दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani – New Episode
जबकि दीवान नें कहा-बहुत देर हौ गई हैं…अब तुम् जाओ। "
फ्लोर पऱ तोताराम कों बांहों मे लिए अमिता थिरकती रही-अमिता रह-रहकर उससे लिपट जाती थि, जबकि तोताराम थोडा झिझकरहा थां-----तोताराम कों फ्लोर पऱ देखकर एक् अखबार केँ संवाददाता नें फ्लोर कां दृश्य अपने कैमरे मे कैदकर लिया--- देखते हि तोताराम नें अमिता कों अपने सें अलग किया!!!!
वो तेजी सें गले मे कैमरा लटकाए संवाददाता कि तरफ लपका !!!
अभि उसने फ्लोर सें नीचेकदम रखा हि थां कि---------
एकदम हाॅल कि सब लाइटे आँफ होँ गई।
अथेरा छा गय़ा--घुप्प अँधेरा।
याँ तोँ सारेशहर कि हीँ लाइटचली गई थि याँ किसी नें होटल कां मेन स्विच आँफकर दिया थां…हांल मे मोजूद सब लोगों केँ सांथ-संग तोताराम कि आंखों केँ सामने भि घने अंधेरे केँ कारण हरे-हरे दायरे चकरा उठे----बह ठिठक-सां गय़ा।
पहलेसमय तोँ अचानक हि अंधेरा होँ जाने केँ कारण सारे हाॅल मे सन्नाटा सां छा गय़ा…फिन अजीब-सि गहमागहमी उभरी---------जब हाॅल मे अंधेरा छाए एक् मिनट हौ गय़ा तोँ आवाजें गूंजने लगी---सिसकांरियां भि उभरी-कदाचित कुछ 'जोडों नें अंधेरे कां लाभ उठाने कि ठानली थि-किसी मनचले नें जोर सें सीटी भि बजा दि।
टाइम गुजारने केँ संग हि वातावरण मे शोर होताजा रहा थां कि--------धांय------!'!
अंधेरे मे कोई रिवॉल्वर गर्जां-एक् शोला लपका।
हॉल केँ वातावरण मे किसी नारी कि दर्दनाक चीख उठी…ये चीख यकीनन अमिता कि थि-इसचीख केँ बाद हाॅल मे जैसे हाहाकार मच गय़ा डरी औऱ सहमी वहुत-भि चीखें गूजऩे लगी-----लोग अपने-अपने जगह छोडकर इधर-उधर भागने लगे।
अंधेरे मे एक्-दूसरे सें टकराते, चीखते, गिरते उठकरपुन: भागते-फायर कि आवाज़ नें वहां आतंक फैला दिया थां।
कोई घबराए हुए स्वर मे चीख पडा----यहा कत्ल हौ गय़ा हैं-----लाईट ऑनकरो---॥.
तभी------धांय---।
दुसरा फायर! '
इसबार हाॅल तोताराम कि चीख सें झनझना उठा।
भगदडमच -गई-आतंक फैल गय़ा।
फिन------अचानक हि साराहाल पहले कि तरह चकाचौंध कर देने वाली रोशनी सें भर गय़ा…लोग जहा केँ तहाँरुक गए…
आखे बुधिया गई-होटल कां मैनेजर चीखपडा-
"पुलिस केँ आने सें पहलेकोई भि आदमी हाॅल हैं बाहर् न् निकले !"
चेहरे पीलेपड़ गए…आतंक पुता पड़ा थां उनपंर'!!
हर दृष्टि फ्लोर केँ समीपपडी अमिता कि लाश औऱ उससे थोडा हटकर फर्श पर्र पड़े तोताराम केँ लहूलुहान बदन पर्र चिपक गई…तोताराम केँ बदन कों लाश इसलिये नहि कहाजा सकता, क्योंकि अभि तक उसकेबदन मे थ्रोड्री हरकत थि।
गोली उसकेपेट मे लगी थि।
। दोनों हाथों सें अपनापेट दबाए तोताराम उठ खड़ाहुआ सफेद कपड़े बुरीतरह खून मे रंग चुके थें…उसके चेहरे पर्र असीम पीड़ा केँ भाव थें-सारा जिस्म बुरीतरह कांपरहा थां-कुछ कहने केँ लिए उसने मुंह खोला…मुंह केँ अन्दर सें ढेर साराखून उबल पड़ा। "
देखने वालों कि चीखें निकल गई, लेकिन किसी नें आगे बढकर तोताराम कों सहारा देने कां साहस नं किया ----- ऐसे अवसरों पर्र कौन रिस्क लेता हैं--सब जानते हें कि ऐसी बेवकूफी करने पर्र आदमी पुलिस कि चक्करदार प्रक्रिया मे उलझ जाता हैं।
सबमूक दर्शक वने असीमित दर्द सें छटपटाते र्तोताराम कों देखते रहे----आगे बढ़कर संवाददाता नें इस दृश्य कां फोटो जरूर लेँ लिया ॥॥॥॥
पेट कों दबाए तोताराम लड़खड़ाता हुआ अपनीसीट कि तरफ बढा-----दर्द मे डूबी उसकी आंखें मेज पर्र रखी जुदाई पऱ गडी हुईँ थि…हर लम्हा, वो बोलने कि भरपूर चेष्टा कररहा थां, लेकिन मुहसे घुटी घुटीचीख केँ अलावा एक् भि शब्द नहि निकला !!!!!!
