हमेशा सोचता थां कि यूधवीर राजा बनेगा औऱ वोँ आहिस्ता जैसे मर्ज़ी विदेश मे रह सकता थां। विवाह मे तौ उसे विश्वास हि नहीं थां। उसका मानना थां कि जब तक जीकरे संगरहो औऱ जिसदिन डिफरेन्सस होँ अलग होँ जाओ। विवाह तोँ बस मर्द-स्त्री केँ ऐसे सिंपल रिश्ते कों कॉंप्लिकेट करती थि।
उसने बॉटल ख़तम करके बाहर् फेंकी कि तभी एक् लंबा, सफ़ेद छोटे बालों वाला क्लीन शेवन इंसान उसकेपास पहुचा, "सलाम, साब। "
उस अजनबी कों देखते हि विश्वा केँ हाथ अपनेकोट मे रखे पिस्टल पऱ चलेगये।
"सलाम, साब। मेरानाम विकी हैं। मुझे लगता हैं कि मेरेपास आपकेकाम कि चीज़ हैं। "
"दफ़ा होँ जाओ। ", कहकर विश्वा वाहन गियर मे डालने लगा।
"साहब, बस एक् बार मेरा सामान देख लीजिए। शपथ सें मे आपका दुश्मन नहींबस एक् छोटा सां व्यापारी हू जिसे लगता हैं कि उसकेमाल केँ असल कदरदान आप् हि हैं। "
विश्वा नें बिनाकुछ बोले वाहन रोकी पर्र बंद नहीं कि औऱ उसका एक् हाथकोट केँ अंदर हि रहा।
विकी नें अपनीजेब सें दो छोटे पॅकेट्स निकाले जिसमे एक् मे सफेद पाउडर थां औऱ दूसरे मे छोटे-छोटे टॅब्लेट्स।
विश्वा समझ गय़ा कि विकी एक् ड्रग डीलर थां औऱ यह सिकैने औऱ एकस्टसी थें।
"मे यहसभी नहीं लेता। "
"साहब, नाँ तोँ मे पोलीस कां व्यक्ति हू नाँ तौ आपको फँसाने कि कोशिश कररहा हूं। आपके जैसे मे भि इन लोगों सें महुआ लेनेआता हूं। आज आपको देखा तोँ मेरे अंदर कां बिज़नेसमॅन कहनेलगा कि इतने मालदार व्यक्ति कों 50 रुपये कि शराब क्यू चाहिए! इसीलिए नाँ कि वोँ कोईनया नशा चाहता हैं। "
विश्वा नें विकी कि आँखों मे ताड़ केँ देखा। सच कहरहा थां वोँ। वोँ नशे मे चैन हि तौ तलाशरहा थां। मैत्री पटेल द्वारा रूपांतरित।
".मे यही नाथुपुरा कां रहनेवाला हूं। शहर मे मेरीफोन शॉप हैं। थोड़ी एक्सट्रा इनकम केँ लिएयह धंधा करताहू। भरोसे कां व्यक्ति हू साहब। माल भि असली देता हूं। एक् बार ट्राइ करो साहब। "
"कीमत क्याँ हैं?"
विकी केँ चेहरे पऱ मुस्कान फैल गयीँ,।
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आगेलिख रही हूं कही जाइएगा नहि.
