नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story - Real Kahani Part 1
फोरम केँ सब पाठकों कों Rajgopal कां नमस्ते, ये किस्सा पहलेइसी फोरम पर्र # Siraj Patel # भइया नें मराठी मे पोस्ट कि थि। मुझे बहोत अच्छी लगी थि। इसलिये मे हिंदी पाठकों केँ लिएइस स्टोरी कों हिंदी मे अनुवाद करके पोस्ट कररहा हूं। उम्मीद हैं आप् सब कों मनपसंद आए
नंदिता, मेरे मित्र कि बेटी
आइये वक्त खराब नां करतेहुए किस्सा सीधे किस्सा शुरुआत करते हें
जवान होती नंदिता केँ बदन पर्र अब थोडा-थोडा बदलाव दिखने लगा थां। मे उसे बचपन सें ऐसे हि देखता आँ रहा हूं। मैंने अपने साथी कि इस बेटी कों अपनीगोद मे, कंधे पऱ झुलाया थां। कभी-कभी वो मुझेछू लेती थि। उसे वो बार्बी डॉल बहोत मनपसंद थि जोँ मैंने उसे उसके पांचवें बर्थडे पऱ दि थि। तभी सें वो मुझसे घुलने लगी थि। बाद मे, विद्यालय जानेलगी तब सें नंदिता अपनी गणित कि प्रोब्लेम्स लेकर मेरेपास आती थि।
हमारा घऱ भि आस-पास हि थां। छोटा सां देहात थां हमारा। पहले मे गाँव केँ सरकारी विद्यालय मे शिक्षक थां, बाद मे मे शिक्षा विभाग मे पदोन्नत हुआ औऱ अब एक् अधिकारी बन गय़ा हूं। अब मेरीजॉब जिले(शहर) केँ दफ़्तर मे थि। मे प्रतिदिन अपने छोटे सें देहात सें जिले केँ जगह तक बस सें जाता थां औऱ साम कों वापस आँ जाता थां। चूंकि ये हमारा पुश्तैनी घऱ हैं, इसलिये मैंने यही गाँव मे हि अपना ठिकाना बनारखा थां। ऐसे देहात मे अच्छे शिक्षक औऱ शिक्षण सुविधाएं नहि थीं। इसलिये अगर मे थककरघऱ आता तोँ भि मे बिनाबोर हुए नंदिता कों गणितहल करने मे सहायता करता थां। वो भि अपने गोल-मटोल गालों कों फुला लेती थि औऱ अपनी मुश्किलों कों हल करने केँ लिए बड़ी-बड़ी आँखों सें मेरी चतुराई कि तारीफ करती थि।
बाद मे वो 12वीं मे गई औऱ उसका हमसे मिलना-जुलना कम होता गय़ा। नंदिता एक् युवा शिक्षक केँ पास ट्यूशन पढने जाती थि, जोँ अभि-अभि गाँव केँ विद्यालय मे स्थानांतरित हुआ थां। इससे हमारा रोजाना मिलना, आनां-जानां कम हौ गय़ा। फिरभी छुट्टियों मे वो हमारे संग हि रहती थि। जब वो मुझे विद्यालय कि शरारतों केँ बारे मे बताती थि तौ उसके चेहरे पर्र बड़ी मुस्कान आँ जाती थि। मे उसकी चटर-पटर कों दिलचस्पी सें सुनता थां। हालाँकि मेरा ध्यान उसकी उभरती हुई छातियों पर्र चला जाता थां, मगर उसके बारे मे मेरेमन मे कभीकोई बुरा विचार नहि आया।
जैसे-जैसे प्रमोशन केँ संग मेरी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं, मुझे दफ़्तर मे कभी-कभी देर हौ जाती थि, इसलिये मैंने शहर मे एक् रूम किराए पर्र लेँ लिया। अगर रात बहोत हौ जाती तौ मे वहींसो जाता। क्योंकि अंतिम बसरात आठबजे निकलती थि, सुभह तक कोई दूसरी बस नहि थि। तोँ एक् तरह सें ये समाप्त होँ गय़ा क्योंकि अब मेरेपास नंदिता कों पढ़ाने कि जिम्मेदारी नहि थि।
12वीं कां रिजल्ट आँ गय़ा औऱ नंदिता फर्स्ट क्लास मे पास होँ गई। कॉलेज हमारे देहात मे नहि थां, मगर जिले मे अच्छे कॉलेज थें। दूरी ज़्यादा नहि थि। बस सें एक् घंटा लगता थां। चूंकि मे शिक्षा विभाग मे थां, मुझे नंदिता कों एक् अच्छे कॉलेज मे प्रवेश दिलाने कि जिम्मेदारी दि गई थि। मे फार्म लें आया। नंदिता नें उसे भरकर मुझेदे दिया, मैंने उस फॉर्म कों एक् अच्छे कॉलेज मे जमाकर दिया। इसमें कोई संदेह नहि थां कि नंदिता कों प्रवेश मिल जाएगा क्योंकि मेरीबात मे वजन थां। फिरभी, प्रथा केँ अनुसार, उन्हें वास्तविक प्रवेश लेने केँ लिएखुद जानां पड़ा।
नियतदिन पर्र, नंदिता मेरेसंग हि शहरजा रही थि। हालाँकि बस मे भीड़ थि, कंडक्टर मेरा परिचित थां, इसलिये उसने हम् दोनों कों बिठा लिया। मैंने उसे खिड़की केँ पास बिठाया औऱ साइड मे बैठ गय़ा। नंदिता कि कोमल जांघें मेरी जांघों कों छूरही थीं औऱ रगड़रही थीं। मगर उसे इसकाकुछ भि अहसास नहि हुआ होगा। वरना मे उसका चहेता चाचू थां।
मुझे भि इसमें कुछगलत नहि लगा। बस केँ सफर मे उसे नींदआई तौ वोँ मेरे कंधे पऱ सिर रखकरसो गई। उसके बालों सें हल्की-सि मादकगंध आँ रही थि। वो मेरे अंगों पऱ अपने जिस्म केँ भार केँ संग धीरे-धीरे सोरही थि। उसकेगरम छुवन नें मुझे थोडा अलग महसूस कराया, मगरजब सें मे उसे बचपन सें देखता आँ रहा हूं, तब भि मेरेमन मे ऐसाकुछ नहि थां।
मैंने नंदिता कों सहारा देने केँ लिए उनके कंधे पर्र हाथरखा औऱ तौ उसनेकस कर पकड़ लिया। मगर उससमय मेरा ध्यान नीचे गय़ा औऱ मे शॉक्ड रह गय़ा। मे नंदिता केँ शर्ट केँ गले सें उसके स्तनों कों स्पष्ट देख सकता थां क्योंकि वो मेरे सीने पर्र सिर रखकरसो रही थि। उम्र केँ संग उसके मम्मों अच्छे सें उठेहुए थें। भले हि मुझेपता थां कि मुझेइसे नहि देख्ना चाहिए, फिन भि मेरी आँखों नें उन सुडौल स्तनों कों देख्ना नहि छोड़ा। गोरे स्तनों कों देखकर मेरी हालत खराब होतीजा रही थि। आखिरकार, मैंने अपनासिर घुमाया औऱ खिड़की सें बाहर् देखा, ये सोचकर कि मे नंदिता कां चाचा हूं औऱ भले हि मुझे गलती सें उसके बूब्ज़ दिखें, मुझे उनकी उपेक्षा करनी चाहिए।
मेरी दुर्दशा ज्यादा वक्त तक नहि रही। थोड़ी देरबाद डिस्ट्रिक्ट लोकेशन आई औऱ मैंने नंदिता कों जगाया। हम् दोनों अपना-अपना बैग लेकरबस सें उतरगए। हम् रिक्शा सें कॉलेज पहुंचे। जब तक उसका एडमिशन हुआतब तक दोपहर केँ एक् बज चुके थें। मे नंदिता कों पास केँ एक् होटल मे लें गय़ा औऱ उसे डोसा खिलाया। उसने जिद्द करकेबाद मे आइसक्रीम खाली। उसे यकीन थां कि मे उसकी सारीजिद पूरी करूँगा।
