छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - होली की कहानी - Real Story Continue Part 1
छुटकी - होली दिदी कि ससुराल मे
ये किस्सा सीक्वेल हैं, मेरी एक् छोटी सि मगरखूब मज़ेदार औऱ गरमागरम होली कि स्टोरी, मज़ा पहली होली कां ससुराल मे, जी अभि उसकी लिंक भि दूंगी, उसके पहलेपेज कों रिपोस्ट भि करुँगी, मगर उसके पहलेइस कथा कि हलकी सि रूपरेखा, जिसकथा सें जुडी हैं यह स्टोरी दोचार लाइनें उसके बारे मे,
तौ इस स्टोरी मे, जुड़ाव बनाये रखने केँ लिए, पहलीकथा केँ दोचार प्रसंग, जिनसे छुटकी कां औऱ इस स्टोरी केँ जुड़े चरित्रों कां जुड़ाव हैं वोँ पूर्वाभास केँ तौर पर्र दूंगी, जिससे छुटकी औऱ उसके जीजा कि होली, केसे औऱ क्यूं आयी छुटकी अपनी दिदी केँ गाँव मे, वोँ सभीकुछ कुछसाफ़ हौ जाए,
फिरभी मे तोँ चाहूंगी कि इस होली मे आप् मूल किस्सा कों भि एक् बारपढ़ लें, अगरपढ़ी होँ तौ भि तोँ थोड़ी फगुनाहट, होली कां सुरूर चढ़ जाएगा, मगर चलिए मे दोचार बातें उसकथा केँ बारे मे भि बात देती हूं, जिस कां ये सीक्वेल हैं।
मज़ा पहली होली कां ससुराल मे, विवाह केँ बाद कि मेरी पहली होली कि स्टोरी हैं, इनकी भि। मेरी ससुराल मे ननदों, ननदोई, देवरों औऱ सासू केँ संग कैसी पहली होली हुयी औऱ इनकी अपनी ससुराल मे सालियों, सलहज, औऱ सासू केँ संग कैसी होलीपड़ी दोनों हि। चलिए पहले पात्र परिचय करादूँ, फिनआगे कि बात, तौ ससुराल मे मेरेयह हैं औऱ इनकीदो बहनें, एक् विवाह शुदा जौ होली मे नन्दोई जी केँ संग अपने मायके आयीथीं, मेरी हि समौरिया, औऱ दूसरी छोटी ननदी, जौ मेरी छोटी बेहन, छुटकी जैसी हि। देवरु कोई नहि हैं, मगर होली मे तौ सारा गाँवनयी भौजाई केँ लिए देवरु हौ जाता हैं, औऱ मेरी जेठानी औऱ सासू माँ। मायके मे मेरी मां, औऱ दो छोटी बहने, मंझली जोँ बोर्ड कां इम्तहान देरही थि औऱ छुटकी, उससे छोटी।
तौ पहलेदिन कि होली मैंने अपनी ससुराल मे मनाई औऱ उसीसाम कों ट्रेन सें हम् लोग इनकी ससुराल कों चलदिए, औऱ अगली सुभह वहां मेरी दोनों छोटी बहने इनसे होली खेलने केँ लिया एकदम बौराई थीं, औऱ मेरीसगी तोँ नहि मगरसगी सें बढ़कर, भाभी, इनकी सलहज भि अपने नन्दोई कां संगदे रही थि। तौ ससुराल मे पहलेदिन हि इन्होने अपनी मंझली साली कां नेवान कर दिया, रात मे सासू माँ केँ संग सफ़ेद पिचकारी वाली होली खेली, औऱ अगलेदिन छुटकी कि दो सहेलियां आयीथीं, उन दोनों केँ संग,। छुटकी बहोत घबड़ारही थि, मगर उसकी भाभी,। अपने नन्दोई केँ संग मिलकर तौ होली मे किस साली कि बचती हैं, अगर ननदोई सलहज एक् संग हौ जाएँ तौ उसकी भि नहि बची.
