Romance लव स्टोरी - rajkumar ki jawani - Full Story Part 1
लव कहानी / राजवंश
“दो हजार सें.शो.” राज नें सामने वाले खिलाड़ी कि आंखों मे देखते हुएकहा।
“दो हें किधर?” सामने बैठा खिलाड़ी आंख मारकर मुस्कराया।
“अभि मंगवाए देता हूं.मरा क्यूं जाता हैं?”
“उस्ताद येजुआ हैं.जुए मे तौ बाप-बेटे भि एक्-दूसरे पर्र विश्वास नहि करते.इसमें उधार कां धंधा नहि चलता। ”
“बड़ा अधीर हैं दोस्त!” राज मुस्कराया, “दस हजार जीतकर भि तेरापेट नहि भरा। ”
“भिखारी कि झोली हैं.जितनी भरो थोड़ी हैं.”
इस वाक्य पर्र इर्द-गिर्द बैठेसब व्यक्तियों नें ठहाका लगाया। राज भि हंसने लगा। अनिल नें भि जेब सें बटुआ निकालते हुएकहा, “लेँ मेरे राजकुमार! अपनेपास तोँ हजार मे सें पांचसौ हि बचरहे हें.”
पांचसौ केँ नोट अनिल नें राज केँ सामने ऐसे फेंकदिए जैसे अपनी हि जेब मे रखेहों। राज नें खुद अपना पर्स खोला औऱ बोला, “लेँ सातसौ मेरे पर्स मे सें भि निकलआए। ”
“साढ़े तीनसौ इधर भि हें.” कुमुद नें मेज पऱ कुछनोट डालदिए।
“तोँ क्याँ साढ़े चारसौ मेरेपास नहि निकलेंगे अपने राजकुमार केँ लिए, ” धर्मचन्द नें अपनीजेब मे हाथ डालकर सौ-सौ केँ पांचनोट मेज पर्र रखकरढेर मे सें दस-दस केँ पांचनोट उठालिए।
राज नें असावधानी सें सभीनोट इकट्ठे किए औऱ सामने डालता हुआ फकीरचन्द सें बोला, “लें बे फकीरे.साले दो हजार केँ लिए भरोसा नहि कररहा थां.अरे, मेरे इतने साथी हें तौ मुझे क्याँ चिन्ता.शो करदेअब.”
फकीरचन्द नें ठहाका लगाकर, अपनी जांघ खुजाई औऱ बोला‒
“शो कराने केँ बाद तुम् सभीधन उठा लेना राजकुमार। येखेल कां नियम होता हैं.एक्-दूसरे केँ सामने डटेहुए खेल मे नम्र बर्ताव नहि चलता.खेल केँ बाद हारेहुए औऱ जीतेहुए एक्-दूसरे केँ गले मे बांहें डालकर चलते हें.तूँ तोँ वैसे भि अपना दोस्त.दोस्त हैं.शो कराकर हार भि जाए तौ पूरे रुपया उठा लेना। ”
“तौ शोकरदे नाँ.” राज सिगरेट होंठों सें लगाता हुआ बोला, “देर क्यूं कररहा हैं?”
इसी टाइम अनिल नें जेब सें लाइटर निकालकर राज कि सिगरेट सुलगाई औऱ फकीरचन्द नें पत्ते मेज पर्र डालते हुएकहा‒
“.लोतीन बादशाह.”
राज नें एक् लम्बी सांस ली.मुस्कराकर बोला, “जीत गय़ा तुँ.इधर सबसे बड़ा गुलाम हैं.सत्ता औऱ अट्ठा हैं.”
फकीरचन्द नें ठहाका लगाया औऱ नोट अपनीओर समेटलिए। राज केँ चेहरे पऱ हल्का-सां भि किसी चिंता याँ खेद कां चिन्ह न् थां। उसने सिगरेट कां कश खींचा औऱ मुस्कराकर उधर देखने लगा जिधर संध्या खड़ी हुई मुस्करा रही थि। उसकी मुस्कराहट मे भि एक् शिकायत थि। राज सिगरेट होंठों सें निकालकर मसलता हुआ बोला, “अच्छा यारो.तुम् खेल जारी रखो.मे जरा अपनी रूठी हुईँ तकदीर कों मनालूं.”
“मनाओ दोस्त! ज़रूर मनाओ.” अनिल ठंडी सांस लेकर बोला, “ऐसी सुन्दर तकदीर किसको मिलती हैं?”
