Romance लव स्टोरी - rajkumar ki jawani – New Episode
राज नें शंकर केँ गैरेज केँ फाटक मे प्रवेश किया‒जिसमें एक् ओरशैड मे शंकर कि नौकरानी चूल्हा सुलगाकर रोटियां पकारही थि.दूसरी ओर एक् टीन केँ नीचे बेबी बैठीपढ़ रही थि। राजउस कोठरी कि ओर बढ़ा जिसमें उसका पलंगलगा थां.इसी वक़्त उसे शंकर कि आवाज़ सुनाई दि जोँ राज कों पुकार रहा थां। राज बेबी केँ पास सें गुजरकर उसकेसिर पर्र हाथ फेरता हुआ शंकर कों कोठरी मे पहुंच गय़ा। शंकर नें मुस्कराकर उसे देखा औऱ बोला, “आज केँ समाचार पत्र देखे तुमने?”
“नहि। ”
“लो देखो.”
शंकर नें ढेर सारे समाचार-पत्र राज केँ सामने डालदिए। राज एक्-एक् समाचार पत्र देखने लगा‒पहले हि पन्ने पऱ कई ढंगों मे राज कि तस्वीर छपी थि.संग हि कई शीर्षक थें जैसे‒‘विप्लवकारी दिमाग़ रखने वाला युवक मिस्त्री जिसने विदेशों केँ बड़े-बड़े इंजीनियरों कों दांतों तले उंगली दबाने पर्र विवशकर दिया। ’ ‘एक् युवक मैकेनिक जिसने वो पुर्जा बना लिया जिसेदेश कां कोई इंजीनियर नहि बनासका। ‘एक् युवक इंकलाबी जिसने लाखों कि दौलत ठुकराकर पूंजीपतियों कि दासता स्वीकार नहि कि। ’ शीर्षकों केँ नीचे पूरी खबरेथीं, राज केँ इन्टरव्यू थें.कुछ अखबारों नें राज कों सिरफिरा कहा थां.राज नें समाचार पत्र एक् ओर रखकर मुस्कराकर शंकर कि ओर देखा औऱ सिगरेट सुलगाने लगा। शंकर नें चुपचाप एक् बड़ी-सि गड्डी राज केँ सामने रखतेहुए कहा, “औऱ अंतिम समाचार ये हैं। ”
“नोट‒!”राज चौंककर शंकर कों देखने लगा।
“पूरेसाठ हजार!” शंकर मुस्कराया।
“साठ हजार!”राज कि पुतलियां आश्चर्य सें फैलगईं।
“ये न् पूछो तोँ अच्छा हैं कि यह कहां सें आए?” शंकर नें ठण्डी सांस लेकरकहा, “क्योंकि मुझेझूठ बोल्ना पड़ेगा। ”
राज नें ध्यान सें शंकर कों देखा औऱ उसके कंधे कों पकड़कर बोला“इधर देखो दादाजी! मेरी आंखों मे.तुमने अपना फ्लैट पगड़ी लेकर किराये पऱ दिया थां.याँ उसेबेच दिया?”
“राज.बेटा.” शंकर भारी आवाज़ मे बोला, “देर न् करोअब, ये राशि लेकर तुम् श्रीधर सिन्हा साहब केँ पास पहुंच जाओ। हमारे लिएअब वही सबसे बड़ी खुशी कां दिन होगाजिस दिन तुम् अपनी फैक्टरी कां उद्घाटन समारोह मनाओगे.”