Funlover
खेल ससुरजी बहु कां | incest indian sex story – New Episode
वोँ फोन जिसमे बस एक् हि नंबर सेव्ड थां अचानक बजनेलगा। जब्बार चौंककर उठा, रात केँ एक2बजरहे थें। मलिका एकदम नंगी बेसूध उसकेबगल मे सोई पड़ी थि। उसकेपेर फैलेहुए थें औऱ उसकी बुर केँ पंखुड़िया फैली हुई थि। फनलवर कि रचना।
"हम्म", उसने मोबाइल उठाया।
"चिड़िया नें आज दानाचुग लिया। "
"वेरीगुड। उसेजाल मे फँसाकर हि छोड़ना। "
"डोन्ट वरी। "
जब्बार नें मोबाइल काट दिया। कल्लन नें पहली सीधीचढ़ ली थि। अब देख्ना थां आगे क्याँ होता हैं।
राजा यशवीर नें महसूस किया कि मेनका केँ आने केँ बाद उनका शानदार महलफिन सें उन्हे घऱ लगनेलगा थां वरना तौ पिछले दो सालों सें बस वोँ यहा जैसेबस सोने औऱ खाने केँ लिएआते थें।
पऱ अब उन्हे घऱ पहुँचने कां इंतेज़ार रहता थां। मेनका सें बातें करने केँ लिए। वोँ भि उनसेहर मुद्दे पऱ बातकर लेती थि। उन्हे वोँ काफ़ी समझदार औऱ सुलझी हुइ लड़की लगती थि। राजासाहब उसे कंपनी केँ बारे मे भि बताते थें औऱ उसके बिज़नेस केँ बारे मे ओपीनियन्स सुनकर प्रभावित हुए बिना नहींरह सके थें। महल कि ज़िम्मेदारी तौ उसने बखूबी संभाल ली थि।
मेनका कों भि अपने ससुरजी केँ संग वक्त बिताना अच्छा लगता थां। उनकेपास बताने कों इतनी इंट्रेस्टिंग बातें थि औऱ वोँ कितने नोलेजबल थें। पर्र सबसे अच्छा लगता थां जैसे वोँ उसके बारे मे केअर करते थें।
धीरे धीरे करके एक् महीना गुज़र गय़ा। जहा राजासाहब औऱ मेनका एक् दूसरे सें काफ़ी फ्री होँ गये थें। वही मेनका महसूस कररही थि कि उसका पति उससेदूर होताजा रहा हैं। वैसे तौ अपनामन टटोलने पऱ वोँ भि पाती थि कि वहा विश्वा केँ लिए प्रेम नहीं हैं- होता भि केसेजिस इंसान नें उसेबस अपनी प्यास बुझाने कां ज़रिया समझा होँ, उसकेलिए प्रेम कहा सें आता। पर्र थां तोँ वोँ उसका पति औऱ उसे होँ नाँ होँ मेनका कों उसकी फ़िक्र अवश्य थि।
पिछले एक् महीने सें वोँ रात मे देर सें आता, पूछने पऱ काम कां बहाने बना देता। मेनका कों शक़हुआ कि कहीकोई दूसरी स्त्री कां चक्कर तौ नहीं पऱ ऐसा नहीं थां कि विश्वा कों उसमे दिलचस्पी नहीं थि। रोज़रात वोँ उसे पहले जैसे हि चोद्ता थां, पर्र अब वोँ औऱ बेचैन औऱ बेसबरा रहनेलगा थां। उसकी आँखों मे जैसेकोई नशाहर समय दिखता थां।
मेनका खाट पर्र पड़ी हुई यहीसभी सोचरही थि, बगल मे विश्वा उसे चोदकर अभि-अभि सोया थां। उसका ध्यान अपने ससुरजी कि ओर गय़ा, कितना फ़र्क थां बाप-बेटे मे। राजासाहब उसकी कितनी चिंता करते थें। अगर विश्वा कि स्थान उसकी विवाह राजासाहब सें हुईँ होती तोँ? ख़याल आते हि मेनका कों अपने बचपने पऱ हँसी भि आई औऱ थोड़ी लज्जा भि। आख़िर वोँ उसके ससुरजी थें।। उसने करवट लेकर विश्वा कि तरफपीठ कि औऱ सोनेलगी।