मैंने नंदिता केँ एडमिशन कराने केँ लिएआज आधेदिन कि छुट्टी ली। मगर अब मुझे दफ़्तर जानां थां। दोदिन बाद शिक्षा मंत्री कां दौरा थां। सारे रिकॉर्ड एपसोड होने थें। मैंने नंदिता सें कहा कि उसे अभि बस सें देहात जानां चाहिए। उसनेजिद कि कि वो साम कों मेरेसंग वापस जाएगी। वो अकेले सफ़र करने सें डरती थि।
मैंने उससेकहा "अरे नंदिता, अब तुम्हें रोज कॉलेज आनां होगा औऱ अकेले हि वापस जानां होगा। तुम् रोज मेरेसंग नहि जा पाओगी। तुम्हें अकेले घूमने कि आदत डालनी चाहिए। " उसने अपने गोल-मटोल गाल थपथपाते हुएकहा, "नहि चाचू, मे कॉलेज शुरुआत होने केँ बाद अकेले आँ जाऊंगी। मगरआज मे आपकेसंग वापस जाऊंगी। मे आपके दफ़्तर मे बैठूंगी। अगर आप् चाहें तौ आप् कामकर सकते हें, फिन हम् एक् संग देहात जाएंगे। "
मे हमेशा कि तरह उसके आग्रह केँ आगेझुक गय़ा। मगर मे उसे दफ़्तर भेजने केँ लिए राजी नहि थां। मुझेपता थां कि मेरी मासूम नंदिता कों देखकर वहां केँ लोग क्याँ सोचेंगे। ऊपर सें उसकी छाती बाहर् निकली हुई थि। दफ़्तर वालों कि गंदी नजरों सें दूर रखने केँ लिए मे उसे अपने किराए केँ कमरे मे लें गय़ा। मैंने उसेकहा, "तुम् यहीं रुको। रेडियो सुनो। मे साढ़े पाँचबजे दफ़्तर सें निकलकर आऊँगा। फिन हम् गाँव चलेंगे। " उसनेये सुनिश्चित करने केँ लिए रेडियो पऱ बटन चालू करना शुरुआत कर दिया कि येठीक हैं। "दरवाजा अंदर सें बंदकर लो। जब तक मे न् आऊं, तब तक इसेमत खोलना। " उसेठीक सें समझा देने केँ बाद मे दफ़्तर चला गय़ा।
कार्यालय पहुंचते हि वहां कां माहौल देखकर दंगरह गय़ा। सब कों बेतहाशा भागते देख मैंने अपने एक् मित्र सें पूछा कि क्याँ चलरहा हैं औऱ उसने कहा"सर, मंत्री जी कां आनांदो दिनबाद होना थां, मगरकल होगा। अभि तारीख बदलने कि खबर मिली हैं। कलेक्टर तभी सें आपको ढूंढ़ रहे हें। पहले जाकर उनसेमिल लीजिए। " मैंने कलेक्टर सें मुलाकात कि औऱ जानां कि दौराकब होगा, केसे तैयारी करनी हैं। वापसआकर सबको दफ़्तर मे काम पर्र लगा दिया। सारे रिकॉर्ड ठीक सें खंगालते हुए बाहर् कब अंधेरा हौ गय़ा पता हि नहि चला। सामने रखेगरम चाय केँ प्याले कों उठाते हुए मेरीनजर कलाई पऱ बंधी घड़ी पऱ पड़ी तौ मे चौंक गय़ा। सातबजे थें। नंदिता केँ कमरे मे अकेले मेरा प्रतीक्षा करने केँ विचार सें मुझे पसीना आँ गय़ा।
मैंने कलेक्टर कों मोबाइल किया औऱ उनसेकहा कि काम करीब-करीब पूरा हौ गय़ा हैं औऱ मुझे देहात केँ लिए निकल जानां चाहिए। जैसे हि मैंने कल जल्दआने कां वादा किया, कलेक्टर चिल्ला उठे "मिस्टर तुषार, तुम् आज देहात नहि जा सकते। तुम्हारे विभाग केँ मंत्री कल आएंगे। सब कों सुभहसात बजे हेलीपैड पऱ होना हैं। तुम्हारे देहात सें सुभहकोई बस नहि हैं। तुम्हें आजयही अपने कमरे पऱ रुकना चाहिए औऱ सुभहछह बजे दफ़्तर पहुँच जानां। "
अब मे कलेक्टर कों केसे बताऊं कि मे किस स्थिति मे थां?? "यससर" मैंने मोबाइल रख दिया। मैंने फटाफट दफ़्तर कां काम समेटा औऱ मे कमरे पऱ पहुंचा। नंदिता गुस्से मे थि। उसने मात्र मेरेसिर केँ बाल नोचने हि बाकि छोड़ दिये। एक् दोसाल औऱ छोटा होता तोँ वो भि हौ जाता। अंत मे किसीतरह उसे शांत कराया औऱ मोबाइल बूथ पऱ लें गय़ा। उससेघऱ पर्र मोबाइल करके बताना पड़ा। मगर उसके पिता नें कहा"उसे अबरात कों अकेला मत भेजो। उसे वहीं सोनेदो औऱ सुभह कि बस मे लेँ आओ। " मैंने ओके कहकर मोबाइल रख दिया।
नंदिता कों पास केँ एक् होटल मे लेँ जाकर खानां खिलाया। हालाँकि मुझेभूख नहि थि, मैंने नंदिता केँ कहने पऱ खाया औऱ हम् दोनों कमरे मे लौटआए। अब नंदिता कां मूड अच्छा होँ गय़ा थां। पहलीबार वो घऱ केँ बाहर् रात बिताने वाली थि। उसे इसमें एक् तरह कां रोमांच महसूस हुआ। वो मुझे दुलार रही थि औऱ मुझसे नाराज होने केँ लिए माफी मांगरही थि। मगर मुझे दूसरी चिंता थि।
मेरे कमरे मे फर्नीचर जैसीकोई चीज नहि थि। सप्ताह मे मात्र एक् दिन मुझे वहां रहना होता थां। तोँ मैंने उस छोटे सें कमरे मे मात्र एक् गद्दा औऱ एक् तकिया रखा। रात मे बोर होने पर्र गाने सुनने केँ लिए रेडियो केँ अलावा कमरे मे औऱ कुछ नहि थां। तोँ अब हम् दोनों कों एक् हि छोटे सें गद्दे पर्र मजबूरन सोना पड़ना थां।
पहलेजब नंदिता छोटी थि तोँ मे अक्सर सो जाया करता थां। मगरआज सुभहबस सें आतेहुए उसकी उछलती हुइ छाती कों याद करके मुझे स्वयं पऱ शक होनेलगा थां। मगर मैंने उसे मुस्कराते हुएकहा "अब तुम् बहोत माफी माँगरही हौ। मुझेआने मे देर हुइ तोँ तुम् मुझ पऱ केसे नाराज हौ गई। औऱ मैंने तुमको दोपहर मे गाँव वापस जाने केँ लिएकहा भि थां। पर्र तुम् हि थि जिसने मेरेलिए रुकने कि जिद कि। अबजब मंत्री जी दौरे पऱ हें। चल, कलसाम तक केसे जाऊं?"अब भुगतना तुम्। अबकलसाम तक रुक जानां। "
इस पर्र वो बोलि "कोईबात नहि चाचू। मे घऱ पऱ बोर हौ रही थि। मे कलदिन भर आपकेसंग रहूंगी। मंत्री जी केँ आने कां मज़ा देखूंगी औऱ रात कों आपकेसंग वापसचली जाऊंगी। " अबउसे समझाने कां कोई मतलब नहि थां कि मंत्रिस्तरीय दौरा मजेदार नहि होता हैं। मैंने कहा थां"ऐसा कुछ नहि हैं। सुभह कि बस लें लो जैसा तुम्हारे पिता नें कहा थां। इन मंत्रियों केँ बारे मे कुछ भि पक्का नहि हैं। अगर मुझेकल भि रुकना पड़े तोँ?"