औऱ राज आंखें फाड़े हुए शंकर कों देखता रह गय़ा।
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Romance लव स्टोरी - rajkumar ki jawani – New Episode
‘सुषमा प्रोडक्ट’ कां एक् बहोत बड़ा-सां बोर्ड फैक्टरी केँ फाटक पऱ रंग-बिरंगी रोशनियों मे झिलमिला रहा थां।
फैक्ट्री केँ फाटक केँ सामने एक् बहोत बड़े मैदान मे छोटा-सां पंडाल बनाहुआ थां जिसमें कुछ पंक्तियां कुर्सियों कि लगी हुइ थि जिन पर्र सुषमा प्रोडक्ट फैक्टरी केँ उद्घाटन समारोह मे चलाएगए चन्द एक् विशेष शख्स विराजमान थें। इनमें वे कारीगर भि थें जौ राज केँ संग शंकर केँ गैरेज मे काम करते थें। सबसे अगली पंक्ति मे बीच वाली कुर्सी पऱ मिस्टर सिन्हा बैठे थें। राज, शंकर औऱ चन्दर केँ संग एक् ओर खड़ाहुआ बातें कररहा थां। अचानक एक् गाड़ी फाटक पर्र आकर रुकी.शंकर नें जल्द सें कहा‒
“वो देखो.यह कौनलोग हें? बिठाओ जरा इन्हें.”
राजआगे बढ़ा.वाहन कि खिड़कियां खुलीं.औऱ राज केँ पुराने यार अनिल, धर्मचन्द, फकीरचन्द औऱ कुमुद नीचे उतरे। चारों नें तेजी सें बढ़कर राज कों घेर लिया। अनिलराज सें लिपटता हुआ बोला, “बधाई हौ राज! तुम्हें देखने कों तोँ आंखें तरस गई थीं.हम् तौ ड्रीम्स मे भि नहि सोचते थें कि हमारा दोस्त इतना छिपा रुस्तम निकलेगा.बस यही सुना थां कि तुम् कैब ड्राइवर बनगए होँ.आज सारादेश राज केँ गीतगा रहा हैं.इससे बड़ी खुशी कि बात हमारे लिए क्याँ हौ सकती हैं। ”
“आजकल समाचार-पत्रों मे आएदिन धड़ाधड़ तुम्हारे भाषण आँ रहे हें.हमारा तोँ मन बाग-बाग हौ जाता थां देख-देखकर” धर्मचन्द नें मुस्कराते हुएकहा।
“हम् तोँ येसोच रहे थें कि शायदइस समारोह मे तुम् हमें भि याद करोगे.” कुमुद नें बड़ी आत्मीयता सें कहा।
“तुम् लोगों कों तौ मे जिंदगी केँ किसीभाग मे भि नहि भूल सकता। ”राज कि मुस्कराहट औऱ गहरी हौ गई।
“आखिरयार हें नं.” फकीरचन्द मुस्कराकर बोला, “दोस्तों कों केसे भूलाजा सकता हैं। ”
“अरे दोस्त! ये खुला पंडाल बनवाया हैं तुमने?” अनिल बोला, “क्याँ पीने-पिलाने कां प्रबन्ध न् होगाइस समारोह मे.बिना पिए-पिलाए तौ खुशी कां कोई समारोह पूर्ण नहि होता.”
“पीने कां प्रबन्ध भि हैं। ” राज कि मुस्कराहट औऱ गहरी होँ गई। वो चन्दर सें बोला, “चन्दर! मेरे बहोत अच्छे टाइम केँ मित्र हें यह जिन्होंने मेरे फालतू वक़्त मे मुझेकभी बोर नहि होने दिया। इनकी देखभाल ध्यान सें करना.इन्हें लें जाकर कुर्सियों पर्र बिठाओ.एक्-एक् ठण्डा गिलास पानी पिलाओ.”
फिन इससे पहले कि उन लोगों मे सें कोई बोलता.एक् मर्सिडीज आकर रुकी। राज तुरंत मुस्कराता हुआ मर्सिडीज कि ओरबढ़ गय़ा। अनिल, धर्मचन्द, फकीरचन्द औऱ कुमुद आश्चर्य सें उसे देखते हुए कुर्सियों कि ओरबढ़ गए। मर्सिडीज कि खिड़की खुली औऱ उसमें सें पहले राजा कूदकर उतरा औऱ लपककर राज कि गोद मे चढ़ता हुआ बोला, “अंकल.अंकल डार्लिंग.”