यह चाहरहे थें कि छुटकी हम् लोगों केँ संगचले, औऱ इनकेसंग मेरे नन्दोई भि, मैंने छुप केँ दोनों कां पूरा प्रोग्राम सुना थां। पऱ इनकी सासू तौ अपने दामाद सें भि दोहाथ आगेथीं, वोँ स्वयं,। तौ दोदिन एक् रात जौ ससुराल मे इन्होने बितायी होली कि मस्ती केँ संग, औऱ अगलीरात कों जौ हम् इनके गाँव लौटे तोँ संग मे इनकी छोटी साली भि,
बस तौ यह स्टोरी उसी ट्रेन यात्रा सें शुरुआत होती हैं,।
तोँ आशा रहेगी, मुझे आपकेसंग कि, प्रेम कि दुलार कि औऱ आपके कमेंट्स कि, जोँ हरकथा यात्रा केँ लिए पाथेय कि तरह हैं,।
तोँ बस शुरुआत करती हूं औऱ सबसे पहलेजिस कथा कां ये सीक्वेल हैं उसका पहला पन्ना, एक् झलक केँ तौर पऱ,
Erotica - आनंद पहली होली कां ससुराल मे
मज़ा पहली होली कां, ससुराल मे ( इस किस्सा केँ सब पात्र वयस्क हें औऱ सब चित्र इंटरनेट सें लिएगए हें यदि किसी कों कोई आपत्ति हौ तोँ टिप्पणी कर सकता हैं। अंडरएज सेक्स न् केवलइस फोरम केँ नियमों केँ खिलाफ हैं बल्कि वैधानिक रूप सें भि निषिद्ध हैं, औऱ मे वयक्तिगत रूप सें भि इसे नहि मनपसंद करती। ) मुझे।( इस किस्सा केँ सब पात्र वयस्क हें औऱ सब चित्र इंटरनेट सें लिएगए हें यदि किसी कों कोई आपत्ति होँ तौ टिप्पणी कर सकता हैं। अंडरएज सेक्स नं केवलइस फोरम केँ नियमों केँ खिलाफ हैं बल्कि वैधानिक रूप सें भि निषिद्ध हैं, औऱ मे वयक्तिगत रूप सें भि इसे नहि मनपसंद करती। )
पूर्वाभास - पृष्ठ १ औऱ २
भाग१ -पृष्ठ ५ छुटकी - होली, दिदी कि ससुराल मे
भाग२ पृष्ठ ८ छुटकी -बंधेहाथ, ट्रेन मे
भाग३ पृष्ठ १३गरम चायगरम चाय
भाग ४, पृष्ठ १९ छुटकी कां पिछवाड़ा औऱ नन्दोई जी कां इरादा
भाग५ - पृष्ठ २२ गोलकुंडा पऱ चढ़ाई- चलती ट्रेन मे
भाग६ --पृष्ठ २९-३०रात भर ट्रेन मे, सटासट,.
भाग७ पृष्ठ ३५रेल मे धक्क्म पेल
भाग ८ पृष्ठ ४० छुटकी पहुंच गई, जीजा केँ गाँव
भाग ९ -पृष्ठ ४६ मेरी सासू माँ
भाग१० --पृष्ठ ५० ननदी, नन्दोई औऱ छुटकी कां पिछवाड़ा
भाग११ - पृष्ठ ५३ सासू, ननदिया ( नैना ) कां महाजाल
भाग१२ - पृष्ठ ५८दो बहेलिये ( सासू औऱ नैना ननदिया)
भाग१३ -पृष्ठ ६२ पूरा गाँव,। जीजा
भाग १४ पृष्ठ ६६ देवर जी मेरे
भाग १५ पृष्ठ ७२ चंदू देवरु
भाग१६ -पृष्ठ ७७ फागुन कां पहलादिन- देवर जी भौजाई
भाग१७ -पृष्ठ ८१ छुटकी - प्रेम दुलार औऱ,.
