बाप बेटी कां अनोखा प्रेम | incest indian sex story – New Episode
फिन हमनेबस सें हि जाने कां सोचा।
15 मिनटबीत चुके थें पऱ बस कां कोई नमोनिशान नहि थां.
“उबर बुलालूं क्याँ ?”.
“रहनेदो बापू … बेकार मे पैसे खर्च होंगे। बस अभि आँ जायेगी.”
मैंने कहा.“उबर पे पैसे बर्बाद नाँ करकेउसी पैसों सें आप् मुझे एक् साड़ी खरीद देना.”
“अच्छा ? दोतीन सौ मे कहां सें आयेगी साड़ी ?”.
“दोतीन सौ मे कुछ औऱ पैसे मिला लेना पिताजी …”। मे हँसते हुए बोलीं.
कुछदेर मे हि उनकीबस आँ गई.
“आजाओ बापू …”.
“इसमें नहि नीलम … बहोत भीड़ हैं.”.
“पिताजी … यहा कि सारी बसेंऐसे हि भीड़ वालीआती हें… चलो.”
जगदीश कों धीरे-धीरे सफर करने कि आदत पड़ी थि, बस मे अंदर घुसते हि भीड़देख कर उसका दिमाग़ घुमने लगा। मे इनसभी मे निपुण थि, मैंने अपने पिताजी कां हाथ पकड़ा औऱ भीड़ मे स्थान बनाती हुई बस केँ एकदम पीछले हिस्से मे चली गई.
भीड़ तौ वहा भि कम नहि थि पर्र बस केँ पिछले हिस्से मे कम सें कमआने जाने वाले लोगों कि धक्को सें बचाजा सकता थां। मुश्किल सें खड़े होने कि स्थान मिली थि उन्हें, दोनों एक् दूसरे केँ अगलबगल खड़े होँ गये, बस चल पड़ी.
“अच्छा नीलम … यहा कि सारी बसेंऐसे हि भीड़ वालीआती हें ?”.
“हाँ बापू … तोँ ? वैसेआज थोड़ी ज्यादा हि भीड़ हैं इस बारिश कि वजह सें… रोज़ नहि होता इतना… पर्र…”.
मे जिस स्थान खड़ी थि उसके पीछे एक् व्यक्ति बड़ा सां बैग लिये खड़ा थां। उसबैग कि वजह सें मे ठीक सें खड़ी नहि होँ पारही थि औऱ बारबार ठोकरलग रही थि.
“इधर आँ जा नीलम.”.
पिताजी नें जबयह ध्यान किया तौ उसने अपने सामने थोड़ी सि स्थान बनाली औऱ मे वहाघुस कर अपने पिताजी केँ आगे खड़ी हौ गई। अबपीठ अपने बापू केँ तरफ थि औऱ धक्के मुक्के सें बचाने केँ लिये पिताजी पीछे खड़े थें.
बापू मेरे लिये इतने रक्षात्मक थें यहदेख कर मे मन हि मन मुस्कुराई पऱ कुछ बोलीं नहि। मुझे अपने पिताजी केँ संग नोंक झोंक वाला नाता हि अधिक भाता थां, औपचारिकता वाला नहि !
बाहर् बारिश होने कि वजह सें दिन केँ वक्त भि अच्छा खासा अंधेरा छा गय़ा थां, बस कि सारी खिड़कीयां बंद थि तोँ अंदरबस मे भि अंधकार हि थां, जोँ जहाँ थां वहीं चुपचाप खड़ा थां, हिलने डूलने कि तोँ स्थान हि नहि थि। कुछदेर कि यात्रा केँ बाद पिताजी औऱ मे अब शिथिल हौ गयें थें…
बापू नें अपनी बेटी कों अपने सामने खड़े होने कि स्थान तोँ दे दि थि पर्र वोँ आरामदायक नहि हौ पारहा थां, मेरा तौ उसेपता नहि। दरअसल, उसकी बेटी कां शरीर उसकेबदन सें एकदम चिपक गय़ा थां, उसपे उसकी बेटी कां सलवार कमीज़ औऱ स्वयं उसका पतलून औऱ शर्टभीग करतरबतर हौ चुका थां.