राज सिगरेट ऐश-ट्रे मे मसलकर उठ गय़ा। संध्या नें उसे अपनीओर आते देखा तौ क्रोधित मुद्रा मे कंधों कों झटककर आगेबढ़ गई। राज नें कंधे कों सिकोड़कर ढीला छोड़ते हुए पैकेट सें दूसरा सिगरेट निकाला औऱ उसे होंठों मे दबा लिया। फकीरचन्द नें झट उठकर लाइटर जलाया औऱ इसी वक़्त उसकी झोली सें कुछ पत्ते सरककर नीचेगिर गए। राज नें चौंककर पत्तों कि ओर देखा। दहला, दुक्की औऱ चौका थां। अचानक राज केँ नथुने गुस्सा सें फूलगए औऱ आंखें अंगारे उगलने लगीं। फकीरचन्द नें घबराकर पत्तों कि ओर देखा.औऱ उसी क्षण लड़खड़ा कर कुर्सी समेत पीछेउलट गय़ा। राज कां उठाहाथ जोर सें उसकेगाल पऱ पड़ा।
“बेईमान.कमीने.निर्लज्ज.” राज बड़बड़ाया।
“क्याँ हुआ प्रिंस?” अनिल तेजी सें राज कि ओर बढ़ा।
“क्याँ बात होँ गई?” धर्मचन्द नें घबराकर कहा।
राज दोनों हाथमेज पर्र टेककर उछला औऱ दूसरी ओरकूद गय़ा। उसने फकीरचन्द कों कमीज केँ गिरेबान सें पकड़कर ऊपर उठाया औऱ एक् हाथ सें तड़ातड़ उसके गालों पऱ चांटे जड़ता हुआ बोला, “लहू पी जाऊँगा तेरा.मुझे कपटी, कमीने, बेईमानों सें घृणा हैं.”
“मारलो दोस्त! मारलो.” फकीरचन्द अपने होंठ कां लहू पोंछकर मुस्कराया, “यारयार केँ हाथों हि पिटता हैं। ”
“चलो छोड़ो प्रिंस!” अनिलराज केँ कंधे पऱ हाथ रखकर बोला, “मित्र हि तोँ हैं.माफ़ करदो.। ”
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“जानेदो राज!” धर्मचन्द नें राज केँ कोट कां कालर ठीेक करतेहुए कहा, “तुम्हारा क्याँ बिगड़ गय़ा दस-पांच हजार मे.?”
कुमुद आगे बढ़कर राज कि बो कां कोणठीक करनेलगा। राज नें नई सिगरेट निकालकर होंठों सें लगाली औऱ अनिल नें सिगरेट सुलगा दि। कुमुद नें फकीरचन्द सें कहा, “अब खड़ा-खड़ा क्याँ देखरहा हैं भोन्दू.माफ़ मांग प्रिंस सें.”
“मेरा कौन-सां मान घटता हैं माफ़ मांगने सें.” फकीरचन्द रूमाल सें होंठ कां लहू पोंछकर मुस्कराया, “कोई दूसरा आंख उठाकर भि देखता तोँ उसकी आंखें फोड़ देता.लेकिन ये तोँ अपना दोस्त हैं.औऱ मार लेँ.” उसनेराज कि ओर देखा औऱ बोला, “मारेगा, प्रिंस?”
“माफ़कर दिया.”राज नें सिगरेट कां कश घसीटकर असावधानी सें कहा, “लेकिन याद रखना, यदि अबऐसी बेईमानी कि तोँ गर्दन तोड़ दूंगा। ”
“अब इसकी आवश्यकता हि नहि पड़ेगी प्रिंस! आज तोँ यदि मे येदस हजार नं बना लेता तौ नय्या हि डूब जाती मेरी। तुम् तौ जानते हि होँ मे कोई बहोत बड़ा व्यक्ति नहि हूं.छोटी-मोटी कपड़े कि दुकान चलाता हूं.जिन थोकमाल बेचने वालों सें हिसाब-पुस्तक हैं उनकादस हजारचढ़ गय़ा थां। दुकान कुर्क होने वाली थि। जुआ तोँ यूं हि हंसी-हंसी मे खेल लिया.वरना मांगता भि तुम्हीं सें.”
“देखा प्रिंस.” अनिल मुस्कराया, “कितना भरोसा हैं इस तुम्हारी मित्रता पऱ.अब तोँ गलेलगा लो.”