भाग१८ - पृष्ठ ८७ चुन्नू कि पढ़ाई
भाग १९ - पृष्ठ ९१ ननदों भौजाइयों कि रंगभरी कबड्डी
भाग२० -पृष्ठ ९३ छुटकी कि हालचाल
भाग२१ - पृष्ठ ९९ छुटकी पऱ चढ़ाई -
भाग२२ पृष्ठ १०३रात बाकी
भाग २३ पृष्ठ १०९नई सुभह
भाग २४ पृष्ठ ११३ देवरु भाभी कि होली
भाग २५ पृष्ठ १२१ छोटा देवर जी - केसे उतरीनथ चुन्नू कि
भाग२६ पृष्ठ १२७ पिलानिंग - कच्ची ननदों कि लेने कि
भाग२७ पृष्ठ १३२ औऱ छुटकी कि होली
भाग २८ पृष्ठ १३६ - किस्सा इन्सेस्ट यानी भैया केँ बहिनिया पऱ चढ़ने कां- उर्फ़ गीता औऱ उसके भैया अरविन्द कां
भाग२९ पृष्ठ - १४५ इन्सेस्ट कां किस्सा -तड़पाओगे, तड़पालो,। हम् तड़पतड़प केँ भि
भाग३० पृष्ठ १५२ किस्सा इन्सेस्ट कां, भैया औऱ बहिनी कां -( अरविन्द -गीता ) दूध -मलाई
भाग ३१ पृष्ठ १६५ किस्सा इन्सेस्ट कां, -रात बाकीबात बाकी
भाग ३२ पृष्ठ १७८ इन्सेस्ट गाथा अरविन्द औऱ गीता, -सुभह सबेरे
भाग३३ पृष्ठ २०० अरविन्द औऱ गीता कि इन्सेस्ट गाथा सांझभई घऱआये
भाग३४ पष्ठ२१४ इन्सेस्ट कथा - चाची नें चांदनी रात मे,.
भाग३५ पृष्ठ २२५ फुलवा
भाग३६ - पृष्ठ २३६ इन्सेस्ट किस्सा- मस्ती भैया बहिनी उर्फ़ गीता -अरविन्द कि
भाग३७ - पृष्ठ २५० इन्सेस्ट कथा - औऱ मम्मी आँ गयीं
भाग ३८ पृष्ठ २६० मेरेपास मम्मी हैं
भाग३९ - पृष्ठ २७१ मां, बेटा, बेटी औऱ बरसात कि रात
भाग ४० पृष्ठ २८६ इन्सेस्ट गाथा - गोलकुंडा पर्र चढ़ाई -भइया कि मम्मी केँ सामने
भाग४१ पृष्ठ ३०३ इन्सेस्ट कथा - मामला वल्दियत कां उर्फ़ किस्से मम्मी केँ
भाग४२ पृष्ठ ३१७ इन्सेस्ट कथा मम्मी केँ किस्से,
भाग४३ पृष्ठ ३२९ इन्सेस्ट कथा- मां केँ किस्से, मायके केँ
भाग४४ पृष्ठ ३४१ रिश्तों मे हसीन बदलाव उर्फ़ मेरेपास मम्मी हैं
भाग४५ पृष्ठ ३४८ गीताचली विद्यालय
भाग४६ पृष्ठ ३६३तीन सहेलियां खड़ीखड़ी, किस्से सुनाएँ घड़ीघड़ी
भाग४७ पृष्ठ ३७५ रोपनी
भाग४८ - पृष्ठ 394 रोपनी -फुलवा कि ननदी
भाग ४९ पृष्ठ ४२० मस्ती -मां, अरविन्द औऱ गीता कि
भाग५० पृष्ठ ४३५ मम्मी कां नाइट विद्यालय
भाग५१ पृष्ठ ४५६ भैया केँ साथ अमराई मे
भाग५२ पृष्ठ ४७९ गन्ने केँ खेत मे भैया केँ साथ
भाग५३ - पृष्ठ ४९४ फुलवा कि ननदी
भाग ५४ पृष्ठ ५०६ स्वाद पिछवाड़े कां
भाग५५ पृष्ठ ५२१ मम्मी
भाग५६ - पृष्ठ ५३६ - गीता औऱ खेत खलिहान
भाग५७- पृष्ठ ५४६ कुश्ती ननदी भौजाई कि -
भाग५८ पृष्ठ ५५७ मंजू भाभी, मिश्राइन भाभी औऱ स्ट्रेटजी
भाग५९ पृष्ठ ५६७ कबड्डी ननदी औऱ भौजाई कि
भाग६० पृष्ठ ५७३ कबड्डी राउंड २
भाग६१ पृष्ठ ५८१ कबड्डी राउंड ३