शुरुआत मे बहुतदेर तक उसने कोशिश कि, कि उसका जिस्म अपनी बेटी केँ जिस्म सें नां सटे, पऱ पीछे सें पड़रहे लोगों कि भीड़ केँ दबाव कों वोँ ज्यादा देर तक रोक नहि पाया। मुसीबत तब हुइ जब आखिरकार बापू केँ कमर कां नीचला हिस्सा उसकी बेटी केँ नितंब मे जासटा.
इतना तोँ फिन भि ठीक थां पऱ सबसे शर्मनाक स्थिति तबआईजब बापू कि टांगों केँ बीच वाला हिस्सा उसकी बेटी कि कमीज़ औऱ सलवार मे लिपटी पानी सें गीली हुई चूतड़ों केँ मध्य कि पतली दरार केँ बीचोबीच फंस गय़ा !
बापूबस यहीसोच रहा थां कि उसकी बेटी पता नहि क्याँ सोचरही होगी, शायदउसे कुछ महसूस हि नां हौ रहा हौ, नाँ हि हौ तोँ बेहतर हैं ! बापू कि कमर औऱ दोनों जांघो वाला हिस्सा अब मे केँ गांड़ कि दोनों गोल उभारों मे सट गय़ा थां जबकि उसका लण्ड वाला हिस्सा उनदोगोल गुंबदो केँ बीचघुस गय़ा थां !
अनुभूति तोँ आखिर अनुभूति हि होती हैं जौ इंसान महसूस करता हैं औऱ जिसका तर्कहर वक्त नां खोजना संभव हैं औऱ नाँ समझना। बापू कों भि जब किसीनरम रसीले गद्दे जैसी अपनी बेटी केँ गांड़ कां उभार अनुभव हुआ तौ नां चाहते हुए भि, याँ फिनयूँ कहें, कि उसकी ख़्वाहिश केँ विरुद्ध, उसका लण्ड उसकी पैंट मे फूलने लगा !!!
पानी मे पूरीतरह सें भीगे होने केँ कारण उसके पतलून केँ अंदर उसका अंडरवीयर भि ढीला औऱ लचीला होँ गय़ा थां, जिसकी वजह सें उसका अंडरवीयर अधिकदेर उसके लण्ड केँ बढ़ते उभार औऱ आकार कों दबा नहि पाया। उसका लण्ड उसके जांघिये मे नीचे कि ओर मुड़े हुए हि खड़ा होनेलगा!
मेरीओर सें अभि तक कोई भि प्रतिक्रिया नहि हुईँ थि। परिस्थिति हाथ सें बाहर् जातादेख पिताजी नें धीरे-धीरे सें अपनीकमर पीछे खिसका कर अपने लण्ड कों अपनी बेटी कि गांड़ कि दरारों सें बाहर् निकाला, औऱ थोडा पहलू होने कि कोशिश कि ताकि वोँ उसकी गांड़ सें नाँ सटे.
पर्र इस प्रयास मे चूंकि पीछे सें भीड़ कां बहुत दबाव थां, उसका लण्ड बाहर् तौ निकला पऱ इसबार वापस जाकर मेरीबाई गांड़ केँ गुंबद पे टिक गय़ा। औऱ यह मैंने बहोत हि अच्छे सें बिना किसी गलतफहमी केँ महसूस भि किया !!!
“आप् ठीक हैं नं बापू ? मे थोडा हटूं क्याँ ?”। मैंने अपनी गर्दन पीछे कि ओरबस इतना सां घुमाकर पूछा कि उसकीआँख पिताजी केँ आँख सें नां मिले.
“हाँ!”। पिताजी नें जितना होँ सका अपनी आवाज़ कों स्वाभाविक बनाकर कहा, जैसे कि कुछहुआ हि नां हौ.
मैंने अपने पिताजी कां लण्डसाफ अपनी गांड़ पऱ महसूस कर लिया थां, थोडा अजीबलगा पऱ मे जानती थि कि यह जान-बूझकर नहि थां। मैंने अपनी गांड़ थोड़ी सि हिलाकर ठीक करना चाहि पऱ उससे मामला औऱ बिगड़ गय़ा !
मेरीइस हरकत सें पिताजी कां लण्ड घिसटकर वापस मेरी गांड़ कि दरार मे स्लिम होँ गय़ा औऱ इसबार पिताजी कां नीचे मुड़ा हुआ लण्ड जांघिये मे थोड़ी सि स्थान पाकर सीधेऊपर कि ओरउठ गय़ा !!!