संवाददाता अब लगातार उसके फोटो लेँ रहा थां।
तोताराम अपनीसीट केँ लगभग पहुंचकर लड़खड़ाया-बड्री मुश्किल सें उसनेमेज पकडकर खुद कों गिरने सें रोका---खून सें सना दायां हाथ बढाकर मेज पर्र रखी 'जुदाई' उठा ली-----पुस्तक कां आवरणखून सें लथपथ होँ गय़ा----इस पुस्तक कों हाथ मे लिए तोताराम घूमा----- पुस्तक वालाहाथ उसनेऊपर उठा लिया----कुछ कहने केँ लिएपुन: मुहं खोला------संवाददाता केँ कैमरे कां फ्लैश चमका ॥॥॥॥॥
तोताराम केँ कंठ सें अंन्तिम हिचकी निकली-------उसका जिस्म लाश बनकर फर्श पऱ लुढ़कता चला गय़ा…खून मे डूबी 'जुदाई' एक् तरफ़पडी रह गई -बैक पर्र छपे प्यार बाजपेयी केँ चित्र पर्र भि कई स्थान खून केँ धब्बे लगगये थें।
विजय केँ गोरे--चिट्टे एवंगठे हुए शरीर पर्र इससमय मात्र एक् अडंरवियर थां---लाल रंग कां चुस्त, अंडरवियर--शेष सारेबदन पर्र आवश्यकता सें ज्यादा तेलमला हुआ थां…तेल लगेबदन पर्र फिसलरहा थां ढेर सारा पसीना।
फिसलता भि क्यूं नहि---???
किसीऐसे आदमी कां पसीने सें तर-वतर हौ जानां स्वाभाविक हि हैं जोँ कि पिछले दो घण्टे सें अपने कमरे कि दीवार कों सरकने कि चेष्टा कररहा हौ-वो बुरीतरह हांफ़ रहा। थां----------दोनों हथेलियाँ दीवार पऱ टेककर उसने एक् बारफिन इसतरह ताकत लगाई, जैसेकोई घक्के सें स्टार्ट होने वाली गाड़ी कों धक्का लगारहा होँ, परन्तु दीवार टस सें मस न् हुई।
" धत् तेरे कि। " कहने केँ संग हि उसने अपने माथे सें पसीना औऱ हाथ झटकता हुआ बोला…“इस दुनिया मे तुम् कुछ नहि कर सकते विजय दि ग्रेट !"
एकाएक कमरे केँ बाहर् सें आबाज उभरी----------" विजय---विजय-----!"
"हांय…यह तौ अपने तुलाराशी कि आवाज़ हैं। " विजय एकदम पछाड-सि खा गय़ा फिनबडी तेजी सें वो फर्श पऱ दीवार' केँ सहारे उल्टा खडा होँ गय़ा…सिऱ नीचे-पैर ऊपर-चेहरा बीमार कि तरफ़किए वो जोर-शोर सें चिल्लाने लगा-------"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तूँ जलाल तूँ आईबला कों टाल तुँ। "
उसे देखते हि सुपर रघुनाथ, दरवाजे पर्र ठिठक गय़ा----मुह सें खुद हि ये वाक्य निकल गय़ा…“अरे---यह तुम् क्याँ कररहे होँ विजय?"
विजय अपनी हि धुन मे कहताचला गय़ा----- ---"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तूँ जलाल तूँ-----आई बला कों टाल तूँ। "
"विजय। ” रघुनाथ नें पुन: पुकारा।
"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तुँ जलाल तुँ आईबला कों टाल तुँ !"