“मेरा राजा बेटा.” राज नें राजा कों प्रेम किया।
फिनराज कि दृष्टि जय पऱ पड़ी। जय मुस्कराता हुआ वाहन सें उतरा थां.उसकी आंखों मे विजय कां भावझलक रहा थां.संग हि संग राधा भि उतरी जिसने डबडबाई आंखों सें स्नेह भरी मुस्कराहट सें राज कों देखा। राज मुस्कराया।
“आइएसेठ जयदास औऱ श्रीमती जयदास.मुझे प्रसन्नता हैं कि इस खुशी केँ समारोह मे सम्मिलित होने कि मेरी प्रार्थना कों आपने ठुकराया नहि। ”
“ये तुम् क्याँ कहरहे हौ राज भैया। ” राधा कंपकंपाते हुए स्वर मे बोलि, “तुम्हारी इस अनुपम सफलता पर्र हम् खुश न् होंगे तोँ औऱ कौन होगा। ”
“सच कहती हें आप्.” राज कि मुस्कराहट औऱ गहरी होँ गई, “आइए! मात्र आप् हि कि इंतजार थि.शेष सभी अतिथि गण आँ चुके हें.समारोह मे। ”
जयकुछ न् बोला। उसके होंठों पर्र अब भि वही मुस्कराहट थि। उसने सिगार कां कोना तोड़कर दांतों मे दबा लिया औऱ राधा केँ संग धीरे धीरेराज केँ पीछे चलनेलगा। राज नें उन्हें कुर्सियों पऱ बिठाया। फिनराज पंडाल सें निकला तोँ उसकी दृष्टि सुषमा पर्र पड़ी औऱ वो ठिठक गय़ा। सुषमा केँ माथे पर्र एक् लाल बिन्दिया जगमगा रही थि। उसकी आंखें लाज सें झुकगईं। राज मुस्कराकर बोला, “आज तुम् सुषमा नहि.साक्षात एक् समारोह हौ.प्रसन्नता कां उत्तम समारोह.एक् उत्सव होँ। ”
“हटिए!कोई सुन लेगा, ” सुषमां घबराहट सें लजाते हुए बोलि.औऱ इधर-उधर देखने लगी।
“यही लड़की हैं वो?” राधा नें धीरे-धीरे सें जय कि ओर झुककर पूछा।
“हां.सुषमा.”
“बड़ी प्यारी हैं.गुड़िया सि.राज कां चुनाव बहोत प्यारा हैं। ”
थोड़ी देरबाद राज सबके सामने खड़े होकरसभी कों सम्बोधित करतेहुए बोला, “समारोह मे उपस्थित देवियो औऱ सज्जनो। अब सारे अतिथि आँ चुके हें सो कार्य वही आरम्भ करने कि आज्ञा चाहता हूं.आप् सोचरहे होंगे कि इस समारोह मे शहर कि प्रसिद्ध हस्तियां सम्मिलित नहि हुईं.कोई मंच क्यूं नहि बनाया गय़ा.कोई माइक कां प्रबन्ध नहि किया गय़ा.इसके लिए मे निवेदन करूंगा कि दो प्रकार केँ आदमी हि आदर औऱ सम्मान केँ योग्य होते हें.पहले वे जिनका सम्मान उनके हाथों औऱ उजलेमन केँ कारण होता हैं औऱ दूसरे वे जिनका आदर उनकेधन केँ कारण होता हैं.यहां दोनों प्रकार कि हस्तियां उपस्थित हें.मंच औऱ माइक इत्यादि वहां आवश्यक होते हें जहां केँ समारोह दिखावे औऱ प्रदर्शनी केँ लिए होते हें.ये समारोह मेरे औऱ मेरे मित्रों केँ मन कि खुशी कों प्रकट करता हैं.इस प्रसन्नता कों प्रकट करने केँ लिए हमें किसी दिखावे कि आवश्यकता नहि.क्योंकि आवाज़ चाहे कितनी हल्की हि क्यूं नं होँ वो उन हृदयों तक ज़रूर हि पहुंच जाती हैं जिनमें स्नेह, सत्यता, सौन्दर्य होता हैं.सहानुभूति औऱ आपस मे समझने कि बुद्धि होती हैं.जहां यहगुण नहि होता वहांलाख ऊंचे स्वर मे औऱ मंच लगाकर कहो.कुछ लाभ नहि। अब आपसे प्रार्थना हैं कि फैक्टरी केँ मुख्य दरवाज़ा पऱ पहुंचकर उद्घाटन कि रस्म मे सम्मिलित हों। ”