बापू औऱ मे इतने सालों सें एक् संगरह रहें थें, बापू नें कभी भि ऐसा महसूस नहि किया थां जैसा वोँ अबकररहा थां। ऐसीबात नहि हैं कि वोँ कभी अपनी बेटी केँ इतना लगभग नाँ गय़ा हौ, इससे ज्यादा करीबी औऱ क्याँ होँ सकती हैं.
पऱ हमेशा सें एक् सामान्य बाप बेटी रहेइन दोनों केँ बीच अभि जौ भि होँ रहा थां, ऐसा क्यूं हौ रहा थां !! दोनों बाप बेटी सामने ऊपर कि तरफबस कां rod पकड़े खड़े थें। पिताजी कां मुँह अपनी बेटी केँ भीगे खुले बालों केँ ठीक पीछे थां…
उसके बालों सें आँ रही बारिश केँ पानी औऱ शैम्पू कि घुली मिलीगंध नें मानो बेटी औऱ उसकेबीच कां संकरा फासला कमकर दिया थां। अभि तक तोँ बापू असमंजस मे थां कि क्याँ होँ रहा हैं औऱ वोँ क्याँ करे औऱ क्याँ नां करे, पऱ अबजब उसका लण्ड पूरीतरह सें टाईटठनक कर खड़ा हौ गय़ा तोँ उसनेसमझ लिया कि वोँ अपनी हि सगी बेटी केँ शरीर सें सटकर कामोत्तेजित हौ रहा थां !!!
अब बापू केँ पासबस एक् हि मार्ग थां… यह टेस्ट करना कि उसकी बेटी क्याँ चाहती हैं, अगर वोँ तिनका भर भि आपत्ती दिखायेगी तोँ उसे जल्दी स्वयं कों रोक लेना होगा। पिताजी नें अपनीकमर हल्के सें सामने कि ओर बढ़ाई तोँ मेरी गांड़ केँ बीच रगड़खा कर उसके लण्ड कां चमड़ा पीछे खिसककर खुल गय़ा औऱ उसका मोटा सुपाड़ा बाहर् निकलआया। बापू कां लन्ड इतनाफूल गय़ा थां कि वोँ उनकी अंडरवियर टाइट हौ रहा थां.
अब बापू अपने भीगे पतलून मे अपने खड़े लौड़े कां सुपाड़ा खोले अपनी बेटी कि गोल गदराई चूतड़ सें टिका खड़ा थां !!! मेरारहा सहाशक भि अब जातारहा कि जोँ कुछ भि हौ रहा थां वोँ अनजाने मे होँ रहा थां। वोँ समझ गई कि उसके बापू बेचारे परिस्थिति केँ सताये कामोन्मादित हौ रहें थें। परिस्थिति केँ सताये औऱ मारे हि कहेंगे नां…
क्यूंकि मे समझरही थि आज तक उसके बापू नें नाँ जाने कितनी बार मुझे नाईटी मे औऱ पजामे मे देखा थां, पऱ कभी भि मुझ पे गंदी नज़र नहि डाली थि। आज कां दिनमगर कुछ औऱ हि थां… मन हि मन मे थोडा मुस्कुराई, पर्र कुछ नां बोलीं, चुपरही.
इधर बापू कां मनबढ़ गय़ा जब उसकी बेटी कि ओर सें ऐसाकोई इशारा नहि हुआ जिसके द्वारा वोँ अपनी असहमति दिखाए। फिन क्याँ थां, उसने एकदम धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरीनरम गांड़ मे अपना लण्ड ठेलना शुरुआत किया। उसके खड़े लण्ड कां सुपाड़ा तोँ पहले हि खुल चुका थां, सो अपने पानी मे गीले भीगे पैंट केँ अंदर अपना लौड़ा घिसने मे उसेऐसी खुशी कि अनुभूति होनेलगी कि वोँ बयां नहि कर सकता थां !
अभि उसनेतीन चारबार हि अपना लण्ड रगड़ा होगा कि बसरुक गई… कोई ठिकाना आया थां। वोँ थोडा संभलकर खड़ा होँ गय़ा पर्र उसने देखा कि जितने लोगबस सें उतरे नहि उससे अधिकलोग चढ़ गयें, भीड़ औऱ बढ़ गई थि। बसफिन सें चल पड़ी.