" ओफ्फो--- तुम् अपनीइन ऊटपटांग हरकतों सें कभीबाज नहि आओगे !” कहने केँ संग हि रघुनाथ लम्बे-लम्बे क़दमों केँ संग कमरे मे दाखिल हौ गय़ा-वो इससमय अपनी सम्पूर्ण यूनीफार्म मे थां…भारी जूतों कि ठक-ठकठीक विजय केँ समीप जाकर रूकी-----विज़य अब बाकायदा हनुमान चालीसा कां पाठ करने लंगा थां-रधुनाथ नें एक् बारपुन: उसे पुकारा, परन्तु जबइस बार----भि पर्र कोई प्रतिक्रिया नहि हुईँ तौ उसके दोनों पेर पकड़कर जोर सें झटका दिया।
चित अवस्था मे फर्श पर्र पड़ा वो आंखें बन्दकिए बुदबुदा रहा थां ---"हनुमान-ज़ब नाम सुनावे-भूत-पिशाच निकट नहि आवे !"
" ओफ्फो---!" रघुनाथ झुंझलाहट भरे स्वर मे चीख पड़ा-----"विजय। "
विजय नें पट्ट सें आखेंखोल दीं-रघुनाथ पर्र दृष्टि पडते हि वो एकदमउछल औऱ चीखा…"भ--भूत-भूत-भूत पिशाच निकट नहि आवे---हनुमान जबनाम सुनावे। "
हनुमान चालीसा कां पाठ करताहुआ वो सारे कमरे मे दौड़रहा थां-दुष्टि हर क्षण रघुनाथ पर्र थि-आंखों मे ऐसेभाव थें जैसे रघुनाथ कों वो सचमुच भूतसमझ रहा हौ, रघुनाथ अपनेजगह पर्र जड़वत'-सां खडारह गय़ा…बड्री अजीब-सि स्थिति थि उसकी-बह पागलों कि-सि अवस्था मे चीख पडा---उफ्फ-यह मे हूं विजय--रघुनाथ---। "
"आंय--। "' कहकर विजय एकदमरुक गय़ा----जैसे बहोत तेज चलती हुइ गाडी मे अचानक हि ब्रेक लगादिए गएहों वो ऊंट कि तरह गर्दन उठाकर बोला----"प.प्यारे तुलाराशी-…यह यह तोँ तुम् होँ ! तुमने पहले क्यूं -नहीं बताया, हम् तोँ समझरहे थें कि
"यह अपनी मूर्खतापूर्ण बाते तुम् कब छोडोगे विजय?" रघुनाथ नें उसकीबात बीच हि मे काटकर कहा-------" वंहा दीबार केँ सहारे उलटेखडे क्याँ कररहे थें?"
दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani – New Episode
विजय उछलकर सोफे पर्र जा गिरा औऱ फिनइस बात कि परवाह किए विना वो पालथी मारकर बैठ गय़ा कि उसके शरीर पऱ लगेतेल सें सोफा खराब भि हि सकता हैं, बोला------"दीवार कि जड़ मे झांककर देखरहे थें प्यारे कि दीवार साली इंच-दो-इंच हटी भि कि नहि?"
"दीवार हटी` हैं?"रधुनाथ कि बुद्धि चकरा गई।
" हा प्यारे ----- मगर गर्दिश मे हैं तारे ---- एक् हि स्थान इकट्ठे होँ गये सारे !"
आगे बढकर रघुनाथ उसके सामने वाले सोफे पऱ बैठता हुआ बोला-“दीवार भला केसेहट सकती हैं?"
"वाउ-क्यूं नहि हट सकती?, विजय एकदम किसी झगड़ालू स्त्री केँ समानहाथ नचाकर बोला----"कहते हैं कि ….दुनिया मे एक् भि कामऐसा नहि हैं, जिसे इंसान न् कर सके-------तुम् हमारी यह उवड़-खाबड़ हालतदेख रहे हौ रधु डार्लिंग-----पिछले दो घण्टे सें लगातार दीवार कों सरकाने कि कोशिश कररहे हें, मगर लगता हैं कि लोग सालेगलत कहते हैं हें----दीवार टस-सें-मस नहि हुई! !
रघुनाथ कों लगा कि विजयं कां मनइससमय खाली हैं।। औऱ यदि उसने सावधानी सें काम नं लिया तोँ विजयउसे लम्बे वक़्त तक बोरकर सकता हैं, अत: उसने जल्द सें कहा---"मै तुम्हरे पास एक् बहोत हि जरूरी काम सें आया हूं विजय।।। "
विजय नें एकदम धूनी रमाकर समाधि मे लीन किसी साधू-कि सि मुद्रा वनाती औऱ आंखें बन्द करके बोला-"'हम् जानते हैं बच्चा। "
“तुम् जानते होँ?" रघुनाथ चोंक पड़ा---म--मगर क्याँ !"