भाग६२ पृष्ठ ६०५ कबड्डी फाइनल राउंड
भाग६३ पृष्ठ ६१६जीत गई, भौजाइयां
भाग६४ पृष्ठ ६२४ ननदों कि हार भाभियों कि मस्ती
भाग६५ पृष्ठ ६३२ भाभियाँ कि जीत कां जश्न
भाग ६६ पृष्ठ ६३९ ननदों साथ मस्ती -मज़ा कच्ची कली रूपा कां
भाग६७ पृष्ठ ६४३ होलिका माई
भाग६८ - पृष्ठ ६६२ होँ गई, सामघऱ कि ओर
भाग६९ पृष्ठ ६७३ पिलानिंग कल कि, ननदों कि
भाग७० पृष्ठ ६८४ रेनू औऱ कमल
भाग७१ पृष्ठ ६९३ किस्सा रेनू औऱ कमल कां
भाग७२ पृष्ठ ७०३ मेरा भइया मेरी जान--किस्से भैया बहिनिया केँ
भाग७३ - पृष्ठ ७२१ किस्से भैया बहिनिया केँ
भाग७४ पृष्ठ ७३२ मस्ती रेनू औऱ कमल कि,
भाग७५ पृष्ठ ७४४ पठान टोले वाली
भाग७६ - पृष्ठ ७४९ बुर्के वाली पठान टोले कि
भाग७७ पृष्ठ ७६५ इंटरवल केँ बाद ननदों कि मस्ती
भाग७८ पृष्ठ ७७९ चंदा कां पिछवाड़ा औऱ कमल कां खूंटा
भाग७९ - पृष्ठ ७९५ हिना औऱ दूबे भाभी
भाग८० पृष्ठ ८०७ चमेलिया -गुलबिया
भाग८१ पृष्ठ ८१८ बारी भौजाइयों कि
भाग८२ पृष्ठ ८३० सुगना भौजी
भाग ८३ पृष्ठ ८४५ महुआ चुये
भाग८४ पृष्ठ ८५८ ननदी केँ भैया बने उनके प्रियतम-
भाग८५ पृष्ठ ८७० इन्सेस्ट कथा -ननदी केँ भैया बनगएसजन -
भाग८६ ----पृष्ठ ८८३ इन्सेस्ट कथा - सैंया बने नन्दोई
भाग८७ - पृष्ठ ८९७ इन्सेस्ट कथा -इंटरवल औऱ थोड़ा सां फ्लैश बैक
भाग८८ पृष्ठ ९०९ - इन्सेस्ट कथा - मेरामरद -मेरी ननदी
भाग८९ - पृष्ठ ९१९ - इन्सेस्ट कथा - इनकी मम्मी - मेरी सासू माँ
भाग९०- पृष्ठ ९३३ - वो रात
भाग ९१ पृष्ठ ९४३नया दिननयी सुभह -सासू माँ बहू
भाग९२ पृष्ठ ९५० ननदी औऱ आश्रम -
भाग९३ पृष्ठ ९६३ नन्दोई सलहज औऱ सासू माँ
भाग९४--- पृष्ठ ९७१ मस्ती सासू माँ औऱ सलहज केँ संग -
भाग९५ पृष्ठ ९९५ सासू कां पिछवाड़ा
भाग९६ पृष्ठ १००५ ननदी कि सासू, औऱ सासू माँ कां प्लान -
भाग९७ पृष्ठ १०१०आज कि रात
भाग९८ पृष्ठ १०१६ अगली तकलीफ़ - ननदोई जी,
भाग ९९ पृष्ठ १०२५ ननदी कि रात -ननदोई केँ साथ
भाग१०० - पृष्ठ १०३५ ननदी कि बिदायी
भाग१०१ - पृष्ठ १०६७ मेरामरद,
भाग१०२ - पृष्ठ १०७३ सुगना औऱ उसके ससुरजी -सूरजबली सिंह
भाग१०३ पृष्ठ १०७६ इमरतिया
भाग१०४, पृष्ठ १०८१, बुकवा ( उबटन ) औऱ इमरतिया भौजी
भाग 105 पृष्ठ १०८६ कोहबर औऱ ननदी भौजाई,
भाग१०६ - पृष्ठ, १०९५रीत रस्म औऱ गाने,
भाग१०७ पृष्ठ ११०० बुच्ची औऱ चुनिया
भाग१०८ - पृष्ठ ११०७खुल गय़ा नाड़ा
भाग१०९ - पृष्ठ १११६नाच गाना, मस्ती औऱ सुरजू
भाग११० पृष्ठ ११२७नाच -चुनिया औऱ बुच्ची
भाग१११ पृष्ठ ११३८ पंडित जी औऱ बुच्ची कि लिख गयीँ, भाग्य