“अभि दूर हैं क्याँ नीलम ?”। बापू नें अपनी बेटी केँ मूड कां जायजा लेने केँ मकसद सें पूछा.
“हाँ बापू … यहबस दूसरे रास्ता सें जाती हैं नाँ। आपकी बाइक मे तौ ज़ल्दी हौ जाता हैं.”। मैंने जल्दी जवाब दिया, पऱ अभि भि पीछे नहि मुड़ी.
“हाँ …”.
बापू नें इधरउधर आसपास केँ लोगों कों देखा पऱ सब अपने मे मगन औऱ परेशान खड़े थें… बस मे दो अच्छे घराने केँ बाप बेटी क्याँ कर रहें थें इसमें शायद हि किसी कों रूचि हौ !!!
बापू अपना दायाहाथ नीचे सरका केँ अपने पतलून तक लेँ गय़ा औऱ पैंट कि ज़िप यानि सुकून खोल दि। मे पीछेदेख तौ नहि पारही थो पर्र वोँ समझ गई कि उसके बापूअब कोई औऱ नई शैतानी करने वाले हें। मेरादिल ज़ोरों सें धड़कने लगा…
अपने पतलून केँ अंदरहाथ डालकर बापू नें अपना खड़ा लण्ड अपने जांघिये सें बाहर् निकाल लिया औऱ फिन पैंट कि ज़िप वापसलगा ली.अब उसका लण्ड अंडरवीयर सें बाहर् मगर पतलून केँ अंदर थां। उसनेऐसा इसलिये किया थां ताकि उसके लण्ड कों अपनी बेटी केँ चूतड़ कां अधिक सें ज्यादा स्पर्श मिलसके.
अब उसने अपनी बेटी कि गीली कमीज़ उठाकर सीधे उसके सलवार मे लिपटी गांड़ मे अपना लण्डसटा दिया औऱ उसकी कमीज़ सें वोँ हिस्सा ढक दिया, जिससे अगरकोई देखे तौ केवलयह समझे कि दोनों बसऐसे हि बाकि यात्रियों कि तरह खड़े हें !
मेरी तौ जैसे साँस हि रुक गई पब्लिक मे अपने बापू कि इस साहसी हरकत कों देखकर ! मैंने अपने भीगे बालों औऱ गर्दन पऱ अपने बापू कि गर्म साँसे महसूस कि… पिताजी अब पहले सें औऱ ज्यादा सटकर खड़ा होँ गय़ा थां। अब पिताजी केँ लण्ड औऱ मेरी गांड मे केवल उनके पैन्ट औऱ मेरी स्कर्ट केँ कपडे कां हि अंतर थां.
टी शर्ट केँ अंदरढकी मेरी गांड़ मे पिताजी अबखुल कर लण्ड घिसने रगड़ने लगा। मेरी मांसल पुष्ट गांड़ कि गोलाईयां उसके लण्ड कों इतनाचैन औऱ मजा देंगी, यहउसे अभि अभि पताचला थां ! अपने पूरीतरह सें उत्तेजित हौ चुके लण्ड सें पिताजी नें ठेलठेल कर अपनी बेटी कि स्कर्ट औऱ उसके अंदर पहनी पैंटी कों उसकी चूतड़ कि फांक मे घुसा दिया थां.
मुझेतो मन हि मन हँसीआने लगी अपने पिताजी कि बेचैनी देखकर। अति कामोत्तेजना मे बापू कों पता हि नहि चला कि कब रुकना हैं औऱ उसने अपना लण्ड अपनी बेटी कि टाईट गांड़ मे कुछ अधिक हि घिस दिया थां, इसवजह सें वोँ स्खलित होने केँ लगभग पहुंच गय़ा.
उसने जल्दी अपना लण्ड मेरी गांड़ सें हटा लिया औऱ साँसरोक कर अपनामाल गिरने सें रोकने कि कोशिश करनेलगा। इस कोशिश मे उसकेपेट मे बलपड़ गय़ा, मगरअब बहुतदेर होँ चुकी थि, उसका लण्ड उसके पैंट मे एकदम सें बड़ा होकरफूल गय़ा औऱ उसका वीर्य निकलआया !!!