इस पर्र वो गुड़िया कहती हें "मे कलरात भि खुशी-खुशी आपकेसंग रहूंगी, चाचा। इतने लंबे वक्त केँ बाद, मुझे मां केँ अत्याचार सें छुटकारा मिला हैं। वो हमेशा मुझेतंग करने केँ लिए चिल्लाती रहती हैं। मे आपको उनसे भि ज़्यादा प्रेम करती हूं, चाचा। " अब मे उसे केसे बताऊं कि तुँ अब बड़ी हौ चुकी हैं औऱ ऊपर सें लड़की भि ऐसे किसीगैर मर्द केँ संग नहि रह सकती। मगर वो मुझेगैर मानने कों रेडी नहि थि। बहुतदेर तक बातें करने केँ बाद मैंने उससेकहा, "अबसोजाओ। मुझे सुभह जल्द रेडी होकर दफ़्तर जानां हैं। तुम्हें भि सुभह 6 बजे पहलीबस पकड़नी हैं। "
‘’अबसोजाओ’’ कहने केँ बाद उसका ध्यान कमरे केँ एकमात्र गद्दे पऱ गय़ा। नंदिता नें शर्माते हुएकहा "अरे चाचू, यहा तौ एक् हि गद्दा हैं। क्याँ हम् दोनों इसी गद्दे पर्र सो जाएँ?" मैंने कहा, "हम् एक् हि गद्दे पर्र सोने नहि जारहे हें। तुम् गद्दे पर्र सोजाओ। मे ये चादर नीचे बिछा लेता हूं औऱ एक् तरफसो जाता हूं। " सुनकर नंदिता कां चेहरा उतर गय़ा। रोनी सूरत करके वो बोलि, "चाचू, मेरीजिद नें आपको इतना कष्ट दिया हैं। आप् दिनभर काम करकेथक गए होंगे। आप् कों सुभह जल्द रेडी होना हें औऱ कहरहे हें कि आप् गद्दे पऱ सोने केँ बजाय नीचे सोएंगे। बल्कि, मे नीचेसो जाऊ औऱ आप् गद्दे पऱ सोजाओ। " कईबार समझाने पऱ भि उसने अपनीजिद नहि छोड़ी। फिन मे गद्दे पऱ सोने केँ लिए रेडी हौ गय़ा।
जैसे हि उसने चादर फैलाई औऱ अपनीतरफ सोने केँ लिए सजधजकर हुइ, वो अचानक रुक गई औऱ बोलीं"चाचू, मे आपके पांवदबा दूंगी। आपकी सारी थकानदूर होँ जाएगी। " मैंने कहा नहि। फिरभी, उसनेहार नहि मानी। उसनेकहा, "मे हरदिन मेरे बापू केँ पांव दबाती हूं। आज मे आपकेपेर दबा दूंगी तोँ क्याँ होगा?" मे उसकेइस तर्क कां खंडन नहि करसका। मैंने अपनी लुंगी लपेटी औऱ गद्दे पर्र गिर पड़ा जैसे कि ठीक होँ। नंदिता मेरे पैरों केँ पासबैठ गई औऱ धीरे-धीरे सें मेरे तलवों कों दबाया। उसने मुझे वास्तव मे बेहतर महसूस कराया। जैसे हि मैंने उसे बताया, नंदिता कां चेहरा खिलउठा। उसनेकहा, "चाचू आप् अच्छे सें सो जाइये। आपकेपेर दबाने केँ बाद मे सो जाऊंगी। " औऱ मे आंखें बंद करके लेटारहा।
मे थक गय़ा थां। मगर नंदिता केँ संगऐसी अजीब स्थिति मे रात गुजारने केँ ख्याल सें हि मुझे टेंशन हौ रही थि। पैरों कों दबाते हि आरामसे सारा तनावदूर होँ गय़ा। मैंने अपनी आँखें थोड़ी खोलीं। नंदिता एक् पांव सें झुक थि औऱ दूसरे पांव कों मोड़कर अपनी ठुड्डी कों अपने घुटने पर्र टिकारही थि औऱ दोनों हाथों सें मेरे पैरों कों दबारही थि। उसके शर्ट कां गला ढीला औऱ नीचेलटक रहा थां। उसके बड़े-बड़े मम्मों जोँ सुभह दिखाई देरहे थें, उसमें सें झाँकरहे थें। मैंने उससेदूर देखने केँ लिए अपनासिर घुमाया औऱ एक् अलग दृश्य देखा।
नंदिता कि जाँघें खुल चुकीथीं औऱ उसका स्कर्ट ऊपरउठ गय़ा थां। उसकी पैंटी स्कर्ट केँ नीचे सें देखीजा सकती थि। पसीने सें लथपथ पैंटी उसके गुप्तांग केँ चारों ओरकस गई थि। इससे पैंटी केँ दोनों तरफ सें काले घुंघराले बाल निकलआए। अपनी पैंटी पर्र मेरा ध्यान गय़ा हुआ देखकर नंदिता शरमा गई। मैंने भि सिर घुमा लिया। मगर उससीन कां मुझ पऱ असरहुआ। जैसे हि मेरा लन्ड लुंगी सें सख्त होँ गय़ा, उसने अपनी उपस्थिति दिखाने केँ लिएफन उठा लिया। तोँ लुंगी पऱ एक् तंबूबन गय़ा। इसे छिपाने केँ लिए मैंने अपनी करवट बदली औऱ उससे कहा"बहोत होँ गय़ा नंदिता, अबसोजाओ। "
उसने भि इस पर्र ध्यान दिया होगा। मगर वो इतनी आसानी सें बेशर्म छोरी विचलित नहि हुई थि। उसने मुस्कराते हुए कहा"नहि, चाचू। अभि भि आपका दाहिना पेर दबाना बाकि हैं। " औऱ जब मैंने नाँ कहाफिन भि वो उठकर मेरेपास बैठ गई औऱ मेरे दाहिने पांव कों दबाने लगी। वो अब मेरा तम्बू स्पष्ट रूप सें देख सकती थि। मे उसकी पैंटी फिन सें देखपा रहा थां। इसलिये मे अपनेमन कों कितना भि रोकलूं, मेरा तम्बू बैठने कों सजधजकर नहि होगा। अंत मे, मैंने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ अपनेमन सें तस्वीर कों मिटाने कि कोशिश कि। मगर बार-बार वोँ पैंटी, वोँ कालेबाल औऱ गोरी जाँघें मेरी आँखों केँ सामने तैरने लगीं।
"चाचू, मुझे आपसेकुछ पूछना हैं। " मैंने नंदिता कि आवाज़ पर्र अपनी आँखें खोलीं औऱ उसकीओर देखा। उसकी आवाज़ अब मुझेअलग लगरही थि। उसका चेहरा भि गंभीर होँ गय़ा। "बोलो बेटा, क्याँ पूछना चाहते होँ?" मैंने कहा थां। "पहले वादाकरो चाचू मेरी माँ याँ मेरे पिताजी कों नहि बताओगे, " उसनेकहा। "ओह, तुम् इतनी गंभीरता सें क्याँ पूछना चाहती हौ?" मैंने वादा तोड़ते हुएकहा। "नहि चाचू, एक् हि बात हैं, मुझेकुछ पूछना हैं। पहलेवचन दीजिये। फिन मे बताऊ। " एक् बारफिन उसकीजिद केँ आगे झुकते हुए मैंने वचन दिया।
"देखो चाचू। आप् हँसना मत। नहि तोँ मे आपकेसंग कभी, कभी बात नहि करूँगी, " उसनेफिन शर्तरखी। मुझेपता थां कि उसकी मन:स्थिति अनुसार हि बात कों समझना होगा। नंदिता नां हंसने कां वादा लेकरबात करनेलगी, "मे घऱ पर्र माँ सें इस बारे मे बात नहि कर सकती। वो हमेशा मुझ पर्र क्रोध करती हैं। वो कहती हैं कि तुम्हारे चाचू नें तुम्हें लाड़ प्रेम किया हैं। मे बापू सें बहोत डरती हूं। आप् मेरीहर बात बहोत ध्यान सुनते होँ। इसलिये मे आपको विद्यालय कां सभीकुछ बताती हूं। घऱ पऱ कोई औऱ नहि हैं, जिसको मे बतासकू।
मैंने उसेबीच रास्ते मे रोकते हुएकहा" अरे पगली, मां तौ तेरेभले केँ लिए कहती हैं। औऱ येसच हैं कि मैंने तुझेही लाड़ प्रेम किया हैं। तूँ कल पति केँ घऱ जाएगी तोँ तेरीपता चल जाएगा। अब तुम्हे घऱ केँ काम मे माँ कां हाथ बँटाना होगा। "
"मे घऱ केँ काम कि बात नहि कररही चाचू। मुझे पसन्द न् होने पर्र भि मे साराकाम कर लेती हूं। मुझे आपसेकुछ औऱ बात करनी हैं। " उसनेसिर झुकाते हुएकहा।
मामला कुछ गंभीर नजर आँ रहा हैं। मैंने सोचा कि मुझे उसको बोलने देना चाहिए। कहा"अब मुझे बताओ। मे बीच नहि बोलूंगा। "
"चाचू, क्याँ आप् जानते हें कि हमारे विद्यालय मे एक् नया टीचरआया हैं" उसनेकहा। "हाँ, तौ। तुम् उनसे ट्यूशन लेती हौ, जिससे मेरीहर दिन तुम्हें पढ़ाने कि तकलीफ़ सें बच जाता हूं, " मैंने ऐसाकहा तोँ वो नाराज होँ गई औऱ बोलीं, "तोँ मेरी पढ़ाई सें आपको परेशान कररही थि। जाओ, मे आपकोकुछ नहि बताऊंगी, " तौ नंदिता बैठ गई। मैंने उसे माफ़ी मांगकर समझाया औऱ उसेफिन सें अपनीबात रखने केँ लिए मनवा लिया।
