पाप ने बचाया - Village sex story - Full Story Part 1
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पाप ने बचाया - Village sex story – New Episode
"रजनी", "ओ रजनी बिटिया" जरा एक् लोटा पानीला, जोर कि प्यास लगी हैं", - देहात कां सरदार उदयराज अपनेसिर सें गेहूं कां बोझ जमीन पऱ गिराकर, अंगौछे सें अपना पसीना पोछते हुए अपनी बिटिया कों आवाज़ लगतेहुए बोला।
रजनी- "लायी बाबू"
(Hello दोस्तों नमस्ते मे हूं S_Kumar, ये मेरी पहली किस्सा हैं, आप् लोगों कि तरह कहानियों कां शौकीन मे भि हूं, बहुत दिनों सें कहानियां पढ़ताचला आँ रहा हूं। आज सोचा क्यूं नं मे भि एक् किस्सा लिखूं।
मे कोई professional writer नहीं हूं औऱ नं हि मैंने कभीकोई कथा लिखी हैं, तोँ अगरकोई गलती हौ तौ माफ कीजियेगा औऱ अगर अच्छी लगे याँ नं भि लगे तौ भि comment कीजियेगा।
ये किस्सा हिंदी font मे होगी जिसकी एक् छोटी सि झलक आप् लोग शुरुआत मे हि देख चुके हें, औऱ हांये स्टोरी पारिवारिक संबंधों पर्र आधारित हैं तोँ जिसको भि ऐसी कहानियां नहीं मनपसंद वोँ कृपया न् पढ़ें। ये किस्सा सामाजिक नियमों केँ खिलाफ हैं, पारिवारिक रिश्तों पर्र आधारित हैं, ये पुर्ण रूप सें काल्पनिक हैं वास्तविकता सें इसका कहींकोई संबंध नहीं, अगर कहींकोई संबंध पाया गय़ा तौ वो बस एक् संयोग हि होगा। इस कथा मे बताएगए कोई भि तंत्र मंत्र याँ टोना टोटका याँ कोई विधिबस एक् कल्पना हें वास्तविकता सें इसकाकोई संबंध नहीं।
इस किस्सा कां update मे 2 याँ 3 दिन केँ अंतराल पे दूंगा अगरकोई जरूरी काम याँ किसी औऱ चीज़ मे busy नं हुआ तौ, औऱ अगरहुआ तौ यह अंतराल औऱ भि बढ़ सकता हैं औऱ इसकेलिए भि मुझेमाफ़ कीजियेगा। )
तौ चलिएफिन किस्सा कों आगे बढाते हें---
Update-1
बात बहोत पहले कि हैं उत्तर प्रदेश मे कहीं दूर-दराज एक् बहोत हि पिछड़ा हुआ देहात थां-विक्रमपुर। बहोत हि पिछड़ा हुआ इशलिये क्योंकि ये एक् बहोत बड़ीनदी केँ दूसरी तरफ थां। शहर सें इसकाकोई खास लेना देना नहीं थां। कुल मिलाकर 100-200 घऱ होंगे वोँ भि बहुत दूर-दूर थें।
नदी केँ किनारे होने कि वजह सें देहात बहोत हि हराभरा थां। ये देहात बहोत बड़े जंगल सें चारों तरफ सें घिराहुआ थां। ये देहात कई दशकों पहले औऱ भि बड़ाहुआ करता थां, आज जौ इस देहात मे केवल 100-200 घऱ हैं वहीं एक् समयइस देहात मे 1000-1500 घऱहुआ करते थें, जोँ कि आज केँ समय मे सिमटकर सिर्फ 100-200 घऱ हि रहगए थें।
मगरऐसा क्यूं? आखिर क्याँ ऐसा होँ रहा थां
इस देहात मे जौ परिवार केँ परिवार धीरे-धीरे धीरे-धीरे ख़त्म हौ रहे थें। बहोत तेजी सें नहीं बल्कि बहोत धीरे-धीरे धीरे-धीरे, एक् बार कों अचानक सें देखने मे नहीं लगेगा परंतु जबकोई देहात कां बाहरी इंसान गौर सें इस देहात कि दशकों पुरानी हिस्ट्री सें दूसरी जगहों कि तुलना करता तोँ वोँ भि सोच मे पड़ जाता कि आखिरऐसा क्यूं?