जब पिताजी नें देखा कि अबकोई फायदा नहि तोँ उसने वापस अपना लण्ड अपनी बेटी कि स्कर्ट मे घुसा दिया औऱ झड़ने लगा। उसका गाढ़ा वीर्य पतलून केँ कपड़े सें बाहर् रिसरिस कर बहनेलगा। मैंने जब अपनी स्कर्ट मे गांड़ औऱ जांघो पर्र गर्म गर्म मलाई जैसी चिकनी रस केँ एक् केँ बाद दूसरी धार कों गिरता हुआ महसूस किया तौ वोँ समझ गई कि उसके पिताजी कां काम तमाम होँ चुका हैं !!!
20 सेकंड केँ अंदर हि बापू कि पिचकारी पूरी खाली होँ गई। उसके पांव अचानक सें हुएइस शीघ्रपतन सें काँप रहें थें औऱ उसने बड़ी मुश्किल सें स्वयं कों अपनी बेटी केँ ऊपर गिरने सें रोका थां। मैंने अपनेहाथ सें अपनी गांड़ मे घुस चुकी पैंटी औऱ स्कर्ट कों निकाला औऱ अपने कपड़े ठीक करनेलगी। पर्र पिताजी कां काम अभि खत्म नहि हुआ थां !
अभि अभि थोड़ी सि शिथिल हुईँ मैंने अचानक अपने बापू कां दायाहाथ सीधे अपनी बुर पे रेंगता हुआ महसूस किया। बापू बुर स्कर्ट केँ ऊपर सें हि सहलाने लगा !
पिताजी अचानक सें इतने बेशरम केसे हौ गयें ???… मे बेचारी यहसोच हि रही थि कि बापू नें स्कर्ट केँ इलास्टिक मे अपनी ऊँगलीयां फंसा दि…
हायरे !… पिताजी पागल हौ गयें थें क्याँ… इतने लोगों केँ बीचभरी बस मे अपनीसगी बेटी कों नंगा करना चाहते थें क्याँ ??? घबराकर मैंने जल्दी अपने पिताजी कां हाथ पकड़कर उन्हें रोक लिया। बापूरुक तोँ गय़ा… उसने अपनी बेटी कि स्कर्ट कां नहि खोलामगर अब अपनाहाथ स्कर्ट केँ अंदर हि डाल दिया.
मगर मैंने स्कर्ट इतनी टाईट बाँधरखी थि कि मुश्किल सें बापू कां हाथ अंदरघुस पाया औऱ पिताजी बेचारे मात्र पैंटी कां ऊपरी हिस्से वाला इलास्टिक हि छू पायें थें !!! अबयह तोँ कुछ अधिक हि होँ रहा थां… मे एकाएक अपने बापू केँ तरफ मुड़कर खड़ी हौ गई। बापू कों यह अंदेशा नहि थां कि उसकी बेटी अचानक आमने - सामने होँ जायेगी। उसनेझट सें अपनी नज़र घुमाली.
“बापू ! मां कों मोबाइल किया कि हम् लेट होँ जायेंगे ?”। मैंने पूछा.
पिताजी समझ गय़ा कि मे जानबूझ कर ज़ोर सें बोलरही थि औऱ “पिताजी ” शब्द पर्र ज्यादा दबावडाल रही थि ताकिआस पास खड़े लोगों कों उनकी हरकतों पे कोईशक नां हौ। बापू कि हिम्मत नहि हुइ कि अपनी बेटी सें आँख मिलासके… उसनेकोई जवाब नहि दिया… उसकागला सूखरहा थां। मे अब सीधे उसकी आँखों मे देखरही थि.
“कितनी भीड़ हैं पिताजी … मे गिर जाउंगी.”। मैंने अचानक अपने दायेहाथ सें अपने पिताजी कां कमर पकड़ लिया औऱ बायेहाथ सें बस कां डंडा पकड़े खड़ीरही.
पिताजी कों औऱ किसी इशारे कि ज़रूरत नहि थि… वोँ समझ गय़ा कि उसकी बेटी केँ संग उसने जौ कुछ किया थां वोँ उसे अच्छा लगा हौ याँ नां पऱ इतना तोँ तय थां कि वोँ नाराज़ नहि थि… उसकी बेटी केँ गोल मम्मे अब उसकी छाती सें दब रहें थें.