तौ मे क्याँ कहरही थां चाचू, वे नए टीचर हें औऱ बहोत अच्छा पढ़ाते हें, मगर-" नंदिता नें बातबंद कर दि। "अरे नंदिता, कहो नाँ, डरोमत "मुझे बताओ क्याँ हुआ हैं, " मैंने उसे आश्वस्त किया। मुझेअब थोडा संदेह होनेलगा थां। उसे आश्वस्त करने केँ लिए, मैंने उसकीपीठ पर्र हाथ कों घुमाकर फिन सें उसे बोलने केँ लिएकहा। मेरी लुंगी पऱ तम्बू अब पूरीतरह सें चला गय़ा थां। नंदिता कि चिंता नें मेरी फीलिंग्स कों छोड़ दिया। अब मुझे हीनता महसूस होनेलगी।
नंदिता नें फिन केहना शुरुआत किया। उसका चेहरा लाल थां। स्वर तीखा थां। " चाचू, वोँ टीचर हें नाँ, क्याँ हैं नां कि, पढ़ाते टाइम वो मुझेहर स्थान छूता थां। मेरी छाती दबाता थां। " मेराशक जायज थां। नंदिता कि बातें सुनकर मैंने कहा, "रुको, मे उस टीचर कों अच्छा सबक सिखाऊंगा। बेहतर हैं कि उसका ट्रान्सफर किसी बुरे देहात मे कर दियाजाए, मगरकल जब तुम् देहात जावो तौ पहले उससे छुटकारा पा लेना। "
"नहि नहि चाचू, मैंने आपको उनकी शिकायत करने केँ लिए नहि कहा थां। पहले पूरीबात सुन लीजिए। " नंदिता नें मुझे रोकते हुएकहा। "हा, सभी कुछबता बेटा। कुछ भि मत छिपाना। तुम् लड़कियां लज्जा केँ मारेऐसी बातें नहि करती होँ, मगरयह भेड़िये ऐसे हि.। " मैंने उसकीपीठ थपथपाई औऱ उसे आश्वस्त किया।
नंदिता नें अपनासिर नीचेरखा औऱ जारीरखा" ईमानदारी सें चाचू, ऐसा नहि हैं कि मुझे उनके हाथों सें छूआ जानां पसन्द नहि थां। पहले तोँ मुझे अजीबलगा, मगरफिन जबसर कां हाथ मेरेबदन पऱ चलनेलगा, तोँ मुझे बहोत अच्छा लगा। अच्छा लगा कि कोई इतनी दिलचस्पी लेँ रहा हैं मुझमें। " मे उसकी बातों सें चौंक गय़ा। मुझेइस बात कि चिंता थि कि इस लड़की कों इतनीकम उम्र मे उस टीचर सें प्रेम होँ गय़ा। मगरये तय थां कि जब तक वो बात पूरी नहि कर लेंगी, मे नहि बोलूंगा।
नंदिता नें बताना शुरुआत किया "मैंने इस मामले कों अपने सहेलियों केँ बीच भि नहि उठाया। मगर उन्हें शक थां। वोँ मुझेसर केँ नाम सें चिढ़ाती थि। जब मुझे मासिक धर्म होता तोँ सर जानबूझकर मुझे अपने सामने बिठाते। सर भि कक्षा मे पढ़ाते वक़्त मुझसे ज़्यादा सें ज्यादा सवाल पूछते थें। मेरे उत्तर गलत होने पऱ भि वो मुस्कुरा कर मुझे बैठने कों कहते थें। यदि किसी अन्य लड़की याँ लड़के कां उत्तर गलत होता, तौ उन्हें डांट पड़ती थि। येकथा थि पूरे विद्यालय मे फैल गई। विद्यालय मे हमारा कोई करीबी न् होने केँ कारणघऱ तक खबर नहि पहुंची थि। विद्यालय सें आते हि मे सर केँ पास ट्यूशन पढ़ने चली जाती थि। सर केँ कमरे मे एक् खिड़की थि। सरउसे हमेशा खुली रखते थें। किसी कों शक नां होँ इसलिये। मगरजब खिड़की केँ सामने कोई नहि होता थां तब तौ वोँ आते-जाते मेरे लगभग आँ जाते। '
मे सांस रोके नंदिता कि बातें सुनरहा थां। उसने बोल्ना जारीरखा। उसकी आवाज़ अब थोड़ी कर्कश थि "विद्यालय मे 12वीं कि परीक्षा सें पहले तैयारी कि छुट्टी थि। सर नें मुझे दोपहर मे विद्यालय बुलाया। उन्होंने कहा कि वो महत्वपूर्ण नोट्स देना चाहते हें। जब मे विद्यालय पहुंची तोँ सर केँ अलावा वहांकोई नहि थां। वो मुझे विद्यालय केँ क्लास रूम मे लेँ गए औऱ मेरेबगल मे बेंच पऱ बैठकर नोट्स समझाने लगे। थोड़ी देरबाद उनकाहाथ मेरी जांघ पर्र आया। कमरे मे ट्यूशन केँ वक़्त मैंने उनका कोमल स्पर्श अपनीपीठ औऱ सीने पऱ महसूस किया। मगर आज अकेले मे विद्यालय मे सर नें मेरी जांघ पऱ हाथरखा औऱ मे डर गई। मे कहनेलगी, नहि नहि। मगरसर नें अपनाहाथ मेरी स्कर्ट मे डाल दिया। मुझे बहोत लज्जा आँ रही थि। मे अपनेहाथ सें अपना चेहरा छुपारही थि औऱ सर नें मेराहाथ पकड़कर उनकी पैंट पऱ रख दिया। "
अब नंदिता कि साँसें भारी होने लगीं। जाहिर थां कि यहसभी बताने मे उसे बहुत तकलीफ़ होँ रही थि। हालाँकि, वो निडर होकर बोलती रही, "सर कि पैंट मे कुछ टाइट हौ रहा थां। मे डररही थि मगरउसी टाइमकुछ औऱ हौ रहा थां। मे सर केँ उस खुरदरेपन केँ लिएतरस रही थि। उसने मेरी स्कर्ट मे हाथ डाला औऱ मे नियंत्रण खो बैठी। मैंने सर सें कहा, मे: डरलगरहा हैं सर। प्लीज रुक जाइए.मगर सर नहि रुके। उन्होंने मेरा शर्टऊपर उठाकर मेरे सीने कों मुँह लगाया। '’ इतना कहकर नंदिता फूट-फूट कर रोनेलगी। मेरा हृदय उसके प्रति करुणा औऱ टीचर केँ प्रति घृणा सें उमड़ पड़ा।
मैंने उसे अपने सें लगाया। नंदिता फूट-फूट कर रोनेलगी। मैंने उसे समझाते हुएकहा "रोमत बेटा। मे उस टीचर कों जिंदा नहि छोडूंगा। " फिन मुझसे दूर जाकर नंदिता नें आँखें पोंछते हुएकहा, "नहि चाचू, आपने अभि तक पूरीकथा नहि सुनी। आगे सुनिए। जैसे हि सर नें मेरे सीने कों छुआ, मुझे एक् अलगतरह कि खुशी महसूस हुई। सर हैंडसम हें। " मुझे उनसे प्रेम होनेलगा। सर नें मुझे चुनायह सोचकर मे बहोत खुश थि। मे उनसे विवाह करने कां सपनादेख रही थि। मगरउस दिन मेरे सारे ड्रीम्स चकनाचूर होँ गए। "
मे उसकीइस बात सें हैरान थां। ये इतनी छोटी लड़की हैं। क्याँ मास्टर उसका फायदा उठाता हैं औऱ क्याँ इस लड़की कों उससे प्रेम हौ जाता हैं? औऱ ऊपर सें कहती हैं ख्वाब टूटगए। सभीकुछ रहस्यमय थां। मैंने उससे उलझन मे पूछा "बेटी नंदिता, मे तुम्हारी बात कां मतलब नहि समझा। अगर तुमने टीचर सें प्रेम किया, तौ फिनऐसा क्याँ हुआ कि तुम्हारे ख्वाब टूटगए? मुझे बताओ। "
नंदिता नें एक् गहरी सांसली। वो शब्दों सें मेल खातेहुए कहनेलगी। "सर नें अचानक अपना मुंह मेरे सीने सें हटा दिया औऱ थूकने लगे। मे सदमे मे खडी हौ गई। पता नहि सर कों अचानक क्याँ हौ गय़ा। गुस्से मे बोले '’गंदी लड़की, अगर मुझे पहलेपता होता, तोँ मे तुम्हें छूने सें पहलेदस बार सोचता। एक् रंडी तुमसे बेहतर हैं। हालाँकि, रंडी भि अपने बालों कों अच्छी तरह सें रखती हें। औऱ तुम्हारे सीने पर्र बहुतबाल हें। छी! तुम् लड़की नहि किन्नर होँ, किन्नर” इतना बोलकर सर बाहर् चलेगए। औऱ मे वहींगिर पडी। " नंदिता अबरो नहि रही थि। मगर उसके चेहरे पऱ एक् बेहद दुःखी भाव थां। मे अवाकउसे देखरहा थां। मुझे वास्तव मे नहि पता थां कि क्याँ कहना हैं।
नंदिता नें मुझे जोँ बताया उससे मे अवाकरह गय़ा। वो मेरीओर मुड़ी औऱ बोलीं "चाचू, क्याँ सच मे लड़कियों केँ सीने पर्र कभीबाल नहि होते? मे नौवीं कक्षा मे थि जब मेरे सीने पर्र बाल बढ़ने लगे थें। मगरतब मेरे जिस्म केँ अन्य हिस्सों पऱ भि बालउग आए थें। मैंने एक् बार अपनी माँ सें पूछा औऱ उन्होंने कहा कि इस उम्र मे हर स्थान लड़कियों केँ बालउग आते हें। मुझेइस बात कां बुरा नहि लगता। उस दिनजब सें सर नें मेरे सीने केँ बालों कों देखा, तब सें मे पूरीतरह सें सदमे मे हूं। घऱ पऱ किसी सें बात नहि कर सकती। आपकेपास मेरेहर प्रश्न कां जवाब होता हैं। मुझे बताइए न् चाचू। क्याँ मे दूसरी लड़कियों कि तरह नहि हूं? किन्नर मतलब क्याँ होता हैं चाचू?, इसका क्याँ मतलब हैं? सर नें मुझे किन्नर क्यूं कहा?"