माना कि मौतहर स्थान होती हैं, जौ इस दुनियां मे आया हैं उसे जानां हि हैं, मगरहर स्थान एक् balance maintain हैं। लोगमर रहे हें तौ बच्चे पैदा भि होँ रहे हें। एक् पीढ़ी गुजररही हैं तोँ नई पीढ़ी आँ भि रही हैं।
परंतु इस देहात मे मृत्यु दर बहोत ज़्यादा थि औऱ जन्मदर नाम केवल।
देखने मे लोग बिकुल स्वस्थ रहते, नं जानेकब केसे धीरे-धीरे धीरे-धीरे बीमार पड़ते औऱ चले जाते, इस देहात केँ लोगजब बाहरी दुनिया मे इलाज कराने जाते तौ report मे कहींकुछ नहींआता। वैसे तौ जल्द इलाज़ केँ लिए जाते नहीं थें क्योंकि इस देहात केँ लोग थें- रूढ़िवादी, अन्धविश्वासी औऱ वोँ झाड़ फूंक, मे ज़्यादा विश्वास रखते थें।
इस देहात केँ लोगों नें जानबूझ केँ भि अपने आप् कों दीन दुनियां सें अलगकर रखा थां। इसका पहला कारण तोँ यह हि थां कि ये देहात चारों तरफ जंगल सें घिराहुआ थां, नदी केँ दूसरी छोर पऱ थां औऱ.औऱ.इस देहात केँ लोगों कों सबसे अधिक नफरत थि- गलत चीजों सें, जैसे-गलत काम करना, झूठ केहना, किसी कां दिल दुखाना, बेईमानी करना, कोई भि गलतकाम, गलतसोच, गलत विचार, भावना किसी केँ मन मे नहीं थि, जैसेकोई जानता हि नहीं थां इनसभी चीजों कों। यही mein वजह थि जौ इस देहात केँ लोग बाहरी दुनिया सें अधिकमेल जोल नहीं रखना चाहते थें क्योंकि उस देहात केँ अलावा हर स्थान गलत चीज़ें थि, गलतकाम थां, गलतसोच थि, गलत भावना थि। यूँसमझ लीजिये हर स्थान कलयुग थां औऱ इस देहात मे सतयुग थां।
मगर सोचने वालीबात यह हैं कि ऐसा देहात मे क्याँ थां कि परिवार केँ परिवार धीरे-धीरे धीरे-धीरे ख़त्म होँ रहे थें, नं कोई महामारी, न् कोईरोग, न् कोई आक्रमण, नं कोई दंगा फसाद, फिन ऐसा क्याँ थां? ऐसा नहीं हैं कि देहात केँ लोग इससे अनजान थें वोँ जानते थें कि कुछ तौ इस देहात मे गड़बड़ हैं, परंतु उनकेपास इसकाकोई इलाज नहीं थां, उनकेपास कोई मार्ग नहीं थां इससे बाहर् निकलने कां, इसलिये देहात केँ लोगों केँ मन मे कहीं नं कहीं किसी कोने मे एक् उदासी सि रहती थि।
परंतु ऐसा क्याँ थां, जिसकी वजह सें ऐसा हौ रहा थां, वोँ आपकोआगे इसकथा मे पता चलेगा---
Update-2
दोस्तों ये स्टोरी दो मुख्य किरदार केँ इर्द गिर्द हि रहेगी, किस्सा मे कुछ औऱ किरदार भि आएंगे आगे चलकर, किस्सा कां हीरो देहात कां सरदार हि हैं।
कथा केँ मुख्य पात्र-
उदयराज- उदयराज विक्रमपुर देहात कां सरदार हैं, उसकी उम्र 44 वर्ष हैं, वो बहोत हि नेकदिल औऱ ईमानदार इंसान हैं। 20 वर्ष कि उम्र मे हि उसकी विवाह विमला सें हौ गई, थि, जौ अबइस दुनियां मे नहीं हैं।
विमला सें उसके 2 बच्चे हुए, 1 लड़का औऱ 1 लड़की, जब वो 22 वर्ष कां थां तब लड़का पैदाहुआ जिसका नामअमन रखा गय़ा थां, जोँ अभि 7 वर्ष पहलेइस दुनिया सें चला गय़ा उसी रहस्यमयी वजह सें जोँ देहात मे थि। उदयराज जब 23 वर्ष कां थां तब विमला कों 1 बेटी पैदा हुई जिसका नाम रजनीरखा गय़ा। रजनीअमन सें एक् वर्ष छोटी थि।