"कलरात एक् विधायक कि हत्या होँ गई हैं। "
" हैं…!" रघुनाथ सचमुच उछल हि पड़ा-"त- तुम्हें केसे मालूम! "
आंखे बन्दकिए विजयउसी मुद्रा मे कहताचला गय़ा----"हम् अन्तर्यामी हें बच्वा तुम्हे उस विधायक केँ कातिल कि तलाश हैं---आज सुभह सुंबह तुम् पऱ हमारे बापूजान कि झाडपडी हैं-उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया हैं कि अगर तुमने जल्द-सें-जल्द विधायक तोताराम केँ हत्यारे कों ससुराल नहि पहुचाया तोँ तुम्हारे कान आंखों कि स्थान औऱ आंखें कानों कि स्थान लगा जाएंगी--जरा सोचो तुलाराशी---कितने हैंडसम लगोगे तुम् !!"
" विजय !!" रघुनाथ कहना हि चाहता थां कि विजय नें हाथ उठाकर उसेरोक दिया, बोला------जनता : नें सम्बन्धित थाने कां घेराव किया ईंट-पत्थर चलाए------तुम्हारी नाक मे दम कों गय़ा। "
" यह-----येसभी तुम्हें केसे मालूम?" रघुनाथ सचमुच हैरत मे पड़ गय़ा।
विजय नें आंखें खोलीं औऱ फिनउसे चिढाने वाले अन्दाज मे बोला----"हमे हैरतइस बात कि हैं प्यारे तुलाराशी कि तुम्हें, पुलिस सुपरिंटेडेण्ट किस बेवकूफ़ नें वना दिया?"
"क्याँ मतलब?"
"हम् तुम्हे इसीलिए सुपर-इडियट कहा करते हैं। "
"तुम् मेरा अपमान कररहे हौ विजय। "
"अबे अपमान नहि करू तोँ क्याँ तुम्हें सिर पर्र बैठाकर भंगड़ा करूं?” विजय नें आंखें निकाली-“कोई छोटा-मोटा इंस्पेक्टर भि इस कमंरे मे घुसते हि जान सकता हैं कि यहसभी बाते मुझे केसेपता लगी, मगर एक् तुम् हौ-बनगए पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट-अक्ल केँ नाम पऱ दिवालिए !!"
"कमरे मे घुसतें हि भलाकोई केसेजान सकता हैं कि।।। "
" जरा ध्यान सें हमारे कमरे कि हुस्न कों देखो। "
असमंजस मे पड़ा रधूनाथ सचमुच कमरे कों औऱ कैमरे मे रखे सामान कों ध्यान सें देखने लगा----अन्तमें उसकी दृष्टि सोफों बीचपडी सेण्टर टेबल पऱ रखे अखबार पर्र स्थिर हौ गई---बोला---“ओह-तोताराम कि हत्या कां'समाचार शायद अखबार मे छपा हैं?"
" सीधी-सि बात हैं-जब विधायक मरेगा तौ समाचार जरूर छपेगा। "
"म्-मगर मे क्याँ जानता थां कि तुमने अखबार पढ लिया हैं ?"
“कमरे मे घुसते हि यदि तुमने मेज पर्र अस्त-व्यस्त पड़े अखबार कों ध्यान सें देखा होता तोँ समझगये होते कि मे अखबार पढ़ चुका हु-बस, तब तुम्हें हमारी बातों पऱ कोई हैरत न् होती। "
" ल-मगरयह तोँ अखबार मे कहीं भि नहि छपा' होगा कि सुभह-सुभह ठाकुर साहब। नें मुझेझाड पिलाई। "
"अखबार मे नहि मेरीजान---- वो तुम्हारे चेहरे पऱ छपा हैं !"
"क्याँ मतलब ?"