नंदिता आंखों मे आंसूलिए मुझसे पूछरही थि। बचपन सें हि पढ़ाई मे आने वालीहर मुश्किल केँ बारे मे मुझसे पूछती थि। अब मे सोचरहा थां कि उसकीइस मुश्किल कां जवाब केसेदूं। उसने जोँ कहा उससे मुझे उसके टीचर केँ प्रति क्रोध आया। दूसरी ओर नंदिता केँ दुःखी चेहरे कों देखकर मुझेउस पर्र दया आँ गई। मे उसके प्रश्न केँ संग अपनेहोश मे आया।
मे उसकीपीठ पऱ हाथ रखकरउसे समझाने लगा "देखो, नंदिता, तुमने मुझे जोँ कुछ बताया हैं, उससे मे स्तब्ध हूं। मुझेलगा कि मेरी नंदिता अभि बहोत छोटी हैं। मगर पहलीबार मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे मनमें ऐसे अजीब विचार हें। फिरभी, किसीतरह अच्छा हि हुआ कि तुम् नें येसभी मुझसे शेयर किया। मे तुम्हारे पिताजी कों अच्छी तरह सें जानता हूं। अगर उन्हें इस बारे मे पताचला, तौ वोँ अपनासिर फोड़ लेंगे। तुमने मुझसे पूछा हैं। नहि तौ इस उम्र कि लड़कियों सें कोई भि इसतरह कि बात नहि करता हें। उनकेसगे चाचा भि नहि। "
नंदिता नें मेरे सीने पऱ सिर टिकाकर कहा"चाचू, यह तोँ आपके सिवा मुझेकोई नहि बता सकता थां। एक् आप् हि हें जोँ मेरीबात ठीक सें सुनते हें। अब बताइए कि ये मेरेसंग क्याँ हुआ हैं?"
मे उसकीपीठ पर्र हाथफेर कर कहनेलगा "बेटी नंदिता, जब लड़के-लड़कियां उम्र मे आते हें, तौ उनकेबदन मे हार्मोनल परिवर्तन केँ कारण जिस्म पऱ कुछ जगहों पऱ बालउग आते हें। लड़कों कि मूंछें औऱ दाढ़ी बढ़ जाती हें। लड़कों औऱ लड़कियों केँ बगल औऱ जांघों मे बालबढ़ जाते हें। येसभी सामान्य हैं। " मगर कभी-कभी लड़कियों केँ सीने पऱ भि बालउग आते हें। तौ कोई लड़की हिजड़ा नहि। हिजड़ा वो हैं जौ नं तौ पुरुष हैं औऱ न् हि स्त्री। मगर शायद तुम्हारे टीचर कों ये नहि पता होगा। अन्यथा वो तुम् जैसी खूबसूरत लड़की कां अपमान नहि करता।
मेरा मतलब हैं कि, चाचू क्याँ आपको लगता हैं कि मे हसीन हूं?" बीच रास्ते मे नंदिता नें मुझसे पूछा। "हाँ, तुम् खूबसूरत हौ औऱ तुम्हारा फिगर भि अब बहोत अच्छा हैं" मैंने जवाब दिया। वो शरमा गई औऱ बोलीं, "फिगर कां मतलब मेरा सीनाकुछ अधिकबढ़ गय़ा हैं चाचू। ?" उसकेइस प्रश्न पऱ मैंने कुछ नहि कहा। फिन उसनेकहा, "मेरी छाती कां उभारइस तरहबढ़ गय़ा हैं। मेरे सारी सहेलियां मुझे चिढ़ाती हें कि सर नें मेरे स्तनों कों दबाकर बड़ाकर दिया हैं। मगरअसल मे सर नें मेरेइन स्तनों कों एक्-दो बार हि दबाया होगा, वे सिर्फ हलकेहाथ सें छूते थें। फिन मेरी छाती इतनी बड़ी क्यूं होँ गई हैं चाचू?"