राज नें मुस्कराकर फकीरचन्द कों गलेलगा लिया औऱ उसकागाल सहलाता हुआ बोला, “बहोत चोटलग गई हैं मेरेलाल केँ.”
सभीहंस पड़े औऱ फकीरचन्द भि खिलखिलाकर राज सें लिपट गय़ा।
अचानक म्यूज़िक कि मधुर तरंगें वातावरण मे फैलगईं औऱ राज चौंककर हॉल कि ओर देखने लगा। फिन उन लोगों सें हटकर वो हॉल कि ओरबढ़ गय़ा.शेष साथीफिन मेज़ केँ गिर्द बैठगए।
राजहॉल मे आया तोँ सामने हि संध्या उसकीओर पीठकिए खड़ी थि। राज उसके समीप पहुँचा तौ संध्या नें मुंह मोड़ लिया। राज नें गर्दन झटकी औऱ आगेबढ़ गय़ा। एक् गोल मेज़ सें आवाज़ आई, “हैलो.प्रिंस.”
“हैलो.”राज नें आवाज़ कि ओर बिना देखे उत्तर दिया।
फिन एक्-एक् करकेकई मेज़ों सें हैलो-हैलो कि आवाज़ें उभरीं.औऱ राज बिना ध्यान दिए सबको उत्तर देता एक् खिड़की केँ पास जाकररुक गय़ा।
म्यूज़िक कि तरंगें धीरे धीरेबह रहीथीं औऱ हॉल मे ट्यूबलाइट कां चांदनी-जैसा प्रकाश छिटका हुआ थां। खिड़की केँ पास हि रात कि रानी केँ महकते हुए पौधे चुपचाप गुमसुम खड़े थें.राज नें सिगरेट कां आखिरी कश घसीटकर सिगरेट खिड़की सें बाहर् फेंक दि। उसी टाइम पीछे सें संध्या नें उसके कंधे पर्र हाथरखा। राज बिनाउसे देखे कठोर स्वर मे बोला, “क्यूं आई हौ मेरेपास?”
“इधर देखो तोँ बताऊं.”
राज धीरे-धीरे-सें संध्या कि ओर मुड़ा। संध्या नें उसकी आंखों मे देखकर हल्की-सि मुस्कराहट केँ संगकहा, “सुकून नहि पड़ता तुम्हें रूठे देखकर.”
“फिनखुद क्यूं रूठ जाती होँ?”
“इसआशा पर्र कि शायद तुम् कभीखुद हि मनालो। ”
“ये जानते हुए भि कि.”
“कि तुम् किसी कों नहि मनाते.” संध्या आंखें मींचकर खोलती हुई मुस्कराई।
“कठोर हृदय हौ नाँ.आज तक तुम्हें हि सभी मनाते चलेआए हें.तुमने कभी किसी कों नहि मनाया.तुम् क्याँ जानो किसी कों मनाने मे कितना आनन्द आता हैं.”
“अच्छा.” राज नें संध्या कि आंखों मे देखकर कहा, “तोँ एक् बारफिन रूठकर देखो.मे देखूंगा कि कितना आनन्द आता हैं मनाने मे.”
“नहि.” संध्या राज केँ कंधे सें सिर लगाकर बोलीं, “अब मे तुमसे कभी नहि रूठूंगी.डरती हूं, किसीदिन तुम् रूठे हि रहगए तौ मे कहीं कि नं रहूंगी.”
“सच.!”राज कि मुस्कराहट गहरी होँ गई।
“काश! तुम्हें मेरे प्रेम पर्र विश्वास आँ सके.”
“यदि विश्वास न् होता तौ इतने फूलों मे सें मे तुम्हें नं चुनता.” राज धीरे-धीरे-सें बोला, “आओ येकाठ केँ फर्श कां हृदय तुम्हारे चांदी केँ सें पैरों तले धड़कने कों व्याकुल हैं.”
“याँ एक् राजकुमार केँ कोमल चरणों कों चूमने केँ लिए.”
राज नें संध्या कि कमर मे हाथडाल दिया औऱ दोनों वहीं सें साज कि ध्वनि पर्र नृत्य करतेहुए काठ केँ फर्श कि ओर बढ़ने लगे.एक् मेज़ पऱ बैठेहुए जोड़े नें उन्हें देखा औऱ औरत नें एक् ठंडी सांसली।
“हायराम! कितने खोए-खोए हें एक्-दूसरे मे.”
“काश!कभी तुम् भि इसीभाव सें मुझे देखतीं। ”
“हां! तुम्हें.तुममें औऱ राज मे कौन-सि बात एक् हैं?”