इस वक़्त वोँ अपनी बेटी केँ संग हि रहता हैं लगभगकुछ सालों सें।
उदयराज देहात कां सरदार तौ थां हि संग हि संग वो एक् तजुर्बेदार किसान भि थां, खेतों मे स्वयं हि साराकाम संभालने कि वजह सें उसकाबदन बहुत बलिष्ट थां, हाइट काठी ऊंची थि, रंग थोड़ा सांवला थां, धूप मे अक्सर कड़ी मेहनत करने कि वजह सें भि होँ गय़ा थां।
उदयराज कों खेती करना बहोत मनपसंद थां, खेतों मे वोँ अकेला हि लगा रहता थां, लोग कहते भि थें कि उदयराज कुछ व्यक्ति वगैरह रख लियाकरो काम मे सहायता होँ जाया करेगी तोँ वोँ कहता कि इतना तौ मे अकेले हि कर लूंगा, जब मुझे लगेगा कि कामबस केँ बाहर् हैं तोँ रख लूंगा।
खेतीबाड़ी मे ज़्यादा टाइम देने सें वोँ सरदार कां कामकम हि संभाल पाता थां, परंतु उसका स्वभाव अत्यंत सरल औऱ अच्छा होने कि वजह सें स्वयं देहात वालों नें उससेकहा रखा थां कि "सरदार तोँ हमारे तुम् हि होगे उदयराज, भले हि तुम् सरदार कां साराकाम अपनेपरम यार बिरजू सें कराओ, पऱ सरदार तौ तुम् हि होँ"
उदयराज भि गांववालों सें इतना सम्मान मिलने पऱ उनकादिल नहीं दुखाना चाहता थां इसलिये वो देहात कां सरदार बनाहुआ थां पऱ अधिकतर काम उसकायार बिरजू हि देखता थां।
रजनी- रजनी कि उम्र 21 वर्ष थि, उसका शादी होँ चुका थां उसकी एक् छोटी बेटी भि थि (यह बहोत किस्मत कि बात थि क्योंकि देहात मे बच्चे बहोत मुश्किल सें होँ रहे थें)।
रजनी अपनी मम्मी कि तरह बहुत गोरी थि। बला कि हसीन, हाइट काठी मे सुडौल थि, भरा पूरा यौवन थां उसका, बड़े बड़े मम्मों, चौड़े औऱ भारी नितम्ब, वोँ एक् अत्यंत मादकबदन कि मालकिन थि, उसकीचाल तोँ अलग हि कहर ढाती थि। पऱ उस देहात मे कोई भि मर्द याँ लड़का कभी भि किसी परायी लड़की याँ औरत कों बुरीनज़र सें नहीं देखता थां औऱ न् हि कभीकोई ऐसा विचार अपनेमन मे लाता थां, जैसेयह सभीगलत विचार उन्हें पता हि नहीं थां। इतने शरीफ थें इस देहात केँ लोग।
जौ औरत विधवा होती थि याँ अपने पति सें किसी भि वजह सें दूर रहती थि औऱ जोँ पुरुष विदुर होते थें जिनकी पत्नि कि मृत्यु हौ गयीँ, होती थि वोँ कामाग्नि मे जलजलकर जिंदगी बिता देते थें पर्र कभी परायी महिला याँ पुरुष कों कभी गंदी याँ गलत निगाह सें नहीं देखते थें।