नंदिता केँ इस मासूम प्रश्न सें मे परेशान हौ गय़ा। मगर उसके सारेशक मुझेदूर करने थें। मैंने उसे कहा"अरे नंदिता, किसी नें छाती दबाई तौ इसका मतलबये नहि कि बूब्ज़ बड़े होँ गए। तुम् इस मामले मे अपनी मां सें आगे निकल गई। " दरअसल, नंदिता कि मां यानी मेरी भाभी केँ ब्रेस्ट बहुत बड़े थें। नंदिता नें कहा जैसे उसकेसिर मे ट्यूबलाइट जल गई हौ, "मुझेअब ये एहसास हुआ"। "मगर चाचू, माँ केँ स्तनों पर्र बाल नहि हें। मैंने उन्हें कईबार कपड़े बदलते देखा हैं। तोँ मेरे स्तनों पर्र बाल क्यूं हें?" उसनेकहा
"अरे पागलहर स्त्री केँ मामले मे इसके अलग-अलग कारण होते हें। मुझे नहि पता कि तुम्हारी छाती केँ बाल कितने औऱ वास्तव मे कहां हें? मगरये शायद हार्मोनल असंतुलन केँ कारण हैं। " मैंने बताया।
बहोत बहोत धन्यवाद स्टोरी मे रुचि दिखाने केँ लिए अपने कमेंट जारी रखियेगा
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नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story – New Episode
Update 2
पहले एपसोड मे आपने पढ़ा कि नंदिता अपने छाती पर्र बढेहुए बालों केँ बारे मे अपने सबसे प्यारे तुषार चाचू सें खुलकर बातकर रही थि,
अबआगे।
नंदिता मुस्कराते हुएकहा "चाचू, मेरी छाती पर्र एक् नज़र डालिए नां? आपने बचपन मे मेरेबदन कां सभीकुछ देखा होगा। मुझे बताएं कि क्याँ मेरे सीने केँ बाल सामान्य हें। " मैंने झिझकते हुए “नहि” कहा। "नंदिता तुम् अब बड़ी होँ गई होँ। अब तुम्हारे सीने कों देख्ना मेरेलिए सही नहि हैं। बल्कि डॉक्टर कों दिखाओ" मैंने सुभहबस मे देखेहुए उसके बड़े स्तनों कों याद करतेहुए कहा। मे जोखिम नहि लेना चाहता थां। मगर नंदिता नें तभी अपना शर्टउठा लिया औऱ मुझे अपने सीने पऱ उछलने कों आतुरथन दिखाये। मे बेबसी सें उसके चेहरे कों देखने लगा। उसकीपीठ दीवार पऱ लगे लैम्प कि ओर थि। इसलिये मे स्तनों कां आकार तौ देखपा रहा थां मगरबाल नहि।
"यहाबाल कहां हें? मुझेकोई बाल वगैरह नहि दिखरहा। अब अपना शर्ट नीचेकर लो। " मैंने उससेकहा। मगर उसनेकहा, "देखो नाँ, चाचू। आप् क्याँ कररहे हें?" तौ नंदिता नें दीये कि रोशनी मे दोनों हाथों सें अपने स्तनों कों पकड़कर मेरे चेहरे केँ सामने ला दिया। उसके स्तनों पऱ प्यारे गुलाबी नुकीले निप्पल थें। उसतरफ कां डार्क सर्कल बहुत बड़ा थां। वहां कि स्कीन हल्की सि सिकुड़ गई थि। घेरे केँ चारों ओर हल्के मगर भूरेबाल उगआए। मेराहाथ अनजाने मे उसके बालों कों छूने केँ लिएउठा मगर जैसे हि मे उसके मम्मों केँ पासआया तौ मुझेहोश आँ गय़ा औऱ मैंने अपनाहाथ रोक लिया।
उसने मेरेइस व्यवहार पर्र ध्यान दिया होगा। उसनेकहा "चाचू, यहा छूकर देखिये नाँ। यहा कितने बालउग आए हें। मैंने उन बालों कों कितनी बार काटा हैं, मगरवे फिन सें उगआते हें। " तौ उसने मेराहाथ पकड़कर अपने सीने सें लगा लिया। उन बालों कों छूते हि मेरी उंगलियों मे गुदगुदी हौ गई। नंदिता केँ निप्पल सख्त हौ गए क्योंकि उँगलियाँ बालों केँ संग उसके निप्पल कों भि छूने लगीं। मे एक् उंगली सें उसके बूब्ज़ केँ बालों पर्र अपनी उंगली फिराने लगा। मैंने उससेकहा, "नंदिता, तुमने अपनेबाल काटे हें, इसलिये सख्त होँ गए हें। मगर यहांसब औरतों केँ थोड़े थोड़े बाल होते हि हें। "
"मगर चाचू, मेरे तौ औऱ जगहों पऱ भि अधिकबाल हें। देखो मेरे पैरों पर्र कितने बाल हें। " तौ उसने अपनी स्कर्ट उठाई औऱ मुझे अपनेपेर केँ बाल दिखाने लगी। दरअसल, उसके नितंबों औऱ जांघों पर्र भि बालउग आए थें। मैंने उसकी पैंटी सें बाल निकलते हुए देखे थें। मुझेअब यकीन होँ गय़ा थां कि नंदिता बालों वाली लड़की हैं। मगरउसे अच्छा महसूस कराने केँ लिए मैंने कहा, "अरे पागल, जिस्म पर्र ज्यादा बाल होने सें दर्द नहि होता। कई पुरुषों कों ऐसी बालों वाली लड़कियां पसन्द आती हें। " मेरी लुंगी मे फिन सें उठने वाले तंबू सें वोँ जान गई होगी कि मुझे भि बालों वाली लड़कियां पसन्द हें।
नंदिता मुझसे पूछने लगी"चाचू, क्याँ आपको बालों वाली लड़कियां पसन्द हें?" मैंने कहा, "देखो नंदिता, प्रश्न ये नहि हैं कि मुझे क्याँ अच्छा लगता हैं। औऱ मे तुम्हारा चाचू हूं, तुम्हारे पिता समान हूं। तोँ ये उचित होगा कि तुम् मुझसे ऐसे प्रश्न नं पूछो। "
मे पूछती हूं कि क्याँ गलतहुआ? जब आप् मेरे पैंटी कों देखरहे थें तोँ आपकी लुंगी मे कितना बड़ा तंबूबन गय़ा थां। मुझेपता हैं कि आप् बालों वाली लड़कियों कों मनपसंद करते हौ। मेरेसर जब मेरे शरीर पऱ हाथ फेरते तौ उनकी पैंट मे भि वैसा हि तंबू खड़ा होँ जाता। औऱ हाँ चाचू, मेरे पैंटी केँ अंदर भि बहुतबाल हें। इन्हें कितनी भि बार काटाजाए, ये बार-बार बढ़ते हि जाते हैं। कितनी खुजली होती हैं। क्याँ यहबाल हमेशा केँ लिए नहि हट सकते चाचू?" नंदिता केँ प्रश्न सें मे चौंक गय़ा।
मैंने उससे गुस्से मे कहा"क्याँ अब तुम् मुझेवहा केँ भि बाल दिखाने कां इरादा रखती होँ?" नंदिता मुस्कुराई औऱ बोलीं, "जैसे आपने मुझेकभी बच्चे केँ रूप मे नहि देखा होगा। देखिये यहा कितने बालउग आए हें औऱ मुझे बताइए कि क्याँ यह नॉर्मल हें। " तोँ एक् झटके मे उसने अपनी पैंटी उतारी औऱ अपनी स्कर्ट उठाई औऱ गद्दे पर्र लेट गई।
उसका नग्नरूप देखकर मुझे औऱ बुरालगा। मुझे नहि पता थां कि नंदिता मासूमियत सें मुझे अपनी योनि पर्र उगेबाल दिखारही थि याँ मुझे रिझाने केँ लिए अपनी योनिखोल रही थि। मगरये सच थां कि वो बहोत आगे निकल चुकी थि। उसे अच्छा महसूस कराने केँ लिए, मैंने उसकी योनी पऱ उगरहे घने बालों कों अपनेहाथ मे पकड़ लिया औऱ उसे खींच लिया। "थोड़ा धीरे-धीरे सें चाचू"अब वोँ मुझसे मिन्नतें कररही थि।
"बेशर्म लड़की! मुझे अपनी पैंटी दिखारही होँ! रुको तुम्हें सबक सीखाता हूं " मैंने उसकी झांटों कों जोर सें खींचा। वो रुंवासी होकर बोलि "प्लीज चाचू, मेरेबाल छोड़दो। " वो मेरेहाथ कों छुड़ाते हुएभीख मांगने लगी। अंत मे मैंने उसेछोड़ दिया। मगर उसनेफिन भि मेराहाथ थामाहुआ थां। वो मेरेहाथ सें अपनी योनि कों सहलाने लगी। नंदिता मुँह सें आहें भरतेहुए मेराहाथ अपनी बुर पऱ रगड़रही थि। मैंने अपनाहाथ घसीटकर हटा लिया।
मैंने उसेकहा "क्याँ कररही हौ, नंदिता? लगता हैं उस टीचर नें तुम्हें बहोत बुरीआदत डाल दि हैं। मैंने सोचा थां कि तुम् मासूम होँ। औऱ तुम् मेराहाथ अपनी योनी पर्र रगड़रही हौ?"
नंदिता नें उठकर मुझेगले सें लगा लिया। "चाचू, कितना अच्छा लगता थां जब वोँ सर मेरेऊपर हाथ फेरते थें। फिन मैंने अपनी योनि कों अपने हाथों सें सहलाना सीखा। अब जब आप् वहांछू लिया तोँ मुझेरहा नहि गय़ा। मुझेमाफ़ कीजिये। "
मगरइस वजह सें मेरा लन्ड बहोत सख्त हौ गय़ा थां। नंदिता नें उधरनजर डालते हुएकहा "चाचू, मे आपको इतना परेशान कररही हूं नाँ। ये आपके लुंगी मे तम्बू क्यूं उठरहा हैं?"