उसकी कमीज़ बारिश मे भीगे होने केँ कारण बापू महसूस करपारहा थां कि मेरे दोनों निप्पल खड़े होँ गयें थें। उसेअब बस मे अपनी बेटी केँ अलावा कोई दिखाई नहि देरहा थां ! बापू कां पैंट मेरी स्कर्ट सें ढक गय़ा थां…
उसने अंदरहाथ डालकर अपने पैंट कि ज़िपखोल दि औऱ इसबार अपना लण्ड पतलून सें बाहर् निकाल लिया। मुझेअपने बापू कि इस हरकत पे अबकोई आश्चर्य नहि होँ रहा थां… सबसे नज़रबचा कर वोँ दोनों जोँ कुछ भि कर रहें थें उससेअब मुझेएक अजीब सां यौन किंक मिलने लगा थां !!!
बापू कां लण्डअब अपने स्वयं केँ पेट औऱ उसकी बेटी केँ पेट केँ बीच मे दबा पड़ा थां औऱ ऊपर सें बेटी कि स्कर्ट सें पूरीतरह ढकाहुआ थां। मैंने उसके लण्ड कां चिकना सुपाड़ा अपनी नाभी मे टच होता महसूस किया… अफ़सोस कि अपने बापू कां लौड़ा देख नहि पारही थि… पऱ उसके स्पर्श सें इतना तोँ अंदाज़ा लगा लिया थां कि पिताजी कां लौड़ा अच्छा खासा बड़ा होगा.
पिताजी धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपनीकमर हिलाकर अपना लण्ड अपनी बेटी केँ पेट औऱ नाभी मे रगड़ने लगा.अब वोँ सीधा अपनी बेटी कि नज़रों सें नज़रें मिलाये खड़ा थां। उसका चेहरा अपनी बेटी केँ चेहरे केँ इतनेपास थां कि उसका तौ मनकररहा थां उसेचुम हि लेँ। चूंकि पिताजी कां लण्ड अभि अभि झड़ा थां, सो उसके लण्ड मे ज्यादा गर्मी नहि आँ रहा थां पर्र उसकामन कररहा थां कि वोँ फिन एक् बारमाल गिराये.
“अब हम् पहुँचने हि वाले हें बापू …”। मैंने अपने बापू कों आगाह किया!!!
बापू नें धीरे-धीरे सें अपनासिर हिलाकर हामीभरी औऱ लण्ड घिसता रहा… पऱ अब इससेबात नहि बनने वाली थि… उसने जल्दी बेटी कि स्कर्ट केँ अंदरहाथ डालकर अपना लण्ड पकड़ लिया औऱ मूठ मारने लगा ! मे अपने बापू कां संग देने केँ लिये उसकेकमर कों सहलाने लगी औऱ अपनी जांघे पिताजी केँ पैरों मे सटा दिया.
पिताजी अपनी बेटी केँ जिस्म, उसकी जांघ, उसकी चूचियाँ, सबका स्पर्श करतेहुए, मूठ मारने लगा। उसकी मेहनत जल्द हि रंगलाई… उसके लण्ड कां पानीछूट पड़ा। वीर्य कि पहलीतीन चारधार तौ इतनी तेज़ थि कि स्कर्ट केँ अंदर होती हुईँ ब्रा तक पहुंच गई.
फिनपेट औऱ स्कर्ट पऱ गिरने लगी औऱ फिन पिताजी नें झड़ता हुआ लौड़ा जल्दी अपने पैंट मे घुसा लिया औऱ बाकि कां माल अपने पतलून केँ अंदर गिराने लगा। उसकी बेटी नें अगर उसकीकमर नां पकड़ी हुईँ होती तोँ बेचारा उत्तेजना केँ मारेगिर हि गय़ा होता ! फिन भि वोँ थोडा सां लड़खड़ा गय़ा तोँ पास खड़े एक् व्यक्ति नें उसे टोका.
“ओ भइया… थोडा संतुलन बना केँ रहो…तब सें देखरहा हूं !”
“भाईसाहब… सॉरी !”। बापू कि आवाज़ गले मे रुक गई.