रजनी कां पति थोड़ा सनकी थां औऱ शारीरिक रूप सें रजनी सें कमजोर थां, उसेऔरत मे कोईखास रुचि नहीं रहती थि, नं हि उसे सेक्स पसन्द थां, उसके अंदर बहोत बचपना थां, विवाह केँ इतनेसाल बाद तक भि कभीऐसा नहींहुआ कि उसने रजनी कों सेक्स मे चरमसुख दिया हौ, यौनसुख केँ लिए रजनी हमेशा हि प्यासी रहती थि, पऱ क्याँ करे महिला थि कुछकह भि नहीं सकती थि लोकलाज कि वजह सें। इसवजह सें उसका पति उसकी नज़रों मे उतरता चला गय़ा, पर्र ऐसा नहीं थां कि वोँ अपने पति कि इज़्ज़त नहीं करती थि बसयह थां कि वोँ यह उम्मीद छोड़ चुकी थि कि उसका पति कभीबैड पे उससेरगड़ रगड़ केँ संभोग करेगा, जिससे वोँ सन्तुष्ट होँ सकेगी। क्योंकि वो अबयेजान चुकी थि कि उसके पति मे इतनी ताकत हि नहीं थि कि वोँ उस जैसी सुडौल औऱ भरे शरीर वाली स्त्री कि प्यास बुझासके।
उसकी यौवन कि रसीली गहराइयों केँ अंतिम छोर तक उसका पति नं तौ अभि तक पहुच पाया थां औऱ न् हि कभी पहुंच पायेगा यह वोँ जानती थि, उसकी पूरी गहराई कों नापने केँ लिए एक् बलिष्ट मर्द कि जरूरत थि, औऱ वोँ कभी भि किसी भि कीमत पर्र पराये मर्द केँ बारे मे सोच भि नहीं सकती थि, याँ यूंमान लोउसे पता हि नहीं थां कि व्यभिचार भि कोईचीज़ होती हैं। इसलिये वोँ अब इसको अपना क़िस्मत मानकर कामाग्नि मे जलरही थि।
पऱ रजनी थि बहोत हंसमुख औऱ चंचल स्वभाव कि। एक् बेटी हौ जाने केँ बाद भि उसका बचपना नहीं गय़ा थां।
(रजनी केँ पति औऱ उसके ससुराल केँ बारे मे औऱ अन्य पात्र केँ बारे मे विस्तार सें अगलेभाग मे)
पाप ने बचाया - Village sex story – New Episode
Update-3
रजनी केँ ससुराल वाले इतनेनेक औऱ भले इंसान थें कि जब उसके भइया कि मौत हुइ तौ उन्होंने रजनी कों अपने मायके मे हि रहने कों बोल दिया थां ताकि रजनी केँ पिता कों कोई दिक्कत याँ तकलीफ़ नं होँ, उनको एक् सहारे कि जरूरत थि, औऱ बाप कों एक् बेटी सें अच्छा सहारा कौनदे सकता हैं, आप् लोग तौ जानते हि हें कि बेटियां बाप कि लाडली होती हैं। बेटियां बाप सें ज़्यादा गहराई सें जुड़ी होती हैं अक्सर बेटे केँ मुकाबले।
बेटेअमन कि मौत केँ बाद उदयराज बहोत अकेला होँ गय़ा थां, उनको एक् सहारे कि जरूरत थि इसलिये रजनी केँ ससुराल वालों नें रजनी कों इतनीछूट तक दे दि कि वोँ चाहे तोँ उम्रभर अपने मायके मे रहकर अपने पिता कि देखभाल करे।
रजनी केँ ससुराल मे भि कम हि लोग थें, उसके सासू माँ-ससुरजी, (रजनी केँ ससुरजी कां नाम बलराज थां), देवर जी देवरानी औऱ उनका एक् बेटा (जोँ बड़ी हि मुश्किल सें कई मन्नतों केँ बाद पैदाहुआ थां)।
जब रजनी केँ भइया कि मृत्यु हुइ औऱ उसके मायके मे ससुराल मे हर स्थान गमहीन माहौल थां, औऱ उसके पिता उस वक़्त बिल्कुल अकेले रहगए थें तौ एक् दिन उसके ससुरजी नें घऱ केँ आंगन मे साम कों जबसभी लोग बैठे थें, रजनी कों बुलाकर यहबात कह दि-
बलराज- बहू, बड़ी बहूजरा इधर आनां बेटी, तुमसे कुछबात कहनी हैं।
(कुछदेर प्रतीक्षा करने केँ बाद भि जबबहू नहींआई तौ उन्होंने बगल मे बैठी अपनी पत्नि सें कहा)
बलराज- लगता हैं बहू नें सुना नहीं, जरा तुम् जाकर आवाज़ लगा देना, किसीकाम मे व्यस्त हैं क्याँ शायद?