"शहर केँ बच्चे-बच्चे कि तरह हम् भि कम-सें-कम -ये र्तो जानते हि हें कि तोताराम विधानसभा मे जिस बर्थडे पार्टी कि तरफ सें विधायक थां, वो बर्थडे पार्टी इस वक़्त विपक्ष मे हैं औऱ सत्तारूढ बर्थडे पार्टी कि नाक मे कदम करने केँ लिऐ किसी भि "इशू" कि विपक्ष कों तलाश रहती हैँ…उनके विधायक कां कत्ल होँ गय़ा हैं ! इससे अच्छा 'इशू' उन्हें कहां मिलेगा-थाने पऱ जान-बूझकर पथराव किया गय़ा--सारे शहरमेँ अब स्थान-स्थान शोक सभाएं होंगी-सरकार कि कार्यशलता पर्र उंगलियां उठेगी----इस हत्या कों राजनीतिक रंग देने कि कोशिश कि जाएगी--- इसीलिए सरकार नें पुलिस पऱ दबाव डाला होगा कि तोताराम कां हत्यारा जल्द-सें-जल्द पिंजरे मे पहुंचना चाहिए---वहीं दबावझाड केँ रूप सें हमारे वापूजान केँ मुह सें तुम् तक पहुचा हैं। "
" तुम् बिल्कुल ठीकसमझ रहे होँ विजय। "
" अखबार मे छपी घटना केँ बादजब तुम् यहाआए तौ, हम् समझगए कि यहा क्यूं आए हौ ?"
"मुझे तुम्हारी समझदारी पऱ फख्र हैं विजय!। "
"तौ जिस तरहँआए हौ प्यारे उसीतरह लौट भि जाओ। "
"क्यूं विजय?"
“अबे यहकोई बात हुईँ साली। " विजय एकदम सें भडक उठा…"तुम् काहे केँ सुपरिटेण्डेण्ट हौ-कही कत्ल होता हैं तोँ यहाचले आते होँ---- चोरी होती हैं तोँ विजय दि ग्रेट चोर कों पकड़ेगा-कही सालीकोई जेब भि कट जाती हैं तोँ सिर हैं केँ बल सीधेयहा चलेआते हौ---आज तक स्वयं कहीँकोई एक् केस भि हल नहीँ किया हैं-----बने फिरते होँ सुपरिटेण्डेण्ट---------हुंह-----लज्जा-आनी चाहिए तुम्हें-पुलिस केँ नाम पऱ धब्बा हौ तुम् !"
"विजय। "
“फूटो प्यारे। मे तुम्हारी कोई सहायता नहि कर सकता-केस स्वयं हल कंरो। "
“प-प्लीज विजय। " रघुनाथ नें बटरिग कि…"तुम् तौ दोस्त बडे अच्छे हौ-----बस, इस केस मे सहायता कर दो…वादा करताहू फिनकभी तुम्हारे पास नहि आऊंगा। "
" देखो प्यारे----!"
" प----प्लीज विजय। " रघुनाथ याचना सि करउठा।
" धत्-धत्-धत्--। " जल्द…जल्द कहने केँ संग हि विजय नें तीनबार अपनाहाथ मस्तक पऱ मारा औऱ फिन बोला-जमाने धत् तेरे कि !"
दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani – New Episode
रघुनाथ धे सें मुस्करा उठा,, जबकि विजय अपना माथा पकडे----आंखों कों बन्दकिए बैठा रहा…उसने चेहरे पऱ ऐसेभाव एकत्रित करलिए थें, जैसे किसी कि मृत्यु पर्र मातममना रहा होँ-जब विजय नें बहुतदेर तक भि अंपनी मुद्रा न् तोडी तोँ रघुनाथ कह उठा----------"क्याँ हुआ विजय---तुमने अपनीयह मातमी सूरत क्यूं बनाली ?”
“तुम् सूरत कों छोडो प्यारे, अपनीराम किस्सा सुनाओ। "
रघुनाथ नें ठंडी सांस ली…उसकै ख्याल सें विजय बहुत जल्द लाइन पर्र आँ गय़ा थां-वो जानता थां कि अगर विजय कों पुन: मौका दिया गय़ा तौ वो बकवास करने लगेगा ओरउसी बोरियत सें बचने केँ रघुनाथ नें जल्द सें
कहा-"तोताराम अपनी बीबी केँ संग डिनर केँ लिए सम्राट मे गय़ा थां-वहां उसने बीबी केँ संग डांस।। "
“वो सभीकुछ हम् अखबार मे पढ चुके हें प्यारे। " विजय नें टोका------“तुम् मात्र ये बताओ कि तुम्हारे वहा पहुंचने केँ बाद क्याँ हुआ------वहां मौजूद लोगों नें किसतरह केँ जबाबदिए औऱ अब तुम्हें हत्यारे तक पहुंचने मे क्याँ दिक्कते हें?”