अब तक जौ हुआ उससे मे हैरान थां। उसने स्वयं मुझे अकेला छोड़ दिया थां। मैंने अपने चाचा-भतीजी केँ रिश्ते कों भूलते हुएकहा ‘’तुम्हारे ऐसे व्यवहार सें मे उत्तेजित होँ गय़ा हूं। इसलिये तम्बू उठ गय़ा हैं’’
"अरे चाचू, मुझे दिखाइए कि ये कैसा हैं। क्याँ मैंने आपको अपनी जांघ केँ बाल नहि दिखाए?" तौ नंदिता नें अपनाहाथ बढ़ाया औऱ मेरे सख्त लन्ड कों लुंगी मे सें पकड़ लिया.ये लड़की बहोत शरारती औऱ बिंदास थि। मैंने भि अब तक कां सब्र एक् तरफरख दिया औऱ उसके थनों पर्र हाथ रखकर उन्हें दबाने लगा। लुंगी कि गांठ खोलकर उसने मेरे लन्ड कों आज़ादकर दिय। औऱ "अहाहा, चाचू आपका कितना बड़ा हें?" औऱ उसने लन्ड कों पकड़कर दबाना शुरुआत कर दिया।
मैंने उसे अपनेपास खींच लिया औऱ उसेचूम लिया। एक् हाथ सें उसके नितम्बों कों दबाता रहा। मैंने उसेकहा "तुमने यह क्याँ किया, बेबी? तुमने मेरीकाम वासना कों जगा दिया। मे अब औऱ बर्दाश्त नहि कर सकता। मे क्याँ करू?"
उसने मुझसे कहा "चाचू, मुझे भि ऐसा हि लगरहा हैं। देखिये यहा नीचे कितना गीला हैं। " तौ उसने मेराहाथ अपनी बुर पऱ लेँ रख लिया। मैंने उँगलियों सें चेक किया। दरअसल, उसकी बुर भि गीली औऱ कामरस सें लबालब थि। बुर केँ दोनों पलकअलग होकर कांपरहे थें। जैसे हि मैंने उसेछुआ, नंदिता नें कहा, "अहह सि!" इसतरह चिल्लाते हुए मुझसे चिपक गई। मैंने उससे पूछा कि क्याँ हुआ। नंदिता नें मादक आवाज़ मे कहा, "चाचू, कितनी देर सें मे चाहती थि कि कोई मुझे वहां स्पर्श करे। जब आपकेहाथ नें छुआ, तोँ ऐसालगा जैसे मेरेबदन मे बिजली चमक गई हौ। "
इधर मेरी मर्दानगी उसके हाथों मे फड़फड़ा रही थि। उसनेगौर किया। "अरे चाचू, आपका लौड़ा भि मेरी बुर कि तरह गीला हैं। ऐसा क्यूं हुआ चाचू?" वोँ अभि भि मुझसे अपनी मुश्किलें पूछरही थि। “देख बेटा, तूने जोँ मुझे अपना नंगा शरीर दिखाया नाँ यहसभी इसी कां नतीजा हैं, औऱ तुम् भि कामुक हौ गई हों औऱ तुम्हारी बुर सें पानीबह रहा हैं। अब हमें एक् दूसरे सें अलग सोना चाहिए। नहि तौ आज मेरे हाथों कुछ बुरा होगा" मैंने कहा। मे अभि भि अपनी नन्ही नंदिता केँ संग संभोग करने केँ बारे मे सोच भि नहि पारहा थां। मैंने अपनी शॉर्ट फिन सें पहनकर लुंगी बाँधली।
मगर नंदिता नें कहा "चाचू, आप् बचपन सें हि मेरे सबसे लगभगरहे हें। मैंने आपसेसभी कुछ सीखा हैं। अब मुझे नहि पता कि मेरे दिमाग़ मे क्याँ चलरहा हैं। मैंने कभी किसी पुरुष कां लन्ड नहि देखा। आप् मुझे अपना लन्ड ठीक सें देखने दीजिये चाचू। " इसे मेरी पढाई केँ नए अध्याय केँ रूप मे सोचें। मुझे अच्छा लगेगा अगर मेरे जिन्दगी कां ये तजुर्बा मुझे आप् सें मिलेगा। मुझे मुझे सेक्स केँ बारे मे सभीकुछ समझाएं।
मे दो मिनटचुप रहा। ये सोचकर कि येअब जवानी कि दहलीज पर्र हैं। मेरी नंदिता कि जीवन बर्बाद होँ जाएगी अगरउसे कमीने टीचर जैसाकोई औऱ मिलजाए। अगर मे उसेयौन शिक्षा दूं, तौ वो आसानी सें किसी बुरी नीयत वाले शख्स केँ चंगुल मे नहि फंसेगी। मैंने रिश्ते कों भूलकर उसकीओर “हाँ” मे सिर हिलाया। मगरकहा कि मे उसेसभी कुछ सिखाने केँ लिएऐसा कररहा हूं। औऱ वो कुछदेर केँ लिए मुझसे अपना नाताभूल जाए औऱ मुझसे सारी शंकाएं पूछ लेँ। मगरहद सें आगे बढ़कर मेरेसंग कुछ करने कि उम्मीद नाँ रखे।
नंदिता उसकेलिए सजधजकर थि। उसनेकहा कि वो पहले मेरे लौडे कों ठीक सें देख्ना चाहती हैं। मे लुंगी खोलकर गद्दे पर्र लेट गय़ा। उसने मेरा शॉर्ट नीचे खींचा। जैसे हि वो आज़ाद हुआ, लवडाउछल कर सीधेछत कि ओर सीधा खड़ाहुआ। नंदिता नीचे झुकी औऱ अपना चेहरा लौडे केँ पास लें आई औऱ उसे जिज्ञासा सें देखा "कितना बड़ा औऱ सख्त हौ गय़ा हैं। आपकायह हमेशा खड़ा क्यूं नहि रहता?"
"अरे पगली, अगर यह हमेशा खड़े रहेगा तोँ हम् मर्दों कि कैसी फजीहत हौ जाएगी? सभी तंबू लेकर घूमेंगे। इतनी उत्तेजना केँ बाद हि वो खड़ा होता हैं। "
"क्याँ मे इसेछू सकती हूं, चाचू?" उसने अपने होठों कों गोल करतेहुए पूछा। जैसे हि मैंने इजाजत दि, उसने मेरे लपकते हुए लन्ड कों अपने छोटे-छोटे हाथों मे थाम लिया। उसकेहाथ केँ भार सें चमड़ी पीछेसरक गई औऱ लौडे कि लाल टोपी बाहर् आकरखुल गई। नंदिता नें उसे अचरजभरी निगाहों सें देखा औऱ कहा, "ये क्याँ हैं चाचा? येलाल लाल क्याँ हैं जौ आपके लौडे सें निकला हैं?"
