दोस्त की शादीशुदा बहन completee - Chudai Ki Kahani - Complete Kahani All Parts
साथी कि शादीशुदा बेहन
पात्र (किरदार) परिचय
01। रामू- मे स्वयं, कथा कां हीरो
02। दमऊ- रामू कां यार,
03। अमृता- घऱ कां नाम रानी, दमऊ कि बेहन,
04। झरना- अमृता कि ननदी
05। चम्पा06। मंजरी
बस मे अमृता (रानी) कि चुदाई मेरीजॉब कां रेक्रूटमेंट कां एग्जाम नागपुर मे होना निश्चित होते हि मैंने रेलवे मे रिजर्वेशन केँ लिए देखा तोँ पीक सीजन होने केँ कारणकोई भि ट्रेन मे स्थान नहि मिली। थक हारकर मैंने अपने एक् यारदमऊ कों मोबाइल किया कि दोस्त मुझेआज किसी भि हालत मे नागपुर जानां हैं।
दमऊ उछलते हुए बोला- साले तुँ पहले नहि बोल सकता थां, मे स्वयं कितना परेशान होँ रहा थां।
मैंने पूछा- क्यूं क्याँ हुआ?
दमऊ नें कहा-अबे कुछ नहि तुँ मेरेघऱ पऱ आँ जा, मिल बैठकर बातें करते हें।
मैंने कहा-अबे मिल बैठकर बातें करते हें। अबे साले मुझेआज हर हालत मे नागपुर जानां हैं। कल सुभह मेरावहा पे इंटरव्यू हैं।
दमऊ नें कहा- पहले तुँ यहा पर्र आँ तौ सही। मैंने तेरा प्राब्लम साल्व कर दिया हैं।
मे भागा-भागा उसकेघऱ पहुंचा तौ उसकी मां नें दरवाजा खोला। मैंने उनसे नमस्कार किया औऱ अंदर आँ गय़ा। दमऊ अंदर जैसे मेरी हि राहदेख रहा थां। उसनेकहा- “यारा तूने मेरी प्राब्लम साल्व कर दि, नागपुर जाने कां नाम लेकर."
मैंने कहा- क्याँ मतलब?
इतने मे दमऊ कि मां अंदरआकर बोलीं- “अरे बेटा तेरी क्याँ बताऊँ? कल हि तेरी दिदी (साथी कि बेहन अमृता जिसे मे भि दिदी हि कहता हूं) केँ पति कों कुछ दिनों केँ लिए देल्ही जानां हैं। अलमारी कि चाभियां तौ तेरी दिदी यहा लें आई हैं, उनकोकुछ जरूरी कागजात लें जानां हैं।
मैंने कहा-कोई बात नहि। दिदी कों आए सात-आठ दिन हि तौ हुए हें। अलमारी कि चाबियां मे दे दूंगा जीजाजी कों।
दमऊ नें कहा- “मैंने कल हि बस कि टिकेट करवाली हैं, एयर-कंडीशन बस कि स्लीपर कोच मे एस-1 औऱ एस2 हें। आहिस्ता सोकर जानां। तुम्हारा भि काम होँ जाएगा औऱ मेरा भि। कल सुभह आफिस मे हेडआफिस सें बिगबास आँ रहे हें तोँ आफिस अटेंड करना भि होँ जाएगा.”
मैंने कहा-चल दोस्त तूने तौ मेरी प्राब्लम हि साल्व कर दिया। मे तौ परेशान हौ गय़ा थां। नां ट्रेन मे स्थान मिलरही थि, नाँ किसीबस मे हि स्थान मिलरही थि। चलो सुभह नागपुर मे दिदी कों उनकेघऱ पऱ छोड़ते हुए होटेल चले जाऊँगा।
Congratulations for new kahani
थॅंक्स राज भइयानई कथा स्टार्ट करने केँ लिए
नई किस्सा केँ लिए अभिनंदन औऱ मस्तभाग राजभाई
बहोत अच्छी शुरुआत....... राज भइया।
दोस्त की शादीशुदा बहन completee - Chudai Ki Kahani – New Episode
इतने मे दिदी नें कमरे मे प्रवेश किया औऱ कहा- “होटेल मे क्यूं भैया? क्याँ मे आपकीकुछ नहि लगती हूं क्याँ? होटेल मे रहने कि कोई जरूरत नहि हैं। दोदिन लगे कि तीनदिन लगे, तुम् मेरेयहा हि रुकोगे औऱ खानां पीना भि मेरेयहा हि होगा."