"सम्राट होटल केँ मेनेजर नें मोबाइल द्वारा कोतवाली मे वारदात कि सूचना दि थि---उस टाइम मे भि वहीं थां, अत: सूचना मिलते हि मे स्वयं भि रवाना होँ गय़ा-जब मे वहां पहुचा तबहॉल कां दरवाजा अन्दर सें बन्द थां…हमारे 'पुलिस' कहने पऱ अन्दर सें दरवाजा मैनेजर नें खोला…पुलिस दल केँ संग मे अन्दर'पहुच गय़ा, वहां गहरा सन्नाटा थां…सब सहमेहुए सें चेहंरों पर्र आतंकलिए जहां केँ तहां खड़े थें-अमिता कि लाश फ्लोर केँ समीपपडी थि, जबकि तोताराम कि लाश उसकीसीट केँ समीप-------। "
"'जुदाई' कहा थि !"
" हां ---- मै जानता हू कि अखबार वालो नें बाजपेयी कि इस पुस्तक केँ बारे मे विशेष रूप मे छापा हैं-मरने सें पहलेजब उसने पुस्तक वालाहाथ ऊपर उठाया थां----"बारूद नामक अखबार मे वो फोटो` भि छपा हैं। "
" हमनेये पूछा थां प्यारे कि वो पुस्तक कहां थि। "
"लाश केँ हाथ मे !"
"ओह बाजपेयी कां बडा तगड़ा पाठक थां…मरता हुआ भि.!"
"नहि विजय-मेरे ख्याल सें तौ तोताराम केँ संग वो पुस्तक मात्र इसलिये नहीँ थि कि तोताराम बाजपेयी कां पाठक थां-पाठक चाहे जितना जबरदस्त होँ, मगरजब मौतदो क्रदम दूरखडी होँ तौ किसी कों उपन्यास पढने कों इतना महत्व देने औऱ आखिरी टाइम पर्र पुस्तक कों उठाकर कुछ कहने कि कोशिश करने केँ पीछे अवश्य कोई रहस्य हैं?"
"क्याँ रहस्य हैं?"
"क--कुछ भि होँ सकता हैं। " रघुनाथ एकदम गड़बड़ा गय़ा, लेकिन फिन जल्दी हि खुद कों सम्भालकर बोला------"शायद तोताराम उस पुस्तक केँ जरिएकुछ कहना चाहता हौ !"
“खैर----वो पुस्तक कहां हैं?”
रघुनाथ नें जेब मे सें पुस्तक निकालकर मेज पर्र डाल दि--विजय, थ्रोड़ा-सां झुककर पुस्तक उठाई---आवरण पृष्ठ दोनों तरफ सें बुरीतरह खून मे सनाहुआ थां---भीतरी पृष्ठों केँ सिरों पर्र भि खूनलगा हुआ थां----विजय नें पुस्तक खोली---भीतरी पृष्ठ साफ थें, यानीयदि कोई उपन्यास पढ़ना चाहे तोँ धीरे-धीरे पढाजा सकता थां----विजय बीच-बीच मे सें उसके पृष्ठ उलटकर देखने लगा, जबकि रघुनाथ कहरहा थां…"मुझे लगता हैं कि इस पुस्तक केँ जरिए तोताराम निश्चित रूप सें कुछ कहना चाहता थां,। इसीलिए मैंने बडी बारीकी सें इसका एक्-एक् पृष्ठ उलटकर देखा, मगर कहीं भि तोताराम नें कुछ नहि लिखा हैं, पता नहि वो इस पुस्तक कों इतना महत्व देकरकिस रूप मे क्याँ कहना चाहता थां.?"
"तुमने पुस्तक पूरीपडी हैं प्यारे?"
" नहीं। "
"मुमकिन हैं कि पूरी पुस्तक पढ़ने केँ बाद हि कोई तथ्य निकलता हौ ?"
उलझन मे फंसे रघुनाथ नें कहा----"कत्ल कां उपन्यास केँ कथानक सें भला क्याँ सम्बन्ध्र होँ सकता हैं?"
"कुछ भि हौ सूकता हैं प्यारे, मगर, फिलहाल तुम् इस चक्कर मे उलझकर अपने दिमाग़ कां फ्लूदा मत निकालो…इसे हम् देख लेगे--तुम् हमारे सवालों कां जवाबदो। "
" पुछो !"
" हत्याएं किस सिचुएशन मे हुईँ?"