थोड़ी देरबाद सारे अतिथि फैक्टरी केँ फाटक पऱ थें। फाटक केँ बिलकुल पास हि राज खड़ा थां। राज केँ पास सुषमा, चन्दर औऱ शंकर भि थें.सभी यहीसोच रहे थें कि देखें राज किसे फैक्टरी केँ उद्घाटन कां श्रेय देता हैं। राज नें इधर-उधर देखा औऱ शंकर सें बोला, “भैया! कल्लन किधर गय़ा?”
“मे हां हूं राज भैया!” कल्लन नें आगे बढ़कर कहा।
सभीलोग उधर देखने लगे। कल्लन दस-ग्यारह वर्ष कां लड़का थां जौ घऱ केँ धुलेहुए बिना प्रेस किए कपड़े पहनेहुए थां.राज नें उसे अपनेपास बुलाया औऱ उसके कंधे पऱ हाथ रखकर मुस्कराकर इधर-उधर देखा औऱ फिन बोला, “ये मेरा मित्र, शंकर दादाजी केँ गैरेज कां सवादो रुपये दिन कां सबसे छोटा कारीगर हैं जिसने अपनी मम्मी कि दवा मे सें बचेहुए चारआने जौ इसने बीड़ियों केँ लिए बचाए थें.इस फैक्टरी कि स्थापना केँ लिएमदद मे दिए थें.वे चारआने इस फैक्टरी केँ लिए जितने महत्वपूर्ण हें उतने शायद कहीं सें मिलेहुए चारलाख रुपये भि न् हों.ये फैक्टरी मेरी हैं लेकिन, इसका असली मालिक कल्लन हैं.इसलिये कल्लन हि फैक्टरी कां उद्घाटन करेगा। ”
सबसे पहलेजय नें तालियां बजाईं औऱ फिन बड़ीदेर तक तालियां गूंजती रहीं.कल्लन नें घबराकर इधर-उधर देखा औऱ कांपते हुए हाथों सें फैक्टरी कां उद्घाटन किया.फैक्टरी कां फाटक खोला गय़ा.उसमें सबसे पहले कल्लन नें प्रवेश किया। फिन राज नें हाथ उठाकर जोर सें कहा, “ठहरिए.”
सभीलोग ठिठककर रह गए.राज नें मुस्कराकर कहा‒
“ये थां मेरी फैक्टरी केँ उद्घाटन कां समारोह जिसका दृश्य आपने देखा.ये हैं वो फैक्टरी जिसकी नींव प्रेम औऱ स्नेह पऱ रखी हुई हैं औऱ उसकी स्थापना मे मेराहाथ बंटाने वालेवे लोग हें जिन्होंने अपने घरों केँ गहने औऱ बर्तन बेचकर, अपनी बीवियों केँ पैसे देकर मुझेइस काम कों पूरा करने कि शक्ति प्रदान कि हैं। साहस बढ़ाया हैं.इसकी स्थापना मे उन लोगों कां कोईभाग नहि जिन लोगों नें उस वक़्त, जब मे एक् करोड़पति बाप कां बेटा थां मेरेसंग शराबपी, मौज उड़ाई, मुझेगलत रास्ता दिखाए.इसकी स्थापना मे उनकाकोई हाथ नहि जिनकी दृष्टि मे दौलतखून केँ रिश्ते सें ज़्यादा महत्वपूर्ण होती हैं.इसलिये फैक्टरी कि जमीन पर्र सिर्फ वहीपेर जाएंगे जोँ एक् निर्धन औऱ गरीबराज केँ मित्र रहे हें.वे पैर नहि जाएंगे जिन्होंने राज कों गरीब बनाया.औऱ उसके गरीब औऱ निर्धन बन जाने पर्र उससे आंखें चुरागए.”