वही राजासाहब विश्वा केँ बारे मे सोचरहे थें। उन्हे आजकल वोँ थोडा अजीब लगनेलगा थां। नयी विवाह थि पर्र बहू मे उसेकोई खास दिलचस्पी नहीं थि। एक् बार उन्होने उसेबहू कों घुमाने केँ लिएशहर लें जानेकहा थां पर्र उसनेकाम कां एक्सक्यूज़ करबात टाल दि। इतनी अच्छी पत्नि पाकर तौ लोग निहाल होँ जाते हें। उन्होने सोच लिया थां कि विश्वा सें खुलकर बात करेंगे। मेनका जैसी लड़की भाग्य वालों कों मिलती हैं। उन्हे भि तोँ ऐसी हि पत्नि चाहिए थि जोँ सिर्फ़ पत्नि हि नहींयार भि हौ, उनकेसंग कंधे सें कंधा मिलाकर चलने कां हौसला रखती थि। सरिता देवी एक् बहोत अच्छी महिला, अच्छी मा थि पऱ राजासाहब कि दोस्त बनने कि कोशिश उन्होने कभी नहीं कि। इसीलिए तोँ वोँ शहर मे उन रखेलो कों रखनेलगे थें, "कितनी पुरानी बात हैं। ", उन्होने सोचा। बेटे कि मौत केँ बाद तोँ सेक्स कि तरफ उनका ध्यान भि नहीं गय़ा। संपादिका मैत्री।
औऱ फिन उन्हे भि ख़याल आया, "अगर मेनका हमारी पत्नि होती तौ? औऱ उनके होटो पे मुस्कान आँ गई,। "छीछीए! अपनीबहू केँ बारे मे ऐसे ख़याल! पर्र गैर होती तौ! शायदअब तक मेरे लन्ड सें खेलती होती"! सोचते हुए वोँ भि सोगये।
अगलेदिन वोँ सुभह होनी थि जौ दोनो कि ज़िंदगी कां रुख़ बदलने कां आगाज़ करने वाली थि।
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आज केँ लिएबस यही तक।
आपके कोमेंट्स कि इंतजार मे.
Funlover केँ ओर सें.
।। जय भारत।।
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अबआगे.
सुभह राजासाहब लॉन मे चाइ पीतेहुए अख़बार पढ़रहे थें। मेनका वही उनसेकुछ 24 फीट कि दूरी पऱ मालियों कों कुछ समझारही थि। राजासाहब नें अख़बार केँ कोने सें उसे देखा, पीलेरंग कि साडी मे वोँ बहोत हसीनलग रही थि। राजासाहब उसका साइड प्रोफाइल देखरहे थें जिसवजह सें उसके बड़ी छातियो औऱ गांड केँ उभार कां पूरापता चलरहा थां। आज पहलीबार राजासाहब नें उसके फिगर कों ढंग सें देखा औऱ रीयलाइज़ किया कि हसीन होने केँ संग-संग मेनका बहोत सेक्सी भि हैं। फनलवर कि प्रस्तुति।
तभी मेनका कां हाथ अपने माथे पर्र गय़ा, माली उसके आदेशानुसार लॉन केँ दूसरे कोने पऱ चलेगये थें। आस-पास कोई नौकर नहीं थां, सब किसी नां किसीकाम मे लगे थें। मेनका कों चक्कर आँ रहा थां, अचानक उसकी आँखों केँ सामने अंधेरा छा गय़ा।