भाग११२ - पृष्ठ ११४५ अगलादिन, बुच्ची औऱ इमरतिया
भाग११३ पृष्ठ ११७० हल्दी-चुमावन कि रस्म
भाग११४ पृष्ठ ११७७ हल्दी- बुच्ची औऱ गप्पू
भाग-११५ पृष्ठ ११८८ बुच्ची, नेछु कि रस्म औऱ, किस्से बुच्ची कि माई केँ
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - होली की कहानी – New Episode
पहला पन्ना- मज़ा पहली होली कां ससुराल मे,
( जिसका ये सीक्वेल हैं )
मज़ा पहली होली कां, ससुराल मे
( इस किस्सा केँ सब पात्र वयस्क हें औऱ सब चित्र इंटरनेट सें लिएगए हें यदि किसी कों कोई आपत्ति होँ तोँ टिप्पणी कर सकता हैं। अंडरएज सेक्स नं मात्र इस फोरम केँ नियमों केँ खिलाफ हैं बल्कि वैधानिक रूप सें भि निषिद्ध हैं, औऱ मे वयक्तिगत रूप सें भि इसे नहि पसन्द करती। )
मुझे त्योहारों मे बहोत मजाआता हैं, खासतौर सें होली मे.
पर्र कुछ चीजें त्योहारों मे गड़बड़ हैं। जैसे, मेरे मायके मे मेरी मां औऱ उनसे भि बढ़ केँ छोटी बहनें कहरही थीं
कि मे अपनी पहली होली मायके मे मनाऊँ। वैसे मेरी बहनों कि असली दिलचस्पी तौ अपने जीजाजी केँ संग होली खेलने मे थि.
परन्तु मेरे ससुराल केँ लोगकह रहे थें कि बहु कि पहली होली ससुराल मे हीं होनी चाहिये.
मे बड़ी दुविधा मे थि। पऱ त्योहारों मे गड़बड़ सें कईबार परेशानियां सुलझ भि जाती हें। इसबार होली२ दिन पड़ी.
मेरी ससुराल मे 17 मार्च कों औऱ मायके मे 18 कों.
मायके मे जबर्दस्त होली होती हैं औऱ वोँ भि दोदिन। तयहुआ कि मेरेघऱ सें कोई आँ केँ मुझे होली वालेदिन लेँ जाए औऱ ‘यह’ होली वालेदिन सुभह पहुँच जायेंगे। मेरे मायके मे तोँ मेरीदो छोटी बहनों नीता औऱ रीतू केँ सिवाय कोई थां नहि.
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मे फ्लैश बैक मे चली गई.
सुहागरात केँ चार-पांच दिन केँ अंदरहीं, मेरे पिछवाड़े कि। शुरुआत तोँ उन्होंने दोदिन केँ अंदरहीं कर दि थि.
सुहागरात केँ चार-पांच दिन केँ अंदरहीं, मेरे पिछवाड़े कि। शुरुआत तोँ उन्होंने दोदिन केँ अंदरहीं कर दि थि.
मुझेअब तक याद हैं, उसदिन मैंने सलवार-सूट पहनरखा थां, जोँ थोडा टाईट थां औऱ मेरे मम्मे औऱ नितम्ब खूबउभर केँ दिखरहे थें। रानू नें मेरे चूतड़ों पे चिकोटी काट केँ चिढ़ाया,
“भाभी लगता हैं आपके पिछवाड़े मे बहुत खुजली मचरही हैं। आज आपकी गांड़ बचने वाली नहि हैं, अगर आपकोइस ड्रेस मे भैया नें देख लिया.”
“अरे तौ डरती हूं क्याँ तुम्हारे भैया सें? जब सें आई हूं लगातार तोँ चालू रहते हैं, बाकी औऱ कुछ तोँ अबबचा नहि.
यह भि कब तक बचेगी?”