“तौ फिन तुमने मुझे किसलिए चुना थां?”
“इसलिये कि राज नें संध्या कों चुन लिया थां। ” महिला हंस पड़ी।
पुरुष नें बुरा-सां मुंह बनाकर शराब कां गिलास होंठों सें लगा लिया औऱ चुस्कियां लेनेलगा। एक् दूसरी मेज पर्र बैठेहुए जोड़े मे सें औरत नें कहा, “ओह.राजकुमार हैं.बिल्कुल राजकुमार.”
“करोड़पति हैं नां.” पुरुष बुरा-सां मुंह बनाकर बोला, “तुम् स्त्रियों कों हर वो शख्स राजकुमार दिखाई देता हैं जोँ रुपया पानी केँ समान बहाए.”
“औऱ तुम् पुरुष हरऐसे शख्स सें इसलिये जल उठते होँ कि किसीबात मे उससे होड़ नहि लेँ सकते.”
“तौ जाओ नाँ, हाथथाम लो उसका.”
“जब भि संध्या नें छोड़ा ज़रूर थामने कां प्रयत्न करूंगी.”
राज औऱ संध्या साज पर्र झूमते-झूमते नाचने वालों कि भीड़ मे सम्मिलित हौ चुके थें.संध्या नें राज केँ कंधे सें सिर लगाकर आंखें बन्दकर लीं.उसके पैरखुद हि साज कि धीमीगति पर्र सर केँ संगउठ रहे थें।
“क्याँ सोचरही होँ.?” राज नें धीरे-धीरे-सें पूछा।
“कुछ नहि.एक् स्वप्न देखरही हूं.” संध्या गुनगुनाई।
“क्याँ? मे भि तोँ सुनूं.”
“हमारा ब्याह होँ गय़ा हैं औऱ हम् यहां सें दूर स्विटजरलैण्ड केँ सुन्दर वातावरण मे ‘हनीमून’ मनारहे हें.”
“येकोई स्वप्न हैं.ये तौ अर्थ हैं पगली.हमारे प्रेम केँ स्वप्न कां.”
“जौ शायदकभी साकार नं हौ सके.”
“हत्.अब दिन हि कितने रहगए हें इस स्वप्न कों साकार होने मे.मात्र दो महीने बाद परीक्षा हैं.परीक्षा ख़त्म होते हि सफलता कि जश्न मे हमारी सगाई कि घोषणा हौ जाएगी औऱ कुछ टाइमबाद ब्याह.”
“तुम्हें परीक्षा मे अपनी सफलता कां इतना विश्वास हैं?”
“विश्वास मेरा नहि.मुझे पढ़ाने वालों कां हैं.वे लोग कहते हें कि जोँ शब्द मेरी दृष्टि सें एक् बार गुजरजाए उसे मे कभी नहि भूलता.बोलो तोँ पाठ्य-किताब कां कोई भि पाठ दोहराऊं.”
संध्या मुस्कराई, फिन ठंडी सांस लेकर बोलि, “फिन भि पांच-छः महीने तौ लगेंगे हि.”
“पांच-छः महीने तोँ पलक झपकने मे हि बीत जाएंगे.”
“औऱ इसपलक झपकने मे तुम् इस योग्य होँ जाओगे कि हम् स्विटजरलैंड तोँ क्याँ काश्मीर भि न् जा सकेंगे.”
“क्यूं? ऐसा क्यूं सोचती हौ तुम्?”
“तुमने येजुए कि लत जोँ डालली हैं.दस-बारह हजार सें कम हारकर तोँ कभीउठे नहि.औऱ फिनहर दिन खेलते हौ.”
“पचास करोड़ मे सें लाख-दो लाख निकल भि गए तौ क्याँ अन्तर पड़ेगा.?”
“तुम् ये क्यूं भूल जाते होँ कि पचास करोड़ तुम्हारे अधिकार मे नहि हें.इस धनराशि कां संरक्षक तुम्हारा बड़ा भइया औऱ तुम्हारी बेहन हैं.औऱ इसमें उनकाभाग भि तौ सम्मिलित हैं.”