मैंने कहा- “सारी दिदी। अच्छा ठीक हैं। आपके यहां हि रहूँगा औऱ खानां पीना भि करूंगा। ठीक हैं नाँ?”
दिदी नें कहा-हाँ। ठीक हैं।
मैंने दमऊ सें पूछा-अरे बस कितने बजे हैं?
दमऊ नें कहा-रात कों ठीकदस बजे जलेबी चौक सें छूटेगी। तूँ वहीं पे पहुँच जानां। मे दिदी कों लेकर वहां छोड़ दूंगा।
मे रात केँ दसबजे वहा पहुंचा तौ बस खड़ी थि। मैंने दमऊ कों मोबाइल किया तौ वोँ बोला कि बस एक् मिनट मे पहँचने हि वाले हें। वोँ दोनों आए, हमने अपना लगेजबस केँ पीछे लगेज बाक्स मे रखवा दिया। बस मे जैसे हि चढ़ेबस चल पड़ी। मैंने देखा कि बस खचाखच भरी हुई हैं।
कंडक्टर ऊपर स्लीपर दिखाते हुएकहा कि साहबयह सीट हैं।
मे चौंक गय़ा- “एस-1 औऱ एस-2 एक् हि स्लीपर केँ दो नंबर थें। सीट चौड़ी जरूर थि पर्र.” मैंने कंडक्टर सें कहा- “भैया। यह तोँ एक् हि सीट हैं.”
कंडक्टर नें कहा- “भैया। यहदोबाइ दो स्लीपर कोच हैं यानी एक् स्लीपर पे दोजने सोने कां.”
मैंने गुस्से मे दमऊ कों मोबाइल लगाना चाहा तौ दिदी नें मनाकर दिया औऱ कहा- “भैया जाने दीजीए नाँ। रात-रात कि हि तौ बात हैं चलिए अड्जस्ट कर लेंगे.”
पहले मैंने दिदी कों ऊपर चढ़ने केँ लिएकहा। वो ऊपर चढ़ने लगी तोँ उनकी गोरी-गोरी जांघों केँ बीच मे सें उनकी गुलाबी रंग कि पैंटी नजरआने लगी। मे नां चाहते हुए भि ताड़-देख केँ पैंटी कों देखने लगा। दिदी केँ चढ़ने केँ बाद मे भि ऊपर आँ गय़ा। वैसे स्लीपर अधिक चौड़ा तोँ नहि पर्र बढ़िया आरामदायक थां। दिदी खिड़की कि तरफ लेटी औऱ मे अंदर कि तरफ। सर्दियों केँ दिन थें, मैंने कंबल लें रखा थां।
मैंने कहा-“कोई बात नहि दिदी आप् लें लो। मे ऐसे हि.”
दिदी नें बात काटते हुएकहा- “ऐसे हि क्यूं? हम् दोनों हि इश्तेमाल करेंगे.”
हम् दोनों नें एक् हि कंबल कों ओढ़ लिया। ज़्यादा स्थान नाँ होने केँ कारण हम् दोनों केँ शरीरआपस मे सटेहुए थें। अभि तक हम् दोनों हि पीठ केँ बल लेटेहुए थें। अभि तक मेरेमन मे कोई गंदा खयाल नहि आया थां। आगे मार्ग कुछ अधिक हि खराब थां। बस हिचकोले खारही थि।
लगभगआधे घंटेबाद मे दिदी नें कहा- “भैया मेरीकमर दुखरही हैं, मे सीधे लेटना चाहती हूं.”