“अरे!” शंकर बड़बड़ाया, “ये क्याँ बकरहा हैं तूँ!”
“मे वो कहरहा हूं दादाजी जोँ कुछ कहने केँ लिए मैंने इतना टाइम इंतज़ार कि.अपनी रात कि नींदें औऱ दिन कां आराम हराम किया.मर्सिडीज केँ मालिक सें कैब-ड्राइवर बना.मिस्त्री बना, दादाजी! मे वो वक़्त कभी नहि भूल सकताजब अचानक किसी कि स्वार्थता नें मुझे निर्धन-मुफलिस बना दिया.औऱ मेरे घनिष्ठ दोस्त मुझेइस प्रकार छोड़कर भागे जैसे मे उन पऱ बोझबन जाऊंगा.इसी टाइम कि इंतजार मे मैंने कितनी रातें जाग-जाग कर बिताई हें.दादाजी! आज मुझे अवसर मिला हैं उस इन्तकाम कां, उस बदले कां.ये आप् बरसों मेरी आत्मा कों झुलसाती रही हैं.मुझे घृणा हैं ऐसे लोगों सें.आज मेरा इन्तकाम पूरा हौ चुका हैं.इन लोगों नें मुझसे एक् दुनिया छीनकर ये समझा थां कि बसअब मुझेकोई दुनिया नहि मिलेगी.आज मैंने एक् नई दुनिया बनाली हैं जिसका निर्माता मे हूं.मे अपनी दुनिया कां मालिक हूं.मे अपनी दुनिया मे इन स्वार्थी पांवों कि चांप भि नहि आने दूंगा। ”
कुछदेर बाद सन्नाटा रहा.फिन अनिल, कुमुद, धर्मचन्द, फकीरचन्द बुरे मुंह बनाकर पलटे औऱ बाहर् चले गए.लेकिन जय वहीं खड़ारहा। राधा नें धीरे-धीरे सें उसकाहाथ पकड़ा औऱ भर्राई हुई आवाज़ मे बोलीं.“चलिए.अब कितना अपमान कराएंगे। ”
“आभासहुआ आपको.श्रीमती जयदास!” राज कड़वी मुस्कराहट होंठों पर्र लाताहुआ बोला, “जब व्यक्ति कां अपमान होता हैं तौ उसकी आत्मा कों कितना दुख होता हैं.”