“जय भैया.” राज ठंडी सांस भरकर मुस्कराया, “वे तोँ मेरे भि संरक्षक हें.डैडी नें प्राण त्यागते टाइम मेराहाथ भैया केँ हाथ मे थमाकर कहा थां.जय! ये तुम्हारा छोटा भइया हि नहि.आज सें तुम्हारा बेटा भि हैं.इसका भविष्य अब तुम्हारे हाथ मे हैं.मे इसे तुम्हारे आश्रय मे छोड़े जारहा हूं.इसका दुख मेरी आत्मा कों दुःख पहुंचाएगा.आज डैडी कों स्वर्गवासी हुएदस वर्षबीत चुके हें, लेकिन, भैया नें कभी मुझे पिता कां अभाव अनुभव होने नहि दिया.”
“औऱ भाभी नें भि.?”
“भाभी पराया खून हैं.उसने मुझे मम्मी कां स्नेह न् दिया तोँ क्याँ हुआ.वो मुझे उठते-बैठते हर वक़्त टोकती हैं.पर्र मे उसकीओर कभी देखता हि नहि.मेरा सभीकुछ जय भैया हि हें.”
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“औऱ जय भैया तुम्हारी भाभी केँ पति भि हें। राज, भाभी तुम्हारे भैया केँ जितनी निकट रहती हें उतनी निकटता तुम्हें प्राप्त नहि.” उठते-बैठते तुम्हें-टोकने वाली क्याँ जय भैया केँ कान तुम्हारे विरुद्ध नं भरती होगी.पत्नि वो चमत्कार होती हैं जोँ अपना प्रभाव धीरे धीरे दिखाती हैं.”
राज ध्यानपूर्वक संध्या कि ओर देखते हुए धीरे-धीरे-सें बोला, “क्याँ पत्नि ब्याह सें पहले हि होने वाले पति केँ गिर्द दीवार खींचना आरम्भ कर देती हैं?”
“क्याँ कहरहे होँ राज?”
“मे भैया कों देवता मानता हूं.औऱ देवताओं केँ पैरकभी नहि डगमगाते.”
उसी वक्त एकाएक एक् छनाके केँ संग म्यूज़िक थम गय़ा औऱ राज नें संध्या कां हाथ छोड़ दिया। दोनों भीड़ सें बाहर् निकल आए.राज आगे-आगे औऱ संध्या उसके पीछे.राज केँ चेहरे पऱ थकान-सि झलकरही थि।
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टेलीफोन कि घंटीबजी औऱ जय नें ऐनकठीक करतेहुए रजिस्टर पऱ उंगली दौड़ानी आरम्भ कर दि.उसके सामने मेज पर्र रजिस्टरों औऱ फाइलों कां ढेर थां.उंगलियों मे बुझाहुआ सिगार दबा थां औऱ टेबल-लैम्प केँ प्रकाश मे वो रजिस्टर चैककर रहा थां। टेलीफोन कि घंटी निरन्तर बजरही थि। जय धीरे-धीरे-सें बड़बड़ाया, “उफ्.फोह.क्याँ कष्ट हैं.” उसने ऊंचे स्वर मे पुकारा, “अरे भइया राधा.जरा देख्ना तोँ.”
“आँ रही हूं.” राधा कि आवाज़ आई।
जय कि दृष्टि निरन्तर रजिस्टर पऱ जमीरही। घंटी थोड़े-थोड़े वक्तबाद बजती रही.इतने मे पैर कि आहटआई औऱ राधा प्रवेश करतेहुए बोलीं, “टेलीफोन आपकीमेज पर्र हैं औऱ आप् बुलाते मुझे हें दूसरे कमरे मे सें.दो बजरहे हें.कब तक सिर खपाते रहेंगे यहां बैठकर.अपने स्वास्थ्य कां भि कुछ ध्यान करें.”
“ऊं.हूं.कर रहा हूं” जय वैसे हि रजिस्टर मे डूबाहुआ बोला।
राधा नें रिसीवर उठाकर कान सें लगा लिया औऱ बोलि, “कौन हैं?”
“भाभी.मे हूं.भैया कहां हें?”
“यहीं हें.”
“क्याँ कररहे हें?”
“अपने स्वास्थ्य कां ध्यान कररहे हें.तुम् कहां होँ? अब तुम् रात दो-दोबजे तक बाहर् रहनेलगे होँ?”
“ओह, भाभी.मे इस टाइम बड़ी उलझन मे हूं.भैया सें कहना तुरन्त सात हजार रुपये शामू केँ हाथ भिजवा दें.”
“खूब.सिर्फ सात हजार रुपये.?” राधा व्यंग्यात्मक स्वर मे बोलि।
“जल्दी भिजवा दो.”राज नें गम्भीर स्वर मे कहा।
राधा नें चोंगे पऱ हाथ रखकरकहा, “सुना आपने.? आपके लाडले नें सात हजार रुपये मंगवाए हें.तुरन्त.क्लब मे.?”