बलराज कि पत्नि- हां लगता तोँ हैं, घऱ केँ पीछे कि तरफ जानवरों कों चारा तौ नहींडाल रही, रुको मे बुलाकर लाती हूं।
फिन रजनी कि सासुउसे बुलाकर लायी औऱ बलराज नें सब केँ सामने उससेयह कहा कि बेटी देखो तुम्हारे पिता मेरे समधी होने केँ संगसंग एक् परम दोस्त भि हें, तोँ मेरायह फर्ज बनता हैं कि मुसीबत कि घड़ी मे मे उनकेकाम आऊं, अब जब तुम्हारा भइया भि इस दुनियां मे नहीं हैं तौ वोँ बहोत अकेले पड़गए हें, उन्हें एक् सहारे कि बहोत जरूरत हैं, यह तौ तुम् जानती हि हौ।
उन्होंने आगेकहा- देखो बेटी कोई भि पिता याँ मां कभी भि अपनी बेटी केँ ससुराल मे रहकर जिंदगी नहीं बिताना चाहेगा औऱ नं हि बिताता हैं वार्ना मे उनको यहीं बुला लेता।
(रजनीसिर नीचे करके चुपचाप सुनरही थि, बगल मे उसके देवर जी देवरानी भि बैठे थें, बस उसका पति हि वहां नहीं थां, वोँ कहां थां अभि थोड़ीदेर मे बताऊंगा)
बलराज आगे बोला- तोँ मेरी प्रिय बड़ीबहू मैने औऱ तुम्हारी सासू नें यहां तक कि तुम्हारे देवरु देवरानी नें भि यही सोचा हैं कि अगर तुम् चाहो तौ उम्रभर अपने मायके मे रहकर अपने पिता कि सेवाकर सकती हौ औऱ उनका ख्याल रख सकती होँ, क्योंकि हम् लोग उनका दर्द बहोत अच्छे सें महसूस कररहे हैं औऱ तुम् भि कर हि रही होगी, आखिर बेटी हौ तुम् उनकी।
ये तुम्हारी ख़्वाहिश पऱ निर्भर करता हैं तुम् यहा रहना चाहो तौ यहांरहो औऱ अपने पिता जी केँ पास रहना चाहो तोँ वहांरह सकती हौ उम्रभर। मगरऐसा अपनेमन मे कभी गलती सें भि मत सोचना कि यहां कि धन दौलत, जमीन जायदाद तुम्हे नहीं मिलेगा, जौ हिस्सा तुम्हारा हैं वोँ तुम्हारा हि हैं तुम् चाहे यहांरहो याँ न् रहो, क्योंकि गलत तौ कभीइस देहात मे सदियों सें नहींहुआ औऱ आगे भि नहीं होगा शायद, बेटी शायद शब्द मैंने इश्लिये लगाया क्योंकि भविष्य कां किसी कों नहींपता, पर्र तुम्हारे संगकभी गलत नहीं होगाजब तक मे जिंदा हूं।
अब तुम्हारे पति कों हि देखलो हमे क्याँ पता थां कि यह नालायक निकलेगा, जिसको अपने परिवार कि कोई फिक्र नहीं, अपनी पत्नि कि कोई फिक्र नहीं, वोँ कहां हैं, कब आएगा, सही सलामत हैं भि याँ नहींकुछ नहींपता, उसकी नालायकी औऱ बेफिक्री केँ कारण हि मैंने जमीन जायदाद कां जौ तुम्हारे हिस्से कां हैं वोँ पहले हि तुम्हारे नामकर दिया हैं, मुझेउस पऱ विश्वास नहीं, उसको मे अपना बेटा नहीं मानता, जब उसने मेरीफूल जैसीबहू कों, हम् सबको इतनादुख दिया हैं, तौ मे भि उसेअब अपना बेटा नहीं मानता। तुम् स्वयं हि देखो पिछले 8 9 महीने सें बिना किसी कों कुछ बताये कहां चला गय़ा पता नहीं, कुछ सूत्रों सें सुनने मे मिला कि शहरभाग गय़ा हैं।
(इतना सुनते हि रजनी कि आंखों सें आंसू बहनेलगे, वोँ घूंघट कियेहुए थि, वोँ अपने आपको संभाल नं सकी औऱ जबयह सुना कि उसका पति शहरभाग गय़ा तोँ आंसूबह निकले, फिरभी वोँ बहोत हंसमुख स्वभाव कि थि, धैर्यवान थि पऱ ऐसीखबर सुनके इंसान रो हि पड़ेगा न्)