"इसे टोपी कहते हें। जबयह नार्मल होता हैं, तोँ ये त्वचा कि आड़ मे छिपा होता हैं। जैसे हि तनने लगता हैं, येइसतरह बाहर् निकल जाता हैं। " मैंने उसके ज्ञान मे इजाफा किया। "मगर जब चाचू उत्तेजित हौ जाते हें तौ लवडा इतना कठोर क्यूं होँ जाता हैं?" नंदिता नें चमड़ी कों ऊपर-नीचे करतेहुए कहा। "पगलीये इसलिये सख्त होँ जाता हैं कि इसे आसानी सें स्त्री केँ बुर मे डालाजा सके। एक् नरम लौड़ा बुर मे केसे जायेगा?" मैंने उससे पूछा।
ये सुनकर नंदिता, जौ इतनीदेर सें मेरे लौड़े केँ संगखेल रही थि, सचमुच शरमा गई। लौड़ा कों हिलाना रोकते हुए उसने शरमाते हुएकहा "तोँ इतनाबड़ा लौड़ा बुर मे चला जाता हैं चाचू? कितनी तकलीफ होती होगी?" "पागल लड़की, तकलीफ होने केँ बावजूद लड़कियां इसको खुशी-खुशी अपनी बुर मे लेती हैं। वोँ भि कमर उचका उचकाकर ऊपर सें धक्के देकर। इसके बिनामजा नहि आता। जब तुम्हारा समय आएगातब पता चलेगा, " मे उसकी शंकाओं कां समाधान किया।
"मे अपनी बुर मे इतना बड़ा लौड़ा नहि लेना चाहती। मुझे इससे बहोत डर लगता हैं। " नंदिता नें अपनीनाक साफ करना जारीरखा औऱ कहा, "औऱ आपका लौड़ा जौ पानीछोड़ रहा हैं ताकि बुर मे आसानी सें जासके, हैं नाँ?" "शाबाश बेबी, तुमने ठीक पहचाना। इसलिये तुम्हारी बुर सें पानीटपक रहा हैं, " मैंने कहा। नंदिता नें अपना चेहरा मेरे लौड़े केँ एकदम लगभगला दिया। नाक सें उसकीमहक लेनेलगी।
"पर्र चाचू, माँ जबहर महीने अलग बैठती हैं तौ पिताजी केँ कमरे मे नहि सोती। तोँ क्याँ उस वक़्त लौड़ा बुर मे नहि डलवाती?" उसका प्रश्न सही थां। मैंने उससेकहा कि मासिक धर्म केँ दौरान औरतेऐसा नहि करना चाहतीं। इस पर्र उसने एक् औऱ शंका उठाई, "फिन पुरुषों कां लौड़ा इतना कठोर नहि होता होगा। हैं नं चाचू?" मैंने एक् मुस्कान केँ संगकहा, "नहि बेटा, ऐसा नहि हैं। पुरुषों कां लिंगकभी भि खड़ा होँ सकता हैं। मगरअगर औरतों कों मासिक धर्म हौ रहा हैं, तौ वे बुर मे लन्ड नहि लें सकती हें, मगर पुरुष अन्य तरीकों सें इसकामजा लें सकते हें। "
कैसा हैं चाचू?" उसने आश्चर्य सें पूछा। "अरे, उसकेलिए कई रास्ते हें। मैंने कहा, "औरते पुरुषों कि कामेच्छा कों अपने हाथों सें हिलाकर याँ उन्हें अपने मुंह मे लेँ कर संतुष्ट करती हें। " इसबात पऱ नाक-मुँह सिकुड़कर बोलीं, छी! क्याँ चाची भि आपके लन्ड कों मुहँ मे लेती हें?" मैंने कहाहाँ, "मत पूछो कि तुम्हारी चाची मेरे लन्ड कों कितने मजे सें चाटती हें। पऱ सब औरतेऐसा नहि कर सकती हें। "
जैसे हि मैंने येकहा, नंदिता चौंकगईं। वो हमेशा पढ़ाई औऱ खेल मे अव्वल आती थि। किसी भि मामले मे दूसरों सें पीछे रहनाउसे मनपसंद नहि थां। वो मुझसे पूछने लगी "चाचू, क्याँ मे आपकेइस कड़क लन्ड कों अपने मुंह मे लेँ लूं?" जैसे हि मैंने कहा “नहि”, उसनेजिद करना शुरुआत कर दि। "चाचू प्लीज मुझे एक् बार लेने दीजिए। सब औरतें इसे लेती हें तौ मे क्यूं नहि लेँ सकती? प्लीज चाचू। " उसकीजिद केँ आगे झुकने कि मेरीआदत औऱ इस टाइम मेरेबढ़ी हुइ उत्तेजना केँ कारण, मैंने आखिरकार उसे हामीभर दि।
नंदिता, मेरे साथी कि बेटी, नन्ही नंदिता, जोँ मेरे कंधों पऱ पली-बढ़ी थि, झुकी औऱ अपने गुलाबी होठों कों गोल करकेहुए मेरे लन्ड कि टोपी अपने मुँह मे लेनेलगी। टोपी उसके होठों केँ चम्बू सें बहोत बड़ी थि। नंदिता नें लन्ड सें निकले हुए पानी कों अपने होठों पऱ लगाया औऱ अपने छोटी सि जीभ सें चाटा औऱ एक् बार टोपी कों मुंह मे लेने कि कोशिश कि। मैंने उससेकहा, "नंदिता, अगर तुम्हें ये पसन्द नहि हैं, तोँ अपने मुंह मे औऱ लन्ड मतलो। "
उसनेउस पऱ जोश मे बड़ेजोर सें लन्ड पर्र अपना मुंह दबाया, औऱ आधे सें ज़्यादा लन्ड निगल लिया। इससे अधिक अन्दर जा हि नहि सकता थां। मगर उसने अपने मुंह मे लियाहुआ आधा लन्ड भि बाहर् नहि निकाला। मे उसकी पीड़ा देख सकता थां। मैंने कहा, "बेटी नंदिता, इसेऐसे मुँह मे रखकर बैठना नहि रहता। नहि तौ तुम्हारे मुँह मे दर्द होगा। चूसते टाइम अंदर बाहर् करना पड़ता हैं। तभी व्यक्ति कों मजाआता हैं। "
फिन उसने लवड़ा निकाला औऱ मेरे लन्ड केँ पानी केँ संगथूक कों भि निगल लिया, फिन सें लन्ड कों अपने मुँह मे लिया औऱ चूसने लगी। उसनेइसे अपने मुँह मे गहराई तक लें जाकर चुस्ती रही जिससे उसकीलार कि चपचप कि आवाज़ कमरे मे गूँजरही थि। चूसते-चूसते उसकेबाल लन्ड पऱ आगे आँ गए, उसे हाथों सें हटाते हुए नंदिता लन्ड कों चूसती रही। उसने अपना एक् हाथ मेरे सें लन्ड कों सहारा देरखा थां। उसकी हथेली मेरे अंडकोष कों उसके मुँह कि ऊपर-नीचे हरकत सें रगड़रही थि। उधर शर्ट अभि भि खुला होने सें उसकेथन बाहर् हि थें। हरबार जब उसने अपना मुँह नीचे किया, तोँ उसके बड़ेथन मेरी आँखों केँ सामने चमकरहे थें।
अंत मे, ये खुशी बहोत ज़्यादा हौ गय़ा औऱ मैंने कण्ट्रोल खो दिया। मैंने अपनी नन्ही नंदिता केँ बाल पकड़कर उसका मुँह लन्ड पर्र दबा दिया औऱ नीचे सें धक्के लगाना शुरुआत कर दिया। अचानक हुएइस हमले सें नंदिता सन्नरह गई। उसकी सांसफंस गई। वो अपने बालों कों खोलने केँ लिए जद्दोजहद करनेलगी। मेरेहाथ कों नाखून सें काटने लगी। मगर मैंने उसे नहि छोड़ा। मैंने उसे वैसे हि दबाते हुए उसका मुंहचोद दिया। एक् झटके मे मेराबचा हुआआधा लन्ड भि नंदिता केँ छोटे सें मुँह मे समा गय़ा। मेरे लिंग सें वीर्य कां एक् पिचकारी निकलकर उसकेगले तक पहुँची तब मे अपनेहोश मे आया।
मे अपना लन्ड खिंचने लगा पऱ नंदिता नें अबउसे अपनेहाथ सें कसकर पकड़रखा थां। मैंने आधा लन्ड उसके मुँह मे रहने दिया औऱ मेरा लन्ड वहींबचा हुआमाल छोड़ता रहा। पूरीतरह सें शांत होने केँ बाद, मेरा लन्ड उसके मुँह सें निकलते हि नरम पड़नेलगा।
जैसे हि उसका मुँह खालीहुआ, नंदिता नें बोलने केँ लिए अपना मुँह खोला औऱ मेरा वीर्य उसके मुँह सें निकल गय़ा। वीर्य उसकी ठुड्डी सें उसके शर्ट पर्र छलकने लगा। मगर जब मे उस पर्र हंसने लगा तौ नंदिता कों क्रोध आँ गय़ा"ये क्याँ थां चाचू? मेरादम घुटरहा थां। क्याँ कोईऐसा करता हैं? जाओ मे आपसेफिन कभीबात नहि करूंगी। " नंदिता गुलाबी गुलाबी गालों केँ संग मुझसे बातकर रही थि औऱ मे उसके चेहरे पर्र फैले अपने चिपचिपे पानी कों निहार रहा थां।
दोस्तों आज केँ लिए इतना हि मगर जिद्दी नंदिता कि जिज्ञासा इन चाचा-भतीजी केँ रिश्ते कों किसहद तक लेँ जायेगी? हमेआगे ये भि देख्ना हैं,
दोस्तों कमेंट जरूर कीजियेगा
बहोत बहोत धन्यवाद स्टोरी मे रुचि दिखाने केँ लिए अपने कमेंट जारी रखियेगा
बहोत बहोत धन्यवाद कथा मे रुचि दिखाने केँ लिए अपने कमेंट जारी रखियेगा
नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story – New Episode
स्टोरी केँ अपडेट्स रेग्युलर आयेंगे, क्षमा कीजियेगा,
मे फोरम पऱ अभि नया हूं, पहलीबार कुछ पोस्ट किया हैं, थोडा सेटिंग्स समझने मे वक्तलग रहा हैं। इसलिये भाग मे देरी हौ गई।
नंदिता, मेरेयार कि बेटी | incest desi sex story - Aage kya hua? Next part padhiye
बहोत हसीन औऱ कॉमिक शुरुआत। लगता हैं बहोत हि बढ़िया रहेगी। पऱ एक् हि रिक्वेस्ट हैं एपसोड लगातार देते रहें।
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