मैंने कहा-ठीक हैं दिदी, आप् सीधेलेट जाओ।
दिदी नें कहा-“अरे पगले मुझेडर लगरहा हैं कि कहींगिर नाँ जाऊँ। मे सीधेलेट रही हूं, तुम् एक् कामकरो। अभि मे जैसे तुम्हारे ऊपर एक् पांवरखी हूं वैसे हि एक् पेर तुम् मेरे दोनों पैरों केँ नीचेरखो औऱ दूसरा पैरों केँ ऊपर.”
मैंने कहा- दिदी, क्याँ यहसही रहेगा?
दिदी नें कहा-अरे पगले। बचपन मे तुम् दमऊ औऱ मे ऐसे हि चिपक केँ कितनी हि बारसोए हें। भूल गय़ा क्याँ ?
मे- “पर्र दिदी- यहां किसी नें देख लिया तोँ?"
दिदी- “देख लिया। तौ क्याँ? अरे पगलेबस मे एक् तोँ अंधेरा हैं, दूसरा पर्दा लगाहुआ हैं। तीसरा हम् दोनों नें कंबलओढ़ रखा हैं। चौथा मुझेडर लगरहा हैं कि कहींगिर नां जाऊँ, पाँचवा।। चल छोड़ नाँ मे जैसे बोलती हूं। वैसे हि कर.”
मैंने दिदी केँ कहे अनुसार एक् पांव कों नीचेरखा। दिदी नें दोनों पैरों कों उनकेऊपर औऱ उनकेऊपर मैंने अपना दूसरा पाँवरख दिया। यानी उनके दोनों पाँव मेरे दोनों पैरों केँ बीच मे फँसेहुए थें। इस पोजीशन केँ लिए मुझे उनकीतरफ करवट बदलना पड़ा थां। अब मेरेहाथ कों पकड़कर दिदी नें अपनी बाहों केँ ऊपररख दिया। दिदी थोड़ी हि देर मे मुझसे इधर-उधर कि बातें करतेहुए सो गई। पऱ मेरी आँखों सें नींद कोसों दूरभाग चुकी थि। मेरे लण्डराज फनफना चुके थें। मे क्याँ करूँकुछ समझ नहि पारहा थां। उनकेपेर कि गर्मी दोनों तरफ सें मेरे दोनों पैरों सें होतेहुए सारे जिस्म मे घुसकर मेरे लण्ड कों खड़ाकर रही थि। मैंने बहोत कोशिश कि अपने दिल-एनादान कों समझने कि पर्र दिल तोँ आखिरदिल हैं जी। इस पे जोर किसी कां चला हैं जौ मेरा चलता।
मेरेहाथ बेकाबू होकर उसकी बाहों सें फिसलकर उसके छाती कों कब सहलाने लगे, मुझे मालूम हि नहि पड़ा। मेरा शरीर कामायनी मे जलरहा थां। औऱ इसे जल्द सें अगर काबू नहि किया गय़ा तोँ यहआगकभी भि हम् दोनों कों जला सकती थि। पऱ मे क्याँ करूंकुछ समझता उससे पहले हि ठंड केँ कारण वोँ मुझसे लिपटती हि जारही थि। इससे मेरे शरीर कि आग बुझने केँ बजाय औऱ भड़करही थि।
मेराहाथ उसकी चूचियों कों सहलाते-सहलाते कबउसे दबाने भि लगे, मुझेपता हि नहि चला। उसकी औऱ मेरी दोनों कि हि सांसें गहरी औऱ गहरी होँ चली थि। बस कां सफरआगे नेशनल हाइवे केँ ऊपर थां। मार्ग शानदार, बस शानदार, ए.सि। स्लीपर औऱ बगल मे लड़की भि शानदार, मेरा लण्ड थां दमदार, तोँ वोँ भि थि मलाईदार।
अमृता भि नींद मे मुझसे लिपटती हि जारही थि औऱ बड़बड़ा रही थि- “बसऐसे हि जानू, मेरे प्रियतम। बहोत तड़पाया हैं तुमने औऱ नां तड़पाओ मेरे सैयां.”
दोस्त की शादीशुदा बहन completee - Chudai Ki Kahani - Kahani ab aur interesting hogi