मुझे हँसी आँ गई अपने बापू कि हालतदेख कर। उनका स्टॉप आँ गय़ा थां… दोनों नें अपने अपने कपड़े ठीक किये, पिताजी नें अपना शर्ट बाहर् कर लिया ताकि उसके पैंट मे बना लण्ड कां तंबू औऱ वीर्य कां गीलापन कां पता नां चले औऱ बस सें उतर गयें। मौसम हमारे पक्ष मे थां, अभि भि तेज़ बारिश होँ रही थि, सो उसके औऱ उसकी बेटी केँ कपड़ों पे लगा वीर्य ऐसे हि धुल गय़ा.
बाप बेटी कां अनोखा प्रेम | incest indian sex story – New Episode
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बाप बेटी कां अनोखा प्रेम | incest indian sex story – New Episode
हम् दोनों बाप बेटी अबबस सें उतरकर घऱ कों चलदिए। बापू केँ दोनों हाथ हमारे सामान सें भरेहुए थें।
घऱ केँ पास पहुंचे तौ घऱ केँ गेट पऱ तालालगा हुआ थां। बापू नें मुझेकहा
"नीलम बेटा! चाबी मेरी पैंट कों जेब मे हैं। मेरेहाथ भरेहुए हें। तुम् मेरीजेब सें चाबी निकाल लो."
मैंने पिताजी कि कोई शरारत नहि समझी औऱ बापू केँ पैंट कि जेब मे हाथडाल दिया।
चाबीजेब मे नहि थि। मैंने कहा तोँ बापू नें मुस्कुराते हुएकहा
"अच्छी तरह सें देखो। चाबी वहीँ होगी। "
मैंने हाथ औऱ अंदर तक घुसाया तौ मेराहाथ पिताजी केँ तनेहुए लौड़े पर्र लग गय़ा। मे समझ गयीँ, कि पिताजी नई शरारत कररहे हें।
तौ मैंने अभि अनजान बनने कां नाटक करतेहुए पिताजी केँ लण्ड पऱ उँगलियाँ घुमाते हुएकहा.
"बापूजेब मे तोँ कुछ नहि हैं."
बापू नें मुस्कुराते हुएकहा
"बेटी! औऱ कहां होगी चाबी? तुम्हारे ताले कि चाबी तोँ यही होनी चाहिए"
मे अबसमझ गयीँ, कि बापू मेरेकिस ताले कि चाबी कि बातकर रहे हें।
बापू शैतानी कररहे थें। मे उसीतरह अनजान होने कां नाटक करतेहुए बोलि।
"पिताजी! मेरे ताले कि नहि। बल्कि घऱ केँ ताले कि चाबी चाहिए। "
पिताजी हँसते हुएफिन बोले "बेटी! घऱ भि तुम्हारा हैं औऱ ताला भि तुम्हारा हि हैं। जौ चाबी तुम्हारा ताला खोलेगी वोँ तोँ यही होनी चाहिए। "
मे भि गरम होँ हि रही थि, बस मे हुए घटना केँ बाद तोँ मुझेलग रहा थां कि मेरी चुदाई कि ख़्वाहिश जल्द हि पूरी होने वाली थि.
मैंने एक् बारफिन सें पिताजी केँ लण्ड पर्र औऱ उनके सुपाडे पऱ उँगलियाँ चलाई औऱ अपने नाखूनों सें बापू केँ सुपाड़े पर्र रगड़ा औऱ हाथ बाहर् निकाल करकहा
"बापूयहा तोँ नहि हैं चाबी। आप् शायद कहींभूल रहे हौ."
बापू नें फिनबात सँभालते हुए बोला "बेटा! तोँ फिन दूसरी जेब मे चेककरो। शायदउस जेब मे होगी। "
मे अब क्याँ करती, मझा तौ मुझे भि आँ हि रहा थां तोँ मैंने अपनाहाथ बापू केँ दुसरे जेब मे डाला।
चाबी वहां थि। पर्र अब मे शरारत करने केँ मूड मे आँ गयीँ, थि तौ चाबी केँ ऊपर सें हाथआगे लें जाकरफिन सें उनके लौड़े पऱ फेरते हुए बोलि
"बापू! चाबी तौ यहा भि नहि मिलरही."