चूतड़ मटका केँ मैंने जवाब दिया.
औऱ तब तक ‘वोँ’ भि आँ गए। उन्होंने एक् हाथ सें खूबकस केँ मेरे चूतड़ कों दबोच लिया
औऱ उनकी एक् उंगली मेरेकसी सलवार मे, गांड़ केँ क्रैक मे घुस गई.
उनसे बचने केँ लिये मे रजाई मे घुस गई अपनी सासू केँ बगल मे.
‘उनकी’बगल मे मेरी जेठानी औऱ छोटी ननदी बैठी थि। वो भि रजाई मे मेरीबगल मे घुस केँ बैठगए
औऱ अपना एक् हाथ मेरे कंधे पे रख दिया.
छेड़-छाड़ मात्र कोई ‘उनकी’ जागीर तौ थि नहि। सासू केँ बगल मे मे थोडा सेफ भि महसूस कररही थि
औऱ रजाई केँ अंदरहाथ भि थोडा बोल्ड होँ जाता हैं.
मैंने पजामे केँ ऊपरहाथ रखा तौ उनका खूंटा पूरीतरह खड़ा थां। मैंने शरारत सें उसे हल्के सें दबा दिया औऱ उनकीओर मुस्कुरा केँ देखा.
बेचारे। चाह केँ भि। अब मैंने औऱ बोल्ड हौ केँ हाथ उनके पजामे मे डाल केँ सुपाड़े कों खोल दिया। पूरीतरह फूला औऱ गर्म थां। उसे सहलाते-सहलाते मैंने अपने लंबे नाख़ून सें उनके पी-होलको छेड़ दिया.
जोश मे आँ केँ उन्होंने मेरे मम्मे कस केँ दबादिए.
उनके चेहरे सें उत्तेजना साफ़दिख रही थि। वो उठ केँ बगल केँ कमरे मे चलेगए जौ मेरी छोटी ननदी कां रीडिंग रूम थां। बड़ी मुश्किल सें मेरी ननदी औऱ जेठानी नें अपनी मुस्कान दबायी.
“जाइये-जाइये भाभी, अभि आपका बुलावा आँ रहा होगा.”
शैतानी सें मेरी छोटी ननदी बोलि.
हम् दोनों कां दिन-दहाड़े कां यहकाम तौ सुहागरात केँ अगलेदिन सें हीं चालू होँ गय़ा थां.
पहलीबार तोँ मेरी जेठानी जबरदस्ती मुझे कमरे मे दिन मे करआई औऱ उसकेबाद सें तोँ मेरी ननदें औऱ यहा तक कि सासू जी भि.बड़ा खुला मामला थां मेरी ससुराल मे.
एक् बार तोँ मुझसे ज़रा सि देर होँ गई तौ मेरी सासू बोलि,
“बहु, जाओ नाँ। बेचारा इंतजार कररहा होगा.”
“ज़रा पानी लेँ आनां.” तुरन्त हीं ‘उनकी’ आवाज़ सुनाई दि.
“जाओ, प्यासे कि प्यास बुझाओ.”
मेरी जेठानी नें छेड़ा.
कमरे मे पँहुचते हीं मैंने दरवाजा बंदकर दिया.
उनको छेड़ते हुए, दरवाजा बंद करते वक्त, मैंने उनको दिखा केँ सलवार सें छलकते अपने भारी चूतड़ मटकादिए.
फिन क्याँ थां.? पीछेआके उन्होंने मुझेकस केँ पकड़ लिया औऱ दोनों हाथों सें कस-कस केँ मेरे मम्मे दबाने लगे.
औऱ ‘उनका’ पूरीतरह उत्तेजित हथियार भि मेरी गांड़ केँ दरार पे कस केँ रगड़रहा थां। लगरहा थां, सलवार फाड़ केँ घुस जायेगा.
मैंने चारों ओर नज़र दौडाई। कमरे मे कुर्सी-मेज़ केँ अलावा कुछ भि नहि थां। कोई गद्दा भि नहि कि जमीन पे लेट केँ.
मे अपने घुटनों केँ बल पे बैठ गई औऱ उनके पजामे कां नाड़ाखोल दिया। फनफ़ना कर उनका लन्ड बाहर् आँ गय़ा.