“लेकिन मुझे तनिक भि नहि पहुँचा.” जय बड़ी ममतामय मुस्कराहट सें बोला, “क्योंकि मे जानता हूं आज तुम् उसजगह पर्र हौ जहां पर्र खड़े होकर तुम् अपने अपमान कां बदला लेने कां अधिकार रखते होँ.मुझे खुशी हैं कि मेरे भइया मे इतना साहस, इतनी शक्ति हैं कि वो अपने अपमान कां बदला लेँ सकता हैं.अपनी बेइज्जती कों नहि भूल सकता.क्योंकि उसने अपने अपमान कां बदला लेने केँ लिए हि अपनी दुनिया कां निर्माण किया हैं.लेकिन तुम् भूलरहे होँ कि जब मैंने तुम्हारा अपमान किया थां उस वक्त मेरादिन थां तुम्हें अपमानित करने कां इसलिये नहि कि तुम् मेरे छोटे भइया थें बल्कि इसलिये कि जिस दुनिया मे उस टाइम मे खड़ा थां उस दुनिया कि मैंने स्थापना कि थि.मैंने निर्माण किया थां.डैडी कि दौलत ज़रूर थि लेकिन ऐसे हि जैसेआज तुम्हारे पास अपनाकुछ नहि.सभी कुछ इन्हीं सच्चे मित्रों कि दौलत हैं.इस दुनिया कां निर्माण तुमने किया हैं.डैडी कि दौलत बेकार पड़ी थि, क्योंकि वो हृदयरोग केँ रोगी थें.औऱ एक् दिनइसी रोग सें चल बसे.तुम्हारे भविष्य कां उत्तरदायित्व मुझे सौंप गए.तुम् ये भि जानते होँ कि डैडी कि मृत्यु केँ बाद मैंने दिन कों दिन नहि समझा औऱ रात कों रात.तुम्हारी हि तरह मैंने जीतोड़ कर परिश्रम किया.अपनी आधी शिक्षा छोड़कर कारोबार कों संभाला.अपने जिंदगी कों सीमित कर लिया‒मात्र तुम्हारे लिए। मैंने जिंदगी कि सारी दिलचस्पियां खत्मकर दीं.क्योंकि मे जानता थां दौलतउन हाथों मे रहती हैं जौ उसे रोकना जानते हें.मे भि यदि तुम्हारे हि समान एक् धनाढ्य बाप कां अय्याश बेटा बनकर शराब, जुआ औऱ सुन्दरी मे खो जाता.जिंदगी कि रंगीनियों मे खुद कों व्यस्त कर देता.तोँ एक् दिन मे खुद हि निर्धन न् होता बल्कि तुम्, राधा, राजा.सभी मेरेसंग मुफलिस हौ जाते.मे सभीकुछ भूलकर येयाद रखने कां प्रयास कररहा थां कि डैडी नें तुम्हारे भविष्य कां उत्तरदायित्व मुझ पर्र डाला हैं.मैंने कभी तुम्हारा मन नहि दुखाया.तुम्हारी हरहठ मैंने पूरी कि.तुम् मेरे असीम, प्रेम केँ कारण अनुचित रंगरेलियों मे पड़ गए.शराब, जुआ, बुरी संगति.तुमने क्याँ नहि किया?फिन एक् दिनजब मुझेये अनुभव हुआ कि तुम् उसजगह पर्र पहुंच चुके होँ जहां मेरा समझाना तुम्हें विष लगता हैं औऱ झूठे कपटी मित्रों केँ परामर्श अमृत.तुम् जिस लड़की सें विवाह केँ इच्छुक थें उसे मे निकट सें जानता थां औऱ तब मैंने बहोत सोच-समझकर फैसला किया कि यही वक्त हैं तुम्हें भास दिलाने कां कि जौ दौलत तुम् पानी केँ समानबहा रहे हौ उसे कमाने मे लहू-पसीना एक् करना पड़ता हैं औऱ जब दौलत व्यक्ति केँ पास होती हैं तौ हजारों यार होते हें खाने-पीने औऱ ऐश करने वाले.लेकिन सच्चे यारवही हैं जोँ मुफलिस कों सहारा बनें.असली प्रेमिका वही होती हैं जिसके प्रेम कां तौलधन न् होँ औऱ मैंने क्षण-भर मे तुम्हें मुफलिस बना दिया। डैडी कि वसीयत वास्तविक नहि थि.