उसकी सासू माँ नें उठकरउसे गले सें लगा लिया औऱ बोलि- नं बेटी न्, रोना नहीं मेरी बेटी, औऱ उसकेसिर कों सहला सहलाकर चुप कराने लगी
बलराज- बेटी तूँ फिक्र मतकर उसको उसके किये कि सजा तोँ परमेश्वर देगा हि, यह मेरादिल कहता हैं कि आने वाले वक़्त मे तुम्हें भरपूर सुख मिलेगा, तूँ चिंता मतकर, बस इस टाइम जोँ पहाड़ हम् सबकेसिर पे टूटा हैं उससे संभालना हैं। ये मेराघऱ हैं औऱ इसघऱ मे जब तक मे जिंदा हूं मेरी हि चलेगी, बेटी तुँ पूरीतरह आजाद हैं अपनी मनमर्जी कि जीवन जीने केँ लिए, तेरेऊपर कोई बंधन नहीं हैं तुँ चाहे जहांरह सभी तेरा हि हैं।
मे अपने साथी उदयराज सें बातकर लेता हूं कि तुँ अब उसकेसंग हि मायके मे रहेगी, उनकी सेवा करेगी, देखभाल करेगी, नहीं मानेंगे तौ मे मना लूंगा सभी समझा केँ, क्योंकि यहां तौ तेरी सासू हैं, देवरानी हैं देवरु हैं, उनकेपास कौन हैं कोई नहीं, तुम्हे उनकेपास होना चाहिए। मे बात करता हूं उनसे पऱ तुकुछ बोल तोँ सहीबस रोयेजा रही हैं, अपनीमन कि बात तोँ बता बेटी।
इतना सुनते हि रजनी रोतेहुए अपने ससुरजी केँ पैरों मे पड़ गयीँ, औऱ बोलीं- मे धन्य हूं जोँ आप् जैसे पिता समान ससुरजी मुझे मिले, जिन्होंने मुझे इतनीछूट दे दि कि मे उम्रभर भि अपने मायके मे अपने बाबूजी केँ संग रहूं तोँ भि उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं, मे धन्य हूं पापा।
रजनी नें आगे बोला-कौन बेटी नहीं चाहेगी कि वोँ अपने बाबूजी केँ संगरहे बस मुझेयही चिंता होती थि कि आप् लोगों कि सेवा कां फल मुझे नहींमिल पायेगा।
बलराज- नहीं बेटी ऐसा नहीं हैं इतनेदिन तूने हमारी सेवा तौ करली न् अब वहां उनको तेरी जरूरत हैं, हम् धन्य हैं तेरी सेवा सें, औऱ तेरी जैसीबहू किसी कों सौभाग्य सें हि मिलती हैं, बसयह मेरा बेटा हि नालायक निकला।
(इतने मे रजनी कि देवरानी बोलीं)
रजनी कि देवरानी- दिदी आप् फिक्र मत कीजिये हम् सभी हैं यहा, संभाल लेंगे, कोई तकलीफ़ नहीं होगी, आप् वहां देखिए औऱ संभालिये।
बलराज- ठीक हैं बेटी मे कल हि उदयराज सें बातकर लेता हूं
(औऱ फिन रजनी कि सासू माँ उसकी देवरानी भावुक होकर एक् दूसरे सें लिपटकर रोनेलगी, औऱ बहुतदेर बाद जाकर एक् दूसरे कों सांत्वना देकरचुप हुईँ, रजनी केँ ससुरजी औऱ देवरु भि भावुक होकर वहां सें उठकर बाहर् चलेगए)
(अगलेदिन बलराज नें उदयराज सें अपनेमन कि बातकही, बहुत न् नुकुर केँ बाद उसने उदयराज कों मना लिया औऱ रजनी उसके अगले हि दिन अपनी बेटी केँ लेकर अपने मायके अपने बाबूजी केँ पास आँ गयीँ, उनकेसंग रहने, उनकी सेवा करने)
(रजनी नें इससमय अपने पति केँ बारे मे क्याँ सोचा, कि वो उनके बगैर केसे रहेगी औऱ वोँ आँ गय़ा तोँ क्याँ होगा, रजनी नें अपना ससुराल छोड़कर अपने मायके मे अपने पिता केँ संग रहने कां निर्णय लेने मे देरी क्यूं नहीं कि, औऱ रजनी केँ ससुरजी नें ऐसा क्यूं बोला कि "मेरादिल कहता हैं कि आने वालेसमय मे तुम्हारी तरफ भरपूर सुख मिलेगा" इसके बारे मे अगले एपसोड मे)
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