राजासाहब नें उसे गिरते देखा औऱ बिजली कि फुर्ती सें उसे ज़मीन पर्र गिरने सें पहले हि सामने सें अपनी बाहों मे थाम लिया, "क्याँ हुआ, दुल्हन?" वोँ उसेइस तरह सें पकड़े थें कि दूर सें कोई देखता तोँ समझता कि दोनोगले लगरहे हें। उन्होने नीचे उसके चेहरे कों थपथपाया। मेनका नें आँखें खोली तोँ देखा कि उसके ससुरजी नें उसे गिरने सें रोक लिया थां। कितना आरामलग रहा थां उसेइन मज़बूत बाहों मे, हिफ़ाज़त महसूस होँ रही थि, उसने सहारे केँ लिए राजासाहब केँ कंधों कों पकड़ लिया। उसकादिल किया कि बसऐसे हि उन बाहों केँ सहारे खड़ीरहे, राजासाहब कि शर्ट केँ उपर केँ दोबटन खुले थें औऱ उनके चौड़े, बालों भरे सीने कां कुछ हिस्सा नज़र आँ रहा थां। मेनका नें सिर झुकाया औऱ उनके सीने मे अपना मुँह छुपा लिया। उनकी मर्दाना खुसबु उसे मदहोश करनेलगी।
राजासाहब कि नज़र नीचे पड़ी तोँ पारदर्शी आँचल मे सें उन्हे ब्लाउस केँ गले सें झँकता मेनका कां मस्त क्लीवेज नज़रआया जोँ कि उनके सीने सें दबने केँ कारण औऱ उभर केँ ऊपर आँ गय़ा थां। उनकेहाथ ब्लाउस केँ नीचे सें उसकी नंगीपीठ औऱ कमर पर्र थें औऱ उसकी कोमलता महसूस कररहे थें। राजासाहब कां लन्ड खड़ा हौ गय़ा थां जिसेसटे होने केँ कारण मेनका नें भि अपनेपेट पे महसूस किया औऱ वोँ अपने ससुरजी सें थोडा औऱ सॅट गयीँ,। दोनो कां दिलकर रहा थां कि ऐसे हि पूरी उम्र खड़ेरहे पर्र तब तक नौकर-नौकरानी भागते हुएवहा आनेलगे थें। राजासाहब नें एक् हाथ अपनीबहू कि कमर सें हटाकर उसके चेहरे कों उपर उठाया, "होश मे आओ दुल्हन। " फनलवर कि रचना।
नौकरानियों कि सहायता सें मेनका कों उन्होने उसके कमरे तक पहुचाया औऱ विश्वा कों डॉक्टर बुलाने कों कहा। राजासाहब नें अपनेमिल स्टाफ कि सुविधा केँ लिए जौ हॉस्पिटल बनाया थां उसकी देख-रेख कि ज़िम्मेदारी डॉक्टर, सिन्हा कि थि। उनकी पत्नि डॉक्टर लता भि उसी हॉस्पिटल गायनेकोलोजी डिपार्टमेंट देखती थि। विश्वा कां मोबाइल मिलते हि वोँ जल्दी महल पहुचि औऱ मेनका कां चेक-अप करनेलगी। थोड़ी देरबाद वोँ राजासाहब औऱ विश्वा केँ पासआई, "बधाई हौ राजासाहब, आप् दादाजी बनाने वाले हें। "
"क्याँ.?सच! डॉक्टर साहिबा आपने तोँ हमारा मनखुश कर दिया। दुल्हन बिल्कुल ठीक तोँ हें नाँ?"
"हा, राजासाहब। आपकी इजाज़त हौ तौ मे कुंवर-कुँवारानी सें ज़रा एक् संगबात करलूँ?"
"हा, हा। अवश्य। जाइए कुंवर। "
मेनका केँ बेडरूम मे पहुचकर उन्होने कहा, "कुँवरनी बिल्कुल ठीक हें, कुंवर। बस आप् इनका रेग्युलर चेक-अप करवाते रहिए। बस एक् बात कां ख़याल रखे। अभि कमसेकम 45 डेज़ तक आप् दोनो फिज़िकल रिलेशन्स मत बनाइएगा। यह होने वालीमा केँ लिए बहोत ज़रूरी हैं। एक् डॉक्टर होने केँ नाते मेरा फ़र्ज़ थां कि मे आपकोयह बतादूं होपयू डिड्न'ट माइंड इट। "
"नोनोट ऐटऑल, डो। आंटी। आपने बचपन सें हमे देखा हैं, आप् इतना फॉर्मल होकरहमे शर्मिंदा कररही हें। "
विश्वा राजासाहब केँ कहने पर्र डॉक्टर कों छोड़ने बाहर् तक आया।
"कुंवर, आपकी तबीयत तौ बिल्कुल ठीक हैं नां?", विश्वा कि आँखें देखकर डॉक्टर लता कों कुछशक़ हुआ थां।
"हा, आंटी ऐसा क्यूलगा आपको?"