"वो तोँ तुम् अखबार मे पढ़ हि चुके होगे। "
"हम् तुम्हारे मुखारविन्द सें सुनना चाहते हें रघु डर्लिग। "
"हाल मे मौजूद सब लोगों कां एक् जैसा बयान थां-उनके बयान केँ मुताबिक तोताराम औऱ अमिता फ्लोर पऱ डासकर रहे थें---------- विधायक कों फ्लोर पर्र देखकर हाल मे मौजूद समीलोग दिलचस्प निगाहो सें उसेदेख रहे थें-वही 'बारूद' कां संवाददाता भि थां, जिसने इस दृश्य कों अपने अखबार केँ लिए चटपटा मसाला समझना---उसने तुरन्त अमिता केँ संग डांसकर रहे तोताराम कां फोटो लेँ लिया -तोताराम शायद नहि चाहता थां कि उसकाऐसा फोटो किसी अखबार मे छपे, अत: अमिता कों छोड़कर वो तेजी सें 'बारूद' केँ संवाददाता कि तरफ वढा-अभि उसने फ्लोर सें नीचे पहलाकदम रखा हि थां कि सारेहाल मे घुप्प अंधेरा छा गय़ा। "
"लाइट गई थि याँ किसी नें मेन स्विच आँफ किया थां?"
"मेन स्विच! "
“किसने?"
"पता नहि लग सका…स्विच सें फिगर प्रिन्दूस भि लिएगए, किंतु कोई निशान नहि मिले-लगता हैं कि ऑफ करने वाले केँ दस्त्ताने पहनरखे थें। "
" फिन क्याँ हुआ"
“अंधेरा होते हि हाल मे खलबली-सि मच गई-लोग एक् दुसरे कों देख भि नहि सकते थें, इसीतरह एक् मिनट गुजर गय़ा, तब अंधेरे मे पहला फायरहुआ। "
“एक् मिनट गुजरने केँ बाद?"
"हा…। " रघुनाथ नें बताया----'' सबकायही कहना हैं कि फायर हाॅल मे अंधेरा होने केँ लगभग एक् मिनटबाद हुआ…गोली अमिता कों लगी। "
“जबकि अंधेरा इतनां गहरा थां कि लोग एक् दूसरे कों नहींदेख सकते थें !!"
" हाँ। "
“मामला यहींआम वारदातों सें हटकर हौ जाता हैं प्यारे। " विजय नें कहा-----ऐसे सार्वजनिक स्थानों पऱ जब गोली सें कत्ल होते हें तौ किसी छुपेहुए जगह सें हत्यारा अपने शिकार पर्र गोली चलाता हैं, गोली चलाने केँ बाद हि घटनास्थल पर्र अंधेरा कर दिया जाता हैं, ये अंधेरा कत्ल करने केँ लिए नहि, वल्कि हत्यारा अपनेभाग निकलने केँ लिए करता हे-ऐसे सार्वजनिक जगह पऱ जहाँ हत्यारे केँ शिकार केँ अतिरिक्त अन्य बहोत सें लोग भि होँ,,, हत्यारा कभी हत्या करने सें पूर्व अंधेरा नहि करेगा, क्योंकि अंधेरे मे वो हत्या कर हि नहीं सकता-------अंधेरा होने केँ बाद जहांकोई किसी कों नहि देख सकता थां-वहां गोली एक् मिनटबाद चली हैं----एक् मिनट मे अंधेरे केँ कारण बौखलायां हुआ शख्स कहीं-कां-कही पहुच सकता हैं-तब, सबसे पहलेये सबाल उठता हैं कि हत्यारे नें अपने शिकार कां निशाना केसे लिया औऱ शिकार भि एक् नहि-----दो थें-अथेरे मे हि शिकारों कों निशाने पर्र लेना असम्भव हैं। "
"इसी प्वाइंट नें तौ मूझे चकराकर रख दिया हैं। "
"मेन स्विच पऱ किसी कि उंगलियों केँ निशान नहि थें?”
"नं। "
"मतलबयह कि ऑफ करने केँ बादउसे आँन भि हत्यारे नें हि किया थां?"
"मे समझा नहि…
"हत्यारे नें जरूर दस्ताने पहनरखे थें, क्योंकि उसकी इनटेंशन हि हत्या कि थि, मगरकोई साधारण व्यक्ति भला दस्ताने क्यूं पहनेगा-स्विच आँफ हुआ----हत्याओं केँ बादखुद हि आंन भि हौ गय़ा------निशान न् मिलने कां अर्थहे कि उसेऑन भि हत्यारे नें किया !"
"इससे क्याँ नतीजा निकला?"
"हत्यारे कों भागने केँ लिए अंधेरे कि ज़रूरत नहि थि। "
"फिन उसने अंधेरा क्यूं किया?"
"हत्याएं करने केँ लिए?"
"अमी तोँ तुम् कहरहे थें कि अंधेरे मे अपने शिकारों कों निशाना बनाना एकदम असम्भव होता हैं !"
"इस हत्यारे केँ लिए शायद अंधेरे मे हि निशाना लेना ज़्यादा आसान थां !!!!!!"