नकली थि। निर्धन होकर तुमने देख हि लिया कि कौन तुम्हारा साथी सिद्ध हुआ, कौन प्रेमिका। तुम्हारे एक्-एक् दिन केँ हालात सें मे परिचित हूं.तुम्हारे कष्ट सुनकर मेरे हृदय मे नश्तर सें चुभते रहे लेकिन मे अपनी छाती पर्र सिलरखे रहा, ताकि डैडी कि आत्मा केँ सम्मुख लज्जित नं हौ सकूं.औऱ अपने भइया कों कुछबना देखलूं। तुम्हारी भाभी राधा जौ तुम्हारे लक्षणों सें घृणा प्रकट करती थि। वो तुम्हें राजा केँ हि समान चाहने लगी। उसनेरो रोकर, मेरेपैर पकड़-पकड़ करकहा कि तुम्हें वापिस बुला लूं.मैंने उसे दुत्कार दिया। तुमने कैब चलाई, मिस्त्री बने.औऱ आज तुम् उसजगह पर्र होँ कि सारादेश राज केँ नाम पर्र गौरव करता हैं.ये सभी तुमने किन लोगों सें मिलकर पाया? अच्छे मित्रों औऱ अच्छे-परामर्श देने वाले शुभचिन्तकों सें क्योंकि इनमें सें कोई भि अनिल, फकीरचन्द, धर्मचन्द याँ कुमुद नहि हैं.तुम् येजान चुके होँ कि अच्छी संगत व्यक्ति कों कहां पहुँचा देती हैं औऱ बुरी कहां। आज तुम् येसभी कुछ प्राप्त कर चुके होँ.मे नकली वसीयतनामा फाड़ चुका हूं.असली वसीयतनामा मेरेपास हैं जिसके अनुसार तुम् आधी सम्पत्ति केँ अधिकारी हौ.मेरा उद्देश्य पूरा हौ चुका हैं मेरे राजा केँ लिएआधी दौलत हि इतनी हैं कि वो खुद खाएगा औऱ बच्चों केँ लिए छोड़ जाएगा.इसलिये तुम् जब भि चाहो अपनी सम्पत्ति कां आधाभाग मुझसे लें सकते होँ.औऱ मेरा आशीर्वाद हैं कि तुम् जिंदगी-भर फलते-फूलते रहो मेरेलाल.” कहते-कहते जय कि आवाज़ भर्रा गई, “चलो राजा.राजा बेटा चलो। ”
राज औऱ उसकेसभी दोस्त सन्नाटे मे खड़े थें। अचानक शंकर नें बढ़कर कहा, “ठहरिए जय बाबू! बहोत हौ चुका.अब मे आपकीशपथ नहि रख सकता। ”फिन वो राज सें बोला, “इतनी ठोकरें खाने केँ बाद भि तुम्हे बुद्धि नहि आई लड़के, तूँ एक् देवता कां अपमान कररहा हैं.जानता हैं वो साठ हजार पैसा किसने दिया थां जिससे ये फैक्टरी बन सकी.वो जय बाबू देकरगए थें.मुझसे शपथ लेकर कि रहस्य तुझ पऱ नहि खोलूं लेकिन मे एक् देवता कां अपमान होते नहि देख सकता.यदि तूनेजय बाबू केँ पैर पकड़कर अभि माफ़ नं मांगी तोँ मे जिंदगी-भर तेरा मुंह नहि देखूंगा। ”
राज भौंचक्का-सां रह गय़ा। सुषमा नें उसका कंधा हिलाया औऱ धीरे-धीरे सें बोलीं।
“सुनरहे हें आप्.मैंने आपसेकहा थां कि जिसदिन व्यक्ति व्यक्ति सें उदास हौ जाएगा वो दिन दुनिया कां अन्तिम दिन होगाअब भि आप् सोचरहे हें। आगे बढ़िए.मान दीजिए इस देवता कों औऱ खुशी केँ इस समारोह कि शोभा बढ़ा लीजिए। ”
राज नें झटआगे बढ़कर जय केँ पेर पकड़लिए। जय नें उसे उठाकर सीने सें लगा लिया औऱ हड़बड़ाई आंखों सें बोला, “मेरे बेटे.मेरे लाल। ”
“मुझे माफ़कर दो भैया.मुझे माफ़कर दो.”राज जय केँ गले लगकर बच्चों केँ समान बिलख-बिलखकर रोनेलगा।
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samaapt
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