"बस ऐसे हि कोई तकलीफ़ हौ तोँ आप् जानते हें कि आपके डॉक्टर अंकल औऱ मे हमेशा मौजूद हें। "
"हा, आंटी। आप् फ़िक्र नाँ करें। "
जब सें मेनका प्रेग्नेंट हुइ थि राजासाहब तौ उसका औऱ ख़याल रखनेलगे थें। अगरउसे एक् फूल भि उठाकर यहा सें वहा रखते देखते तोँ नौकरों कों डाँटने लगते। उसे अपने हाथों सें काम तौ पहले भि नहीं करना पड़ता थां औऱ अब तोँ लगता थां कि राजासाहब कां बस चलता तौ उसेहर समय बिठाकर हि रखते। पर्र विश्वा वैसे कां वैसा थां बसअबउसे चोद नहीं सकता थां। पऱ मेनका कों उसकी चिंता होती थि, इधर वोँ उसे औऱ अजीब लगनेलगा थां। राजासाहब जर्मन कंपनी सें डील मे बिज़ी थें। अब पेपर औऱ शुगर दोनो मिल्स मे हिस्सेदारी अकेली वोँ जर्मन कंपनी खरीदरही थि।
ऐसे मेनका कि प्रेग्नेन्सी कों एक् महीना पूरा होँ गय़ा। फनलवर लिखित।
"दुल्हन, जर्मन डील केँ लिएहमे 2-3 दिनों केँ लिएशहर जानां पड़ेगा? पीछे आप् अपना ख़याल रखिएगा। औऱ हाँकोई भि काम बिल्कुल नहीं करना हैं, बस हुक्म देना हैं। सारे नौकरों कों भि हमने ताकीद कर दि हैं। "
"आप् हुमारी चिंता मत करिए, पापा। आप् बसडील केँ टर्म्स ध्यान सें फाइनलाइज करिएगा। वोँ क्लॉज़ अवश्य डलवाइएगा जिसमे मेन्षंड हैं कि उनके स्टाफ केँ ग्रूप मे आने केँ बाद भि हमारे एग्ज़िस्टिंग एंप्लायीस कों 6 महीने तक नहीं हटाया जा सकता, सिर्फ हटाने केँ लिए शॉर्टलिस्ट कियाजा सकता हैं। औऱ हा, उनकी कॉंपेन्सेशन अमाउंट भि अभि हि फाइनल कर लीजिएगा। ", राजासाहब केँ गाड़ी मे बैठते मेनका बोलीं।
"ओके, दुल्हन। अब अंदर जाकर आराम कीजिए। "
"गाड़ी मे बैठे-बैठे राजासाहब सोचरहे थें कि वोँ कितने किस्मतवाले हें कि मेनका जैसीबहू मिली। औऱ फिन वोही ख़याल आया उन्हे, "अगर वोँ उनकी पत्नि होती तौ?"
पर्र उन्होने अपनासर झटका औऱ कुछ पेपर्स देखने लगे।
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"कैसाचल रहा हैं? चिड़िया कों दाने कि आदतलग गयीँ, ?"
"हा, अब तोँ पंछी एक् दिन भि बिना दाने केँ नहींरह पाता। इतने हि दीनो मे ऐसाआदि हौ जाएगा मैने तोँ सोचा हि नहीं थां। "
"तौ अबउसे थोडा तड़पाओ। कुछ दीनो केँ लिए दानो कि सप्लाइ रोकदो। थोडा तडपेगा तौ जोँ हम् कहेंगे वोँ करेगा। "
"ओके। "
औऱ जब्बार औऱ कल्लन उर्फ विकी कि बात ख़तम हौ गयीँ,।
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जय भारत
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