सुपाड़ा अभि भि खुला थां, पहाड़ी आलू कि तरह बड़ा औऱ लाल.
मैंने पहले तौ उसे चूमा औऱ फिन बिनाहाथ लगाये अपने गुलाबी होठों केँ बीच लेँ चूसना शुरुआत कर दिया.
आरामसे मे लॉलीपॉप कि तरहउसे चूसरही थि औऱ कुछहीं देर मे मेरीजीभ उनके पी-होल कों छेड़रही थि.
उन्होंने कस केँ मेरेसिर कों पकड़ लिया.अब मेरा एक् मेहन्दी लगाहाथ उनके लन्ड केँ बेस कों पकड़ केँ हल्के सें दबारहा थां औऱ दूसरा उनके अंडकोष (Balls) कों पकड़ केँ सहला औऱ दबारहा थां। जोश मे आके मेरासिर पकड़ केँ वो अपना मोटा लन्ड अंदर-बाहर् कररहे थें.
उनकाआधे सें अधिक लन्ड अब मेरे मुँह मे थां। सुपाड़ा हलक पे धक्के माररहा थां। जब मेरीजीभ उनके मोटे कड़े लन्ड कों सहलाती औऱ मेरे गुलाबी होठों कों रगड़ते, घिसते वोँ अंदर जाता.खूब मजा आँ रहा थां मुझे। मे खूब कस-कस केँ चूसरही थि, चाटरही थि.
उस कमरे मे मुझे चुदाई कां कोई मार्ग तोँ दिख नहि रहा थां। इसलिये मैंने सोचा कि मुख-मैथुन कर केँ हींकाम चलालूं.
पऱ उनका इरादा कुछ औऱ हीं थां.
“कुर्सी पकड़ केँ झुकजाओ.” वोँ बोले.
मे झुक गई.
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तौ कुछऐसे हुयी थि, इस किस्सा कि शुरुआत जिसका सीक्वेल मे पेशकर रही हूं, पऱ उसके पहले पूर्वाभास, उसकथा केँ कुछ वोँ प्रसंग जहाँ छुटकी कां जिक्र आया हैं, सब नहि बसकुछ, औऱ अगर डिसजवाईंटेड लगे तोँ मे मूल किस्सा केँ पेज नंबर कां सन्दर्भ भि संगसंग देने कि कोशिश करुँगी, जिससे सुधी पाठक पाठिकाओं कों लिंक बैठाने मे कोई मुश्किल नें होँ.
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - होली की कहानी – New Episode
पूर्वाभास 1
छुटकी
“अरे तोँ इसमें क्याँ? कल होली भि हैं औऱ नाता भि.”
बोतलअब उनकेपास थि। मुझे भि कोई ऐतराज नहि थां। मेराकोई सगा देवर जी थां नहीं, फिन नंदोई जी भि बहोत मुलायम थें.
“तेरे तोँ मज़े हें दोस्त.कल यहा होली औऱ परसों ससुराल मे.कैसी हें तेरी सालियाँ?”
नंदोई जीअब पूरेरंग मे थें.
‘इन्होंने’ बोला
“बड़ी वाली बोर्ड कां इम्तहान देरही हैं हैं औऱ दूसरी थोड़ी छोटी हैं.(मेरी छोटी ननदी कां नाम लेँ केँ बोले).उसके बराबर होगी.”
“अरेतब तोँ चोदने लायक वोँ भि हौ गई हैं.” हँस केँ नंदोई जी बोले.
अबतक ‘इन्होंने’ औऱ नंदोई नें मिल केँ उसे८-१० घूंट पिलाहीं दिया थां। वोँ भि अब लज्जा-लिहाज खो चुका थां.
“अरे हाँ.साले साहब सें हीं पूछिये नां उनकी बहनों कां हाल। इनसे अच्छा कौन बताएगा?” ‘यह’ बोले.
“बोल साल्ले। बड़ी वाली कि चूचियाँ कितनी बड़ी हें?”
“वोँ.वोँ उमर मे मुझसे एक् साल बड़ी हैं औऱ उसकी.उसकी अच्छी हैं.थोड़ी.दिदी केँ इतनी तौ नहि। दिदी सें थोड़ी छोटी.”
हाथ केँ इशारे सें उसने बताया.