“पता नहि तुम् क्याँ वकरहे होँ?"
"बक नहि रहे प्यारे-यहीं कहरहे हें, जोँ वारदात सें नजरआता हैं;-----हत्यारे द्वारा अंधेरा करने औऱ हत्याओं केँ बादपुन: मेन स्विच ऑनकर देने सें जाहिर हैं कि हत्यारा जानता थां कि प्रकाश केँ मुकाबले अंधेरे मे ज़्यादा ठीक निशाना लगा सकता हैं। "
"ऐसाभला केसे'हौ सकता हैं?”
“यही तोँ पता लगाना हैं मेरीजान। " कहने केँ संग हि उसने आंखें बन्दकर ली-दोनों पेर सोफों केँ बीचरखी सेण्टर टेबल पर्र पसार दिए-----रघुनाथ हक्का-बक्का-सां उसेदेख रहा थां-होंठों-हि-होंठों मे विजय जाने क्याँ-क्याँ बुदबुदाने लगा-----अचानक हि वो बुरीतरह उछलकर चीख पड़ा-“वोँ मारा साले पापड़ बाले कों। ”
" क------क्याँ क्याँ हुआ"' रघुनाथ चौंका।
“तोताराम अमिता कि लाशे कहां हें प्यारे?"
“अभि तक पुलिस केँ चार्ज मे हें। ”
"जियो प्यारे-----मुझे उन दोनों केँ कपड़े चाहिए ?"
" कपड़े? "
"हां---वे कपड़े, जिन्हें पहनकर वे डिनर केँ लिए सम्राट मे गये थें !"
" म----मगर उन'कपडों कां तुम् क्याँ करोगे?"
"उन्हे पहनकर नाचूंगा मेरीजान। " कहने केँ संग हि उसने सोफे सें सीधी जम्प बाथरूम केँ दरवाजे पऱ लगाई, बोला…तुम् उनके कपड़े यहा मंगाओ-तव तक हम् नहा धोकऱ उन्हें पहनने केँ लिए सजधजकर होते हैं !"
फिरभी रघुनाथ समझ नं सका थां कि विजय नें तोताराम औऱ अमिता केँ कपडे क्यूं मांगे हें, परन्तु इतना वो जानता थां कि हत्या सें उन कपडों कां निश्चित रूप सें कोई सम्बन्थ अवश्य रहा होगा ; अत: उसने मोबाइल करके एक् इंस्पेक्टर केँ द्वारा वे कपडे मंगा लिए-औऱ-पन्द्रह मिनटबाद हि इंस्पेक्टर कपडेलिए वहां पहुच गय़ा------रघुनाथ नें कपडेमेज पर्र रखवालिए औऱ इंस्पेक्टर कों विदाकर दिया-----रघुनाथ कों विजय केँ बाथरूम सें निकलने कि इंतज़ार थि विजयबीस मिनटवाद बाहर् निकला।
बाथरूम सें वो पूरीतरह रेडी होकर निकला थां!
उसकेबदन पऱ इससमय 'काली' कमीज औऱ वैसी हि वैलब्रॉटम थि…बाल कढ़ेहुए थें-बाहर् निकलते हि उस नें रघुनाथ कों आंख मारी-रघुनाथ नें कहा…“कपडे आँ गए हैं विजय।
उसकी तरफ़ बढतेहुए विजय नें कहा-------------" तुम् यहां सें फूटो प्यारे। "
"क-क्याँ मतलब…?" रघुनाथ उछले पड़ा।
"फूटने कां मतलब हैं चलते-फिरते नजरआओ!" विजय नें कहा।
"म-'मगर !"
"अगर-मगर कुछ नहि मेरी जान--नहाने केँ बादबडी जोर सें भूखलगी हैं …अच्छे बच्चों कि तरह यहां सें उठकरनाक कि सीध मे सीधेघऱ जाओ----रैना बेहन सें बोलो कि उनका प्यारा भाई आनेबला हैं-----आलू-केँ फर्स्ट क्लास परांठे औऱ घीए कां रायता बनाए। "
" ल-मगर हत्यारा। "
"हम् एक् घंटे मे वहीं आँ रहे हें-"तुम्हें हत्यारे कां नाम भि बताएंगे। '
“क-क्याँ मतलब?" रघुनाथ उछल पड़ा-“एक् घंटे मे हत्यारे कां नाम ?"
"तुम् फूटो प्यारे, यह कपड़े औऱ 'जुदाई' यही छोड़जाओ। "
दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani - Continue reading next part
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