पिताजी मेरी शरारत समझते हुए बोले
"नीलमअब मेरी तौ दो हि जेबें हैं। अच्छी तरह सें देखो चाबी जरूर मिलेगी। "
अब मे कितनी देर तक नाटककर सकती थि तौ मैंने एक् बार अच्छी तरह सें जेब केँ अंदर सें हि पिताजी केँ लण्ड पर्र हाथ फेरा औऱ अच्छी तरह सें उनके लौड़े तोँ टटोलकर फिन चाबी बाहर् निकाल ली.
पिताजी तोँ इससभी सें बहोत मस्त तौ गए थें। उनका लौड़ा तौ बांस कि तरह सख्त होँ करतन गय़ा थां। औऱ झटकेमार रहा थां।
फिन हम् घऱ केँ अंदर आँ गए औऱ पिताजी नें सामान टेबल पऱ रख दिया।
माँ अभि घऱ मे नहि थि। शायद कहीं गई, थि तोँ पिताजी खलीघऱ देखकर फिन शरारत केँ मूड मे आँ गए औऱ मुझे बोले कि नीलमआज कल चोरों कां डर रहता हैं। तुम् गेट कों अंदर सें तालालगा दो.
मे समझरही थि कि बापू ताला लगवाने कों कहरहे हें तौ इसकाकोई तोँ मतलब होगा। पऱ मे समझ नहि पायी, पऱ ताला लें कर लगाने लगी.
गेट लॉक करने केँ टाइम मुझेदेर लगरही थि.
इतने मे बापू नें पीछे सें मेरीकमर कों टच करतेहुए मेरी सहायता कि.
मेरीहिप मे उन्होंने अपने लन्ड कां पूरा प्रेशर डालाहुआ थां.
मेरी सहायता करने केँ बहाने सें वे अपने लन्ड केँ उभार कों मेरी गांड पर्र रगड़ने लगे थें.
कहीं नं कहीं मुझे भि यह नाटक अच्छा लगरहा थां.
हम् दोनों लॉक करने मे इतने व्यस्त हौ गए कि जिस्म केँ संग क्याँ हौ रहा थां, भूल हि गए थें.
पिताजी- बेटा लॉक थोडा टाइट हौ गय़ा हैं, रुको.
वे अपने उभार कों पीछे मेरी दरार मे रगड़ते हुएहिल रहे थें.
मे- हां बापू, आप् धीरे-धीरे करो.
मे हिप पऱ थोडा दबाव बनाकर खड़ी थि!
पिताजी कां लौड़ा पहले सें हि तनाहुआ थां। औऱ वोँ उसे मेरी गांड कि दरार मे घुसारहे थें.
मेरी ड्रेस हिप केँ बीच मे चली गई थि.
पिताजी नें अपने लौड़े केँ जोर सें मेरी स्कर्ट कों मेरे चूतड़ों मे घुसा दिया थां। हम् कुछदेर इसीतरह नाटक करकेमजे करतेरहे आखिरकार लॉक हौ गय़ा औऱ वे पीछेहट गए.
मे पीछे सें पिताजी कों छेडते हुए बोलि
"बापू! रसोई मे सामान रखकरनहा लेना। आपके कपडेभीग गए हें."
ये कहतेहुए मे शरारत सें मुस्कुरा रही थि। बापू मेरी मुस्कराहट सें समझगए कि मे किस कपडे केँ भीगने कि बातकर रही हूं.
बापू मेरेपास आये औऱ मेरी चूतड़ों पऱ एक् प्रेम सें थप्पड़ मारते हुए बोले
"नीलम! तुम् बहोत बिगड़ गई, होँ। कपडे भि तोँ तुम्हारे हि कारणभीग गए हें."
येकहकर वे मुस्कुराते हुएचले गए। मे भि तौलिया लें कर अपने कमरे मे नहाने चली गयीँ,.
बापू कों उत्तेजित करने औऱ पटाने कां मेराये अभियान ठीकचल रहा थां.
माँ अभि भि नहि आयी थि। मुझे विश्वास थां कि यदि मे इसीतरह सें कोशिश करतीरही तोँ जल्द हि बापू सें चुदवाने मे सफल होँ जाउंगी औऱ फिन हम् बाप बेटी केँ मजे हि मजे हें।
बाप बेटी कां अनोखा प्रेम | incest indian sex story - Next part miss mat karna
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