मे शर्मा गई.मगर अच्छा भि लगासुन केँ कि मेरा ममेरा भइया मेरे उभारों पे नज़र रखता हैं.
“अरेतब तौ बड़ामजा आयेगा तुम्हारी तरफ उसके जोबन दबा-दबा केँ रंग लगाने मे.”
नंदोई ‘इनसे’ बोले औऱ फिन मेरे भइया सें पूछा,
“औऱ छुटकी कि?”
“वोँ उसकी.उसकी अभि.”
नंदोई बेताब होँ रहे थें। वोँ बोले,
“अरे साफ-साफ बता, उसकी चूचियाँ अभि आयी हें कि नहि?”
“आयीं तौ हैं बस अभि। मगरउभर रही हें। छोटी हैं बहोत.”
वोँ बेचारा बोला.
“अरेउसी मे तौ असलीमजा हैं.चूचियाँ उठान मे.मींजने मे, पकड़ केँ पेलने मे। चूतड़ केसे हें?”
“चूतड़ तौ दोनों सालियों केँ बड़े सेक्सी हें। बड़ी केँ उभरे-उभरे औऱ छुटकी केँ कमसिन लौण्डों जैसे। मैंने पहलेतय कर लिया हैं कि होली मे अगर दोनों साल्लियों कि कच-कचा केँ गांड़ नाँ मारी.”
“हे तुम् जब होली सें लौट केँ आओगे तौ अपनी एक् साली कों संग लेँ आनां.उसी छुटकी कों.फिन यहा तोँ रंग पंचमी कों औऱ जबरदस्त होली होती हैं। उसमें जम केँ होली खेलेंगे साल्ली केँ संग.”
आधी सें अधिक बोतल खाली होँ गई थि औऱ दोनों नशे केँ सुरूर मे थें। थोडा बहोत मेरे भइया कों भि चढ़ चुकी थि.
“एकदम जीजा.यह अच्छा आइडिया दिया आपने। बड़ी वाली कां तौ बोर्ड कां इम्तिहान हैं, मगर छुटकी,। पंद्रह दिन केँ लिये लेँ आयेंगे उसको.”
“अभि वोँ छोटी हैं.”
वोँ फिन जैसे किसी रिकार्ड कि सुईफंस गई होँ बोला.
“अरे क्याँ छोटी-छोटी लगारखी हैं? उस कच्ची कली कि कसी चूत कों पूरा भोंसड़ा बना केँ पंद्रह दिनबाद भेजेंगे यहा सें, चाहे तोँ तुम् फ्रॉक उठा केँ स्वयं देख लेना.”
बोतलमेज पे रखते‘यह’ बोले.
“औऱ क्याँ। जौ अभि शर्मा रही होगी नां.जब जायेगी तौ मुँह सें फूल कि स्थान गालियाँ झड़ेंगी, रंडी कों भि मातकर देगी वोँ साल्ली.”
नंदोई बोले.
मे समझ गई कि अब ज़्यादा चढ़ गई हैं दोनों कों, फिनउन लोगों कि बातें सुन केँ मेरा भि मन करनेलगा थां। मे अंदर गई औऱ बोलीं, “चलिए खाने केँ लियेदेर होँ रही हैं!”
वोँ तीनों खानां खारहे थें मगर खाने केँ संग-संग। ननदों नें जम केँ मेरे भइया कों गालियां सुनाई, खासकर छोटी ननदी नें.
मैंने भि नंदोई कों नहि बख्शा औऱ खानां परसने केँ संग मे जान-बूझ केँ उनके सामने आँचल ढुलका देती.कभी कस केँ झुक केँ दोनों जोबनलो कट चोली सें। नंदोई कि हालत खराब थि.
जब मे हाथ धुलाने केँ लिये उन्हें लें गई तब मेरे चूतड़ कुछ ज़्यादा हींमटक रहे थें, मे आगे-आगे औऱ वोँ मेरे पीछे-पीछे। मुझेपता थि उनकी हालत। औऱ जब वोँ झुके तोँ मैंने उनकी मांग मे चुटकी सें गुलाल सिंदूर कि तरहडाल दिया औऱ बोलीं,
“सदा सुहागन रहो, बुरा नाँ मानो होली हैं.”
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