“चाबी दराज मे हैं.आलमारी खोलकर निकाल लो.मुझे डिस्टर्ब नं करो.”
जय नें उत्तर देकर बुझेहुए सिगार कां कश लिया औऱ होंठों सें इस प्रकार हवा निकाली जैसे धुआं निकलरहा होँ.राधा नें मुस्कराकर कहा, “सिगार बुझाहुआ हैं.”
जय नें चौंककर सिगार कि ओर देखा औऱ फिन मुस्कराकर तिपाई पऱ रखा लाईटर उठाकर बोला‒
“मेरा तौ दिमाग़ हि खराब होँ गय़ा हैं.तुम् मुझे टोकती नं रही तोँ मे किसीदिन गरमचाय कि प्याली केँ जगह पर्र स्याही कि दवात उठाकर मुंह सें लगा लूंगा.”
“जानती हूं.लेकिन इतनी व्यस्तता भि अच्छी नहि कि अपने लाड़ले सें इतना भि नं पूछें कि उसनेये सात हजार रुपये क्यूं मंगाए हें.”
“अरे हां.क्यूं मंगवाए हें.अभि कल हि तोँ उसने मुझसे दो हजारलिए थें.”
“दो हजार नहि तीन हजार.औऱ कल नहि आजसाम कों.”
“अरेहां, आजसाम कों.पूछो, पूछोउसे अब क्याँ आवश्यकता पड़ गई हैं?”
“ये भि कोई पूछने कि बात हैं?” राधा व्यंग्य सें बोलीं, “अब वो क्लब जानेलगा हैं.औऱ क्लब मे इतनी धनराशि कोका-कोला मे घोलकर नहि पी जाती.जुआ भि होता हैं वहां.”
“नहि.राज जुआ नहि खेलता.”
“पूछ लेती हूं.” राधा नें चोंगे सें हाथ हटाकर पूछा, “राज तुम्हारे भैया पूछरहे हें, साम हि कों तुम्हें तीन हजार रुपये दिए थें.इतनी जल्दसात हजार कि क्यूं आवश्यकता पड़ गई हैं?”
“भैया पूछरहे हें याँ तुम्?” राज नें उधर सें पूछा।
“यदि मे भि पूछलूं तोँ कोई अपराध नहि.”
“क्याँ अब मुझे अपने खर्च कां हिसाब भि देना होगा?”
“खर्च सीमा सें अत्यधिक बढ़जाए तौ उसका हिसाब मांगना हि पड़ता हैं.धन कोईजल कां सोता नहि होता जिसे खर्च करतेरहो औऱ वो बढ़ता रहे.”
“आप् टेलीफोन जय भैया कों दीजिए.” राज नें कठोर स्वर मे कहा।
राधा नें एक् झटके सें रिसीवर जय कि ओर बढ़ा दिया। जय राधा कों आश्चर्य सें देखता हुआकह रहा थां, “ये तुमने क्याँ किया? बच्चा हि तोँ हैं.बेचारे केँ मन कों ठेस पहुंची होगी.”
“हां.ठीक हैं.मे आप् दोनों भाइयों केँ बीच मे बोलने वाली होतीकौन हूं?” राधा गुस्स मे बोलि, “आप् उसकीठेस कां ध्यान करते रहिए ताकि किसीदिन वो आपको इतनी बड़ीठेस पहुंचाए कि आप् संभल न् सकें.आपके चौबीस घंटों मे सें बीस घंटेकाम करते बीतते हें औऱ उसकेबीस घंटे मनोरंजन मे.पिछले एक् महीने सें दस हजार रुपये उड़ा चुका हैं.जरा खाता उठाकर देखिए तोँ उसे कितना दे चुके हें.जब धन कां ये कुआं खाली होँ जाए तोँ आप् मुझे औऱ अपने बच्चे कों किसी अनाथालय मे भरतीकरा दीजिएगा.”
ये कहकर राधाझट कमरे सें बाहर् निकलआई। जय अवाक् टेलीफोन कां रिसीवर हाथ मे उठाएउस दरवाज़ा कि ओर देखता रहा जिधर सें राधा बाहर् गई थि। फिन उसने रिसीवर कान सें लगाया औऱ बोला, “राज.?”
Romance लव स्टोरी - rajkumar ki jawani - Kahani ab aur interesting hogi
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